Sunday, February 3

"खिलौना/नटखट/बालमन "02फरवरी 2019

ब्लॉग की रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं बिना लेखक की स्वीकृति के रचना को कहीं भी साझा नहीं करें |
             ब्लॉग संख्या :-287

"नटखट"
(1)प्रस्तुति
नटखट कान्हा आकर मुझे जगाता है
मैया कह सपनों में गले लगाता है।

याद तेरी अब मुझको बेहद आती है
मस्त पवन का झौका तू बन जाता है।

नन्हा कान्हा कितना तू तड़पाएगा
आजा राजदुलारे तुझे बुलाते है।

नटखट तेरी शैतानी जग जाहिर है
ग्वाल गोपियाँ सब तुझ पर ही वारी है।

राधा-मीरा तुझ पर ही बलिहारी है
प्रेम डोर में तुमने ऐसी बाँधी है।

नटखट तेरी शैतानी जगजाहिर है
कान्हा आजा अब भी राह निहारी है।

वीणा शर्मा वशिष्ठ
स्वरचित

विधा - हाइकु
विषय - खिलौना,नटखट - बालपन


कृष्ण कन्हैया
नटखट मोहन
त्रिलोकवासी

मासूम आयु
हँसे खिलखिलाये
बालकपन

दिल खिलौना
ठसक लगे टूटे
नाजुक शीशा

सरिता गर्ग
स्व रचित
--तू खिलौना चाबी वाला---

मत कर बन्दे तू गुमान

नहीं जाना कुछ साथ
सब यहीं रह जाना है
चाबी ऊपर वाले के हाथ

खाली हाथ तू आया था

खाली हाथ ही जाएगा
छोड़ मोह माया सब कुछ
धरा का धरा रह जायेगा

न तेरा ये शरीर अपना

और साँसें भी पराई है
चलती है ये उतनी ही
जितनी चाबी घुमाई है

चलती हैं जब तक साँसें

कर ले बन्दे नेक काज
चाबी वाला खिलौना हैं तू
चाबी वाला ही जाने राज

तेरा अपना कुछ नहीं यहाँ

जितना मर्जी जतन कर ले
लेकर ऊपरवाले की शरण
साँसों की तू चाबी भर ले

स्वरचित
बलबीर सिंह वर्मा
रिसालियाखेड़ा सिरसा (हरियाणा)
विधाःःः गीतलेखनःःः

खिलौना बना जब प्रभु हाथ का,
अब सदा साथ चाहूँ मै रघुनाथ का।
नहीं चाहता कहीं द्वेषभाव हो,
सदा चाहूंगा मै प्रेमभाव का।
खिलौना बना जब...........
क्यों कर किसी से दुश्मनी मोल लूँ
खुशियाँ सभी से ही बहुमूल्य लूँ
जीवन हमेशा सुखद ही रहे,
अगर साथ हो श्री जगन्नाथ का।
खिलौना बना जब............
सारे जगत को ही अपना कहूँ
प्रीतप्रेम सबकुछ जहाँ से गहूँ
परोपकार पुरूषार्थ करपाऊँ गर
वरदहस्त हो मुझपर मेरे नाथ का।
खिलौना बना जब...........
खिचडी बनूं मै सभी जात की
याद रखूं मै अपनी औकात की
क्यों आया क्या ले जाऊंगा,
बस आशीष चाहूँ मै श्रीनाथ का।
खिलौना बना जब..........
जिऊँ मैं जबतक श्री चरणों में रहूँ
बन सके तो सदा पुण्य ही करूँ
जिंदगी मुझे जो उधार में मिली,
नहीं अहसान भूलूँ भोलेनाथ का।
खिलौना बना जब........
प्रेमपाश में सभी को बांध लूँ
प्रसन्नताऐं सभी में बांट लूँ
जिऊँ मरूँ अपने वतन के लिए
बन खिलौना रहूँ गिरिनाथ का।
खिलौना बना जब..........

स्वरचितःःःस्वप्रमाणित,मौलिक
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र
वो बचपन वाला खिलौना मुझे बहुत भाता है
मैंने वह सजाकर रखा गम में वो काम आता है ।।
मैंने उसके साथ कभी भी छेड़छाड़ नही की 
वो तो यूँ ही आँखों को जाने क्यों लुभाता है ।।

दिल तो यह आज भी बच्चा है
इसका रूप तो सदा ही सच्चा है ।।
वो तो दिमाग बीच में आ जाता है
दिल के मुकाबले दिमाग न अच्छा है ।।

दिमाग को कोशिश भर दूर रखता हूँ
दिल बच्चा है बच्चा ही समझता हूँ ।।
उस खिलौने की एक तस्वीर बना रखी
दिल में रख 'शिवम' उसी से हंसता हूँ ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 02/02/2019

विधा .. लघु कविता
***********************
🍁

गिले-शिकवे भुला करके, चलो मिलते है मुस्का के।

चलो मिलते है पहले से, हजारो गम भुला कर के।
🍁

पुराने पन्ने यादों के, जरा तुमको पलटना है।

सुनहरी यादे पलको मे से,आँखो मे झलकना है।
🍁

चलो फिर साथ चलते है, पुराने फिर वो रस्ते पे।

कि फिर खुल करके हँसते है, वो बाते याद कर-कर के।
🍁

खिलौने की उमर ना है, ना बालामन मे ही हम है।

चलो फिर साथ मिल करके, वो नटखट दोहराते है।
🍁

ये जीवन एक है मिलता, जो आधी और है बाकी।

रगडना क्यो भला साँसे भी, अपने साथ ना जाती।
🍁

तो कोशिश करके देखेगे, चलो अब मुस्कराते है।

ये कविता शेर की पढके, सभी शिकवे भुलाते है।
🍁

स्वरचित ... Sher Singh Sarraf

खिलौना बचपन का साथी
हाथ पैर से गेंद खेले नित
माटी निर्मित घोड़े हाथी
कभी खेलता कभी रूठता
नटखट चञ्चल होता बचपन
हट करता रोता ही रहता वह्
अद्भुत सुन्दर प्रिय लड़कपन
झूंठे आँसू वह् भर लेता
रुदन करे पल में हँस देता
मात यशोदा प्रिय लाडला
नयी नयी क्रीड़ाएँ करता
छोटी पतली कोमल ऊँगली
मोबाइल पर चटपट चलती
खेल खेलता कार्टून देखता
दिनभर करता रहता मस्ती
कभी कभी जो बातें करता
प्रश्नों के उत्तर नहीं मिलते
मधुर अतुलनीय वाणी से
ताली पीटे हम सब हँसते
चञ्चल चपल मधुर वाणी से
वह् सबको सम्मोहित करता
आसमान सी ऊँची बातों से
दिनभर सबका वह् मन हरता
बालक होता राजदुलारा
मातपिता आँखो का तारा
बालक से जब युवा बनता
बूढ़ी आँख का वही सहारा।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

विधा छंदमुक्त कविता
****
बालमन की जिज्ञासा को 
कोई माप नहीं पाया ,
नटखट गुड़िया माँ से बोली
वो खिलौना है भाया ।
नहीं बची अभिलाषा शेष
खेलूं धरा के अवशेषों से
अब ला दो माँ मुझे 
दूर गगन का वो "विशेष"।
तारों संग कर आंखमिचौली
नित बदलता अपना रूप,
दूर से मुझको ललचाता 
माँ....मुझे चाँद को पाना है ।
व्याकुल देख बेटी को माँ अकुलाई ,
बेटी की करी तब हौसला आफजाई
मैं बनूँगी संबल तुम्हारा
ला कर दूँ तुम्हारा खिलौना प्यारा
धरा से गगन तक सीढ़ी लगा दूँ
एक एक पग तू धीमे चढ़ 
पा ले तू अपनी मंजिल ।
कर ले मार्ग प्रशस्त अपना
छू ले तू चाँद गगन का ।

स्वरचित 
अनिता सुधीर श्रीवास्तव


विषय-बालमन
===========================
जीवन के अनमोल पल, 
सुंदर होता यह बचपन। 
मन में न कोई राग द्वेष, 
पावन होता सबका मन।। 
कल्पना के संसार संजोते, 
अद्भुत यह है बालमन। 
कभी रूठते कभी हंसते, 
कितना सुंदर यह बचपन।। 
सभी करें सहयोग जब, 
सुखी बने परिवार। 
सुख दुःख में सहभाग को,
रहें सभी तैयार।। 
हर आँगन परिवार के ,
बच्चे होते शान। 
पढ़ो मेहनत से बढ़ो, 
बनो सदैव महान।।
संस्कारी हम सब बनें,
अपनायें संस्कार। 
बढ़े मान परिवार का,
होत सदा जयकार।। 
.......भुवन बिष्ट, रानीखेत, उत्तराखंड 
(स्वरचित/मौलिक सृजन 
जिंदगी बनी इक खिलौना मेरी,
पीके गम को बहाये आंसू ।
देके दिल पाया है यही ,
खिंजा या मौत मिलेगी कबतक।

पड़े हैं फूल कदमों में वही,

पर न उजड़ा है चमन कोई।
उन्हीं को देख उठाया ये कदम,
खिंजा या मौत मिलेगी कबतक।

कोई दे दे इक प्याला गम का,

बस यही है तमन्ना सोई।
कुछ तो कम होगी ये कसक,
खिंजा या मौत मिलेगी कबतक।

स्वरचित: 2-2-2019

डॉ.स्वर्ण सिंह रघुवंशी, गुना( म.प्र.)
बेटे के बिछोह में एक माँ के हृदय की तड़प---

क्यों तू मुझसे दूर गया है , कहाँ तुझे मैं पाऊँ
नटखट आजा पास मेरे , मैं तुझको गले लगाऊँ
रूठ गया क्यों मुझसे बेटा , तू था मेरा खिलौना
खेला करती निशा दिवस मैं , तू था मेरा
छौना

रो रो कर आँसू भी सूखे , उर में ज्वाला
जलती
धुँआ उठता पल पल दिल से , यादों की लौ बलती
तुझे कहाँ ढूँढू मैं नटखट , तू था मेरा सहारा
माँ की बुझती आँखों का , तू ही था एक उजियारा 

बालकपन तेरा मैं बेटा , जी भर भोग नही पाई
जाने किस बैरी ने मेरे , सुख को नजर
लगाई
तेरी यादें मेरे उर में , नित उत्पात मचायें
जहाँ कहीं भी हो तू बेटा , वहीं सदा सुख पाये

सरिता गर्ग
स्व रचित


सारे घर में धूम मचाती 
काश मैं छोटी होती !

गुडिया और खिलौनों को 
सारे घर में बिखराती 
दौड़ती आती खेलकर 
मम्मी की गोद में सोती 
फिर उछलकर प्यार से 
पापा से लिपट जाती 
काश मैं छोटी होती !

खूब खिलौने खूब टाफियाँ 
दीदी मुझको दे जाती
और प्यारी सी रंग बिरंगी 
कपडो़ में मुझे सजाती 
जब भी जाती मैं बाहर को 
इक काला टीका लगाती 
ऊँगली पकड़कर मेरी दीदी
मुझको संग घुमाती 
काश मैं छोटी होती !!!
-------------------------------------
दीपमाला पाण्डेय 
रायपुर छ.ग.


आज का शीर्षक-#खिलौना#विधा-मुक्तक     (01)🌹माँ शारदे के निमित्त🌹मात भव से निकल जाऊँ, खिलौना ज्ञान का दे दो ।ज्ञान से मैं बहल  जाऊँ , खिलौना ज्ञान का दे दो ।फूल तेरे पगों में रख रहा यह कामना लेकर,अँधेरों में संभल जाऊँ, खिलौना ज्ञान का दे दो ।।  (02)🌹प्रेम आह्लादिनी के निमित्त🌹तड़प हो प्यार की बेहद अदाओं का खिलौना क्या ?तमन्ना पैंग भरती हो फ़ुगाओं  का खिलौना क्या ?सवाली बन के कहता हूँ  मुझे तुम आज समझादो,घिरी तूफ़ान में  कश्ती बलाओं का खिलौना क्या ?  (03)🌾साधारण विचार के निमित्त🌾प्यार,मुहब्बत,द्वेष,घृणाएं सभी खिलौने मन के हैं।क़ाबा,काशी,अज़ाँ,ऋचाएं सभी खिलौने मन के हैं।यारो,तुम से क्या-क्या कह दूँ इसका कुछ परिमाप नहीं,झीलें,पर्वत,रम्य दिशाएं सभी खिलौने मन के हैं।।स्वरचित-"अ़क्स"दौनेरिया🌹🌹🙏🙏🌹🌹🙏🙏🌹🌹


लघु कविता विषय:-"खिलौना"
हालात के हाथों का खुद बना खिलौना,आज बचपन को देखा बेचते खिलौना,हसरतें मजबूर थीयथार्थ का था बिछौना,पेट का सवाल बड़ा दर्द छुपा था कोना l
तंत्र की हार थी या विषमता का रोना, शिक्षा मंदिर के आगे याचक था सलोना,क्या जन्म ही अभिशप्त है गरीब का होना, खिलौने बेच व्यक्तित्व गढ़ा  स्वयं रहा बौना l
स्वरचित ऋतुराज दवे

आदमी, समाज, देश , सरहद, राजनीति 
दिल, वफा, धर्म, भक्ति, उपासना 
यहाँ हर चीज खिलौना है खिलाड़ी 
बताओ किस से खेलोगे
मन्दिर-मस्जिद, स्वर्ग, भगवान, खुदा 
जलती बस्तियाँ, रोता संविधान, सहमी हुई जनता 
यहाँ हर चीज खिलौना है खिलाड़ी बताओ किस से खेलोगे
सभी कुछ दौड़ रहा है -----सिर्फ एक तुमको छोड़कर
सभी कुछ मैदानों में खड़ा है -------सिर्फ एक तुमको छोड़कर 
@शंकर कुमार शाको स्वरचित


II  खिलौना / नटखट /  बालमन II 
ऊषा किरण आ चरण पखारे, पुरवई भी चंवर झुलाये...नाटक करते नटखट कान्हा, मूंदें आँखें ज्यूं सोने का...बलिहारी लीला पे उसकी, श्याम सलोनी सूरत जिसकी…. डांटे माँ ये चाहत उसकी, उँगली पे है जग यह जिसकी....
II  स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II ०२.०२.२०१९


शीर्षक:- खिलौना / बालमन
चाँद खिलौना भा गया..मेरे बालमन को..अद्भुत समां ये भा गया..मेरे बालमन को..तारों सँग अठखेलियां..करता मैं भी कभी...आकाशगंगा की भुलभुलैया में..रमता मैं भी कभी...काश! ये सब होते धरा पर..होती खुशियाँ हर आँगन...लबों की हर मुस्कान से..खिलता सबका उपवन..सितारों से होते धन भंडार..भूखा न सोता इंसान कोई..होता आसरा सबके सर...खुले आसमां न होता बिछौना कोई..झूम उठता बालमन मेरा भी...जब होती खुशियाँ चहुँओर..
स्वरचित :- मुकेश राठौड़

शीर्षक-"खिलौना/नटखट/बालमन"विधा- कविता***************छोटा कान्हा बड़ा ही नटखट, बाल लीलायें खूब दिखायें, कभी मांगें चन्द्र खिलौना, कभी धरती पर लोट जाये |
कभी राधा को देख कर रीझे,अपने सावरे रंग पर प्रश्न उठाये,ये कान्हा का प्यारा सा बालमन, माँ यशोदा को खूब भा जाये |
रूप कान्हा का कितना सलौना,गोकुल का है वो प्यारा खिलौना, नटखट सा वो प्यारा प्यारा, सबकी आँखों का है वो तारा |
    स्वरचित *संगीता कुकरेती*



*खिलौना नटखट बालमन*
नन्हे -नन्हे प्यारे बच्चे ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति !!
बाल-सुलभ चंचलता से मोहित करते, बन जाते हैं,माता- पिता ,दादा -दादीके प्यारे खिलौने!
परियों की राजकुमारी !मधुर कल्पनाओं कीउड़ान सारीमीठी- मीठी बातें न्यारी दूध सा बचपन मासूम भोलापनआनंदित करते ये सजीव खिलौने ।
कागज की बहती नाव छप- छप पानी में पाँवतितलियों संग भागनाजाग उठता अंतरमन में छुपा बीता बचपननटखट शरारती बच्चों संगउमर की झुर्रियाँबन जाती बालमन!!
दादा का घोड़ा बनना दादी की कहानियाँ माँ की मनभावन लोरी  पिता के काँधे  चढ़नासमुचित संस्कारों का मेल सीख जाते खेल-खेल 
सारे अटूट खिलौने फिर एक दिन कहीं छूट जाते हैं वक्त के प्रवाह में रह जाता हैबस यादों के गलियारे में सिमट 
मन का कोना तलाशता उम्र भर वे सारेअविस्मरणीय छूटे- टूटे खिलौने
औरवह नटखट बालमन!!!!
स्वरचित सुधा शर्मा राजिम छत्तीसगढ़ 2-2-2019प्रस्तुति: 2विषय  :खिलौना 
1
दीवारों पे टंगे दर्पण को तोड़ डाला खिलौना तोड़ नहीं पाया तो उसने अपने खिलौने से घर के सारे खिलौने तोड़ डाला 
2
धैर्य रखोखिलौनों के झंझट में मत फंसोउछलो नाचो गाओबेचैनी को निकाल फेंकोएक दिन परम फल  पाओगे मौसमी फलों का कभी  शोक मत करो 
@शंकर कुमार शाको स्वरचित

 नटखट, बालमनःविधाःःः गीतलेखनःःः
मै माटी का एक खिलौनाटूट जाऊँ कब पता नहीं है।खेले मुझसे सारी दुनिया।तुम भी खेलो कृष्ण कन्हैया।
इधरउधर फेंकें सब मुझकोमाया ठगनी मुझे बनायाकैसे क्या बतलाऊँ तुमको क्यों झंझट में मुझे फंसाया।सदा रहे यह आनाजानामै माटी का एक खिलौना।............
नटखट श्याम सलोने मेरेहम सब घनश्याम खिलौनेमहिमा जिसकी अपरंम्पार।सिर्फ चाहिए उसका प्यारतूने बनाया हमें खिलौनामै माटी का एक खिलौना।.........
ध्यान लगाऊँ प्रभु चरणों मेंअलमस्त रहूँ ईश भजनों में।टूट फूट चलती रहे मेरीतू चाहे जो मर्जी मेरी ।तेरा ही मैं बनूँ बिछोना।मै माटी का एक खिलौना.........
तू सबका है नटवरनागरतुझे उतारैया है भवसागर कृपादृष्टि तेरी हम पाऐं।क्यों सृष्टि यह हमें लुभाऐ।बस श्याम हमें बंशी सुनानामै माटी का एक खिलौना।............
स्वरचितःःःइंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेयमगराना गुना म.प्र.जय जय श्री राम रामजी



        (1)लघु कविता
देखो आया खिलौने वाला बालक का मन ललचायारोटी की खातिर.......कचरे से चुनकर... कुछ प्लास्टिक लाया
छोटा सा सलोना बालककातर नजरों से .....खिलौने को निहारता रहाभारी कदमों से आगे बढ़ा सहमकर बोला....
ओ !खिलौने वाले...मुझे एक खिलौने दे दो ना..बदले में इसे ले लो ना...
खिलौनेवाला को अपनेबचपन की कहानी... याद आ गयी...
खिलौने देकर सर परहाथ सहलाते बोलाखुश रहना मेरे बेटेना करना तू......खुशियों की खातिररोटी का सौदा...
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

टूटा खिलौनाबोझिल बालमनवो नटखट।।
मांगे खिलौनाहाट बीच मचलाचिंतित पिता।।
बेचे खिलौनेंपरिवार के लियेछोटा बच्चा।।
वो नटखटमिलता उलाहनामां परेशान।।
समाज लिखेकोरे बालमन पेशांति अशांति।।
बच्चा सीखताघर ही पाठशालाकोरा कागज।।भावुक

Vina Jha 🌷🌷🌷🌹🌹🌷🌷🌷
खिलौना/नटखट/बालमन🐵🐵🐵🐵🐵🐵🐵🐵मैं हूँ एक छोटा सा बच्चा।खेल, खिलौने मेरे साथी।
जबतक जी करता खेलता।तोड़ फेंकता, जब जी भर जाता।
खिलौना मेरा मन बहलाता।उस गाड़ी में मैं सवारी करता।
कार,ट्रक,ट्रेन पास हैं मेरे।गुड्डे,गुड़िया भी रखते हैं।
गुड्डे,गुड़िया की शादी करके।अपना मन बहलाते हैं।
लड़ते रहते दोस्तों से।जब तोड़ते वे खिलौने मेरे।
पल भर में जब ठंडा होता गुस्सा।फिर उनसे हीं खेलने लगते हैं।
मेरा सारा प्यार खिलौना।मेरा है संसार खिलौना।।🐎🐅🐓🐦🚊🚆🎠🚓स्वरचितवीणा झाबोकारो स्टील सिटी🎎🎉🎈🎆🎍🎾🏉

स्वरचित रचना: बालपनदिनांक: 2/2/2019
वो कागज़ की कश्तीवो बारिश का पानीआई याद मुझे फिर वोनटखट अपने बचपन,वो बालपन की कहानी। 
वो नंगे पांव घर से बिन बताए निकल जाना और फिर वो मम्मी की खट्टी-मीठी डाँट फटकार सुनना। 
क्या शरारत भरी उम्र थी वो हमारी और क्या मस्ती भरी थी वो हम सब की बालपन की ज़िन्दगानीवो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी। 
हँसते-गाते,खेलते-कूदते, लड़ते-झगड़ते इक-दूजे के घरों में टी.वी. देखते, खाते-पीते सो जाते थेसुनकर दादी-नानी सेहम परियों की कहानीवो कागज़ की कश्तीवो बारिश का पानी। 
बारिश में भीगना औरकिचड़ में नंगे पांवों सेछपाक-छपाक कूदनाऔर फिर कागज़ की नाव बनाकर किसी गड्ढे के जमा पानी मेंवो अपनी नाव चलानीवो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी। 
यूँ बिता दी हम सबने वोअपनी बालपन की प्यारीसी मस्ती भरी ज़िन्दगानीभुलाए ना भूले हम सब वोबालपन की उम्र सुहानीवो कागज़ की कश्तीवो बारिश का पानी। 
रौशनी अरोड़ा(रश्मि)

मैय्या तू क्या जाने?-----------------
हे मैय्या तेरी बात हमारे,कभी समझ न आता है,
तू कहती क 'चंदा' है मामा,तो घर पर क्यों नही आता है?
कभी-कभी बादल में आकर,हमको जीभ चिढ़ाता है,
कभी तो डरकर कई दिनों तक,कहीं नजर न आता है,
पकड़ में न आये पापा के,इसलिये वो खेल रचाता है,
कभी बड़ा तो कभी छोटा,नये रूप धर आता है.....
हे मैय्या तेरी बात हमारे,कभी समझ न आता है,
तू कहती अगर रहेगा भूखा,तो पेट में चूहे दौड़ लगाएंगे,
तो बोलो भोजन करने पर,वो चूहे कहाँ पर जाएंगे?
दिन-रात हमेशा पेट में रहते,या पढ़ने भी जाते हैं,
उसकी भी तो मैय्या होगी,फिर  पेट में क्यो आजाते हैं,
जीत-हार होती है उसमे या,यूँ ही दौड़ लगाता है....
हे मैय्या तेरी बात हमारे,कभी समझ न आता है,
तेरी कहानी में तो पारियां,सब कुछ तो कर जाती हैं,
पर केवल सपनों क्यों हैं?दिन में क्यों नही आती हैं?
खेल-खिलौने टॉफी, बिस्किट,उससे हम मंगवाते फिर,
होमवर्क मेरा सारा,चुटकी में करवाते फिर,
उसके साथ गगन में उड़ते,खूब सैर करवाते फिर,
मां तू क्या जाने होमवर्क से?कितना मन घबराता है....
हे मैय्या तेरी बात हमारे,कभी समझ न आता है,
©राकेश पांडेय

नटखट बाल मन🎻🎻🎻🎻🎻🎻🎻
उसने नीबू चूसा, और ज़बरदस्ती मुझे भी चुसायाफिर एक शरारती ठहाका  ,भरपूर भी लगायाउसकी भाव भंगिमा,बडी़ ही नटखट थीउसकी हर क्रिया ही, तत्पर और झटपट थी। 
चूसा हुआ नीबू उसने, मेरे गाल पर हल्का सा मलाफिर दिखाने लगी अपनी, बालपन की भोली सी कलाउसने  मुँह मेरा साफ किया, और लिया एक रुमालबार बार पोंछे उसने, मेरे बड़े प्यार से गाल।
नटखट मुस्कान भर, वह यह सब करती रहीचूसा हुआ नीबू हर बार, मेरे गाल पर धरती रहीयह छोटा सा फेशियल जैसा, मेरे चेहरे का हो गयामैं भी पूरी तरह, इस बाल मुद्रा में खो गया। 
और करुँ और करुँ,पूछती थी  प्यार सेएक विशेषज्ञ की तरह,उसने सब किया अधिकार सेलोह अंश की तरह मैं उसके, चुम्बकीय प्रभाव में झूम गयामेरे खुरदुरे गालों को, नन्हा बचपन चूम गया।
एक नई ताज़गी वह, मेरे भीतर भर गईमेरे बुझे हुए मन को, सुन्दर तरंगित कर गईबच्चों के भावों में, निराला एक संसार भराइनकी मोहक मुद्राओं से, झूम उठती है धरा। 
बच्चों की दुनियां ज़िन्दाबाद। बिषयःःखिलौना,नटखट,बालमनःःविधाःःः गीतलेखनःःः
नटखट कृष्ण कन्हैया घर मेंध्येय सभी मन भाऐ।बहुत शरारती नाती मेरा सब जन इसे सुहाऐ।खेल खिलौने इकट्ठे करताकभी तोडता कहीं जोडताचंचल चपल शोख शरारती ,सोता तब तक नहीं छोडता।हमें इसकी वाणी बहुत लुभाऐ।नटखट कृष्ण कन्हैया.....
रोज रोज टाफी मांगें येरूठ जाऐ माफी मांगें येस्नानागार से पानी फेंकेंगांव जाऐ तो आगी सेकेसबको नाच नचाऐ।नटखट कृष्ण कन्हैया.....
चाहे जितनी ठंड हो फिर भीसाबुन से  ही नहाता।रगड रगड अपने हाथों सेसाबुन खूब लगाता।नृत्य अदाओं से सबको बहुत हंसाऐ।नटखट कृष्ण कन्हैया.......
नहीं छोडता बाई को येचोटी उसकी पकडे।घोडा बना कर करे सवारीझोंटी उसकी जकडे।डंडे मारकर बाई बहुत रूलाऐ।नटखट कृष्ण कन्हैया........
कितनी बात बताऊं इसकीकैसी बातें करता।बडे बूढों सी बातें करकेहमको शिक्षा देता।अतिथि सत्कार प्रणाम से सबका आशिष पाऐ।नटखट कृष्ण कन्हैया.......।।
स्वरचितःःःइंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी"अजेय"जय मगराना गुना म.प्र.





विषरय :-खिलौना / नटखट/बालमन:-नटखट बालमन कभी खिलौनों से नही बहलता ,चाहेजितना भी रिझाओ ।मां हार गई उसे समझा समझा कर पर माना ही नहीअपनी ही जिद पर अड़ा रहा ।मैं तो चाँद ही खिलौना लूंगा कोई और नही बस एक वही ।हाथी ,घोड़ा ऊंट सब दे डाली परनही ,उसे तो वह चाँद ही चाहिये ।अब उसे कोई कैसे समझायै वह आसमां काचाँद.खिलौना नहीहै, जो तुझे ले दूं ।चुप होजा रे नटखटछोड़ ये जिद और मान जा रे लालतभी भरलाई दादी सकोरे में पानीदिखा कर परछाईंमना लिया बालमनभोला नादान था ।स्वरचित :-उषासक्सेना

Kusum Trivedi 
खिलौने घर की शान है नन्हें बच्चो की जान हैमाता पिता खिलौने लातेबच्चे फूले नहीं समाते ********************पास पडोस जाके कहते खुले मन से हँसते रहतेहाथी घोडे़ टेढीबेयर प्यारे बच्चो की आँखो के तारे ********************आप सबसे है एक विनती पास में हो जो गरीब बस्ती पुराने खिलौने वहाँ दे आयें वहाँ भी बच्चे खुश हो जायें ********************स्वरचित मौलिक रचना कुसुम त्रिवेदी दाहोद

शीर्षक :- खिलौना/बालपन/नटखटद्वितीय प्रस्तुति:-💐💐
बाजार में देखा दृश्य अनोखाबच्चे ने एक खिलौना देखालेने की उसे वह जिद कर बैठाबाप को होते तब लाचार देखा
ऐसा नहीं कि वह गरीब थाखिलौना मौत के करीब थाउसने ही लगाया था बम उसमेंबस यही उसका बदनसीब था
किस धर्म का था पता नहींक्यों कि आतंकवाद का धर्म नहींउनका तो मकसद सिर्फ दहशतगर्दीजानता वो किसी का मर्म नहीं
नफरत की आग इस कदर छाईकि वह अब घर तक है आईक्या बिगाड़ा है हमने किसी काजो अब खिलौनौं में मौत समाई
स्वरचित :- मुकेश राठौड़

II खिलौना ४ II विधा: लघु कथा 
"भइआ....खिलौने कैसे दिए"'कौन सा...बीबी जी'...."ये गाडी"....'तीस रुपये'....इधर उधर देखते हुए...."भइया...कोई पसंद नहीं आ रहा"...फिर अचानक...."ये झोले में गुड़िया जो निकालो"'ये तो बीबी जी....'"कितने की है....".'पचास की है बीबी जी...पर '...."पर क्या... ये दे दो"....खिलौने वाला सोच में पड़ गया... उसकी बेटी ने गुड़िया मंगवाई थी...सुबह ली थी उसके लिए जो कमाए थे...शाम होने को है और बाकी सामान बिका नहीं....जेब में पैसे नहीं.....घर में खाने के लिए भी कुछ नहीं...क्या करे...
उसकी बेटी को बाहर की बनी दाल खानी अच्छी लगती थी...रास्ते में उसने 'दाल' ली....भारी मन से घर को चल दिया....
II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II ०२.०२.२०१९

"शीर्षक-खिलौना/बालमन/नटखट।माँ,मुझे नये खिलौने ला दोदेखो रोती, नन्ही मुनियादेखो गुडिय़ा के बाल उलझ गये हैटूट गया है मोटर के पहिया
चकरी तो अब घूमती ही नहीकैसे, और कब तक खेलूइन पुराने खिलौने से?बंटी,बबलू नित नये खिलौने लाते
मैं तो भला समझ भी जाऊँनही समझती नन्ही मुनियानये खिलौने न पाकर देखोरो रही नन्ही मुनिया
कटोरी चम्मच बजा बजाकरदेखो खेल रही है मुनियामम्मी, तूम कब समझोगी?कब लाओगी?मुनिया की गुड़िया
सुन मुन्ने की ऐसी बातकमली ने पोछी बस अपनी आँखजल्द लाऊँगी नई गुड़ियासुन मेरे मुन्ने, मुनिया
बस दादू की दवा मैं ला दूऔर मैं ला दूँ,नई किताबफिर थोड़े से पैसे बचाकरला दूँगी मै नये खिलौने बस आज।  स्वरचित-आरती-श्रीवास्तव।

Mukesh Sharma 
" खिलौना /नटखट बालमन " एक प्रयास !
जब देखता हूं खिलौनाखो जाता है नटखट बालमन ,मैरा भी दिल कहता है बहुत हि सुन्दर होता है नटखट बालमन !
सबसे अच्छा और सच्चा नटखट बालमन ,हाथों में खिलौना देखखिलजाता है तनमन !
मैरा दिल भी चाहता हैमिल जाये फिर से बचपन हाथों में हो खिलौना और सुन्दर लगे मैरा नटखट बालमन !
स्वरचित - मुकेश शर्मा रावतभाटा ( राजस्थान )

आज का विषय खिलौना,हर सुबह,मेरी पोती आती,मुझे जगाती,दादा जी उठो,सुबह हो गई,मैं किताब लाई,मुझे कब पढ़ा गें,हम दादा पोती,किताब से खेलते,किताब उसका खिलौना है,किताब पर अंगुली रख,अ से अनार,आज से आम बोलती,उसे देख, में हंसता,पोती के संग,मैं खेल ता,बच्चे बूढो के,खिलौने होते हैंऔर बूढ़े बच्चों के,खिलौने होते हैं,एक दूसरे के साथ,हम खेलते यही खेल,बच्चे आके , बूढ़ों संग खेलतेआगे चल ,यह खेल बच्चों के आदत और चरित्र बन जाते।।देवेन्द्र नारायण दास बसना छ,ग,।।

  "खिलौना/बालमन"        (2)1होहलसवालबालमनचाँद का घरआँचल गगनखुशियों का चमन2हैमनदर्पणसुकोमलरुप सलोनाखुशियों का दोनादिल नहीं खिलौना
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल


🌹"खिलौना/नटखट/बालमन"(2)
***********************तांका कविता प्रयास मात्र***********************मन खिलौनानटखट बन केअटका दौड़ाचंचल चितवनखाली ही हाथथक के हाराउलझा सा जीवनसोच न पायाशिथिल हुआ मनदुबका बचपनबालक मनसुगठित जीवनसुदृढ नींवप्रेम भाव का लेपसफल हो जीवन।।
वीणा शर्मा वशिष्ठस्वरचित ,मौलिक
4.भा.2/2/2019( शनिवार)दैनिककार्य ,बिषयखिलौना,नटखट, बालमनविधाःःः काव्य
कान्हा अपने कृष्ण कन्हैयासब कहते हैं पीतांबर धारी।नटखट नटनागर मनमोही ये,बंशीबजैया कहें मुरलीधारी।
पीले पुष्प खिले मधुवन में,पीली लता हैंअमरबेल की। पीला रंग ललाट पर चंदन , महिमा पीतवर्ण खेल की।
पीत रंग हमें बहुत  सुहाता।पीली सरसों का रंग भाता।क्यों पीले आम कहें रसधारी,हैं नटखट चंचल मुरलीधारी।
पीत रंग कचनार का भाता।पीताम्बर श्रीकृष्ण लुभाता।बचपन बालमन ललचाऐ,सदा शरारती बचपन जाता।
बचपन बसंन्त सा खिलता है।कहीं  रोता हंसता मिलता है।कभी पीले आम चूसने मांगें येपीली आइस क्रीम चाहता है।
स्वरचितःःः ःइंजी.शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेयमगराना गुना म.प्र.जय जय श्री राम राम जी


    "बालमन"      (3)बालमन में उभरते कुछमासूम से सवाल:---- चँदा मामा का घरहै नीला आकाशजहाँ रात को निकलतीसितारों की बारातचँदा मामा दूर हैं हमसेक्यों नहीं है पास ??
बालमन की है उलझनमन में उठते हैं सवालकैसा है  ....??सूरज दादा का घरबारअपने नन्हे हाथों से..करते....आसमान छूने की बात
दादा-दादी के साथ बैठकरगप्पें मारते हैं मजेदारपूछ ही लेते अपनेमासूम से सवालदूरदर्शन के अंदर हैकितना छोटा सा संसारकाश!अन्दर जाकर..संग उनके ...मिल आता एक बार।😊😊😊😊😊😊स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

****चंद हाइकु****(1)  मेरा खिलौना नटखट बंदर झूमता मन
(2) बना खिलौना आधुनिक मानव  अनंत इच्छा 
(3) बना खिलौना मासूम का जीवन  नोंचें दरिंदे
(4)   खिलौना नहींदिल है ये हमारा  संभाल लेना
(5)    टूटा खिलौना  दुखद एहसास    छलके आँसू 
(6)   बना गरीबअमीरों का खिलौना   रूपया बोले
(7)   अच्छा खिलौना   बालक को लुभाये    मुस्कान लाये
   स्वरचित *संगीता कुकरेती*


     तेरा बालपन **************
गोल-गोल सी चंचल आँखें,         चपलता से भरी हुई ।           नन्ही-नन्ही उँगलियों में,                          सारी दुनिया धरी हुई। संग-संग बतियाना तेरा,    पोपली हँसी तुम हँसते थे।        घुटरून चलते सरपट-सरपट,           हरदम नजरों में रहते थे। देख चुप चेहरे को मेरे,        विस्मय से तेरा भर जाना।         नन्हें हाथों की थपकी से,         पा उत्तर खिल सा जाना। खूब भला था रूठना तेरा,       मुँह सिकोड़ गर्दन झटकाना।             भिन्न-भिन्न भावों में जैसे,          अपने मन की बात बताना। पाँव पटक खीसें निपोरना,        जब चाहत गोद की होती थी।        झट गले लग चिपक सा जाना,          जब - जब मैं सामने होती थी। मैंने खूब सहेज रखा है,         खट्टी-मिठी यादें तेरी।        आबाद आज भी रहती है,           उन पल में छोटी दुनिया मेरी। 
          डॉ उषा किरण


शीर्षक-खिलौना
उर में शूल सी चूभती हैंबच्चों का जब बचपना छुटता हैपरिस्थितियां गहराती हैंसमय प्रतिकूल होता हैंकंधा पर बेग की जगहउत्तरदायित्व होता हैं ।
जब नन्हें नन्हें हाथखिलौना की जगहसमस्याओं से जुझते हैअरमानों की अंगीठी पर वर्तमान झोंकते हैदो जून की रोटी कोकहीं गन तो कहीं हल ढ़ोते हैंनफरत भरी निगाहों सेखिलौने को देखते हैंउर में शूल सी चूभती हैं।
ज्योति अरूण जैनकोलाघाट (पं बंगाल)

 आज का विषय , खिलौना , नटखट , बालमन ,दिन , शनिवार ,दिनांक, 2,2,2019, 
नटखट बचपन मन को हर्षाता , सब दुख दर्दो को दूर भगाता ,
कोई नहीं है जग में ऐसा , जिसको नटखट श्याम नहीं भाता |
जीवन अपना है एक खिलौना , खेल रहा है जिसे बैठा विधाता ,
खिलौना तो बस होता मौहरा , ईश्वर को ही  जिसे चलना होता  |
मानव मन ये समझ न पाता ,  भाग्य विधाता का भ्रम उसे होता ,
ठोकर खाता उठता गिरता , तमाम उम्र बस  चलता यही धोखा |
बनी  वैसाखी  कर्मों की सहारा , और नहीं यहाँ कुछ भी चोखा ,
बालमन सा मन  को रखना , हमेशा  राग द्वेष का रखना टोटा |
नटखट गोपाल हृदय में रखना , अपना  तन तो झूठा ही होता  ,
माया मोह का न खिलौना बनना , नटखट बचपन ही सच्चा होता |
स्वरचित , मीना शर्मा , मध्यप्रदेश ,


तृतीय प्रस्तुति 😊😊😊आज के शीर्षक पर
धर्म भी बन रहा खिलौनाअब सत्ता के गलियारों काखूनी खेल चल रहा अबआमजन की भावनाओं का
खेल रहे मंदिर मस्जिद परसब खेल सत्ता के अधिकारीखिलौने ही बनकर रह गयीआम जनता भी अब बेचारी
हर जगह वोट की मारामारीलील रही मासूम बेरोजगारीखेल खिलौने है ये कुर्सी केएक कुर्सी बाईस अधिकारी
चल रही बयार झूठे वादों कीचल खेल घिनौना सत्ता समर मेंजनता को झूला रहे राजनेतासोने और चांदी के चंवर में
स्वरचित :- मुकेश राठौड़

       (4) "बालमन/खिलौना"तांका1माटी पुतलाईश्वर का खिलौनारुप सलोनास्व हाथों से नचातेरोते और रुलाते2गुड्डे,गुड़ियाबच्चे बने बारातीब्याह रचातेबालमन दुनियाखूब खिलखिलाते
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल


"खिलौना/नटखट/बालमन"(4)************************क्षणिका************************1)खिलौना*
दिल खिलौनाजो टूटाकभी न दिखता!*****2)बालमन*
बालमन ने गढ़ीमनगढंत,अनगिनत,बिना सिर पैर कीदिल चीरती कहानी।।
3)नटखट*
नटखट बचपनगरीबी की मार सेखटपट में बीता।बचपन ,हुआ पचपनपता न चला।।
4)बचपन*
पचपन में बचपन क्यों खोना?अंधेरी रात में हीतारे टिमटिमाते है।।
5)बालपन*बालपनकच्चा घड़ासुदृढ मनोबल बिनपल में चटके।।
6)*
काश!बुढापा पहले आताबचपन के दिनफिरन भूल पाते!
7)नटखट*
नटखट खिलौना!तोतली बोलीमाँ ने समझी।बुढापे मेंमाँ ने समझी'संकेत भाषा'!
वीणा शर्मा वशिष्ठस्वरचित,मौलिक

CM Sharma
II खिलौना-५ II 
विधा :: ग़ज़ल (गैर मुदर्रफ़) - खिलौने सी है ज़िन्दगी ये हमारी...
खिलौने सी है ज़िन्दगी ये हमारी...बने पल में टूटे क़ज़ा* की सवारी.... 
जभी बालपन कूद खेले गँवाया....खिलौना बना इश्क़ चढ़ती खुमारी... 
खपाया गृहस्थ आश्रम जां जिगर को....खिलौना गए तोड़ घर के खिलारी....
रहे जब अकेले जहां के समंदर....न पूछो हुई जो फ़ज़ीहत** करारी....
अगर हाथ इक तोड़े दूजा न जोड़े.... खिलौने के जैसी है किस्मत हमारी...
खुदा तुम अगर है बनाई ये दुनिया...नचा क्यूँ रहे सबको गुंडे मदारी.....
कभी खेलना अर न दिल तोड़ना तुम... अगर आज 'चन्दर' तो कल तेरी बारी....
*कज़ा          = मौत **फ़ज़ीहत    = अत्यधिक दुर्दशा/बदनामी
II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II ०२.०२.२०१९

 "बालमन/खिलौना"      (5)हाइकु1मनु खिलौनाचाबियों से चलताईश भरता2खेल,खिलौनाअपना सा लगताजग अनूठा3खिलौना टूटादिनभर ना खायाबालक रुठा4 छत क्यों नीलाबालमन उलझाकिससे पूछे5गुड्डे, गुड़ियाबच्चे ब्याह रचातेखेल खेल में6माटी का देहसंसार का खिलौनाईश खेलते7दिल खिलौनाटूटकर बिखराटुकड़ा रोया
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल



माँ मुझे एक चन्द्र दिला दो,सुन्दर सी माला बनवा दो।
बहुत दूर है देखो चन्द्रमाछोटा सा दिखता हैनही कहीं बाजार में भीऐसा चन्दा बिकता है।
जब तक नही मिलेगा चन्दाकुछ न मैं खाऊंगीनही करूंगी बात किसी से छुप कर खो जाऊंगी।
परेशान होकर माता ने पिता को बात बताई। बेटी चन्द्र खिलौना चाहेसारी बात बताई।
बड़े प्यार से पिता ने पूछा चन्दा बड़ा है कितनाबेटी बोली मेरे हाथ केनख के कोने जितना।
पूछा फिर तेरे चंदे का रंग बताओ कैसाबोली हँसते हुए प्यार सेसोने के रंग जैसा।
पिता गए बाजार तभीसोने का चन्दा लाये।पहना दिया गले बेटी केफूली नही समाये।
शाम हुई निकला फिर चन्दा,माँ का मन घबरायाक्या उत्तर देंगे बेटी कोचंद्र ने प्रकाश फैलाया।
बोली बेटी माँ से हँसकर,खिड़की से चन्द्र दिखाया।एक तोड़ कर लाये पिता जीदूसरा फिर उग आया।
स्वरचितगीता गुप्ता 'मन'


''बालमन"
न कोई द्वेश थान कोई क्लेश थाबचपन बचपन हैहरेक ही नरेश था 
पल भर में झगड़नापल भर में मिलना मिलकर दोस्तों संगनये स्वांग रचना 
माँ से बातें मनवानापापा से मुरादें बताना ऊंगली पकड़ बाजार सेपापा संग जलेबी लाना
दादा दादी के संग हंसनाकिस्से कहानी रोज सुननाछुट्टीं हुईं के नानी के घर धमाचोकड़ी खूब करना 
बलमन की यही थी दौड़ न कोई ख्वाब न कोई होड़ हो सबका प्यारा बचपन यही 'शिवम' अर्ज करि जोर 
हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"स्वरचित 02/02/2019


खिलौना1चाँद-एक खिलौना
चाँद सी एक गुड़ियाआफत की थी पुड़ियामाँ-बाप की बड़ी लाडलीखिलौनों के लिए बावलीतुनक-तुनक रोती रोनापापा,ला दो चाँद-खिलौनापलट गया फिर काल-चक्रया, भाग्य-लकीरें खिचीं वक्रएक चिड़ीमार का फंदाऔर जाल में फंस गई चंदाकिसी सफेदपोश के चंगुल मेंघनी यातानायें और जुल्मेंविवश,बैठ गई महफिल मेंकोई कसक लिए से दिल मेंअशर्फ़ियों का मगर बिछौनासोचती,सच,चाँद-एक खिलौना-©नवल किशोर सिंह 
2खिलौने का शौक बड़ा भारीउस पार बैठा व्यापारीसब्जबाग दिखाता हैआदमी को एक खिलौना बनाता हैउसके हाथों की बन कठपुतलीअपनों पर ही उठाते उँगलीखेल खिलौने का खेल घिनौनाखुद,मिट्टी में मिलता खिलौना-©नवल किशोर सिंह    स्वरचित

Anuradha Narendra Chauhan 
विषय - खिलौना/नटखट/बालपन🌺🌺🌺🌺🌺🌺सांवली सूरतलगता है प्यारानटखट नन्हा-सायशोदा का लालाकान्हा का बालपनहै मन मोहने वालाकरके माखन की चोरीबनाता सूरत भोलीगोपियों को नचाएमधुर मुरलिया बजाएहाथी, घोड़े नाचता बंदरखिलोने पड़े घर के अंदरवो तो खुद जग का रखवालाखिलौना उसका यह जग सारामुरली की धुन पर सबको नचाएजीवन के अलबेले खेल दिखाएकहीं धूप कहीं छायासब है उसकी माया***अनुराधा चौहान***स्वरचित✍


"बालमन/खिलौना"कविता
नंद का ये लालचंचल बडा कमालबालपन मे छेडताकरता धमाल,कभी फोडे मटकीमाखन चुराये हाल
2)बाबला खिलौनानंद का सलौनायमुना के तीरेवंशी बजाए धीरेदेता मुझे आबाजहै मधुर आभास
स्वरचितनीलम शर्मा#नीलू

6 भा.2/2/2019(शनिवार )बिषयःखिलौना, नटखट, बालमनःःःविधाःःहाइकुःःः
1)कठपुतलीखिलौना भगवानकौन महान2)ये बालमनखेलता स्वाभिमानजीवंत मान3)क्यों नटखटतू चुलबुलापनसुहाता जन
4)चंद्र तोडताक्यों खिलौने फोडतामुंह जोडता
5)माटी जीवनखेलता बालमनपहलवान
स्वरचितःःःइंजी.शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेयमगराना गुना म.प्र.


नमन मंच 'भावों के मोती'02-02-2019शीर्षक- खिलौना , बालमन, नटखट बालमन खिलौने साटूट -फूट और रूठ जाता हैंइसका दिल शीशे सा                                                                                      मन दर्पण हो जाता हैं ।माँ  पर अर्पण हो जाता हैं।ठबक सी लगती सुबक जाता हैं लोरियाँ मीठी सुन चुपचाप सो जाता हैं।सुबह से पहले माँ को जगाता हैं हमैशा वह हरपल रूलाता हैं।स्वर दूर से पहचान रूदन मचाता हैंनटखट बालक यह उधम मचाता हैं ।खिलौना माँ का यह नाच नचाता हैं , घूम-घूम घर में पैंजनियाँ बजाता हैं।स्वरचित -चन्द्र प्रकाश शर्मा 'निश्छल',

खिलोना/नटखट/बालमन
बचपन के वो खिलोनेचपेटे चक्की और चूल्हा शादी गुड्डे-गुड़िया कीगुडिया राधा बनी दुल्हन औरगुड्डा कृष्ण  बने  है दूल्हाराधा किसन की जौडी निरालीलागे सबको प्यारी प्यारी 
नटखट थे कान्हा इतनेपरेशान थी गोपियां सारीवृन्दावन में धूम मचायेहोली पर खूब इतराए 
थाली में  जब चाँद दिखायेबालमन पकड़ने को ललचायेहनुमान ने जब देखा सूरजफल समझबालमन उसे खाने जाये
बचपन के हैं  तीन उपहारदोस्त , खिलौने और नटखट बालमननहीं भूले जाते ये जीवनभर
स्वलिखित लेखक संतोष श्रीवास्तव  भोपाल

Neelam Sharma
इतर ,दूसरा प्रयास 
🍁खिलौना/बालपन🍁
1),🍁🍁🍁खिलौना जानसंसार का चलनखेलता जग
🍁🍁🍁बालपन मनखेलता  कमाल हैनिश्छल तन
🍁🍁🍁खिलौना मनहरी दर्शन परनिहाल जन🍁🍁🍁
चाँद खिलौनामन भरमाता हैआभा फैलाता 
स्वरचितनीलम शर्मा,#नीलू

🌹भावों के मोती🌹2/2/2019"खिलौने/नटखट/बालमन"(5)************************दोहे प्रयास*************************(1)गुल्ली डंडा खेल कर,हम हुए सरताजनही खिलौनों से हमें,अब कोई भी काज।।(2)मैया मेरी बोलती,आजा मेरे लालहाथी घोड़ा खेल के,घर मे करो धमाल।।(3)सूरज चंदा देखकर,मन मे उठे सवालविस्तृत नभ में रच रहा,ईश्वर माया जाल।।
वीणा शर्मा वशिष्ठस्वरचित,मौलिक

Manish Srivastava

विधा:हाइकुविषय:बालमन/नटखट/खिलौनाबालमन हैचाँद को मचलता-अधूरी इच्छा
खेल खिलौने बच्चों के गहने हैं-बचपन में
अच्छे लगतेनटखट से बच्चे-बालपन में
खिलौने तोड़ेंबच्चे फेंक करके-बचपन में
सजे खिलौनेदुकानों के अंदर-बीच बाजार
मनीष श्रीरायबरेली

Sarita Dadhich 


विषय-'बालमन'विधा-क्षणिका(एक प्रयास🙏)
    'बालमन'महल की खिड़की पे बैठा
वो बालमन,
चाह रहा था भीगना ,
झरती रेशमी बूँदों में।
सामनेउस झोपड़ी में रहने वाले , 
हमउम्र की तरह।
पर दो सुर्ख आँखों ने
सहमा दिया उसे,और....
थमा दिया खिलौना(मोबाईल)।🙏🙏🙏🙏🙏
सरिता विधुरश्मि😊

जिंदगी भी क्या अजब तमाशा हैं सज सवंर गई तो खूबसूरत हैं बिखर गई तो एक टूटा खिलौना हैं कभी कोयला तो कभी सोना हैं .
बचपन भी कितना प्यारा था कभी तब खिलौना ही जिंदगी थीअब जिंदगी ही खिलौना बन गई हैं जो हर मोड़ पर हर दिन एक नया खेल खेलती हैं .
जिंदगी का ये दस्तूर हैं जो दिल के करीब हैं वही दूर हैं कभी दिल ऐसे टूट जाता हैं कांच का खिलौना बिखर कर जैसे टूट जाता हैं .स्वरचित:-  रीता बिष्ट

Abhilasha Chauhan 
भावों के मोती
२/१/२०१९विषय-खिलौना/नटखट बालपन
मेरे घर आया एक ऩन्हा चांद,घर मेरा हुआ किलकारी से आबाद।बना सबके हाथों का वो खिलौना,लागे न नजरिया लगाऊं दिठौना।देखूं अपनी बेटी का उसमें बालपन,देखूं उसे हंसते तो झूम उठता मन।जिंदगी गुलजार हुई मिला खिलौना,सारे खिलौने उस पर निसार दूं,उसके एक किलकारी पर जीवन वार दूं।कैसा नटखट मेरा अंश सलोना,कहां ऐसा होता है कोई खिलौना।ईश्वर का अनुपम उपहार मिला,जब मेरे घर में ये नन्हा फूल खिला।चंचलता उसकी बड़ी ही अनोखी,देख -देख खुशियां दिन दूनी होती।
अभिलाषा चौहानस्वरचित

Pathik Rachna20/02/2019"खिलौना"क्या कहूँ मैं बात मन की!खत्म होती है सभी संभावना...था लगा यह कोई रिश्ता है पुराना,साथ चलना,मुस्कुरानाघूमना, हँसना-हँसाना...तुमको सांसों में संजोना,धड़कनों में थामना...दूर मेरे साथ आना,और फिर मुँह मोड़ना...!दिल मेरा यह क्यों लगातुमको खिलौना ?याद में तुमको बसाना,था कोई वह वक्त सुहाना...मर गई है आज हर संवेदना,भूल जाना तुम न मुझको ढूंढ़ना...
स्वरचित 'पथिक रचना'

राधे श्याम शीर्षक : खिलौनाप्रस्तुति : 4
1दुकान दुकान खिलौनोंकी कीमत पूछ रहा थाखिलौना महँगा है एक बाप अपने बच्चे कोबता  रहा थानिर्धन था वह अपनी निर्धनता पर रो रहा था दुकान दुकान खिलौनों की कीमत पूछ रहा था
2
मत रो तू निर्धन का बच्चा है खेल लो मिट्टी के खिलौनों से बाजार में खिलौना महँगा है 
3
अपने काँधे पर अपने बच्चे को बैठाकर बाजार का चक्कर लगाता रहा ठिठक जाता था रूक जाता था देखकर खिलौनों की दुकान 
4
बच्चा रो रहा था आँसू टपक रहे थे बाप रो रहा था आँसू सूख रहे थे जेब में पैसे नहीं थेफिरभी बाजार का चक्कर लगा रहा थाचुप हो जाएगा बच्चा खिलौनों के सौदागरों से खिलौनों की कीमत पूछ रहा थाएक निर्धन का बच्चारोते रोते सो रहा था 
@ शंकर कुमार शाकोस्वरचित









No comments:

:गवाह/सबूत"22 जून 201 9

ब्लॉग की रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं बिना लेखक की स्वीकृति के रचना को कहीं भी साझा नहीं करें   ब्लॉग संख्या :-425 ।। गवाह/सबूत ...