Monday, February 4

"स्वतंत्र लेखन "03 फ़रवरी 2019

ब्लॉग की रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं बिना लेखक की स्वीकृति के रचना को कहीं भी साझा नहीं करें |
             ब्लॉग संख्या :-287














1भा.3/2/2019( रविवार)
बिषयःः# मैं और मेरा देश#स्वतंत्र लेखन,
विधाःःः काव्यः

जय जय परमेश्वर मेरे
मुझको दें वरदान।
सदा गाऊँ गुणगान तुम्हारे,
बन पाऊँ सच्चा इंसान।

महान बनाऐं सारी दुनिया,
मुझे शांति भरपूर मिले।
कल्याण करें इस जग का प्रभु
खुशियां हमें सब दूर मिलें।

कोई नहीं रहे यहां भूखा प्यासा, 
सबको तन ढकने को वस्त्र मिलें।
नहीं निराशा हो जीवन में,
दिलों में सबके प्रेमास्त्र मिलें।

वैरभाव नहीं रागद्वेष हो,
चहुंओर खुशहाली आऐ,
गौरवशाली हो भारत ये,
चारों तरफ हरयाली छाऐ।

हर्षित पुलकित हो मानव,
सभी हमें रसवंत मिलें।
मधरम हो भारत की झांकी,
हमें सदैव ही संत मिलें।

सोने की चिडिया बन जाऐ फिर
मेरा देश महान बने।
जगमग जगमग करे राष्ट्र ये,
सुंन्दर सभी जहान बने।

स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना, गुना म.प्र.
जय जय श्री राम राम जी
3/2/2019(रविवार )
#मै और मेरा देश#


प्रेम पापिनी...
***************

जीवन-मधुर-पावन-मधुकरणी
में, घोर-कलुष पापिनी तुम आयी
सुवासित-हर्षित-उल्लासित-
ऋतु-पति की वल्लरी मुरझाई...
री प्रेम बता 'तू फिर क्यों आयी'

पारितन्त्र हुये स्वतंत्र स्वपन-
नैनन-नीर-नित-धार बहे
नही पुष्प कोमल-सुन्दर-
है, कंटक स्वीकार कहे
हहर-हहर-हहके- हृदय-व्याकुल
प्रेम-पलक-पीड़ा अधिकाई
री प्रेम बता 'तू फिर क्यों आयी'

मौन रहे वाचाल बने
रचे जाल षड्यंत्र करे
दुविधा-दून-बढाये दिन-दिन
सुख-दुख संग अभीयंत्र करे
नेह-विनेह-विमुख सन्मुख-
कातर-कातर नैन भिगाई...
री प्रेम बता 'तू फिर क्यों आयी'

मैं न एकल सो हूँ जग में
जीनो प्रेम ठगो-ठगनी बनकर
राधा-विरह ब्रजधाम है जाने
मीरा फिरी जोगनी बनकर
करे प्रेम-पतिंगा मरे जलकर
पर नैनन-नेह नही विसराई...
री प्रेम बता 'तू फिर क्यों आयी'

स्वरचित....राकेश पांडेय,



नमन मंच-🌹भावों के मोती🌹
सुप्रभात-मित्रगण
💐जय वीणा पाणि सरस्वति माँ💐
दिनांक-03/02/2019
शीर्षक-स्वतंत्र विषय लेखन
विषय-श्रृंगार रस
उप विषय-#प्रिय की तड़प#
विधा-🌾🌴गीत🌴🌾
⭐⭐⭐☀☀☀⭐⭐⭐
गीत मेरा संगीत मेरा तू है जीवन का सार।
              मीत मेरे तुझे पुकारे प्यार।।🌹।।(टेक)
तेरे बिन सूना लगता है खुशियों का संसार।
               मीत मेरे.....................।।🌹।।
कब तक अमृत रस बरसाएं ये बादल कजरारे?
कब तक मार मेह की झेलें घर आँगन अरु द्वारे?
गर्ज-गर्ज जो उठे जोर की पावस की अँगड़ाई ।
सुन-सुन व्याकुल हो जाती है यादों की तरुणाई ।
रणभेरी के घोर नाद में पपिहा कहे पुकार।।🌹।।
तनहाई की सेज पै सो गईं चाहों की बारातें ।
सन्नाटों की चादर ताने आवाज़ों की घातें  ।
मिल-मिलकर बिछुड़ें ये कब तक जाने साँझ-सकारे?
तेरे बिन बेचैन से लगते हैं मुझको बेचारे ।
अँधियारों में डूब गई सुख सपनों की झनकार।।🌹।।
गली-गली में डगर-डगर पर नाच उठी पुरबाई ।
वृक्ष वल्लरी सब झकझोरे ये मारूत हरजाई ।
जब मैं तेरे ध्यान में बैठूँ मेरा जी ललचाए ।
मीठे-मीठे अहसासों से दर्द नया उपजाए ।
दिल को 'अ़क्स 'चुभन देती है इसकी मीठी मार।।🌹।।
स्वरचित-R.s.दौनेरिया
🌾🌾🙏🙏🌾🌾🙏🙏🌹🌹🌾🌾


मोरे मृत्यु पाहुन
**************

सोच रही हूँ आज सजा लुँ
तन-मन ऋतु-यौवन को
भेंट करूँ क्या जो आ बैठे
मेरे मृत्यु-देव पाहुन को

अब खोलेंगे बन्धन सारे
कहेंगे प्रिये सब त्याग चलो
ये बड़ा ही नीरस गरल-सिंधु है
बन खग इसको लांघ चलो

है पुण्य पर्व इसे व्यर्थ करूँ न
सबकुछ आज लुटा दूँ मैं
जो मांगें मोरे प्रियतम पाहुन
सन्मुख आज सजा दूँ मैं

लाज हया सब त्याग चलूँ मैं
बस्त्र खोल दूँ सारे तन से
नही रहे कुछ मध्य हमारे
घुल जाये सब कनक-किरण से

जो स्वप्न कभी देखा था कि-
ऋतु-पति संग श्रृंगार करूँ
मस्तक पर नख-दीप सजाये-
तेरा अंगीकार करूँ
तिमि आयी यौवन पर अपनी
दमकी-दमक-विभावरी गगन में
चमक उठी वह राह सरल ही
जो राह गयी मेरे 'पी' के भवन में

खोज रहा था मन युग-युग से
जिस अलबेले पाहुन को
हुई मुक्त तो अब पा लूँगी
उस मतवारे साजन को

अब तक फंसी थी गरल स्रोत में
पर अब पथ को जाना है
हर-क्षण हर-पथ है पाहुन का
अब मैंने पहचाना है

दूर हुआ सब विरह-वियोग
भय-मद-मोह को त्यागी हूँ
मिली श्रान्ति मिली शीतलता
जो अब 'पी' की अनुरागी हूँ

अब 'पी' पाहुन अनुरागी हूँ....

स्वरचित....राकेश पांडेय



अब ऐसे वैसे लोग असरदार बनेंगे
गद्दार अब कोम के सरदार बनेंगे।

चोरी डकेती आम होगी हत्या सरेआम
धंधा काला रिश्र्वत अब व्यवहार बनेंगे।

जिनको नहीं मतलब होगा जन सेवा से
वे लोग ही तख्तो ताज के बिमार बनेंगे।

लालच के खातिर बैंच दे बच्चों को अपने
वे दुश्मनों के साथ के हथियार बनेंगे।

न राम को जाने और न रहीम को माने
मजहब के ऐसे लोग ठेकेदार बनेंगे।

देखो अब आ गया है वक्त कयामत
गुण्डे मवाली बड़े सियासतदार बनेंगे।         

कोम की परवाह हामिद ना ही वतन की
वतन फरोश मुल्क के मुख्तार बनेंगे।

 हामिद सन्दलपुरी की कलम से




भावों के मोती दिनांक 3/2/2019
स्वतंत्र लेखन 
लघुकथा विधा

 सब हो साथ
हाथ में हो हाथ

बाबू जी मुझे रिटायर हुए तीन साल हो गये मेरी पेंशन अभी तक नही बनी न ही कोई और पैसा मिला है बेटी की शादी करनी है , बाबू जी बडी परेशानी में हूँ।"

रमा हाथ जोड़ कर प्रकरण डील करने बाबू के आगे गिडगिडा रही थी।  

लेकिन बाबू उसकी तरफ ध्यान नही दे रहा था। जिनसे पैसों के लेनदेन की बात हो गयी थी उनके कैस निपटा कर कमरे से बाहर आ गया ।

रमा असहाय सी देखती रही ।

आखिर वह बड़े अधिकारी के पास जाने लगी लेकिन उसे रोक दिया ।

 शाम को रमा घर गयी लेकिन 

उस के चेहरे पर उदासी छाई हुई थी 

वह कोने में जा कर बैठ गयी , अभी संगीता की शादी की तैयारी भी करना है पेंशन और बाकी पैसा नही मिले तो कैसे काम होगा ? संगीता के पिताजी अब दुनियां में नहीं  है सब जिम्मेदारी उसी पर है ।

तभी संगीता आयी और दस हजार रूपये रमा को देते हुए बोली:

" कल यह पैसे बाबू को दे देना इतनी रिश्वत वह मान्ग रहा है ना ।"

रमा ने संगीता को देखते हुए कहा :

" बेटी इतने पैसे कहाँ से लाई एक महिने बाद तेरी शादी होनी है ?"और वह शंकालू निगाह से उसे देखने लगी ।

तभी बाहर से संगीता की जिससे शादी होने वाली थी वह दामाद परेश अंदर आया और बोला :

" माँ जी आप जैसा सोच रही है वैसा कुछ नही है । एक दिन संगीता मुझे मिली थी लेकिन हमेशा खिलखिलाने वाली संगीता उस दिन एकदम खामोश थी वह तो कुछ बता नही रही थी लेकिन बहुत जोर देने पर उसने यह बताया तब मैने ही उसे यह पैसे दिये है अब कल यह पैसे देने बाद जब आपका काम हो जाऐगा तब उस बाबू पर आगे कार्रवाही करवाई जाऐगी मैने विभाग में शिकायत कर दी है और हाँ आप चिंता मत करिऐ मुझे सिर्फ पढी लिखी समझदार संगीता चाहिये शादी बिल्कुल सादी होगी अभी आपकी दो बेटियाँ और उनका भी तो ध्यान रखना है ।"

रमा की उदासी मुस्कुराहट में बदल गयी थी ।

वह मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना कर रही थी सभी को परेश जैसा दामाद बेटा मिले अब वह अकेली नहीँ थी । काश उसने संगीता के बाद बेटे की चाह नहीँ  की होती ? 

स्वलिखित

लेखक संतोष श्रीवास्तव भोपाल



''आज के हालात"

आज तो सब कुछ सस्ता है ।
इंसान अब छोटी पर हंसता है ।
बड़ी बात से वह दूर बचता है ।
छोटा धंधा अब खूब पनपता है ।

बड़ी चीज लिये जो बैठे वो रोते हैं ।
सबकी पसंद अब गोलगप्पे होते हैं ।
दूध मलाई के स्वप्न कोई न संजोते हैं ।
सोना कैसे पहने घर में ही वो खोते हैं ।

देख जमाने के हालात हम हंसते हैं ।
अब तो चरित्र भी हुये बहुत सस्ते हैं ।
सिक्के भारी हैं तभी तो वो बजते हैं ।
हर जगह 'शिवम' अब वही दिखते हैं ।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 03/02/2019


नमन 'भावों के मोती'
तिथि: 03.02.2019
विषय: स्वतंत्र लेखन
विधा: छंद मुक्त कविता

नारी शक्ति

सुनसान रास्ता बीच राह से 
डरी सहमी जार रही थी
न जाने क्यूँ अनहोनी की शकां
 जहन में झुनझुना रही थी
नकाबपोश को देख कर 
शकां हकीकत में बदलती दिखाई दी
सांसे थम सी गयी 
जब उसने पुकारा
है अबला!  इस सुनसान राह में
क्यों अकेली जा रही .?
भाई आपसे बात नहीं करनी
नारी सहमी सी बोली 
और निरन्तर चलती रही 
गहनें दे दे  चुप चाप.....
नहीं सुनी बस चलती रही
हथियार निकाल गले से लगा
 बोला, 
बोल रहा हूँ आखिरी बार
हा देती हूं रुको जरा
कानों के कुंडल, हाथों के कंगन 
सब दिए नारी ने उतार।
अब मंगलसूत्र की बारी थी
नही उतारा
फिर... धमकाया नकाबपोश ने 
नारी ने धक्का दे मारा
हैरान हुआ गिरा पड़ा
अबला कैसे चंडी बनी?
नारी शक्ति को महसूस किया
फिर उठा नहीं 
क्योंकि उसी की तलवार
थी उसी पर तनी

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


नमन मंच भावों के मोती
स्वतंत्र लेखन
शीर्षक     सोच
03  02  2019 रविवार

सोच सोच  में बड़ा फर्क है
सोच बनाती मन को अंधा
नारकीय होजाता तन मन
जीवन बन जाता अति गंदा
     बढ़ती सोच सकारात्मकता
     जन जन का सौभाग्य जागे
     माया मोह बंधन सब खोले
     द्वेष  ईर्ष्या जग नित  त्यागे
सोच भक्ति है सोच मुक्ति है
सोच पावन हर दुःख हरति
जैसा जीवन कर्म करे नित
वैसा फल ही उसको भरती
      सद संगति सद सोच है
      बद संगति बद सोच है
      पूरा जीवन जी कर भी
      नहीं बदलती यह सोच है
सोच कर्म है सोच धर्म है
सोच है रामायण गीता
सोच मर्म है सोच शर्म है
सोच रखे रीता का रीता
      अच्छी बुरी एक सोच है
      पाप पुण्य जग सोच है
      सत्य असत्य मार्ग चलावे
      अहिंसा परमोधर्म सोच है
सही सोच मंजिल पंहुचाती
शिक्षा के नव दीप जलाती
नहीं रुलाती सदा हँसा ती
असम्भव को सम्भव बनाती।।
स्व0 रचित ,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।



नमन "🏵️🌼🏵️भावो के मोती"..🏵️🌼🏵️.
🌼
...  मुकर जाते है सब अपनी ही बातों से ,
जब कोई अपने लिए मांगता है कुछ उनसे..🌼
 गैर हो जाते वो अपने ...
जो कल बिन बात के ही गले से लगा लेते थे ,
फिक्र नहीं की ज़माने ने रुख मोड़ लिया हमसे ,
ये तो फितरत है इस जालिम ज़माने की..
 नहीं करते हम  शिकवे गिला सब से क्युकि हम जानते है हम गैर हो गए हो उनके लिए 
लेकिन वो आज भी हमारे अपने ही है...
और गिला गैरो से करते है अपनों से तो सिर्फ मोहब्बत की जाती है.....🌼🌼🌼🌼




नमन भावों के मोती 
     स्वतंत्र लेखन 

1

जो चले गए हैं 
उनकी राह ताकना क्या
जो अतिथि आएंगे
उनका कहना क्या 
यह दुनिया मुसाफिर खाना है 
यहाँ हमसफर बनने का 
वादा ना करो 
जो अतिथि आ रहे हैं 
उनका अभिनंदन करो 

2

मुस्कुराने दो मुझे 
रोको मत 
जिन्दगी दो दिनो की है
पता नहीं कब मौत आ जाए

3

निहारने दो मुझे
टोको मत
अभी चाँद चमक रहा है
पता नहीं कब अमावस हो जाए 

4

जब झिलमिल तारों को देखता हूँ
तब अपना गम भूल जाता हूँ 
जब चमकते चाँद को देखता हूँ 
तब रोटी खाना भूल जाता हूँ 
यह जिन्दगी आँसू के सिवाय 
कुछ भी नहीं 
जब मुस्कुराते बच्चों को देखता हूँ 
तब अपना दर्द भूल जाता हूँ
@ शंकर कुमार शाको 
स्वरचित


3-3-2019
नमन मन्च।
साथियो सुप्रभात।
🌷🌷🌹🌹🌷🌷
           गीत
         🍀🍀🍀
वो जो दिल में मेरे रहते थे कभी 
जाने खो गये कहाँ देखते,देखते 
कभी वो सामने रहते थे सदा।
झलक दिखलाते नहीं  अब,देखते,देखते।
ना तसल्ली हीं दी।
नाहीं बोला हीं कुछ।
गायब हो गये देखते,देखते।
जो बनके आये थे होठों की मुस्कान मेरी।
आँसू बन गये नैनों की
देखते,देखते।
वो जो............
ऐसे गायब हुये वो जहाँ से मेरी।
जैसे खुशबू फूलों की
देखते,देखते।
दुनियाँ मेरी सुनी कर गयेवो
जीकर क्या करना है
देखते,देखते।
वो जो............
याद आने पर ढूँढना हवा में मुझे।
पर ना दिखेंगे कहीं
देखते,देखते।
खुश रहें वे,हमने छोड़ा महफ़िल।
ना याद आना मुझे
देखते,देखते।
वो जो..............
चाहे दुनियाँ मेरी उजड़ गई अब।
पर जहाँ ऐसे हीं चलेगा
देखते,देखते।
खुश रहो तुम सदा ये दुआ है मेरी।
चले तेरे जहाँ से
देखते,देखते।।
वो जो.............
🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼
स्वरचित
वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी
🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀



नमन मंच।   
स्वतंत्र। लेखन
03/02/19
*****
ख़्वाब...
ये चाह थी मेरी, तुझे छूकर कभी देखूँ
हसरतें अधूरी ,तुझे जी भर  के जी लूँ ।

तुझमें वो हकीकत बन इक रोज आये थे
सफेद लिबास में वो मन को बड़ा भाये थे
समंदर का किनारा था ,रेत के घरोंदे थे
पत्थरों पर बैठी थी,सुर्ख गुलाब वो लाये थे।
लहरों का यूँ कदमों को चूम चले जाना
ठंडी मस्त बयारों का यूँ सरगोशियाँ करना..
क्षितिज के पार यूँ सूरज का ढलते जाना...
उनका धीमे से मेरे  काँधे को यूं छू लेना...

ख़्वाब में  देखे  हकीकत को जी रही हूँ
उस छुअन को आज भी महसूस कर रही हूँ

उनके ख्वाबों में जाकर मेरी याद दिला देना
बरसों से मै सोई नहीँ ,उनको जा बतला देना
वो अब तक कैसे है ,उनकी सुध लेते आना
हसरतें मिलन की हुई पूरी,ख्वाबों को छू कर जाना ।

स्वरचित
अनिता सुधीर



भावों के मोती 
************
स्वतंत्रलेखन के तहत
————————-
हर मौसम दोस्तों के आने जाने का मौसम बन जाए 
---------------------------------------
दर्द को इतना न समेटो ख़ुद में कि वो ज़ख़्म बन जाए
वक़्त को इतना तो वक़्त दो कि वो मरहम बन जाए।

बादल कारे गुज़रना मेरी गली से आहिस्ता-आहिस्ता
यूँ न हो कि ये तेरा पानी  कहीं चश्मे- नम बन जाए ।

दस्तुरे-वफ़ा पर आकर ख़त्म हो जाती हैं दलीलें सारी
डरता हूँ , मैं कोई बात करुँ और वो क़सम बन जाए।

इंतज़ार का हक़ चलो हम अपने हिस्से में कर लेते हैं
हलकी सी आहट भी न कहीं तुम्हारा वहम बन जाए।

तसववुर में ही सही, यारब कोई तो ऐसा करिश्मा हो 
हर मौसम दोस्तों के आने जाने का मौसम बन जाए।

मेरी तन्हाई करती रही गुफ़्तगू,माह ओ अँज़ुम से ताशब
आग़ोश ए सहर वो एहसास अकसर शबनम बन जाए।

फिर  यही सोचकर आदतन  निकल पड़े हैं सफ़र  में 
अज़नबी ही सही,दौराने-सफ़र वो हमक़दम बन जाए।

ऐसे ख़्वाब न सज़ा बेनूर सी इन आँखों में ऐ ज़िंदगी !
जिसे मैं हक़ीक़त समझूँ और वो मेरा भरम बन जाए ।

All rights reserved (C)भार्गवी रविन्द्र...

आग़ोश ए सहर -सुबह की बाँहों में , चश्मे नम -आँसू , 
तसववुर - ख़यालों में , माह ओ अंज़ुम - चाँद और तारे

: स्वतंत्र लेखन - सुप्रभात - नमन भावों के मोती

"मोती" - हाइकु
1.
मोती मन के
शब्द व्यंजन माला
ईश अर्पण

2.
'भावों के मोती'
साहित्यिक सागर
शब्द हैं सीप

3.
शिव के अश्रू
हर जन सुखाय
रुद्राक्ष मोती

4.
सीप में मोती
अधर्म अत्याचार
भ्रूण की हत्या

5.
मोती दर्शन
आत्मा का साक्षात्कार
ध्यान समाधि

"स्वरचित-सी.एम.शर्मा"
03.02.2019



नमन भावों के मोती
  3 फरवरी 2019
  विधा: लघु कविता 
 विषय:सुबह का  प्रहर
----------------
उठ सुबह हुई
तज अलसाई
सूरज की रोशनी आई
पूरब में लाली छाई
चहुँ ओर प्रकृति मुस्काई
जीवन ने ली अंगड़ाई
फूलों ने सुगंध फैलाई
चिड़ियों की आवाज भी आई
बच्चों ने भी दौड़ लगाई
सेहत की जो सही दवाई
उठ सुबह हुई
तज अलसाई

मनीष कुमार श्रीवास्तव स्वरचित रायबरेली


"नमन-मंच"
"स्वतंत्र-लेखन"
नफरतें नही हम प्यार करते है
सबकी सलामती का दुआ करते है
उपवन मे है फूल हजारों
उनकी सलामती का हम दुआ करते है

नफरतें नही हम प्यार करते है
बदला नही हम  माफ करते है
जिगर में अपनो के हम रहते है
अपने जिगर मे हम अपनों को रखते है

नफरतें नही हम प्यार करते है
तेरी आस पर हम बिश्वास रखते है
मुहब्बत करना आसान नही
फरियाद तो हम सभी करते है

नफरतें नही हम प्यार करते है
चमन मे फूलों से नही
हम दुआ के हजारों रंग से प्यार करते है।
नफरतें नही हम प्यार करते है।
स्वरचित-आरती-श्रीवास्तव।

भावों के मोती नमन 
दिनांक: 03/02/2019
    स्वतंत्र लेखन 
------------------------------
लिफाफा समझकर 
मुझे फाड़ मत देना 

अपने दिल का पैगाम 
समझकर 
मुझे बंद मत कर देना 

उन्मुक्त हूँ मैं 
उन्मुक्त रहने देना
स्वछंद हूँ मैं
स्वछंद रहने देना
कवि के हृदय का तार हूँ मैं
जब जी चाहे मुझे झंकृत कर लेना 

लिफाफा समझकर 
मुझे फाड़ मत देना

मैं विशुद्ध अनुभूति हूँ 
हृदय की मुक्ति की साधना हूँ 
अलौकिक आनंद अनुभूति हूँ 
मुझ में सत्यम् शिवम् सुन्दर् हैं 
वाणी का शब्द विधान हूँ

लिफाफा समझकर 
मुझे फाड़ मत देना 

अपने दिल का पैगाम 
समझकर  
मुझे बंद मत कर देना

लिफाफा समझकर 
मुझे फाड़ मत देना

@ शंकर कुमार शाको 
स्वरचित



नमन ---- भावों के मोती 
दिनाँक ---- 03/02/2019
विषय ------ स्वतंत्र लेखन 
विधा ------- गद्य 

"" दुनिया में प्यार विश्वास और जिंदादिली भरपूर है 💖 बस कमी है तो इसे उपयोग करने वालों की , हमारे पास सिर्फ आज है जिसे हम जी💖 भर कर जी सकते हैं बीता हुआ कल वापस नहीं आता ,  और आने वाला कल हमारे लिये आये ये जरूरी भी नहीं । इसीलिये जीवन का हर पल का मजा लो इसे व्यर्थ ना जाने दो । खुद भी हंसो और दूसरों के भी आँसू पोंछते जाओ जिंदगी खुद ब खुद मुस्कुरा उठेगी ।।

दीपमाला पाण्डेय                                         
रायपुर छ.ग.



नमन भावों के मोती💐
कार्य:- स्वतंत्र लेखन
विधा:- छंद रहित कविता

निहत्थे की सच्ची बोली
गर्म होकर
बाहर नहीं निकलती
पर
मुर्दा इंसान में
किलकारी भर देती है
वही बोली
और
दूर छिटक जाती हैं
भरी बंदूकें
एक बोली सुनकर।

बन्दूक बाले भाई?
खाली हाथ ललकारने पर
तुम्हारी बन्दूक
गोली भी नहीं चला पाती
एक अनुगूँज सुनकर।

(मेरे कविता संग्रह से)
डॉ.स्वर्ण सिंह रघुवंशी, गुना(म.प्र.)



आज का विषय स्वतंत्र रूप।
हाइकु गीत, वसंत की रात।।
धूल उतारे,
बगिया भी पहने,
फूलों गहना,
महक उठे पात,
आज की रात,
वसंत की है,रात,
बात न करो,
तुम गमन की ही,।
रोज न होते,
सपने विवाहित,
प्यास प्रतीक्षा,
याचक बनकर,
बांट जोह ते,
वसंत की रात है,
बात न करो,
तुम गमन की ही,
गदराई है,
आज गेहूं की बाली,
सरसों खड़ी,
बजा रही है ताली,
मस्ती में झूमें,
तुम गमन की ही,
बात न करो,
वसंत की रात है,
सेज निगोडी,
सौत सी ताना मारे,
प्राण पि रात,
चुभन वाली बात,
प्राणेश नहीं,
वसंत की रात है,
बार बार तो,
ऐसी रात न आती,
सारी उमर,
हम कांटे ही बीने,
छांह मिली है,
हरसिंगार,तब
 ऋतु मौसम ,
किसकी हो जायेगी,
जाने को कब,
आंखें मत चुराओगे,
आज की रात,
वसंत की रात है,
बात न करो,
तुम गमन की ही,
याद आती है,
आंखें भर आती है,
ऐसी रात न आती।।
देवेन्द्र नारायण दास बसना छ,ग,।।


नमन भावों के मोती 🙏🙏🌹
 दिनांक - 3  / 2 / 2019 
 विषय - स्वतंत्र लेखन 
 विधा ...कविता 
 🌼🌼🌼🌼🌼

आए न जो लबों पे 
वो बात बार बार लिखना 
 फिर मिलेंगे दो दिल 
 कब नहीं जानते 
 किया तूने मेरा कितना 
 इंतजार लिखना 
 दर्दे दिल भी क्या चीज है 
 मुहब्बत में करती आँखें 
 इकरार लिखना 
 याद आ गये जो 
 गुजरा सावन का महीना 
 तन बहके मन बहके 
 खुश्बू उस खूबसूरत 
 सी हरसिंगार लिखना 
 कर लिया था कैद 
 तुम्हें जुल्फों मे जो 
 महकती वो रात लिखना ..!!
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
  तनुजा दत्ता (स्वरचित )



नमन भावों के मोती
दिनांक 03/02/2019 

     बिन बरसा सावन

मन मेरा रीता - रीता सा, 
बिन बरसे सावन बीता सा।

अँखियाँ मेरी सूनी - सूनी,
रातें जैसे खाली - खाली,
बदली में चन्दा छुपा सा, 
वक्त भी है जैसे रूठा सा,

   मेरा मन रीता - रीता सा,
  बिन बरसे सावन बीता सा। 

थामा है दामन यादों का, 
क्या करूँ मैं तेरे वादों का, 
करते हुए मीठी बातें, 
पहलू में कटती थीं रातें। 
वो ख्वाब सुनहरा टूटा सा, 
मन का आँगन लूटा सा। 

  मेरा मन रीता - रीता सा, 
   बिन बरसे सावन बीता सा। 
 तेरे बहाने अब न झेलूँगी, 
अबकी होली संग खेलूँगी, 
न करना अबकी अनदेखा, 
मैंने भेजा है जो संदेशा। 
तुम आओ अब न देर करो, 
ज्यों आता सूरज हँसता सा। 

 मेरा मन रीता - रीता सा,
 बिन बरसे सावन बीता सा। 

       डॉ उषा किरण





हो गए टेक्नोक्रैट चौधरी
नया जमाना, राग पुराना,
नहीं भला है ये फसाना,
बनेंगे बड़े ग्रेट चौधरी,
खुद को करे अपडेट चौधरी।
ढूढे है डिजिटल ट्यूटर,
सीख लिए अब कंप्यूटर,
द्रुतगति में अब कहाँ शटल,
आसान हुआ कुंजी पटल,
टिक, टिक ,टिक टिपते
फेसबुक,ट्विटर,गैजेट चौधरी।
हो गए टेक्नोक्रैट चौधरी।
 पैनी नज़र का है ये मरम,
न कोई संशय,न कोई भरम,
सुकुमार भये,तज कठिन श्रम,
कंप्यूटर से ही अब सर्व करम,
चिट्टी-पत्री या संग,समागम,
देह हिलाना बहुत बिषम,
छोड़ी कसरत,लिये बड़ी हसरत,
यूट्यूब के मज़े,फुरसत दर फुरसत,
निकल रहा है पेट चौधरी,
कर देगा सब मटियामेट चौधरी,
हो गए टेक्नोक्रैट चौधरी।
-©नवल किशोर सिंह
  तिरुचिरापल्ली
स्वरचित

3/2/19
भावों के मोती
विषय- स्वतंत्र लेखन
----------------------------
जब मन उदास होता है
तब सोचता कुछ करता कुछ है
हम कहना कुछ चाहते हैं
पर कहने कुछ लगते हैं
ऐसा तब होता है
जब कोई अपना हमें
छोड़कर जाने लगता है
हम रोकना चाहते हैं
पर रोक नहीं पाते हैं
उस समय खुद को
बड़ा ही बेबस पाते हैं
किस्मत के आगे हम
मजबूर नजर आते हैं
तब दिल का दर्द
आँसू बन बह निकलता है
शब्द अंदर ही अंदर 
दम तोड़ जाते हैं
संसार बेगाना-सा लगने लगता है
पर फिर भी हर ग़म पीकर
 जीना पड़ता है
अपनों के लिए दर्द में भी 
हँसना पड़ता है
यही जीवन का दस्तूर है
जिसके आगे सब मजबूर हैं
***अनुराधा चौहान*** मेरी स्वरचित रचना ✍


भावों के मोती
दिनांक - 03/02/2019
स्वतंत्र लेखन के तहत
विधा - गजल

मुझे हरदम  मुस्कुराने की आदत है
हँसकर दिल बहलाने  की आदत है,

शरारतों  ही  शरारतों  में  करके तंग
महबूब  तुम्हे  रिझाने  की  आदत है,

कुछ  तुम  चलो  और  कुछ  मैं  चलूँ
दुनिया की तो बहकाने की आदत है,

कुछ  नहीं  रखा  गमों की  तन्हाई में 
खुशबू बनकर महकाने की आदत है,

भरी महफ़िल में भी  बैठा रहा  तन्हा
हर किसी से गम छुपाने की आदत है,

बस गया  जो दिल की  गहराइयों  में
उस  पर  जान  लुटाने  की  आदत है,

स्वरचित
बलबीर सिंह वर्मा
रिसालियाखेड़ा सिरसा (हरियाणा)


नमन मंच
दिनांक:03/02/19
विषय:स्वतंत्र 
छंदमुक्त

छलती हूं, छिलती हूं, खुद को ..
थोड़ा-थोड़ा हर बार ...
जब भी लिखती हूं।
उतरती हूं, डूबती हूं ,उबरती हूं ....
भावों के अतिरेक में,
कुछ नया लिखने को।
 पिघलती हूं, मचलती हूं, मथती हूं ...
विचारों को अपने,
लेखक बन कहीं छपने को...
चलती हूं, ठिठकती हूं,संभलती हूं...
पैमाने जहां पे परखने ,
आत्मावलोकन को।
झुकती हूं ,वर मांगती हूं..
वीणावादिनी माँ शारदे से,
सच लिखूं, सम लिखूं ,
जब लिखूं, तुझे लिखूं।।

नीलम तोलानी
स्वरचित


*निःशब्द कर गए तुम*
"""""""""""""""""""""""""""""

भावों के मोती,,रविवार/3-2-19/ स्वतंत्र लेखन..

शब्द भी आजकल मौसम की तरह
बदलते हैं दिन-रात तापमान अपना...
ये सुकून भी देते हैं कभी...और
जला भी देते है आँख का सपना...।

पीर की बीन पर रखे शब्द स्वर बन
आँसुओं का कलेवर निखार देते हैं...
शब्द निःशब्द होकर जिन्दगी के पृष्ठ पर
वेदनाओं के जीवन गीत सँवार देते हैं...।

तुम शब्द हो स्वयं और अर्थ भी हो तुम
तुम जीवन हो रौशन और अंधकार भी तुम
तुम संग सुरमय हो दिन-रात भी तुम
शब्दों का झरना हो,,बेजुबान लाचार भी तुम...।

और मैं....

हे प्रिय! मैं स्वयं आज भी निःशब्द हूँ, निर्वाक हूँ
अवसाद के चिन्ह चिपके है मेरे मन से
मैं शब्द तीर से लक्ष्य भेदन करता रहा हूँ
और...प्यार के बोल से "निःशब्द कर गए तुम"...।।

✍🏻 गोविन्द सिंह चौहान
       3/2/18








नमन मंच को
दिन :- रविवार 
दिनांक :- 03/02/2019
विषय :- स्वतंत्र लेखन

ख्वाबों की दहलीज पर,
लिखता रहा मैं रातभर।
सितारों की बरसात में,
शब्द संजोता रहा रातभर।

तसव्वुर में बस वो ही रहे,
उसी को कहता रहा रातभर।
गजल बने या नगमा कोई,
बस यादें उसकी लिखता रातभर।

ना नींद आई ना ख्वाब कोई,
खुली आँखों से सोता रहा रातभर।
गुजरे जमाने की यादों में,
पृष्ठ आँसुओं से भिगोता रहा रातभर।

स्वरचित :- मुकेश राठौड़




नमन"भावो के मोती"
03/03/2019
स्वतंत्र लेखन

अभी है जीवन में तपिश
मिल रहे गमो के संग शूल।

मन में वेदना है,दहन है,
आनेवाला है कोई तूफां।

उड़ा ले जायेगा मन का शहर
उथल-पुथल मचायेगा ये कहर।

तू ना डर,रहो निडर,थोड़ा ठहर
होगी कभी तो बारिश........।

भीगेगा उस पल तेरा मन
वो सोंधी सी गंध......
महक उठेगा ये जीवन।

प्रीत के रंगों से खिलेगा उपवन
होगी उसदिन तेरी जीत......।

भूलाकर संताप को.......
झूम उठेंगे धरा व गगन।

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल


II स्वतंत्र लेखन २ II 
विधा: ग़ज़ल - कहाँ खो गयी है महब्बत हमारी.... 

कहाँ खो गयी है महब्बत हमारी.... 
बदलने लगी क्यूँ है नीयत हमारी... 

अगर बैठ कर हम गिनें अपने दुश्मन...
मिलेंगे खुदी में हकीकत हमारी...

नशा वैर का दम्भ से दोस्ती क्यूँ....
कहाँ प्यार की अब विरासत हमारी....

ये तुम याद रखना न मैं भूल पाऊं....
हमीं ने बिगाड़ी अकीदत हमारी....

कहीं जात नीची कहीं धर्म ऊंचा....
बनी क्यूँ है दुश्मन नसीहत हमारी...

सदा कौन सुनता है आते तुफान की... 
ज़हर है हवा में हिदायत हमारी.... 

चलो आज 'चन्दर' दफन कर लें खुद को...
नहीं ऐब झूटी हो खिदमत हमारी....

अकीदत   =  सम्मान, श्रद्धा 
खिदमत    = सेवा, सत्कार 

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II 
०३.०२.२०१९
मंच को नमन
दिनांक-3-2-2019
रदीफ़-जनाब

मनुष्य योनि में जन्म तो  ले लिया
मनुष्यता को अंगीकार करो जनाब

जिनकी बदौलत यह देह दुनिया पाई
उन मात पिता को ना ठुकराओ जनाब

दूसरे के अवगुण गिनाते हो तुम
ख़ुद के गिरेबाँ में झाँकों जनाब

 जीवन कहलाता सुख दुःख का संगम
संयम दुःख में दिखलाओ जनाब

पश्चिमी सभ्यता के रंग में सरोबार
निज सभ्यता पर गर्व  करो जनाब 

अंग्रेज़ी भाषा को आत्मसात कर रहे
हिंदी को रूखसत ना करो जनाब

वतन की माटी तुम्हें पुकार लगाती
वापस अपने वतन आ जाओ जनाब

निरक्षरता:जीवन का महा अभिशाप
साक्षरता अभियान में जुटो जनाब

संतोष कुमारी  ‘ संप्रीति ‘
स्वरचित


स्वतंत्र सृजन 
वार रविवार 
दिनांक 3/2/2019
विषय :- नेता 

जब तुम आते हो 
हम हिस्सों मे बंट जाते हैं 
कितने टुकडे हो जाते हैं 
जब तुम आते हो 
जाति पाति 
ऊंच नीच 
अगडा पिछडा
धरम वरम सब 
तुम ही बताते हो
हम कहां जानते सब 
हम तो सब एक है 
साथ उठते बैठते चलते 
तुम विष उडेल जाते हो 
हम शिव नही बन पाते 
हम इंसान भी कहां रह पाते है 
हम हिस्सो मे बंट जाते हैं 
तुम नही होते तो 
कैसे पता चलता हमे 
कौन हम, कौन भगवान हमारा 
तुम ही तो हो जो कहते हो 
मंहगी गाडियों मे आकर 
चेलों का झुंड साथ साथ
बैठकर साथ हमारे 
ढोंग करते हमारा होने का 
बस कुछ दिन की हमदर्दी 
फिर गायब न जाने कहां रहते 
तुम नोट लूटाते
तुम शराब बंटवाते
अपनो को आपस मे लडाते
जीत जाने पर इतराते
हम ठगे जाते बस 
अरजी ले ले दौड लगाते
आखिर कैसे नेता हो तुम 
किसलिए बने फिरते हो 
केवल कुर्सी की ख़ातिर 
सेवा कितनी रह गई है अब 
दिखावा बस केवल दिखावा 
काश तुम सच्चे नेता बन पाते 
तो सबके दिल मे बस जाते 
तो सबके दिल मे बस जाते 

कमलेश जोशी 
कांकरोली राजसमंद


नमन मंच
दिनाँक 03 .02 .19
स्वतंत्र लेखन 2,,
~~चौराहा~~
~~~~~~~~~
चौराहे पर 
फैला ढेर सा 
मुँह से निकलता 
धुआं,,बीड़ी का
फैल जाता है,,
जैसे ही कोई दिख जाता हैं
अपनी पारी के 
इंतजार में ....
फिर दो कश
लगा लेता है
मजदूर...
खड़ा रहता है चौराहे पर
दस बजे तक 
देखता है 
बड़ी उम्मीद से 
शायद कोई 
उसे भी ले जाये 
तो शाम को
 उसके घर भी चूल्हा
जल जाए ,
उसके 
घर पहुचते ही
दौड़कर आने
पर उसके बच्चों को
निवाला मिल जाये
इसी लिए वह.
चौराहे पर सबसे
 पहले पहुंचता है,,,
~~~~~~~~~|
उपमा आर्य ,लखनऊ
शुभ संध्या

कोई कहता है कि आप अकड़े हैं
कैसे समझायें ये स्वभाव कैसे पड़े हैं ।।

यह संसार झूठ का एक सागर है
कौन कितने झूठ से यहाँ लड़े हैं  ।।

चिह्न उनके मस्तिष्क पर अंकित हैं
जो पढ़ने वाले हैं वो उनको पढ़े हैं ।।

कमल बेचारा अंतस में ही डूबा रहा
फिसलने के हर वक्त क्षण खड़े हैं ।।

कौन जाने समझे भला किसके संग 
हुये यहाँ कितने कैसे कैसे लपड़े हैं ।।

पढ़ना सीखिये दूसरों को ''शिवम"
जो पढ़े दूसरों को वो कहलाये बड़े हैं ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 03/02/2019


भावों के मोती 
दिनांक -03/02/2019
दिनांक -रविवार 
विषय -स्वतंत्र लेखन 
==============================
       ( स्वयं की पहचान बनो)

उठो जागो हे मातृशक्ति,
             स्वयं की तुम पहचान बनो। 
रहो न अबला बनकर तुम, 
            भाग्य स्वयं का तुम ही बुनो।। 
नारी जग जननी कहलाती, 
            बांधे पावनता की डोर। 
मिटाती जग के अंधकार को, 
          उजियारा तुम से चहुँ ओर।।
फैलाने प्रकाश जगत में, 
           तुम ही अब रवि पुंज बनो।।... 
उठो जागो हे मातृशक्ति,
            स्वयं की तुम पहचान बनो। ...
खुशियाँ संपन्नता है तुमसे, 
             जग जननी जग का आधार। 
सहो न अत्याचार भी तुम,
            शक्ति का स्वरूप बनो।। 
विद्या संपन्न शक्ति स्वरूपा, 
             मिले लक्ष्य मंजिलें चुनो। 
उठो जागो हे मातृशक्ति,
              स्वयं की तुम पहचान बनो। ....
                   ....भुवन बिष्ट, 
                   रानीखेत, उत्तराखंड


🙏जय माँ शारदा
 ....नमन भावों के मोती...🙏
दि- 03.02.19
स्वतंत्र सृजन 
""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""
           🌷गीत🌷

जिंदगी इक जंग प्यारे मत भुलाना |
हौसलों से सुन इसे  तू जीत जाना ||
                 ***
दूर है मंजिल मगर रुकना नहीं है |
मुश्किलों के सामने झुकना नहीं है ||
राह हर आसान होगी पग बढ़ाना |
जिंदगी इक जंग प्यारे मत भुलाना || 
                 ***
वक्त के अनुसार हर मंजर यहाँ का |
वक्त ही सच्चा सिकंदर है यहाँ का | 
वक्त से सुरताल तू अपना मिलाना |
जिंदगी इक जंग प्यारे मत भुलाना ||
                  ***
कौन सच्चा मीत है पहचान रखना |
है छलावा या हकीकत ध्यान  रखना ||
जो रहे नित साथ उनके काम आना |
जिंदगी इक जंग प्यारे मत भुलाना  || 
                   ***
चार दिन की चाँदनी फिर रात होगी |
तू भले न हो पर तेरी बात होगी ||
तू दिलों में छाप अपनी छोड़ जाना |
जिंदगी इक जंग प्यारे मत भुलाना  ||
                    ***
दिल किसी का ना दुखे ये याद रखना |
नेकियों से स्वयं को आबाद रखना ||
दे तुझे सम्मान कल भी ये जमाना |
जिंदगी इक जंग प्यारे मत भुलाना ||

""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""
स्वरचित 
   प्रमोद गोल्हानी सरस 
      कहानी सिवनी म.प्र



"स्वतंत्र लेखन" के अंतर्गत

*********फ़िज़ा महक गया**********
-------------------------------------------------------
रंग   सारा   इंद्रधनुष - सा   छिटक   गया 
ऐसे  ही  अपना  भी  जीवन  चमक  गया।

आया  था   तूफानों   के   जलजले   कई
पर  हौसलों  के  पास आकर ठिठक गया।

ज़ोर   बहुत  था  मेरी   शमा   बुझाने  की
पर  कठिन  ज़ुनूनों  के  आगे सटक गया।

फिर  मिली  नहीं  यहाँ उसको जगह कोई 
तो  आकर  यहाँ   से  रास्ता  भटक  गया।

हुआ  था   ज़ुल्म  उसका  मुझपे  ऐसे  ही 
आग  में तपा यह जीवन फिर चमक गया।

व्यथित जगत  खलों से होता रहा अक्सर
फिर भी झूठ  के आगे  सत्य  दमक गया।

नभ  में  तारों  की बज्म  सजने  लगी   हैं
फिर चंद्र का प्रकाश चहुँओर छिटक गया।

आशियाना  बहारों    सँग    झूमने   लगा
मलय जैसी  खुशबू से  फ़िज़ा महक गया।

-- रेणु रंजन
( स्वरचित)
3/2/2019



नमन मंच 'भावों के मोती '
दिनांक-03-02-2019
स्वतंत्र सृजन 
कविता 
शीर्षक -सच्च हैं यह दुकान - पान! 
नजदीक ही दुकान-पान
भव्य -आलीशान, 
खडे़ लोगों की अपनी शान
हर एक मनवाते अपनी बात
मान न मान अपना मेहमान ।
बड़ी  मंहगी तम्बाकू, पत्ते देशी , 
चूना कर देता ऐसी की तैसी ।
कुछ सिगरेट का कश खिंच रहे हैं , 
कोई उड़ते धुएँ से आँख मीच रहे हैं।
बातें करते कुछ आनन-फानन 
मानों हो देवराज कानन ।
पार्टी बाजी में करता कोई सावधान, 
किसी की हालत पतली निकलती जान ।
कोई नुक्ता -चीनी करते जैसे गुणखान, 
प्रदर्शित करते स्वंय का अज्ञान ।
खड़ा कोई केवल खोले अपने कान, 
प्रपंच से दूर बने अनजान ।
 तैयार, अब न आने की ठान, 
 कोई संगीत का करता रस-पान,
 खडा़ जैसे हो रहा राष्ट्र -गान ।
 कोई बीडी़ पीला कर रहा दान, 
दान किसका करे ! करता पीकदान ।
लिखा दुकान पर मेरा भारत महान, 
क्यों उल्लू बनता और होता नादान! 
सच्च हैं यह दुकान - पान! 
स्वरचित -चन्द्र प्रकाश शर्मा 'निश्छल',



दिनांक - ३/२/१९
मंच को नमन 
स्वपसन्द के अंतर्गत -- - -

पीली -  पीली फूली सरसों ली ओढ़ धरा ने चुनरी सी |
बागों - बागों  बगरा  बसन्त  छायी हरीतिमा गहरी सी |
बिखरा चहुँओर बसन्ती रंग अलियों ने कुसुमों को चूमा -
सूरज ने फिर अंगड़ाई ली नव भोर सुनहरी बिखरी सी |

अलमस्त बहारें झूम उठी बह रही  मलय भी महकी सी |
सज गयी धरा नव सुमनों से हर  दिशा लगे है चहकी सी |
फागुन  के  रंग  हुए  गहरे  मन  मे  उमंग  की  लहरें   है- 
बासन्ती मन मनुहार करे ज्यो रस  गागर हो छलकी सी |
          © मंजूषा श्रीवास्तव 'मृदुल '
                         लखनऊ ,उत्तरप्रदेश


नमन मंच"भावों के मोती"
03/01/2019
मंच की सभी सम्मानित मातृ शक्ति को समर्पित... लघु कविता 
"नारी"

नारी  तू प्रेम  है, श्रद्धा  है, 
त्याग की मूर्ति है ममता है,
समर्थ  है, नहीं अबला है, 
कोमल है तो तू ही दुर्गा है l

घर  की धुरी है, विश्वास है, 
जननी है तू,तू ही सूत्रधार है, 
व्यक्तित्व  गरिमा है,भाव है, 
नारी तू स्वयं एक सम्मान है l

नारी  तू मेहँदी  है,  त्यौहार है,
पुरुष की पूरक, गले का हार है, 
मीरा सी भक्ति,राधा सा प्यार है,
तुझसे ही तप्त जीवन,शीत फुहार है l

चपला है, चंचला है,सौंदर्य भरा है,
वाणी में माधुर्य है,नारीत्व खिला है, 
नारी तू  लाज है रिश्तों  का साज है,
हे शक्ति स्वरूपा तू सृष्टि का नाज है l

स्वरचित 
ऋतुराज दवे

सादर नमन मंच
दिनांक 3 फरवरी 2019
 दिन रविवार 
स्वतंत्र लेखन

______________________________

🙏    ऐसी अमर कहानी हो........

सब सहज भाव से कहते हैं, बस ऐसी अमर कहानी हो ।
हां हां जी अमर कहानी हो, पर आंखों में ना पानी हो ॥

गौतम में पाया बुद्ध ज्ञान, बन गए अमर अजर महान ।
उस चिर वियोग की कौन कहे, जिसने बिरहा दुख रोज सहे ।
गौतम से और महान बने, गर कविता ऐसी गानी हो ।
हां हां जी अमर कहानी हो, पर आंखों में ना पानी हो ॥

सच कहने वाले दुख पाएं, सच को सच भी ना कह पाएं ।
बोले जो अहिंसा की बोली, उसने ही खाई थी गोली ।
सूली पर लटके खुद ईशा, ऐसी ना कोई निशानी हो ।
हां हां जी अमर कहानी हो, पर आंखों में ना पानी हो ॥

जब दुश्मन ने ललकारा था, भारत माता ने पुकारा था ।
सीमा* को छोड़ गया सीमा*, और प्राण गवाए बिना बीमा ।
पेंशन खातिर भटके विधवा, ठोकर ना ऐसी खानी हो ।
हां हां जी अमर कहानी हो, पर आंखों में ना पानी हो ॥

सब सहज भाव से कहते हैं, बस ऐसी अमर कहानी हो ।
हां हां जी अमर कहानी हो, पर आंखों में ना पानी हो ॥

रचना तिथि 03/02/2019
रचना स्वरचित एवं मौलिक है ।
©®🙏
   -सुश्री अंजुमन मंसूरी आरज़ू'✍
छिंदवाड़ा मप्र



नमन भावों के मोती , 
दिन ,रविवार ,
दिनांक, 3,2,2019, 
स्वतंत्र लेखन ,

**मौन क्यों **

थी गरिमामयी पंरम्परा हमारी 
भारत देश में इज्जत नारी की
सब पास पडोस गांव शहर की 
हमें बहिन बेटी ही लगती सारी |
पर दीवार वक्त ने  बना दी ऐसी 
अब कैसे जियेगी ये अपनी बेटी 
नहीं  कोख में भी जो जी  पाती 
वो जिंदा रहकर क्या जिंदा होगी ?
नहीं सुरक्षित जो घर में रह पाती  
जब पास पडोस की नजर है खोटी 
यहाँ हर बात की बस वही हैं दोषी 
तो मस्तक ऊँचा वो कैसे रख्खेगी ?
पर कभी ये  हार नहीं मानती बेटी
हर एक चुनौती हसकर वो ले लेती 
दायित्व सभी रिश्तों का है निभाती 
भाईयों पर भी अब ये भारी पड़ती |
अब  बात  यही एक  मन में आती 
यहाँ अपनों  के लिऐ  ही जो जीती
कुप्रथा की जंजीरों में  क्यों जकडी
लक्ष्मण रेखा इस जग ने क्यों खीची |

स्वरचित , मीना शर्मा , मध्यप्रदेश ,






















































































































































Vipin Sohal क्या
































































No comments:

" स्वतंत्र लेखन "21अप्रैल 2019

ब्लॉग की रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं बिना लेखक की स्वीकृति के रचना को कहीं भी साझा नहीं करें |                                        ...