Friday, February 8

"प्रश्न /सवाल"07फरवरी 2019

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             ब्लॉग संख्या :-292


अपने आप से जब कुछ सवाल करता है ।
हकीकत में दिलका बडा मलाल करता है।


डुबा के लिखता हूँ हर्फ को दर्द जख्मों में। 
लोग कहते हैं कि शायर कमाल करता है। 

जब कहा मैंने के आओ जरा मिल के चलें। 
कह रहे रहनुमा के तु क्यों बवाल करता है। 

मिला के आग को पानी मे जब बरसता है। 
बन के बादल मेरा साहिब धमाल करता है। 

हैरान हूँ खिला के फूल सेहरा मे दरिया में। 
किस तरह से वो रौशन जमाल करता है।

विपिन सोहल
💐💐गीतिका💐💐
सृजन प्रकृिया डावाॅ डोल ।
लिखने बैठा विद्युत गोल ।।

मत प्रश्नों में सेंध लगा ।

पहले उत्तर माला खोल ।।

प्रेम करेगा मरना होगा ।

विपदा क्यूँ लेता है मोल।।

मुझको बुरा बताने वाले,

ख़ुद ही अपना हिया टटोल।।

'अ़क्स' बड़ों का साथ न कर,

खलते हैं गर्वीले बोल ।।

@R.S.DAUNERIA

स्वरचित


आज फिर उठे दिल में सवाल
ढूढ़ती हूँ इन सभी के जबाब

कहने को उत्तर मिले सभी के
रह गये कुछ के सही जबाब

ख्यालों में दूर से आती रही
कानों में मेरे तेरी ही आवाज

सुन लो दूर से ही अब मेरे
महकते प्यार का आगाज़

प्रश्नों का सिलसिला चलता ही रहेगा
मैं मिलूंगा यूँ ही ख्यालों में हर बार

प्रवीणा त्रिवेदी
पुर्णतः मौलिक




?
चिन्ह,
जब आता,
उभरकर ।
खडे होते हम,
एक प्रश्न बनकर ।
ढुंडते जबाब ।
प्रश्न ? का ।
करते कोशिश ।
हल करने ।
मिलती कभी,
सफलता/असफलता ।
खुश होते सफलता पर ।
निराश होते,
असफलता पर ।
कोसते है,
प्रश्न को,
प्रश्न बनकर



🌷🌷🌷🌹🌹🌷🌷🌷
जिंदगी।
मैं करूँ तुमसे सवाल।
क्यूँ इतने दुखदर्द दामन में भर दिया?
क्यूँ मेरा जीना हराम कर दिया।
मिला नहीं अभी तक जबाब।
मैं करूँ तुमसे सवाल।

काँटें हीं काँटें मिले।
नहीं मिली कभी कलियाँ।
दर्दभरे हैं दामन में।
नहीं मिली कभी खुशियाँ।
जीवन बना एक सवाल।
मैं करूँ तुमसे सवाल।।
जिंदगी।
मैं करूँ तुमसे सवाल।।
🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀
स्वरचित
वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी




प्रश्न ही तो है 
जो भगाता है 
नींदे उडाता है 
और मन चलता है 
उत्तर की तलाश मे 
उत्तर सुकून है 
पर कहां है वह 
तलाश मे उसकी 
दौडता रहता मन
कभी एकांत मे 
कभी महफिल मे 
वन मे, पर्वतों पर 
पर पग पर तलाश बस 
प्रश्न से उमडते 
जेहन मे खयालात 
कभी चित्र बन उकरते 
कभी शब्दो का 
ताना बाना बनते 
संगीत बन सजते कभी 
प्रश्न और उत्तर की 
अजीब यह कश्मकश 
उलझते सुलझते रहते 
तुम भी और हम भी 
कुछ प्रश्न अब भी बाकी 
कुछ प्रश्न अब भी बाकी 

कमलेश जोशी 
कांकरोली राजसमंद





जिन्दगी गुजर 
जाती है
सवालों के 
जंजाल में !

बड़ी बेदर्द से 
जबाव मांगती है
जिन्दगी 
हर सवाल का

सवाल कभी यक्ष प्रश्न 
बन जाते है
और हम जबावो के 
चक्रव्यूह में 
फंस जाते हैं 

बुढापा 
अपने आप में है
एक सवाल
बच्चों को पाला
पेट काट कर
अब वो बुढापा 
काटेंगे कैसा ?

सबसे मुश्किल 
सवाल होता है
जिन्दगी का अंत
इन्सान चिर निद्रा 
में सो जाता है
और दुनियां करती है
विश्लेषण उसकी 
जिन्दगी का

काश सवालों को
विराम लग जाऐ
और 
जिन्दगी अविराम 
हो जाऐ

स्वलिखित लेखक संतोष श्रीवास्तव
भोपाल




सबसे पहले प्रश्न यही है
हम दुनियां में आये कैसे
अद्भुत भव्य जीवन दाता
आखिर हम पहचाने कैसे
अनल अनिल भू नभ पानी
पंचतत्व का कौन है स्वामी
शस्यश्यामल वसुंधरा कर्ता
चित्र चितेरा कँहा वह् नामी
अगणित प्रश्न उठे मानस में
कुछ उत्तर तो मिल जाते हैं
सूर्य चन्द्र गगन सितारे भव्य
षड ऋतुओं को क्यों लाते हैं
सत्य अहिंसा दया ममता
परोपकार मानव धर्म है
घृणा द्वेष निजी स्वार्थ में
क्यों चलते जो अधर्म है
सामान्य ज्ञान परीक्षा देकर
प्रशासनिक पद को पाते
निज स्वयं कर्तव्य भूलते
जनता से बस घूस खाते
प्रश्न अधूरे रह जाते हैं
प्रश्नो का न पारावार
कर्तव्य मार्ग पर डटे रहो
जीत पाओगे तुम संसार
जन्म मृत्यु भी एक पहेली
जाने सब अंजाने बनते हैं
कुछ तो निजी स्वार्थ मस्त
कुछ पहने भक्ति गहने हैं।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम।





जीवन वासंती है कब?
मन में उठे सवाल
केवल बसंत में ही
मचाता क्यों धमाल?

अपने होकर पराए
भूल क्यों जाते?
जग में क्यों दर्द दें
ये रिश्ते-नाते?

भावों के मोती
दिन-रात गूंथे
टूटे क्यों माला
हा! किससे पूछे?

झेल प्रसव-पीड़ा 
क्यों मुस्काती मां?
मृत्यु भय से हरदम 
डरता क्यों ये जहां ?

परहित करने वाले 
छिपकर रहते क्यों?
दुष्ट इरादों वाले अक्सर 
पाते इज्जत क्यों?

______
डा. अंजु लता सिंह 
नई दिल्ली



जब तक सांसें हैं जब तक सवाल है
जिन्दगी का यही सच यही हाल है ।।
एक उत्तर खत्म नही दूसरा तैयार है 
कौन न हुआ एकदिन इससे बेहाल है ।।

सवालों की गुत्थी बड़ी उलझी है
सुलझाये से भी न यह सुलझी है ।।
बड़े बड़े ज्ञानी ध्यानी भी हार गये 
कितने प्रशन की कड़ी अनसुलझी है ।।

सवाल बवाल न बने रखना सूझबूझ
काँटे आते चलो कितना फूँक फूँक ।।
सवालों के घेरे में न डरना ''शिवम"
वक्त भी कभी हल देता है सचमुच ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम् _
स्वरचित 0702/2019



🏵️प्रश्न🏵️
ये कैसा लोकतंत्र
बगावत सरेआम
आतंकियों का समर्थन
कानून के हाथ बंधे
आज़ादी का दुरुपयोग
जनता परेशान
मुश्किल में देश
तड़पता जवान
वोटों के इर्दगिर्द
होतें हर फैसले
शहीदों की आत्मायें भी
अशांत होंगी शायद
देख इस देश का ये हाल..!
~विजय कांत
(स्वरचित)


बचपन के है मासूम प्रश्न
जवानी के प्रश्न हजार
बुढा़पा है स्वयं एक प्रश्न
आखिर किया क्या गुनाह?

सारे प्रश्नों का बस एक जवाब
हम सुधरेंगे, जग सुधरेगा
हो जाय सभी समस्याओं का निदान
प्रश्न है तो उत्तर भी है।

दूसरो से प्रश्न करने से पहले
प्रश्न करें हम अपने आप
आखिर ये प्रश्न क्यों, कब और
कैसे उठ खड़ा हुआ आज

इन प्रश्नों को सुलझाने में
किसका कितना है योगदान
और मैंने किये है कितने प्रयास
उत्तर ढूंढे पहले आप।

एक प्रश्न पूछने से पहले
हजारों उत्तर है बाहानोबाजो के पास
प्रश्न आखिर है ये ,क्यों करें ऐसा काम
जिससे दुनिया करें सवाल

प्रश्नों की हैं दुनिया निराली
सबसे है इसकी रिश्तेदारी
रिश्तेदारी ये खूब निभाती
आपको छोड़कर ये कही नही जाती।
स्वरचित-आरती-श्रीवास्तव।




प्रश्न यही उठता है मेरे मन में।
क्यों आया हूँ इस दुनिया में।
गर सद्कर्म नहीं कर पाऊँ तो,
अकारण आना इस दुनिया में।

क्या सोच मुझे प्रभु ने भेजा है,
कुछ तो इसका मकसद होगा।
नहीं प्रपंचों में ही फंस जाऊँ मै,
मुझे बचना इनसे भरसक होगा।

सवाल हमारे जहन में उठते।
क्यों प्रपंच सभी यहां झेलते।
कर्तव्य हमारे कुछ निर्धारित,
यक्ष प्रश्न यही हृदय उडेलते।

जीवन क्षणभंगुर है फिर भी,
आवागमन चलता रहता है।
यत्र तत्र सर्वत्र यहां पर देखा,
क्यों मन प्रश्न करता रहता है।

भाव भंगिमाऐं कुछ दिखती तो
क्या बात मन सवाल कोंधता है।
हमें उत्तर जब तक नहीं मिलता,
सचमुच ये मन सवाल रोंधता है।

स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
जय जय श्री राम राम जी

7/2/2019( गुरूवार)
1भा##.प्रश्न/सवाल##


सवाल

कचोटती है कई बार ,
अंतरात्मा मेरी।
जाने अनजाने यूं ही..
भ्रमित क्षणों में हुई,
घटनाओं के लिए...
पूछती है सवाल..
कठघरे में करके कैद,
उड़ जाती है नींद रातों की,
मौन अनुत्तरित में,
कुछ कह नहीं पाती..
ढूंढती हूं जवाब..
अहंकार की ,
अंधियारी गलियों में ..
जवाबों की तलाश..
अभी जारी है जनाब...।
नीलम तोलानी
स्वरचित


--*--*--*--*--*--
मासूम आंँखें करें सवाल
क्यों मुझसे उपेक्षित व्यवहार

अंश आपका वो भी है
अंश आपका मैं भी हूं

फिर क्यों आपके दिल में
मेरे लिए यह दूरी है

बेटे की हर अभिलाषा पूरी
मैं कुछ भी न मांँगू कभी

मेरी बस यही अभिलाषा
मुझको भी मिले प्यार जरा सा

मैं रोशन करती नाम आपका
फिर भी शाबाशी बेटों को

मैं इतना लाड़ लगाती पापा
पर आपका प्यार बेटों को

थोड़ा प्यार मुझे भी करलो
मेरा छोटा सा अरमान यही

आप जान से प्यारे पापा
यह कैसे समझाऊं मैं
***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित कविता






प्रश्न पीछा कर रहें हैं जी भर
भाग रहा मनुज कहाँ है उत्तर 

भागम-भाग मची है 
यहाँ चहुँ ओर
अमरबेल सी उलझनें
कहीं ओर ना छोर

निपट एकाकी चलता
काट रहा है सफर।

दावानल लालसा धधके
तृप्ति की गंगा सूखी
मृग मरिचिका हुई जिंदगी 
दूब हुई संतोष सिमटी

गगन चुंभी अरमानो संग
भरते उड़ान पर कुतर

पलक मूंदने ने सच कभी
अस्तित्व नहीं खोता है
सदियों से कांधों पर मनुज 
सवालों का बोझ ढोता है

हल करना ही होगा सारथी 
रहोगे कब तक बचकर।

स्वरचित 

सुधा शर्मा 
राजिम छत्तीसगढ़



प्रश्न ज्वलंत धरा पर अगणित,
उत्तर में भी प्रश्न समाहित,
बसुधा के शुचि रंगमंच पर,
जीवन क्या मृत्यु मे संनिहित।

मुखरित वर्ण विविध में प्रकृति,
क्यों पराग पुष्पों उर संचित,
चालित क्यों ऊर्जा से अविरल,
प्रतिपल शुचि ब्रह्माण्ड सकल।

सर्वश्रेष्ठ कृति मानव भूतल पर,
क्रिया-कलाप क्यों नित निकृष्ट,
अंतरिक्ष में शक्ति कौन जो,
सृष्टि नियंता शुचि अति श्रेष्ठ।

राजनीति जन-संरक्षण हित,
वचनबद्ध क्यों नहीं आज,
निहित स्वार्थ संलिप्त नेतृ-गण,
रखते नयन न किंचित लाज।

प्रश्न अनेकानेक उपस्थित,
मनुज प्रजाति के सम्मुख सत्य,
उत्तर सत्यासत्य खोजते,
आ जाता मृत्यु का सत्य।
--स्वरचित--
(अरुण)




सवालों से भरी है ये जिन्दगी,
हर पल एक नया सवाल लिये,
कुछ के जवाब मिल जाते हैं,
कुछ सदा पीछा करते रहते हैं |

सवालों के इस चक्रव्यूह से,
कौन भला निकल पाता है?
जो निकल जाये वह अर्जुन,
वरना अभिमन्यु बन जाता है |

जन्म से मृत्यु तक बस सवाल,
प्रमाण पत्रों में दाखिल होता है,
शान्ति से मुक्ति मिले तो ठीक है,
वरना फिर से सवाल खड़ा हो जाता है |
स्वरचित *संगीता कुकरेती*





 जीवन प्रश्न,
हम हल ढूंढते
हर क्षण ही।।१।।

जीवन भर
सवाल करते हैं,
दुखों पर ही,।।२।।
३/जीवन गीत,
हम गाना सीख ले,
सवाल हल।।
अंधेरे हमें,
सवाल करते हैं,
वक्तउतर।।
देवेन्द्र नारायण दास बसना छ,ग, हाइकु मेरे


आध्यात्मिक गुरु के 
प्रवचन का माहौल था ।
मोक्ष ,मुक्ति जैसे गूढ़ विषयों 
पर चर्चाओं का दौर था ।
जीवन मे आनंद के 
कुछ गुर सिखा रहे थे ।
संभ्रांत लोगो का जमावड़ा
माहौल को गंभीर बना रहा था ।
तयशुदा लोग तयशुदा प्रश्न
पूछ रहे थे ।
उनके गूढ़ जवाब ,कुछ समझ मे,
तो कुछ समझ से परे थे ।
हमने भी
....…एक सरल सा प्रश्न उनसे पूछा
अगर ये आपका पाठ और विधि 
है इतनी महान
तो इस पर इतना भारी शुल्क क्यों?
क्या इसी से देश विदेश मे 
आश्रम बनवाते है ।
ये ज्ञान आम जनता तक मुफ्त बाटों
समाज के हर तबके तक पहुँचा
दूषित मन को शुद्ध करो ।
...ऐसे प्रश्न की उम्मीद नही होगी 
माहौल मे सन्नाटा छा गया
सब मुझको ताक रहे थे
प्रश्न बहुत ही सीधा था,
पर जवाब उनके लिए टेढ़ा था
शायद चुभता प्रश्न था 
तीर निशाने पे लगा था ।

स्वरचित
अनिता सुधीर श्रीवास्तव


CM Sharma II सवाल
II अमावस का चाँद II 

पूछा एक बच्चे ने मुझसे 
ये अमावस का चाँद क्या होता है....
जैसे जीवन में सुख दुःख आता जाता है....
चाँद भी सुख में बढ़ता और दुःख में घटता जाता है...
एक दिन दुःख जब ज्यादा होता है और वो छुप्प सा जाता है...
तब अमावस का चाँद होता है...यूं उसको जवाब दिया.....

बच्चा तो चुप्प हो गया मुस्कुरा के चल दिया....
हलचल मेरे दिल में मचा गया.....
कि अमावस का चाँद क्या होता है.....

मन का पंछी उड़ने लगा...
ख्यालों के बादलों में यूं गुम होने लगा...
एक बादल मस्त मुझ से टकराया....
उससे पुछा मैंने अमावस का चाँद क्या होता है....
मस्ती अपनी में उसको अमावस तो सुना ही नहीं....
चाँद में अटक के रह गया...
महबूब का चेहरा कहके वो गया और वो गया....

फिर जब एक बुझते तारे से पूछा यही सवाल…
उसने मुश्किल से ही मुंह खोला...फिर दिया जवाब.....
महबूब के रूठ जाने से दिल जब बुझ जाता है...
वो चाँद अमावस का होता है.....
अपनी अपनी सोच है...अपना अपना नजरिया है....
किसी को चाँद महबूब दिखे है....किसी का बुझता दिल सा है...
ये तो निज स्वार्थ है जो चाँद अलग अलग सा दीखता है....

मन मेरा भी उद्वेलित था के आखिर चाँद अमावस का क्या होता है....
मैं यूं ही जवाब से नदारद अपने पे गुस्सा हो रहा था....
कानों में मेरे मद्धम सी एक आवाज़ टकरा गयी....
एक बच्चा माँ की गोद में लेटा हुआ था...
माँ उसको लोरी सुना रही थी...
सो जा लाल मेरे आज तू ऐसे ही....
कल चन्दा मामा आएंगे.... कचोरी पकोड़े लाएंगे....
साथ में ढेर से खिलोने होंगे....जो सब तेरे लिए होंगे....
हम सब मिल के खाएंगे....खूब धूम मचाएंगे...
अब तू सो जा लाल मेरे...कल चन्दा मामा आएंगे...
कचोरी पकोड़े लाएंगे....
साथ में झर् झर् आँखें उसकी बहे जा रही थी....
मुझको जवाब बता रही थी.....
जब माँ का बच्चा भूखा सोता है.....
माँ के दिल पे क्या होता है....
ये चाँद ही समझता है....
इसी लिए वह एक दिन...
जब छुप छुप के बहुत ही रोता है....
वो अमावस का चाँद होता है....

निवेदन: कृपया खाने को व्यर्थ में मत फेंके... ज़रूरतमंदों में वितरण कर दें या ऐसी संस्थाएं जो ज़रूरतमंदों को खाना खिलाती हैं उनको दे दें... 

II स्वरचित - सी.एम्. शर्मा II 



? ? ? ? ? ?
कुछ सवाल हैं दिल के....
कुछ सवाल हालातों के...
कुछ सवाल अपनों के.....
कुछ सवाल सपनों के.....
कुछ सवाल ख्वाबों के.....
कुछ सवाल जज्बातों के...
कुछ सवाल हैं यादों के....
कुछ सवाल गहराते रातों को
कुछ सवाल होते धड़कनों के
कुछ सवाल होते मदहोशी में
कुछ सवाल उठते खामोशी से
कुछ सवाल होते वहमी के...
कुछ सवाल हैं सहमें से.......
कुछ सवाल हैं कलियों के...
कुछ सवाल होते भँवरों के..
कुछ सवाल पूछे हवाओ ने..
कुछ सवाल पूछे फिजाओं ने

उलझा है मन सवालों के घेरे में
हर सवाल का है एक ही जवाब
हो प्रीत की हल्की फूहार......
जिससे धूल जाए हर सवाल..
और खिल जाए मीठी मुस्कान।
😊😊😊😊😊😊😊😊
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल



े हम हैं बेटियाँ हैं या हमारे बेटे हैं
सब प्रश्नों की शय्या पर ही लेटे हैं। 

बेटियों का प्रश्न कब सुरक्षित होंगी
इस समाज में कब अभिरक्षित होंगी
कन्या भ्रूण कब सबका चहेता बनेगा
कौन इस समस्या मिटाने में प्रणेता बनेगा। 

बेटों को कब रोज़गार मिलेगा
प्रगति का पथ तैय्यार मिलेगा
ये डिग्रियाँ ये योग्यता भरे पुलिन्दे
कब इन्हें उपयुक्त बाजा़र मिलेगा। 

ये आतंकी समस्यायें मुँह खोले खड़ी हैंं
ये छोटी नहीं हैं बहुत बड़ी हैं
गले से चैन लुटने की बातें
इनकी तो जैसे लगी सब ओर झडी़ हैं। 

सड़क पर हर रस्ता ही जाम है
कहीं भी नहीं कोई विराम है
पार्किंग की समस्या हर ओर खड़ी है
बेचैन सुबह और चिंतित शाम है। 

यक्ष के प्रश्न तो और बढ़ गये
हम आपस में बिना बात लड़ गये
अस्पताल में, थाने में, जुलूस में
अफ़वाह में नर समूह उमड़ गये


***********************************
करती सवाल जिंदगी, जवाब दीजिये |
हर बीत रहे पल का, हिसाब दीजिये ||

हासिल किया जहां से क्या,और क्या दिया |
हर लेन-देन की वो , किताब दीजिये ||

मगरूर हो गये जो ,शोहरत ज़रा मिली |
जीते रहे सदा जिसे, वो रुआब दीजिये ||

देखे जो अभी तक सभी, पूरे या अधूरे |
जैसे भी हों वो सारे , अब ख़्वाब दीजिये ||

कुछ भी नहीं ये जिंदगानी ,प्रश्न के सिवा |
उत्तर हमेशा सोचकर ,जनाब दीजिये ||
*********************************

स्वरचित 
प्रमोद गोल्हानी सरस 
कहानी सिवनी म.प्र


जीवन प्रश्नों के महारथी
बना खड़े थे जीवन चक्रव्यूह
अभिमन्यु सी योध्दा बन साहसी

मैं ढूंढ रही थी इन्हे तोड़ने के व्दार
प्रथम प्रश्न तड़पती विषमताओं का
व्दितीय प्रश्न कराहती मानवताओं का
धर्म-व्देष ,भाषा-रिवाज,धर्म और समाज
परिपाटियाँ रस्मों की ,रिश्तों के उठते अंगार
कहीं आरक्षण कहीं प्रदर्शनों की पुकार
कहीं सत्ता कहीं अधिकार माँगों की है भरमार
कहाँ थे जबाव सभी में है सुलगते सवाल
उत्तर सब सीखे थे हमने भी अभिमन्यु के समान
पर सिखा ना पाई थी मेरी भी माँ
तोड़ इनके व्दार बाहर आने का प्रकार
सवालों के घेरे में आज भी है तलाश
एक गीता सर्जक की जो दे सके 
जीवन कुरूक्षेत्र में विवश खड़े अर्जुन के
सुलगते जीवन मूल्य प्रश्नों के जबाव
-----नीता कुमार (स्वरचित)



बदकिस्मत यहाँ नहीं कोई ऐसा ,
तुझको ईश्वर ने बनाया जैसा |
संसार में कोई नहीं चाहता तुझको ,
जग में दूर सभी ने तुझे भगाया |
हमेशा परेशान तू सबको करता ,
सबसे छीन लिया नीदों का साया |
बड़ी ही अजब गजब तेरी बातों का ,
तुझको कोई जबाब नहीं देने वाला |
होते अलग अलग क्यों बेटी बेटा ,
क्यों बल औरत पै मर्द आजमाता |
हमें पाल पोसकर बड़ा जो करता ,
क्यों हमको भूल उसी का जाये रास्ता |
कोई रातों रात जब अमीर बन जाता ,
कहें वह तो बंदा राजनीति का होता |
हम सबको नेता पर नहीं रहा भरोसा ,
क्या सच में नेता बस बेईमान ही होता |
कहीं पर तो पीते बहुत से मंहगा सस्ता ,
और कहीं पर कोई पीने को पानी तरसता |
कहीं कहीं तो फेंकने के लिऐ खाना परसता ,
और देखो कहीं भूख से कोई बिलखता |
यहाँ पर कोई अमीर कोई गरीब क्यों होता ,
कोई बना बैरागी तो कोई अधिकार छीनता |
न जाने कितने सवाल ऐ प्रश्न तू करता ,
सबको तू क्यों नहीं चैन से जीने देता |
दिखती सुप्त पडी हो जहाँ पै मानवता ,
बार बार क्यों प्रश्नों के वहाँ तीर चलाता |

स्वरचित , मीना शर्मा , मध्यप्रदेश ,


पूछ रहा है दिल मेरा मुझसे आज सवाल
आखिर कब तक होंगे यों ही ये सब अत्याचार।
कब तक लुटती रहेगी बेटी कब तक लूटेंगे हैवान?
आज हमारी रूह भी हमसे कर रही वही सवाल।
कब तक बेटे बेटी में तुम भेद यह मिटाओगे?
आखिर भारत की बेटी को उसका हक कब तुम लौटाओगे?
बातें होती हैं बड़ी बड़ी पर काम अधूरे रहते हैं
बहनों का चीर हरण करनेवाले यहाँ चैन से कैसे सोते हैं?
कब मिलेगा न्याय उन बहनों को,जो घुट घुट करके जीती हैं?
कब झूलेगा वह फांसी पर जो कुटिल हँसी बस हँसता है?
आज मेरा अंतर मन भी बस प्रश्न यही है पूछ रहा?
कब लौटेगा वैभव बेटी का कब मन उसका हर्षाएगा?
बार बार यही प्रश्न आज सम्मुख मेरे बस आता है।
क्या फिर से सतयुग आएगा, क्या फिर से वैभव लौटेगा?
क्या फिर से सतयुग आएगा क्या फिर से वैभव लौटेगा?
(अशोक राय वत्स) स्वरचित
जयपुर


विषय:प्रश्न/सवाल
1
जनता पूंछे
सवाल अनुत्तर-
राष्ट्र उत्थान
2
गम्भीर प्रश्न
लोकसभा निस्तारे-
संसद सभा
3
शिशु पूंछते
अनबूझ सवाल -
बालक हठ
4
गणित प्रश्न
उलझाते दिमाग
छात्र जीवन
5
यक्ष सवाल
हर मोड़ पर हैं-
जीवन राह

मनीष श्री
स्वरचित
रायबरेली


सिर्फ जवानी में ही होता दम है 
वृद्धावस्था कहाँ किसीसे कम है 

सिर्फ जवानी में नहीं आते विचार 
वृद्धावस्था तो विचारों का संगम है

जवानी में दिल में रहता कोई ओर
वृद्धावस्था अपनो का होता भ्रम है

जवानी में पति-पत्नी करते झगड़ा
वृद्धावस्था में दोनों ही होते नरम है

यौवन में काली जुल्फें है लहराती
वृद्ध श्वेत जुल्फों में अनुभव दम है

जवानी में मानव मन है भटकता 
वृद्धावस्था में स्वयं करता रहम है 

जवानी में पत्नी लगती बदसूरत
बुढ़ापे में वही लगे अप्सरा सम है 

वृद्धावस्था में ही होती सुहानी शाम 
बचपन,युवानी गुजरा सा मौसम है

यौवन किए कई उल्टे गलत कार्य 
वृद्धावस्था प्रायश्चित आँखे नम है 

कुसुम त्रिवेदी दाहोद


प्रश्न यह था कि उत्तर क्या देते ?
कैसे इससे बचकर हम
अपना मुँह फेर लेते
प्रश्न यह था कि उत्तर क्या देते ?

उत्तर देकर क्या फिर सब
पहले जैसे सुनकर रह पाते
हमको तो लगता है ऐसा
निरूत्तर ही सब रह जाते !

कुछ प्रश्न कुछ उत्तर
सदैव हमको उलझा देते हैं
कुछ प्रश्न पूछे नहीं जाते
कुछ में हम निरूत्तर ही रह जाते हैं 
निरूत्तर ही रह जाते हैं !!
स्वरचित- गोविन्द पाण्डेय 
उत्तराखण्ड

ंद हाइकु 
विषय:-"प्रश्न/सवाल" 
(1)
बेटी पे गाज़ 
सवालों के घेरे में 
सभ्य समाज 
(2)
कौन ढूँढता? 
सवालों की भीड़ में 
उत्तर छुपा 
(3)
प्रश्न थे आगे 
जन्म से मृत्यु तक 
जवाब माँगे 
(4)
कर्मठ इंसा 
प्रश्नों के पीछे दौड़ 
ढूँढा विज्ञान 
(5)
भूखे थे प्रश्न 
मन हुआ चेतन
मिले उत्तर 

स्वरचित 
ऋतुराज दवे


क सवाल मचा बवाल, 
क्या सब है खुश हाल, 
या एक दूजे के होड़ में, 
धन को रहे संभाल l

धन को रहे संभाल, 
जो काम भी न आये, 
एक साँस भी न ली जाये, 
जब यमराज लेने आये l

जब यमराज लेने आये, 
तो बन जाएँ सब पराये, 
पार्थिव देह बन जाता, 
रिश्ते सब खो जाएं l

रिश्ते सब खो जाएं, 
ना रखो धन की बोरी, 
कुछ काम नेकी का करलो, 
कुछ विप्र खुश हो जाएं l

कुछ विप्र खुश हो जाएं 
तो देंगे लाख दुआएं, 
क्या पता आपको जीते जी 
परम शांति मिल जाये ll
कुसुम उत्साही 
स्वरचित 

देहरादून




चामर छंद में ,,,दो सृजन
2121212,,12121212( मापनी)
वार्णिक छंद
1) समांत-ई पदांत-रही
2)समांत- आ पदांत-करे
"जिंदगी"
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जिंदगी सवाल है ,,,,,,जवाब संग भी रही /
जन्म से छिपी हुई,,, पहेलियाँ बनी रही/
न्याय क्यों अन्याय सा,सत्य उकेरती रही/
अंत वक्त में सुशांत,,,, प्रश्न खोजती रही //
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प्रश्न के जवाब भी,,यदा-कदा मिला करे /
ढेर से सवाल- जाल,,,, जिंदगी बुना करे/
धर्म को अधर्म कहें,,असत्य को चुना करें /
पारखी सदा यहाँ,,,,,,सुकर्म में जिया करें/
***
राजनीति में सदा ,,,अनीति ही चला करे/
हार-जीत प्रश्न का जवाब ना मिला करे/
लोकतंत्र है अजीब,,,,,सत्य से घृणा करे/
लाठियाँ-प्रधान की,सुदेश मे चला करै /
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ब्रह्माणी वीणा हिन्दी साहित्यकार


विधा=हाइकु 
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बच्चे का प्रश्न 
अमावस की रात 
चाँद है कहाँ 

चाँद भी जाता 
अमावस की रात 
मामा के गांव 

एक सवाल 
किस पर विश्वास 
रावण राज

एक सवाल 
तरक्की में हमारी
कौन बाधक

हम है खुद
तरक्की में अपनी
बनें बाधक

एक सवाल 
दहेज़ का दानव 
मरेगा कब

जाता है मिल
सवाल में जवाब 
मनन कर

देकर बनि
सवाल के जवाब 
करोड़पति

===रचनाकार ===
मुकेश भद्रावले
हरदा मध्यप्रदेश 



सवालों से घिरी...
हरवक्त जिंदगी..
जवाबों को ढूँढती..
हरपल जिंदगी..
एक सवाल सदा कचोटता
कब तक बरसेगा आतंकवाद?
माँ भारती की छाती पर...
कब तक होगी शहादतें?
माँ भारती के लालों की...
कब तक बनेगा तिरंगा कफन?
माँ भारती के शेरों का..
कब तक होंगे बच्चे यतीम?
माँ भारती के रखवालों के...
कब तक टूटेगी चूड़ियाँ?
जवानों के ताबूतों पर..
कब तक ढोएंगे जवान लाशें ?
वृद्ध अपने काँधों पर...
आखिर कब तक?
क्यों न हम बंधुत्व भाव रखें?
इंसान को इंसान समझे,
जात,धर्म को त्याग कर...
सद्भावना का संचार करें।
क्यों न वसुधैव कुटुंबकम को साकार करें?
आओ आज हम संकल्प करें...
इंसानियत हो धर्म अपना,
देशहित ही हो कर्म अपना।
जात धर्म में ना बटेंगे कभी,
धर्मनिरपेक्ष हो राष्ट्र अपना।

स्वरचित :- मुकेश राठौड़


सवाल उठने-बैठने
खाने-पीने , . . रोने-धोने
-निचोड़ने -सुखाने, 
नहाने, पौछने, 
गाने -नाचने ,
चलने-दौड़ने, 
सोने-जगने का नहीं ! 
बस! सवाल और बवाल, 
जिंदगी सवाल करती हैं , 
जवानी, दिवानी, इतराती डराना-धमकाना, हिंसा -आगजनी, बलात्कार दल-दल, भटकता-मानव,भ्रूण हत्या ठिठुरता -गणतंत्र अनसुलझे सवाल हैं।
बलखाती , इठलाती हैं ।
बुढा़पा , अपनापा 
पारस्परिक सदभाव हैं , 
रोशनी से चमक 
हर जगह एक समस्या 
हर जगह एक पैंचिदा प्रश्न! , 
सवाल का उत्तर खोजता मन, 
हर व्यक्ति का अपना सवाल हैं ।
उत्तर देना अवश्य ही कमाल हैं ।
धर्म, कर्म एवं अर्थ पर सवाल! लोकतंत्र -भीड़तंत्र अस्थिर सरकार ? मेरे सवाल! स्वरचित -चन्द्र प्रकाश शर्मा 'निशछल'


विषय प्रश्न, सवाल।

बूझो कौन? 

मै शब्द शब्द चुनती हूं
अर्थ सजाती हूं
दिल की पाती ,
नेह स्याही लिख आती हूं
फूलों से थोड़ा रंग,
थोड़ी महक चुराती हूं
फिर खोल अंजुरी हवा में बिखराती हूं
चंदा की चांदनी
आंखो में भरती हूं
और खोल आंखे
मधुर सपने बुनती हूं
सूरज की किरणो को
जन जन पहुँचाती हूं
हवा की सरगम पर
गीत गुनगुनाती हूं
बूझो कौन ?
नही पता! मै ही बतलाती हूं 
जब निराशा छाने लगे
मै " आशा " कहलाती हूं।

कुसुम कोठारी ।



तुम्हारी ऊर्जा अक्षुण्ण है 
तुम्हारा यश अक्षय है 
तुम्हारा पराक्रम अपराजेय है 
तुम्हारा संकल्प अटल है 
जिसे लगाना है प्रतिबंध प्रश्नों पर 
उसे प्रश्नों पर प्रतिबंध लगाने दो 
लेकिन जब प्रश्न होंगे 
रोटी, कपड़ा और मकान के 

जब प्रश्न होंगे रोजगार और किसानों की आत्महत्या की 
जब प्रश्न होंगे भ्रूण हत्या की 

तब सवाल पर सवाल तो दागने ही होंगे 

जब पशु के नाम पर 
मनुष्य की हत्या होगी 
जब धर्म के नाम पर 
आदमी को जलाया जाएगा 

तब सवाल पर सवाल तो दागने ही होंगे 

हाँ यह अलग बात है कि
अहंकारी अट्टहास करने वाले 
तुम्हें गालियाँ भी देंगे, राष्ट्रद्रोही भी कहेंगे 
तुम्हें कैद में भी डाल सकते हैं 
तुम्हारे ऊपर 
गोलियों की बौछार भी करवा सकते हैं 

लेकिन क्या तुम मौन हो जाओगे 

जब तुम मौन हो जाओगे 
तब देश को कौन जिन्दा रखेगा 
तिरंगे की लाज कौन रखेगा 
सरहद को कौन सुरक्षित रखेगा 
लोकतंत्र को कौन जीवित रखेगा 
संविधान की मर्यादा बचाकर कौन करेगा 

नहीं नहीं नहीं 
तुम कभी मौन मत होना
तुम्हें अपने सुझ बुझ धैर्य साहस का परिचय देते रहना होगा 

सवाल पर सवाल करते रहना होगा 

क्योंकि 

सवाल से ही तो सभ्यता है 
सवाल से ही तो सुशासन है
सवाल से ही तो प्रशासन है
सवाल से ही तो ज्ञान है
सवाल से ही तो विज्ञान है 
सवाल से ही तो संविधान है 
सवाल से ही तो लोकतंत्र है 
सवाल से ही तो राष्ट्र है
सवाल से ही तो सरहद है 
सवाल से ही तो भारत है 
सवाल से ही तो "हम भारत के लोग हैं"
सवाल से ही तो मूल कर्तव्य हैं 
सवाल से ही तो मूल अधिकार हैं 
सवाल से ही तो मर्यादा है
सवाल से ही तो गरिमा है

सच कहता हूँ प्रश्न पर प्रतिबंध लगाने वाले 
एक दिन थक जाएंगे 
क्योंकि सवाल शाश्वत है
और प्रतिबंध एकदिन टूट ही जाते हैं 
इसलिए स्फूर्त होकर आशावादी होकर 
सवाल पर सवाल 
अनवरत अनगिनत निरंतर 
सवाल करते रहना 
@ शंकर कुमार शाको 

स्वरचित

सवाल युद्ध
जवाब ढूंढ कर
बनते बुद्ध

सवाल बड़ा
दहेज का दानव
सामने खड़ा

सवाल बाकी है अभी जवाब बाकी है
नींद उड़ गई कबकी ख्वाब बाकी है
ऐ मौत थोड़ी देर अभी और ठहर जरा 
चुकाने दे जिंदगी का हिसाब बाकी है

जलते सवालों को ऐसे बुझा देती हैं
जवाब में आंखों से आंसू बहा देती हैं
कुछ सवालों के जवाब भी सवाल होते हैं
जिन्दगी हर सवाल का जवाब कहां देती है

ये कैसा तूफान अजब ये कैसा बवाल है
जो दिल का अमीर है वो ही फटेहाल है
परेशान हूं मैं अब तक उत्तर ढूंढते-ढूंढते
जिन्दगी सवाल है कि जिंदगी पर सवाल है

मोटी धूल जमी हुई ज़िन्दगी की किताब है
दर्द उतना नहीं जितनी चोट के निशान हैं
समझ सकते हो तो समझना फुर्सत में
मेरा मौन होना तेरे सारे सवालों का जवाब है


मेरे प्रश्न ःः

कभी कभी तो मुझे तुम्हारी हंसी ठिठोली भाती है।
कभी कभी क्यों मेरे मन में ये शोले भडकाती है।
मेरे वश की बात नहीं ये,
न ही है कोई गल्ती मेरी।
मन का अंतर्द्वंद ये अपना,
यही भावना शायद मेरी।
ये दुनिया रंग बदलती जैसे, गिरगिट रंग बदलता है।
सुंन्दर दिखती हमें कभी पर क्यों नागिन सी डसती है।
कभी कभी तो.........
स्वार्थ पूर्ण ये सारा जग है,
न ही है अपनत्व भावना।
अपना अपना हर कोई चाहे,
हर मानव की अलग कामना।
मन मयूर पुलकित हो उठता,ऋतु बसंन्त जब आती है।
महिनों बाद बदलकर फिर वह क्यों पतझर बन जाती है।
कभी कभी तो..........
इस मिट्टी के पुतले में तो
जीव आत्मा पडे हुऐ हैं।
प्राण हमें दो दिन को जैसे,
दानस्वरूप ही मिले हुऐ हैं।
आत्मा का तो काम यही है,आवागमन ही करती है।
जानबूझकर सारी दुनिया फिर क्यों पाप कमाती है।
कभी कभी तो.............
प्यार प्यार का नाम नहीं यहां
अर्थ रूपमय सारी दुनिया।
चंद चांदी के सिक्कों पर ये
न्योछावर बेचारी दुनिया।
जीना मरना हमें यहां ये,गीता कुरान सिखाती है।
नश्वर जब संसार ही सारा फिर क्यों दुनिया रोती है।
कभी कभी................
ईमान धर्म न अपना कोई
दौलत से ही रिश्ते हैं।
जिसकी खातिर देखो हमने,
सबसे नाते तोडे हैं।
पैसा ही भगवान यहां पर,पैसा ही ईमान है।
बेचो तुम ईमान भी अपना क्यों न आत्मा कहती है।
कभी कभी तो..............
रूपरंग के बाजारों में
सरेआम नीलामी होती।
क्षुधा तृप्ति के लिए यहां पर
दो कौडी में इज्ज़त बिकती।
तनमन सब तुम यहां खरीदो माया का बाजार लगा है।
धन से फिर भी बोलो प्यारे सत्यप्रीत कब मिलती है।
कभी कभी तो............
सत्य अहिंसा कू रखवारे
ईश्वर के भी यहां शिकारी।
दिल का देवालय दूषित कर,
लक्ष्मी के बस यहां पुजारी।
धर्म कर्म यदि नहीं यहां पर,बदमाशों का शासन है।
कौन शक्ति है जिससे फिर भी जगमग करती धरती है।
कभी कभी तो..........

स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

जनक दीर्घकालिक पीड़ा के ,
अनापेक्षित प्रश्न बन जाते ।
बडी सहजता से कुरेदते ,
बंद ज़ख़्मों के मुँह खुल जाते ।

कितने प्रश्न चिह्न लग जाते ,
हर इच्छा करने से पहले ।
प्रश्न स्वयं उत्तर बन जाते , 
जीवन पट पर चित्र रुपहले ।

बाल्यकाल में बालक करता ,
अपनी माँ से प्रश्न सौ बार ।
उत्तर देती मुखड़ा चूमती ,
दिठौना देती जाती बलिहार ।

मनुष्य का मन रहता जिज्ञासु ,
उस परब्रह्म की पाने को पार ।
प्रश्न सैंकड़ों मन करता है ,
कहाँ बैठा जग का भर्तार ।

पंच महाभूतों के पुतले में , 
किसने फूँकें हैं ये प्राण ।
मृत्यु जिस रथ पर लेने आती ,
क्यों नहीं दिखता वह महायान ।

प्रश्न प्रेम में प्रश्न क्षेम में ,
मन सागर में प्रश्न हिलोरें ।
ज्वार भाटा क्यों सिंधु हृदय में ,
शशि पर उर्मियाँ डालें डोरे ।

कितने प्रश्न अनुत्तरित रहते ,
बहुधा प्रश्नों के प्रश्न जवाब ।
पृष्ठ भूमि प्रश्नों की होती , 
बनता हृदय अन्तस्थ किताब ।

स्वरचित :-
ऊषा सेठी 
सिरसा 125055 ( हरियाणा
)




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