Sunday, February 10

"दहलीज़ "08फरवरी 2019

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दबे क़दमों से जो वो आकर ठहरा दहलीज़ पे,
जाती बहारें दमभर के लिए ठहर गई दहलीज़ पे ।

दामन में समेटे माज़ी की वो चंद हंसीन यादें 
ढलती शाम , जाते जाते उँडेल गइ दहलीज़ पे ।

बेइरादा जो अरमानों ने ली अँगड़ाई इस दिल में 
दफ़अतन ,हसरत भरी नज़रें बिछ गई दहलीज़ पे ।

ख़्वाब सा कोई बस गया इन निगाहों में चुपके से 
शुआ ए आफ़ताब फ़िर से बिखर गई दहलीज़ पे ।

ख़्वाहिशों का सैलाब और ये सफ़ीना ए दिल 
उमृ -ए - रफ़्ता जाते जाते ठहर गई दहलीज़ पे ।

स्वरचित (c)भार्गवी रविन्द्र .....बेंगलोर 
माज़ी -अतीत , दफ़अतन - जानबूझकर , सैलाब - बाढ़ 
शुआ ए आफ़ताब - सूरज की रौशनी , सफ़ीना - कश्ती


क्या करें अश्क आँखों की दहलीज पर आ गये 
रूकाये से भी न रूके हाल ए दिल सुना गये ।।

बेसब्र हो रहे थे वो उनको महीने नही सालों से
वो मिले दो लब्ज बोले बाकी अश्क सब बता गये ।।

देखकर चेहरा उनका भी हाल कुछ ऐसे ही लगा
अश्क उनका जैसे आँख की दहलीज पर रूका ।।
पूरा वाक्यात वो दो लब्जों में ही समझ गये 
पर वक्त अब भी जैसे किसी दहलीज पर है थका ।।

आते आते बहारें भी कब कहाँ रूक जायें 
बारिष कहीं बरसनी हो हवा कहीं उडा़यें ।।
दहलीज पर भी कभी किस्मत थमीं 'शिवम'
आँगन क्यों न किस्मत पर अफसोस मनायें ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 08/02/2019

दीवारों की मौन बात ,,और
छत का एकटक निहारना
बहुत चुभता था दहलीज को...।
घर के आँगन की कहानी
दरो दीवार पे खड़ी थी
बाहर जाने को आतूर
सहमी-सहमी सी चुपचाप
दहलीज रोके खड़ी थी
उस कथा का विस्तार
खिड़कियां-दरवाजे भी
खुलकर खिलखिलाए
आँगन की बेबसी पर
बस! एक दहलीज ही थी जो
लांघने का दर्द जानती है
सदियों से ठोकरों में रहकर
दहलीज के बाहर रावण राज है
अन्दर मर्यादा पुरुषोत्तम
बाहर मृगमरीचिका है भ्रम की
जो दूर तलक ले जाती है
फरेबी स्वर्ण आभा से मण्डित...।।

स्वरचित
गोविन्द सिंह चौहान
भागावड़,, भीम,,राजसमन्द


ख़्वाबों की दहलीज पर
यादों का पुलिंदा बांधे बैठी हूँ
शायद किसी मोड़ पर
शायद किसी छोर पर
किसी चौराहे पर
किसी दोराहे पर
तुमसे मुलाकात हो जाये
दर्द की 
सलीब पर टँगी
पलकों की दहलीज पर
लहराता समंदर रोके
बैठी हूँ 
इस इंतजार में
कोई महकता 
झोंका हवा का
बन आएगा 
मरहम जख्मों का
लाएगा सन्देशा
फिर होगी
दिल की दहलीज पर
कोई दस्तक
दिल की धड़कन सम्भाले
बिखर जाऊंगी मैं
एक बार फिर
तेरी दहलीज पर

सरिता गर्ग
स्व रचित


लांघ कर 

दहलीज वो 
पराई कहलाई
और किसी की 
दहलीज में पहुंच
अपनी कहलाई
दहलीज़ का फर्क 
या रीति रिवाज का 
परंपरा का या सोच का
जो बना देता पल मे 
अपने को पराया तो 
पराये को अपना सा 
दहलीज लांघते ही 
टूटने लगती मर्यादाएं
दहलीज मे दबकर मरी
कितनी इच्छाएं आकांक्षाएं
सोचता हूं वक्त के साथ बढे 
दायरा इन दहलीजों का 
जी सके ताकि हर कोई 
अपना सा बनकर 
अपनी इच्छा से जीकर
अपनी इच्छा से जाकर 

कमलेश जोशी 
कांकरोली राजसमंद
दहलीज़ होती मर्यादा
दहलीज़ होती है सीमा
दहलीज़ में रहकर ही
कभी नही पड़ता है धीमा 
दहलीज़ होती हद है
दहलीज़ होती ज़ीद है
भक्तिभाव प्रिय भक्ति में
दर्शन देता प्रिय गोविंद है
दहलीज़ में हम सब रहते
जैसा करते वैसा भरते
कर्म प्रधान इस जीवन मे
कोई बनते कोई बिगड़ते
घर दहलीज़ सदा पावन हो
नित खुशियों का गायन हो
स्वर्गीम सा घर हो अपना
सदा प्रभु को नव नमन हो
जीवन स्वयं है मर्यादित
सद चरित्र है दहलीज
जो तुम चाहो पा जोओगे
कोई बड़ी नहीं है चीज
जो खुद दहलीज़ लांघता
वह् जीवन मे रोता धोता है
पाता नहीं है वह् जीवन मे
नारकीय जग निज रोता है
दहलीज़ में रहना सीखो
जनमन में बसना सीखो
निज स्वार्थ परहित छोड़ो
भारत माँ से खुद को जोड़ो
जगजीवन है सुन्दर सपना
नहीं पराया कोई अपना
कर्तव्य दहलीज में रहकर
नहीं किसी से कोई डरना।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

ग़ज़ल,
ग़म को दिल में छुपा ए रखना,

प्यार का दीया जला ए रखना।।१
खुद आयेगी मंजिल सामने,
अपने पग दहलीज पे रखना।।२।।
ये चांदनी जवां मौसम न मिले
दिल में मुहब्बत जगाएं रखना।।३।।
राह पर जरा संभल के चलना
खुद को हमेशा बचाए रखना।।४।।
हाए कैसी सजा जी ने की,
मुरझाए गुलों का खिलाएं रखना।।५।।
बहर से ग़ज़ल की पहचान बनी,
राह बहर की बनाए रखना।
६।।
देवेन्द्र नारायण दास बसना छ,ग,।।

आज हमारे प्यारे बच्चे
चाँद तलक जा पहुँचे
चाँद पे घर भी बनवा लेंगे
ऐसा सोचा करते...
बचपन बीता लिखा पढ़ी की 
पढ़ लिख कर आबाद हुए..
'डॉलर'और'यूरो' की ललक में
कितने तो बर्बाद हुए।
घर छूटा अपनो से बिछड़े
माटी देश की दूर हुई..
भीगी अम्माँ की आंखे भी
इन सबको न रोक सकी...
घर की# दहलीज पर 
बैठे मां बाबा नज़र न आते
आँखे पत्थर जाती जिनकी
राहें तकते - तकते ।।

दहलीज़.....

कितना मासूम...
प्यारा सा लफ्ज़ है....
दहलीज़...देहरी...
सभ्यता है...संस्कार हैं....
प्यार की नेह की सुगंध है....
पादुर्भाव है दिल से दिल में....
संवाद का...
वाणी से....आचरण से....

जिसने दहलीज़ को लांघा है...
वो रिश्ता...रिश्ता नहीं रहा...
बेटा हो...बेटी हो...बहु हो...
पति हो...पत्नी हो....

अक्सर कहते हैं हम कि पहले ज़माने में...
शिक्षा नहीं थी... अनपढ़ थे लोग....
'लिविंग स्टैण्डर्ड' नीचे दर्जे का था...
और आज....
शिक्षा ने....लिविंग स्टैण्डर्ड ने...
झंडे गाड़ रखे हैं...
प्रगति के नए आयाम...रोज़ बनते हैं...
हर क्षेत्र में...
'सोछल स्टैण्डर्ड' बहुत 'हाई फाई' है....
फिर भी....
झगडे...खून खराबा...रिश्तों में कड़वाहट...
घर टूटना....रोज़ की बातें हो गयीं...
बृद्धाश्रमों और उनमें रहने वालों की...
दिन-ब-दिन बढ़ती संख्या...
गवाह है कि हम कितने जागरूक...
कितने बेबाक...बेशर्म...निडर हो गए हैं...
कि अपने सिवा कोई दिखाई नहीं देता....

कहाँ धोखा खा गए हम....
कहाँ....
भूल गए हम अपनी दहलीज़...
जो पहले ज़माने में...
सब अपनी वाणी में आचरण में...
दिल में समाये रखते थे....
अपनी सभ्यता...संस्कार से जुड़े थे...
जो कोई लांघता था दहलीज़...
घृणित नज़रों से देखा जाता था...
आज लांघना दहलीज़...
'सोसाइटी' में...
स्वतंत्रता...निडरता...स्वाबलंबन...
प्रयाय बन गया है...
दहलीज़ के मायने बदल गए...
इंसानियत गर्त में चली गयी...
इंसान यंत्र हो गए...
दहलीज़ घर की...समाज की...
देश की ही नहीं....
भूमण्डल की भी 'क्रॉस' कर गए...
इतने शिक्षित हो गए हम...
कि सब कुछ पा कर भी...
सुखी नहीं हम...
शांत नहीं हम...
क्यूंकि दहलीज़ गुम हो गयी...
हमारी दहलीज़...
सच में... लुप्त हो गयी...

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा I

उम्र की दहलीज तक
निभाई है रिश्तों की मर्यादा मैंने
यह लक्ष्मणरेखा जीवन की

जो कभी ना लांघी मैंने
पर क्या यह दहलीजें सिर्फ मेरी खातिर
क्या नारी पर ही है हर पहरेदारी
अग्निपरीक्षा सीता की जो लांघी दहलीज
पत्थर बनी अहिल्या जो टूटी मर्यादा की दहलीज
प्रतीक्षित उर्मिला को अयोध्या की दहलीज
मीरा को विष का प्याला टूटी जो दहलीज
कृष्ण विरह में राधा को वृंदावन की दहलीज
वचन की खातिर द्रौपदी को पांचाली की दहलीज
घर की दहलीज समाज की दहलीज
रिश्तों की दहलीज बंधनों की दहलीज
यहाँ तक नारी के ऊपर खुशियों की भी दहलीज
दहलीजों का संसार क्यूँ नसीब नारी का
अब दो निकालने कदम उसको भी
इन दहलीजों से बाहर कभी
----नीता कुमार

============
(1)खोल माँ द्वार 
दहलीज़ पे तेरे 
खड़ा अज्ञान 
🌹🌹🌹
(2)देता दस्तक 
भोर की दहलीज़ 
सूर्य देवता 
🌹🌹🌹
(3)खुले है द्वार 
ईश्वर दहलीज़ 
वही इंसाफ
🌹🌹🌹
(4)उम्र सोलह
आते ही दहलीज़ 
जागे हैं ख्वाब 
🌹🌹🌹
(5)छोड़ने जाते
स्वर्ग की दहलीज़ 
मेरे ही यार
🌹🌹🌹
(6)मावस रात
दहलीज़ से लौटा
तम में चाँद 
🌹🌹🌹

===रचनाकार ===
मुकेश भद्रावले 
हरदा मध्यप्रदेश 

बांट जोहती..
घर की दहलीज...
उन किलकारियों की..
जो गूँजती थी अभी..
पूरे आँगन में..
जो लांघ गई,
जिम्मेदारीयां अपनी..
छोड़ बूढ़ी आँखों में पानी..
छोड़ अकेले..
उम्मीदों के दामन में..
चल दिया..
छोड़ सुनापन आँगन में...
पुकारती दहलीजें..
करुणामयि स्वरभंगिमाएं...
क्यों न तुझे..वो बचपन याद आए...
कर दी जाती थी...नीची दहलीजें तब...
जब जब लगी ठोकर तुझे तब तब...

स्वरचित :- मुकेश राठौड़



1

हर आदमी कब से 
ठिठका पड़ा है 
वक्त की दहलीज पर 
बेबस लाचार आदमी 
कब से खड़ा है
दर्द की दहलीज पर

2

कोई आकर बताओ हमें
ये कैसी दहलीज है 
इस दहलीज की 
क्या रीत है 
यह कैसी रीत है
बस्तियाँ जलाई जा रही है 
दिन के उजालों में 
संविधान बनाया जा रहा है 
रात के अंधेरों में 

3

ये कैसी दहलीज है 
यहाँ परंपराओं, रूढ़ियों,
कुरीतियों की बहार है 
मानवता के नाम पर
लहू का फरमान है 
मंदिरों में देवदासियों की 
भरमार हैं
विद्यालयों में दौलतों की 
कहानियाँ है
रो रही सच्चाई है 
चारो ओर बेईमानी है 

4

गाँव, शहर और आबादी 
एक दिन बर्बाद हो जाएंगे 
जब ईमान को 
दहलीज में कैद किये जाएंगे 

5

हमने कभी ऐसा ना सोचा था 
वक्त भी ऐसा आएगा 
लोकतंत्र, संविधान को
सियासत ही जला
डालेगी 
और एक दिन 
जन गण मन को 
तबाही की दहलीज पर 
ले आएगी 
@शंकर कुमार शाको
स्वरचित


श्वेत बिन्दु कुछ
झिलमिल सी
हरे पत्तों पर
खिलखिला रही है
जैसे तैरती आँखों में
असंख्य स्वप्नों की खिलखिलाहट
इन बूँदों से टकराती
चंचला - चपला किरणें
करती गुदगुदी सी
अधूरे स्वप्नों के
कई अक्स
झाँकते अन्तर से
चटकती कलियों में
उड़ती खुशबू में
और झरते हृदय के
रंग महल में 
हरशृंगार के जैसे
ख्वाहिशों की फैलाए झोली
प्रतीक्षारत मैं
कि तुम लौट आओ
उसी पुराने रूप में
एक बार फिर से
दस्तक दो तुम
स्मित अधर 
फिर से
मेरी चाहतों की
दहलीज पर..... ।

स्व रचित 
डॉ उषा किरण
साँवली सूरत....
मनमोहिनी मूरत..
हिरणी सी,चंचल नयन

रातों को मेघों का शोर
नाचता मन मोर.......
झर-झर झरता सावन..

कभी सपनों में....
कभी यादों में....
अतीत के झरोखे में...

खयालों के बवंडर में..
जज्बातों के तूफानों में..
दिल के कोने मे.....
मर्यादा को समेटी.
अपने दामन मे...

नारी मर्यादा की.... 
दहलीज को कभी ना
पार किया.....
कहोगे कैसे कि..
गुनाह किया...।
फिर भी कितनों ने
ऐतबार किया...
मैं हूँ "कृष्णकलि"...।

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल


सिंदूरी आभा लिए 
पर्वतों से उतरती सुरमई सांझ 
सागर किनारे हो मौन मुखरित
आ बैठी है दहलीज पर
कर रही है इन्तजार
कुछ थके पाँवों का,जो
दिन भर की कडी धूप,
अथक परिश्रम से हो बेहाल,
अब घर लौटने को है बेकरार
सांझ तुम जरा हट बैठो दहलीज से
आहिस्ते से नीड मे आते परिन्दों को
आने का रस्ता दो।
निशा भी राह तक रही
तुम्हारी जगह लेने को,
थके पथिक को कुछ 
सुकून देने के लिए।
फिर इक नयी सुबह आएगी
नयी उर्जा का सन्चार लिये
जीवन का अबाध चक्र 
यूँ ही चलता रहेगा ।

स्वरचित
अनिता सुधीर
दहलीज पर खड़े हम
लेकर सौ सवाल
घर के अंदर बैठे रहे 
या दे हम दहलीज लाँघ

एक बार पार गये जो
फिर मूड़ कर न देखेंगे
आये कंटक राह मे जो
राह कभी ना छोड़ेंगे

दहलीज पार हम अकेले नही
साथ मे होते स्वाभिमान
जड़ नही चेतन है हम
सोच समझ कदम बढ़ायेंगे

नजर रखे गर देश पर दुश्मन
नजर हम झुका देंगे
दहलीज पर जो रखे कदम
नेस्तानुबुंद हम कर देगें

अपने देश के दहलीज को 
हम अक्षुण्य रखेंगे
इसे अक्षुण्ण रखने को 
सर हम कटा लेंगे
स्वरचित-आरती श्रीवास्तव।

सच पूछो तो दहलीज़ छोटी लक्ष्मण रेखा है
इसमें हमारे अनुशासन का थोडा सा लेखा है
हम ज़बरदस्ती इसे न पार करें
अपने जीवन को दुष्वार करें। 

इन दिनों दहलीज़ लांघी जा रही है
कुटिलता की घोर आँधी आ रही है
अच्छे शब्द तो जैसे सो रहे हैं
अपने भाग्य को लेकर रो रहे हैं। 

भाषा मर्यादा हीन हो गयी
माइक पर वसन हीन हो गयी
वातावरण विषैला हो गया
हर बात पर झमेला हो गया। 

शिखर संवेदन हीन हो गये
लोग झूठ में प्रवीण हो गये
अब क्या होगा अब क्या होगा
लोग यही सोच ग़मग़ीन हो गये।

दहलीज़ के अर्थ बहुत गहरे हैं
ये भावनाओं के मौन पहरे है
इनकी आवाज़ सुनाई नहीं देती उनको
जो अहम् में डूबे बहरे हैं।

मर्यादा में बंधी रहती है
दहलीज
एक चौखट में बंधी है
दहलीज

दहलीज के अंदर है 
घर की इज्जत
बाहर गयी तो 
सरे आम बदनाम है
आबरू

आज हर मुकाम पर 
खड़ी है नारी 
पड़ रही है वह
हर सफलता पर भारी
मत बांधो उसे 
दहलीज की रेखा में 

आने दो बाहर बेटी बहू को
दहलीज के
बेटों की तरह 
काम करने दो उन्हें 
घर बाहर के

दहलीज तो है बस 
आँखो की मर्यादा तक
बढो और भेदो लक्ष्य 
उन्नति के उच्च सोपान तक

स्वलिखित लेखक संतोष श्रीवास्तव
भोपाल

संध्या के दहलीज खड़ा 
रवि आकुल है मिलने को
निशा पार दहलीज है आई
रंग चाँदनी ढलने को
सूरज छिपता झुरमुट में जब
बच्चों ने खेल समेट लिये
थके पाँव व्याकुल है पल पल
उस दहलीज तक चलने को।

बैठी है वो जाने कब से
रह रह कर राह निहार रही
चिंतित है , दिन बीता जाता
आशा भर आँख पुकार रही।
रजनी आई बनकर आशा
लौटेंगे नीड़ को अब पक्षी
दहलीज से अंदर आई खुशियाँ
नजरों से नज़र उतार रही।

उन्नति का पथ प्रशस्त करें
ये है मर्यादा सोपान ।
बाँधो न नारी को अन्दर
भरने दो जीवन को उड़ान।
आधार बने जब बढे कदम,
मन में रहे न कोई प्रश्न
पैर धरा पर बना रहे
हो उम्मीदों भरा आसमान।

स्वरचित
गीता गुप्ता 'मन'

विधा- कविता छंद मुक्त
यौवन की दहली पर कदम
नया उन्माद, बेपरवाह 
बेटी देहरी नहीं लांघती , 
माँ-बाप की नाक नहीं कटाती, 
हिलोर तन-मन में , 
भटकती शिक्षा -दीक्षा तक, 
जब हो जाता कन्यादान, 
माँ-बाप की दहली, 
हो जाती सूनी-सूनी , 
हवेली की विरानी 
यादें -नसीहत, 
नयनों का बहता काजल
बिटिया का सुख-दुख 
भाग्य भरोसे , 
अब बेटी पराई 
जन्म भर की भरपाई ।
बिटिया को ससुराल की देहरी , 
बहुत को लगती गहरी ।
ऩनंद -जेठानी का डर, 
क्योंकि झुका नहीं सकती सर ।
देहरी दर्पण दिखाती हैं , 
ससुराल कि मर्यादा सीखाती हैं।
बडो़ की आज्ञा मानना धर्म,
पति के हर कार्य में सहयोग, 
होता हैं उसका मुख्य कर्म ।
वह देहरी अगर उतरती हैं , 
फिर कभी नहीं सुधरती हैं।
बहू को बिटिया समझ सत्कार दो, 
फिर उससे बिटिया सा व्यवहार लो।
हर दहलीज का अपना कायदा हैं, 
वह निभाओ तो तुम्हारा फायदा हैं।
स्वरचित -चन्द्र प्रकाश शर्मा 
'निश्छल',


बाबुल की दहलीज पर चहकती बुलबुल
गिलहरी सी कातर,फुदक जैसे खगकुल
नन्ही गुड़िया,फुदक फुदक अब बड़ी हुई
सौंदर्य-सुधा से सराबोर वो एक परी हुई
पेशानी पे परेशानी कोलाहल भरे हृदय में
निरत अहर्निश तात,सुता-सगाई के लय में
अथक उपक्रम पश्चात साधित मनोकामना
निरख परख फिर एक वर का हाथ थामना 
लाल जोड़े, डोली में ओढ़े लाल ओहार चली
उड़ी बुलबुल,बाबुल की दहलीज के पार चली
संजीदा है,बचपना अल्हड़पन सब कहीं गुल
ससुराल की दहलीज में जैसे कैद में बुलबुल
-©नवल किशोर सिंह
स्वरचित
दहलीज प्रतीक,
मर्यादाओं की,
परिवार की आन की,
उसके सम्मान की,
होती है सुरक्षा घेरा।
जिसके अंदर
फलता-फूलता जीवन,
संस्कार लेते स्वरूप।
दहलीज है,
संस्कृति का प्रतीक,
घर की पहचान,
परंपराओं का मान।
दहलीज,
बांधती परिवार को,
बंधन में।
दहलीज है,
लक्ष्मण-रेखा।
जिसका उल्लंघन,
लाता मुसीबत,
संकट में पड़ती मर्यादा।
दहलीज,
पड़ाव है,ठहराव है।
जहां जिंदगी ,
करती है विश्राम।।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित


पुरातन काल से बनी दहलीज़ ,
भारतीय संस्कारों की एक अंग ।
कलश ,नारियल,पुष्प चित्रों से ,
सजा कर चौखट भरते थे रंग ।

दहलीज़ नाम है मर्यादा का ,
उल्लंघन होता जिसका दुष्कर ।
लक्ष्मण रेखा एक दहलीज़ थी ,
उल्लंघन से हुआ दुखी परिकर ।

मुख्य द्वार पर बनी दहलीज़ से , 
घर की स्वच्छता बनी है रहती ।
नकारात्मक शक्ति बाहर रहती ,
गेह समरसता बनी है रहती ।

चुपके से थी झाँकती बेटियाँ , 
घर दहलीज़ कभी न करतीं पार ।
पिता की पगड़ी रखती सुरक्षित , 
बनती दूसरे घर का शृंगार ।

नई सभ्यता के नए दौर में,
दीमक चाट रही संस्कारों को ।
बहा ले गई पश्चिम की आँधी ,
हमारे पारम्परिक उद्गारों को ।

स्वरचित :-
ऊषा सेठी 
सिरसा 125055 ( हरियाणा )

विधा=मुक्तक 
लिखने का प्रयास 
===========
दहलीज़ भावों का भंडार 
खुशियाँ देता हैं हमें हजार 
दुल्हन घर में रखती कदम
परिवार का मिलता है प्यार 

दुल्हन भी खाती है कसम
ये रिश्ता रहेगा सात जनम
दहलीज़ पर आयी हे डोली
अर्थी की भी निभाऊँ रसम 

उम्र सोलह की दहलीज़ 
इश्क के फूट रहे है बीज 
बाहर की मिल रही हवा
और अपनों से रहा खीज

सोलह सत्रह साल की उम्र 
रहे सम्हल बिगाड़े हम उम्र
इस दहलीज़ पर रखे ध्यान 
नहीं तो बदनाम होंगे ताउम्र 

====रचनाकार ====
मुकेश भद्रावले हरदा 
08/02/2019

यह तो एक ऐसा बन्धन है,
यह दहलीज मान सम्मान है।
जब जब इसको लांघा गया,
तब तब छिना हर एक सम्मान है।

बचपन से लेकर घर तक में
हर जगह यह दहलीज होती है।
कभी भर देती उन्माद है मन में,
तो कभी यह पराया करती हमको।

दहलीज में प्यार छुपा बाबुल का,
दहलीज में मान छुपा घर का।
यदि ना समझी में लांघोगे तो,
निर्वांण छिपा है हर जन का।

सीखो इसकी इज्जत करना
इसमें कल्याण तुम्हारा है।
इसमें कल्याण तुम्हारा है।
(अशोक राय वत्स) स्वरचित
जयपुर

------------------------
बेटी बन बाबुल की
दहलीज की रखी मर्यादा
दिल पर पत्थर रख
माँ-बाप का घर छोड़ा
चली साजन के घर
अपने दिल को तोड़ा
सपनों की बांध पोटली
तिजोरी में रख छोड़ा
दहलीज का मान बढ़ाया
सबको रिश्तों में जोड़ा
सबकी खुशियांँ चुनी
अपनी खुशियों को छोड़ा
खुद गीले में सोई
सुखा बच्चों के लिए छोड़ा
सबके सुख के लिए
अपने वजूद को निचोड़ा
जब सपने याद आते
बंद तिजोरी को खोला
देखा, सहलाया
नम आँखों को पोंछा
देकर सबको सम्मान
खुद अपमान बटोरा
सब छोड़कर भी
चेहरे की मुस्कान को न छोड़ा
दी बार-बार अग्नि परीक्षा
पर नारी होने का गौरव
अपना अभिमान न छोड़ा
क्योंकि नारी ही नारायणी है
नारी से ही हर दहलीज की शोभा
***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित रच
ना
मेरे दिल की दहलीज पर
न रखा आज तक किसी ने कदम।
घर के बंद दरवाजों पर

न हुई आज तक कहीं कोई दस्तक।
इंतजार करता रहा,
ख़ामोशी से बैठा रहा।
हद हो गई अब तो इंतजार की,
अब किसी के आने की
कोई उम्मीद नहीं बची।
अपनी ख्वाहिशों की,
खुद मैंने चिता जला दी।।
निलम अग्रवाल, खड़कपुर

(1)
घर उद्धार 
मर्यादा दहलीज़ 
सँस्कार द्वार 
(2)
निहारे धरा 
क्षितिज दहलीज़ 
सूरज विदा 
(3)
वक़्त के घर 
उम्र की दहलीज़ 
खड़ा है काल 
(4)
भीतर घाव 
मन की दहलीज़ 
मुस्काते भाव 
(5)
जागते दीप 
साँझ की दहलीज़ 
सो गया दिन 

स्वरचित 
ऋतुराज दवे
तुम्हारा खत यूं सम्हाल कर रक्खा हुआ है। 
जख्मे जिगर ज्यों पाल कर रक्खा हुआ है।


लगाया तुमने जिससे मेरे जख्मों पे मरहम। 
मैंने वह कांटा निकाल कर रक्खा हुआ है। 

यूं पूछते हैं कि तुम अब मुस्कुराते क्यों नहीं। 
आंखों में समन्दर उबाल कर रक्खा हुआ है। 

अब वही जाने कि उनके दिल मे छुपा क्या। 
हमनें ये कलेजा निकाल कर रक्खा हुआ है।

मुझको किसी सूरत अब अफसोस न होगा। 
उसने तो सिक्का उछाल कर रक्खा हुआ है।

जो घर की दहलीज छोड कर आए थे तुम। 
उसी पर हमनें दिया बाल कर रक्खा हुआ है। 

जो हंस रहे थे बीच शहनाईयों के उस पल। 
उन्होने अब घूंघट निकाल कर रक्खा हुआ है। 

क्या करेगी कल ये दुनिया जल रही है जब। 
सिर्फ हाथों में हाथ डाल कर रक्खा हुआ है।

है नसीहत को ये पुतले देख कुछ डरो सोहल। 
तूफान शीशे मे पिंघालकर कर रक्खा हुआ है।

विपिन सोहल
विधा:हाइकु
1
घर की खुशी
दहलीज पर माँ-
जीवन धन्य
2
माँ का आँचल
घर की दहलीज-
पूरा संसार
3
हम निकले
दहलीज को छोड़ -
शहर मार्ग
4
हम उलझे
दहलीज को भूल-
जीवन चक्र
5
दहलीज है
कच्चे घर की याद-
पापा की गोद

मनीष श्री
स्वरचित
रायबरेली
प्रस्तुति : चतुर्थ 
------------------
1

रोटी के लिए जो तरसता है 
वो दहलीज क्या जाने 
वसन के लिए जो तड़पता है 
वो दहलीज क्या जाने 
दहलीज अमीरों की अमानत है 
भूखा नंगा कोई निर्धन दहलीज क्या जाने 

2

श्मशानो में भूखी हड्डियाँ बिखरी हुई है 
बाज़ारों में कफन की कीमत लगी हुई है 
ऐ मनुज! बता 
क्यों हमेशा मानवता की दहलीज शहीद होती रही है 

3

मर्यादा गरिमा सिर्फ कहने की बातें हैं 
जब बात दौलत संपत्ति शक्ति की आती है
तब पल पल घर घर
ईमान की दहलीज की आबरू लूटी जाती है 

4

धर्म मन्दिर पूजा प्रार्थना 
सब दहलीज हैं इंसानियत के
सत्यम् शिवम् सुन्दर् तीनों दहलीज हैं 
मानवता के
आज खुलेआम धर्म को शर्मसार किया जाता है 
फिरभी आज मन्दिर को लूटा जाता है 
पूजा के नाम पर इंसान ठगा जाता है
प्रार्थना के नाम पर अंधविश्वास फैलाया जाता है 
यह इंसानियत की कैसी दहलीज है
जहाँ मानवता के नाम पर धोखा दिया जाता है
5

शिक्षा ज्ञान बुद्धि आचरण 
सब बिकते हैं यहाँ 
संविधान की धज्जियाँ उड़ती हैं यहाँ 
अभिव्यक्ति की यह कैसी दहलीज है 
संसद में भी गालियाँ दी जाती है यहाँ 

6

शुचिता विन्रमता शालीनता बंजर हो गई है 
भय आतंक हिंसा का उपवन सजा है 
जनकल्याण की यह कैसी दहलीज है 
बाहुबली शक्तिशाली की होड़ लगी हुई है 
@ शंकर कुमार शाको 
स्वरचित

दस्तक दे रहा दहलीज पर कोई 
चलूं उठ के देखूं कौन है
कोई नही दरवाजे पर
फिर ये धीरे धीरे मधुर थाप कैसी
चहुँ और एक भीना सौरभ
दरख्त भी कुछ मदमाये से
पत्तों की सरसराहट
एक धीमा राग गुनगुना रही
कैसी स्वर लहरी फैली 
फूल कुछ और खिले खिले
कलियों की रंगत बदली सी
माटी महकने लगी है
घटाऐं काली घनघोर, 
मृग शावक सा कुचाले भरता मयंक
छुप जाता जा कर उन घटाओं के पीछे
फिर अपना कमनीय मुख दिखाता
फिर छुप जाता
कैसा मोहक खेल है
तारों ने अपना अस्तित्व
जाने कहां समेट रखा है
सारे मौसम पर मद होशी कैसी
हवाओं मे किसकी आहट
ये धरा का अनुराग है
आज उसका मनमीत
बादलों के अश्व पर सवार है
ये पहली बारिश की आहट है
जो दुआ बन दहलीज पर
बैठी दस्तक दे रही है
चलूं किवाडी खोल दूं
और बदलते मौसम के
अनुराग को समेट लूं
अपने अंतर स्थल तक।
कुसुम कोठारी।
चार अक्षरों का ये नाम। 
बाँधे रखे जीवन तमाम।

मर्यादा की शिला आधार ।
जोड़े रखे सारा परिवार ।

दहलीज सिखाती है संस्कार।
जीवन का चले व्यापार।

आखों की दहलीज 
लाज का पानी। 
उम्र की देहरी बहके जवानी। 

देहरी नहीं है कोई जंजीर ।
आन बान शान की तासीर। 

दहलीज कभी ना लाँघे कोई।
टूटे सीमा जिंदगी रोई।

दहलीज आत्म सम्मान है।
जीवन का अटूट विधान है।

दहलीज सम्मान की नींव है।
आस्था निष्ठा बल सींव है।

दहलीज है सीमा रेखा ।
जिसने इतिहास समेटा।

रामायण से महाभारत तक।
दहलीज रही है साक्षी तट।

जिसने किया दहलीज पार। 
पाया उसने संकट अपार।

रक्षक संस्कृति संस्कारों की। 
अवरोधक है अनाचारों की


खंडित दहलीज कभी करना।
मान सर्वदा बनाये रखना।

स्वरचित 
सुधा शर्मा 
राजिम छत्तीसगढ़ 
प्रीत देहरी 
ह्रदय के किवाड़ 
हर्ष उत्कर्ष 

पृथ्वी आकाश 
क्षितिज की देहरी 
मिले थे कभी 

ज्ञान के द्वार 
विज्ञान दहलीज 
मनु उद्धार 



यौवन की दहलीज पर खड़ा मधुमास 
बासंती मुस्कान लिए ॠतुराज 
बजा रहा खुशियों के साज ।
प्राची की अरूणाई गहरायी 
बसंत आता देख शीत भी 
थोड़ा -थोड़ा शर्मायी 
सुंदर पुष्पों से आच्छादित 
वसुधा भी सज सवंर के हर्षायी ।

(स्वरचित) सुलोचना सिंह 
भिलाई
विधा-हाइकु

1.
संस्कार होते
घर की दहलीज
मान मर्यादा
2.
घर की शोभा
दहलीज बताती
मौन बनके
3.
भूखा भिखारी
दहलीज पे खड़ा
रोटी आस में
4.
सज जाती है
घर की दहलीज
कन्या जन्म से
5.
रह जाती है
कवारी दहलीज
बिन कन्या के

स्वरचित
अशोक कुमार ढोरिया
मुबारिकपुर(झज्जर)

यादें समेटे
पुरानी दहलीज 
भविष्य ढूंढे 
उम्मीद की किरण 
कल का पता नहीं |

बैरी जमाना 
पुरानी तहजीब 
उन्मुक्त मन 
यौवन दहलीज 
बदलती किस्मत |

शिक्षा संस्कार 
अध्धयन आधार 
रोशन नाम 
दहलीज शिक्षक 
तराशते जीवन |

नारी जीवन 
दहलीज उमंग
सपने नये 
जीवन समर्पण 
मान सुरक्षा सार |

स्वरचित , मीना शर्मा , मध्यप्रदेश 

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" स्वतंत्र लेखन "21अप्रैल 2019

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