Monday, February 18

"आसरा "18फरवरी 2019

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             ब्लॉग संख्या :-303




#आसरा

चल अकेला किनारे-किनारे ।
ढूंढता है तू किसके सहारे ॥

#आसरा जब भी देता जमाना ।
उसने एहसान हीं हम पे माना ।
इतने तो हम नहीं हैं विचारे ।
ढूंढता है तू किसके सहारे ॥

#आसरा तू बने जो किसी का ।
वो सबब होगा तेरी ख़ुशी का ।
बेसहारे रहे फिर तू क्या रे ॥
ढूंढता है तू किसके सहारे ॥

जानती हूं घना है अंधेरा ।
किंतु होगा कभी तो सवेरा ।
हम बनेंगे सुबह के सितारे ॥
ढूंढता है तू किसके सहारे॥

रोशनी होगी सूरज उगेगा ।
जग ये सारा हमी से जगेगा ।
जुगनू भी तम से हरगिज़ न हारे ॥
ढूंढता है तू किसके सहारे॥

हौसलों से डरें यातनाएं।
टूट जाती है सब वर्जनाएं।
आरती फिर विजय खुद उतारे ॥
ढूंढता है तू किसके सहारे॥

चल अकेला किनारे-किनारे ।
ढूंढता है तू किसके सहारे॥

रचना स्वरचित एवं मौलिक है ।
©®🙏
-सुश्री अंजुमन मंसूरी आरज़ू'
छिंदवाड़ा मप्र

हर तरफ तबाही मची,
खून की बह रही नदी, 
न आस है न आसरा, 
बस हर तरफ है निरसता |

देश का वो सिपाही, 
बुढ़ापे का था, सहारा, 
माँ की आँखों का तारा, 
छिन ले गया जो दुश्मन, 
वो आसरा था हमारा |

सब हैं पर आज वो नहीं, 
खल रही है उसकी कमी, 
आस जिस पे रखी थी ,
वो नहीं दिख रहा कहीं |

हाय हाय का ये रुदन, 
चहुँ ओर गूँज रहा, 
न धरती न ही आसमां, 
का मिल रहा आसरा |

स्वरचित *संगीता कुकरेती*
विधा लघुकविता
धर्म आसरा कर्म आसरा
मात पिता का प्रिय आसरा
जननी जन्म भूमि गरियसि
मन निर्मल स्वविवेक आसरा
एक आसरा परमपिता का
जो जग का है कर्ता धर्ता
अंधा लंगड़ा और अपाहिज
जिनका बनता रोज सहारा
आस पराई वह् करता है
कर्महीन जो जग में होता
खून पसीना सदा बहाकर
जीवन में सुखमय हो हँसता
तूफानों से हम लड़ते है
घर मे घुसकर हम मारेंगे
एक आसरा आत्मनिर्भरता
अब भारत के तलवे चाटेंगे 
वायु जल नभ सैन्य आसरा
हथियारों से हम खेलेंगे
नापाक जहरीले सांपो को
बिल उनके विध्वंस कर देंगें
आग लगाई है भारत में
शेरों को तुमने ललकारा
अरे सपेंलो कायर नर तुम
वीर शूरता प्रिय आसरा
निर्मल पावन गंग आसरा
स्वर्गीम प्रिय कश्मीर आसरा
रन बाँकुरे भारी भरकम हैं
किसका लोगे कायर सहारा?
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम्
कोटा,राजस्थान।

गुजार लेता दो पल आपकी पनाहों में 

यही एक ख्वाब था मेरी निगाहों में ।।

मगर किस्मत को कहाँ मंजूर था यह
हया न कहायी दो पल की फिजाओं में ।।

किस्मत रूठी रही ववंडर आते रहे 
पनाह ढूढ़ी कभी इस कभी उस राहों में ।।

निराश्रितों से पूछिये दिल की दुखन 
कभी पनाह देना असर होता दुआओं में ।।

उजड़ते हैं चमन बिलखते हैं परिन्दे
हजार आसियां होते पेड़ की छाहों में ।।

टेड़ी नजर कब किस पर हो वक्त की
मत डूबे रहिये सिर्फ अपनी ही चाहों में ।।

माँ बाप पालते बच्चों को आसरे को 
कोई छीने कितना दर्द होता उन आहों में ।।

आस्मां भी धराशायी हो जायेगा आह से
मत उलझिये 'शिवम' ऐसी गुनाहों में ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 18/02/2019

है आसरा माँ तेरा
कृपा बनाए रखना
भूले भटको को 
राह दिखाए रखना

नादान बच्चे थे 
आसरे जिसके
आतंक के तांडव ने
छिना उनसे
बहनों की कलाई 
हुई सूनी
बुढे माता पिता की
आँखे है पत्थराई

है मौला ताकत 
तुझमे इतनी
हर बला से 
निकाल लेता है
मुझको
बन आसरा 
हर इन्सान का इतना
खाली नही रहे
झोली किसी की

स्वलिखित लेखक संतोष श्रीवास्तव 
भोपाल

है भावों का सबको सहारा ,बस वही मैं भी चाहती हूँ ,
भावों की कभी टूटे न माला,पिरोना प्यार से चाहती हूँ |

अपनों का है सबको सहारा ,रिश्ते मैं निभाना चाहती हूँ ,
सिकुडे न प्रेम का कोई धागा, बुनना हर घड़ी चाहती हूँ |

अपने देश में हो कोई अभागा, नहीं देखना मैं ये चाहती हूँ ,
सबको खुशियों का सहारा , देना हर घड़ी मैं चाहती हूँ |

आसरा ज्ञान व विज्ञान का, विकास के लिऐ चाहती हूँ ,
यहाँ सूत्र कोई विनाश का, नहीं छोड़ना मैं चाहती हूँ |

रहे सलामत सबका आसरा , यही मॉगना मैं चाहती हूँ ,
जगदीश्वर हमेशा यही प्रार्थना , करबद्ध करना चाहती हूँ |

स्वरचित , मीना शर्मा , मध्यप्रदेश 
ईश आसरा मिल जाऐ तो
नहीं कुछ दुर्लभ हो पाऐगा।
प्रभु सहारा हमें सदा जब,
सब कुछ सुलभ हो जाऐगा।

सबसे बडा सहारा किसका
वरदहस्त रहता है जिसका
परमपिता तो वही कहलाऐ
मिले सुखद आसरा जिसका।

जीवन सुगम सफल हो जाऐ।
ये उन्नति मार्ग सरल हो जाऐ।
कहीं कोई अवरोध नहीं आऐंगे
अगर सहाय निश्छल हो जाऐ।

दयानिधान सदा दया करते हैं।
कृपानिधान सद्कृपा करते हैं।
दीनदयाल हैं अपने जगदात्मा,
सब झोली खुशियों से भरते हैं।

स्वरचितःःः

इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
आसरा टूटा सहारा लूटा...
लूटा किसी का घर संसार..
चूड़ियाँ टूटी खुशियाँ लूटी..
मातम का किया विस्तार..

कायरता ने औकात दिखाई..
शौर्य देखेगा अब संसार..
लिखेंगे इबारत खून से..
भरेंगे रणभेरी अब हुंकार..

लहरायेंगे तिरंगा लाहौर में..
जय हिंद की होगी ललकार..
करेंगे शंखनाद अब युद्ध का..
होगी माँ भारती की जयकार..

स्वरचित :- मुकेश राठौड़
मुक्तक
1
शिक्षक आसरे ही छात्रों के भविष्य होते,
प्रेमभाव से सद्ज्ञान के दीप जलाते।
विश्वास, लग्न और प्रतिभा की नींव रखकर,
मजबूत आधार संग अपने भविष्य सजाते।।
2
माता पिता मजदूरी करके पढ़ना सिखाया,
देश रक्षा की खातिर फौज में भर्ती कराया।
बुढ़ापे की आँखों को था एक ही आसरा,
विर बेटा लिपटके तिरंगे में घर को आया।।

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
विषय-आसरा
विधा-पिरामिड 
1⃣
है
नन्हा
अनाथ
असहाय
आसमां छत
धरती बिछौना
फुटपाथ आसरा
2⃣
है
कष्ट
बुढ़ापा
बेआसरा
घर पालक
आज उपेक्षित
संतान अनदेखी
--------***अनुराधा चौहान***© स्वरचित
"शीर्षक-आसरा"
हे प्रभु, चाहूँ मैं आसरा तेरी
ना करूँ मैं पूजा-पाठ
ना करूँ मैं वेद-पाठ
मैं करूँ दीनन की सेवा
जो है मेरे आसरा
हे प्रभु चाहूँ मैं आसरा तेरी
ना करूँ मैं व्रत त्योहार
ना करूँ तीर्थं,ना यात्रा
मैं तो करूँ माँ-बाप की सेवा
जिनको है आसरा मेरा
हे प्रभु चाहूँ मै आसरा तेरी
ना करूँ मैं यज्ञ-आहुति
ना चढा़ऊ प्रभु कभी मेवा
मैं करूँ निर्बलो की सेवा
जिनको है आसरा मेरा
हे प्रभु चाहूँ मै आसरा तेरा
ना चाहूँ मैं सोना चाँदी
ना चाहूँ, महल अटारी
मैं तो चाहूँ सिर्फ आसरा तेरी
अपना जन्म मैं सवारूँ
हे प्रभु चाहूँ मैं आसरा तेरा
अणु अणु को है आसरा तेरा
ये बस भूल बैठे मानव
हे प्रभु गति ओ मति मेरी
सब है तेरे सहारे।
स्वरचित-आरती-श्रीवास्तव।
आसरा गया , 
अवसर गये छूट, 
क्या तकदीर गयी फूट? 
किसी का गया लाल, 
तो कहीं धन-माल! 
किसी की राखी गयी 
तो कहीं आँखों तारा, 
कहीं जीवन का सहारा ! 
किसी का भरोसा न रखो 
अपने पर चलना- जीना सीखो, 
कब प्रलय आजाए, 
शरणागत ही चला जाए! 
भरोसे से दूनियाँ लूटती हैं, 
अंदर ही अंदर घूटती हैं, 
अपने में टूटती हैं।
आसरा खुद का ही रखो 
आसमान में उड़ कर देखो
तारे सितारे सब न्यारे-न्यारे 
क्या उनके कोई सहारे ? 
भरोसा हो अपने आप का
फिर तो सामना करो काल का ! 
जाओ हर दिशा में जीत ही जीत
मिल जाएगे राह में मीत ही मीत, 
कहीं गम का साया तक न होगा , 
आसरा न मिले किसी का 
भरोसा करो अपने ईश्वर का , 
जो खुद को भरोसा दिलाता हैं 
यही हैं इस जीवन की रीत! 
जीवन लहलहा उठेगा , 
सुनाई देंगे खुशियों भरे गीत ।
स्वरचित -चन्द्र प्रकाश शर्मा 
'निश्छल ',

आसमा है सर के ऊपर
किस आसरे की तलाश है
है मुट्ठी में कर्म तेरे
फिर क्यों उदास है।।

जोश है उमंग है
फिर क्यों निढाल है
चंद पल की जिंदगी है
उसमे बवाल है।।

उन्मुक्त हो,निर्भय हो
विपदा से क्यों हलाल है
क्या निस्तेज है तेरी शिराएं
जोश क्यों न बरकरार है।।

मनोबल ही तेरा आसरा
झक मारता है क्यों
ईश्वर अनुपम रचना है तू
संशय फिर पालता है तू।।

हौसलों से नीड़ बुन
प्राण मोह त्याग कर
नव सृजन स्व भाग्य रच
न आसरे की तलाश कर।।

एक कदम अब तू बढ़ा
आसरा खुद से बना
क्यों ताक बगुला अब रहा
श्वेत कमल खुद को बना।।

वीणा शर्मा वशिष्ठ
स्वरचित, मौलिक
"आसरा" द्वितीय प्रस्तुति

है आसरा तेरी रहमतों का..
जिससे जिंदगी चल रही है..
तेरे ही आसरे तो ईश्वर मेरे,
तमाम हसरतें मेरी पल रही है
तुझसे ही हर खुशी मेरी..
तू ही तारणहार मेरा..
तेरी ही बदौलत मेरी..
हर सांस चल रही है...
इतनी सी बस रहम मेरे दाता..
बना रहे तुझसे सदा ये नाता..
तेरे ही चरणों में रहूँ मैं सदा..
गीत भक्ति के गाता रहूँ मैं सदा..
हे ईश कृपा कर सभी पर..
भूखा रहे न कोई जमीं पर..
तड़फ रहे बस तेरी भक्ति की..
जलाकर ज्योति शक्ति की..
तेरे ही आसरे पड़ा हूँ..
तेरे ही सहारे खड़ा हूँ..
थाम ले तू हाथ मेरा..
ले चल द्वार मुक्ति के..
गाता रहूँ गीत भक्ति के..

स्वरचित :- मुकेश राठौड़


रखिये बुलंद हौसलों को,
इच्छाशक्ति न जाया कीजिये।
उस एक के अलावा ,
आसरा किसी का न कीजिए।
गर्दिश में हो तारे ज्यो,
बाजुओं पे भरोसा कीजिए।
करनी कथनी जो हो नेक तो,
खुदाया खुद पे भरोसा कीजिये।
बोल मीठे ,शुक्राना रहे जुबां पर,
नसमझियो की माफी मांगा कीजिये।
खता जो हो जाय कभी,
झुकिये न शरमाया कीजिये।
वक़्त ऐसा टूट जाए, सब और 
हार हो,लेना ही पढ़े आसरा,
अभिमान ना कीजिए।
लीजिए,मीसम बदलने पर,
एक का दस लौटया कीजिये।
आस किसी की ना तोड़िए,
जब हो उसकी मंजूरे नज़र,
आसरा सभी का बना कीजिये

नीलम तोलानी
स्वरचित

विषय=आसरा
वि
धा=हाइकु 
=========
(1)मेरा आसरा
सीमा पर कुर्बान
देश का बेटा 

(2)छीना आसरा
था बुढ़ापे की लाठी
हुआ शहीद 

(3)लेना ही नहीं 
देना सीखें आसरा
श्रेष्ठ संदेश

(4)निर्धन बच्चे
शिक्षा धन आसरा
दे पुण्य कमा

(5)लेना व देना
रिश्तों का फेविकोल 
जड़ आसरा 

(6)कटे जंगल 
भटक रहे पक्षी 
ढूंढ़े आसरा 

===रचनाकार ===
मुकेश भद्रावले
हरदा मध्यप्रदेश 


विधा-हाइकु

1.

अंधेरे मार्ग
दीपक के सहारे
चलता गया
2.
शहीद बोला
एकमात्र सहारा
भारत प्यारा
3.
शहीद हुए
माँ के प्यारे लाडले
छूटा आसरा
4.
आँखों के तारे
भारत माँ के प्यारे
वीर हमारे
5.
हाथ लकुटि
दुर्बल का सहारा
डर भगाए
6.
आटा व दाल
निर्धन का सहारा
वक्त की रोटी
7.
बना सहारा
वृद्धावस्था पेंशन
वृद्ध लोगों का
8.
आँखों का तारा
पिता का इकलौता
बना सहारा
9.
हर देश का
जवान ही आसरा
सच्चा सेवक
10.
बिन आसरा
जीवन है नीरस
सब शून्य है

11.

बन आसरा
अनाथ बालक का
पालो जीवन

12.

पुलवामा में
बेटा हुआ शहीद
खोया आसरा

**********

स्वरचित

अशोक कुमार ढोरिया

मुबारिकपुर(झज्जर)

हरियाणा

हाइकु 
विषय:-"आसरा" 
(1)
मन्नती बेटा 
माँ-पिता वृद्धाश्रम 
"आसरा" झूठा 
(2)
मन है मरा 
जग स्वार्थ पसरा 
ईश "आसरा" 
(3)
देश भी जागे 
भारत माँ "आसरे" 
शहीद सोये 
(4)
धरतीपुत्र 
मौसम के "आसरे" 
मेघ निहारे 
(5)
कांच से रिश्ते 
नफरतों की आँधी 
टूटे "आसरे"

स्वरचित 
ऋतुराज दवे

शब्द है : आसरा

साथी हाथ बढ़ाना ...!
साथी एक रुपैया बढ़ाना ...!!

एक रुपैया से कुछ फर्क नहीं पड़ेगा तुम्हें यार 
संवर जाएगा हमारे वीर सपूतों का परिवार ।

परस्त नहीं हुआ है हमारे वर्तमान सरकार 
थका नहीं है राज दरबार दिल्ली दरबार ।

कोई है ... हमेशा ...सुरक्षा के लिए तैयार 
हम हैं ...हमेशा वीर जवानों के लिए तैयार ।

साथी हाथ बढ़ाना ... !
साथी एक रुपैया बढ़ाना ...!!

नेक मशवरा दिया है सितारे अक्षय कुमार 
मान लिया है हमारे वर्तमान मोदी सरकार ।

कानून में मंजूरी बिल में मंजूरी को तैयार 
खोल दिया है बैंकों में खाता और द्वार ।

इन्हीं रुपयों से जीवन बीमा संपूर्ण परिवार 
सुरक्षाकर्मी को आधुनिक सुरक्षा और हथियार ।

तू ही एक आसरा है देश के कर्णधार 
तुझसे देश सुरक्षित तू देश का आधार ।

एक का सिक्का बनेगा कई करोड़ हजार 
सभी देश वासियों हो जाओ तैयार ....।

अब महा संग्राम होगा महा रण आर पार 
कह दो उन गद्दारों से मक्कारों से हम हैं तैयार ।

साथी हाथ बढ़ाना ... !
साथी एक रुपैया बढ़ाना ...!!

स्वरचित एवं मौलिक 
मनोज शाह मानस 
सुदर्शन पार्क 
मोती नगर नई दिल्ली

माँ भारती देती आवाज, 
बढ़ें कदम ना कोई रोके।

आज शिरायें फटने को है,
लहू के उबलते ज्वालों से।
धधक रही है हृदय में चिता, 
वतन पर शहीद जवानों के 

रक्तरंजित हुई है वसुधा, 
दुश्मन के खालों सेपोंछे। 

जागो वतन, वीर सपूतों, 
आतंकियों को मार गिराओ।
लहू के हर बूँद का बदला, 
अरियों का रक्त सरि बहाओ।

जब तक न हो प्रतिशोध 
पूरा, 
विधवाएं न सिंदूर पोछे।

आस्तीन में सांप जो पलते,
वक्त आया है फन कुचल दो।
देश में बसे जयचंदों को,
पकड़ गर्दन समूल मसल दो।

निर्बल है भारत के बेटे, 
कोई कायर ये ना सोंचे।

नहीं मनाना कोई उत्सव,
एक राष्ट्र पर्व मनाना तब।
जब दुश्मनों की चिता जलेगी,
शान्ति गीत मिलकर गाना सब।

हर झोली में आज वेदना 
कोई कैसे आँसू पोछे।

स्वरचित 
सुधा शर्मा 

राजिम छत्तीसगढ़

1⃣
है प्रलय का आगाज
या प्रकृति का क्रौध है
गरजती हुई दामिनी
बादलों का रोद्र रुप है
गरज-गरज बरस-बरस
तांडव है मचा हुआ
जलमग्न होता शहर
पहाड़ गिर बिखर गया
बह गया घर-द्वार
सामान सब बह गया
छिन गया आसरा
इंसान फिरे दरबदर
यह प्रलय का आगाज नहीं
प्रकृति का क्रौध है
2⃣
आज कलम उदास है
शब्द नहीं कुछ पास है
पुलवामा के हादसे से
है बड़ा मन व्यथित
घूमते हैं दृश्य वही
आँखो में बार-बार
पिता है बेबस खड़ा
माता की करुण पुकार
पत्नियों का मिटा श्रृंगार
बच्चों से छूटा साथ
हर तरफ मचा रुदन
हर किसी की आँखें नम है
आज बड़े ही दर्द में
पुरा हिंदुस्तान है
जिनके आसरे हम अपने घरों में
महफूज़ थे
उन वीरों की शहादत से
बड़ा न कोई ग़म है 
🙏नमन 🙏
***अनुराधा चौहान***© स्वरचित 
हाइकु
1
खोखले रिश्ते
रुपये से तुलते
झूठा आसरा।।

2
दुर्गंध मार
झोपड़ी में आसरा
महकी शिक्षा।।

3
कमल मन
गहराई आसरा
पवित्र तन।।

4
स्वयं से हारा
परिजन सहारा
धैर्य की खान।।

5
खुले विचार
तकनीकी सहारा
प्रबुद्ध राष्ट्र।।

वीणा शर्मा वशिष्ठ
" आसरा"
किसका है आसरा तुझे,
किसका इंतजार है,
सब कुछ मिलेगा तुझको,
अवसरों की भरमार है,
नाव तूफानों से निकाल,
बाजूओं में तेरे पतवार है,
ना ढूँढ़ आसरा किसी का,
हौंसलें तेरे दमदार हैं,
आत्मविश्वास बनाए रखना,
यह सारे ग्रंथों का सार है,
फिर तू क्यों इतना सोचता है,
क्यों तू इतना बेजार है।
टूट गए जो रिश्ते यहाँ,
भरनी उनकी दरार है,
अधूरे हैं जो सपने,
करने सब साकार हैं।
*****
स्वरचित-रेखा रविदत्त
18/2/19
सोमवार
विषय -आसरा 


छिना आसरा 
पथराये नयन 
आत्मा वतन 


कपटी पूत 
प्रभु तेरा आसरा 
छूटा बसेरा 


लुटा बसंत 
छिन्न-भिन्न आसरा 
जला पराग 


विषैली हवा 
देश वीर आसरे 
रूख दो मोड़ 


मृदुल मिट्टी 
प्रभु तेरे आसरे 
घट क्यों फूटे 

(स्वरचित )सुलोचना सिंह 
भिलाई
विषय-आसरा

आसरा जब छूटता है,
पहाड़ दुख का टूटता है।
फिरते हैं दर-बदर बेचारे
रब जब किसी से रूठता है।

आसरा ही है जीवन-आधार
बिन आसरे बुजुर्ग लाचार।
भटकते फिरते राहों में,
सहते फिरते अपनों की मार।

दर-दर ठोकर खाए अनाथ,
कोई भी बन जाता है नाथ।
मंगवाते भीख जब उनसे,
मजूरी कराते हैं दिन-रात।

आसरा हर व्यक्ति चाहे,
सफल जीवन तभी पाए। 
प्यार का आसरा मिले गर,
असंभव कर्म वह कर जाए।

आसरा सबको प्यारा है,
इसने जीवन संवारा है।
जिन्हें मिलता नहीं है ये,
वही हालात का मारा है।

अभिलाषा चौहान

स्वरचित


घाव अभी भी ताज़े हैं
रिस रहा है ख़ून
दर्द भरी छटपटाहट
इधर उधर बिखरे गात
केवल मात्र अवशेष
रक्त रंजित सड़क
कौन भूल सकता है!!!!
आतंकवाद का वह
घिनौना वीभत्स रूप
माँ भारती के लाल
शहादत पाकर शहीद
अमर ज्योति जला गये
अपने देशप्रेम का विशुद्ध
रूप हमें दिखा गए
मगर.....
अपने पीछे अपना शोक संतप्त
हँसता खेलता परिवार छोड़ गए
आज......
किसी की बूढ़ी माँ
कोई ग़मगीन पिता
किसी भाई का स्नेह
बहन का रक्षाकवच धागा
किसी का ताज शृंगार
कोई मासूम बचपन
खिलौनो को तरस रहा
बड़ा दारूण दुःख
अब वे ना आएँगे
परिजनों को सांत्वना ना दे पाएँगे !
क्या हम टी०वी० अख़बारों में
शोक संवेदना जताते रहेंगे ?????
क्या बेसहारा, शोक संतप्त परिवारों की सहायतार्थ आगे आएँगे?????
आज हमारा एक कर्तव्य होना चाहिए
उन परिवारों का संबल बनें
अपने अपने स्तर पर
तन , मन, धन से 
उनको सहारा बने
आसरा बनकर जवानों को
सच्ची श्र्द्धांजलि दें
यह आसरा यक़ीनन
देशप्रेम का ही एक 
मानित हिस्सा होगा
हमारे जीवन का
एक गरवीला क़िस्सा होगा ।

संतोष कुमारी’ संप्रीति’
स्वरचित

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