Monday, February 25

" स्वतंत्र लेखन "24फरवरी 2019

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विधा-"प्रियवर के प्रेम में प्रवाह शब्द क्रम "
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प्रेम ने नाम तेरा पुकारा तुझसे नाता है कोई हमारा ।
मेरे होंठों पै लय बद्ध होकर बह रही है तेरी प्रेम धारा ।।
इस ज़माने को इतना बतादूँअब न राहों में काँटे बिछाए ।
मेरे सपनों का क्रम टूटता है ज़ख़्म देकर न मुझको सताए ।
जिसने वातावरण ढँक लिया है मिट रहा है घृणा का अँधेरा ।
फिर नया प्रात पैदा करेंगे प्रेम लाएगा फिर से उजेरा ।
मेरी लोगों ये इल्तिजा है ज़हर घोले न फिर से दुबारा ।।१।।
कब मिटाए मिटी प्यास मन की कब बुझाए बुझी लौ हृदय की ।
जिससे सारा बदन जल रहा है आग होती है ऐसी प्रणय की ।
तेरी यादें सिसकने लगीं हैं दिल को छलने लगीं हैं दिशाएं ।
शोक गीतों को दिल पढ़ रहा है हो रहीं हैं विकल भावनाएं।
चाँदनी को तपन ग्रस रही है चाँद लगने लगा है शरारा।।२।।
तुम को डर था ज़माने का इतना मीत!क्यूँ मन के वासी बने थे ।
चाहते तुम किसी को बनाते और भी लोग तो सामने थे ।
दूर हो तुम मगर पास हो तुम मेरे मन को व्यथित कर रहे हो ।
मैं सहारा तुम्हारा बनूँगा फिर ज़माने से क्यूँ डर रहे हो ।
क्यूँ मिलन से विरह जोड़ते हो क्यूँ छुरा बेधते हो दुधारा ।।३।।




स्वरचित- राम सेवक दौनेरिया "अ़क्स "

स्वतंत्र लेखन—आ !अज़नबी बन मुलाक़ात करते हैं 
——————————————————
ऐ जिंदगी ! आ अजनबी बन मुलाक़ात करते हैं,
फिर एक नये सिरे,नये तौर से शुरुआत करते हैं।

एक दूसरे की आँखों में अपना अक्स टटोलते हैं,
हाथ मिलाकर आपस में कोई नई बात करते हैं।

गुज़री हमपर इस दरमियाँ वो सुनना इत्मिनान से,
जो गुजर रही तुमपर आशना वो हालात करते हैं।

इक उम्र गुजर गई मसले-मसाइल सुलझाते हुए,
अब कुछ पुरसुखून होकर बयान जज़्बात करते हैं।

न तुम्हें हो गिला कोई, न हमें कोई शिकायत रहे,
चंद लमहों के लिए ही सही ऐसी औक़ात करते हैं

अब नामुमकिन लगता है तनहा सफर तय करना,
बाक़ी जो सफर है चलो वो साथ-साथ करते हैं।

आज हम मिले हैं शायद कल फिर मिलना हो न हो,
इन लम्हों को मुक़म्मल जीने की वज़ुआत करते हैं।

सुना है, है और भी इक जहाँ, इस जहाँ से दूर कहीं 
मजीद ग़म न मिले चलो ख़ुशियों को तैनात करते हैं।
(C) भार्गवी रविन्द्र २८ जून २०१८....
स्वरचित .....मेलबर्न :आस्ट्रेलिया 
आशना- पहचान , पुरसुखन - चैन से , मुक़म्मल - पूरी तरह से 
वज़ुआत - वज़ह , मज़ीद - और (ज़्यादा )

(1)उम्र सारथी
मंजिल तक जाती
जीवन गाड़ी

(2)बर्फ सी यादें
पिघलती ही जाती
उम्र जो बड़ी

(3) कर्म की गाड़ी
मानव है चालक
मंजिल पाती

(4) विश्वास नाव
हिम्मत पतवार
लगाती पार

(5)मनु ही लिखे
कर्मों की स्याही से
भाग्य अपना

मुकेश भद्रावले
हरदा मध्यप्रदेश 

मैं सोचता ही रहा जिन्दगी बीत गई
लगता है व्यर्थ ही हमारी प्रीत गई ।।

खुशियों से भरी लगी थी यह जिन्दगी
पता भी नही चला कब यह रीत गई ।।

हम देखते रहे वो देखते रहे ''शिवम"
लब सिले संगदिल किस्मत जीत गई ।।

कब चला जोर यहाँ वक्त पर किसी का
बसंत गया हेमंत गया गर्मी औ शीत गई ।।

मेरे दिल में अभी भी वह समाये हैं
इस दिल से अभी भी न वह टीस गई ।।
हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"


कलमकार हैं दिशा बताते
नित नित नव मार्ग बनाते
खुद रोते हैं मन ही मन में
सबको मधुरम गान सुनाते
सद्साहित्य नित लिखते हैं
ज्योति किरण जग को देते 
सत्यमेव सुंदरतम पथ है
हर नर नारी से नित कहते
कवि धर्म जग सद धर्म है
भर्म तोड़ते हम जीवन का
परमपिता से बड़ा न कोई
चयन करो मार्ग भक्ति का
आना जाना जग जीवन है
अब आये तो कुछ तो करलो
पीड़ित असहाय निर्बल को
परहित मान उसे हिय भरलो
जो चलता मंजिल मिलती
कर्महीन जीवन भर रोता
कायरता और आलस्य में
वह् जीवन सब कुछ खोता
एक पिता की सब संताने
सबकुछ छोड़ यँहा से जाते
तेरा मेरा जीवन झूठा सब
पुण्य कमाओ सब कुछ पाते
सब सुखी हो सभी खुशमय
द्वेष ईर्ष्या फिर क्यों पालते
पावन धरा को स्वर्ग बनालो
क्यों अमृत में जहर डालते?
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।


खुशी मिलती गम मिलते है,
सबसे हंसकर हम मिल ते है।।१।।
मेरी आदत है कुछ ऐसी,
ग़म में भी बस हम हंसते हैं।।२।।
अंधेरों से नहीं हारे हम,
उजाले की तरफ चल ते है।।३।।
दुख जाता सुख भी आता है,
मौसम के थपेड़े सह ते है।।४।।
अंधेरों की तो आदत है,
सूरज की तरफ बढ़ते हैं।।५।।
खुश रहता ऐ दुनिया वालों,
हम दिनकर सा अब ढलते हैं।।६।।
स्वरचित देवेन्द्र नारायण दास बसना छ,ग,।।।


अहम वहम से दूर रहूं और 
प्रभु प्रेमालय में रहूँ सदा।
रहूँ वासनाओं से बंचित मैं,
नहीं कलुषालय में रहूँ कदा।

विकार कभी मन में ना आऐं,
अपने इष्ट का भजन करूँ।
संम्पूर्ण विश्व का सुखद चाहूं
यही सदा ईश से विनय करूँ।

कभी हरि भूलूँ न जग भूलूँ,
कमल समान में प्रभु रहूँ।
जग के कीचड में रहकर भी,
प्रभु गंगाजल सा बना रहूँ।

ऊंच नीच कभी नहीं मानूं मैं,
सबजन का उपयोगी होऊँ।
परोपकार परमार्थ करूं कुछ,
यथा योग्य सहयोगी होऊँ।

स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

 घनाक्षरी छन्द 
वर्णिक छन्द 31 वर्ण 
8,8,8,7

****
दिव्य कुम्भ ,भव्य कुम्भ 
चलो कुम्भ चले 
*****

बुलाते प्रयागराज, छोड़ सब काम काज
करिये नहान आज, कुम्भ मे पधारिये ।

भीड़ देश विदेश की ,अखाड़े साधु संत के
कामना अब मोक्ष की ,दिव्य कुम्भ आइये।।

पावन त्रिवेणी बहे, मन का संताप हरे
चूड़ी टिकुली मोल के ,मेला घूम आइये ।

अद्भुत छटा निराली ,करो नाव की सवारी
संगम मे स्नान कर ,गंगाजल लाइये ।

ये पर्व भक्ति भाव का,वैराग्य और ज्ञान का
अध्यातम के कुंभ मे ,जीवन सवाँरिये ।
***

अनिता सुधीर

हम लगा कर दिल अभी तक रो रहे
ख्वाहिशें क्यों अब किसी से कीजिए।😊

हर तरफ खुदगर्जियों का दौर है
भांप इनको दूर खुद से कीजिए।😊

टूट कर बिखरी मुहब्बत कांच की
आह मेरी यूँ फना मत कीजिए।😊

दिल सनम पत्थर कहीं है बन गया
मखमली चादर किनारा कीजिए।😊

आशियाना है कहीं हिलता लगा
सँग देकर फिर हिफाज़त कीजिए।😊

वीणा शर्मा वशिष्ठ
स्वरचित मौलिक


गजल प्रयास 
रदीफ़. को जी करता है 
काफिया. ए 
बेबहः 
आज फिर मुस्कुराने को जी करता है, 
आज फिर बच्ची बन जाने को जी करता है, 
मिलेगी जन्नत मुझे तेरी ही बाँहों में, 
आज तुझे आलिंगन करने को जी करता है l

इस इश्क की शायद कोई मंजिल नहीं, 
बस दिल में उतर जाने को जी करता है l

तू जब भी सामने आता है मेरे, 
तुझसे दूर जाने को जी करता है l

गर दूर हो जाये मेरी नज़र से, 
तेरे करीब आने काे जी करता है l

मालूम है तेरे इश्क में फ़ना होना, 
पर तुझ पर फ़ना होने को जी करता है l

समझ से बाहर है ये इश्क "उत्साही "
पर तुझमे समाने को जी करता है l
कुसुम पंत "उत्साही "
स्वरचित 
देहरादून

सोच रहा हूँ कलम को एक मुकाम दूँ...
लिखकर मोहब्बत सबको एक पैगाम दूँ..

सितारों से सजाऊं दामन प्रियतमा का..
चूमकर माथा उसका चाँद का नाम दूँ..

वार दूँ मेरी हर खुशी इस मोहब्बत पर..
तोहफा इजहार ए इश्क का सरेआम दूँ..

प्रीत की धार बरसाकर मन पर उसके..
कुछ इस तरह मोहब्बत को अंजाम दूँ..

थामकर हाथ उसका यूँ जी लूँ सँग सँग..
दीये की हो बाती ऐसा उसको नाम दूँ...

स्वरचित :- मुकेश राठौड़


**साजन आया फागुन**
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साजन आया फागुन, ला दे लाल पीली चुड़ियाँ।
मँगा दे धानी चुनर, मिटा दे फिर दिल की दूरियाँ।।
*****************************************
साजन आए जब - जब फागुन के महीना।
अनेक रंग देख बज उठे मन की वीणा।।
देख चारों ओर मगन बहे पछुआ ब्यार।
तब याद आए साजन तेरा प्रीत प्यार।।
जिया ललचे हर बार सुनती रहूँ तेरी मीठी बोलियाँ।
साजन आया फागुन, ला दे लाल पीली चुड़ियाँ।।
******************************************
साजन आया फागुन, ला दे लाल पीली चुड़ियाँ।
मँगा दे धानी चुनर, मिटा दे फिर दिल की दूरियाँ।।
******************************************
ढोलक थाप पर नाचे हर ओर नर - नार।
मस्त बसंत चारों ओर दिखे बार - बार।।
देख साजन खिले- खिले हैं सबके तन-मन।
सुख-दुख भूल जिंदगी जिए हैं मस्त मगन।।
खिला दे सजना मुझे भी अपने प्रेम की गोलियाँ।
साजन आया फागुन, ला दे लाल पीली चुड़ियाँ।
******************************************
साजन आया फागुन, ला दे लाल पीली चुड़ियाँ।
मँगा दे धानी चुनर, मिटा दे फिर दिल की दूरियाँ।।
******************************************
कितने सजे हैं सब रंगीन परिधान में।
फूलों पर मँडराए भँवरा रसपान में।।
मेरे मन भाए तितली की अठखेलियाँ।
सुंदर लुभावन है प्रिये तेरी शोखियाँ।।
सजा दे मेरी माँग, डालो फिर मुझे गले बहियाँ।।
साजन आया फागुन, ला दे लाल पीली चुड़ियाँ।
*******************************************
साजन आया फागुन, ला दे लाल पीली चुड़ियाँ।
मँगा दे धानी चुनर, मिटा दे फिर दिल की दूरियाँ।।
*******************************************
-- रेणु रंजन
( स्वरचित )

#यादों के झरोखे#

रिश्तों की महिमा....
परिवार की गरिमा...
कर्तव्यों का निर्वहन
सांसारिक व्यस्तता..
निभाती रही........

आज अनायास ये मन..
यादों के पन्ने पलटता रहा
कुछ क्षण तो लगा जैसे..
रुक सा गया है पल..
थम सी गई है जिंदगी

प्यारा सा एहसास था
सुना रही दास्तां थी
फूलों सी खुशबू थी
होठों पे खिलीं मुस्कान थी

बहुत कुछ कह रहा....
बीता हुआ मेरा कल

सपने बुने थे जो तूने
क्या खोया....क्या पाया
हाथों में जो कुछ है आया
आजतक मैंनें नहीं गुना.

उधेड़बुन में मैं....
मूक ........नि:शब्द...

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

सुनसान वादियां
*************

ये वादियाँ,
ये लहराते दरख्त,
नीले आसमां तले,
नीली आभा में ढले,
दिखते हैं मायूस,
बिखरी नीम खामोशी,
बनती है गवाह हर पल की।

ये शांत सुरम्य वातावरण,
प्रकृति का अनंत सौंदर्य,
अनिर्वचनीय, अद्वितीय,
बन गया पनाहगार,
निर्मम आतंक का।

ये सूने मकान,
ये दरोदीवार,
जीवनोल्लास से रहित,
भय से ग्रसित,
ये जन्नत !!
बन गई कैद खाना,
दुबके घरों में लोग,
हताश व निराश।

छिन गई जीवन की सरलता,
हर और दिखती विकलता,
प्रकृति में भी नहीं सहजता,
जीवन में आ गई दुरूहता।।
चढ़ गयी आतंक की भेंट प्रसन्नता।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित, मौलिक

हर आदमी को बस तलाश कुछ नये की है ,
परवाह किसी की नहीं अपने भले की है |

लड़ते भाई भाई बात कुछ अधिक की है , 
रह गयी नहीं अहमियत अब कुछ कहे की है |

जरूरत रह गयी नहीं अब माँ बाप की है ,
पहचान कुछ रही नहीं उनके करे की है | 

परम्परा भुला दी सबने दोस्ती की है ,
आदत रह नहीं गयी हमें निभाने की है |

किताब बंद कर दी अपने रिवाजों की है ,
अब तो लग चुकी है लत नकल करने की है | 

चाहत सभी को बस नसीहत देने की है ,
कोई आरजू नहीं आगे आने की है |

करता है वक्त माँग नई रोशनी की है , 
लगती जरूरत नव जागरण करने की है |

स्वरचित , मीना शर्मा , मध्यप्रदेश

**********************
🍁
लगा दिया दिल के दरवाजे, 
पर मैने इक ताला ।
बन्द झँरोखो को कर मैने,
कुण्डी भी दे डाला ।
🍁
बहुत रूलाते है मुझको ये,
दिल मे आने वाले।
आ करके वो जाते है और,
फिर ना आने वाले।
🍁
कुछ दिन के मेहमा बनके जो,
दिल मे जगह बनाते है।
फिर जब वो जाते है तो,
वापस ही ना आते है ।
🍁
सुप्त भाव भडका करके वो,
हृदय तोड कर जाते है।
पुनः नही आते है वो पर,
हृदय रोग दे जाते है ।
🍁
लगा लिया है इसी लिए,
दिल के द्वारे पर ताला।
कोई भी दस्तक दे पर ये,
ना है खुलने वाला।
🍁
शेर के कोमल चंचल मन को,
बाँध के इसमे डाला।
बन्द झँरोखे और खिडकी कर,
लगा दिया है ताला।
🍁
स्वरचित ... Sher Singh Sarraf
सांझ ढलने लगी
चाँद मुस्कुराने लगा
चाँदनी भी हंँस कर
आँगन में गई उतर
ऐ रात जरा ठहर के चल
अभी तो बाकी है प्रहर
थोड़ी देर रुक सही
जरा दिल को करार आने दे
तारों को जगमगाने दे
जाग उठे सुखद अहसास
चली फागुनी बयार
तन-मन में मची सिहरन
ऐ बहार थोड़ा रुक जरा
अभी बसंत गया नहीं
प्रिय को पास आने दे
जरा दिल को करार आने दे
बिखरने लगे ओस के मोती 
यहाँ फूलों पर निखर-निखर
ऐ अंधेरे मुझे यूँ न सता
थोड़ी देर तो जरा ठहर
चिराग प्रेम के जलने दे
जरा दिल को करार आने दे
***अनुराधा चौहान***©स्वरचित

तर्ज- सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

तुम कहो तो हम विरह के गीत गाना छोड़ दें

मुसकुराना छोड़ दें या ये जमाना छोड़ दें।

इक नए रिश्ते की खातिर वो पुराना तोड़कर
राह दोनों ने बदल ली हाथ अपने जोड़कर
ना गिला शिकवा कोई औ ना कोई थी सिसकियां
दोनों के दिल में बचीं जो वो थी बस बेचैनियां 
तुम कहो बेचैनी के किस्से सुनाना छोड़ दें
मुसकुराना छोड़ दें या ये जमाना छोड़ दें

इक ज़रा सी रश्म ने हमको जुदा यूं कर दिया
चाह कर भी मिल न पाएं फैसला यूं कर दिया
उसकी गलियों से जो गुजरूं वो ही वो दिखता हमें
सोचती हूं क्या अभी तक याद वो करता हमें
जो कहे गलियों से उसकी आना जाना छोड़ दें
मुसकुराना छोड़ दें या ये जमाना छोड़ दें

सामने इक दूसरे के वक्त ने यूं ला दिया
बाद वर्षों के लगा कोई मसीहा आ गया
खुश तो हम दोनों ही थे खुशियों के पर रँग अलग थे
सूरतें तो थी वही पर मिलन के ढँग अलग थे

तुम कहो तो आज हम नजरें मिलाना छोड़ दें
मुसकुराना छोड़ दें या ये जमाना छोड़ दें।

इति शिवहरे

गजल

बड़े नाजुक हो गए रिश्ते, हर रिश्तों में दरार है,
जताते तो सभी हैं पर होता दिखावे का प्यार है,

झूठी ढींगे हांक-हांक कर हड़प लेते हैं कुर्सी
देश की खातिर जरा देखो ये कितने वफादार हैं

कुछ समय तो बिताया करो बूढ़े माँ - बाप संग
फेसबुकिये रिश्ते सारे के सारे होते निराधार हैं,

कितनी शिद्दत से पालते हैं अपनी औलाद को
बेटे बहू के आगे देखो माँ-बाप भी लाचार है,

ना कृष्ण-सुदामा सी दोस्ती ना लखन सा भाई
स्वार्थ सिद्धि की खातिर बढ़ाते हाथ हजार है,

मत कर बर्बाद जीवन मोह माया के चक्कर में
झूठी सारी माया हैं और झूठा ये संसार हैं,

स्वरचित
बलबीर सिंह वर्मा
रिसालियाखेड़ा सिरसा (हरियाणा)


हे प्रभु ! मुझको ऐसा वर दे |
सारे जग का तू मय हर दे ||

कहते मानव उत्थान हुआ है ,
उन्नति कर आकाश छुआ है ,
बिगड़ गया सब जगह सन्तुलन ,
जागरूकता नर में भर दे |
हे प्रभु ! ..... .... .....

बेटा - बेटी भेद किये हैं ,
भ्रूण गर्भ में मार दिये हैं ,
जन्मी संग हैवान बना फिर ,
क्या होगा भू का तम हर दे |
हे प्रभु ! ..... ...... ....

रक्षक ही तक्षक बन बैठे ,
धन खाते लम्बोदर बैठे ,
हुआ विलुप्त न्याय इस जग से ,
अन्यायी के उर भय भर दे |
हे प्रभु ! ..... ..... .....

भ्रात प्रेम दिख रहा नहीं अब ,
मात-पिता की दशा करें सब ,
बोल अमोल भाव भी बदले ,
''माधव'' खून खेल कम करदे |
हे प्रभु ! ..... ..... .....

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#स्वरचित
#सन्तोष_कुमार_प्रजापति_माधव ( #शिक्षक )
#सुभाष_नगर_कबरई_जि_महोबा_उ_प्र

विधा-हाइकु

1.
सही परीक्षा
नकल रहित हो
जाँच बुद्धि की
2.
शिवालय में
शिव शंकर आए
रौनक बढ़ी
3.
कहाँ खड़ी हो
फोन पर बताओ
इंतज़ार में
4.
भावों के मोती
उपजते मन में
अच्छे विचार
5.
फौजी का मन
ये अपना वतन
प्यारा होता है
....….….
स्वरचित
अशोक कुमार ढोरिया
मुबारिकपुर(झज्जर)
हरियाणा

लघु कविता 
लोकतंत्र अजीब, बडा़ दीवाना लगता हैं, 
हर पार्टी का हाल बुरा , बचकाना लगता हैं।
बेरोजगार गुहार लगाते उम्र बीत जाती हैं, 
सरकार बनाती पार्टियां , ईमान बेच आती हैं।
भीड़त़ंत्र का एक मंत्र, गुटबाजी दल-दल, 
वादे करते बडे़-बड़े पर काम के लिए कल ।
चुनाव प्रचार में आरोप-प्रत्यारोप लगाते हैं, 
फूट डाल जाति-पाँती में अपना प्यार जताते हैं ।
साम, दाम, दंड और भेद सभी अपनाते हैं, 
चुपके-चुपके चमचों के बल वोट बिकवाते हैं।
जीत गये जंग चुनाव की तो फिर चांदी ही चांदी हैं, 
हर तरफ पांव पसारते , जनता की बर्बादी हैं।
गयी पाँच साल की वो नजर नहीं मिलाते हैं , 
हड़ताल -बंद पर भी पशुता - सा व्यवहार 
करवाते हैं।


शीर्षक "जीवन जल का बुदबुदा" 

किस का गुमान कौन सा अभिमान 
माटी में मिल जानी माटी की ये शान।

भूल भुलैया में भटका
खुद के गर्व में तूं अटका
कितने आये कितने चले गये मेहमान
माटी में मिल जानी माटी की ये शान। 

एक पल के किस्से में
तेरे मेरे के हिस्से में
जीवन के कोरे पल अनजान
माटी में मिल जानी माटी की ये शान।

ना फूल झुठी बड़ाई में
ना पड़ निरर्थक लडाई में
सब काल चक्र का फेरा है नादान
माटी में मिल जानी माटी की ये शान। 

तूं धरा का तुछ कण है
आया अकेला जाना क्षण में
समझ ले ये सार मन में कर सज्ञान 
माटी में मिल जानी माटी की ये शान। 

किसका गुमान...
स्वरचित 

कुसुम कोठारी ।

आरक्षण की आड में फूट डालते जाते हैं, 
Kusum Kothari 
मुद्दा कोई एक अटकाते बहाने बनाते जाते हैं।
मानो तो गरीब की कोई जाति-पांती नहीं होती , 
उच्च जाति में भी लाखों गरीब जिनके रोटी नहीं होती ।
प्रजातंत्र जनता का , जनता के लिए तथा जनता द्वारा हैं , 
लेकिन दुख नेता का , नेता के लिए और नेता द्वारा हैं।
गरीब का लड़का चुनाव में खडा़ नहीं हो सकता हैं , 
शैक्षणिक योग्यता का उपयोग नहीं कर सकता हैं।
अनपढ़ -पढे़ लिखे वोट सभी एक गिनती में आते हैं , 
मंत्री पद की शपथ नहीं ले सके , अफसर भी लजाते हैं ।
धनहीन दल सच्चा होतो भी दबता जाता हैं, 
सम्पत्ति की ठगी से वह दल जीतता जाता हैं।
जहाँ देश रक्षक सैना को पत्थर मारे जाते हैं, 
धिक्कार हैं ऐसे कानूनों को निर्दोश मारे जाते हैं ।
गाँधी जी के सत्य -अहिंसा मंत्र अभी भी जिंदा हैं , 
हत्या -बलात्कार और युवतियों के गले क्यों फँदा हैं ? 
संविधान ने जो हक महिलाओं को दिया हैं ।
उसको क्या राजनीतिक दलों ने उनको दिया हैं ? 
संसार में लोकतंत्र -नाम परिचय दिया जाता हैं , 
भीड़तंत्र में आतंकियों क्यों माफ किया जाता हैं ? 
स्वरचित -चन्द्र प्रकाश शर्मा 
'निश्छल',

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"कांच /शीशा ""10अक्टुबर 2019

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