Monday, February 25

" तकदीर/भाग्य "25फरवरी 2019

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             ब्लॉग संख्या :-310
लघु कविता 
राह देखता रहा उम्र भर तकदीर की, 
डगर चुनता रहा नित्य नयी राहगीर सी।
हर सुबह आस जगी , कली अब खिलेगी , 
अब तो निश्चित ही मेरी किस्मत चमकेगी।
हमेशा ही मुझसे भाग्य जैसे रूठता रहा , 
खिलौने सा मेरा नाजुक दिल टूटता रहा ।
बार-बार मुंह की खाई मेरी झूठी तकदीर ने, 
जब होश ने जोश बढा़या खुद की तस्वीर से ।
बैठे हाथ पर हाथ धरना तकदीर नहीं होती , 
सोने को न तपाया जाए उसमें दमक नही होती ।
किस्मत को आजमाते रहो मंजिल नहीं मिलती , 
मेंहदी न पीसोगे तो वह कभी श्रृंगार नहीं बनती ।
पहाड़ के नीचे खडे घबराने से फतह नहीं होती , 
बादल को फटना पडता हैं वरन बरसात नहीं होती ।
सफलता हासिल करनी पडती हैं मुफ्त नहीं मिलती ।
भाग्य, तकदीर और किस्मत जपते बहुतेरे मर गये , 
लकिरों को मिटाया हाथों की वो सिकन्दर बन गये ।
स्वरचित -चन्द्र प्रकाश शर्मा 
'निश्छल',
हाथों पर पड़ी रेखायें, 
माथे पर खींची लकीर, 
साधारण भाषा में जिसे, 
हम सब कहते हैं तकदीर |

तकदीर के खेल बड़े अजब होते हैं, 
तभी यहाँ कुछ हँसते कुछ रोते हैं, 
प्रभु की बनाई अजब ये माया है, 
कोई भी इसे कहाँ समझ पाया है |

जिन्दगी में सुख, दु:ख अाने जाने हैं, 
तकदीर तो एक तसल्ली होती है, 
जो हौंसलों को बुलंद रखती है, 
उम्मीदों का दामन थामें रखती है |

तकदीर के भरोसे न बैठे आप, 
परिश्रम का न छोड़े कभी साथ,
मन में भरना होगा आत्मविश्वास, 
मिलेगी निराशा में भी इक आश |

स्वरचित *संगीता कुकरेती*

दर्द के अफसाने हैं सबके पास 
एक हम ही नही क्यों हों उदास ।।

तकदीर भी क्या शय बनाई है
बरसात में भी पपीहे की प्यास ।।

सजीला मोर भी आँसू बहाये यहाँ
जब नजर पडे़ पैरों के आसपास ।।

तकदीर कब हंसाये कब रूलाये 
तकदीर को सब आम कोई न खास ।।

प्रभु राम की क्या तकदीर कहायी
तिलक की तैयारी थी हुये वनवास ।।

तकदीर से डरो नही , करो सुकर्म 
जारी रखो सुकूने पलों की तलाश ।।

कश्मकश खत्म नही होने देती ये 
पल पल बदलती 'शिवम' लिबास ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 25/02/2019

हाय किस्मत तेरे पहलू मे बंधा क्या है।
जिये जाता हूँ बेखबर तो मजा क्या है। 


हरेक शख्स ने पूछा मेरे महबूब का नाम।
जिसने बनायी है दुनिया वो भला क्या है।

होके चाहत में दफन देखा नहीं कुछ भी़।
क्या थी बहारे चमन और फज़ा क्या है।

तुम झुकाए खड़े हो क्यों अपने सर को।
माफ तो कर दूँ तुम्हें मगर खता क्या है। 

जब उठाता हूं सर तो कर देते हैं कलम। 
अब वही जाने जालिम की रज़ा क्या है।

विपिन सोहल
तकदीर का लिखा कहा बदलता है
भाग्य का लिखा ही पीछा करता है

दूर से देख सपन कदम पीछा करता है
बंद आँखों मे जब ख्वाब पलता है

नजर आती है दूर से मंजिल साहब
खुली आँखों में वो जब मचलता है

राह लम्बी हो तो क्या गम ऐ हमदम
इरादे ठान दिल में तो भाग्य चलता है

ठूंठ कर राह ऐ मुसाफिर चलना है
तुझे खुद अपनी मंजिल तलाश करना है

तकदीरें बदल जायेगी मत डगमगाना
इरादा बुलंद करना तू खुद का इतना

स्वरचित

नीलम शर्मा#नीलू
भाग्य कर्म अद्भुत संगम
कोई मावा मिस्री खाता
हँसता गाता और खेलता
अभागा नर कोई न भाता
पूर्व जन्म के संस्कारों से
रंक कभी राजा बन जाता
शहंशाह फकीरी करता है
नर से कोई नारायण बनता
राम लखन वनवास गये थे
सीता खुद वन वन में घूमी
पांडव खाक छानते फिरते
हरदम उनने माटी ही चूमी
मीरा के गिरधर गोपाला
गटक गई विष का प्याला
भक्ति भाव मे तन्मय होकर
पहन गई वह् सर्पो की माला
कर्मप्रधान होते जीवन मे
कर्मशील भाग्य निज लिखते
जैसी करनी वैसी भरनी है
कर्मवीर जग कभी न बिकते 
जीवन देने से पहले ही
कर्ता ने खुद भाग्य लिखा है 
ईमानदार का भाव बड़ा है
कोई कौड़ी भाव बिका है
लगन मेहनत जज्बातों से
जीवन मे लाली आती है
तिमिर हरण पल में होता 
नयी रोशनी जगमगाती है
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम।

🍁
जूझते हर द्वंद से निर्द्वंद होकर जी रहा ।
अपनी दुनिया अपने सपने अपनो मै जी रहा।
🍁
अब भला ये सोचने से वो मिलेगा की नही।
ऐसी बातें त्याग कर मै दिव्य जीवन जी रहा।
🍁
भाग्य मे जो भी लिखा है आयेगा वो सामने।
कर्म को गतिमान कर मै खुद ही खुद पे लिख रहा।
🍁
भाव से कर्मठ रहूँ मै कलम ही हो जीवनी।
शेर की रचना अमिट हो सोच के संग जी रहा।
🍁
तुम कहो की क्या गलत है ये यदि मै सोचता।
अपने सपनो को धरातल दे सकू ये कह रहा।
🍁

स्वरचित ... Sher Singh Sarraf

तकदीर का फसाना , दुनियाँ को क्या सुनाना ,

परिचित सभी हैं इससे , सबका है ये पहचाना |

फूलों के साथ काँटे भी , गुलशन में सबने जाना ,

इनको राह से हटाकर , हमको है गुजर जाना |

जीवन की पाठशाला में , हम सभी को पढ़ना ,

होगीं परीक्षाऐ भी , फिर उनसे है कैसा डरना |

भाग्य के लिखे को , होगा हमको ही है बदलना ,

तकदीर जब सताये तो , हिम्मत से काम लेना |

मुश्किल नहीं है कुछ भी , बात मन में जो ठानना ,

रहेगा उद्देश्य गर भला , होगा उसको भी मानना |

यहाँ सच्चाई के आगे , होता खुदाई को भी झुकना ,

चाहे फिर देर हो भले ही , पर काम नहीं है रुकना |

कर्मों की लेखनी से ही , हमारे भाग्य को है बनना ,

जिंदगी में करना वही है , हो जिसकी हमको चाहना |

स्वरचित , मीना शर्मा , मध्यप्रदेश 


ुदी को बुलंद करो
भाग्य रज़ामंद करो 
बदलो पुरुषार्थ से 
लिखा तक़दीर का ।
पन्ने क़िस्मत के ख़ाली
लिखो मन चाहा आली
मन चाहा रंग दिखे 
खेल तक़दीर का 
संकल्प दृढ़ कीजिए
विकल्प नहीं लीजिए
सफल हो परिश्रम 
बनी तदबीर का ।
लक्ष्य पर हो नज़र 
चलता रहे डगर
टाँका कोई बेड़ी बने 
तोड़िए ज़ंजीर का ।

स्वरचित :-
ऊषा सेठी 
सिरसा १२५०५५ ( हरियाणा )
ग़ज़ल,
बादलों की तरह बढ़ते चल,
सूरज की तरह चढ़ते चल।।१।।
ग़म के फसाने, पढ़ते चल,
मंजिल पे नज़र रखते चल।।२।।
जी वन का पैगाम बहुत है,
जिन्दगी से निंबाह करतें चल।।३।

सुनते रहो लोग जो कहते हैं,
तकदीर अपना खुद लिखते चल।।४।।
बैठे-बैठे सोच रहा,
खुद में खुद को ढूंढ ते चल।।५।।
इस संसार में प्यार ही फले,
रब से "देव""दुआ मां गते चल।।६।।
स्वरचित देवेन्द्र नारायण दास बसना महासमुंद छग।।
=========
(1)सत्य है बात 
रहते सदा साथ 
कर्म व भाग्य 
(2)करते आज
कर्म कर इंसान 
भाग्य निर्माण 
(3)सफल व्यक्ति 
खुद ही बदलते 
भाग्य अपना 
(4)खोल ही देती 
तकदीर का ताला 
कर्म की चाबी 
(5)देते है दोष
कर गलत कार्य 
अपने भाग्य
(6)विधाता कार्य
भिन्न-भिन्न लिखते
सभी के भाग्य 
(7)कर्म के साथ 
होता है मेरा भाग्य 
यही सौभाग्य 
(8)खुली लाटरी
हुआ मैं धनवान 
भाग्य की बात
(9)इंसा या ईश
टाल न पाए कोई 
भाग्य का लिखा 
(10)अच्छा या बुरा
तकदीर में लिखा
माने इंसान 

====रचनाकार ===
मुकेश भद्रावले 
हरदा मध्यप्रदेश 

भाग्य विधाता भगवान हैं
वही बदलते अपनी तस्वीर।
निजधर्म कर्म में रत रहें,
बदलेगी निश्चित ये तकदीर।

भाग्य वलवान उन्हीं का होता,
जो सदा सदकर्म करते हैं।
नहीं रहते कभी आलस्य मे डूबे,
रत निज धर्मकर्म में रहते हैं।

कर्म प्रधान हर ग्रंथ ने माना,
हमें कर्म करते रहना ही होगा।
रामायण गीता ने यही सिखाया,
सब भाग्य भरोसे नहीं होगा।

सौभाग्य कर्म से बनता अपना।
मनुष्य स्वयं ही भाग्य निर्माता।
कोई नहीं कुछ कर सकता अपना,
हम हैं स्वयं के भाग्य विधाता।

जिनका साथ प्रभु देता है।
उनके साथ भाग्य रहता है।
लेकिन परोपकार जो करते,
सच उनका भाग्य बदलता है।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

दूसरे का हक छीन कर
बनाते हो तकदीर अपनी
ताकते बाजुओ में लाओ
फिर बनाओ तकदीर अपनी 

मत बैठो भरोसे 
तकदीर दोस्त 
मेहनत करो और
संवारो तकदीर दोस्त 

तकदीरे भरोसे 
बैठता गर सिकन्दर दोस्त
नहीं होता पूरा 
फतैह दुनियाँ का सपना दोस्त 

अलसी लोगों का जुमला है 
तकदीर में नहीं दोस्त 
पक्के इरादों से जुट जाए
गर तू काहे का भाग्य और
काहे की तकदीर दोस्त 

पताका फैलाना है गर 
अपनी सफलता का दोस्त 
मत बैठो भरोसे तकदीर 
जुट जाओ 
अपने लक्ष्य पर मेरे दोस्त 

स्वलिखित लेखक संतोष श्रीवास्तव 
भोपाल

विधा: कह मुकरियाँ....

१.
प्यार से बोया, सींचा जान लगाई...
पर मेहनत मेरी रंग न लायी...
हाथ लगी बस मेरे पीर....
ए सखि साजन ? न सखि तकदीर...

२.
जो मन मेरे वो न होता.. 
उसके किये में मन मेरा न होता.. 
बेकार होते मेरे सब तीर...
ए सखि साजन ? न सखि तकदीर...

३.
बात बात पे चिलाऊँ मैं...
हर किसी को कोसूं मैं... 
उसके सामने खो दूँ धीर...
ए सखि साजन ? न सखि तकदीर...

४.
बहु यत्न कर पींघ बढाऊँ...
मन ही मन रही हरषाऊँ...
पर पल में वो कर दे दिल चीर...
ए सखि साजन ? न सखि तकदीर...

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II 

तकदीर को संवारना अपने ही हाथ है
और गन्दगी बुहारना अपने ही हाथ है।

मांगने से मान कभी मिलता नहीं सुनो
पाक ज़िन्दगी गुज़ारना अपने ही हाथ है।

हो जाती हैं रौनकें गर दिल से मुस्कुराओ
ग़मों को बिसारना अपने ही हाथ है।

तीखे बोल बोलकर दिल न दुखा किसी का
हर बात को विचारना अपने ही हाथ है

मांगने से माफ़ी कोई छोटा नहीं होता
गलतियां सुधारना अपने ही हाथ है।

स्वरचित - सविता गर्ग "सावी"
पंचकूला (हरियाणा)

विषय भाग्य/नशीव
*******
नशीव अपना अपना
एक एक रोज छुआरे बादाम का नास्ता करे, 
एक एक भूंख से है सूख रह्यौ छुआरौ है। 
एक एक लाखन को लाख सम फूंक देत, 
एक एक पायौ न देख लाख, जीवन सारौ है। 
एक एक करे रोज भोग छप्पन भोग का, 
एक एक को न छुकी मिर्चंकौ सहारौ है। 
एक एक रहता है मसलन में रोज ठाठ से, 
एक एक को न नशीव टूटौ उसारौ है

कवि महावीर सिकरवार
आगरा (आगरा)

💥💥💥💥💥💥💥
मेहनत और लगन गर हो तुम्हारे
भाग्य चमकते हैं कर्मों के सहारे
सफलता चूमते कदम तुम्हारे
फिर किस्मत भी होते साथ तेरे

छोड़ो ना कश्ती भाग्य भरोसे
डूब जायेंगे ये बीच ही धारे
हाथों में लेकर पतवार सहारे
हौसले से ही कश्ती पार उतारे

पथ हो दुर्गम चले चलो
विश्वास के संग बढ़े चलो
लड़खड़ाते कदम संभालते चलो
प्रेम का संदेशा देते चलो

सतकर्मों से भाग्य बदल जाते है
ये विश्वास मन में मान के चलो
प्रेम से भाग्य भी सँवर जाते हैं
गर्दिश के तारे भी चमक जाते हैं 
ऐसा तुम ठान के चलो ।।।

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल


. किस्मत क्या है!! 

कर्मो द्वारा अर्जित लब्ध और प्रारब्ध ही किस्मत है... 

पूर्व कृत कर्मो से
जो संजोया है 
वो ही विधना का खेल है 
जो कर्म रूप संजो के
आया है रे प्राणी 
उस का फल तो
अवश्य पायेगा 
हंस हंस बाधें कर्म 
अब रो रो उन्हें
छुडाये जा
भाग्य, नसीब,
किस्मत क्या है ? 
बस कर्मो से संचित
नीधी विपाक
बस सुकृति से
कुछ कर्म गति मोड़
और धैर्य संयम से
सब झेल
साथ ही कर
कृत्य अच्छे
और कर नव भाग्य
का निर्माण ।

स्वरचित 
कुसुम कोठारी।
"भाग्य"
**********
भाग्य खोटा है नही ये जान लो तुम सर्वदा
कर्म तेरे है न पूरे मान लो तुम सर्वदा।।

हौसलों को थाम कर पतवार तुम भी थाम लो
डगमगाए जब भी नैया हौसलों से काम लो।।

थक न जाना राह अपनी लक्ष्य पर ही ध्यान दो
भाग्य तेरा खिल उठेगा स्वयं को सम्मान दो।।

है नहीं आसां कभी भी वक्त को संभालना
हो गए जो पैर पीछे भाग्य को न कोसना।।

आदि तेरा अंत तेरा भाग्य तेरे साथ है
कर हमेशा कर्म पूरे साथ तेरे हाथ है।।

वीणा शर्मा वशिष्ठ
स्वरचित मौलिक

विषय - भाग्य , तकदीर

सृष्टि नियन्ता
भाग्य विधाता
लिखता मस्तक पट पर
तकदीर हमारी
रखता बहीखाता
हमारे कर्मों का
देता फल
तदानुरूप
कभी अच्छा
कभी बुरा
खुशी में नजरें
तारों सी चमक जाती
दुख में अंखियाँ नीर बहाती
भाग्य से रंक राजा
बन जाता
फिर भी कर्म 
भाग्य पर
भारी पड़ जाता
हौंसला और कर्म
छू सकते हैं
आसमानों की बुलन्दी
पुरुषार्थ होता है बलवान 
भाग्य नियति है
साहस पुरुषार्थ
जगा देते हैं
सोता भाग्य
न बैठ भाग्य भरोसे
अरे इंसान
अपनी कर्मठता से
झुका दे आसमान
कदमों में
और बन जा
कालजयी

सरिता गर्ग
स्व रचित

तकदीर/भाग्य

भाग्य का लिखा कौन पढ़ पाया है,
भाग्य भरोसे जो रहा सदा पछताया है।
भाग्य के लिए पुरूषार्थ जरूरी है,
पुरूषार्थी ने सदा सफलता को पाया है।

दुर्भाग्य का रोना कायरों का काम हैं,
हवाई किले बनाना इनके लिए आम है।
कर्महीन बैठे-बैठे दूसरों को दोष देते,
भगवान तक को कर देते बदनाम हैं। 

कर्मवीरों के लिए कोई कठिन न काम है,
कांटों का ताज पहनना उनके लिए आम है।
मेहनत से अपना सौभाग्य वे बनाते हैं
ऊंचे पर्वतों पर विजय पताका फहराते हैं।

कोशिश करो तो भाग्य बन जाता है,
फिर भी कुछ न मिले दुर्भाग्य कहलाता है।
हिम्मत हार देना मनुष्यों का नहीं,
छोटे से छोटा जीव मेहनत से ही पाता है।

भाग्य के खेल अजब अनोखे हैं,
राजा-रंक के भाग्य बदलते देखें है।
कर्म ही इनके पीछे खड़ा नजर आता है,
जैसा कर्म होगा फल वैसा ही आता है।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित, मौलिक

तकदीर का हाल देखो मेरा 
कुछ ख्वाब टूट गये हैं 
कुछ अपनों ने तोड़ दिये 

कुछ हमें तकदीर के हवाले करके चले गये.

तकदीर भी देखो क्या कमाल करती हैं 
हर कदम पर एक नया रंग दिखाती हैं 
कभी हँसाती हैं कभी रुलाती हैं 
आसमान देने से पहले जमीन पर गिराती हैं .

नजर मेरी जमीं पर हैं 
उम्मीद की लहरों के सहारे खड़े हैं हम 
इंतजार हैं तकदीर मेरी बदल जायेगी 
कभी तो मेरी ये जिंदगी बदल कर नया रुख अपनायेगी.
स्वरचित:-रीता बिष्ट
शीर्षक तकदीर / भाग्य

एक बात सुन ले मेरी तू मेरे बीर।
कहे कोई कुछ बड़ी ही है तकदीर।।

कर ले परिश्रम तू तो चाहे कितना।
मिलेगा उतना भाग्य में है जितना।।

हर पासा तब तब उलटा ही पड़ता।
भाग्य किसी का जब साथ न होता।।

भाग्य किसी का जब साथ है देता ।
फकीर सरलता से शहन्शाह बनता ।।

नहीं कभी कोई भी उससे बलवान ।
तकदीर से होता नहीं है कोई महान।।

डाक्टर सुरेन्द्र सिंह यादव
“व्यथित हृदय मुरादाबादी”
स्वरचित
विधा - मनहरण घनाक्षरी 
वार - सोमवार 
तिथि - 25 / 02 / 2019
=================

हाथ की लकीर को जो,
मान बैठे तकदीर ,
उनको फकीर बस ,
लकीर का मानिये I

कर्म अधिकार रखे ,
फल में कदापि नहिं,
शायद उनको स्मृति,
नहीं बात मानिये I

कर्म से बिगड़ती हैं,
बनती लकीर नव,
इसलिये शिशुओं के,
कमजोर मानिये l

तकदीर भली- बुरी ,
जैसी "माधव" गढ़ लो,
कर्मबीज नशे नहीं ,
सच कहूँ मानिये I

#स्वरचित
#सन्तोष कुमार प्रजापति "माधव"
#कबरई जिला- महोबा (उ. प्र.)

हाइकु 
विषय:-"भाग्य" 
(1)
"भाग्य" के संग 
सफलता प्रशस्ति 
लिखता कर्म 
(2)
नैन तरसे 
कृषक की आशाएँ 
"भाग्य" भरोसे 
(3)
माँ-पिता सेवा 
तिरंगे का कफ़न 
"भाग्य" की बात 
(4)
भारत माता 
गोद में विविधता 
"भाग्य" विधाता 
(5)
डूबा आलस 
कर्म के क्षितिज पे 
चमका "भाग्य" 

स्वरचित 
ऋतुराज दवे

भाग्य भरोसे बैठ कर 
करो ना मन में आश।
तकदीर बनाने में यारों
कर्म का है बस हाथ।
विश्वास करो निज कर्म पर
उस जैसा ना मीत कोई जग में
जब छोड़ भागते मीत सभी
तब कर्म बनाता भाग्य को
लौटा देता खोया वैभव
जो चले गए थे दूर कभी
उनको भी ला देता ये पास।
इस जैसा मीत नहीं जग में
ना ही इस जैसा हितकारी।
जिसने है विश्वास किया इसपर
वह नित प्रति आगे बढता है।
किस्मत को यदि चमकाना है
निज कर्म को भी अपनाना है।
निज कर्म को भी अपनाना है।।
(अशोक राय वत्स )स्वरचित
जयपुर

हाइकु

गुरु देता है
शिष्यों को ज्ञान शिक्षा
भाग्य निर्माण

वर्तन धोते 
होटलों पर बच्चे
भाग्य का खेल

अपने दम
जीवन का निर्माण
भाग्य व कर्म

गरीब व्यक्ति
सड़क पर सोते
भाग्य की मार

धोखा प्यार में
जीवन मंझधार
भाग्य निर्बल 

माता पिता हैं
बच्चों के भगवान
भाग्य विधाता

मनीष श्रीवास्तव
स्वरचित
रायबरेली

हाइकु
(१)
मानव मन
श्रम से बदलता 
भाग्य के रंग
(२)
देखते सब
बड़ा ही बलवान
भाग्य का लेख
(३)
नहीं ठिकाना
भटकता फिरता
भाग्य का मारा

***अनुराधा चौहान***© स्वरचित 

जीवन में भाग्य से बहुत पाया है
पर कर्म से संवारा है 
भाग्य कर्म से ही बनता है 
पर कभी-कभी बहुत अखरता है 
जब किसी भाग्यवान का भाग्य बिना कर्म के चमकता है 
मन में प्रश्न चिह्न उभरता है ?
फिर यह विश्वास मन में आता है 
की नहीं भाग्य कर्म से ही चमकता है 
भाग्य पिछले कर्मों का लेखा जोखा है
यह अलग है कि उसे आज किसी ने नहीं देखा है 
भाग्य कर्मों का ऐसा बैंक बैलेंस है 
जिसमें कल जमा किया था आज पा रहे हैं 
आज भरेंगें कल पाएँगे 
तुलसीदास ने सच ही लिखा है
सकल पदारथ हैं जग माहीं 
कर्महीन नर पावत नाहीं ।
अर्थात कर्म करोगे तो भाग्य चमकेगा 
अन्यथा यूँ ही उदासी का बादल बरसेगा 
सोचो कलाम ,शास्त्री बैठे रहते भाग्य के भरोसे 
तो आज क्या देश उन्हें याद करता ऐसे ?
तो कर्म से कभी न कत राओ
अपने भाग्य को कर्म से चमकाओ ।
स्वरचित -मोहिनी पांडेय

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