Thursday, February 28

" बाल साहित्य "26फरवरी 2019

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💭💥😊बाल 
साहित्य😊💥💭
शीर्षक:बादल (1)
🗯️💦🗯️💦🗯️💦🗯️💦🗯️
बादल बरस
झम-झम बरस
जम कर बरस।
सूने आँगन
सूखे खेत
कुछ न सोच
जम कर बरस।
बादल बरस
झम-झम बरस
ऐसा बरस
की यादे हरी हो
सूखे खेतों में
कलियाँ खिली हो।
बादल बरस
झम-झम बरस
नंगे पैरों
मैं भागूं दौडूं
कीचड़ रमी हो
कपड़े व तन पे।
बादल बरस
जम कर बरस
बचपन के दिन
यादें हरी हो।
झम-झम बरस
बादल बरस।💭💭😊

वीणा शर्मा वशिष्ठ
स्वरचित मौलिक


जब तुम्हें बच्चा कहती हूँ 
मैं भी बचपन में खो जाती हूँ 
1) गाँव की पगडंडियों पर 
तुम्हारी उँगली पकड़ कर 
बैलगाड़ी के पीछे पीछे 
नंगे पाँव धूल उड़ाते हुए 
भागना मुझे अच्छा लगता है । 

जब तुम्हें बच्चा कहती हूँ 
मैं भी बचपन में खो जाती हूँ ।
2) खेतों खलिहानों में 
छुप्पम छुपाई खेलना 
पीछे से आकर तुम्हारा 
जोर का धप्पा मारना 
मुझे अच्छा लगता है ।

जब तुम्हें बच्चा कहती हूँ 
मैं भी बचपन में खो जाती हूँ ।
3) गरमी की दुपहरिया में 
अमियाँ के बागों में 
रखवाले से छुपते छुपाते 
नमक के साथ चटखारे 
लेकर अमियाँ खाना 
मुझे अच्छा लगता है ।

जब तुम्हें बच्चा कहती हूँ 
मैं भी बचपन में खो जाती हूँ ।
4) छोटे छोटे हाथों से 
रेत के घरौंदे बनाना 
उसमें तुम्हारे साथ के 
सपने बुनना 
मुझे अच्छा लगता है ।

जब तुम्हें बच्चा कहती हूँ
मैं भी बचपन में खो जाती हूँ। 
5 ) सूनी सूनी रातों में 
डिबियों की टिमटिमाती 
रोशनी में , जुगनुओं का चमकना 
और दादी की लोरियां 
गाकर सुलाना 
मुझे अच्छा लगता है ।
जब तुम्हें बच्चा कहती हूँ 
मैं खुद भी बचपन में खो जाती हूँ ।।
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
तनुजा दत्ता ( स्वरचित )


🍁
याद बहुत आते है मुझको,
बचपन के दिन प्यार।
चंपक नाम की एक पत्रिका,
बचपन की थी यादें।
🍁
हाथ मे जब भी पैसा आता,
उस दुकान पर जाते।
एक रूपये मे चार कहानी,
वाली पुस्तक पढते ।
🍁
नागराज और चाचा चौधरी,
अंकुर, साबू, पिंकी।
इसी मे बचपन बीत रहा था,
वो दिन भी था फंकी।
🍁
अमर चित्र कथा की बातें,
अब ना है बचपन मे।
शेर ने बचपन मे जो पढा है,
लिखता है कविता में।
🍁
स्वरचित .. Sher Singh Sarraf


बहुत नादान होता है बचपन
गम से अनजान होता है बचपन 
सुनहरे दिन थे वह स्कूल के
जब दोस्तों का साथ था
पता ही नहीं चल रहा था कब 
सुबह होती थी कब शाम होती थी
बस खेल कूद का ही ध्यान 
हर संडे को पिकनिक का प्लान
तालाब में जाना दूर तक तैर कर आना
देर रात तक मोहल्ले में रेस टीप खेलना
चुपके चुपके दबे पांव घर आना
फुगड़ी ,बिल्लस ,गोटा परी -पत्थर ,नदी पहाड़
खेलते खेलते पता ही नहीं चला 
कब बीत गया बचपन
लड़ना झगड़ना ,खी, मी होना
आखिर बस जल्द ही मान जाना
सचमुच दीवाना होता है बचपन
हर गम से अंजाना होता है बचपन
कोई रोक टोक नहीं था
पढ़ाई का बोझ नहीं था 
बस खेलते घूमते खाते थे
और मौज ही मौज मनाते थे
पर आज समय बदल गया है बचपन भी,
उम्र से पहले ही बच्चे बड़े हो रहें हैं
पढ़ तो रहें पर नैतिकता खो रहें हैं
ज्यादा देर घर से बाहर रह नहीं सकते
बोलो तो सह नहीं सकते बाहर तो क्या
बस घर ही उनके लिए खेल का मैदान है
बालिकाओं के लिए तो बचपन बना श्मशान है यह
बस्तों के बोझ तले आज का बचपन दब गया है।।

#रश्मि अग्निहोत्री केशकाल
जिला कोंडागांव

विधा लघुकथा (पहली प्रस्तुति)

मदारी 

सुबह से दोपहर हो गई थी झुरियों से भरे चेहरे वाला मदारी डमरू बजाते हुए घूम रहा था पर उसको शहर में एक जगह भी बच्चों का हुजूम नहीं दिखा था जहाँ वह बन्दर बंदरिया का खेल दिखा कर , कुछ पैसे इकट्ठे कर सके । कई जगह तो शौर होने का वास्ता दे कर , सोसाईटी के गार्ड ने उसे दुत्कार कर भगाया भी गया ।

वह खुद ही बडबडाते हुए आगे बढ़ गया :

" आजकल शहरों के बच्चे तो मोबाइल पर ही खेल देखते रहते है , घर से बाहर निकलते ही नहीं है । बचपन क्या होता है ? उन्हें मालूम ही नहीं है । खैर "

अब वह झुग्गियो के पास आ गया । कई बच्चे उसके पीछे पीछे आ गये । 

एक जगह उसने खेल दिखाना शुरू किया , बच्चे ताली बजा बजा कर खुश होने लगे । वहाँ बंदर बंदरिया भी खूब मस्ती से एक के बाद एक खेल दिखा रहे थे । अब एक खेल में बंदरिया, बंदर से रूठ कर मायके आ गयी थी , बंदर लेने गया था , उसने बंदरिया को खूब मनाया लेकिन वह नहीं मान रही थी तब बंदर को गुस्सा आ गया और उसने मदारी के हाथ से डंडा छीन लिया और बंदरिया डर कर बंदर के साथ जाने के लिए तैयार हो 
गयी ।

इस खेल से रमिया को शर्म आ गयी , एक बार उसके साथ भी ऐसा ही हुआ था , बाकी औरतें भी कहीं न कहीं इन कहानियों से अपने को जोड़ रही थी ।

इस बीच घर की औरतें कोई रोटी सब्जी, कोई एक दो रूपये ले कर आ गयी । 

अब मदारी ने सब सामान बटौरा और घर चल दिया ।साथ ही उसने हाथ जोड़ कर आसमान की तरफ देखा और बोला :

" या खुदा बच्चों का बचपन लौटा दे" और बंदर बंदरिया ने भी आसमान की तरफ देख कर " आमीन" कहा ।" 

स्वलिखित 

लेखक 
संतोष श्रीवास्तव भोपाल


-----------🌞-----------
काली घटा छाई
आई रे आई
बरखा रानी आई
बच्चों की शुरू हुई
छुपम छुपाई
मन को भाती
मासूम मस्ती
पानी में तैरती
कागज की कश्ती
नन्हें नन्हें पांवों से
करें पानी में छप छप
लगा कर सिर पर
पत्ते की छतरी
झूमे उनके संग
पवन पुरवाई
दादुर पपीहा ने
अपनी तान सुनाई
पेड़ों ने भी झूम
डालियां हिलाईं
बच्चे भी गाते
छई छप छई
देख मस्त मगन
मासूम मस्ती
याद आ गई
मुझे भी बचपन की
***अनुराधा चौहान***©स्वरचित


 नमन भावों के मोती,नमन मंच
बाल साहित्य
विधा लघुकविता

26 02 2019,मंगलवार
बच्चे मन के सच्चे होते
द्वेष ईर्षा वे नहीं जानते
मनमौजी हटीले रहते वे
सर्वसुखाय मस्त मानते
रोते खाते रहते दिन भर
हँसते रहते खिलखिलाकर
नव नूतन वे खेल खेलते
उछल कूद करते वे दिनभर
बचपन याद सदा आती है
दादी नानी की अद्भुत गोदी
सुनते रोज़ नित नयी कथा 
जब गुम होते तब माँ रोती
चँदा मामा से बातें करते
नित नव मित्र सदा बनाते
हँसते गाते और चिल्लाते
नयी कविता रोज सुनाते
मम्मी पापा की बांहों में
सदा झूलते रहते झूला
जन्मदिन आता प्रतिवर्ष तो
आनंदित होता हिय फूला
आसमान से बातें करते थे
पेड़ो पर जाकर चढ़ जाते
जामुन आम स्वयं तोड़ते
स्व कर मीठे फल हम खाते 
बचपन का अतुलित आनन्द
हर इंसा को रहता स्मरण
यादें ही बस रह जाती हैं
स्वप्न मात्र बनता आमरण
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।


छोटी गुड़िया ।।

गुड़िया द्वारे राह निहारे ।
पापा नही आये हमारे ।
अब न आयें सांझ सकारे ।
कहते काम हैं ढेर सारे ।

सन्डे का किया था वादा ।
सन्डे को रूके न ज्यादा ।
पहले तो थे दादी दादा ।
उनका प्यार हमें रूलाता ।

पापा भी अब झूठे हैं ।
शायद हमसे रूठे हैं ।
खिलौने सारे टूटे हैं ।
मेरे ये भाग्य फूटे हैं ।

कोई न सुनता मेरी बात ।
मम्मी भी न देती साथ ।
पापा आते हैं देर रात ।
भूली गुडडों की बारात ।

कल से मैं स्कूल जाऊँगी ।
घर में कहाँ खेल पाऊँगी ।
होम वर्क रोज लाऊँगी ।
किसी को न मैं सताऊँगी ।

मम्मी भी बनाये बहाना ।
नही सुनाये लोरी गाना ।
इधर उधर बंद है जाना ।
कैसा 'शिवम' ये कैदखाना ।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"

ये कैसे उडती रहती चिड़िया , कैसे उड़ती है तितली रानी ,

मुझे सुनाओ दादी अम्माँ , आज नयी फिर कोई कहानी |

समझ के मुझको छोटा बच्चा , मत बहलाना दादी मेरी ,

हो जायेगी कट्टी फिर समझो , चालाकी सब समझूं तेरी |

सपनों में ही क्यों आया करती,बताओ परियों की रानी ,

पास नहीं क्यों वो मेरे आती ,मैं भी देखूं कितनी सयानी |

चंदा मामा दूर क्यों इतने , वे तारों के ही संग में रहते ,

पास बुलाया कितना हमने , पर वो दूर दूर ही रहते |

भगवान की सब लीला बच्चे , इसके तो जबाब नही होते ,

अच्छे बच्चे जिद नहीं करते , खेल खिलौने खेला करते |

स्वरचित , मीना शर्मा , मध्यप्रदेश ,


चूहे मामा

काला चश्मा चढ़ा नाक पर
घड़ी सुनहरी सजा हाथ पर
अपनी लम्बी पूंछ हिला कर
चूहे मामा जी इतराये
चुहिया मामी सिले पजामा
मामा पहन उसे इठलाये
कितना सुंदर दिखता हूँ मैं
सोच सोच कर वो मुस्काये
आज सभी साथी पर अपना
खुल कर रौब जमाऊंगा
सभी जलेंगे फिर वो मुझसे
मैं राजा बन जाऊंगा
तभी सामने बिल्ली मौसी
आती पड़ी दिखाई
अब तो चूहे मामा जी की
घिग्घी सी बंध आई
सभी विचारों को मामा ने
मुश्किल से था थामा
जान बचा कर भागे बिल में
निकला वहीं पजामा

सरिता गर्ग
स्व रचित


****पतंग*****
😃😃😃😃😃

सर-सर ,फर्र-फर्र उड़े पतंग,
हवा के संग-संग उड़े पतंग,
नील गगन में खूब उड़े पतंग,
मन में उमंग आज भरे पतंग |

सोनू, मोनू, पप्पू और बब्बू,
छत पर दौड़े-दौड़े जायें,
रंग-बिरंगी पतंग उड़ाये,
मस्ती में झूमें और गायें |

आसमान में पतंग लहराये,
सर-सर,फर्र-फर्र उड़ती जायें,
जब पेड़ों से पतंग टकराये,
थोड़ा सा गुस्सा आ जाये |

अपनी पतंग को सब बचायें,
दूसरे की पतंग को काटना चाहें,
बचपन की ये प्यारी यादें,
कभी-कभी खूब सताये |

स्वरचित *संगीता कुकरेती*


१/घर गढ़ते,
बादल छित राये,
रेत में बच्चे।।१।।
२/बैर न जाने,
बच्चे मन के सच्चे,
प्रभु के रुप।।२।।
३/मेरुदंड है,
घर के आभूषण,
नन्हे बच्चे ही।।३।।‌
दुलारे बच्चे,
धरती के सितारे,
रुलाना नहीं।।४।।
५/मासूम बच्चे,
ढो रहे मां के संग,
बालू पत्थर।।५।।
देवेन्द्र नारायण दास बसना छ,ग,।

आज मची है चिल्लम चिल्ली,
घर में आई फिर मिठाई,
रानी राजू दोनों में फिर
मिठाई के लिए हुई लड़ाई।
ढिशुम ढिशुम धाय धाय
तूने मुझसे ज्यादा खाई,
मेरी फेवरेट है वो मिठाई।
ढिशुम ढिशुम धाय धाय।
मेरी मर्जी मैंने है खाई,
मैं खा लूंगा और मिठाई,
ढिशुम ढिशुम धाय धाय।
इतने में फिर मम्मी आई ,
पापा के लिए नहीं बचाई !
हो गई फिर दोनों की ठुकाई ,
ढिशुम ढिशुम धाय धाय।
बच्चों हमेशा मिलकर रहना
मिठाई के लिए कभी ना लड़ना।
नीलम तोलानी
स्वरचित।

पचपन में भी बचपन की
बातें करता है बालमना
उसको कोई रोक सके ना
बैठा रहता है जो अनमना ।
रेत बर्गूले सदा बना कर
मिट जाने पर हार न माने ।
लहर लहर को मार कंकरिया
खेले उस पर मार लकुटिया
पेड़ों पर जाकर चढ़ जायै
खट्टी -मीठी अमिया खाये ।
बादल देख मोर बन नाचे
बूंदों के संग ता-ता-थैया
बचपन में जो बातें करता
कभी भूल न उनको पाता ।
याद आगये वह दिन भैया
मैया.दौड़ी लिये लगुदिया
शैतानी कर छिप गये भैया
मार पड़ी जब दैया-दैया ।
उषासक्सेना-स्वरचित


मन मेरा इत उत भागे रे....
उड़ जाए बदली बन कभी...
कभी चाँद सा झांके रे....

जंगल में सबने क़ानून बनाया...
दुश्मन भी जिसने दोस्त बनाया...
बिल्ली मौसी के घर शादी...
चूहा दूल्हा बन नाचे रे....
मन मेरा इत उत भागे रे....

भालू भी दावत में आया....
आलू और टमाटर खाया...
पेट उस का भर न पाया....
फिर भी थैंक्यू बोला रे......
मन मेरा इत उत भागे रे....

शेर दहाड़ न मारे अब...
पेट में उसके पडते बल...
शेरनी बनाये खाना अब...
और लगाए लिपस्टिक रे.....
मन मेरा इत उत भागे रे....

लोमड़ी चाची नाक सिकोड़ती...
घूमें इधर उधर मटकती...
या पढ़ती फिर बैठ पोथी...
बातों में उसकी कोई न आये रे.....
मन मेरा इत उत भागे रे....

बन्दर मियाँ खी खी करते...
खजूर के पेड़ पे पड़े हैं लटके...
बच्चों को अब वो खूब हंसाये...
केले उनके नहीं खाये रे.....
मन मेरा इत उत भागे रे....

गिलहरी फुदके इधर उधर..
तोता मैना बैठे जिधर...
हाथी पे बैठ कुत्ता जाए...
'चन्दर' मन सब भाये रे..... 
मन मेरा इत उत भागे रे....

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II 


"चंपक"के मनमौजी 'चीकू'जी
करते बड़ी चुहलबाजी जी ।

"नंदन "की कहानियाँ
मन को बड़े लुभाते जी।

"बाल भारती"में बतलाते
चिजें कैसे है बनते जी।

मन में हरपल घूमता था
परियों की कहानी जी ।

विशालकाय हमारे"साबूजी"
बहादुरी ही दिखलाते जी।

तारिफें करते ना थकते ,
"चाचा चौधरी"की बुद्धिमानी जी

था बड़ा ही भयंकर मामला
"ड्रेकुला"का आ जाना जी।

"तेनालीराम"के किस्से
आहा! क्या कहने जी।

"अकबर-बिरबल"के चर्चे
दोस्तों के संग जमते जी।

उन दिनों की बात निराली
सोच-सोच अब हँसती जी।

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल



मेरी गुड़िया सो री।
तुझे सुनाऊं लोरी।
सपना सलोना कोई

आएगा चोरी चोरी।
आओ चंदा मामा,
बनेंगे हमजोली।
मत खेलो तुम तारों 
हमसे आंख-मिचौली।
हौले हौले हवा चली
रात भी अब ढली
बांध रे निंदिया रानी
प्रीत की अब डोरी।
मेरी गुड़िया गोरी
दुध भरी कटोरी।
सो री, गुड़िया,सो री।
तुझे सुनाऊं लोरी।।
निलम अग्रवाल, खड़कपुर


पेड के फुनगी चढी चिरैया
मद में मरी मरी जाय
मैं उडूं आकाश नापलूं
जा सूरज से आंख मिलाऊं
ओ डरपोक बदरी के पीछे
कयों तूं छुप छुप जाय
भरी उडान अनोखी
ऊपर ऊपर उडी जाय
तभी भानु जी बाहर निकले
पंखों में तपन चुभी आग सी
लगा सूखने गला प्यास से
फिर भी यूं इतराके बोली
चलो आज मैं तुम्हें छोडती
तुम भी क्या याद करोगे
छोटी थी पर महावीर थी
प्यारी प्यारी चिड़िया रानी
पास आती तो सच कहती
याद दिलाती तुमको नानी।
स्वरचित।
कुसुम कोठारी।


मासूम बिटिया करे गुहार..
आई बहार मेरे अँगना...
गुड्डे गुड्डी का है ब्याह कराना..
पापा मेरी पॉकेट मनी बढ़ाना...
गुड्डा हुआ है बड़ा सयाना..
गुड्डे को है मोबाईल दिलाना..
खत लिखना हुआ पुराना..
गुड्डी को है बहलाना..
पापा मेरी पॉकेट मनी बढ़ाना...
मंहगाई बहुत बढ़ गई है..
गुड्डी गुड्डे से लड़ गई है..
पिज्जा की है मांग लगाई..
ब्यूटी पार्लर भी है ले जाना..
पापा मेरी पॉकेट मनी बढ़ाना...
गुड्डे को है गाड़ी दिलाना..
गुड्डी को है घुमाना फिराना..
आजकल का फैशन देख...
गुड्डी को भी बांहे डाल है घुमना..
पापा मेरी पॉकेट मनी बढ़ाना...
शार्ट्स की है गुड्डी दिवानी...
नई ड्रेस है उसको दिलवाना...
पापा मेरी पॉकेट मनी बढ़ाना...

स्वरचित :- मुकेश राठौड़


😊बाल साहित्य😊
👧गोदी👧(2)
🌹🌹🌹🌹🌹🌹
ओ,मेरी प्यारी मैया सुन ले
ना चाहूं मैं खेल खिलौने
ना चाहूं मैं झूला
मुझको तो तू दे दे मइया
अपनी गोद सा हिंडोला।
चैन यहीं है आता मुझको
नींद यहीं है आती
बाकी सारी दुनिया झूठी
गोदी ही सच्ची लागी।
झूठ-फरेबी दुनिया से मैं
दुखी बहुत ही होया
पाकर तेरी गोदी मइया
सुकूँ रात भर सोया।
ना। देखी मैंने तेरी मुश्किल
रात-रात तू जागी
कुछ भी हो जाए मइया मुझको
तेरी गोदी ही प्यारी लागी।😊

वीणा शर्मा वशिष्ठ
स्वरचित मौलिक


बच्चों का देश-प्रेम
--------------------------
मैं भारत का छोटा सिपाही,
सीमा पर लड़ने जाऊंगा।
आंख उठा कर देखे शत्रु,
उसको मजा चखाऊंगा।
वंदे मातरम,वंदे मातरम!

मुझको बच्चा न समझना,
मुझको न झुठलाना रे।
पढ़ा भगतसिंह का पाठ हमने,
देश-प्रेम को जाना रे।
वंदेमातरम् वंदेमातरम्!

हम बच्चे अपनी पर आए,
तो कुछ भी कर जाएंगे।
पानी में चलाएं कागज की कश्ती,
धरती से बंदूकें उगाएंगे।
वंदेमातरम् वंदेमातरम्!

छोटे हैं तो क्या हुआ,
हमको हमारा देश प्यारा है।
उन वीरों की पढ़ते कहानी,
जिन्होंने खुद को देश पर वारा है।
वंदेमातरम् वंदेमातरम्!

बच्चा-बच्चा वीर सिपाही
लड़ने को तैयार है,
शत्रु करे गर दो-दो हाथ,
होगी उसकी हार है।
वंदेमातरम् वंदेमातरम्!

भारत के बच्चे हम प्यारे,
पूरे विश्व में हमारा नाम हैं।
देश का मान रहे सदा ऊंचा,
यही हमारा काम है।
वंदेमातरम् वंदेमातरम्!

अभिलाषा चौहान
स्वरचित ,मौलिक


**********
समझ हमें कमजोर न
समर सदा ही जीते है
जीते जी है टक्कर लेते
मर,शहीद हो जाते है
कर जाते है ऐसे काम
हर बालक कह उठता है
जय जवान,जय जवान।।🇮🇳

दुश्मन की सेना देख कर
तनिक नही घबराते है
कर्तव्यों पर चलते चलते
मर,शहीद हो जाते है
कर जाते है ऐसे काम
हर बालक कह उठता है
जय जवान,जय जवान।।🇮🇳

ये देश मेरा सम्मान है
आँख उठाए जो भी इस पर
ढेर वहीं कर जाते है
हम,मर शहीद हो जाते है
कर जाते है ऐसे काम
हर बालक कह उठता है
जय जवान,जय जवान।।🇮🇳

धधक रही थी ज्वाला उर में
शांत हुई है अब रणधीर
नाज करें हम सेना पर
जो,मर शहीद हो जाते है
कर जाते है ऐसे काम
हर बालक कह उठता है
जय जवान,जय जवान।।🇮🇳

न लू गर्मी,न ही शीत
डटे रहे भारत के वीर
रहे चैन से सोते हम
वो,मर शहीद हो जाते है
कर जाते है ऐसे काम
हर बालक कह उठता है
जय जवान,जय जवान।।🇮🇳

वीणा शर्मा वशिष्ठ
स्वरचित,मौलिक


मैं हूँ एक नन्हा सा बच्चा।
खेल,खिलौने मेरे साथी।

चाहे मैं मिट्टी में खेलूँ।
चाहे पतंग हो मेरे साथी।

चाहे गाड़ी, घोड़े संग हों।
चाहे क्रिकेट,फ़ुटबॉल।

कुछ भी हों खिलौने संग मेरे।
खुश होकर खेलूँ खेल।

दूर तलक दौड़ लगाऊं।
साथियों को पीछे छोड़ूँ।

सबसे आगे निकल जाऊँ मैं।
लड़ूं,झगडूं,फिर गले मिलूँ।

बचपन का दिन है ये प्यारा।
बड़ा सुहाना लगता।

बड़े पता नहीं, क्यूँ खुश नहीं रहते।
मैं तो हरदम खुश रहता।।
💐💐💐💐💐💐💐💐
स्वरचित
वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी


आज बाल- साहित्य शीर्षकांतर्गत मेरे पुत्र द्वारा रचित रचना --

आ रहा बसंत बहार
--------------------------------------
विद्या की देवी सरस्वती की 
हुई जगत में जय-जयकार,
शीत नृप अपने सिंहासन दिए
आ गया बसंत बहार।

हरित धरा पर सौरभ बिखेरता 
फूलों का संसार,
साल बाद फिर से 
आ गया बसंत बहार।

कोयल कुहके, पपीहा बोले,
उड़े आकाश में लाल गुलाल,
गोरी नाचे आज मगन में 
आ गया बसंत बहार।

भ्रमरों जैसे फूलों पर 
मंडरा रहे हैं बाल गोपाल,
इस हर्षित मौसम में देखो 
आ गया बसंत बहार।
-------------------------------------
-- अवनींद्र मधुरेश गिरी
राकेश निकेतन, नरगी जीवनाथ 
मुजफ्फरपुर, बिहार 
843123


नमन "भावो के मोती"
26/02/2019
"बाल साहित्य"

"गिनती सीखो"(2)
😊😊😊😊😊😊😊
हमारे दरवाजे पे
बँधा रहता 'डागी'एक
मुसाफिर देखते करता
भेंक-भेंक!!!

तालाब में है बड़ा-बड़ा रुई
पशु और माछ मिलके
एक और एक दो!!

बागान में चर रहे दो हिरण,
दो पशु और एक माछ
दो और एक तिन!!

मामा के घर है गाय लाल
बड़े सुस्वादु हैं दुध
तीन पशु और एक माछ
तीन और एक होते चार!!

सड़क पर देखो बंदरो का नाच
चार पशु और एक माछ
चार और एक होते पाँच!!

ऊन देता सफेद भेड़ा
ठिठुरकर धूप में बैठा
पाँच पशु और एक माछ
पाँच और एक छ:!!

घर पर मेरे है खरगोश
उठ बैठा है मेरे हाथ
छः पशु और एक माछ
छः और एक होते सात!!

नानाजी के चिपके गाल
जैसे हो छोटा थाल,
सात पशु और एक माछ
सात और एक होते आठ!!

तालाब में तैरता राजहंस
पशु, पक्षी और माछ!!!
किसी से ना करते भय
आठ और एक मिलके नौ!

दादाजी लाये रसगुल्ला
छक के खाये मस्त मौला
गिनती में थे नौ और एक 
😊दस😊अरे!!बस😊
(रुई--मछली की एक प्रजाति)
(माछ--मछली)
(थाल--थाली)
सौजन्य हँसते-हँसते सीखो

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल


पंख
(माँ और बेटे के संवाद)

मम्मी मेरे पंख उगा दो,
मैं पायलट बन जाऊं,
नन्ही नन्ही चिड़ियों संग..
सारा आकाश नाप आऊँ।
कभी हिमालय कभी महासागर ,
सब जगह पिकनिक मनाऊं ।
मम्मी मेरे पंख उगा दो।
में पायलट बन जाऊं।।

बेटा मेरे प्यारे प्यारे ,
तुम बच्चे इंसान के..
बोलो कैसे पंख लगा दूं ?
वह तो होते चिड़िया के।

फिर मम्मा तुम चिड़िया..
बन जाओ ।
मैं ना जानूं मैं ना मानूं ,
नीले पीले जैसे भी हो ,
सुंदर सुंदर पंख लगा दो ।
मैं पायलट बन जाऊं ।।

अच्छा बेटा ,आ तेरे में पंख लगा दूं ..
आदम से चिड़िया बना दूं ।
पर थोड़ा सा तू यह सोच ,
पिज़्ज़ा बर्गर छोड़ना होगा ..
पेड़ों पर ही रहना होगा ।
क्या तुम ऐसा कर पाओगे ?
दाना कच्चा खा पाओगे ?

ओ मम्माsss भोली भाली ....
मैंने की थी हंसी ठिठोली।।

नीलम तोलानी
स्वरचित

विधा:- पद्य

माँ ने मुझको दिया ख़ज़ाना ,
मत घबराना बढ़ते जाना ।
पथ में कंकड़ पत्थर आएँ ,
उनको चुन कर राह बनाना ।
माँ ने मुझको .........

नाव लगे जब गोते खाने,
बल विवेक काम में लाना ।
थपेड़े लगे लगने लहरों के,
लहरों से फिर जा टकराना ।
माँ ने मुझको............

चलते चलते राह जब भूलो,
रुक कर बुद्धि अपनी लगाना।
मंज़िल सही है किस दिशा में,
सोच के अपना क़दम बढाना।
माँ ने मुझको ..............

बड़ों को सिर झुका के चलना,
स्नेह छोटों पर खूब लुटाना।
झगड़ा पड़ोसी से ना करना,
अहिंसा का मार्ग अपनाना।
माँ ने मुझको ............

चोरी झूठ फ़रेब से बचना,
सच का मार्ग ही अपनाना।
संगत बुरी से बच कर रहना,
साहस से आगे डट जाना।
माँ ने मुझको..........

स्वरचित:-
ऊषा सेठी 


विधा:- पद्य

माँ ने मुझको दिया ख़ज़ाना ,
मत घबराना बढ़ते जाना ।
पथ में कंकड़ पत्थर आएँ ,
उनको चुन कर राह बनाना ।
माँ ने मुझको .........

नाव लगे जब गोते खाने,
बल विवेक काम में लाना ।
थपेड़े लगे लगने लहरों के,
लहरों से फिर जा टकराना ।
माँ ने मुझको............

चलते चलते राह जब भूलो,
रुक कर बुद्धि अपनी लगाना।
मंज़िल सही है किस दिशा में,
सोच के अपना क़दम बढाना।
माँ ने मुझको ..............

बड़ों को सिर झुका के चलना,
स्नेह छोटों पर खूब लुटाना।
झगड़ा पड़ोसी से ना करना,
अहिंसा का मार्ग अपनाना।
माँ ने मुझको ............

चोरी झूठ फ़रेब से बचना,
सच का मार्ग ही अपनाना।
संगत बुरी से बच कर रहना,
साहस से आगे डट जाना।
माँ ने मुझको..........

स्वरचित:-
ऊषा सेठी 


आओ बच्चों एक हो जाए ।
कोई न बुराई नेक हो जाए ।।
हिलमिल कर सब काम करो।
फिर समय-समय आराम करो।।
नित्य सवेरे जल्दी उठ जाओ ।
निवृत हो काम,बन ठन जाओ।।
चबा-चबाकर कर खाना खाओ।
पढ़कर घर तुम फिर शाला जाओ।।
मन लगा कर तुम करो पढाई़ ।
विद्या से सभी तरफ होती बढा़ई ।।
 कहना माता-पिता गुरूजन का मानो ।
सच्ची बात का बुरा हरगिज़ न मानों ।।
घर आकर शाला से मुंह हाथ धोओ।
खाना सब हिलमिल कर साथ खाओ।
थोडा़ ब्रूश दांतों में दुध पी सो जाओ ।।
स्वरचित -चन्द्र प्रकाश शर्मा
'निश्छल',


बचपन में मैने भी यह पढ़ा है
जैसा कर्म वैसा ही फल पाया हैं
पाक आतंक का कर सफाया
हमारें वीरों ने फल चखाया है

पाक आतंक का सपना हुआ गुल
कश्मीर का नाम लेना जाएगा भूल
खुद को हि बचाने में देखों है लगा
आतंकवाद के अड्डे नष्ट हुवें समुल

भारत ने रचा है आज इतिहास
वायु सेना ने किया काम खास
पाक असमंजस में पड़ गया है
बिछाएगा लाश ना था एहसास

===रचनाकार ===
मुकेश भद्रावले
हरदा मध्यप्रदेश 


मैं नादान अबोध सा बच्चा
दिल का हूँ मैं बड़ा ही सच्चा
हे ईश्वर तू ही,है पालक मेरा
हाथ जोड़ मैं करूँ वंदना
कर दे मेरी पूर्ण मनोकामना
मैं हित चिंतन करूँ सभी का
बुरा ना चाहूँ कभी किसी का
कभी ना भय से मै घबराऊँ
ड़र को अपने दुर भगाऊँ
मातृभूमि की करूँ मैं सेवा
मातृभूमि के काम में आँऊ
दुश्मनों को मार भगाऊँ
अच्छे अच्छे काम करूँ मैं
देश का ऊँचा नाम करूँ मैं
दुखीजन को मै सुख पहुँचाऊ
उनकी पीड़ा मैं हर जाँऊ
वृद्ध माताओं की करूँ मै सेवा
गुरुजन का सम्मान करुँ मै
क्रोध ,लोभ, द्वेष, से दूर रहूँ मै
कर्म भी मेरा धर्म भी मेरा
जीवन भर करूँ मैं जन जन की सेवा
मंगल ही मंगल हो मेरा
मानवता का धर्म हो मेरा
एक अच्छा इंसान बनु मै
और नहीं कुछ मेरी कामना
इसका दो वरदान मुझे तुम
हे ईश्वर कृपया कर दो तुम मुझ पर
मैं नादान अबोध सा बच्चा
🙏🏻 स्वरचित, हेमा जोशी


बाल कविता- नानी जी ओ नानी जी
मुझे सुनाओ एक कहानी
नानी जी ओ नानी जी।
बैया कैसे बुने घोंसला
बंदर खिर खिर करता क्यों?

मुझे सुनाओ बात अनोखी
नानी जी ओ नानी जी ।
तड़ तड़ तड़ तड़ पानी बरसे
कड़ कड़ बिजली करती क्यों?

मुझे बताओ एक पहेली
कुत्ते की दुम टेढ़ी क्यों?
पंख फैला मयूर नाचता
पैर देखकर रोता क्यों?

मुझे बताओ गूढ़ पहेली
नानी जी ओ नानी जी।
मूक जानवर जिराफ होता
लम्बी गर्दन होती क्यों ?

मुझे बताओ नेक कहानी
नानी जी ओ नानी जी।
खाकर भूसा गाय बोलती
किसको दूध पिलाना जी।

मुझे बताओ बात राज़ की
नानी जी ओ नानी जी ।
पाल पोष कर दूध पिलाती
बकरी पाती खाती क्यों ?

परिचय:-
अशोक कुमार ढोरिया
मुबारिकपुर(झज्जर)
हरियाणा


**सलोना बचपन**
----------------------------------------------
सुखद, सुंदर, सलोना बचपन 
मस्त पवन-सा बहता है।
न हित कोई, नहीं दुश्मन 
यह सबसे मेल रखता है।
*****************************
झगड़े कर फिर दोस्त बन, 
हमें भाईचारा सीखलाता है।
सबके साथ बिंदास जीवन, 
इनका खूब ही निभता है।
सुखद, सुंदर, सलोना बचपन 
मस्त पवन-सा बहता है।
******************************
किसी से नफरत या द्वेष की, 
भाषा इन्हें आता नहीं है।
इनका हर किसी से सिर्फ, 
सहज मेल का नाता रहता है।
सुखद, सुंदर, सलोना बचपन 
मस्त पवन-सा बहता है।
***************************
नहीं खुद्दारी होती इनमें, 
नहीं गद्दारी का भय खाता है।
सिर्फ सहज सरल व्यवहार, 
सबको हमेशा दिखता है।
सुखद, सुंदर, सलोना बचपन 
मस्त पवन-सा बहता है।
***************************
मन बचपन का इतना निर्मल 
किसी से राग-द्वेष नहीं।
मस्त-मगन सुंदर- सुखद 
जीवन यह जीता रहता है।
सुखद, सुंदर, सलोना बचपन 
मस्त पवन-सा बहता है।
******************************
खेल प्रपंच का यह नहीं जाने ,
प्रेम भरी नजर पहचाने।
अपनों के वात्सल्य के लिए 
हरपल यह लालायित रहता है।
सुखद, सुंदर, सलोना बचपन 
मस्त पवन-सा बहता है।
******************************
सुखद, सुंदर, सलोना बचपन 
मस्त पवन-सा बहता है।
न हित कोई, नहीं दुश्मन 
यह सबसे मेल रखता है।
******************************
-- रेणु रंजन 
( स्वरचित )
26/02/2019


गीतकार-राज़ बदायूँनी
------
"शोर मचाना चिड़ियों का"
----------------------------
आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं,
हँसना मुस्काना चिड़ियों का।
रोज़ शाम को बाग में होता,
शोर मचाना चिड़ियों का।।

चिड़ियों के भी नन्हें मुन्ने,
कैसे पंख हिलाते हैं।
इन के भी तो मम्मी पापा,
उड़ना इन्हें सिखाते हैं।।
पापा इन के दूर दूर से,
चोंच में दाना लाते हैं।
आ जाओ हम तुम्हें दिखाएं,
खाना दाना चिड़ियों का।।
रोज़ शाम को---------

पापा के घर आते ही ये,
खुशियों से खिल जाते हैं।
इक दूजे की करके शिकायत,
इतराते इठलाते हैं।।
सुनके शिकायत मम्मी पापा,
मंद मंद मुस्काते हैं।
आ जाओ हम प्यार से देखें,
प्यार सिखाना चिड़ियों का।।
रोज़ शाम को---------

दिन भर चींचीं चूं चूं करके,
हल्ला खूब मचाते।
काश ये पंख हमारे होते,
हम भी गगन में जाते।।
चिड़ियों के संग उड़ते उड़ते,
सैर जगत की कर आते।
अपना भी हर रोज़ का होता,
उड़कर आना चिड़ियों सा।।
रोज़ शाम को---------

आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं,
हँसना मुस्काना चिड़ियों का।
रोज़ शाम को बाग में होता,
शोर मचाना चिड़ियों का।।
---------
गीतकार-राज़ बदायूँनी
बाजार कलां उझानी
बदायूँ उप्र २४३६३९


विषय-बाल साहित्य

आओ सीखें गिनती और अच्छी बातें

एक एक एक
कूड़ा इधर उधर न फेंक ।

दो दो दो
अजनबी से कुछ मत लो ।

तीन तीन तीन 
किसी से कुछ मत छीन।

चार चार चार
सब से बाँटो प्यार।

पाँच पाँच पाँच
ख़ुशी में सबकी नाच ।

छः छः छः 
बन जाओ अच्छे।

सात सात सात 
रहना मिलकर साथ ।

आठ आठ आठ 
बात बांध लो गाँठ।

नौ नौ नौ,
गिनती होती सौ।

दस दस दस, 
आज यही पढ़ेंगे बस ।। 

रचयिता
गीता गुप्ता "मन"


आ गया सामने से शेर

होकर मग्न पहुच गये, हम जंगल में बहुत ही दूर ।
टपक पड़ा सामने मेरे, अचानक से ही बच्चा शेर ।।

होता है शेर तो शेर ही भाई, हो चाहे वह बच्चा शेर ।
हो गयी गुम सिट्टी पिट्टी मेरी, गया मैं बड़ा ही डर।।

बोला होकर प्रसन्न वह, आज तो तुम्हें ही मैं खाऊंगा ।
खाकर तुमको ही तो मैं भी आज,जश्न बड़ा मनाऊंगा ।।

बोला ऊपर से मुस्कुराकर मैं, बच्चू कैसे मुझे खाओगे ।
हो छोटे से तुम, दाँत भी नन्हे,कैसे चबा मुझे पाओगे ।।

हो जायेगा दर्द पेट में तुम्हारे, लग जायेंगे जोर के दस्त ।
होगा कष्ट बहुत ही तुमको, हो जाओगे तुम पूरे पस्त ।।

खाने में भी मुझको, आयेगा नहीं तुमको कोई भी स्वाद ।
हड्डियाँ हैं सख्त मेरी, मांस भी है बिल्कुल ही बेस्वाद।।

खिलाता हूँ माल बढ़िया, हो जाओगे खाकर तुम प्रसन्न ।
पेश किया सिंह शावक को मैंने, टाफी तथा नमकीन ।।

कूदता फांदता हुआ शावक, चला गया मांद खुश होकर ।
पहुँचा मांद में, पहूँचा सीधा पास माता पिता के जाकर ।।

किस्सा मेरा उसने, माता पिता को अपने जाकर सुनाया ।
सुनकर जिसको, शेर बड़े क्रोध के मारे गया तमतमाया ।।

होकर लाल पीला क्रोध में, उसने मुझको जंगल में घेरा ।
कर खडे कान व आँखें कर के लाल, मुझ पर गुर्राया ।।

तूने मेरे छोटे शावक को समझकर बच्चा, है बहकाता ।
मार कर तुरन्त ही तुझे मैं इसका मज़ा हू चखाता ।।

लगा नहीं न जाने क्यों उससे, मुझको किंचित भी डर ।
कहा गरज कर मैंने तू है शेर, तो हूँ मैं भी बब्बर शेर ।।

कह कर मैंने साथ लाये लठ्ठ को, हाथ में अपने उठाया ।
सर पर शेर ही के मैंने, उसको दनादन कसकर बजाया ।।

भागा शेर तुरन्त ही डर कर मुझसे, दुम अपनी दबाकर ।
लिया सांस उसने फिर, फिर मांद में ही अपनी जाकर ।।
डा0 सुरेन्द्र सिंह यादव
“व्यथित हृदय मुरादाबादी”
स्वरचित


याद आता हैं मुझे वो प्यारा बचपन 
जिसमें था कितना अपनापन 
मन में चाँद को छू लेने की आरजू थी 
ना हंसने और रोने की कोई वजह थी .

किस्से और कहानी में जिंदगी थी 
बेपरवाह बचपन में प्यारी ख़ुशियाँ थी 
वो बचपन की बेशकीमती ख़ुशी खो गई हैं 
किस्से और कहानियां एक ख्वाब सी हो गई हैं .

उदास हैं मेरे बचपन का वो मोहल्ला 
लुका-छुप्पी खेलने वाले बच्चे इंटरनेट में खो गये हैं 
फिर से थमा दो मुझे वो बचपन का बस्ता 
जिंदगी का बोझ बहुत बड़ा हो गया हैं .

झूठ बोलते थे पर दिल के सच्चे थे हम 
उन दिनों की बातें बड़ी प्यारी थी जब बच्चे थे हम 
कोई फिर से दे दो मुझे वो मासूम बचपन 
वो कागज की कश्ती वो रिमझिम बरसता सावन .

मुझे फिर से खेल खेलने हैं बचपन के खेल पुराने 
फिर से गाने हैं बचपन के प्यारे तराने 
जी भर के हँसना और मुस्कराना हैं फिर 
मुझे एक बार बचपन जीना हैं फिर.
स्वरचित:- रीता बिष्ट


वन का राजा ( बाल कविता )

सबसे ज्यादा ताकतवर हूँ ,
पशु पक्षी सब मुझसे डरते |
जंगल पर अधिकार हमारा ,
सब वनराज मुझे हैं कहते |

मांस नहीं खाता मैं बासी ,
करता हूँ शिकार ताजा |
शेर बाघ भी मैं कहलाता ,
मैं हूँ जंगल का राजा |

मेरी एक दहाड़ से सारा ,
जंगल है थर्रा जाता |

राष्ट्रीय पशु भारत का प्यारा,
भारत का बल मैं दर्शाता |

©मंजूषा श्रीवास्तव "मृदुल "
लखनऊ , यू. पी .


तोता (बाल कविता )

              (2)
हरा हरा रंग मेरा सुंदर ,
तोता नाम हमारा है |
करूँ ग्रहण मैं अच्छाई को ,
पढ़ना मुझको भाता है |
गले लाल काली माला है ,
लाल टोंट प्यारी प्यारी |
खग कुल में हूँ सबसे ज्ञानी ,
बोली है न्यारी न्यारी |
हरी मिर्च भाती है मुझको ,
सभी फलों को खाता हूँ | 
मैं बोलूँ मानव की भाषा ,
राम नाम मन भाता है |

©मंजूषा श्रीवास्तव 'मृदुल '
लखनऊ ,यू. पी.


शायद सबके बचपन में ऐसा हुआ हो
उस को रेखांकित करती रचना
*****
एक प्रश्न बालमन को मथता रहा
एक जिज्ञासा मन मे उठती रही
कैसे हमारे बचपन की तकिया
बन अलार्म घड़ी हमको उठाती रही ।

तकिये को संदेश दे देते थे
इतने बजे उठाना ,कह देते थे
वो वक़्त की पाबंद रही,
परीक्षा मे साथ निभा देती थी ।

वो वाकया अब भी याद आता है
तकिये को देख चेहरा मुस्कराता है
क्या थी ये बचपन की नादानियाँ
या कुछ और,मन ये प्रश्न उठाता है ।

अब सवालों के जवाब मिलने लगे
विज्ञान और अध्यात्म समझाने लगे
"ध्यान "से मष्तिष्क को जो संदेश दो
तरंगे अब वो काम पूरा कराने लगे ।

हे मानुष ,ऐसा है तो

क्यो रागद्वेष नफरत में पड़ते हो
जीवन के झंझावातों मे घिरते हो
सकरात्मक संदेश दे मस्तिष्क को
क्यों नहीं सुख चैन से रहते हो ।

स्वरचित
अनिता सुधीर श्रीवास्तव


"प्यारी गोरैया"

एक चुलबुली सी गौरैया ,
मेरी रसोई में आई थी ।

तिनका एक दबाकर अपने ,
चोंच में वह लाई थी ।

लटक रहे से एक तार पर ,
तिनका उसने जोड़ा था ।

पूरी लगन से चीड़े के संग,
मिलकर नीड़ बनाई थी। 

हमारी रसोई पर करके कब्जा,
हमसे कहते वह जा! चले जा !

बंद नहीं कर सकते खिड़की, 
चीख-चीख देते थे झिड़की ।

अच्छी अपनी शामत आई, 
रहते थे हम भूखे भाई !

निर्मित करके वह घर अपना ,
फिर गौरव से मुस्काई थी ।

तैयारी जब हो ली पूरी ,
फिर बारी अंडे की आई ।

एक दिन उसमें बच्चे निकले,
उनकी मेहनत थी रंग लाई ।

चींंचींंचींंचींं चुनचुन-चुनचुन
खुश होते हम बच्चे सुनसुन

स्वरचित "पथिक रचना"


शीर्षक -"बात सभी की मैं मानूंगा"....

मैं मां की आंखों का तारा-
पिता का राजदुलारा हूं,
घर में बस रौनक है मुझसे-
लगता सबको प्यारा हूं.

आज सुबह नल के नीचे जी-
मैंने जब स्नान किया,
पता नहीं था ठंड बहुत है-
अंजाने यह काम किया.

सिकुड़ सिकुड़कर बैठा हूं अब-
ठिठुर रही मेरी काया,
दादी मेरी कितनी अच्छी -
कंबल लाकर ओढ़ाया.

दादा जी ने डांट डपटकर
मुझे धूप में बैठाया है
मम्मी पापा गए वाॅक पर-
फिर भी मन कुछ घबराया है .

दादी!भूख लगी है मुझको-
एक कटोरी दूध पिलाओ,
दादा! मेरा चिकना सिर है-
टोपी लाकर मुझे पिन्हाओ.

पहना दो अब कपड़े मुझको-
वरना थर-थर ही कांपूंगा,
अब शैतानी नहीं करूंगा -
बात सभी की मैं मानूंगा।

डा.अंजु लता सिंह
नई दिल्ली 


सच कहूँ तो मानो
बाल साहित्य का अकाल पड़ गया
जिज्ञासाओं का खेत सूखता जा रहा
बाल खिलौनों का संसार बदल रहा
इंटरनेट का जाल माई बाप हो गया
चंपक , नंदन का आवागमन बंद हो गया
परियों की कहानी पर जैसे बैन लग गया
ओनलाइन गेमों का बचपन फ़ैन हो गया
अंग्रेज़ीयत का ऐसा भूत सवार हो गया
मातरि भाषा पठन पाठन लाचार हो गया
स्वच्छंदता का ऐसा चस्का लग गया
एकल परिवारों से मसक़ा लग रहा

अभिभावकों की व्यस्त दिनचर्या हो गई
प्ले स्कूलों में अब परवरिश हो रही
21 वीं सदी का बचपन तकनीकी हो गया
डोरेमोन बाल साहित्य का नाम हो गया

संतोष कुमारी ‘संप्रीति’
स्वरचित

.
* टिक्की टी*

टिक्की टी रे टिक्की टी
चल मेरे घोड़े टिक्की टी

हरी- हरी घास खिलाऊँगी, 
नंदन वन घुमाऊँगी।
लुका- छुपी खेलूंगी 
झूला खूब झुलूंगी।

ले चल मुझे बिठाकर पीठ्ठी 
चल मेरे----
जल्दी- जल्दी दौड़ लगा,
सबसे तू आगे हो जा।
सारी धरती घूमुंगी
खुशियों से मैं झूमुंगी।

दूंगी तुझको चाकलेट मीठी 
चल मेरे---

नदियाँ, पेड़ ,पर्वत, झरना 
सबको लाँघ आगे बढ़ना। 
भागे -भागे जाना रे 
चँदा मामा को लाना रे।

दूंगी तुझको प्यारी पुच्ची 
चल मेरे-----
स्वरचित 
सुधा शर्मा 
राजिम छत्तीसगढ़
मेरे दद्दू

मेरे ददू्दू , प्यारे दद्दू 
शोर मचाते मेरे दद्दू 
लाड़ लढ़ाते डांट पिलाते 
मन मन में यूँ मुस्काते 
चोरी चुपके लड्डू खाते 
मौज मनाते मेरे दद्दू 

होली पर वे छिप जाते 
दीवाली पर बम चलाते 
मनमौजी से खूब हंसाते 
मन मोर नचाते मेरे दद्दू 

कभी-कभी तो डांट पिलाते 
पिक्चर भी हैं खूब दिखाते 
डोनट भी वह हमें खिलाते 
यूँ ललचाते मेरे दद्दू 

जो मोबाइल उनका छू ले 
हमें डराते और धमकाते 
तिल का वो ताड़ बनाते 
शोर मचाते मेरे दद्दू

मीनाक्षी भटनागर
स्वरचित

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