Sunday, March 3

" पवन/समीर"01 मार्च 2019

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             ब्लॉग संख्या :-314





देखो पवन चले पुरवइया ...

भाभी को ले आओ भइया ...
चार दिन हम भी संग रहलें 
सावन की सुखद समइया ...

भाभी बिन सूना घर लागे 
रोटी तुम्हे यहाँ कौन बनावे 
बापू गुजरे पाँच बरस भये 
अब गुजर गई है मइया ..

मेरी बहना मेरी बहना
जानूँ तुझे सदा न रहना 
पिछले बरस खेत खरीदा 
इस बरस खरीदी गइया ....

घर में भी छप्पर कराया 
तेरी भाभी को घर बनाया 
पवन झोंके जब चलते थे 
तब होती नही थी छइया ....

बहना जानूँ मैं तेरी ये पीर 
हो न अब तूँ और अधीर 
सावन की ये 'शिवम' समीर 
चल बैठ गायें हम छंद सवैया ...

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"



मलय पवन चलते झोंखे
मधुमास मधुरता छाई
वन उपवन में उड़े बहारें
सौरभता जगति में लाई
जाड़े में अति शीतल होकर
पवन कंपाती तन मन को
तेज हवाएं भू पर चलती है
पीड़ा पहुँचे है जन जन को
कालचक्र पवन प्रवर्तक है
ये मौसम परिवर्तित करती
कभी शीत है कभी उष्ण है
सुख शांति वह् जग भरती
पञ्च तत्व से जीवन बनता
प्राण वायु है प्रमुख सहारा
बढ़ता लड़ता संघर्षों से वह
नहीं कभी जगति में हारा
रवीरश्मिया पूर्व उदित हो
पवन शांति सन्देशा देती
सर्वभवन्तु सुखिनः जग हो
पवन नव सबक सिखाती
हवा प्रभंजन घन घौर घटाए
सुखद दुःखद क्रम चलता
ममता दया करुणामय हिय में
सुख निर्झर अविरल बहता ।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

विधा-दोहे

ईश्वर ने धरती रची , रचा सकल संसार
पवन नाम है प्राण का,महिमा अपरंपार।

ग्रीष्म ऋतु धरती जले, बढ़ती जाती पीर
तन ज्वाला शीतल करे,बहती मंद समीर।

नही पवन सा है बली,नही पवन सा प्यार
क्रोधित हो विध्वंस हो , निर्मल करे दुलार।

रावण की लंका जली, शुरू किया अभियान
काज किये सब राम के , पवन पुत्र हनुमान।

मत इसको दूषित करो,पवन न बांधा जाय
जो कुछ दोगे तुम इसे , तुमको ही पहुचाय।

~प्रभात
स्वरचित
विधाःःःगीतःःःः

मस्त पवन पुरवैया प्यारी
चलै खूब जा सबसै न्यारी
आऐ बसंत घर सबई के,
सुरभित समीर बहे भुनसारी।
मस्त पवन पुरवैया प्यारी..........
आजा तू अब कृष्ण कन्हैया
अच्छौ लगथै मुरली बजैया
पनघट बैठ मथनिया फोरै
रोवत हैं सब गोपी न्यारी।
वहे मस्त पवन पुरवैया प्यारी.......
लच्छन तेरे बहुत बिगर गये
जैसे तेरे रूप निखर गये
फैली कैसी कारी घटाऐं
जा बदरा सै तेरी यारी
चले मस्त पवन पुरवैया प्यारी........
रूपरंग तेरो अच्छौ लगथैगौ
नटखटपन तेरौ फबथैगौ
सब लेथैंगे तेरी बलैयां
कैसै तू ऐसौ सजथैगौ
तेरी कौन सगी महतारी
चले मस्त पवन पुरवैया प्यारी..........
तू चाहै जित्तौ परेशान हमें करलै
सबकौ माखन मुंह मे भरलै
लेकिन जरा सौ रास रचा दै
मधुवन सारौ सुरभित करदै
फूल जाऐं सारी फुलवारी
चले मस्त पवन पुरवैया प्यारी........
आऐ बसंत घर सबई के 
सुरभित समय र चलै भुनसारी।

स्वरचित ःस्वप्रमाणित
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

पवन

बीत चली ठंडी महक 
पवन सुहानी बहने लगी
भोले ने बजाया डमरू
भांग की महक उड़ने लगी

पवन बसंती 
ने छूआ आसमां
हुलियारों की
निकली टोली 
रंगों ने बांधा समां 

पवन में लहराये 
तिरंगा
देश विदेश तक
परचम फहराये 
बात जब हो 
देशभक्ति की
सब को भाए 
तिरंगा

मनभावन है 
शीतल पवन
मन-मष्तिक 
हो जाए मदहोश
ऐसे प्यारे 
भारत देश का
हर कण कण लगे
सुहावन

स्वलिखित लेखक संतोष श्रीवास्तव 
भोपाल


"पवन/समीर"
हाइकु
1
मंद पवन
महका मधुवन
बौराया मन
2
उड़ी पतंग
दूर नील गगन
संग पवन
3
यादें क्यों लाई
पवन पुरवाई
रामा दुहाई
4
वसंत संग
झूमे धरा गगन
मंद पवन
5
बेचैन मन
मदहोश पवन
लगी अगन
6
पवन पुत्र
शत्रु का यमदूत
हमारी सेना

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल

विधा / हाइकु
विषय - पवन


पवन पुत्र
हृदय बसे राम
परम भक्त

पवन गति
गहन झंझावात
आंधी तूफान

मन्द बयार
पुलकित हृदय
मनभावनी

शीत पवन
कांपता तन मन
ठंड गहन

सर्द मौसम
ठिठुरता शरीर
पवन वेग

शरद ऋतु
तीव्र पवन गति
बिखरी धुंध

मन्द मलय
सुगन्धित चमन
भौंरा गुंजन

सरिता गर्ग
स्व रचित


विधा-हाइकु

1.
पवन पुत्र
करें सबके काम
जय श्रीराम
2.
पवन पुत्र
ले आया संजीवनी
राम का भक्त
3.
मीठी सुगंध
उड़े संग पवन
हर्षित मन
4.
ठंडी पवन
सुहावना मौसम
मिटाए उष्म
5.
पवन संग
दौड़ पड़े बादल
बरसने को

स्वरचित
अशोक कुमार ढोरिया
मुबारिकपुर(झज्जर)
हरियाणा


नहीं मिली है मुझे वफ़ा की पवन कहीं से ।
करती पीछा रही जफ़ा की पवन कहीं से ।
ख़ुद ग़रजी का प्यार हृदय है व्याकुल इतना,
हसरत है मिल जाय शिफ़ा की पवन कहीं से ।।

(02)समीर
मेरे आँगन में आई है खुश्बूदार समीर निराली ।
क्यूँ इतनी चाहत लाई है खुश्बूदार समीर निराली ।
बन्द पड़ा था ताला दिल का हौले-हौले खोल रही है,
बेहद दिल को सुखदाई है खुश्बूदार समीर निराली ।।
स्वरचित- "अ़क्स "दौनेरिया



हाइकु 
विषय:-"पवन " 
(1)
"पवन"घोड़े
बैठ के आये मेघ
सूखे को देख
(2)
दिखे ना टिके
मौसम की गोद में
"पवन" खेले
(3)
अँगुली सँग
बाँसुरी रँगमंच 
नाचे "पवन"
(4)
पवन करे 
मौसम की चुगली
तन संभले 
(5)
सुमन चूमें
फागुन की हवाएँ
मन को छुए
(6)
छेड़ती नाक
"पवन"पीठ पर
गंध सवार

स्वरचित 
ऋतुराज दवे

विधा :-पद्य

पागल अल्हड़ हवा बसंती 
भोर के तारे संग जागती ।
कलियों के मुख चूम चाट के ,
रख कर सिर पर पाँव भागती ।

स्वर्ण गेंदे पर रुकती पल भर, 
करती चम्पे से है मनुहार ।
महुए की गंध से है बौराई,
निर्लज्ज हुई करती अभिसार ।

आम मंजरियों संग झूलती 
मस्तमौला बन निडर घूमती ।
गेहूँ बालियों को झकझोर के ,
पुष्प पीत सरसों के चूमती ।

शीतल मंद सुगंध से बहती ,
उतर के मलयाचल से आई ।
संयोग प्रेम को करे रोमांचित , 
विरह अग्नि को करे सवाई ।




बावरी हवा को देख घूमते , 
कर शिंगार ऋतुराज आ गया ।
नभ जल थल प्राणी जगत में ,
प्रेम मिलन उन्माद छा गया ।

भ्रमरावलियाँ संग तितलियाँ ,
मुख कलियों के चूम के गाएँ ।
गा गाकर उपवन में लिखते 
मनसिज रति की प्रेम कथाएँ 

छुप कर बैठी आम्र पल्लव में ,
बोल प्रखर वनप्रिय है बोले ।
पंचम स्वर में गाए विरह को ,
हो निस्संग रति रंग को घोले ।

एक छलाँग में पवन बसंती , 
लेती महल कँगूरों को नाप ।
दूब बिछौने पर अगले ही पल , 
लेटती नयन मूँद चुपचाप ।

स्वरचित :-
ऊषा सेठी 
सिरसा 125055 ( हरियाणा )
पवन पुत्र 
बजरंग बली जी 
श्री राम प्रिय |

ये पंचतत्व 
शरीर संरचना 
आधार जीव |

जीवन नहीं 
संचालित प्रक्रिया
पवन श्वांस |

पवन गति 
सुख दुख प्रवाह 
बदले रंग |

स्वच्छ पवन 
जीवन का आधार 
करें प्रयास |

वातावरण 
अप्राकृतिक गैसें 
बिषैला करें |

सुबह सैर 
लाभदायी पवन 
निरोगी तन |

अभिनंदन 
लौटे देश पवन 
सुस्वागतम |

स्वरचित , मीना शर्मा , मध्यप्रदेश





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