Tuesday, March 12

"मेघ/बादल " 11मार्च 2019

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             ब्लॉग संख्या :-324
िधा- कविता
*************
मेरे दिल की जमीं ,
कब से सूखी पड़ी है, 
मेघ बनकर बरसो सजन, 
कब से आँखें बिछाये खड़ी हूँ |

विरह की अग्नि में, 
किस कदर जल रही हूँ, 
मेघ बनकर बरसो सजन,
मैं इंतजार में कब से खड़ी हूँ |

तरसते हैं नैन मेरे, 
झलक तुम्हारी पाने को, 
मेघ बनकर बरसो सजन, 
सूख जाये न कहीं नैनों का पानी |

स्वरचित *संगीता कुकरेती*

बारिश की बूँदों सी बन आ जाओ कभी
खुशी की बदली बन कर छा जाओ कभी ।।

देखो कब से वीरान है ये दिल का चमन
दिल का चमन फिर मंहका जाओ कभी ।।

मौसम ए बहार हमसे रूठी है कब से 
बिन मौसम की बारिश ही कहाओ कभी ।।

गीत मल्हार हम भी कुछ गा लें 'शिवम'
मायूस दिल के भाग्य जगा जाओ कभी ।।

सुन पपीहे की पीऊ पीऊ दिल रोये है
दिल को ढांढस आके बँधा जाओ कभी ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"


आज का शीर्षक-'मेघ/बादल'
विधा-मुक्तक (द्वय)
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(1) मेघ
इच्छा है मेघों के ऊपर जमे धाक स्यन्दन की।
नहीं टूटने दें हम दोनों डोर प्रेम बन्धन की ।
यह जग वाले,प्रणय विरोधी कोप भले बरसाएँ,
हमने कशकर पकड़ रखी है शरण नंद नंदन की ।।
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(2)बादल
जिगर के दरम्याँ आकर मेरे अफ़सोस बस जाता ।
नहीं आते जो तुम साहब जिगर मेरा तरस जाता ।
हज़ारों मिन्नतें करके मैंने बादल को रोका है ,
बगरना भींग जाते तुम अगर पानी बरस जाता ।।
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@"अ़क्स" दौनेरिया


बादल घिरे अकास पे ,याद पिया की आय बारिश धरती पे गिरें ,अखियन जल बरसाय

पहली बूंदे धरा पर ,जब बादल टपकाय
बूंदे माटी से मिलें , सौंधी खुशबू आय

बादल नभ में जब घिरें ,सबका मन हर्षाय
कागज की नैया बहे , बालक शोर मचाय

नभ में चमके बिजुरिया , मनवा सिहरा जाय
पवन वेग से बादरा, पिय को लिया लिवाय

घन गर्जत आकास में नींद न हमको आय
आओगे कब साजना , मौसम बीता जाय

सरिता गर्ग
से रचित


मेघ गरजते मेघ बरसते
मेघों की अपनी लीला है
नीले पीले काले मटमैले
दूर गगन यह सिलसीला है
बादल पानी को जग देते
जिससे जीवन का संचरण
बिन जल के है जीवन सूना
हर प्राणी जरूरत आमरण
शस्यश्यामल वसुधा हँसती
प्रकृति पावन हरी हरी है
बिन पानी के जग है सूना
फसल सूखती मरी मरी है
जल जीवन है जल सर्वोपरि
जलदाता मेघा हैं पावन
मेघा हरषे बरसे वसुधा पर
चलता नित आवन जावन
सागर नदियां ताल तलैया
निर्भर करता है मेघों पर
यही सदा मरहम जीवन
लेप लगावे दुख दर्दो पर
श्यामल मेघ बिना क्या जीवन
दूर गगन का यह सृंगार है
काले बादल पानी बरसा दे
तब ही जगति में बहार है
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

तुम मेघ बनो घनश्याम बरस जाओ।
प्रभु कृपाकर स्वयं प्रेम बरस जाओ।
जय शिवशंकर भजन करें डमरूधर,
दीनबंधू दया कर हम पै तरस खाओ।

बादल बन हम सभी जन पर बरसें
ज्यूं गंगाधर की जटाओं से गंगधार।
हम सब द्वार खडे तुम्हारे दयानिधि,
पार लगाओ शिव हम पडे मझधार।

हे गंगाधर तुम सदा ऐसे बरसो कि,
हर मन मंदिर ही पुलकित हो जाऐ।
चहुंओर फैले खुशहाली दुनिया में,
हर किसान मन प्रफुल्लित हो जाऐ।

बहे प्रभु प्रेम प्रीत रसधार धरा पर,
हर घर घनश्याम सांवरा नृत्य करें।
बस मेघदूत बन खुशियां छा जाऐं,
जितना संभव हो हम सुकृत्य करें।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.


मेघ से स्वर्णिम आशा....

धरा आकर कह रही है....

मेघ से अपने पिया का
गूढ़ चुंबन पाऊं आज
देह तृप्ति हो रसधार से
सावन की सुधि आई आज
मेघ गंभीर अकुलाई आज
मिल गया मुझे आज
असिंचित अंबर का प्यास
गंध व्याकुल कर गई
मेरी मूर्छित श्वास को
स्पर्श छुवन भड़क गई
उस सुनहली आग को
बूंद प्यासी स्वयं थी
पी रही थी रूप को
झिलमिलाती स्वप्न दूर
नीर तृप्ति कर रही थी भू को.....

स्वरचित..
सत्य प्रकाश सिंह केसर विद्यापीठ इंटर कॉलेज प्रयागराज


मुक्तक प्रयास 
मेरा विषय -बादल और धरती 
काले काले बादल आये, 
धरती को व्यथित कर जायें l
प्यास बढ़ाते है धरती की, 
उमड़ घुमड़ कर वापस जाएं ll

बदरा तू क्यों तरसाता है, 
बरस क्यों नहीं जाता हैl
विरही बेचारी तरसे है, 
नहीं गले उसे लगाता है ll

बिन तेरे सब कुछ सूखा है, 
किसान बेचारा भूखा है l
अब तो बरसो बैरी बदरा, 
बिन तेरे सब कुछ रुखा है ll

देखो.. प्रकृति भी उदास है, 
उसे भी यही तो आस है l
अबकी बार तो काले बादल, 
बरसोगे तुम विश्वास है ll
कुसुम पंत उत्साही 
स्वरचित 

देहरादून

ग़ज़ल,
सपने में तुम बहुत आते हो,
पांच बरस के बाद आते हो।।१।।
पतझड़ सा शापित जी वन है,
झूठे बहारें क्यो दिखाते हो।।२।।
पाहुन मेघ की तरह आते हो,
गीत सावन के गाते हो।।३।।
सपने देखे कितने नदी ने,
इशारों से क्यो बुलाते हो।।४।।
प्यार को प्यार ही रहने दीजिए,
क्यो घुमाकर बातें करते हो।।५।।
देवेन्द्र नारायण दास बसना छ,ग,।

विधा-हायकू

छाए है मेघ
व्याकुल है धरती
प्रेम बरसे

उमड़ रहे
पलकों पर मेघ
मोती ढलके।

छाए बादल
चातक निहारता
स्वाती की बूँद

मेघ गर्जन
व्याकुल विरहन
कहाँ हो प्रिय।

काले बादल
बाहरी सजावट
नीर रहित।

फट पड़े है
गरजते बादल
दर्द दरिया।

संजोयी आस
खूब गरजे मेघ
परदेशी थे।

स्वरचित
गीता गुप्ता 'मन'


कब होगा मेघों आगमन 
तप्त धरा का हर एक कोना
व्याकुल हो राह देखें नयन
तुम बिन तरस रहा जीवन 

सूरज अग्नि-सी बरसाए ऐसे
क्रौधित हो रहा धरती से जैसे
नदी तालाब में घटता जाए पानी
जीना दूभर हो रहा बरसा दे पानी

बहते हैं अब आंखों से आँसू
तेरे इंतजार में प्यासी आँखें
सूखी पड़ी धरती खेतों की 
जमकर बरसो तो हो जाए हरी-भरी

मेघों अब तुम तपन मिटा दो
कर दो तृप्त प्यासी धरती को
भिगोकर तन-मन वशुंधरा का
पहना दो धानी चूनर वशुधा को

अब इंसानों की तरह ही
मेघों तुमने भी जज़्बात बदले हैं
कहीं आफत बन बरसते हैं
तो कहीं सुखद अहसास देतें हैं
***अनुराधा चौहान***© स्वरचित


CM Sharma II 
विधा: नवगीत - कारे कारे बादल आये (१६ मात्रिक)

कारे कारे बादल आये....
मन मेरे को नाच नचाये....
बिजली चमके मेघा गरजे...
मनवा मेरा डर डर जाए...
कारे कारे बादल आये....

देखूं राह मैं चढ़ अटरिया.. 
कब आएंगे पिया नगरिया 
घूमूं पागल मैं इधर उधर...
पायलिया भी बिखरी जाए....
कारे कारे बादल आये....

आग लगे काले सावन को...
बैरी बरसे है जम जम जो...
साजन कैसे घर को आये....
नदिया नाले भर भर आये...
कार कारे बादल आये....

मुझ बिरहन की है कौन सुने...
जग न सुने मेरा मन न मने...
अपना चहरा मुझे न भाये...
ऊपर से दर्पण दे डराए...

कारे कारे बादल आये....
मन मेरे को नाच नचाये....

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II 

विषय - बादल

मन के आकाश पर बादल से छा जाओ
अंखियों में मनमोहक ,सपने भर जाओ
ढूंढें तुम्हें नयना मेरे , हर पल जहान में
कहीं से अचानक ,मेरे सामने आ जाओ

बदली सी अँखियों में , घिर घिर आती है
बासन्ती हवा भी क्यों ,बैरन बन जाती है
जब से गये हो , हमें भूले तुम सजना
फूलों की नरम सेज कण्टक बन जाती है

पल पल अंचला , मैं अपना भिगोती हूँ
यादों की हरदम मैं , माला पिरोती हूँ
बादल बन कभी मेरे अँगना बरस जाओ
मन पर अनेक भारी , पाथर मैं ढोती हूँ

सरिता गर्ग


अरे बरखा अब तो तु बरस 

नाचे मन मोरा होके पागल

कब बहेगा मेरे नैनो का ये काजल

छा गई घटा ,मचल गए बादल

खिल गई कली ,भंवरा हुआ पागल

बावरा हुआ मोर, चातक हुआ घायल

गोद भरेगी की धरा की,

खिल उठेगा सूनी आंचल

तब छम- छम बाजेगी मेरी पायल

बिजली चमकेगी ,बादल गरजेंगे

नीर गिरेगें ,भर देंगे प्यासे गागर

कब तक मृग दौड़ेगा मृगमरीचिका में,

हो जाते उसके पांव घायल।

धरा कहती अंबर से......

वर्षों से हूं मैं प्यासी

आज मिटा दे मेरी उदासीः

मैं हूं तेरी सबसे प्रिय दासी

कबीर के दोहों की रैदासी

जायसी के कलम की प्यासी

पानी के बूंदों की तासी

अधेंरा छटेगा होगा अजोर

विचलित मनवा होगा विभोर

अरे बदरा अब तू जम के बरस, थम के बरस

सत्य प्रकाश सिंह केसर विद्यापीठ इंटर कॉलेज प्रयाग राज


चंद हाइकु 
********
(1)

सूखी धरती
बरसा न बादल
प्यासा इंसान 

(2)
ख्वाब बादल
अरमान सजाये
हवा हो गये

(3)
काले बादल
प्रकृति को लुभाये
धरा हर्षाये 

(4)
मेघ गरजे
पपीहा गीत गाये
प्यास बुझाये

(5)
साजन आये
मेघ संदेशा लाये 
मन हर्षाये 

स्वरचित *संगीता कुकरेती*


गीतिका
---------

बादल तज बूँदें चली, प्रिय वसुधा की ओर,
ठुमक ठुमक कर नाचती, होकर आत्मविभोर।

स्वागत वसुधा ने किया, हिरदय लिया समाय,
दूब हरी होने लगी, मन में उठी हिलोर।

धन्यवाद वसुधा करे, बादल का सौ बार,
बरसो प्रियतम जोर से, बनो घटा घनघोर।

कण-कण मेरा प्यास से, तड़पा है दिन-रात,
तृषा मिटे, तब दिल हँसे,हे मेरे चितचोर।

तुम बिन मेरी जिन्दगी, देती कष्ट अनेक,
इंतजार तेरा करूँ, ज्यों चँदा का चकोर।।
~~~~~~~~~~
मुरारि पचलंगिया


मेघ घनेरे घिरते हैं आज भी उसी तरह
और बरसती है बारिश की बूंदे ,आज भी उसी तरह।

पर उन बूंदों को देखकर ,
अब खिलखिलाने को जी नहीं चाहता
बिन तेरे दामन लहराने को मेरा जी नही चाहता।
नही अब हरियाली आंखों को भाती है 
नही अब जुल्फें मस्ती में इतराती है
नागिन सी डसती है बिरहा की रातें
खंजर सी चुभती है तेरी यादें।
बारिश की बूंदों में अब 
छम -छम नहीं होती।
बिरहा की अग्नि मद्मम नही होती,
रोज मेघ घिरते है,, रोज बारिश मेरे शहर में होती हैं,,
अब भी " रश्मि"
पर अब पहले जैसी नही होती।
- रश्मि की कलम से

विधा=हाइकु 
🌧🌧🌧🌧
(1)ह्रदय मेघ
बरसा रहा खूब 
भावों के मोती 
🌧🌧🌧🌧
(2)इंद्र है खुश
फोड़ मेघ गुब्बारे 
मनाए होली
🌧🌧🌧🌧
(3)छाए बादल
सूरज भी सहमा
हुआ अंधेरा 
🌧🌧🌧🌧
(4)उड़ा गुलाल
बने रंगीन मेघ
बृज की होली
🌧🌧🌧🌧
( 5)ज्ञान के मोती 
अज्ञान के बादल
हटा के वर्षा 
🌧🌧🌧🌧
(6)बादल देख
रेगिस्तान हर्षाया
निश्चित वर्षा 
🌧🌧🌧🌧
(7)धरा कम्पित 
मेघनाथ गर्जन
करे तांडव 
🌧🌧🌧🌧
====रचनाकार ====
मुकेश भद्रावले
हरदा मध्यप्रदेश 

**तुम कभी तो बुलाओगे** 
*
****************************************
आस लगी रही तुम कभी तो बुलाओगे 
प्रेम की बारिश से मुझे नहलाओगे। 

दिल के दरमियान है खालीपन पसरा 
अपनी मधुर वाणी से मन हुलसाओगे।

जीवन हो गया है अब ताप से व्याकुल 
शीतल मेघ के बूँद से हर्षाओगे।

सारे सुख औ वैभव त्याग किया हमने
आकर मुझपर सरस स्नेह बरसाओगे।

जीना चाहती खुशी से अपना जीवन 
उदासी से अब तो पीछा छुड़ाओगे।

वक्त है आ मिलकर जीवन संवार लें 
जुदाई के गम से अब तो उबारोगे। 

इस प्रेम - आँगन में हसीं बहार लाकर
कुसुम सौरभ से तन-मन महकाओगे।

नैन में प्रेम की ज्योति जलाकर साजन
तेज धवल प्रभा हर ओर बिखराओगे।

बिखरा - बिखरा-सा है जो जीवन मेरा 
अपने प्रेम की बारिश से सरसाओगे।

जोड़ कर अपने नाम से तुम नाम मेरा
गुमनामी से निकाल मुझे चमकाओगे।
************************************
-- रेणु रंजन 
( स्वरचित )


लघु कविता 
⛈️⛈️⛈️⛈️⛈️⛈️⛈️
बादलों के उस पार है,
एक सपनों का शहर,
संग तेरे रहता है कौन,
कभी ना बताता है तू।

रंग रुप बदलता रहता
झलक दिखाके लुभाता
रातों को मन में शोर मचाके
दिल में अगन लगाता है तू।

कभी फूहार कभी रसधार
बनकर बरस जाता है तू
प्यासी धरती अतृप्त अधरों से
हरवक्त निहारती ही रहती..
सावन मे प्यास बुझाता है तू।

छुकर मेरे अन्तर्मन को
गगन की सैर करता है तू
सपनों का आशियां सजाके
दिल को मेरे जलाता है तू।।

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल


**************************
सुन धरा के करुण स्वरों को,
#मेघ आलिंगन को आतुर हुए!

तप्त धरा की क्षुधा मिटाने,
#मेघ चुंबन को आतुर हुए !

सुन पुकार जलते हर कण की,
खुद समर्पण को आतुर हुए !

उमड़-घुमड़ कर सौदामिनी भी,
भू विसर्जन को आतुर हुए !

जो सुख गया जल बिन जीवन,
भिगोने तन -मन को आतुर हुए !
**************************
राजेन्द्र मेश्राम "नील!"
चांगोटोला ,बालाघाट ( मध्यप्रदेश )

***************************************
बादलों के पार बादलों से मिलने चली
अनजानी सी ...पर खुशनुमां थी गली
स्याह मेघों का देख इक समन्दर यहाँ
श्वेत मेघों बीच मची हुई थी खलबली
कतरा कतरा बादल रुई के फाहों से
ज़ी चाहता भर लूँ अंक दोनों बाँहों से
शब्दों में बयाँ हो न सके ऐसा नज़ारा
प्रफुल्ल हृदय की तंरगों में बजे इकतारा
आज मै ऊपर और .....आसमाँ नीचे
मन के घोड़ों की रास कौन आ खींचे
रजनी रामदेव
न्यू दिल्ली




🍁
बादलों के पार, उसका छोटा सा संसार है.......।
अनकही सी अनसुनी, वो दिव्य सा संसार है...॥

🍁
उसमे रहते है मेरे अपने, जो अब है पास ना....।
मेरी ''प्रीती'' भी छुपी है, बादलो के पार हाँ.....॥

🍁
कौन देखा था उसे, कब कौन जान पाया था...।
जानने से पहले वो यमराज बन कर आया था.॥

🍁
तोड के सारे ही बँन्धन, आज ना वो पास है....।
बादलो के पार उसका, छोटा सा संसार है......॥

🍁
देखते रहना मुझे, तुम अपना वादा याद कर...।
मै भी ना तोडूँगा वादा, बात पर विश्वास कर...॥

🍁
बादलो के पार से तुम , मेरा रस्ता देखना.......।
वादा पूरा करके अपना, आऊँगा मै भी वहाँ....॥

🍁
फूल सा दिखता हृदय मे, काँटो का आर्डण्य है.।
शून्य है प्रारम्भ मेरा, शून्य मेरा अन्त है..........॥

🍁
शेर के तपते हृदय का अनकहा सा सत्य है......।
शून्य है प्रारम्भ मेरा शून्य ही अब अन्त है.......॥

🍁
....
🍁 .. Sher Singh Sarraf


ओ ! बादल कारे......
****************
अबकी बार ओ ! बादल कारे 
ऐसे बरसना मेरे द्वारे,
न तन प्यासा रहे,न मन
रिमझिम का हो गुँजन
सोंधी मिट्टी से महके घर आँगन!

अबकी बार ओ ! बादल कारे 
ऐसे गुनगुनाना मेरे द्वारे,
जिंदगी गुलज़ार हो जाए
दुल्हन सा सिंगार हो जाए
प्यार की फुहार हो जाए !

अबकी बार ओ! बादल कारे
ऐसे महकना मेरे द्वारे,
फूल महके गली गली
पखेरु चहके डाली डाली 
सिंदूरी शाम सी फैले लाली !

अबकी बार ओ ! बादल कारे
ऐसे थिरकना मेरे द्वारे,
पायल की रुनझुन हो पाँवों में 
मन मयूर गीत गाए पीपल की छाँवों में ।
गूँजे मंगल गान गाँवों-गाँवों में !

अबकी बार ओ ! बादल कारे 
ऐसे संवरना मेरे द्वारे
इंद्रधनुषी हिंडोलन हो 
सपनें के झूलते तोरन हो 
रिमझिम बरसता सावन हो !

अबकी बार ओ ! बादल कारे 
ऐसे बरसना मेरे द्वारे....!!!
(C)सर्वाधिकार सुरक्षित ....भार्गवी रविन्द्र

रुक जा ठहर जा बादल ,
मेरा दिल पुकारता है |
तुम रूठा करो न मुझसे ,
बस इतना चाहता है |

कब से धरती लगाये आशा ,
धानी चुनर वो ओढे |
कहीं सजने संवरने का ,
मौसम यूँ ही न बीते |
सावन की घटाओं को ,
मौसम पुकारता है |
बरसो काली बदरिया ,
यही पपीहरा चाहता है|...........

पूछते हैं सब आपस में ,
जग में नर और नारी |
गलती हुई क्या हमसे ,
जो रास्ता भुला दी |
अब दूरियाँ मिट जायें ,
यही वक्त पुकारता है |
यहाँ तृषित है हर पंछी,
बस उर तृप्ति चाहता है |.........

बादल तो हैं पर उपकारी ,
सब ने बात यही कही |
होते जग के पालन हारी ,
दुनियाँ निर्भर उन पर रही
हैरान हर शय दुनियाँ की ,
अब तुमको पुकारती है |
सुन लो पुकार सब की ,
प्रकृति यही तो चाहती है |...............

स्वरचित , मीना शर्मा , मध्यप्रदेश 

आसमान में छाए बादल,
सबका मन हर्षाए बादल।

काली घनी घटाओं संग,
सबकी चाहत बरस जाए बादल।

सुखी पड़ी हैं धरती सारी,
नदी तालाब भर जाए बादल।

खुश हो जाये हर किसान,
धरती हरी भरी हो जाए बादल।

हो जाये मौसम भी हसीन,
गर्मी से निजात मिल जाए बादल।

सुन लो सबकी एक पुकार,
अब तो बरस जाए बादल।

हो हंसी सबके चेहरे पर,
ऐसा अहसान कर जाए बादल।

स्वरचित
बलबीर सिंह वर्मा
रिसालियाखेड़ा सिरसा (हरियाणा)


विधा -हाइकु

1.
आकर मेघ
करते झमाझम
खूब बरसे
2.
पवन कुंभ
आया मेघ बन के
लेकर जल
3.
उड़ा गुलाल
बादल हुआ लाल
होली के दिन
4.
बादल संग
अंबर भरे रंग
इंद्रधनुष
5.
काले मेघों पे
सजकर आ बैठा
इंद्रधनुष
6.
मेघ बुलाने
उठते स्वागत को
प्यासे पादप
7.
ताकते मेघ
वर्षा इंतज़ार में
प्यासे दादुर

स्वरचित
अशोक कुमार ढोरिया
मुबारिकपुर(झज्जर)
हरियाणा


हाइकु
विषय:-"बादल/मेघ"

(1)
जीवन भरा
बादलों के कलश
अमि छलका
(2)
बूँदे अशर्फी
मेघ पोटली खुली
धरती धनी
(3)
पवन घोड़े
बैठ के आये मेघ
सूखे को देख
(4)
धरा कल्याण
बादल के हाथों से
बूँदो का दान
(6)
दुःख उमड़ा
बादल सा घुमड़ा
आंसू की वर्षा
(7)
नेह से भरे
धरती को चूमने
बादल झुके
(8)
नौकाएँ बन
आसमाँ के सागर
तैरते घन
(9)
बूंदे समेट
परदेसी बादल
विदा में रोये
(10)
रवि को देख
सागर की बाहों में
फिसले मेघ
(11)
सावन घर
बादलों का पहरा
छुपी किरण

स्वरचित
ऋतुराज दवे


काली अँधेरी रात
विलुप्त चाँद।
गगन में काले बादलों का डेरा
अम्बर के आनन को कालिमा ने घेरा
चमक रही बिजलियाँ
ऊर्ध्वमुखी उँगलियाँ
नीरव-भंजक गड़गड़ाहट
मन मे अकुलाहट
घरों में दुबके हम
जाने कबतक सुबके हम
द्विविध मानस,अलस,अवसाद
आतुर-उर,पुर विवाद
बरसता है मेघ
या मन का उद्वेग
टूटता सब्र,
दो-दो अभ्र
अम्बुद क्यों बने जल-सिक्त?
कौन सा गम कर रहा रिक्त?
बरस,मिटा धरा का ताप
मिटेगा मन का सन्ताप
-©नवल किशोर सिंह
स्वरचित


दिनभर के काम से थककर
रात को जब आती हूं बिस्तर पर
तुम्हारी याद के काले-काले बादल
छा जाते हैं मेरे सुने सुने दिल पर
और बरस पड़ती हैं आँखे मेरी
बेऋत की बरसात की तरह।

काश कि कोई झोंका हवा का
उड़ा ले जाए इन बादलों को
दूर कहीं विराने में बरसने के लिए।
ताकि मैं सो सकूं सुकून से।
मेरे पत्थर बन चुके दिल को,
अब जरूरत नहीं रही इनकी।।
स्वरचित- निलम अग्रवाल, खड़कपुर


अ बादल अब तो बरस जा,
तपती धरा की प्यास बुझा दे,
सौंधी-सौंधी मिट्टी की महक,
चारों ओर तू महका दे,
देख घटा काली-काली,
फैला पंख नाचे मोर,
रंग -बिरंगे खिले फूल,
कूहके कोयल चारों ओर,
शीतल हवा ने जब छुआ,
सिहर गया मेरा बदन,
रिम-झिम सी बूँदों को छूकर,
खिल गया सारा चमन,
सुन बादलों की गड़गड़ाहट,
कृषक भी मुस्काया है,
मेहनत रंग लाएगी,
पसीना इसने बहाया है,
नभ दामिनी ऐसे चमके,
पिया मिलन को जैसे चली,
अविरल बूँदों से मिलकर,
अतृप्त वसुधा खिली।
*****
स्वरचित-रेखा रविदत्त
11/3/19


लगता आतूर मेघ...
धरा के आलिंगन को...
बरसाता नेह धार वो..
प्रकृति के सिंचन को..
स्वाति बूंद बरसा वो..
देता राहत अकिंचन को...
उमड़ घूमड़ की गड़गड़ाहट...
धड़ाधड़ नाद सावन आहट..
तड़ातड़ सी तड़तड़ी..
चमचम चमक क्षणिका की...
तड़ तड़ तड़के ऐसी...
स्वर उद्वेलित गायिका सी...
श्याम रंग लिये मेघराजा...
अब तो प्यास बुझा जा...
विनय करत कर जोड़े..
वसुधा आँगन सजा जा...

स्वरचित :- मुकेश राठौड़


यह मनभावन से न्यारे मेघ 

नित नव वीथिका सजाते मेघ 
रंगोली गगन रचाते मेघ 
हर पल में यूं रूप बदलते 
लुकाछिपी संग खेल खेलते 
ये मनभावन रतनारे मेघ
यह मन भावन से न्यारे मेघ

कभी शितिकंठ नचाते मेघ
सिंहनाद से ज्यूँ गरजे मेघ 
दादुर धुन से बनते गाने 
कोयल छेड़े अपनी ताने 
ये मनभावन मतवारे मेघ
ये मनभावन से न्यारे मेघ 

कभी विरह की आग लगाते
कभी मिलन की आस जगाते
कभी प्यार की कली खिलाते
मन सागर में भंवर उठाते
ये मनभावन कजरारे मेघ
ये मनभावन से न्यारे मेघ

मीनाक्षी भटनागर
स्वरचित


"चाँद बादल की लुक्का छिप्पी"

आज चाँद के नूर पे देखो
फिर बदरी सी छायी है ,
मौसम है कुछ महका बहका
चंद्रिका घूंघट ओट कर आयी है ,
क्या पीया मिलन को जाना है
जो यूं सिमटी सकुचायी है ,
अंखियां ऐसे झुकी कि जैसे
पहली मिलन रुत आयी है ,
कभी छुपाये खुद को
बादल के मृग छौनो में ,
कभी झांकती हटा घटा
घूंघट के कोनो से ,
निशा , चुनर तारों वाली
झिलमिल झलकाती है ,
और कभी नीला नीला
अपना आंचल लहराती है ,
आज बादलों ने देखो
चाँद से खेली छुप्पम छुपायी है ।
स्वरचित
कुसुम कोठारी ।

विधा-हाइकु
विषय-'घन"

चली पवन
है सुहाना मौसम
छाए हैं घन।

सुनो पुकार
बरसो अब घन
खुश हो मन।

गरजे घन
दामिनी भी हर्षायी
चली पूर्वाई।

बरसे घन
हैं हरियाली छाई
धरा हर्षायी।

रचनाकार:-
राकेशकुमार जैनबन्धु
रिसालियाखेड़ा, सिरसा
हरियाणा


सवैया छंद

बरसात पर कुछ विशेष छंद, ,बदरा,घन
÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷
सुंदरी सवैया छंद = 112 112 112 112,,112 112 112 112 2 अंत तुकांत के साथ दो गुरु
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बरसात सुहानि लगै मनको, बरसै बदरा मन भाय सखी री/
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झरती बुॅदिया सरसै जियरा,झुमिकै हॅसिकै मन गाय सखी री/
÷
कहुॅ कूकति डारन कोयलिया,कहुॅ मोर पॅखा झलकाय सखी री/
÷
प्रिय संग अनंग रिझाय रह्यो,अभिसारहि- प्रेम जगाय सखी री//
÷
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÷
परदेश गए सजना अपने ,हियरा महि याद सतावन लागे /
÷
घनघोर घटा बिजुरी चमकै ,,,,गरजै बदरा डरपावन लागै /
÷
बरसात सुहात तबै सजनी,जब प्रीतम संग मुस्कावन लागैं /

अभिसार करें, उमगैं सजनी,बरषा ऋतु नारि लुभावन लागै //
÷
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ब्रह्माणी वीणा हिन्दी साहित्यकार


निर्विवाद मेघ गर्जन करते आगाज......
.
चहूँ और प्रकृति करती आह्लालाद
गर्जन से मेघ होते आज आजाद
प्राची का अरुणिमा मस्त बिहान
इंद्रदेव आते सवार होकर विमान
रुनझुन -रुनझुन वायु के मंद स्वर
नीर-नीर से होती धरा तरुवर
बदली की रिमझिम फुहार
कोयल गाए मेघ मल्हार
तितली का सतरंगी आंचल
सलिल तृप्ति करता बादल
भंवरों के मीठे अनुस्वार!
अंजलि में भर लूं तेरा प्यार
त्यागूँ मन के विरह बिराग
किरणों की लडियो का माला पहनू मैं
पल -पल गाउँ जीवन के अतुल्य राग
छिपा है कहीं वेदन का अवसाद
मैं गाऊँ मल्हार राग आज

स्वरचित....
सत्य प्रकाश सिंह केसर विद्यापीठ इंटर कॉलेज प्रयागराज



बादल घिर-घिर आए ,उमड़ घुमड़ कर शोर मचाए
रस बरसाए ,मन हर्षाए ,चित पुलकाए
सावन में अपना यौवन दिखलाए
विरहिन को पिया की याद जगाए
अपनी गागर सागर से भर लाए
मेह का सागर धरती पर बरसाए
खारा लेकर मीठा बरसाए
जग को यह रीत सिखाए
संचय नहीं दान का मर्म बताए
जग को हर्षाए पुलकाए ।
बादल उमड़ घुमड़ कर आए।
स्वरचित
मोहिनी पांडेय


अपने आप से जब कुछ सवाल करता है ।
हकीकत में दिलका बडा मलाल करता है।

डुबा के लिखता हूँ हर्फ को दर्द जख्मों में। 
लोग कहते हैं कि शायर कमाल करता है। 

जब कहा मैंने के आओ जरा मिल के चलें। 
कह रहे रहनुमा के तु क्यों बवाल करता है। 

मिला के आग को पानी मे जब बरसता है। 
बन के बादल मेरा साहिब धमाल करता है। 

हैरान हूँ खिला के फूल सेहरा मे दरिया में। 
किस तरह से वो रौशन जमाल करता है।

विपिन सोहल


तुम्हारी
यादों के बादल
घिर आते है अक्सर
और चुपके से
लुढक जाती है
कुछ बूंदें
एक ठंडी
शीतलता
का अनुभव
मन हल्का
और सांत
फिर सिमट जाती हूँ
अपने नित्य निरंतर
सफर की तरफ
और दोगुना उत्साह से
प्रतिक्षा तुम्हारे आने की
व्यस्त हो जाती हूँ म़ै
बिखरे घर को समेटने में
बच्चों को पढाने में
खुद को सवांरने में
कभी मुर्झाने नहीं देती
तुम्हारे वो फूल
रातरानी के
आंगन में
लॉन के गुलाब गेंदे
वो तुलसी का बिरवा
सिंचती रहती हूँ
जब तुम आओगे
वही ताजगी
वही बहारें
सावन की फुहारें
ठणी हवाएं
हर पल सहेज के
रखती हूँ जीने के लिए
तुम ही तो जीवन मेरे
सारे वो पल जी लुंगी
तुम्हारे संग
तुम्हारी ये गंगा
हर पल तुम्हारे संग।

मधुर गंगा
लखनऊ।


Lokpratap Singh Rana विषय: मेघ
विधा: गीत(गेय कविता)

मेघ अपने करुण मन का
मेरे मन पर भी गिरा दो
मुझको तुम अपना बना लो
मेरे मैं को तुम मिटा दो
मेघ अपने....

शुष्क है धरती यहाँ की
अहं की ज्वाला जली है
तृष्णा है,पाने की तुझको
बुद्धि मुझको रोकती है
हृदय को स्वच्छन्द कर दो
मैं मिटूँगा तुम मिटा दो
मेघ अपने...

आस है, एक बूँद की बस
मैं हूँ चातक, एक पद का
मेरा स्वाति मुझको दे दो
नाश हो फिर मेरे मद का
तेरे दर्शन को खड़ा हूँ
मुझको अमृत तुम पिला दो
मेघ अपने....

लोकप्रताप सिंह राणा
(स्वरचित)

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"विधि/विधान"20नवम्बर 2019

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