Tuesday, March 12

"रोग/बीमारी/मर्ज़ " 12मार्च 2019

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             ब्लॉग संख्या :-325
आज का शीर्षक-*रोग/आज़ार*
विधा-मुक्तक द्वय
=====================
(01)रोग
दिल में बसाया तुमको मुझे रोग है दिल का ।
अपना बनाया तुमको मुझे रोग है दिल का।
अब ग़ौर मेरी टेर पर तुम क्यूँ नहीं करते,
पल-पल बुलाया तुमको मुझे रोग है दिल का।।
🌹🌹🌹🌹
(02)आज़ार
दिल का मुझे आज़ार है यह किसको बतादूँ ?
महँगा तेरा दीदार है यह किसको बता दूँ?
रहती है तेरी याद दिल के दरम्याँ हर आँ,
करती मुझे बे ज़ार है यह किसको बता दूँ ?
🙏🙏🙏🙏
@स्वरचित- "अ़क्स "दौनेरिया
आपका अपना

**************************
दुनियां को न जाने कैसा ये मर्ज़ हो गया,
दूर खुद से ही खुद का अब फर्ज हो गया!

लूटता रहा बाजार देखो तो सरेआम,
देखकर भी वो इतना खुदगर्ज हो गया!

सदाचार भूल गया हिंसा की बीमारी फैल गई,
लड़ाई झगड़े में सुर तेरा कितना बेतर्ज हो गया !

दर पर उस खुदा के भी ये क्या मांग बैठा?
लोभ ,लालच में नाम तेरा अब दर्ज हो गया

तू तो बांटता रहा ख़ुशियों के रंग सदा ही,
"नील"हर रंगों का तुझ पर ही कर्ज हो गया !

**************************
रचनाकार:-राजेन्द्र मेश्राम "नील"
चांगोटोला, बालाघाट ( मध्यप्रदेश )

स्वस्थ निरोगी तन मन हो
तभी समाहित होते हैं सुख
स्वच्छ जल वायु ध्वनि हो
फिर कौनसा जग में दुःख
भौतिकवादी इस जीवन मे
दिखावा सब मिल करते हैं
दौडधूप करते जीवन भर
निज स्वार्थ जग में भरते हैं
कई रोग हम स्वयं पालते
चोरी चुगली दिनभर करते
मन मुटाव द्वेष ईर्षा वाचन
से जीवन मे क्षणभर मरते
योगा कसरत जो करते हैं
स्वस्थ निरोगी वह् रहते हैं
स्वयं सुखी रहते जीवन भर
परहित पर पीड़ा हरते हैं
अति खा लेना अति बोलना
सदा मर्ज़ के यह कारण हैं
सावधान सचेत रहो प्रतिदिन
ताज़ा भौज्य सत्य निवारण है
तन स्वस्थ तो मन स्वस्थ है
सदा संतोषी स्वस्थ रहता है
परहित डग पर चरण धरे जो
नित रोगी के आँसू हरता है।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविंद प्रसाद गौतम

विधा-छंद मुक्त कविता(व्यंग्य)
विषय-रोग/ बिमारी

🌹🌺 फेसबुक बिमारी🌺🌹

🍀🍁🍀🍁🍀🍁🍀🍁🍀

देखो रे फेसबुकिया कितने अफलातून है😂
बस अपनी मस्ती में ही रहते चूर हैं😂😁😁

चाहे हो टेडी नाक ना हो इनके सर पर बाल
सबसे नाइस पि कहलबाते हाये रे फेसबुकिया

नैट खत्म हो जब इनका ये बेचैन हो जाते😂
सारे काम छोड़कर ये रिचार्ज कराने जाते 😁

भाग भाग कर काम ये करते फोन में झाँका करते
अगर लाइक कमेंट मिले ना इनको ये उदास होते

हाये रे फेसबुकिया फ्रैंड रिक्वेस्ट हैं भेजा करते 😂
फेसबुक का पटल छोड़ इनबॉक्स में कूदा करते 😅

बिगड़ जाए फोन जो इनका गुस्सा औरों से करते 😂
लेके वाइक और गाडी दुकान पर कूदा करते 😎😎

मैं भी इसी दुनिया में रहती कितनी भोली बनती 😃😂
इधर उधर की करती रहती देख देख मैं हँसती😄😄

🌺स्वरचित🌺

नीलम शर्मा#नीलू
मर्ज आफत 
भूली है शराफत 
लोग गायब |

बीमारी कैसी 
चली रिश्तों पे कैंची 
भूला पडोसी |

प्रेम का रोग 
नहीं मिला संजोग 
दीवाने लोग |

आयी बीमारी 
भागमभाग भारी 
दुनियाँ सारी |

अजब रोग 
बदल गये लोग 
भ्रम का योग |

हम डॉक्टर 
घरेलू उपचार 
मर्ज तैयार |

वैद्य विलुप्त 
परीक्षण संयुक्त 
बीमारी मुक्त |

कहते सभी 
रोग धन की कमी 
कैसी ये जमी |

प्रतिष्ठा झूठी 
सारी दुनियाँ लूटी 
बीमारी होती |

मर्ज भगाओ 
काया निरोगी पाओ
जाग्रति लाओ |

रोग निदान 
स्वच्छता अभियान 
सुखी जहान |

टीकाकरण 
शिशु अवतरण 
रोग हरण |

उत्तम स्वास्थ्य 
भोजन हो सुपाच्य 
मर्ज नैराश्य |

दूर हो रोग 
हो प्रेम सहयोग 
सुख का भोग |

स्वरचित , मीना शर्मा , मध्यप्रदेश 
कई तरह के रोग होते हैं।
कुछ शारीरिक,कुछ मानसिक होते हैं।
शारीरिक बीमारी।
दवा से ठीक हो जाती है।
पर मानसिक बीमारी का।
कोई इलाज नहीं।

इश्क की बीमारी भी लाइलाज होती है।
इसकी दवा किसी के पास नहीं।
जो फंस गया इस बीमारीमें।
बेमौत मरने के सिवा कोई उपाय नहीं।

फेसबुक की बीमारी भी है लाइलाज।
इसका कोई नहीं इलाज।
जो फंसा फेसबुक में।
वो दिन,रात रहता इसीमे व्यस्त।

ना खाने का समय मिलता।
ना सोने का।
यहाँ तक कि जरूरी काम भी नहीं होता।
नाहीं मिलता वक्त,कहीं जाने का।।
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
स्वरचित
वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी
अब जुदा है राहें मेरी और तुम्हारी। 
है अजब मुहब्बत की दास्तां हमारी। 
उसी दौरे उन्हीं ख्यालों में पी रहा हूँ। 

अब न मर रहा हूँ और न जी रहा हूँ। 
गुज़र रही क्या मुझ पे जो चाहे कहिये। 
समझिए उल्फत के है कोई बीमारी। 
हरेक रात ख्वाबों में इस तरह से आना।
तुम्हारे ख्यालों में हर वक्त यूं खो जाना। 
दिखता नहीं है कुछ भी सिवाय तुम्हारे। 
आखों में जैसे छप गई तस्वीर तुम्हारी। 

विपिन सोहल 

स्वरचित
चंद हाइकु 
*********
1)

शुद्ध भोजन
सदा ही अपनाये
रोग भगायें

2)
ताजी हवा
वृक्षारोपण लाये
मर्ज़ की दवा

3)
सुने संगीत
मानसिक तनाव
दूर भगाये

4)
हृदय रोग
उच्च कोलेस्टेरॉल 
प्राणघातक

स्वरचित *संगीता कुकरेती*

रोग -मदिरापान....का

ऐ साकिया कुछ दर्द पिला,


तभी मजा है पीने में।

गम की इस दुनिया में वरना,

कहां मजा है जीने में।।

प्रेम के इस बाजार में,

कम हो जाती मदिरा पैमाने में।।

मैं पीता अधरों की नूरो को,

जम जाती नजरे मैखाने में।।

हर नुक्कड़ पर प्रेम सजा ,

हर नाटक का मंचन यहां।

निगाहें ढूंढती है तुम्हें ऐ प्रेम,

प्रेम पथिक का कंचन कहां।।

प्रेम पथिक की शाम ढलती,

साकी के मयखाने में।

प्रेम के आशिक तू बता,

तू रहता किसके आशियाने में।।

कर इनायत प्रेम की,

हाल दिल बेकरार हुआ।

हुस्न की इस बाजार में

मदिरालय का हर आशिक शर्मसार हुआ।।

स्वरचित

सत्य प्रकाश सिंह केसर विद्यापीठ इंटर कॉलेज प्रयाग राज

-----------------------
जिंदगी की तेरी कमी 
कभी पूरी न होगी 
बिन तेरे हर खुशी
अब अधूरी ही रहेगी
तेरी बातें तेरी यादें
कैसे भूला दे वो बीते लम्हे
जलूं विरह की अग्नि में
हाय किसकी लगी नजर
बड़ी मनहूस वो घड़ी थी 
जब टूटी तेरी साँसो की कड़ी
पल बचपन के भूलते नहीं
बिन तेरे खुलकर हँसते नहीं
दर्द बन गया बीमारी
जिसकी कोई दवा न बनी
भ्रम होता दिल को कभी-कभी
तू दूर नहीं मेरे करीब है कहीं
बसंत भी सूना है सावन भी सूना
तुम बिन हर लम्हा है सूना
छलक पड़ते आँखों से आँसू
तुम बिन अब मैं कैसे हँसू
असमय यूँ तेरा चले जाना
तन्हाइयों में हमें छोड़ जाना
गुजरते दिन अब बिन तेरे
ज़िंदगी के सफ़र में हैं अकेले
***अनुराधा चौहान***©स्वरचित
सभी निरोग रहें हम प्रभु जी,
जीवन भर सुखी स्वतंत्र रहें।
असहरोग आऐं नहीं जीवन में,
अपना जीवंत सदा गणतंत्र रहे।

बीमार दिखे नहीं कोई यहां पर,
सुखमय हों चेहरे जन जन के।
प्रफुल्लित हर घर हमें दिख जाऐ,
मुखरित हों मुखडे जन मन के।

नहीं शंकालु रहें कोई शंकाग्रस्त।
नहीं रह पाऐं कोई अभावग्रस्त।
चहुंओर खुशहाल हो वातावरण,
मुस्काते दिखें नहीं कोई रोगग्रस्त।

सदैव स्वस्थ रहें प्रसन्नचित्त सब
रहें हमेशा हृष्ट पुष्ट तंदुरुस्त यहां।
चिरपरिचित मुस्कान हो मुस्कित,
एकदूजे को देख हों गर्वित यहां।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय

1.
इम्युनिटी जब घटती,सतत बढ़ें तब रोग ।
दुश्चिंता को त्यागकर,सब कुछ सकते भोग।।
2.
स्वच्छ पेयजल औ हवा,हों शौचघर जरूर।
जीवन हो स्वच्छता का ,रहें रोग भी दूर।।
3.
मिलते नहीं गरीब को ,डॉक्टर व अस्पताल।
करोड़ों होंय खर्च पर,रोगों से बेहाल।।
4.
करते नियमित रूप से,जो ,श्रम या व्यायाम।
अगर दुर्व्यसन से बचें,दूर रोग आयाम ।।

प्रेम रोग गर लग गया,बढ़े प्रेम की डोर।
इक तरफ़ा यदि प्रेम हो,कभी न होए भोर।।
6.
असमय मृत्यु व बांझपनधूम्रपान की देन।
हृदय आंख व केंसर,की,बढ़े रोग की चेन।।
7.
सौ ग्राम ताजा दही, रोज ,रोज यदि खायँ।
ग्रीवा धमनी हो सही,हृदय रोग मिट जायँ।।

******स्वरचित *******
प्रबोध मिश्र 'हितैषी'
बड़वानी(म.प्र)451-551

 रोग ये कैसा
ढूढ़ता सिर्फ पैसा
ईमान बेंचा।।


बढ़ी बीमारी
दवाई न अजारी
दुख संसारी।।

बढ़ता मर्ज़
किया जितनी दवा
मालिक ख़ुदा।।

मिले बीमार
इश्क़ के साहूकार
घर न द्वार।।
भावुक


12/03/2019
"रोग/बीमारी/मर्ज"

कविता
😊😊😊😊😊😊😊
नजरें मिली जो तुमसे मेरे यारा
रोग ईश्क का लगा दिल हुआ बेचारा
ऐ!मेरे खुदा अब तू ही बता
क्या है इस मर्ज की दवा।।

हर वक्त रहता मदहोशी सा छाया
कैसा रोग मिला मुझे वो यारा
मिल जाए अगर दवा का सहारा
उस गली से ना गुजरुँ फिर दोबारा।।

दिन को रहता तेरे चेहरे का पहरा
अक्स उभर के आये शाम को ऐ !यारा
रातों का भी शकुन है मैनें खोया
ये कौन सा रोग लगा मुझे दिलदारा।।😊😊

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

दवा ना ढूंढों दिल के दर्द का 
कोई इलाज नहीं हैं दिल की बीमारी का 
मोहब्बत का इलाज करने गये थे हम खुद ही मरीज बन गये.

यूँ तन्हा होकर मोहब्बत की गलियों में 
हमने बिल्कुल छोड़ दिया हैं 
दिल के दर्द ने हमें मुसाफिर बना दिया हैं 
दिल की रोग ही अब हमारी दवा बन गया हैं .

मोहब्बत का हैं ये दर्द मीठा 
बिना मर्ज के ये इश्क हैं अधूरा 
अहसासों हैं बेशकीमती पिटारा 
इसी इश्क मैं ढूँढे हर कोई किनारा और सहारा .
स्वरचित:- रीता बिष्ट

तन में रोग 
मन में रोग
जहाँ देखो
वहाँ रोग ही रोग
त्रस्त है मानवता
त्रस्त हैं लोग
फिर क्यों लगाते
कुत्सित आदतों
विचारों का भोग ?
उपचारित हो सकता है
तन का रोग
खा लो दवा
अपना लो योग
किस चिकित्सक को दिखाओगे
मन का रोग
सदविचारों का अकाल
कुसंस्कारों का भोग
तुमने अमोल जीवन पाया
चरित्र तेरा बनता हमसाया
सादा जीवन:उच्च विचार
हो संतुलित इनका योग
अपनाओ इनको
और रहो नीरोग ।

संतोष कुमारी। ‘ संप्रीति ‘
स्वरचित

सबसे बड़ा है रोग
जाने,क्या कहेंगे लोग ?
चहक रही थी एक किशोरी
किसी सगे ने की बलजोरी
अल्हड़,अबूझ,निपट अंजान
कुकृत कुचली कली नादान
रो अम्मा को कथा सुनाई
माता ने कुछ व्यथा बताई
बाला को चुप कुछ यूँ कराई
नित समाज की देकर दुहाई 
कुत्सा पर कहाँ लगी रोक ?
जाने,क्या कहेंगे लोग ?
ऐसी ही जाने कितनी बाते
दुनिया से हम रहे छुपाते
दंभ,दिखावा मिथ्या अहंकार
दर्श दर्प-सर्प व्यर्थ फुफकार
रे जागो,अपनी पहचान करो
दुर्बलता का अवसान करो
विद्रुप-रीति-नीति तिरस्कृत हो
अब तो समाज परिष्कृत हो
भीत भाव से भरे खल कामी
कुकृत्य कलंक न रहे बेनामी
संबल-संचित ललकार भरो
रोग पलट-पूर्व उपचार करो
जग में स्वस्थ सुखद संयोग
जाने,क्या कहेंगे लोग ?
-©नवल किशोर सिंह
स्वरचित

विधा=हाइकु 
=========
(1)मेरी दादी माँ 
नुस्खा भरा खजाना 
रोग बताना
(2)लगे लगाम
रोग पर कमांड
योग है नाम 
(3)किया है योग 
हकीकत में भागे
तन के रोग 
(4)रोग का कीड़ा 
देख होती हैं पीड़ा
उम्र ही पीता
(5)जग का रोग
क्या कहेंगे जी लोग 
जग को छोड़ 
========

===रचनाकार ===
मुकेश भद्रावले 
हरदा मध्यप्रदेश 
12/03/2019

अरी ओ बीमारी क्यों दुनिया में आयी ,
कर दी अच्छे भले आदमी की तबाही |

छोटे से बच्चे की है ऑंखों पै चश्मा ,
डाक्टर के आगे लगा कितना मजमा |
बढा दी रक्तचाप और शक्कर की बीमारी ,
हृदय पर भी तूने अपनी नियत बुरी डाली |...... 

कितने परीक्षण कितनी रिपोर्टों की दुनियाँ ,
फैली दवाओं की बदबू इंजेक्शन की सुइयाँ |
सबकी पहले ही छूटी थी दूध और मलाई ,
और तबियत डायटिंग की बात सुनके घबराई |........

सुनो बीमारी हटो चलो जाओ दूर हमसे , 
स्वच्छ वातावरण कर देगें हम कसम से |
जैविक खाद से ही करेंगे खाद्यान्न की बुबाई ,
बीमारी दुनियाँ से फिर हो जायेगी तेरी विदाई |...........

स्वरचित , मीना शर्मा , मध्यप्रदेश ,
मोटापे ने दस्तक दी, 
बढ़ने लगा था भार, 
बीमारी मन से हुई, 
शरीर बना लाचार ll

मधु मेह ने घेरा लगाया, 
अस्थमा का हो गया वार, 
औषधि कुछ नहीं थी, 
न था कोई उपचार ll

सोच सोच के दिल भर आया, 
पति बोले क्या करू मैं
मोटी काया l
सोचा अब कुछ करना होगा, 
यही सोच कर योग अपनाया ll

छंट गया था घोर अँधेरा, 
बदन छंट गया था पूरा मेरा, 
ना कोई ओषधि ना दवाई, 
अब तो है पूरा आसमां मेरा l
कुसुम पंत उत्साही 
स्वरचित 
देहरादून
एक गीत का प्रयास...
तर्ज... लागा चूनरी में दाग...

लागा इश्क दा रोग , छुपाऊँ कैसे
इश्क दा रोग, छुपाऊँ कैसे, ये निभाऊं कैसे
लागा इश्क दा रोग...

निकला सनम मेरा हरजाई...
सरहद की मोहब्बत निभाई...
जाके सरहद पर मिल आऊँ कैसे, मिल आऊँ कैसे...
लागा इश्क दा रोग...

भूल गया वो वचन विवाह के...
खो गया वो सरहद पर जाके..
जाके सरहद पर मिल आऊँ कैसे, मिल आऊँ कैसे...
लागा इश्क दा रोग...

टुकड़ो में सिमटकर आया...
भारत माँ का लाल...
तिरंगे को फहरा कर आया...
कर न्योछावर प्राण...
अब उनको गले लगाऊँ कैसे, मिल पाऊँ कैसे...
लागा इश्क दा रोग...

स्वरचित :- मुकेश राठौड़
विधा-हाइकु

1.
पेड़ लगाओ
स्वच्छता अपनाओ
रोग भगाओ
2.
छोड़ के योग
पाल लेते हैं रोग
भ्रमित लोग
3.
क्यों उपचार
जब नहीं बीमारी
निरोगी काया
4.
बढ़ता कर्ज़
बन लापरवाही
बढ़ता मर्ज़
5.
गमी में रोग
पाल लेते हैं लोग
नशे का शौक
6.
इश्क बीमारी
फैला युवा पीढ़ी में
तनाव भारी
7.
क्यों फैल गया
भ्रष्टाचार का रोग
उपाय ढूंढो
8.
मार डालेगा
प्रदूषण का रोग
भयंकर है

स्वरचित
अशोक कुमार ढोरिया
मुबारिकपुर(झज्जर)
हरियाणा

तुझसे दूर जाना अब तो, 
नामुमकिन सा लगने लगा।
समझ में बिल्कुल नहीं आता
कैसा ये रोग मुझको लगा।
तन के रोग की तो है जहां में
दवाएं कई, इलाज हजार।
मन का मर्ज, किसी वैद्य को
समझाए से समझ न आता।
ना नींद है,ना चैन है मुझको
हर क्षण भार सा क्यूं लगे,
मौत भी मयस्सर हुई नहीं
दर्दे अब और सहा न जाता।
स्वरचित- निलम अग्रवाल, खड़कपुर

आज का विषय - रोग/बीमारी/मर्ज
विधा - हाइकु

समझें लोग
करें हमेशा योग
रहें निरोग

तू मत भोग
मोहमाया का रोग
खुदा हकीम

नर या नारी
इश्क दिल लाचारी
महा बीमारी

स्वरचित
बलबीर सिंह वर्मा
रिसालियाखेड़ा सिरसा (हरियाणा)

=============

गन्दगी है सबली बीमारियन की जड़ ,

रहो साफ सुथरे न कोई ले जकड़ |

1..खाना से पहले पखाना के बाद |

साबुन से धोओ भइया तुम हाथ ||

करो रोज मंजन तुम , दांत को रगड़ | रहो साफ ... .... 

2..गन्दगी से होते हैं मच्छर उत्पन्न |

भोजन को दूषित कर,करें भनन भन्न ||

डेंगू ,मलेरिया ,चिकन ले पकड़ | रहो साफ .... .... 

3..खुले में न शौच, शौचालय बनाओ |

बहिन,बहू , माँ की इज्जत बचाओ |

आदत पुरानी छोड़, कान लो पकड़ | रहो साफ ... ..... 

4..इधर -उधर कूड़ा , लघुशंका न करियो |

ट्वायलेट औ डस्टबिन,उपयोग सब करियो ||

"माधव" समझा रहे , है सबकी फिकर | रहो साफ ... 

जब नयना तुमसे चार हुए
सुख चैन से मैं न सो पाई
हर पल दिल मेरा,कसकता है
पर कुछ न तुमसे कह पाई
यह कैसा रोग लगा मुझको
न जीती हूँ , न मरती हूँ 
तेरे ही ख्यालों में हर पल
दीपक बाती सी जलती हूँ
दिल हरदम रोता हँसता है
चुप चुप तुमसे कुछ कहता है
मैं भीड़ में तन्हा होती हूँ
एकांत मिले तो रोती हूँ
कहते हैं लोग यही अक्सर
यह रोग आग का दरिया है
कोई डूब के भी तर जाता है
कोई बीच भँवर फंस जाता है
तुम वैद्य बनो खुद आ जाओ
आकर तुम दवा पिला जाओ
किसी और के बस की बात नहीं
आकर मेरा रोग मिटा जाओ

सरिता गर्ग
स्व रचित

विषय:-"रोग/बीमारी/मर्ज़" 

पर्यावरण को चूस रहे, 
स्वार्थ की राह भोगी हैं, 
ईश्वर को काहे कोसना, 
जब मन ही यहाँ रोगी है l

और तन बड़ा लाचार है,
गरीबी कोढ़ में खाज है, 
जद्दोजहद जिंदगी की, 
व्यवस्थाएँ बड़ी बीमार है l

कुछ भावनाएँ भी मर्ज़ है, 
जब अपनों ने दिया दर्द है, 
वो बीच राह में चले गए, 
अब गिनती के हमदर्द हैं l

होता नहीं जो दिखता है
आवरण लगता , झूठा हैं 
जहाँ हो तन-मन परिष्कार 
वो सच्चा स्वास्थ्य अनूठा हैं 

स्वरचित 
ऋतुराज दवे
क्या ऐसा कोई जो बीमार नहीं है।
सचमुच क्या कोई उपचार नहीं है।
मै तनसे कुछ मनसे बने बीमार,
इसका क्या कोई प्रतिकार नहीं है।

मिलकर रहना कोई गुनाह नहीं है।
क्या सदाचार सद्व्यवहार नहीं है।
करते रहें हास परिहास आपस में,
क्या हमको उचित सलाह नहीं है।

बीमार हमें कोई नहीं कर सकता।
ठांस पेट भोजन नहीं भर सकता।
हमने खानपान में कमी रक्खी हो,
वरना रोग बीमार नहीं कर सकता।

दुराभाव दुराग्रह सबसेबड़ी बीमारी।
क्या सबकी ये बेवशी नहीं लाचारी।
तुम क्यों सुखी शिकायत हमें रहती,
ये चिंता महारोग हम सबकी बीमारी।

स्वरचितः ः
इंजी.शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
विधा :- सरसी छंद

मन शरीर पीड़ित हो जिस से ,
कहते उसको रोग ।
चाहे तन हो चाहे मन हो , 
सब कर्मों का योग ।।
दैविक दैहिक भौतिक तीनों 
नर को दें संताप ।
वात शूल खाँसी दमा ज्वर ,
ये हैं भौतिक ताप ।।
काम क्रोध मद लोभ मात्सर्य ,
छोड़ें अपनी छाप ।
युद्ध भूकम्प दुर्भिक्ष आदि ,
ये हैं दैविक ताप ।।
डकैती बल छल कपट चोरी , 
भौतिक हैं ये ताप ।
तीन ताप ही रोग मूल हैं ,
बन जाते परिताप ।।
ज्ञान कर्म भक्ति का समन्वय ,
रोगों का उपचार ।
सदनीति सत्कर्म से चल कर , 
हो न मन बीमार ।।
मन से ही है रोग उपजते ,
होए न मन निर्बल 
हृदय बुद्धि के ताल मेल से , 
मन को रखें निर्मल ।।

स्वरचित :-
ऊषा सेठी 
सिरसा 125055 ( हरियाणा )

तेरे इश्क में बीमार हुए बैठे है
हुस्न में तेरे गिरफ्तार हुए बैठे है।

रोग है ये मेरे दिल का ,सुकूँ मांगे
तेरी राहों में इतवार हुए बैठे है।

मेरी नजरों की जुस्तजू तुम हो
तेरी सूरत के तलबगार हुए बैठे है।

लाख कर ली दवा, हकीमों की
तेरी नजरों के चमत्कार हुए बैठे है।

दबे किताबों में कितने ही गुलाब मिले
तेरी यादों में हम गुलजार हुए बैठे है।

हमसफर बनके मेरा हाथ तूने थामा है
तेरी उल्फ़त का अख़बार हुए बैठे है।

मेरी साँसों की महक तेरी जैसी क्यूँ है 'मन'
मेरी धड़कन का एतबार हुए बैठे है।

स्वरचित
गीता गुप्ता 'मन'

मंच को नमन
दैनिक कार्य 
स्वरचित लघु कविता
दिनांक 12.3.2019
दिन मंगलवार
विषय रोग
रचयिता पूनम गोयल

प्रेमरोग लागा , रे ,
मोहे प्रेमरोग लागा ।
चैन मन का भागा , रे ,
चैन मन का भागा ।।
कहाँ जाऊँ ?
क्या करूँ ?
कुछ समझ न आता ।
छोटी-छोटी बातों पर,
यह मस्तिष्क शून्य हो जाता ।।
कह गये लोग सयाने ,
कि यह रोग
बहुत विचित्र ।
इसके समाधान का ,
नहीं खिंच पाया
कोई चित्र 🧐😂
खोजे अनेक उपाय ,
और ढेरों औषधियाँ ।
पर है बड़ीं 
टेढ़ी-मेढ़ी ,
इस प्रेम की गलियाँ ।।
हार गये सब 
वैद्य -डॉक्टर ,
कोई हल न निकाल पाया ।
इस प्रेमरोग का
अब तक ,
कोई ईलाज न कर पाया ।
संतुलन जीवन मे बिगड़ जाए
कार्यक्षमता मे कमी आ जाय
तन रोग ग्रसित हो जाता है
मन व्यथित हो जाता है
घर अस्त व्यस्त हो जाता है 
रोग से पीड़ित तो एक होता है
कष्ट पूरा परिवार सहन करता है
अपनों को कष्ट मे देख 
परिवार असहाय हो जाता हैं 
पल पल टूटता ,पल पल बिखरता है।
स्वास्थ्य ही सबसे बड़ी पूंजी है
स्वास्थ्य सारे जहान की खुशी है ।
अधिकतर क्यों रोग ग्रसित है आजकल
तन मन की बीमारी बढ़ रही प्रतिपल
कारण तो इसका ढूँढ़ना होगा 
जड़ से निदान तो करना होगा 
चिकित्सा क्षेत्र में उन्नति हो रही 
और बीमारियाँ भी बढ़ती जा रही 
जीवनशैली क्या दोषी इसके लिए 
खाद्य पदार्थों मे मिलावट कारण इसका 
वायु,जल प्रदूषण पर नहीं नियंत्रण 
महत्वाकांक्षाये कर रही मानसिक शोषण 
या विदेशी कंपनियों की चाल है
क्या उनको बेचना अपना माल है 
पूरी की पूरी व्यवस्था है रोगी 
हर इंसान इसका है भुक्तभोगी
क्या है रोग का कारण 
चलो मिल कर करें इस का निवारण
काश रोग मुक्त संसार हो जाए
काश....

स्वरचित 
अनिता सुधीर

चेहरे पर हंसी लेकर
गम छुपाए रहते हैं,
रहकर महफिल के बीच,
तन्हाई हम सहते हैं,
जीवन बंजर सा हो जाए,
लगे जब हृदय को रोग,
मन विचलित सा रहता है,
कैसा है ये ग्रह का योग,
मानसिक पीड़ा को सहते,
दिन रहे हैं बीत,
रोग की होती दवा,
जुदाई की दवा है प्रीत,
अपनों से हो जाए मिलन ,
ऐसी तुम दुआ करो,
प्रेम का लगा कर मरहम,
जख्मों को मेरे भरो।
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स्वरचित-रेखा रविदत्त
12/3/19
मंगलवार

चयनित शब्द - बीमारी/मर्ज़ /रोग़
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ज़िंदगी इतनी बस मोहलत देना -
वादों को निभा सकूँ
यादों को जुटा सकूँ
बिगड़ी को सँवार सकूँ 
कुछ क़र्ज़ जो उतार सकूँ।

ज़िंदगी इतनी सी बस फ़ुरसत देना -
रिश्तों को जी भर जी सकूँ
हर चाक़ गिरेबाँ सी सकूँ
राहों से काँटे छाँट सकूँ
कुछ ख़ुशियाँ बाँट सकूँ ।

ज़िंदगी इतनी सी बस हिम्मत देना -
अपने अहम को मिटा सकूँ
ग़म दूसरों का घटा सकूँ
आँखों में ख़्वाब सज़ा सकूँ
फूलों सा जीवन महका सकूँ।

ज़िंदगी इतनी सी बस इज़ाज़त देना -
दुखती रग सहला सकूँ
रुठी बहार फिर लौटा सकूँ
तारीक़ियों में चराग़ जला सकूँ
बिछड़े दिल फिर मिला सकूँ ।

ज़िंदगी दिल में मेरे बेपनाह मुहब्बत देना 
जी भरकर सबको प्यार दे सकूँ
अपनो का खोया ऐतबार दे सकूँ
हर मर्ज़ दूर हो वो दवा दे सकूँ 
चाराग़र बन ज़िंदगी की दुआ दे सकूँ ।
स्वरचित (c)भार्गवी रविन्द्र .....१२/०३/२०१९
चाक़ गिरेबां- फटा दामन , तारीक़ी - अंधेरा , ऐतबार - विश्वास 
चाराग़र - चिकित्सक

करवाता हूं परिचित सबको आज नई बिमारी से।
रग रग में है फैल रही
यह देश खोखला कर रही ।
कहते हैं इसको भ्रष्टाचार
खून सभी का चूस रही।
इस का मारा हर दम रोए
करे न अच्छा कार्य।
आगे चलकर वह भी बरे
भ्रष्टाचारी कार्य ।
इससे बच कर रहना है सबको,
इससे घातक कुछ और नहीं
जन जन को आज जगाना है।
भ्रष्टाचार रूपी बिमारी को
जड़ से हमें मिटाना है।
(अशोक राय वत्स)
स्वरचित जयपुर

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'''धोखा/फरेब/विश्वासघात " 22मार्च 2019

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