Wednesday, March 13

"वसन/वस्त्र/चीर/कपडा" 13मार्च 2019

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             ब्लॉग संख्या :-326


जय गणेश जय मात शारदे,
लज्जा सबकी रख लीजो।
चीर हरण हो न पाऐ द्रौपदी का,
कृष्णा ऐसा फिर कीजो।

दूष्ट दुशासन बहुत बडे हैं,
अब तो इनके हाथ काट दीजो।
नहीं निर्वस्त्र हो पाऐ अवला ,
त्रिदेव ऐसा कुछ कर दीजो।

हे मात शारदे देवी दुर्गे
सबकी लाज तुम्हारे हाथों में।
श्री गणेश हे बुद्धिदेवा ,
सब दिव्य देवता हाथों में।

ज्ञानदीप जलाऐं अंतर्मन में
हम सब प्रभु सुकृत्य करें।
नहीं हो पाऐं चीरहरण कहीं,
अब नहीं कोई कुकृत्य करें।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
************************
🍁
खींच रहा था वसन दुशासन,
मर्यादा को छोड कर।
कुरू कुल की गरिमा खडी,
बिलख रही कर जोड कर।
🍁
केशु खुले थे रूदन तीव्र,
थी नारी मधुमास मे।
खींच के लाया केशु पकड के,
पुरूष के दरबार मे।
🍁
भाग्य बली है लाख जतन हो,
पर वो मिट पाया है।
पंचपति जो महाबली थे,
अस्मित जोड ना पाये है।
🍁
ईश्वर ही सम्पूर्ण धरा है,
वो ही तारने वाला है।
शेर के संग हर जीव मात्र का,
वो ही भाग्य विधाता है।
🍁

स्वरचित .


वस्त्र बड़े बेढंगे हैं
पाश्चात्य के फंदे हैं ।।
भारतीयता गायब है
वस्त्र पहने भी नंगे हैं ।।

फैशन में मतवाले हैं 
संस्कार के लाले हैं ।।
गलती है माँ बाप की 
क्यों न सवाल डाले हैं ।।

तर्क में सब माहिर हैं
बच्चे भी अब लायर हैं ।।
जिसे भी तुम छेड़ोगे 
बन चुके सब फायर हैं ।।

सीमायें 'शिवम' तोड़ रहे 
संस्कारों को सब छोड़ रहे ।।
वस्त्र क्या हर क्रियाकलाप 
पाश्चात्य से अब जोड़ रहे ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"

स्वरचित 13/03/2019
हरित वसन पहने वसुधा
श्वेत वसना मात शारदे
नीलाम्बर नभ शौभित है
पीत वसन पहने माधवे
तन ढकने को वस्त्र जरूरी
वसन मान सम्मान हैं देते
शीत ऋतु बयार चले ठंडी
कंपित काया को ढक लेते
प्रिय बापू ने वसन हेतु ही
स्व हस्त चर्खा नित काता
वस्त्र एक पहना जीवन में
हो सम्पन्न प्रिय भारतमाता
भरी सभा में द्रोपदी का
कौरव चीर हरण किया
दुःशासन थककर हारा
स्वयं वसन कृष्ण दिया
कपड़े अब फ़ैशन बन गए
तन सृंगारित और दिखावा
नर नारी करते आकर्षित
वस्त्र बन गया मात्र छलावा
रंग वस्त्र प्रतीक बन गए
खाकी वर्दी पुलिस सुरक्षा
जल थल नभ भिन्न वसन
वतन सैनिक करते रक्षा
प्रिय तिरंगा वस्त्र नहीं है
आन बान सम्मान प्रतीक
जन जन प्राण न्यौछावर 
वतन मादरे यह सटीक।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

क्या पहने क्या न पहने, 
ये है नारी का अधिकार, 
क्यों वस्त्र कटघरे में खड़े, 
दोषी तो कुत्सित विचार l

कई सदियों ने शोषण किये,
हाँ नारी मुखर हुई है आज, 
अब वस्त्र बन गए हैं प्रतीक, 
घोषणा स्वतंत्र मैं भी आज l

वक़्त के साथ कदम चले, 
शर्म आँखों में, बसे लाज, 
बस आँचल में मर्यादा रहे, 
और खिलते रहे सँस्कार l

जहाँ हो संस्कृति का ह्रास, 
फूहड़ नग्नता का नाच, 
शालीनता को त्यागा जाये , 
वहाँ आज़ादी बने उपहास l

स्वरचित 
ऋतुराज दवे

वसन लाल 
दुल्हन का श्रृगार 
रीत विवाह |

चीर आबरू 
तलवारें रूबरू
करें सुर्खरू |

चीर हरण 
द्यूत क्रिया कारण 
हरि शरण |

वस्त्र निर्माण 
हो जीविका आसान 
कला सम्मान |

चाहिऐ थोड़ा 
रोटी कपड़ा छाया
तृष्णा है माया |

नजर दोष 
करते वस्त्र क्षोभ 
ये कैसा क्रोध |

चीर मर्यादा 
चला चलन पर्दा 
ओछा इरादा |

बालिका तन 
मतलब वसन 
घृणित कृत्य |

नारी की लाज 
वस्त्र की मोहताज 
कैसा समाज |

पापी है मन 
बना दोषी वसन 
नारी नमन |

चीर महत्व 
महिला का अस्तित्व 
पूज्य व्यक्तित्व |

समझे नारी 
वस्त्र तीमारदारी 
है ये जरूरी |

निखरा रूप 
वसन है अनूप 
शक्ति स्वरूप |

सभ्यता यही 
परिधान हों सही 
मन की कही |

व्यवसाय है 
विकास चलता है 
वस्त्र शान है |

स्वरचित , मीना शर्मा , मध्यप्रदेश 

चीर हरण
मानवता हनन
हाँ शर्मसार।। 

पिला वसन
फागुन लहराएं
उरे गुलाल।। 

पूर्ण करता
वस्त्र नारी को साड़ी
मनमोहनी।। 

स्वरचित: - मुन्नी कामत।

हे....कान्हा..
बना कोई वसन ऐसा...
जिससे अस्मिता बचे मेरी...
या रोक ले...
जन्म उन दुशासन का..
जिससे रहे सुरक्षित नारी...
हे...कान्हा...
कर कोई जतन ऐसा...
भोग विलासिता से हटकर...
बने कोई पहचान मेरी...
दे कोई 
गीता का ज्ञान फिर...
या कर अब महाभारत की तैयारी... 
लाज वसन अब छोड़ूगीं....
रण चंडी सा रूप अब धारूंगी...
करूंगी सर्वनाश उनका...
नजर जो डाले चीर पर...
वो हर आँख निकाल लूंगी...
आज की नारी हूँ....
न अबला न बेचारी हूँ....
बस हालात की मारी हूँ.....
नहीं तो में ही जगतारी हूँ....

स्वरचित :- मुकेश राठौड़

वस्त्र इंसान की
मूलभूत जरूरत
तन पर परिधान
मौसम की 
मार से बचाते
व्यक्तित्व की शोभा बन जाते
समाज में रुतबा बढाते
न मिल पाता
कुछ बदनसीबों को
आज भी इस धरा पर
तन ढकने को परिधान
कहीं घूमते
कीमती वस्त्रों में सज्जित
नर नारी
कहीं एक चीथड़े से
ढकती तन नारी
आज भी दुष्कर्मी करते
समाज में
किसी द्रौपदी का चीर हरण
आज भी न्याय न पाती नारी
बदल दो ये तस्वीर
भारत के वीरों
करो माँ का सम्मान
माता के धीरों
कहीं गर जो देखो
अधढका तन
ओढा दो उसे तुम
अपने तन का वसन
कोई न रहे अर्धनग्न
नर हो या नारी
तस्वीर बदलेगी
दुनिया की सारी

सरिता गर्ग
स्व रचित

आमिर हो ग़रीब, सब के होते तीनो अरमान 
खाने रोटी, पहेनने कपड़ा, और रहेने मकान 

जी तोड़ महेनत के बाद, भूका सोता इंसान
ख़ूब बहाकर पसीना सिर पर होता असमान 

ईद हो या दीवाली, न जले चूला बिन काम 
कड़ी महेनत बाद भी, भूका सोए हार शाम

दिन हो या रात इनका तो बस है नारा काम 
इनके क़िस्मत में न है , करना कोई आराम

महेनत मज़दूरी करो , या करो कोई दुकान 
होगा संभव तबी रोटी, कपड़ा और मकान 

न रहे ग़रीब जहाँ में , ऐसा लाए अनुशासन
रोटी,कपड़ा,मकान , मोहिया करे प्रशासन
___________________________________
✍🏻 @राज मालपाणी (शोरापुर-कर्नाटक)

 नग्न लोगों के दरों से धोतियाँ बिकती रही
मर्ज तो कायम रहा और गोलियाँ बिकती रही ।


आदमी ऐसी शराफत की रखे चादर रहा
भीड़ तो भूखी रही,बस रोटियाँ बिकती रही ।

किस तरह इंसानियत के मायने समझे शहर
इस शहर में आदमी की बोटियाँ बिकती रही ।

कौन सोचेगा वफ़ा के फूल थोड़े बाँट दे
आजतक केवल जफ़ा की गोटियाँ बिकती रही ।

फिर किसी एक द्रौपदी के जिस्म को नोंचा गया
भीड़ साफे ले खड़ी थी,चोलियाँ बिकती रही ।

देखता तो है शहर पर आँख गिरवी छोड़कर
क्यों जमीरों को भुलाकर टोलियाँ बिकती रही ।

आप सामाने-वफ़ा की बात करते किसलिए
आज तक केवल वहां बस बोरियां बिकती रही ।

उन पहाड़ों की कसक को कौन समझेगा अजय
रौंद कर जिनकी ख़ुशी को चोटियाँ बिकती रही।
सत्य प्रकाश सिंह
केसर विद्यापीठ इंटर कॉलेज प्रयागराज
(2)
कौन पूछे हाल मुर्दों के कफन की

संकट है जब जिन्दा लोगों के वसन की।
भला कौन पूछे हाल मुर्दों के कफ़न की।।

लूटने की होड़ सी लगी चुने हुए गद्दारों में।
फिकर किसे भला अब अपने वतन की।।

डर है अब तो फूलों को अपनी माली से।
कौन करे अब हिफाजत इस चमन की।।

हिन्दू-मुस्लिम, दंगों मे जो बंट जाये हम।
किसकी जिम्मेदारी है राष्ट्र के अमन की।।

हल चलाता अन्नदाता जब खेतों में अपनी।
कैसी हालत पसीने से तर बतर बदन की।।

जब नोटों की गड्डी उछले या चले लात घूसे।
कैसे बचे मर्यादा मर्यादित संसद सदन की।।

सत्य प्रकाश सिंह केसर विद्या पीठ इटंर कालेज प्रयागराज

विधा- हाइकु
************
(1)
चीरहरण
द्रौपदी असहाय
पांडव मूक

(2)
द्रौपदी लाज
बचायें गिरधारी
बढ़ायें चीर

(3)
पड़ोसी देश
खींचें कश्मीर चीर
है दुशासन

(4)
लाल वसन
पहने दुल्हनिया
सुन्दर नार

(5)
रोयेे कपड़ा
देख के फटेहाल
खोया अस्तित्व

(6)
वस्त्र भंडार
आकर्षित करते
मन लुभाते

स्वरचित *संगीता कुकरेती*



#भिखारी#

वस्त्र पहनता मैं टाट का
घूमता राही मैं रात का
नहीं लूट जाने की चिन्ता
अर्थ समझो मेरी बात का

दिखता हूँ मैं एक गरीब
पर हूँ मैं ईश्वर के करीब
लाड़ला हूँ मैं ईश्वर का
मुझसा नहीं कोई शरीफ

सर्दी, गर्मी हो या बारिश
अमृत समझ में पी जाता
रूखी सूखी रोटी को भी
पकवान समझ जी जाता

मेरी ये ड्रेस बहुत निराली
अंग प्रदर्शन बजे न ताली
दया भाव से मुझको देखे
कहे कोई ना मुझे मवाली

मैने ड्रेस धनिक की देखी
आँखे लोगों ने खूब सेकी
अंग प्रदर्शन करते भारी
सिर्फ बातों में मारे शेखी

स्वरचित कुसुम त्रिवेदी दाहोद

विधा - अलंकारिक कविता

किरणों के वस्त्र।

ये रजत बूंटों से सुसज्जित नीलम सा आकाश
ज्यों निलांचल पर हिरकणिका जड़ी चांदी तारों में

फूलों ने भी पहन लिये हैं" वस्त्र" किरण जाली के
आई चंद्रिका इठलाती पसरी लतिका के बिस्तर पे

विधु का कैसा रुप मनोहर तारों जडी पालकी है
छूता निज चपल चांदनी से सरसी हरित धरा को

स्नान करने उतरा हो ज्यों निर्मल शांत झील में
जाते जाते छोड़ गया कुछ अंश अपना पानी में

ये रात है या सौगात है अनुपम कोई कुदरत की
जादू जैसा तिलिस्म फैला सारे विश्व आंगन में।
स्वरचित
कुसुम कोठारी ।
तौहीन ए ईमान से खुद किनारा कर लिया। 
मैंने फाकों से दोस्ती की गुजारा कर लिया। 

उनके महल की सोने , के पिंजरे सी जिंदगी। 
काटे कटी ना रात सफर गवारा कर लिया। 

मै तुम वे और आप की चख चख है बेमजा। 
प्यारी सी एक हंसी सबको प्यारा कर लिया। 

उनकी हंसी पे कैसे हंसा यूं अरसे के बाद मैं। 
मालूम हो कि जख्मे- दिल दोबारा कर लिया। 

छुपाते रहे हैं लोग अक्सर ऐबों को पैरहन में। 
मैंने गिरते हुए मेयार का, नजारा कर लिया। 

आज उनके इल्म के हम भी हुए हैं कायल। 
दौलत को अपनी मांग का सितारा कर लिया। 

हंसती है आज सोहल ये जमाने की रौनके। 
तूने गिरती हुई दीवार का सहारा कर लिया। 

विपिन सोहल
विधा :हाइकु

आदिम युग
वृक्ष की छाल, पर्ण
तन वसन

वस्त्र की खोज
विकसित सभ्यता
लाज ढकता

नीला अम्बर
प्रकृति आवरण
मन हरण

चीर हरण
नारायण रक्षक
अब है कहाँ?

मनुष्य रूप
मौसम अनुरूप
वस्त्र विभिन्न

स्वरचित
अनिता सुधीर
विधा-हाइकु

1.
वस्त्र सीलना
कला खूब निराली
दर्जी का काम
2.
रंगीन वस्त्र
पहनती नारियाँ
तीज त्योहार
3.
सुंदर वस्त्र
पहने दुल्हन ने
रंग बिरंगे
4.
लाल कपड़ा
खतरे का सूचक
रोकता रेल
5.
नहीं धुलता
सुंदर कपड़ों से
मन का मैल

स्वरचित
अशोक कुमार ढोरिया
मुबारिकपुर(झज्जर)
हरियाणा

वसन/वस्त्र/कपड़ा/चीर
एक वो पगली
घूमती सड़क पर
पत्थरों से खेलती
पत्थरों को झेलती
विक्षिप्त मन
उघड़ा तन-बदन
चिंदी-चिंदी,चिथड़ा चीर,
चीथड़ों की जंजीर
उलझी फाँस सी जुड़े।
हा!तन पे वस्त्र न पूरे।
एक वो आधुनिका
सम्पन्न,संभ्रांत,सबरंग
कपड़े,कटे,फटे और तंग
सुंदर साज, सृंगार
घूमती भरे बाजार
चटक चटकारे
वसन धारे,
आधे-अधूरे।
एक वो घृष्ट,
निगाहें मुड़-मुड़ घूरे
कपड़े छोटी या सोच?
पागल कौन ये सोच?
-©नवल किशोर सिंह
स्वरचित

13/03/2019
"वसन/चीर/कपड़ा/वस्त्र"

✍️✍️
तन रुपी कोरा वस्त्र
जन्म से मिला मानव को
अपने सत्कर्मों से करते हम
उज्ज्वल ,धवल।
कुकृत्यों से लग जाते
दामन में दाग,
छलिया है मायावी संसार।।

इंग्ला पिंग्ला के ताना भरनी
मिलकर बनते तन के चीर
जग के खेल खेल में
हो जाता यह मलिन,
फिर जाए कैसै द्वार रघुवीर।।
✍️✍️
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

हरित धरा के वस्त्राभूषण,
नीलांबर है छतरी इसकी।
पीतांबर शोभित गिरधारी,
मोरमुकुट पगडी है जिसकी।

प्रकृति प्रदत्त हमें ये मिलता,
खोज करें जब हम तनधारी।
छाल बृक्ष की बहुत लपेटीं,
विकसित हुई सभ्यता भारी।

सीखे कपास उपजाना हम,
चरखा बहुत चलाया बापू ने।
कात कात सूत तकली चर्खे से,
वस्त्र बनाऐं बतलाया बापू ने।

नंगधडंग घूमते थे जो पहले,
पत्ते छाल लपेटकर रहते थे।
आई बुद्धि मानव में धीरे धीरे,
कुछ बिचित्र श्रंगार कर रहते थे।

हर देव जन की अपनी मरजी
ये डमरूधर मृगछाल लपेटते।
जिसको जैसा मन भाता पहने,
कुछ नंगे दिखते टाट समेटते।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र।

विधा हाइकु
विषय वस्त्र

वसन फटे
भिखारी ठिठुरता
नयन जल

लज्जा का अस्त्र
वस्त्र का आवरण
तन व मन

कपास पौधे
वसन का निर्माण
शरीर रक्षा

वस्त्र उद्दोग
रोजगार सृजन
प्रसन्न मन

गंदे कपड़े
शरीर बने रोगी
डॉक्टर घर

मनीष श्री
स्वरचित
रायबरेली

विधा- मुक्तक 

वस्त्र केवल बाहरी व्यक्तित्व को सुन्दर बनाते,
कितने काले मन वसन की श्वेतिमा में मुँह छुपाते।
रोज हम सब देखते हैं चमक की तह में कलुषता-
फिर भी क्यों इस बाहरी सौन्दर्य पर सब रीझ जाते।

सादगी वस्त्रों की मन को उच्चता से जोड़ती है।
राग- द्वेषों को मिटाकर सद्गमन - हित मोड़ती है।
चाहे जितनी राजसी पोशाक को धारण करे नर -
किन्तु कर्मठता मनुज की हृदयतल झकझोरती है।
स्वरचित 
डॉ ललिता सेंगर
ाइकु 
विषय:-"वस्त्र/वसन/चीर" 

(1)
बुध्दि थी नग्न 
शिक्षा ने पहनाये 
सभ्यता वस्त्र 
(2)
आया वसंत 
धरती को ओढ़ाया 
पीत "वसन"
(3)
निकाल आत्मा 
काल ने यहीं छोड़ा 
तन "वसन"
(4) 
सजाये तन 
वस्त्रों की शालीनता 
खास है "मन"
(5)
मन लुभाते 
संस्कृति की पहचान 
वस्त्र कराते 
(6)
विचार लड़े 
"वस्त्र" न ढक पाए 
मन उघड़े 

स्वरचित 
ऋतुराज दवे
-------------------------
एक कली जो खिलने को थी
मसल दी हैवानों ने
वजह क्या थी
छोटे वस्त्र
पहने थे 
नहीं
इंसानियत मर चुकी थी
वहशी दरिंदों की
तभी तो नहीं
दिखती उन्हे
नन्ही कली
नाजों से
पली
जब स्त्री का होता चीरहरण
तार-तार होती इज्जत
लोगों की दृष्टि में
वही इसकी
जिम्मेदार
होती
बातें बनती उसके पहनावे
उसके कपड़ों पर
छोटे वस्त्रों पर
पर उन नन्ही
कलियों का
दोष क्या 
उनके
वस्त्र
यह सोच उन्हें जीने नहीं देती 
उनके तानों से आहत
उल्हानों से पीड़ित 
कपड़ों पर लगते
प्रश्नचिंह
उनके
सच्चाई जानते दुर्योधनों की
पर सब धृतराष्ट्र बने हैं
मौन रहते देखते
भीष्म की तरह
द्रोपदी के दर्द
उनकी चीख
करें कान
बंद
***अनुराधा चौहान***© स्वरचित
रात का अंधेरा
लाज बचाती वह
दुर्योधन के
चीर हरण से
उम्मीद नहीं 
आएगा किसन 
कोई आज

कपड़ा आज 
लगता मोहताज 
शरीर का
कपड़ा गायब 
होता जाता 
लज्जा अपने में 
सिमटती जाती

रहेगी मर्यादा में 
जब बहन बेटियां 
कपड़े इज्जत 
बचाएंगे उनकी

और आखिर में 

कपड़ा तेरी 
अजब कहानी
जिंदगी भर पहने जो
इन्सान कपड़े रंगीले
सफेद कफन ही
साथी आखिर उसका

स्वलिखित लेखक संतोष श्रीवास्तव
भोपाल
बादल का वस्त्र ओढ़े 
चांदनी निशा से मुँह मोड़े ।
छुप छुप जाते नन्हे सितारे 
चाँद चांदनी संग खेले 
आँख मिचौली ।
श्यामल बादल 
फैलाये चादर 
दामिनी संग जमकर दौड़े ।
घनघन बजते नूपुर 
थम थम कर सौदामिनी 
आकाशीय पटाखे 
झूमझूम कर फोड़े ।
बादल का वस्त्र ओढ़े 
चांदनी निशा से मुँह मोड़े ।

(स्वरचित )सुलोचना सिंह
भिलाई (दुर्ग )

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