Thursday, March 14

"करवट " 14मार्च 2019

ब्लॉग की रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं बिना लेखक की स्वीकृति के रचना को कहीं भी साझा नहीं करें |
             ब्लॉग संख्या :-327



करवट बदलते बीती रात
कैसे कहूँ दिल के जज्बात ।।

चाँद गवाही दे सकता है
वो ही था बस मेरे साथ ।।

तारे सारे हंस हंस छुप गये 
सुवह गम के साये थे पास ।।

मौसम भी करवट बदले था
विकट वो तन्हाई के लम्हात ।।

सिलसिला गमों का रूका न
होने न दी उन्होने मुलाकात ।।

आज 'शिवम' कलम मेहरबां
लिखा देती यह कुठाराघात ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 14/03/2019


शयन वक्त ही करवट नहीं है
करवट होती सदा जागरण
शुद्ध कर्म पर अड़े रहो जग
है कर्म पूजन नित आमरण
करवट है हुंकार जीवन की
मानव आखिर क्या न करता
तूफानों से संघर्षित वह नित
सदा लक्ष्य मुठ्ठी में है भरता
सतयुग त्रेता द्वापर कलियुग
कालचक्र अद्भुत करवट है
जो जाना है अद्भुल पल को
सदा जग में वह नर वर है
ऋतुएँ भी करवट लेती 
गर्मी बरखा सर्दी आती
कभी काया होती कंपित
कभी गर्मी आग लगाती
करवट लेता है जीवन भी
जन्म युवा बुढ़ापा आता
मायावी मतलबी जग में
न स्वयं पहिचान है पाता
करवट राह बदल देता है
दानव से मानव बन जाता
अगर स्वयं से भिज्ञ रहे तो
सुख चैन जीवन नित आता
लोकतंत्र महायज्ञ आहुति
करवट बदले राजनीति की
निर्वाचन जन एकाधिकार से
सूरत बदले रीति नीति की।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।


तुम जज़्बात न समझे हमारे, 
चमक खोने लगे प्यार के सितारें,
तुम भी मौसम की तरह होने लगे, 
कुछ महीनों में करवट बदले लगे |

जब खाली वक्त होता था तुम्हारा,
तब हमारे सिवा कोई न था तुम्हारा,
व्यस्तता अब तुम बहुत दिखाने लगे,
शायद किसी ओर के सपने सजाने लगे |

करवटें बदलते रातें हम बिताने लगे,
तुम खामोशी से हमसे किनारा करने लगे, 
कभी तो वक्त हमारे लिए भी करवट लेगा, 
तुम्हारी बेवफाई का वक्त ही जवाब देगा |

स्वरचित *संगीता कुकरेती*

चंचलता के रंग में डूबी हुयी , दुनियाँ की हर इक शय रहती है 

इन्सानों को ये नित रंग नये नये , हर पल ही दिखलाया करती है |

कब क्या होगा ये कोई न जाने, धोखे में सबको ही रखा करती है,

हमेशा अपनी सुबिधा से ही , ये दुनियाँ करवट बदला करती है |

मानव मन का नहीं कोई ठिकाना , कब किस करवट बैठने वाला है ,

रंज कभी कभी खुशी कब करे कटाक्ष , कब वाह वाह करने वाला है |

कभी तो ये साधु बड़ा ज्ञानी ध्यानी रहता ,परोपकारी बडे दिल वाला है , 

कब करवत बदल कर के झटपट , वह लालच के दरिया में कूदने वाला है |

संसार राजनीति का भी अनोखा , ऊट किस करवट बैठने वाला है ,

कब राजा यहाँ पर रंक बन जाये , इसे नहीं कोई भी जानने वाला है |

होता वक्त बड़ा ही अजब खिलाड़ी , वो कब कहाँ क्या चलने वाला है ,

जग में कौन हुआ है पैदा ऐसा , जो इसकी फितरत को समझने वाला है |

रिश्ते भी होते मायाजाल से लिपटे , कहाँ करवट कौन बदलने वाला है ,

यहाँ पर महसूस दर्द तो वही करेगा , जो ठोकर को खाने वाला है |

घड़ी घड़ी दिल की धड़कन लेखन मेरा , यही बस दुआ माँगने वाला है ,

ऐसी करवट न ले कोई भी यहाँ , जिससे किसी का भी अनिष्ट होने वाला है |

स्वरचित , मीना शर्मा , मध्यप्रदेश ,


विषय :-करवट ।विधा :-कविता:-
मौसम ने करवट बदली है

ऋतुओं कै आये ऋतुराज
फागुन के संग फगुआई के 
रंग रंगे हैं सब सारे साज ।
कोई नहीकिसी की सुनता
गालों में मल रहा गुलाल
रंग भरी पिचकारी मारी
सिरऊपर रंग डारे लाल ।
श्याम रंग में रंगी चुनरिया
दूजा रंग न कोई है आज
करवट लेकर चलागया जो
वापिस न फिर आया साथ ।
स्वरचित :-उषासक्सेना


क्यों मुंह फेर लेते तुम गुरूवर,
हमें चाहिए आशीष आपका।
बदलें करवट अगर गुरूदेव जी,
बस मिले शुभाशीष आपका।

जय जय श्री गणेश मात शारदे।
जय बुद्धिदात्री माता बुद्धि वरदे।
रहें सभी मिलजुलकर दुनियां में,
कुछ शुभ चमत्कार मात तू करदे।

दीनदयाल तुम करूणा की सागर।
माँ भर दो तुम खुशियों की गागर।
करवट बदल रहे निशदिन अज्ञानी,
स्वीकारें दंण्डवत मां हमारी सादर।

सुख दुख तो आते जाते जीवन में,
तुम इन्हें सहने की हमें शक्ति देना।
करवट ना बदलें कभी सर्वदेव तुम,
सिर्फ अपने चरणों की भक्ति देना।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.


ग़ज़ल,
सूरज को भी ढल जाने दो,

दीपक को भी जल जाने दो।।१।।
यह दल वालों का शासन है,
शासन को करवट बदल ने दो।।२।।
खुशियों की बारात आयेगी,
ती लगी के दिन टल जाने दो।।३।।
जीवन भर पीड़ा मिल ती रही,
गीत में पीड़ा ढल जाने दो।।४।।
ग़म से भी छुटकारा पाने,
माया को भी जल जाने दो।।५।।
यह शिशु किसका है पता नही,
लोगों में भी पल जाने दो।।
देवेन्द्र नारायण दास बसना छ ग।।


------------------
पल पल बदलती हैं
भाग्य की लकीरें
वक़्त लेता है करवट
कभी सुख की छाँंव
कभी दुःख की बदली
बदल जाती तकदीरें
जब दुःख की हवा चले
रातों की नींद उड़ जाती
इंसान बदलता करवट
चैन नहीं फिर हर पल
आती प्रलय खामोशी से
जब मौसम लेता करवट
कहीं आएं आँधी तूफान
कहीं पर धरती धसकती
भाग्य लेता जब करवट
इंसान की किस्मत चमकती
फूल खिलते तब बहारों के
महक उठते हैं गुलशन
***अनुराधा चौहान***© स्वरचित


करवटों के नीड़
""""""""""""""""""""""""

दुःख-सुख के लबादों की सलवटों में
अन्तहीन "करवटों" के नीड़ से
चहचहाने दो जीवन चिड़िया को
बसंत की शाखाओं पर बैठकर
सांसों की फैली मंजरियों के बीच
लबादों से उन्मुक्त होकर...।

क्योंकि...

अपनी ही देह के साथ
बगैर अंग-विन्यास बदले यह लबादे
कितनी सहजता से मन अनुरूप
धारित हो जाते हैं, और ढ़क लेते हैं
अकेलेपन की शिकायत से, फिर
अन्दर ही अन्दर भरने लगते हैं
शून्यता, अशब्दता अपार में
अपने भीतर के सुनसान प्रांत में
अन्तर्मुखी वृतियों की तह बनकर....।

और यह सुख के लबादे...

अन्तर्मन पर चिथड़ों में बँटकर भी
अकारण आनन्द भरते हैं
हवाओं का हल्का सा स्पर्श पाकर
बहर्मुखी होकर चारों ओर
आयुष्य खम्भों से झांकती रोशनी लेकर
मन के वीरान जंगल में
गुनगुनाते छंद की आवाजें भरते हैं
सतरंगी इंद्रधनुषों से सजधज
झिलमिलाते हैं सितारों के संग...।।

स्वरचित
✍🏻 गोविन्द सिंह चौहान


विधा-हाइकु

1.
बर्फबारी ने
लेकर करवट
ठंड बढ़ा दी
2.
पूर्वा हवा ने
बरसाया बादल
ली करवट
3.
बदल गया
मिजाज मौसम का
ले करवट
4.
कटती नहीं
लेकर करवटें
विरही रातें
5.
विरही रातें
बदलें करवट
प्रेमी याद में
6.
भाग्य भरोसे
करवट तलाशें
परीक्षा फल
7.
सावन मास
करवट प्यार की
पिया मिलन
8.
पल में प्यार
लेकर करवट
बैर भूलाता
********
स्वरचित
अशोक कुमार ढोरिया
मुबारिकपुर(झज्जर)
हरियाणा


लघु कविता
☺️☺️☺️☺️☺️☺️☺️
यादों के करवटें बदलती रही
संग तेरे जीती मरती रही
नैन अपना भिगोती रही
अश्कों के दरिया में डूबती रही

यादों के करवटें बदलती रही
चैन अपना मैं लुटाती रही
तारों संग टिमटिमाती रही
रातों को मै जागती रही।

यादों के करवटें बदलती रही
मुझे देख चाँद भी छुपता रहा
मन पलाश सा दहकता रहा
तेरे नाम का दीया जलाती रही

यादों के करवटें बदलती रही
बेला की खुशबू आती रही
रात रानी भी महकती रही
मेरे रुहों में समाती रही।।

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

जीवन की विसंगतियां


बहारों ने फिर ली कुछ ऐसी "करवट" 
शोलो में शबनमी अब तपिस धीमी सी।

मौसम यूं कह रहा कर कर सलाम
फूलों की नियती में हर हाल झड़ना।

जर्द पत्तों का शाख से बिछड़ना
तिनके के नशेमनो का उजडना।

ख्वाहिशों का रोज सजना बिखरना 
सदियों से चला आ रहा ये सितम।

मन के बंध तोड इच्छा क्यों उडती अकेली 
मगृ मरीचिका जीवन की अनसुलझी पहेली।
स्वरचित 

कुसुम कोठारी।

यादों में उनकी बदली है कितनी करवटें....
सब हाल बयां करती बिस्तर की सलवटें...

हसीं सपनों की ख्वाहिश में लेटे रहे बस...
नींद न आई आँखों में बदलते रहे करवटें...

साथ जीने मरने के सजाए थे अरमान...
हिस्से में आई मेरे सिर्फ़ ये तन्हा करवटें...

आकर थाम लो अब हाथ मेरा ए "गज़ल"...
आ बदल लें अब हम एक दूजे की करवटें..

यादों की तस्वीर से निकल कर सामने आ...
पा जाए अब सुकूं ए मोहब्बत मेरी करवटें..

स्वरचित :- मुकेश राठौड़


गहरी चोट
वक्त की करवट
टूटे घमंड़

ले करवट
बदले परिणाम
सब हैरान

यादें सहारा
करवटों के साथ
कटती रात
****
स्वरचित-रेखा रविदत्त
14/3/19


विधा=हाइकु 
=========
(1)भाग्य बदले
वक्त पे करवट
कोई न जाने 

(2)कर्म का फल
गरीबी ने बदली
है करवट

(3)जीतेगा कौन
करवट ले जन
चुनावी जंग 

(4)सुदामा भाग्य 
जब ली करवट
बदली दशा

(5)छोटा पलंग 
करवट बदली 
जम़ी पे हम

(6)है कहावत
किस और बैठेगा
ऊँठ बताओ

(7)ले करवट
बड़ी सेना की शक्ति
आया राफेल

===रचनाकार ===
मुकेश भद्रावले 
हरदा मध्यप्रदेश


रात भर जागती रही मैं बेचैन आँखों से 
जाने किसकी याद मुझे सता रही थी 
बेचैन होकर चलकदमी करती रही हैं

कभी करवट बदल बदल कर सोचती रही .

तुम्हारे इश्क में गुमसुम सी रही ऐ नींद 
करवट बदल कर अपने दिल का इज़हार करती रही 
करवटों में उलझी ही रही मैं 
तुम्हारा चहेरा ख्वाब में ढूंढती रही.

मैं करवट बदलती रही रात से सुबह हो गई 
ना जाने कब दिल की बात आंसू में बह गई 
दिल का दर्द जबां पर आ गया 
दिल ने फिर से एक नई करवट ली .
स्वरचित:- रीता बिष्ट

वह बदलते रहे करवटें इसकदर,
दूर होती गई नींद उनसे हर कदम।
कास साहस रखा होता थोड़ा भी उसने,
जुदा होती न निदिया आंखों से इस कदर ।
वह छुपाते रहे राज हमसे सदा,
इसलिए हो गए देखो ओझल यहाँ से।
चलो हम चले कुछ कदम तो बढाएं,
कब तलक केवल करवट बदलते रहेंगे।
करो कुछ जतन दूर बेचैनी करो,
छोड़ करवट बदलना काम दिल से करो।
(अशोक राय वत्स)स्वरचित


मैं इधर जाऊँ
मैं उधर जाऊँ
सबकी नजरें मुझपर
मैं किधर जाऊँ
मुझे मनाने को अड़े
प्रलोभन लिए खड़े
अपने किस्मत पर क्या ऐंठू
मैं ऊँट हूँ साहब
जाने,किस करवट बैठूँ 
मेरी करवट की आड़ में
बंजर-खेत रेत सुखाड़ में
बड़े ववंडर टल जाते हैं
आश्रय लेकर पराश्रयी
ऐसे ही,आगे निकल जाते है 
मैं ऊँट हूँ साहब
मरु ही सर्वस्व धन है
मरुस्थल ही मेरा जीवन है
जीते हैं मरीचिका में
जल-स्रोत की आस में
अगले ववंडर में आएंगे
वो फिर करवट की तलाश में
-©नवल किशोर सिंह
स्वरचित


कविता 

युग अब करवट बदल रहा है नया जमाना आएगा,
भ्रष्टाचार- अनाचारों का पूर्ण अंत हो जाएगा। 

धन-वैभव के महल बनाकर जो खुशियों में जीते थे,
नोटबंदी के बाद न अब फिर काला धन छुप पाएगा।

अब तक देश छद्म- कृत्यों से आहत होता आया है,
लेकिन राष्ट्र-द्रोहियों का अब कुछ न दाव चल पाएगा।

सीमा पर सशक्त प्रहरी सब देश-सुरक्षा में रत हैं,
अब शत्रु का कोई वार न राष्ट्र-अहित कर पाएगा।

राष्ट्रभक्ति का ज्वार आज हर भारतवासी के मन में,
उनके पावन राष्ट्रवाद से नवभारत बन जाएगा।

स्वरचित 

डॉ ललिता सेंगर


भाग्य जब लेता करवट
चमक उठती किस्मत
होता अनुकूल
खिल उठते
सहरा में फूल
दर खटखटाता
जब दुर्भाग्य
होता प्रतिकूल
बदलता करवट इंसान
चैन न पाता किसी करवट
वक्त की करवट
पल में बनाती
रंक को राजा और
राजा को बनाती रंक 
बदलता मौसम
लेता जब करवट
आते कयामत के
आंधी और तूफान
हिल जाता इंसान
रुग्णता में पीड़ित तन
अपनों के दिये
जख्मों से पीड़ित मन
सो न पाता 
छटपटाता
बदलता करवट 
हर पल

सरिता गर्ग
स्व रचित


दर्दे दिल 
बेवफा सनम 
रात भर 
करवट |

जुदाई जानम 
एहसास जगाते 
बदलते हैं
करवट |

बदला मिजाज 
दौलत बेहिसाब 
नींद गायब 
चिंता बढी
करवट ही करवट |

परिश्रम दिन रात 
ली किस्मत ने
करवट |

प्रतिभाशाली 
भारत का युवा 
स्वप्न अनंत 
वेरोजगारी ग्रसित 
लेते करवट |

आगमन चुनाव 
परिणाम क्या 
अंधेरे में तीर 
मन अधीर 
शयन कक्ष 
सिर्फ करवट |

खुश जन मन 
ऋतु बसंत 
कोकिला गायन 
उत्सव फाग 
मौसम करवट |

सुविचार 
सहयोग परस्पर 
अंत बुराई 
विकास करवट |

छलकता पैमाना 
भीगता मन 
हसीन सपने 
लेते करवट 
ऑंखों का कमाल |

स्वरचित , मीना शर्मा , मध्यप्रदेश 

करवटें बदलता वक्त, 
जीवन के चादर में, 
दे जाता है,
जानें कितनी सिलवटें!

चुपके से बदल लेता रुख,
और छोड़ जाता,
अहसासों की दरिया में, 
मुड़े -तुड़े चादर!

सुख- दुख लहरों के झोंके 
कभी इस किनारे 
कभी उस किनारे 
उछालती।

भँवर जाल में 
चक्रवात सा
घुमता जीवन 
वक्त संग मजबूर हो
लिपटा 
चिथड़े- चिथड़े होता 
अस्तित्व बचाने की पुरजोर कोशिष के बावजूद ,

तिनका -तिनका 
बिखर जाता
वक्त के, अंतहीन
करवटों संग!!

स्वरचित 



सुधा शर्मा 
राजिम छत्तीसगढ़ 

 ये करवट
नयी पहल शुरू
आया चुनाव।।


लें करवट
दें नये परिणाम
हों जागरूक।।

बढ़ा आतंक
मौत की करवट
पिसे निरीह।।

गरीबी हटी
भाग्य की करवट
भूत न भूलें।।

अधिक वृष्टि
ऋतु की करवट
प्रकृति कोप।।

निरीह रोगी
बदले करवट
मख्खियां घेरे।।

भावुक


बहुत अनूठे रंग प्रेम के ,
नींद बदलती रहे करवटें ।
होए मिलन या होय विछोह ,
शैया पर रहती हैं सिलवटें ।

प्रेम हृदय में लेता करवट ,
मौसम जब परिवर्तित होता ।
भ्रमर कली की प्रीत देख कर ,
हृदय संवेग आवर्तित होता ।

नभ पर शशि देख पूर्णिमा का ,
लहरें सागर में बल खाती ।
सिंधु हृदय जब करवट लेता ,
नृत्य -स्थल बने उसकी छाती ।

पृथ्वी भी लेती करवट है ,
जब सह न पाती अत्याचार ।
वक्ष काँपने लगता उसका ,
होता देखती है व्यभिचार ।

कुदरत करवट लेती है जब ,
बसंती हवाएँ तब हैं चलती ।
मकरंद सुवासित को लेकर ,
कलियों के मुख उबटन मलती ।

स्वरचित :-
ऊषा सेठी
सिरसा 125055 ( हरियाणा )


क्यों करवट बदल रहे हैं ।
अपने नहीं संभल रहे हैं ।
अब जैसे ही चुनाव आऐ,
नेता पाला बदल रहे हैं।

अपना मतलब ढूंढ रहे हैं।
गफलत मे ही घूम रहे हैं।
रोज तमाशे होते हैं यहां,
कुछ पीकर दारू झूम रहे हैं।

करवट ऐसे यहां बदलते ।
जैसे गिरगिट रंग बदलते।
नहीं जनता से है मतलब,
अपना स्वार्थ ये ढूंढ रहे हैं।

स्वर
चितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

षित शब्द - करवट
******************
हवा बंजारन सी फिरती रही मेरी गलियों में तमाम शब
हमने भी करवटें बदलते- बदलते गुज़ार दी तमाम शब ।

सुना है ज़िदगी ने फिर ख़ुशियों की महफ़िल सजाई है 
साज़ ए दिल पर हम भी गीत गुनगुनाते रहे तमाम शब ।

कभी फ़ुरसत से शिकवे शिकायत मिलकर दूर करलेंगे
कहती रही ख़ुशनुमा सहर से रात की रंजिश तमाम शब ।

कोई तो गुज़रेगा इन दिल की गलियों से, ये सोचकर
आँखों में इंतज़ार लिए शमा जलती रही तमाम शब ।

साहिल पर फैली ख़ामोशी और लहरों में निहां तलातुम 
नाखुदा जानें किस कशमकश में मुततला रहा तमाम शब ।

मुतमइन कोई नहीं यहाँ ज़िदगी से , मुतासिर भी नहीं कोई
सिलवटें कह रही हैं ,रात भी करवटें बदलती रही तमाम शब ।

तारे निकल पड़े चाँद का डोला सजाए जाने किस ज़ानिब
चाँदनी अफ़सुरदा , कहकशां परेशां, नज़र आए तमाम शब ।
स्वरचित (c)भार्गवी रविन्द्र .....१४/०३/२०१९
तलातुम - तूफ़ान , नाखुदा - नाविक , मुततला - उलझा हुआ ,मुतमइन -संतुष्ट , मुतासिर - प्रभावित , ज़ानिब -ओर , अफ़सुरदा - उदास , कहकशां-आकाश गंगा


करवट बदल बदल कर
ख्वाब भी सारे सो गये
तुझ बिन सजना पर नींद
ना आई अँखियों के द्वारे

सावन बीता, भादो बीता
कितने बीते मधुमास रे
मेरे जीवन में तो सजना
तुझ बिन रहा पतझर का वास रे

कितने सूरज तेज हुए
कितने सजे आसमां पे चाँद-तारे
मेरा चाँद औ'सूरज तो तू पिया
जो आया न कभी मिलन द्वारे

करवट करवट रात बीत रही
सिलवट सिलवट चादर पर
कितने दिन सूने बीते
कितनी जागती रही रातें

कब तक दीदार ना होंगे
कब मिलन यामिनी के
मधुमास ना होंगे
अब तो दरस मिले सांवरिया
कुछ तो मन को राहत मिले मेरे।

डा.नीलम.अजमेर


कैसी ये करवट ली वक़्त ने ,
मैं वीतरागी हो गई ।
सुखों की चाह में ,
भटकी इतना ,
भटकना मेरी फितरत हो गई ।
ना आरजू थी पारस की मुझे ,
खोजते खोजते पत्थर की मानिंद ,
मैं खुद पारस हो गई ।
मौसम की करवट ,
करवट यह उम्र की ,
जाने क्या-क्या सिखा गई ।
चांदी की लकीरें ,
लकीरें चेहरे की ,
मेरा हिस्सा हो गई ।
कैसी ये करवट ली वक्त ने ..
सभी को तो देखा ,
बड़ी हसरतों से ,
न ली किसी ने करवट ..
की मुझको देखे ।
मैं खड़ी इंतजार में ,
इस घर का सामान हो गई।।

नीलम तोलानी
स्वरचित


(1)
धरा की ओट
रवि ले करवट
साँझ प्रकट
(2)
धरा के घर
मौसमी करवट
रोग दस्तक
(3)
बैचैन नैन
इश्क ले करवट
गायब रैन
(4)
विदेश बेटा
करवटे बदलें
माँ की ममता
(5)
सोचे गुनाह
बैचेन करवटें
वृद्धाश्रम में
(6)
जख्म रिसते
वक़्त की करवट
बदले रिश्ते

स्वरचित
ऋतुराज दवे


आज है चाँद ख़ामोश
चाँदनी भी कुछ उदास है
फैलाकर रात्रि का गहन तम
हालात हो जाते हैं कितने विषम
आँखें लगती हैं मानो बाग़ी
निंदिया को विस्मृतकर
ख़यालों की हो गई सहभागी
पल पल लेते जाते भाव
हृदय में करवट कुछ ऐसे
कभी आशा कभी निराशा
जीवन अदृश्य छाया कुहासा
अतीत की विश्रांत यादें
वर्तमान की भुलाई बातें
भविष्य में कोई नही भविष्य
लक्ष्य पाहुन का कैसा आतिथ्य
बेचैनी से अनुप्राणित हुई करवटें
मखमली बिस्तर पर पड़ी सलवटें
किस मौन वेदना का बनकर साया
अर्ध रात्रि में आज सामने यूँ आया

संतोष कुमारी ‘ संप्रीति ‘
स्वरचित

करवट बदल बदल हमने बिताई रातें
यादों का घर बनाकर हमनें भुलाई रातें।

आयेंगेें होश में क्या मदहोश हो चुके है
चुकता करेंगे कैसे हम ये उधारी रातें।

पल पल बदल रहा है वक्त भी करवटें तो,
बस यादों का सहारा ,जिसने निभाई रातें।

खायी है चोट फिर से टूटी नहीं उम्मीदें
रो रो हमनें अक्सर पूरी बिताई रातें।

जलते सभी चराग़ सोने को चल दिए
पलकों में मेरी रह रह बस झिलमिलाई रातें।

स्वरचित
गीता गुप्ता 'मन'

विषय-करवट
कभी -कभी जब रिश्ते करवट बदलते हैं, छा जाती है शून्यता 
बदल जाते हैं हालात 
करवट बदलते ही बीतती है पूरी रात
विस्मृत यादें आंदोलित करती हैं
विचारों के बवंडर मचाते हैं हलचल 
मन ही नहीं तन भी होता है बहुत विव्हल,प्रश्नों की झड़ी मचाती है शोर 
निदिया रानी रूठकर जा चुकी होती हैं कहीं और
बार-बार सोचनेको हम हो जाते है मजबूर 
न कोई हल निकलता है ,न कोई समाधान 
रात गुज़रती है करवट बदलते 
कभी ताकते हैं जमीं तो कभी आसमां
करवट ही देती है यह आशा क़ि शायद इसके बदलते ही शायद छटेगा 
निराशा का कुहासा 
विचार करवट बदलेगें ,हम भी करवट बदलेंगे तो शायद निशा की जटिलता
हटेगी ,निदिया रानी आएगी ।
स्वरचित

मोहिनी पांडेय


वक्त है
बड़ा बलवान
कब किस
करवट बैठता है
कोई नही जानता
लेता है जब
ये करवट
बना देता है
राजा को रंक

रात
जब लेती है
करवट
उम्मीदों की
रोशनी फैलती है
चहुंओर

उम्र की करवट
रुबरू करा
देती है
जिंदगी की
पहेलियों से
कभी धूप तो
कहीं छाह

नज़ाकत समझो
ऐ इन्सान
वक्त की
लेता है करवट
जब ये
पहुँच जाता है
इन्सान
श्मशान तक

स्वलिखित लेखक संतोष श्रीवास्तव
भोपाल

No comments:

"विधि/विधान"20नवम्बर 2019

ब्लॉग की रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं बिना लेखक की स्वीकृति के रचना को कहीं भी साझा नहीं करें   ब्लॉग संख्या :-571 अभी सक्रिय है ...