Monday, March 18

"अंकुर" 16मार्च 2019

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             ब्लॉग संख्या :-329
मां शारदे को नमन...

मिट्टी से फूटा है अंकुर

प्यास को मेरे तर कर दो

संघर्ष भरे जीवन में

एक नया उमंग भर दो।

अंबर के मस्तक पर

शब्दों के वस्त्रों से छंद भर दो।

मूक नहीं बन कर बैठूंगा

सूर्य जैसा ज्योतिपुंज भर दो।

मिट्टी से फूटा है अंकुर....

तम के बादल मन की आधी

ज्योर्तिलिंग से प्रकाश पुंज कर दो

मिट्टी से फूटा है अंकुर.....।

सत्य प्रकाश सिंह प्रयागराज


माँ गर्भ में शिशु अंकुरण
प्रकृति का ही चमत्कार है
शिशु होता प्रभु की मूरत
कौन कहे वह निराकार है
दिव्य लालिमा लिये भास्कर
अंकुरित होता पूर्वांचल में
जाग्रत होते जीव जंतु सब
छा जाता आनंद भू तल में
वसुंधरा पावन अंचल पर
वनस्पतियां अंकुरित होती
भाव भक्ति से ओतप्रोत सब
देवालय नित घण्टी बजती
मातृभूमि को वन्दन करते
देश भक्ति का अंकुर होता
सीमा की रक्षा में सैनिक
अमर शहादत वह नित देता
दीन दुःखी सेवा करते वे
परोपकार का अंकुर होता
वह देता लेता नहीं कुछ भी
सदा बीज खुशियों के बोता
मात पिता के सदाचरण से
संस्कार अंकुरित होते हैं
बालक करते सदा अनुकरण
वे नित जग आगे बढ़ते हैं
अंकुर होता ज्ञान हृदय में
परमपिता खुद दर्शन देते
भाव भक्ति भूखे प्रभु तो
हर विपदा को वे हर लेते।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

भोर किरण ,
ऊर्जा ले आई ।
सुप्त बीज ने ,
ली अँगड़ाई ।

अंकुर फूटा, 
चीर धरा को ।
नन्हा पादप, 
ऊर्ध्व उगाई ।

पंच भूत से ,
पाया जीवन । 
सृष्टि उपक्रम, 
है फलदाई ।

माया जीवन ,
मन उमड़ाया ।
बोध का अंकुर ,
जगा , सुधि आई ।

' मैं ' हूँ कौन ?
किसलिए आया ?
क्या था करना ?
क्या राह सुहाई ?

मोह पिटारा ,
कौन सहारा ?
भव को तारा ,
प्रभु लगन लगाई ।।


हे मानव खुद को पहचान,
स्वयं सृजनचक्र तू जान
निराश न हो ,
आशा है यहीं कहीं,
एक अंकुर फूटेगा फिर,
कभी न झुकने पाये,
हार के समक्ष अपना ये शीश,
धरती पर चरण रज हो,
सिर्फ और सिर्फ तेरा,
अपना हक लेकर,
अपनी अलग पहचान बना,
रेत के घरौंदे नही,
इरादों के महल बना,
निराश न हो,
आशा है यहीं कहीं,
एक अंकुर फूटेगा फिर !
उथल पुथल भरा मन ,
सुख-दुख का अनुभव है,
जन्म-मरण का पहरा है,
मानवता कहीं खो गई,
दिखावे की भीड़ में,
फिर भी जीवन हरा-भरा,
होगा तेरा देख जरा,
निराश न हो,
आशा है यहीं-कहीं
एक अंकुर फूटेगा फिर !
ईश्वर की अनमोल कृति,
मानव जीवन सार भरा,
प्रेम जगत में फैला दे,
चारो ओर निःस्वार्थ भरा,
ईर्ष्या,द्वेष ,स्वार्थ को तज,
प्रेम की धारा निश्छल बहा,
प्रकृति का कर सम्मान,
खुद को साबित कर,
निराश न हो,
आशा है यहीं कहीं
एक अंकुर फूटेगा फिर !
इस अभिशप्त जीवन में
शुभ के पुष्प उगा दे तू,
विश्वास जगा खुद पर,
तो जीवन से प्यार कर,
भरोसा खुद पर हो,
साहस खुद का जगा दे,
मुस्कान,उमंग,आनंद,मस्ती
का खिलता कमल है जीवन,
जीवन के उतार -चढ़ाव,
से लड़ने की कला सीख ले,
निराशा से लड़,
सफलता को आगोश में ले,
भूत को भूल कर,
वर्तमान को जी ले जरा,
भविष्य की चिंता छोड़ दे,
आंदोलित जीवन मे,
फिर आनंद ही आंनद,
सफलता चरण चूमेगी तेरे,
निराश न हो,
आशा है यहीं कहीं,
एक अंकुर फूटेगा फिर !

*************************************
रचनाकार:-राजेन्द्र मेश्राम "नील"
चांगोटोला, बालाघाट ( मध्यप्रदेश )

विषय-अंकुर
🌺🌹🌺🌹🌺🌹🌺🌹🌺
अंकुर प्यार का बोया तो खिली धरा
भोर जागी तितलियों ने भरा
पराग
कलियों ने ली अँगडाई हो
गया बचपन जवां
रात भी धोने लगी अपने
गेसू जवां
तिमिर से मिल गले रश्मियां भी
खिली वहाँ
दूर छटने लगी आलस की कमसिन
गर्मियां
फाग भी भरने लगा रंगों को बाँहों
में यहाँ
रगों की छटा छाने लगी गालो पर
छाया गुलाल

🌺स्वरचित,🌺

नीलम शर्मा#नीलू

अँकुर
हम प्रेम का बीज बोये।

तो अँकुरित हुआ प्रेम।
वे घृणा का बीज बोये।
तो घृणा अँकुरित होती रही।

कोई बीज बोता है घृणा का।
तो बदले में उसे घृणा हीं मिलेगी।
प्रेम का बीज जो बोयेगा।
उसे सदा बदले में,
प्रेम,प्रीत हीं मिलेगी।

प्रेम अँकुरित हृदय में जब होय।
परमात्मा विराजे वहाँ।
जीवनहोजायेआनन्दित।
सुखी होवे जन,जन वहाँ।।
स्वरचित
वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी

जब भाव प्रस्फुटित होते हैं मन में ,
अव्यक्त शब्दों का जन्म हो जाता |
साकार हो जाती कवि की कल्पना,
पाठक को नया उपहार मिल जाता |

जब जब भाव अंकुरित हुआ त्याग का ,
स्नेह व ममता का अम्बार लग गया |
रूप निखर उठा है सम्पूर्ण जगत का ,
जग को मानवता का संदेश मिल गया |

सहयोग मिल गया जब भी अपनो का ,
मन में संस्कार का अंकुर तब जन्मा |
पदचिन्हों पर बालक ने कदम बढाया ,
उज्जवल भविष्य का अंकुर फिर जन्मा |

उदित हुआ प्रकृति प्रेम का अंकुर मन में ,
प्रकृति को नया एक संरक्षक मिल गया |
वसुंधरा का कहलाया है वह पुत्र लाडला ,
हमारा मानवता पर फिर उपकार हो गया |

हम बीज लगायेंगे जब जब सत्कर्मो का ,
मानवता का तब तब ही अंकुरण होगा |
जब मन में बीज होगा धरती से प्रेम का ,
देश भक्ति का मन में तब ही अंकुर फूटेगा |

स्वरचित , मीना शर्मा , मध्यप्रदेश 

सुनहरी धरा पर
प्रस्फुटित अंकुर
प्राची में उगे
सूर्योदय जैसा है
ओस कणों ने
मेरे आँगन के अंकुर को
धीरे से जगाया
बहती पवन ने
माँ सा
प्यार से सहलाया
मुँह चूमा
और दुलराया
तपती धूप ने
जब झुलसाया
बारिश की बूंदों ने
प्यार से नहलाया
प्यारे बच्चे सा 
रूप उसने पाया
सुबहोशाम देख उसे
मेरा मन हरषाया
पत्ते निकले टहनी लहकी
अंकुर तब 
पुष्प बन लहराया
मेरा रोम रोम
खुशी से भीगा
खिलखिलाया
हरा भरा रक्खो
इस जगती को
पल्लवित पुष्पित अंकुर
मन महकाता है
हमारा जीवन है
प्राणदाता है

सरिता गर्ग
स्व रचित

अंकुर फूटा
उपजी सद्भावना
विकाश हेतु।।


आतंक फैला
विनाश अंकुरित
अमानवीय।।

दिखा अंकुर
किसान प्रफुल्लित
श्रम का फल।।

पापी अंकुर
अपराध की जड़
निरंकुशता।।

बढ़ा अंकुर
बोया जब बबूल
आम की इच्छा।।

भावुक


ग़ज़ल,
तम ने देखा तो दम ही निकल जाएगा,

दीप आहट पे उनकी संभल जाएगा।।१।।
खौफ से तीरगी के न रोना कभी,
चांद निकला तो मंजर बदल जाएगा।।२।।
होगें जब बीज पीड़ा ओं के अंकुरित,
स्वप्न मेरा बहारों का फल जाएगा।।३।।
मेरे विश्वास के सूर्य के सामने,
बर्फ जैसा अनिश्चय पिघल जाएगा।।४।।
देश की खैर मां गंगे जो मिल कर,
ये जो संकट उपस्थित हैं टल जाएगा।।५।।
स्वरचित देवेन्द्र नारायण दास बसना छ,ग,।।


सीधी सच्ची सरल भाषा
लिखती हूँ मन की अभिलाषा
नित पनपते मेरे मन में
नव अंकुर अहसासों के
आशाओं की बेल पनपती
मन के कोमल भावों से
कोरे कागज पर लिखकर
करती भावों को साकार
रचनाओं के रूप से निखरे
शब्दों का यह सुंदर संसार
लय न जानूं ताल न जानूं
भावनाओं में बहना जानूं
कविता लिखूंँ या गीत लिखूंँ
भावों से अपनी प्रीत लिखूंँ
नित पनपें सबके मन में
नव गीत सुंदर भावों के
मोती बनकर चमकें सदा
शब्द सुंदर अहसासों के
चाँद की चाँदनी बनकर
मधुमास का प्यार बनकर
सावन की रिमझिम फुहारों-सी
लिखूँ मैं विरह की वेदना
सीधी सच्ची सरल भाषा
लिखती हूँ मन की अभिलाषा
***अनुराधा चौहान***© ® स्वरचित


विधा .. लघु कविता 
*************************
🍁
सुप्त हृदय मे पुनः प्रेम का,
अंकुर यू फूटा है।
वर्षो बाद वो बिछडा साथी,
रस्ते मे जो मिला है।
🍁
भूल चुका था जिसको मै वो,
सामने मेरे खडा था।
भाव मेरे निश्छल आखों से,
बरबस आ निकला था।
🍁
याद सुनहरे बन्द हृदय से,
बाहर आ निकला था।
भावो के मोती शब्दों को,
बाँधे मेरे खडा था।
🍁
कैसे कहे तुम्हे वो मंजर जो,
मैने वहाँ देखा था।
दोनो के आसू आँखो से,
अधरो तक पहुचा था।
🍁
गले लगा कर शेर ने उससे,
मन की बात कहाँ था।
याद सुनहरी अंकुर पर,
बरबस ही आ निकला था।
🍁

Sher Singh Sarraf


अंकुरित हो प्रभु प्रेम बीज तो
हर घर मंगल हो जाऐ।
नहीं दिखे कहीं वैरभाव यहां,
कहीं नहीं दंगल हो पाऐ।

प्रेमपुष्प प्रस्फुटित हों मन में,
जन मन कुसुमित हो जाऐ।
रागद्वेष नहीं दिखे कहीं भी,
हर हृदय प्रफुल्लित हो जाऐ।

अंकुर उपजे हरजन मन ऐसा
चहुं दिशा खुशहाली छाऐ।
नहीं कहीं दुनिया में भगवान,
धोखे से भी बदहाली आऐ।

प्रेमप्रीति बस प्रेमपात्र हों।
रुचि सभी की प्रेमास्त्र हों।
अंकुरित हों ज्ञान के पौधे,
न निरक्षर कोई अपात्र हो।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

************
दिल की जमीं पर तुम,
कब प्रेम के बीज बो गये, 
एहसास की खाद भी डाली, 
फिर अचानक लापता हो गये |

तुम्हारे विरह की तपन में, 
मैं रोज ही जलती रही, और
आंसुओं से बीज को सींचती रही,
आज अंकुर उसमें फूट गया |

इस बेरहम दुनियां में आज, 
नन्हें पौधे ने कदम रख लिया, 
मालूम है, मुश्किलें आएगीं बहुत,
मैंने अपना जिगर मजबूत कर लिया |

तुम तो भूल गये मुझे लापता होकर, 
पर तुम्हें मैं कैसे भूल पाऊँगी? 
पौधा, वृक्ष भी बनेगा एक दिन, 
कैसे उसे मैं छुपा पाऊँगी ?

दुनियां के उन तमाम सवालों का, 
जवाब भी मुझे अकेले देना पड़ेगा, 
माँ हूँ न कोख मुझे ही मिली है ,
हिसाब भी मुझे ही देना पड़ेगा |

स्वरचित *संगीता कुकरेती*


विधा-हाइकू।

1)
मन अंकुर,
खिल कर भावों में,
करे सृजन।
2)
अंकुर फूटे ,
हर्षित है किसान,
मिटाये क्षुधा।
3) 
पुष्प अंकुर,
पहनता कन्हैया,
माली गूँथता।
4)
सुंदर दृश्य,
उपवन अंकुर,
महके धरा।
5)
गौरी शृंगार,
साजन को लुभाय,
पुष्प अंकुर।
©सारिका विजयवर्गीय"वीणा"
नागपुर(महाराष्ट्र)

अधर्म का अंधियारा है चारो ओर
भय,द्वेष,इर्ष्या ,
क्रोध दिखता हर
ओर
उठे घने पापों के
बदरा कहीं निरादर तो कहीं 
अत्याचार घनघोर
विचारों में घुल गया जहर ।
रहते थे पहले भाई
चारे से
अब फूटी आंख न
सुहाते
कैसे धर्म की ज्योति बुझी जाती
परम् नीति भी अब खत्म हुई जाती ।
न दिखता भाव दया का 
करते धर्म की बात 
वे जो हिन्द की 
परिभाषा भी न जाने
न जाने जो इस्लाम
को वे अपनी दाढ़ी
मूंछ हैं बढ़ाते ।
भगवान ,अल्लाह न किसी मंदिर-
मस्जिद के मोहताज़
कहते है स्वयं राम
हैं वे कण- कण में
खोजो ध्यान करो
वे मिलेंगे तुझे तेरे
घट में ।
क्यूँ हम भेड़ चाल 
चलते जाते
आँख मूंदकर बस
पीछे चलते जाते
क्यूँ धर्म के नाम
पर अधर्म करते
जाते।
आया वक़्त सब मिल डालें बीज
मानव मन मे
देशप्रेम और सत्यता का ।
फूटेगा अंकुर हर
मन में जो होगा 
नई खुशबू से परिपूर्ण, देश मे
होगा प्रेम और प्रेम
फूटेगा अंकुर मानवता का,इंसानियत का
जो कहीं दब गया 
तेरा -मेरा की जोड़
में
मेरा -मेरा की होड़
में।।।।
अंजना सक्सेना


बीजांकुर

जलधर भार से नीचे झुके
चंचल हवा ने आंचल छेड़ा
अमृत बरसा तृषित धरा पर
माटी विभोर हो सरसी हुलसी
हृदय तल मे जो बीज थे रखे
उन्हें प्यार से सींचा स्नेह दिया
क्षिती दरक ने लगी अति नेह से
एक बीजांकुर प्रस्फुटित हुवा 
सहमा सा रेख से बाहर झांके
खुश हो अंगड़ाई ली देखा उसने
चारों और उसके जैसे नन्हे नरम, 
कोमल नव पल्लव चहक रहे
धरित्री की गोद पर खेल रहे 
पवन झकोरों पर झूल रहे 
अंकुर मे स्फुरणा जगी
अंतः प्रेरणा लिये बढता गया।

सच ही है धरा को चीर अंकुर
जब पाता उत्थान है
तभी मिलता मानव को
जीवन का वरदान 
सींचता वारिध उस को
कितने प्यार से
पोषती वसुंधरा , करती
उसका श्रृंगार है
एक अंकुर के खिलने से
खिलता संसार है।
स्वरचित 
कुसुम कोठारी।

कागजी धरा पर...
कलम रूपी हल चलाकर
बोए कुछ शब्द बीज...
काव्य रूप में अंकुरित हुए..
भावों की मिट्टी में..
कल्पनाओं के सिंचन से..
मस्तिष्क तंतुओं से छनकर..
सृजन रूप अवतरित हुए..
नवांकुर लिया जब शब्दों ने..
झकझोर दिया हृदय पट..
बनकर दीप ज्ञान का..
शब्द स्वतः प्रकाशित हुए..
सहकर आलोचनाओं के तूफां..
काव्य तरु स्थापित हुए...

स्वरचित :- मुकेश राठौड़

🌱🌱🌱🌱🌱🌱🌱
प्रेम का अंकुरण हुआ 
जब से मेरे जीवन में
सुंदर लगने लगी ये दुनिया
नव वसंत का आगमन हुआ

नूतन सवेरा, नव आनंद
हर पल खुशियों का मेला
दूर हुआ जीवन का अँधेरा
कैसी है प्रभु की माया।।

भूलकर तेरा और मेरा
पल्लवित हुआ प्रेम हमारा
मन में उमंग भी जाग रहा
प्रीत के रंग से रंग रहा।।

तन मेरा चहक रहा
किसलय से सज रहा
तन का तरुवर खिल रहा
नित-नित पुष्पों से भर रहा

वृक्ष फलों से भर गया
उस दिन मैं परिपूर्ण हुई
वसुंधरा भी अब तृप्त हुई
जीवन आनंद से सतुष्ट हुई

नित पल्लव झड़ने लगे
जीवन का पतझड़ आया
उस दिन मै बुढ़ी हुई
तन सुख के ढूँढ हुआ।।

फल से कुछ बीज बना
मिट्टी में था वो मिला
पुन:प्रेम का अंकुरण हुआ
फिर से नूतन जन्म मिला।।

नव जीवन का अंकुर फुटा
जीवन का हर रुप मिला
सुख-दुख का यही क्रम रहा
जन्म -मृत्यु का चक्र चला।।

स्वर
चित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

विधा-हाइकु

1.
फूटा अंकुर
मातृभूमि प्यार में
देश भक्ति का
2.
प्यार अंकुर
प्रस्फुटित दिल में
सींचा प्रेमी ने
3.
शिक्षा अंकुर
मिटाके अज्ञानता
पाता मंजिल
4.
सुप्त अंकुर
लेने हवा प्रकाश
उठा आकाश
5.
प्यारा अंकुर
उठा भर उमंग
नभ छूने को
********
स्वरचित
अशोक कुमार ढोरिया
मुबारिकपुर(झज्जर)
हरियाणा


आज फिर वह दिन याद आया है,
जब दिल हमारे मिले थे।
प्रथम प्यार प्रथम भाव 
दिल में अंकुरित हूआ।
भूल चुका था मैं जिसको,
वह फिर से सामने आई थी।
वह सकुचाई सी आई थी,
मन मेरा भी घबराया था।
आकर जब हौले से बोली,
दिल में संगीत हुआ झंकृत।
जब नैन उठाकर देखा उसको,
दिल धड़का जोरों से मेरा था।
बिन कहे हमारी आँखों ने
सब कुछ ही तो कह डाला था।
कुछ शब्द अधरों तक आए थे,
पर फिर से उर में समा गए।
बस आंखों की भाषा से ही,
हमने एक दूजे को सराहा था।
कुछ ही पल को हम साथ रहे,
पर पूरा जीवन हमने जीया 
पूरा जीवन हमने जीया
स्वरचित (अशोक राय वत्स)

"शीर्षक-अंकुर"
जब पड़ा दुःखों का रेला
प्रभु ने आकर स्वयं उबारा
फुटा अंकुर भक्ति भाव का
भक्तिमय हो गया जीवन हमारा

हर क्षण हर पल प्रभु को सौंपा
निश्चित हो गया मन हमारा
भक्ति का अंकुर बस रोप ले बंधू
सुधर जायेगा जीवन धारा

भक्ति का अंकुर जब प्रस्फुटित होगा
खुल जायेगा ज्ञान -चक्षु
कण कण मे है राम बसे
सौंप दे अपना जीवन सारा
स्वरचित-आरती-श्रीवास्तव


**
अंधेरे गर्भ में छिपा 
छोटा नन्हा सा कोमल बीज 
अन्जान झंझावात से ,
पाकर प्रकृति का दुलार 
धरती का सीना फाड़
हरीतिमा लिए सृजन का उपहार
अंकुरित हो रहा 
लिए नवजीवन की बहार ।
जग की रीति सदा रही 
जो बोया सो पाय
बीज बोय जो नफरत का 
ह्रदय प्रेम कहाँ अंकुरित हो पाय।
आज स्थिति यही बन रही
संस्कार की कमी रही 
खाद पानी आवश्यकता 
से अधिक पड़ा
जीवन मूल्य समझ न पाए 
अनुशासन के डोर से बाँध न पाए
बच्चे ,कच्चे घड़े के मानिंद 
बालमन मे जो लिखा ,
अमिट छाप छोड़ जाए
ये बीज रूपी बालक 
पब्जी जैसे खेलों में उलझ जाय
तो वो अंकुरित हो कैसे 
वो प्रस्फुटित हो कैसे?
कैसे वो उज्ज्वल भविष्य 
के सृजनकर्ता बने !
नाकामी किसकी 
बीज की ,अंकुरण की 
या खाद पानी की ?
नन्हे अंकुरित कोपलों को 
प्यार से सहेजना होगा ,
मजबूत वटवृक्ष बनाना होगा ।

स्वरचित
अनिता सुधीर श्रीवास्तव

विधा - हाइकु

पलने देते
कन्या भ्रूण अंकुर
बेटा समान

बीज रोपण
अंकुरित पादप
स्वच्छ समीर

उपजों मन
प्रेम-प्यार अंकुर
रिश्ते मधुर

अंकुर ईर्ष्या
नफरते पनपी
रिश्ते खण्डित

स्वरचित
बलबीर सिंह वर्मा
रिसालियाखेड़ा सिरसा (हरियाणा)

रक्त बीज के अंकुर, 
वेद बीज के अंकुर, 
दोनों का माटी से उद्भव 
रक्त बीज अति क्रूर! 
असत्य का बोलबाला 
सब पर ऐसा जादू कर डाला , 
असत्य का डंका ,
सच्चे का मुंह काला , 
रक्षक भी भक्षक, 
केंचुआ भी बन गया तक्षक! 
अधर्म हर जगह पसारे पैर, 
धर्म के ज्ञाता से बैर! 
हर ठग की ठकुराई हैं , 
हर जन से निठूराई हैं ।
अंत नहीं हुआ निशाचरों का , 
विष वमन, संत दमन, 
सुरा सुंदर नैन रमण! 
मानवता बिलख रही दूर, 
फूट रहे पाप के अंकुर! 
कभी तो धर्म पताका फहरायेगी , 
सत्य को असत्य पर विजय दिलाएगी ।
दबा हुआ यह धर्मांकुर, 
चमकेगा अब भावांकुर! 
तब जीत निश्चत हो जाएँगी , 
प्रस्फुटित हो जाएँगे नवांकुर! 
स्वरचित -चन्द्र प्रकाश शर्मा


अंकुर 

उम्मीदों पर है
ये दुनियाँ 
हर करता है
अच्छे की कामना

बोते है बीज
यह सोच कर
अंकुरित होगा 
एक दिन

जीवन में 
हर क्षण 
अंकुर
खिलता है
नये सतरंगी 
सपने लिए

जब दिखता है
खेत में 
बीज का अंकुर
किसान का मन
हो जाता है प्रसन्न 

फलीभूत 
अंकुरित होगी
इन्सान की
हर इच्छाए
अगर वह
सच्चे मन से
मांगे ईश कृपा

स्वलिखित 
लेखक संतोष श्रीवास्तव भोपाल

हाइकु 
1
सृष्टि अंकुर 
मनु व सतरूपा 
अभिशापित 
2
झरते बीज 
जब हों अंकुरित 
धरा हरित 
3
प्रीत अंकुर 
भावो की होती खाद 
रिश्तो की खेती 
4
आत्मा अंकुर 
देह होती धरती 
ईश्वर किसान 
5
ज्ञान अंकुर 
अध्यात्म होती खेती 
आत्मा की पौध 
कुसुम पंत "उत्साही "
स्वरचित 
देहरादून



प्रेम की भूमि
अंकुरित खुशियाँ
सुख है फल

बहा पसीना
धरती है मुस्काई
फूटा अंकुर

नव अंकुर
उम्मीद की किरण
पूर्ण सपने
*****
स्वरचित-रेखा रविदत्त
16/3/19
शनिवार


वो मेरे सपने साझा करती है,
नित नव अंकुर मेरे ह्रदय में 
प्रेम के बोया करती है ।
नींद चुरा कर मेरी 
बड़ी तसल्ली से 
सुकून संग सोया करती है ।
वो मेरे सपने साझा करती है ।
प्रीत की आंच से अंकुर खिला 
नव पल्लव प्रेम का जागा 
मैंने उससे अपना घर 
साझा करने का आज 
एक वादा मांगा ।
वो मेरे सपने साझा करती है ।

आँखों का जादू 
प्रेम अंकुर फूटा 
मन की धरा 

(स्वरचित )सुलोचना सिंह 
भिलाई (दुर्ग )

बीज करुणा 
बरसात नयना 
अंकुर क्षमा |

गुरु किसान 
परम्परा महान 
अंकुर ज्ञान | 

दरिया प्रेम 
अंकुर सुख बेल 
विषाद फेल |

अंकुर कोख 
कैसी सबकी सोच 
बेटी को दोष |

संस्कार बीज
अंकुर तहजीब 
स्वप्न सजीब |

धरती माता 
देश अपना पिता 
अंकुर बेटा |

बीज कल्पना 
अंकुर है रचना 
भाव व्यजंना |

परोपकार 
अंकुर स्नेह प्यार 
सदाबहार |

शिक्षा प्रभाव 
अंकुर बदलाव 
धारा प्रवाह |
स्वरचित , मीना शर्मा , मध्यप्रदेश 


शीर्षक- अंकुर
बीज भावों के

बो दिए हृदय में।
आंसुओ से सिंचती रही
रोज सुबह शाम मैं।

वक्त गुजरा अंकुर फूटे
कविता के रूप में।
हौले हौले अंकुर ये
पहले पौध फिर पेड़ बना।

खुशी-दर्द, घृणा-प्रेम के
अनगिनत फल लगते रहे।
पतझड़ बसंत,बारीश गरम
सम भाव से सहते रहे।।
स्वरचित कविता
निलम अग्रवाल, खड़कपुर



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:गवाह/सबूत"22 जून 201 9

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