Monday, March 18

" स्वतंत्र लेखन "17 मार्च 2019

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             ब्लॉग संख्या :-330

सजल हृदय पथ का साथी हूं......

तुम हो कुसुमित पुष्प प्रिये
मैं हूं तेरा निश्चल अनुरागी
हृदय द्वार पर खिल जाओ तुम
बना रहूंगा अविरल सहभागी
पायल की हर झुनझुन पर तेरे
प्राण न्योछावर है सारा
मलयलिन अलको पर ओढे़
नभ के चादर का हर तारा
नयनों के शीतल झरने में
गजगामिनी सी पलकें भारी
बांध लिया आगोशो के ओसों में
मेघो का मँडराना है जारी
कंगन की हर खनखन पर तेरे
रचूँ छंद मैं जग का सारा
जब -जब महके के आंचल तेरा
जगमग -जगमग चमके
नभ मंडल का हर तारा
हृदय ऐश्वर्य को स्फुरित करो तुम
पुष्प जग का प्रथम सुगंध होवे न्यारा
मिले रूप दर्शन लावण्य यह तेरा
चुम्बित बसंत के प्रथम तरंग से
पुलकित हो जाए विह्वल मन मेरा

पथ का साथी डरती है........ अविचल मन से

डरती हूं मैं बिकल कली नग्न तंतु काया से
कहीं मैं तेरे उपवन से छिन्न भिन्न ना हो जाऊं
पवन स्पर्श काँपते है तेरे इस पुलकित माया से
जीवन की इस बीणा में
व्यंग बाण की पीड़ा में
अश्रु धार की क्रीड़ा में
लाज ,कुल ,मान, शील ,ज्ञान, अज्ञान होगा
उच्च प्राचीर महलों का बारंबार अपमान होगा
अग्नि परीक्षा देना होगा व्यर्थ का अभिमान होगा
मैं सीता नहीं बन पाऊंगी नारी जगत तेरा सम्मान होगा

भले ही तेरे सौंदर्य के बंधन क्यों ना स्वर्गीय हो..........

स्वरचित

सत्य
प्रकाश सिंह केसर विद्यापीठ इंटर कॉलेज प्रयागराज


हाइकु

(१)
रंग फुहार
पिचकारी की धार
भींगे है तन
(२)
उड़ा गुलाल
फागुन सराबोर
होली के रंग
(३)
रंग उड़ाता
फागुन मनभाता 
होली की धूम
(४)
फाग के गीत
गुझियों की मिठास
सखियां साथ
(५)
होली के रंग
फागुन बरसाता
द्वेष मिटाता
(६)
प्रीत में रंगे
मानव का जीवन
होली संदेश


***अनुराधा चौहान***©® स्वरचित


विधा - ग़ज़ल
=======================
ग़रीबी की कहानी यूँ मेरा घर बोलता है ।
गिराए बूँद दो बादल तो छप्पर बोलता है ।।१।।

पता लगता है जब उसको मेरी तश्नालबी का,
मुखातिब हो के ख़ुद मुझसे समुन्दर बोलता है ।।२।।

मेरे घर आज तुम तश्रीफ लाओगे यकीं है,
जो मुझसे मुस्कुरा कर अब मेरा घर बोलता है ।।३।।

कि ढाता है मेरी बे वश रआ़या पै सितम कोई ,
मेरे अन्दर का शाइर लफ़्ज़ बनकर बोलता है ।।४।।

'अ़क्स 'तुम ऊँची उड़ानें भर रहे हो क्यूँ फ़ज़ा में,
हवाएँ तुन्द हैं इतनी कि शहपर बोलता है ।।५।।
==========================
'अ़क्स' दौनेरिया


*************************
#क्या_जगत_का_भार_हूँ_मै_?
***************************************
कुचिका है चित्रपटल है,
है अनोखे रंग मनोहर !
है विस्तृत उद्गार ह्रदय में,
है कलामय ये कुशलकर !

स्रोत जीवन का जहां से,
शुष्क बन निर्झर गया हो!
कब चितेरा कर सका,
आंखों बिना निर्माण सुंदर !
आह के दो अक्षरों में,
है छिपा इतिहास मेरा !
विवशता का चित्र हूँ,
क्या जगत का भार हूँ मै ?

जानता हूँ मृत्यु से भी,
हीन है निस्सार जीवन !
किन्तु क्या उपचार इसका,
कर सका लाचार जीवन !
गरल जीवन दान दे तो,
मृत्यु का आधार क्या हो?
बन गया क्या आज मृत्युंजय,
विवश यह व्यर्थ जीवन !
विश्व के हित क्या स्वंय ही,
भार हूँ अपने लिए भी,
व्यर्थ का संघर्ष हूँ,
असमर्थ का प्रतिकार हूँ मैं,
क्या जगत का भार हूँ मैं ?......

राजेन्द्र मेश्राम""नील"""
चांगोटोला, बालाघाट ( मध्यप्रदेश )


राधा जी की विरह वेदना

आज राधा की सूनी आंखें
यूं कहती सांवरिया 
जाय बसो तुम वृंदावन
कित सूरत मैं काटूं उमरिया। 

कहे कनाही एक हम हैं
कहां दो, जित तुम उत मैं 
जित तुम राधे, उत हूं मैं
जल्दी आन मिलूंगा मैं । 

समझे न हिय की पीर 
झडी मेह और बिजुरिया
कैसो जतन करूं सांवरिया 
बिन तेरे बचैन है जियरा । 

बूंदों ने झांझर झनकाई 
मन की विरहा बोल गई
बांध रखा था जिस दिल को
बरखा बैरन खोल गई ।

अकुलाहट के पौध उग आये
दाने जो विरहा के बोये
गुंचा गुंचा विरह जगाये 
हिय में आतुरता भर आये।

विरह वेदना सही न जावे 
कैसे हरी राधा समझावे
स्वयं भी तो समझ न पावे
उर वेदना से हैअघावे।

राधा हरी की अनुराग कथा
विश्व युगों युगों तक गावे गाथा

कुसुम कोठारी।


~◆गजल सृजन

आजादी महलों की दीवानी क्यों है
दीवारें आपस में मनमानी क्यों है।

बदहाली की सूरत पे चमकते है नारे
जमीं का मसला आसमानी क्यों है।

पिछड़े, तो पिछड़े तगड़ों का भी देश
शर्मिंदा कोई नहीं मरता, हैरानी क्यों है।

गुल होने से पहले ही नोंचे जाते हो बदन
फिजाओं में आज जहर खुरानी क्यों है।

आलीशान रुतबों को क्यूँ नहीं दिखता
मगरूर लोगों में आखिर शैतानी क्यों है।

सूखता है समुन्दर भी रोकर आखों से
दिखते सब्जबाग रेगिस्तानी क्यों है।

तुष्टिकरण से होते रहे सत्ता के हरण
जनता में इतनी नादानी क्यों है।

आजादी तुझे कितनी महबूबा लिखूं
पास सबके सितम की कहानी क्यों है।

#राय दशकों से लानत ओढ़े सोता देश 
ये मर्ज आखिर कार हिंदुस्तानी क्यों है।

पी राय राठी
भीलवाड़ा, राज


सगुण निर्गुण भेद नहीं है
प्रभु जग में घट घट वासी
गन्ध सुगन्ध सदा समाहित
रब उज्जवलमय पूर्णमासी
राम रहीम वाहे गुरु ईशा
रोम रोम में प्रभु समाया
भक्ति मार्ग अलग हो चाहे
दीन वत्सल सदा कहाया
दिवा निशा प्रकृति पालक
सूरज चँदा झिलमिल तारे
वह अखंड ब्रह्मांड नियंता
रब करता नित वारे न्यारे
भाव भक्ति के भूखे भगवन
दीन दुःखी हर आह में बसते
मंदिर मस्जिद गिरिजा सूने
वे हर नर आत्मा नित रहते
छाप तिलक घण्टी माला
छप्पन भोग नहीं वह भूखा
मोह माया तजे जीवन भर
वह खा लेता रूखा सूखा
है जग त्राता विश्व विधाता
सुख शांति जीवन में करदो
चँचल मायावी जगति में
भ्रातृभाव सद्स्नेह ही भरदो
है जगति के पालनहारा
छल कपट की कड़ियाँ तोड़ो
भावों की निर्मल गङ्गा से
प्रभु आप जन हित जग जोड़ो।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।


- ''आज का इंसान"

आज किसी को किसी की नही चाह

बदल लेते जरा जरा सी बात पर राह ।।

कैसा विचित्र जमाना आया है आज 
कैसा हो गया है इंसान अब बेपरवाह ।।

रंज तो तब होता है ''शिवम" कि जब 
परिवार में ही दिखती है आपसी डाह ।।

कैसे चलेगा कैसे फलेगा यह समाज
इसमें भलाई नही है इसमें छुपे गुनाह ।।

जिसकी कीमत परिवार या समाज
उठाये देखे फिर इक दूजे की निगाह ।।

महाभारत इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है
ज्ञानी करते ही रह गये तब आगाह ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 17/03/2019


विधा -- बंधन मुक्त गीतिका 
**************************************
राष्ट्र लूटने वालो सुनलो ,मत करना तुम भ्र्ष्टाचार |
देश मेरा है जान से प्यारा , हूँ मेँ भी चौकीदार ||

राष्ट्र सुरक्षा मजबूत बनाएं ,ऐसी लाएंगे सरकार |
उठो कदम बढ़ाओ , मिलकर. लाएंगे नव बहार ||

56 इंच का चौड़ा सीना , करता है सबको आव्हान |
आओ मिलकर सभी बनाएं ,भारत की श्रेष्ठ पहचान ||

अब खून का बदला खून ही होगा ,कर देंगे बदरंग |
नामों निशान मिटा देँगे ,जीतेंगे निश्चित ही हम जंग ||

सुरक्षित हाथों में राष्ट्र रहें ,भारत हरपल चमकेगा |
कितने ही जयचंद मिला लो,भारत हर क्षण महकेगा ||
*******
* प्रहलाद मराठा 
* रचना ,स्वयं रचित मौलिक सर्व अधिकार सुरक्षित 
वज़न 1222 1222 1222 1222

ग़ज़ल

खुदी को जो न पहचाने वही कस्तूर मांगा था ।
हमारे रहबरों ने क्या यही जम्हूर मांगा था ॥

सियासी साजिशें करके शराबी हम को ठहराया ।
हमें मालूम ही कब था कि क्यों अंगूर मांगा था ॥

मिटी है तीरगी दुनिया हमारी हो गई रोशन ।
खुदा की रहमतों का बस जरा सा नूर मांगा था ॥

जमाने भर की दौलत से तुम्हारा साथ था प्यारा ।
तुम्हारा हाथ था मांगा, न कोहेनूर मांगा था ॥

वही रिश्ते दिखाते हैं अकड़ जिनको कभी हमने ।
खुदा के सामने झुक झुक के बा दस्तूर मांगा था ॥

अकेले ये डगर मुश्किल मगर है ये सफर मुमकिन ।
तुम्हारा साथ राही हमने कब भरपूर मांगा था ॥

कड़ी है धूप जीवन की कली फिर भी खिली देखो ।
खुदा से 'आरज़ू' ने हौसला भरपूर मांगा था ॥

रचना स्वरचित एवं मौलिक है ।
©®🙏
-सुश्री अंजुमन मंसूरी 'आरज़ू' 
छिंदवाड़ा मप्र

-----प्रेरणा-----

प्रेरणा, प्रेरणा मन का विश्वास है
प्रेरणा, प्रेरणा जगाती आस है
प्रेरणा, प्रेरणा जिसके पास है
फिर कामयाबी उसकी दास है

प्रेरणा, प्रेरणा देती झंकझोर है
प्रेरणा, प्रेरणा मंजिल का छोर है
प्रेरणा, प्रेरणा उठते की भौर है
फिर हाथ सफलता की डोर है

प्रेरणा, प्रेरणा नदी की धार है
प्रेरणा, प्रेरणा नौका की पतवार है
प्रेरणा, प्रेरणा दो दूनी चार है
फिर बेड़ा उसका पार है

प्रेरणा, प्रेरणा लौ जलाती है
प्रेरणा, प्रेरणा ही सब कराती है
प्रेरणा, प्रेरणा आलस भगाती है
प्रेरणा ही मंजिल दिलाती है

प्रेरणा, प्रेरणा सोये को जगाती है
प्रेरणा, प्रेरणा बैठे को चलाती है
प्रेरणा, प्रेरणा चलते तो भगाती है
प्रेरणा रुकना नहीं सिखाती है

स्वरचित
बलबीर सिंह वर्मा
रिसालियाखेड़ा सिरसा (हरियाणा)

जिंदगी का सफ़र क्या
ऐसे ही तय करोगे
रहोगे यूँ गुमशुदा से
रास्ते पर भटका करोगे ।

ये दुनियां है सराय
जाना होगा छोड़कर
बन्धनों से खुद को
मुक्त न करोगे?

कब तक इस मेलेमें
घूमोगे 
पालकर आसक्तियां
कब तक इन सब को
प्यार करोगे।

क्यूँ नहीं करते बाह्य से अंतर की यात्रा 
करोगे जो
स्वयं के भीतर स्वयं को
प्राप्त करोगे ।।।
अंजना सक्सेना


छाई उमंग
होली हो गया मन
रँगा है तन


सजना छुए
हुए लाज से लाल
गोरी के गाल

हुआ मलंग
भीग टेसू के रंग
सर्द मौसम

रंगों में डूब
भूले अपने गम
चढ़ी है भंग

बढ़ा लो प्रेम
एक दूजे के संग
लगा के रंग

रँगा जो उसे
रूठ गई मुझ से
मनाऊँ कैसे

#स्वरचित कविता 
शीर्षक -"बंजारा जीवन"

बंजारा जीवन भटकाए
गांव नगर और डगर डगर 
बकरी पाले दूध की खातिर 
श्वान करे रखवाली जमकर

लौहकर्म का कौशल उनमें-
कूट कूटकर भरा हुआ है,
युगल कर्मी के हाथ हथौड़ा-
संबल उनका बना हुआ है.

राजस्थानी परिवेश का -
सुंदर ताना बाना है,
इधर है साफा,धोती,कुर्ता-
उधर घाघरा पहचाना है.

गति जीवन है, जीवन चलना
बंजारों सा चलना भाता
जब भी देखें नजरें इनको
कर्मठ जग से जुड़ता नाता.

#स्वरचित
डा.अंजु लता सिंह 
नई दिल्ली


अशांति
हे कृष्ण
तब भी क्या परोक्ष रूप से
अशांति तुमने ही फैलायी थी
और स्वयं बैठ महल में
परिणामभिज्ञ, बाँसुरी बजायी थी
आज फिर वही कालचक्र बहुर
अशांति का व्योपार खिल रहा
और प्रमुख ,प्रणेता ,सूत्रधार को
शान्ति का नोबल पुरस्कार मिल रहा
नीति की गति यही,फिर विस्मय क्यों?
सच,सच बतलाना
इस कोलाहल से तुम्हें भय क्योँ?
संघर्ष से ही सत्ता का उद्भव
फिर कैसे हो प्रिय शांति का रव
हे सर्वज्ञानी,तटस्थ
तेरे हृदय में,ये कैसी पीड़ा है
क्लेश,कलह तो सत्ता की क्रीड़ा है
दंश,डंक,विध्वंस भी है वरदान
खिलते खल अधरों पर कुटिल मुस्कान
असमर्थ तुम,होगा न तुमसे 
अब कोई जन कल्याण
छोड़ो,चलो,बिखेरते रहो तुम 
अपनी वंशी की मृदुतान
-©नवल किशोर सिंह
स्वरचित


"मौसम ने ली अंगड़ाई है"
मुखड़ा हुआ गुलाबी देखो,
गोरी कैसे शर्माई है।
होली के रंग ने दिल में
पिया मिलन की आश जगाई है।

खेतों में सरसों ने देखो ,
कैसे ली अंगड़ाई है।
होली के दिन आने से,
मौसम में मादकता छाई है।

आंगन वाले आम की डरिया,
देखो कैसे झुक आई है।
पिया मिलन की आश में गोरी,
मन ही मन इठलाई है।

घर से लेकर बगिया तक में,
रौनक फिर से आई है।
देखो बाबा के होठों पर,
कैसी मस्ती छाई है।

बच्चे से लेकर बूढे तक में,
उमंग नई अब छाई है।
गोरी डूबी मस्ती में,
धरती ने ली अंगड़ाई है।

होली के मौसम में देखो,
सब पर मादकता छाई है।
अब दोष न देना जग वालों,
हर मन में मस्ती छाई है।

होली के मौसम में देखो,
गोरी मिलने को आई है।
यदि मन बहके मेरा लोगों,
मत कहना लाज न आई है।

होली के मौसम में देखो।
मौसम ने ली अंगड़ाई है।।
(अशोक राय वत्स) स्वरचित
जयपुर


.
विधा :नज़्म - वो दिन वो रातें कहाँ
****************************
कहाँ गए वो दिन ,वो रातें ,जो कभी हमारे अपने लगते थे
इक ख़ूबसूरत ख़्वाब सा हरदम इन आँखों में सज़ा करते थे ।

गाँव की ये घुमावदार गलियाँ ,पगडंडियाँ हैं वैसी ही
कहाँ हैं वो अल्हड़ बच्चे जो कभी यहाँ कंचे खेला करते थे ।

झाड़ियों की झुरमुट के पीछे वे लुकाछुपी , वो पतंगबाज़ी 
कहाँ गए वो लोग सारे ,जिनके दिलो-जाँ यहाँ धड़कते थे ।

ये चमन का आँगन जाना पहचाना सा लगता तो है , मगर
मगर अब वो परिंदे नहीं यहाँ जो हर सूँ चहकते-फुदकते थे ।

मेले अब भी सजतें हैं यहाँ , झूले अब भी पड़ते हैं ,यकीनन
खंडहर सी हैं वो दरो-दीवारें जो कभी बेबाक़ हँसी से गूँजते थे ।

चाँद का टीका सजाए , रात आज भी वैसी ही इतराती आती है 
क्यों ख़ामोश हो गए वो लब जो कभी लोरियाँ गाकर सुलाते थे ?

बिखेरती ख़ुशियाँ दहलीज़ पर अब वो उजली सी धूप कहाँ 
वो सुरमयी शामें कहाँ जो झरोखों की दरारों से झाँकते थे ?

वो तीज़- त्योहार ,वो पायल - कंगन, वो झूमर - बाली कहाँ 
मंदिर की घंटी से , जो कभी कुँओं की मुँडेरों पर बजते थे ।

वो अरुणाचल, वो तरुणाई , वो बदलते मौसम की अँगड़ाई 
वो हँसी-ठिठोली,मौज़-मस्ती जो होली के रंग संग बिखरते थे ।

न जाने कहाँ गुम हो गया मेरा वज़ूद इस दुनिया की भीड़ में 
हर गली , हर मोड़ से अपने ही घर का पता पूछते फिरते हैं ।

जाने कहाँ गए वो दिन,वो रातें,जो कभी हमारे अपने लगते थे ?
स्वरचित (c)भार्गवी रविन्द्र .......बेंगलूर

संग तेरे

तेरी आशिकी मे क्यूं बेखुदी सी रहती है,

अंखियां भी बावली बावली सी रहती है,

मुस्कुरा के कहते है वो जुल्फें खुली होंगी,
जब बूंदें बरसें या बदली बदली सी रहती है,

सब रश्क करते हैं देखकर महबूब को मेरे ,
देखकर चांदनी को भी तिश्नगी सी रहती है,

तेरी उल्फत मेरी सांस सांस मे यूं घुल गई ,
कि मेरी रूह अब खिली खिली सी रहती है,

रात रात भर सोयी जागी खोयी खोयी सी,
सिर्फ तेरे ख्वाब आंखें बुनती सी रहती है,

गुजरती है शब तेरे ख्यालों की चादर ओढ़ ,
ख्वाबों के आगोश मे नींद महकी सी रहती है,

मेरा हर गम मोहब्बत से चुरा लेते हो तुम,
संग तेरे हरपल मेरे लबों पे हंसी सी रहती है,

जिंदगी की किताब का बर्क तुमने क्या बदला,
कि सफहे सफहे मे खुशियां बसी सी रहती है,

आलम ये कि तन्हाइयों मे भी गुफ्तगूं तुम्ही से,
और तेरे कसीदों मे "विजय"बारहा उलझी सी रहती है।
©"विजय"

विषय---स्वतंत्र--होली
विधा --दोहे
1
होली में गोली लगे, उनकी चितवन यार।
बिना किसी हथियार के करती हैं वो वार ।।
2.
केसरिया वसुधा हुई,मन टेसू की प्रीत ।
हवा बसन्ती डोलती,फागुन की ये रीत ।।
3.
विरहिन बैरी बेबसी,बदला सा संसार।
हिय में हूक उठा रहा,फागुन का व्यवहार।।
4.
बृज बरसाना बाँसुरी, बहकी बहे बयार।
नारी नर को पीटती, ये होली लठ मार ।।
5.
फागुन में गुण बहुत हैं,मन का कारोबार ।
अब' मनोज' बिन देह के,' रति' को रहे पुकार ।।

******स्वरचित*******
प्रबोध मिश्र 'हितैषी'
बड़वानी(म.प्र)451551

गजल सृजन...
काफ़िया-आत
रदीफ़- बाकी।
122,122,122,122

मिलन की वो तुझसे हसी रात बाकी,
प्रथम तेरी ,मेरी मुलाकात बाकी।

नजर से नजर जो मिली तेरी ,मेरी
सनम बाँटने को ये ख्यालात बाकी।

तुझे देख आँखें मेरी नम हुई जो,
रुकेगी ना नयनों की बरसात बाकी।

बनाया तुझे जो गले की है माला,
दुनीया के दिल में सवालात बाकी 

तड़पते है "वीणा" ये दिल इस जहाँ में,
सहेंगे ये हम साथ आघात बाकी।

©सारिका विजयवर्गीय"वीणा"
नागपुर (महाराष्ट्र)


विषय -होली

*जाऊँ कैसे घर मैं गुजरिया*

नटखट कान्हा ने रंग दी चुनरिया 
जाऊँ कैसे घर मैं गुजरिया

नीर भरन मैं चली पनघट को 
देख ना पाई उस नटखट को
डाली पे बैठा कदंब के ऊपर
धम्म से कूदा मेरे पथ पर 

रोकी जो उसने मेरी डगरिया 
जाऊँ----

मेरी नजरें पथरा गई थी 
मैं तो बस घबरा गई थी 
अबीर गुलाल से सना था चेहरा 
आँखों में फागुन का पहरा

पलकें झपकाई मटकाई कमरिया 
जाऊँ---

बिनती करूँ मैं भारी कर जोरी
पकड़ कन्हैया ने कलाई मरोड़ी
डारि दियो रंग बरजोरी
रोक ना पाई मैं भी निगोड़ी 

फेंकी जो छिनकर मेरी गगरिया 
जाऊँ---

आँखें नचाकर लगे मुस्कराने
होरी है कह-कह कर खिझाने

भोले पन ने भाया मन को 
देखती रह गई मैं मोहन को
पल भर को मैं हुई रे बावरिया 

जाऊँ---

किसको बताऊँ कैसे समझाऊँ 
हालत अपनी कैसे छुपाऊँ
फागुन ने बौराया मन को 
कैसे रोकूँ मैं मोहन को

मन मोरनी कर गई रे मुरलिया 
जाऊँ----

वसन भीजने की बात नहीं प्यारी 
तन- मन भीज गई है सारी
रंगी जो कान्हा ने ऐसी चुनरिया 
छूटे ना जो सारी उमरिया 

भूल गई रे मैं अपनी डगरिया 
जाऊँ---'

सुधा शर्मा 
राजिम छत्तीसगढ़

कभी तो मिल मुझे अपनी संपूर्णता के साथ
कि आधी अधूरी बातों से दिल नहीं भरता 

कभी कभी किस्मत से जब भी मिलते हो ,
अधूरे अधूरे हमेशा कम कम से मिलते हो ।
दो पल की बतियां ,बातों का अंत नहीं मिलता ,
कि आधी अधूरी बातों से दिल नहीं भरता ।

बेखबर नहीं मैं तेरी मोहब्बत से सनम ,
फुर्सत के चंद लम्हों की दरकार है सनम।
क्षितिज के पार भावो का दरिया बहता,
कि आधी अधूरी बातों से दिल नही भरता।।

बुझने लगते है चिराग भी,अंधेरो को हरा,
रवि रश्मियों का प्रकाश ,सब और होने लगा
न खत्म होता क्यू कभी अनंत इंतज़ार मेरा,
क्यों ये सूरज, अंधेरा मेरे मन का नही हरता,
की आधी अधूरी बातों से दिल नही भरता।

नीलम तोलानी
स्वरचित।


"स्वतंत्र लेखन"
वज्न:-12122 12122
"गजल़"
न रहगुज़र को थी कोई परवाह
मैं जिसके खातिर मचल रही थी।।

बड़ा है खुदगर्ज मेरा हमदम
मैं थी कि रिश्तों पे चल रही थी।।

हवा का मंजर बदल गया अब
मैं जिनसे अब तक संभल रही थी।।

वो आ न पाया है ख्वाब में जब
तो क्यूं मै करवट बदल रही थी।।

वो कांच सा दिल को तोडता है
मैं जिस पे कह ये गजल़ रही थी।।

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल


विषय-स्वतंत्र लेखन " होली "
'****
" बिरज की पावन होली"
🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼
होली शुभागमन पर,,,
🌼🌹🌼🌹🌼🌹
सुंदरी सवैया छंद में ,,,,,नव निर्मित प्रयास
112 112 112 112,112 112 112 112 2( 112सगण×8 ) अंत दो गुरू
🌼🌹🍀🌼🌹🍀🌼🌹🍀🌼🌹
********************************
घनश्याम बने रसिया- ब्रज के,
फगुवा महि धूम मचावत होली/
इत श्याम छुपे वन-वीथिन में,
मुख लाल कियो,सखियाँ हमजोली/
उत लाल गुलाल मलैं रसिया,
बृषभानुलली ,,,घुंघटा-पट खोली /
ब्रज -गोकुल रंग फुहार उड़ै,
बदरंग भईं,,, अँगिया अरु चोली//
*********************************
🌼🌹🌼🌹🌼🌹🌼🌹🌼🌹🌼
*********************************
सखि!फागुन आय गयो,मनभावन,
मोहन आय,,,मचावन होरी /
घनश्याम- छुपे, चितचोर -मुरारि,
अबीर-गुलाल मलैं,ब्रज- गोरी/
ब्रजराज लिए पिचका कर में,
रँग छाँड़ दई,,,सखियाँ रँगबोरी/
ब्रज-गोकुल आजु अनंद भयो,
रसराज नचावत हैं ब्रज-छोरी//
*********************************
🌼🌹🍀🌼🌹🍀🌼🌹🍀🌼🌹
ब्रह्माणी वीणा हिन्दी साहित्यकारणी

#स्वरचित सर्वाधिकार #सुरक्षित रचना


विषय -स्वतंत्र लेखन
जीवन का अंतिम पड़ाव

जीवन के
अंतिम पड़ाव पर 
बैठी स्त्री
स्मरण करती है
बार बार
बचपन से
बुढ़ापे तक का सफर
संन्यास आश्रम की
इस पगडंडी पर
अनायास ही
प्रस्तुत हो
उठते हैं
चित्र
आँखों के सामने
पिता,पति ,पुत्र
के प्रतिबंध
मीठे,खट्टे, कड़वे पल
माँ, बहन,बेटी,बहू
संग बिताया
एक एक पल
बूढ़ी नज़र
बीनती कंकर
वृद्ध काया 
करती मूल्यांकन
जीवन में
क्या खोया
क्या पाया।

हरीश सेठी'झिलमिल'


विधा: ग़ज़ल - तुझे मिलके खुद से दगा चाहता हूँ....

तुझे मिलके खुद से दगा चाहता हूँ....
कि होना तुझी में फना चाहता हूँ....

अजब खेल दिल का गजब इश्क़ जादू...
न दर्द-ए-दवा न ही दुआ चाहता हूँ... 

मुझे क्या पता था खुदा वो नहीं है...
*ज़बीं* ज़ख्म अब मैं सिला चाहता हूँ....

न जाना जिसे और देखा नहीं मैं....
उसी नाज़नीं का हुआ चाहता हूँ.... 

तसव्वुर से तस्वीर दिल जो बनायी... 
उसे देखूं हर शै खुदा चाहता हूँ...

मिलूं जब भी खुद से उसे देखूं 'चन्दर'... 
छुपा जो मुझी में मिला चाहता हूँ....

*ज़बीं* = माथा 

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II 
१७.०३.२०१९


विधा - छन्द मुक्त 
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संगीत क्या है 
समझ में न आये
किसी का सुख छिपा है इसमें
कभी दुःख में ये आँसू बहाये I

संगीत प्रेमियों का मिलन है
जीने मरने की कसम है
कल्पनाओं का चमन है
बेवफ़ाई में दिल की चुभन है I

संगीत सन्तान की अभिलाषा है
उनसे भविष्य की आशा है
अपना सर्वस्व खोकर भी
अन्त में दुत्कार की हताशा है

संगीत पक्षियों की आवाज है
पर्वत और झरनों जैसा ताज है
वन सम्पदा का नाज है 
बढ़ रही आपदाओं का आगाज है

संगीत मेरे जवानों की लगन है 
पूरा परिवार छोड़ 
जो देश सेवा में मगन है
अन्त में शहीदों का कफ़न है

संगीत अनाथ बच्चों का गगन है
बहुरूपिये नेताओं का श्वेत वसन है
राजनेताओं के भ्रष्ट आचरण से
जल रही जनता की अगन है

संगीत समाज का विकास है
आपसी सौहार्द्र में खास है 
बात - 2 में टूट रहे रिश्ते 
ऐसी मानव श्रेष्ठता का उपहास है 

विषय- मतदान 

सभी इंसान करें मतदान 
यही गणतंत्र की है पहचान,
चुनें नेता सब परम सुजान,
बने फिर सुन्दर हिन्दुस्तान।

सभी नर-नारी , युवा - वृद्ध
लगाएँ मत पर पूरा ध्यान,
न देखें जाति-पांति और वर्ग,
कर्म को ही रक्खें प्रतिमान। 

न कोई स्वार्थ-मोह का भाव
सभी के मन में हो शुभ ज्ञान,
सफल हो लोकतंत्र का पर्व,
करें सब बढ़-चढ़कर मतदान।

जिसे जनता अब चुने प्रधान
न भूले वह सबका कल्याण,
सभी कष्टों का करें निदान
देशवासी तब देंगे मान।

स्वरचित 
डॉ ललिता सेंगर

स्वतंत्र लेखन 
#जिंदगी
जिंदगी जरा... धीरे चल, 
मुझे समेटने है ख़ुशी के पल, 
शुक्रिया तो कर दूँ उन हस्तियों का, 
जिन्होंने महकाया मेरा हर पल ll

जिंदगी ज़रा...... धीरे चल, 
मुझे जुदा करने गमो के पल, 
शुक्रिया करदूँ उन दुश्मनो का, 
जिन्होंने दिखाए रास्ते हर पल ll

जिंदगी ज़रा.... धीरे चल, 
मुझे जीने दे जरा प्यार के पल, 
शुक्रिया कर दूँ उन मित्रो को 
जो चाहते है मुझको हर पल, ll

जिंदगी जरा.... धीरे चल, 
जिंदगी जरा.....धीरे चल ll
मीठा नमन मित्रों 
कुसुम पंत "उत्साही 
स्वरचित 
देहरादून


स्वतंत्र-लेखन
क्यों हो रहा है जल संकट

क्या हमनें किया है कभी मंथन
छेड़छाड़ कर रहे हम प्रकृति के संग
तभी बिलुप्त हो रही जल संशाधन

जब हमनें की मनमानी
स्वयं बुलाये अपनी बर्बादी
अब हमें सुधरना होगा
जल संरक्षण सीखना होगा

बूंद बूंद है जल का अनमोल
स्वयं समझ फिर समझाये किसी और
जल के बिना जीवन नही धरा पर
आज ही इसे समझना होगा

जल सरंक्षण पर आज से ही 
अमल करना होगा।
अभी से ही अमल करना होगा
हम सभी को इसे समझना होगा
स्वरचित-आरती-श्रीवास्तव।


दिनांक-17/3/2019
ऐसी मुझमें शक्ति नहीं

विचारों को शब्दों का बाना पहना सकूँ
ऐसी मुझमें शक्ति नहीं
भावनाओं के वेग में बह
छंदों की प्रबल धारा बहाऊं
ऐसी मुझमें वेगता नहीं ।
दुःख के झंझावातों ने झकोरा है मुझे
विचारों के आघातों ने थपेड़ा है मुझे 
मैं ऐसा पुख्ता किला बन सकूँ
ऐसी मुझमें सक्षमता नहीं ।
जीवन के मधुमय क्षणों की
विषैले तीर भरे दुखों की चुभन को
शब्दों की लड़ियों में पिरोकर लाऊं
ऐसी मुझमें दृढ़ कल्पना नहीं ।
तिल -तिल जीवन बीत रहा
होकर समय रूपी रथ में सवार
उन सब लम्हों को कैद कर सकूँ
मैं ऐसी छायाकार नहीं ।
पर एक दिन वह (ईश्वर )मुझे विचारों का ठहराव देगा
लेखनी में प्रबल प्रवाह देगा ।
तब कोई भी आ सके मार्ग में
ऐसी कोई बाधा नहीं ।
जीवन में सौरभ बिखरेगा
बगिया को सुरभित करेगा
इस आशा को कोई काट सके
ऐसी कोई निराशा नहीं ।
स्वरचित -मोहिनी पांडेय


स्वतंत्र लेखन
विधा -हाइकु

1.
होली सन्देश
बढ़ाओ भाईचारा 
छोड़ दो द्वेष
2.
शिक्षा अधूरी
करते मजदूरी
क्या मजबूरी
3.
छूटती नहीं
लिखने की आदत
हाथ कलम
4.
बिन शीर्षक
कोशिश लिखने की
अच्छे हाइकु
5.
व्यस्त बहुत
काम की अधिकता
आज के दिन
********
स्वरचित
अशोक कुमार ढोरिया
मुबारिकपुर(झज्जर)
हरियाणा


समझ लेओ होरी है ।

जब छावै अजब सो खुमार 

रंगन की बरसै फुहार 
गलिन मैं घूमै मिल सब यार 
फाग गावैं जबहीं हुरयार 

समझ लेओ होरी है ।

होवै बरसाने में लट्ठमार 
करैं बरजोरी सब नर नार 
प्यार की होवै जब तकरार 
सजनवा जबहिं दिखावैं प्यार 

समझ लेओ होरी है ।

जब भौजी लगें दिलदार 
रंगैं बार बार 
करें आंखें चार 
बचावै ना कोई जब यार 

समझ लेओ होरी है ।

पीके भंगिया दिखैं सब चार 
हंसै सब यार 
अम्मा बनी थानेदार 
दद्दा चटावैं अचार 

समझ लेओ होरी है ।

पकर सब घर लै जावैं यार 
खिलावैं गुझिया बारम्बार 
गले मिल होवै हर्ष अपार 
प्रेम रस की जब हो बौछार 

समझ लेओ होरी है ।

होरी है .................


अनुराग दीक्षित

दो लफ्जों मे हम,
मोहब्बत को बयाँ करते हैं,
कभी हम तो कभी तुम,
मिलने को मजबूर रहते हैं,
रूबरू तो नही होते हम,
शब्दों से तुम्हें छू लेते हैं,
बंद करके आँखों को हम,
दिल में तेरा अहसास कर लेते हैं,
दिल की तू मेरी धड़कन है,
मेरी पहली और आखिरी वफा है तू,
चाहा है तुझे चाहत से बढ़कर,
मेरी चाहत और चाहत की इंतिहाँ है तू 
पाने की तुझको ए सनम,
हम दिल में हसरत रखते हैं,
मोहब्बत है आग का दरिया,
कभी रोते हैं हम और कभी हँसते हैं।
****
स्वरचित-रेखा रविदत्त
17/3/19

रविवार


विधा -तांका 


निशा के घर 
जुगनू की बारात 
वाह क्या बात 
जगमग आंगन 
मयंक है साजन 



जलते दीये 
तमस घबराया 
आंधी से लड़े 
जगमग जुगनू 
हँसते हुए उड़े 

(स्वरचित )सुलोचना सिंह 
भिलाई (दुर्ग )

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"गुमनाम"12नवम्बर 2019

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