Thursday, March 28

'''खबर/समाचार" 26मार्च 2019

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             ब्लॉग संख्या :-339








बाकी बचा बस जहर है। 
बडी ही कठिन रहगुजर है।


न जाने कैसे कटती यूं ही। 
शुक्र के आप हमसफर है। 

जल्द ही शाम ढलने लगेगी। 
कहां बची लम्बी उमर है।

मर गए होते हम कभी के। 
आपकी दुआ का असर है। 

अब और सब्र न हो शायद। 
अभी तक काबू में जिगर है।

हर्फ सराबोर हैं लहू से। 
हादसों की हर इक खबर है। 

हो नाम रब का हर साँस में। 
जिन्दगी यूं भी मुख्तसर है। 

हुआ अम्न गायब शहर से। 
लगी चैन को भी नज़र है।

विपिन सोहल


विधा-मुक्तक
======================
(01)ख़बर
लगा लो दिल में चिनगारी शरर देने को आया हूँ ।
सनम! मैं प्यार को सादिक ख़बर देने को आया हूँ ।
हमेशा याद कर-करके तुम्हें आँख़ें बरसती हैं,
यह देखो अश्क़ हैं मेरे गुहर देने को आया हूँ ।।
(02)समाचार
मुद्दतें हो गयीं तेरा न समाचार मिला ।
पता अहवाल का बा फ़िक्र न सरकार मिला।
मुझे भूले से तूने बेवफ़ा मिस्काॅल दी होती,
पढ़ूँ तेरे लिए छपता हो न अख़बार मिला ।।
======================
"अ़क्स " दौनेरिया

ऐ चाँद ! मुझे उनका पता दे 
या मेरी खबर उन्हे बता दे ।।

तेरा हमशक्ल है तूने देखा है
मेरे हाल की उन्हे इत्तला दे ।।

कब से तड़फ रहा हूँ दीदार को 
क्या उनकी रज़ा वो रज़ा बता दे ।।

अफ़सुर्दगी का आलम क्या कहूँ
रातों में नींद नही नींद वो ला दे ।।

किस्मत रूठी उन्हे खोकर 'शिवम'
किस्मत की खातिर वो मुस्कुरा दे ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 26/03/2019


"खबर/समाचार"
1
खुश खबरी
तरंगित लहर
मन आँगन
2
चाय की प्याली
सुबह की खबर
परमानंद
3
देश,विदेश
समाचार दर्शन
ज्ञान अर्जन
4
सच्ची औ झूठी
खबरों की लहर
गाँव व शहर
5
सुबह,शाम
खबरी सिलसिला
हो रहे आम

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल

सामान्य ज्ञान वृद्धि हेतु
खबरें होती बहुत् जरूरी
कुछ सुनते कुछ न सुनते
रहती होगी कुछ मजबूरी
नित चलती सुख दुःख खबरें
कभी रुलाती कभी हँसाती
सत्य मिथ्या चलती खबरें
सद मार्ग अनवरत चलाती
सत्य खबर की चाल मंद है
झूंठी खबर हवा में उड़ती
मायावी अद्भुत इस जग में
खबर सदा नया ही मंडती
समाचार दैनिक हम पढ़ते
देश विदेशी पाते नव ज्ञान
पत्र पत्रिका आकाशवाणी
से होता असल जग भान
टी वी और मोबाईल ने तो
खबर क्रांति जगति में ला दी
सभी दूरियां कम होगई अब
रुकी पैसों की अब बर्बादी
समाचार सुख साधन अब
नये अन्वेषण होते जग में
दूर पास के भेद मिटे सब
सब हिय मिलगये लगभग
खबरदार करती है खबरें
नव जीवन सबक सिखाती
अच्छे और बुरे का अंतर
खबर हमें नव राह चलाती।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविंद प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

दिन-मंगलवार

खबर दिल तक पहुंचे सदा बन कर
ऐ जिन्दगी लम्हों को बहला दे

अगर याद हैं तुझको जो बीत
गये पल उन पलों को चहका दे

रात के अंधेरों मे महके थे जो
ख्याल उन्हे आकर बहला दे

भूल गये चाँद और चाँदनी रातें
कुछ उन्हें आकर सहला दे

अब टूटे हैं साज साँसों के मेरे,
कोई सरगम दिल को महका दे

भूल से भी न मिले उनको सजा
ऐ दिल इस खबर को पहुंचा दे

स्वरचित
नीलम शर्मा#नीलू

समाचार अभी मुझे मिली कि,
अपना कृष्ण कन्हैया आया है।
माखनचोर जिसे कहते हैं हम,
सचमुच वही संवरिया आया है।

रंग गुलाल अबीर साथ लाऐ ये
प्रेमरंग में हम सबको रंग देगा।
ऐसी खबर लगी है हमको भैया,
यह वैर छोड जीने के ढंग देगा।

प्रीत बसंती में सबको रंगना है।
यही हमारी संस्कृति गहना है।
आओ मिलजुल रंगोत्सव मनाऐं,
हमें यहां हिलमिलकर रहना है।

हैं मनुष्य हम और सदा रहेंगे,
नहीं किसी जातपात में भूलें।
सुखी समाचार बन जाऐ भैया,
गर दिल से एकदूजे को छूलें।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.


~~~~~~
की थकी सी जिंदगी कहाँ
मौसम सुहाने हैं
पहले पूरा रुपया थी जिंदगी
अब तो चार आने हैं।

पहले मौसम की पहली बरखा
पहले कितना सुहाती थी।
रिमं झिम रिम झिम बरसता मेह
पूर्वा संग चल उड़ाती थी।
थक हार गया जीवन
चारो चित खाने है।
पहले पूरा रुपया थी जिंदगी,
अब तो सिर्फ चार आने है।

हँसी संग ठिठोली करते
बचपन सुहाते थे।
यौवन के मोह मादक रिश्ते
चित चोर बन जाते थे।
ज्यो पुष्प पर जैसे
मधुकर मदमाते थे
दिवा स्वप्न आकर नींद में
सोये चेन जगाते थे।
उन्मुक्त गगन के उड़ते रहते
पंख हौसलों में ले उड़ान
तितलियों के पख जैसे 
रंग बदलते ,मन परिधान

अब जुरमुठ झाइयों को ,
देख दर्पण रोता हैं।
काल समय सब बीत गया,
नव यौवन 
कब पल्लवित होता है?
जैसे तैसे बीत रहा जीवन

दिन जो हमे बिताने हैं।
पहले पूरा रुपया थी जिंदगी
अब तो सिर्फ चार आने है।

यौवन रूपी सेंधव पर बैठ 
कभी हम खूब मचलते थे।
अंतरंग ड़ूब मन अनुरागों मैं
दिवा स्वप्न पलते थे।
सांझ का सूरज 
अब अस्ताचल है
उम्र अब दराज होगई
सुशप्त निष्ठुर काया
स्वयं तन की छाया हो गई।
मन मल्लाह के 
पड़े दमखम ढीले
कदम कदम धकलाने है
पहले पूरा रूपया थी जिंदगी
अब तो सिर्फ चारआने है।

बीत कर पुराना अखबार
हुई जिंदगी
कहाँ रही नव का 
समाचार ये जिंदगी?
रद्द हो गए सारे सपने
यौवन रूपी तिलिस्म ठिकाने है।
पहले पूरा रुपया थी जिंदगी
अब हाथ सिर्फ चार आने है।

मृगमरीचिका सा भ्रम दे गई
थोड़ा थोड़ा कभी हुआ न पूरा
स्वप्न दिखा 
रोज अपनी उम्र ले गई।

व्यतीत होकर बित रहे हम
प्राण दविज बन उड़ जाने है।
पहले पूरा रुपया थी जिंदगी
अब हाथ कुछ भी नहीं आने है।


पीराय राठी
भीलवाड़ा, राज

बहुत दिनों के बाद, 'सरहद'से तेरी पाती आई।
तेरे आने की खबर सुन, तन-मन में आकुलता छाई।
मन व्याकुल हो बैठा,बस तेरी एक झलक पाने को।
संग बिताये क्षणों की, हर बात दिल में आज उभर आई।
**************************************
प्यार भरी बातें हैं ढेरों,जो मुझको तुझसे करनी हैं।
मुन्ना हुआ है तीन माह का,वो भी मिलने को आतुर है।
मधुर- मिलन की प्यास जगी,तन-मन में आग लगी।
बाट-जोहती बेकल होकर,नैनों में इक आस जगी।
*************************************
आखिर तेरे मेरे सुखद मिलन का, वो दिन आ ही गया।
नख से शिख तक कर श्रृंगार,तन-मन चौखट पर आ गया
पर ये कैसा शोर और कोलाहल,ये कैसी उमड़ी है भीड़।
कौन बजा रहा है मातमी-धुन, ये कैसा है करुण क्रंदन।।
*************************************
तुम आवोगे पर लिपट 'तिरंगे' में,मुझे ऐसा आभास न था।
सपने सारे चूर हुये, तेरे शहीद होने का एहसास हुआ।
मन विचलित हो गया,पर गर्व मुझे अपार है तुम पर।
न्यौछावर प्राण किये तुमने, "माँ-भारती" की रक्षा पर।।
***************************************
(स्वरचित) कुलदीप तिवारी
प्रयागराज।


खबर यह है कि 
सपना खरीदने चला है 
देश के दो सूरज और चांद 
सौदेबाजी भी हो रही है 
सपना के लिए शालिनी के लिए 
वर्तमान भारतीय लोकतंत्र में 
लुप्त हो चुका है 
आम जनता की जरूरतें 
सचमुच जो चौकीदार है 
उनके दैनिक हसरतें 

समाचार यह है कि 
लुढ़क रहे हैं नेता 
बनकर बिना पेनी के लोटा 
टिकट लेने के बाजार है 
एक से बढ़कर एक खरीदार है 
कौन गिरा कौन उछला 
कौन आगे कौन पीछे रह गया 

प्यारे मतदाताओं तुम कोई खिलौना नहीं 
बिके जो इन लोकतंत्र नेतातंत्र के बाजारों में 
जैसे ही कैद होगा तुम्हारा मतदान मत पेटी में 
फिर न मिलेंगे यह किसी किरदारों में 

गिरगिट की तरह बदल रहे हैं रंग 
ऐसी नेताओं की फितरत बता दें 
एे भारतवासियों एक ऐसा आईना बना दे 
जिसमें चेहरा नहीं नियत दिखा दे
इस चुनावी शतरंज में वजीर मर चुका है 
इस लोकतंत्र में नेताओं के जमीर मर चुका है 
झूठ का भी कई जायक़ा है यहां 
खुद बोले तो मिठो और बोले तो कड़वा 
यही खबर है 
यही समाचार हैं ।

स्वरचित एवं मौलिक 
मनोज शाह मानस 
सुदर्शन पार्क 
मोती नगर नई दिल्ली

विधा=हाइकु 
===========
(1)फ़ौजी मैं बना
आया नियुक्ति पत्र
खुश खबर
(2)रक्त रंजित
समाचार से भरा
है अखबार 
(3)तोड़ के जेल
भागे आतंकवादी 
फैली खबर
(4)पाक पे वार
प्रातः का समाचार 
आतंकी ढ़ेर
(5)फैली खबर
मंदिरों में गणेश
पी रहें दूध
(6)ताजा खबर
टेलीविजन पर
देखिये आप

===रचनाकार ===
मुकेश भद्रावले 
हरदा मध्यप्रदेश 


विधा-छंदमुक्त
====================..

किस सफर की शुरूआत है ये.....
जहाॅ तलाश ही तलाश है।
गर्भ से निकल कर नाम को ढूूॅढता,
ये किस शहर में पहॅूचा हॅू मैं,
जहाॅ लाश ही लाश है।

अहिंसा के मूलमंत्र पढ रहा है बच्चा
हाथ में खंजर को थामकर
नवयौवना का फट रहा है आॅचल
बहशी होठों की प्यास पर
दुआ का हाथ उठ गया बेटे का
बाप की मौत के लिये
कफन खरीद रहा है शोैक से
बसीयत की आस पर।

अपहरण, बलात्कार, चीत्कार
सिर्फ खबर बन गये है।
कोई कतरन को काटकर
रख रहा है शौके मिजाज में
कोई हॅस रहा है उस अबला पर
कोई हाथ मल रहा है, अपने 
वहाॅ न होने पर।

ये वो शहर तो नहीं।
जहाॅ के लिये मैं छोड आया था
माॅ का शहर ‘गर्भ’
अजब घर था वो जहाॅ
जात पात द्यर्म पर झगडे न थे
मेरी ही तरह इक ओर शख्स 
ममता की छत में पल रहा था वहाॅ।

हम साथ ही तो आये थे बाहर 
फिर क्या हो गया हमें
इस शहर में आते ही.......

गर्भ से निकल कर नाम को ढूॅढते
ये किस शहर में पहूॅचे है हम
जहाॅ तलाश ही तलाश है।
जहाॅ लाश ही लाश है।
ये किस सफर की तलाश हैं। 
वंदना मोदी गोयल ,फरीदाबाद

ना कोई खबर भेजी
ना कोई खबर आई
क्यों छोड़ गए तन्हा
होती रही रुसवाई
छपते रहे चर्चे
पर्चों में तुम्हारे
पर मुझको नहीं भेजी
एक प्यार भरी पाती
हवाओं से सन्देसा भेजा
चलती रही पुरवाई
बादल भी बरसते रहे
तुम्हें याद न आई
जीती हूँ उसी पल को
मौसम वो सुहाना हो
आ जाये खबर तेरी
या खुद तेरा आना हो
तुम बन के खबर खुद ही
एक बार चले आओ
पलकों पर ठहरे आँसू
अधरों से तुम पी जाओ

सरिता गर्ग 
स्व रचित


" अखबार "

दैनिक चर्चा
बीते कल का पर्चा
सिर्फ कागज की गठरी नहीं
खबर का भंडार
समाज, देश, विदेश
की हूँ पतवार
मैं हूँ अखबार। 
इतिहास गवाह है
पलटी है मैंने
कितने तख्त- ताज
हर घटना से
रू-ब- रू होता
पढ़कर अखबार समाज। 
एक दौर था
जब चाय की चुस्की संग
हम घर- घर छाएँ रहते थे, 
इंतजार रहता था सबको मेरा
सुबह - सुबह अपनी आँखे मल
मुझे पढ़ा करते थे। 
पर आजकल मेरी छवि
कुछ धुँधली पड़ी है
अब इंतजार वो नहीं
मैं किया करती हूँ
और इसी इंतजार में
दिन कट जाता
मैं पुरानी हो जाती हूँ, 
अनपढ़ी ही 
कबाड़ी में चली जाती हूँ। 
देखते है नित सब
टी.वी, फोन पर समाचार
कर रहे है
युवा- बच्चे मुझसे दरकिनार
बुजुर्ग बस मुझे उठाते है
अपनी सरसरी निगाह
मुझपर डाल देते हैं। 
फिर भी न जाने क्यों
अब भी घर ढूँढी जाती हूँ
शायद शौक से
या देखा- देखी
हर गेट के चौखट
पर दस्तक देती हूँ
आने वाले दशकों में
कहीं मैं कागज की 
गठरी न बन जाउँ
इसलिए अपनी 
अस्तित्व बचाना चाहती हूँ
मैं स्वयं में
आधुनिकीकरण लाना चाहती हूँ। 

स्वरचित: - मुन्नी कामत।

पेपर कई घरो में रोज आता।
नई पुरानी खबरें खूब लाता।।
कभी बाहर से दरवाजा खटखटाता।
कभी दरवाजे के नीचे घूस जाता।।

कभी खुले दरवाजे में जम्प लगाता। 
पढ़ने वालों का मन हरषाता।।
चाय के संग हाथों में सज जाता।
पढ़ने वाला आडा़ तिरछा मुंह बनाता।।

घर का मुखिया पहले अखबार पढ़ता।
अच्छी बुरी खबर सबको सुनाता।।
कभी पेपर आने में देर हो जाये।
घर में कोहराम भी खूब मचाता।।

अखबार में देश विदेश की खबरें आती।
नेता चारा खाता दहेज में बहुएँ जल जाती।।
कभी बेटा बाप का खून करता।
कभी माँ प्रेमी संग भग जाती।।

कभी कभी अच्छा समाचार भी आता।
बेरोजगारों को रोजगार मिल जाता।।
महीला शक्ति को खूब बढाता।
हर क्षैत्र में नारी को आगे ले जाता।

स्वरचित कुसुम त्रिवेदी दाहोद गुजरात

विधा - मुक्तक

🌹🌹🌹🌹🌹🌹
चाँद तारों की महफिल सजी रात है।
संग सुरमई सी यादों की बारात है।
खबर उन्हें नहीं, शिकायत नहीं मुझे,
जो उम्र भर संग तेरे - मेरे जज्बात है।

🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

लब खामोश है आँखें चुपचाप रोती।
व्यथा बनकर शबनम है धरती भींगोती।
है उफनता हुआ सा हृदय में समंदर,
इसकी खबर कुछ उन्हें भी तो होती।

स्व रचित
डॉ उषा किरण


विधा---दोहा गीतिका

समाचार है आ गए,अपने देश चुनाव।
रिश्वत पर ये टिक गए, दल नेता बेभाव।।

रुपए किलो अनाज औकर्ज माफ के बीच।
खबर गरीबों के लिए,बहुतर हजार दांव।

बैठे बैठे खाइए,सगरे कर्म फिजूल,
मुफ्त सब कुछ मिल रहा,काम करन ना जाव ।

काम शून्य व शून्य प्रगति,जाय भाड़ में देश,
बस सत्ता मिल जाय तोनिज संपत्ति बढ़ाव।

जिम्मेदार चुप चुप हैं,खुला रिश्वती खेल,
किसी को बिना काम केकुछ नहिं मिले सुझाव।

जो भी ऐसा कर रहा,हितैषी'वो न होय,
ऐसे अवसर को कभी कोई भुना न पाव।

*****स्वरचित********
प्रबोध मिश्र 'हितैषी'

छंद मुक्त कविता 

ज्ञान ,मनोरंजन व प्रेरणा के सूत्र ये संचार -दूत 
आज समाज को जो नवीन विचार ,प्रेरणा व मनोरंजन की सामग्री परोस रहेहैं,
वास्तव में वे मानवता कीआधार-शिला को झकझोर रहे हैं। 
ज्ञान के नाम पर चोरी, हत्या और बलात्कार ,
नवीन-विचारों में देशद्रोह के कुत्सित उद्गार,
तथा प्रेरणा की आड़ में अपनों के द्वारा अपनों पर ही वार|
क्या यही है आज के अखबार का आधार ?
आज इन अखबारों में आदर्श व्यवहार और विचार जैसे कहीं गुम हो गए हैं ,
सच्चाई व ईमानदारी जैसे मानव-मूल्य ,
झूठ और फ़रेब के सामने सौ-सौ आँसू रो रहे हैं |
अश्लीलता का खुला बाज़ार है ,
इसीलिए आज जो जितना सत्यवादी और ईमानदार है,
वही परिस्थितियों के सामने विवश व लाचार है |
जबकि जिसके आचरण में अनीति व भ्रष्ट-विचार हैं,
उसी की दुनिया में हो रही जय -जयकार है|
आखिर कैसा यह समाचार का संवेदनशून्य संसार है ?

स्वरचित 
डॉ ललिता सेंगर

खबर/अखबार

देखो ख़बरों का है
व्यापार
छप रहे रोज़ न जाने कितने
अखबार 
न है कोई गितनी
इनकी
कोई है अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय तो किसी
की गिनती स्थानीय में होती
होता हर अखबार का मुख्य सम्पादक
उसकी सम्पादकीय भी
छपती जो मन को छू जाती
हर अखबार की
अपनी विशेषता
अपना प्रभाव
आजकल तो हर अखबार पर किसी न किसी राजनैतिक पार्टी का होता प्रभाव
होते उसके अलग-अलग पन्ने जिन पर 
हर पन्ने पर अलग अलग क्षेत्र की
होती खबरें
किसी पन्ने पर खेल की खबर तो
कोई रखता फिल्मों
पर नज़र
लेकिन देखो कैसी
विडंबना कुछ खबरे तो हर अखबार का हिस्सा होती 
जैसे घोटाले ,रेप,चोरी 
लूट,डकैती 
बस उन के होने
की तारीखें बदलती रहती ।
अंजना सक्सेना

बेचैनी इस कदर थी दिल में हमारे 
खुद से ही खफा हो गये हम 
जब आती उनके आने की खबर 

आँखें बिछाये बैठे रहे राह पर हर पहर .

ख़बर हमें लगती कभी उनके आने की 
कभी उनके चले जाने की 
कभी उनका खत पढ़कर दिल को तसल्ली देते हम 
कभी खुद से रूठकर दिल को समझा लेते हम .

सब दिखावे का हाल पूछते हमारा 
कोई ना बन पाया हमारा सहारा 
कभी दिल से खबर पूछ लिया करो ऐ नादां इन्सान 
फिर कहते हो हमें ख़बर नहीं की .

ख़बरें ऐसे ही चलती रही
खबरों के सहारे एक रोज वो हमें मिले 
फिर से इश्क मोहब्बत हुई 
फिर से जिंदगी ख़बरों के सहारे आबाद हुई .
स्वरचित:- रीता बिष्ट


क्यूँ मग़रूर हो के गुज़रे इधर से 
गर न आते तो क्या सहर न हुई 

रहने लगे कुछ गुमनाम ऐसे
ख्यालों को तेरी खबर न हुई

टकराई न हो सागर के तट से
ऐसी तो अभी तक लहर न हुई

डूबी रहे सदा तेरे ग़म में
जिंदगी इसकदर भी ज़हर न हुई

आसान होता मौत का मन्ज़र
कयामत की ऐसी नज़र न हुई
रजनी रामदेव
न्यू दिल्ली
स्वरचित


खबर
भ्रमण से लौटे मुनि नारद
पूछे सुरेंद्र ‘कहो,क्या खबर है’
मुनिश्री वृतांत सुना रहे
व्यथा से भरा स्वर है
प्यासी धरती,प्यासी आँखें
आसमान पर टिकी नजर है
बूंदहीन छलिया है बादल
आँखों से बहता निर्झर है
सीधा लांछन सत्ता पर
भला यह कैसी खबर है
क्रुद्ध हो बोले देवेंद्र
उपहास से भरा तेवर है
आँखों देखी हाल न कहें
कुछ मनगढ़ंत सुनाईये 
बिकने लायक जो हो
प्रभु वो ही खबर चलाईए
-©नवल किशोर सिंह
स्वरचित

सारे नेता ही हो मक्कार जरूरी तो नही
सच हो सब इस समय अख़बार जरूरी तो नही

बिक गया झूठ सरे-राह यूँ बाजार में अब
सच का भी कोई हो बाजार जरूरी तो नही

सब चुनावी घुड़की खूब बजाएँगे अब
अब सब प्रत्याशी हो दमदार जरूरी तो नही

ज़िन्दगी के कई रंग देखने को अब मिले हैं
दिल के सब हो ख़रीदार जरूरी तो नही

हम रहे चाहे मंदिर में या हो मस्ज़िद में तुम 
सब रखे लोग दिल में रार जरूरी तो नही

मीडिया भी गई बाज़ार में जबसे अब बिक
यों मिले प्यार लगातार जरूरी तो नही

सर-फिरे लोग ही यहाँ करते है यों खून ख़राबा
सब मुस्लिम ही हो गुनहगार जरूरी तो नही

✍️आकिब जावेद
स्वरचित/मौलिक

समाचार पत्र 

समाचार पत्र तुम आदत हुए 
तुम्हे छोड़ पाते नहीं हैं 
हर सुबह ,हर दिन 
क्या घटा, क्या घट रहा है 
हम तुमसे जान पाते हैं 
पुराना शौक हो हमारा 
तुम्हें छोड़ पाते नहीं हैं 

तुम हो ताकत कलम की 
कलम की जुबानी जान पाते हैं 
पैमाने तो बहुत है जमाने में 
उनको तुमसे ही नाप पाते हैं 
तुम्हें छोड़ पाते नहीं हैं

अंतरजाल दूरदर्शन 
आभासी मित्रों की जुबानी 
कहानियां तो जान पाते हैं 
पर समाचार पत्र तुम आदत हुए 
तुम्हें छोड़ पाते नहीं हैं

मीनाक्षी भटनागर
स्वरचित

ांका
1 खबर फैली
दिखाया दमखम
फिर बनेगा
पछाड़ कर शत्रु
विश्व गुरु भारत।

2 है समाचार
लोकतंत्र चाहता
आरक्षण हो
भारत में पूजित
राष्ट्रीय प्रतिभा का।
****स्वरचित****
सीमा आचार्य


विधा हाइकु

खबरें छायी
समाचारपत्र में-
प्रात:समय

चेहरा खुश
नवोन्मेषी खबरें-
चाय का प्याला

रोज सुबह
खबरें प्रसारित-
आकाशवाणी

खबरें आती
समाचार चैनल-
प्रत्येक घर

खबरें लाते
संचार उपग्रह-
विज्ञान यन्त्र

स्वरचित
@मनीष श्री
रायबरेली


कल तक जो अखबार बेचता था..
आज अखबार की सुर्खि हो गया..
फुटपाथ पर कंपकंपाता वो..
ठंड के आगोश में चिरनिद्रा में सो गया..
खबरें तो रोज छपती है..
नई योजनाओं की..
पर गरीब का कंबल भी अमीर औढ़ गया..
है ये भ्रष्टाचार इस भ्रष्टतंत्र का..
गरीब गरीब ही रहा..
अमीर और अमीर हो गया..
वो तपता रहा धूप में..
तुम ठंडी हवा के झोंकों में नींद उढ़ाते रहे..
तुमने अखबार का मुख्य पृष्ठ चुना..
और उस गरीब को मिला एक कोना..
जब-जब पड़ी जरूरत तुम्हें..
उसके ही तुम शरण गये..
एक एक वोट की खातिर..
दर पर उसके झोली फैलाए..
आज पड़ी लाश वो लावारिस सी..
मिला मौका फिर तुम्हें भुनाने को..
चले तुम एक दूजे पर आरोप लगाने को...
अपनी गंदी राजनीति का मत, 
बनाओ हथियार उसे..
दो जुन की रोटी पा जाए वो..
बस दे दो इतना अधिकार उसे..

स्वरचित :- मुकेश राठौड़

विधा-हाइकु

1.
मिली खबर
सेना हुई तैनात
आतंकी ढेर
2.
मिला तमगा
फोटो अखबार में
बहादुरी का
3.
बांटी मिठाई
खबर नौकरी की
मिली बधाई
4.
बना शिक्षक
मिली आत्म संतुष्टि
खुश खबर
5.
लाते खबर
समाज का आइना
ये अखबार
6.
तड़पे दिल 
पहुँचा दो खबर
प्यारे पिया को
7.
झूठी खबर
फैलाती अफवाह
भ्रमित लोग
8.
रेडियो मेरा
सुनाता समाचार
देश विदेश
9.
लीक न करो
खबर सुरक्षा की
देश हित में
10.
मीडिया मौन
खबर विदेश की
बताये कौन
********
स्वरचित
अशोक कुमार ढोरिया
मुबारिकपुर(झज्जर)
हरियाणा


चलता रहा है कब से सिलसिला , खबरों का रात दिन ,

खबरों के बिन हो जाता है बैचेन मन ,जी न सके पलछिन 

बन जाती है अंधे कुआँ जैसी , मानव की जिदंगी ,

पल भर भी चल नहीं पाती , खबरों के बिन जिदंगी|

खबरों का आशिक तो था , पहले भी सारा जमाना ,

आजकल तो आ चुका , मोबाइल का नया जमाना |

अब खबरों का चल पड़ा , आनन फानन ही जमाना ,

हुआ बिद्युत की गति जैसा , अब धारा प्रवाह जमाना | 

बिक रहा चटपटी खबरों से , कचरा साहित्य का सारा ,

टूट गयीं कलमें कलाकारों की ,चर्चा में नकल का पिटारा|

खूब ही राजनीति की रोटियाँ , सिका करती हैं आजकल,

मजे से बदनाम करना किसी को , है मुमकिन आजकल| 

परिवार को है हितकारी , रहकर दूर पास हैं आजकल ,

खबरों का आदान प्रदान, होता है चुटकी में आजकल |

चमत्कार को नमस्कार करना , शौक रहा सबका पुराना , 

आजकल सीख लिया सबने , खबरों से फायदा उठाना |

स्वरचित , मीना शर्मा , मध्यप्रदेश 

शीर्षक-खबर/समाचार
मर गई है संवेदनाएँ हमारी
भावनाएँ हो गई है सुषुप्त
कोई खबर हमें झकझोर नही पाती
रह गई है बस खबर मात्र

"पाँच मरे और सात घायल"
सुनकर भी नही रोते हम
क्यों होती है ये दुर्घटना
क्या कभी सोचते हम?

सड़क सुरक्षा न अपना कर
खाई अपनी हम खोदे हम
कभी कभी दूसरों की गलती की
सजा भी हम भुगते हम

रोज आती है ऐसी खबरे
मन मलिन हो जाता है
आओ सब मिलकर करें विचार
ऐसी खबर न छपे बार बार।
स्वरचित-आरती-श्रीवास्तव


मैं हूँ अखबार, 
हैं मेरे विभिन्न प्रकार, 
दैनिक जागरण, अमर उजाला, 
दैनिक भास्कर और हिन्दुस्तान,
सुबह-सुबह सबको जगाता,
देता हूँ ताजा समाचार |

खबरों का लगा बड़ा बाजार,
मोल भाव से हो रहा व्यापार, 
अच्छी, बुरी सारी दुनिया की, 
खबर मिल जाती हर बार |

समाचार पत्र सूचना के आधार, 
बढ़ती बेरोजगारी, भ्रष्टाचार,
फिल्म और खेल जगत के समाचार, 
जन-जन तक पहुँचती हर बार |

स्वरचित *संगीता कुकरेती*


हाँ, समाचार हूँ मै ;
दुनिया की हर नब्ज़,
हर धड़कन,
मुझमें समाहित,
हर खबर का
सार हूँ मैं ।
जनता के ही
पालन पर आश्रित,
जनता की 
आवाज़ हूँ मैं ।
सभी अस्त्र - शस्त्र
हारे मुझसे,
हाँ ऐसा 
शंखनाद हूँ मैं ।
बनूँ आईना
दुनिया का
घर बैठे सब 
दिखलाऊँ मैं ।
हाँ,अखबार हूँ मैं ।

---- नीता अग्रवाल
#स्वरचित


आज का विषय - खबर/ समाचार
विधा - हाइकु

झूठी खबर
मचा देती कहर
आठों पहर

नहीं खबर
मौत आ जाये कब
सिमर रब

देश है स्तब्ध 
शहीदों की खबर
फैली आग सी

ये अखबार
खबर का भण्डार
हाथ में चाय

स्वरचित
बलबीर सिंह वर्मा
रिसालियाखेड़ा सिरसा (हरियाणा


**
ख़बरों का जखीरा समेटे
मैं समाचार पत्र हूँ ।
अब मेरी सुर्खियों मे
खबर ये चटपटी आई है
15 लाख का इंतजार कर 
72 हजार की खबर छाई है ।
शक मे पत्नी की हत्या कराई 
सड़क दुर्घटना में जान गवाई 
खबर आज दुखद आई ,तो
व्यवस्था पर ऊँगली उठाई है ।
एक दल से बेवफाई कर 
दूसरे से वफा दिखाई है
हीरो ठंड में नही नहाए 
कोई अध्यापक से मार खा जाए 
ये खबर मुझमें स्थान पा जाये
सोचने को विवश मुझे कर जाये 
चौथा स्तंभ मे रहा
क्यों कमजोर पड रहा 
खबरों की निष्पक्षता 
पर प्रश्नचिन्ह लग रहा !
पत्रकारिता पर संदेह हो रहा 
राजनीतिज्ञों के हाथ की 
कठपुतली बन दुर्दशा मेरी हो रही ।
आजकल थोड़ा उपेक्षित 
पड़ा रहता हूँ कोने कतरे मे
कभी तो छुआ भी नही जाता हूँ
अपनी बदहाली पर रो लेता हूँ।
क्या कारण ,सोचता हूँ
एक तो...e -खबर का जमाना है
समय का अभाव है,
हाथों मे मोबाइल लैपटॉप है
लोग कई स्रोतों से खबर पढ़ते है
तब अपनी राय बनाते है 
माना ये सही भी है ।
दूसरा मेरा गिरता स्तर ,
मालिको के स्वार्थ ने 
खबरों को पीछे धकेल,
विज्ञापनों से मेरे पृष्ठ भर दिए ।
सुबह अब मुझे वो लोगो मे
गर्मजोशी नही दिखती
चाय के प्याले संग 
मैं नहीं हाथों मे रहता 
मौतों ,झूठ ,गिरती राजनीति से 
के ख़बरों से उन्हें पीड़ा पहुंचती।
मैं उपेक्षित हूँ ।
पर अभी आस नही छोड़ी है
बुजुर्गों ने नेह नही तोड़ी है
उनका टाइम पास हूँ
उनका विश्वास हूँ
सम्पादकीय वो ध्यान से पढ़ते है
खबरें निष्पक्ष ,ज्ञानवर्धक हो 
सबका विश्वास जीत मैं 
पहले जैसा बन जाता हूँ 
खबरों का जखीरा समेटे
मैं समाचार पत्र हूँ
अब करो मुझ पर एतबार
उपेक्षा का दंश सह नहीं पाता
वही स्नेह ,विश्वास फिर पाना है ।

स्वरचित
अनिता सुधीर


ाइकु (5/7/5) 
विषय:-"खबर/समाचार" 

(1)
सच औ झूठी 
ख़बरों की दुनियां 
तथ्य कसौटी 
(2)
मौसम लाया 
वर्षा का समाचार 
हल तैयार 
(3)
स्वयं लापता 
पड़ौस की खबर 
सबको पता 
(4)
टेलीविज़न 
ख़बरों का संग्राम 
हारता देश 
(5)

भागी ख़बरें 
अफवाहों के संग 
प्रमाण रोये 

स्वरचित 
ऋतुराज दवे


खबर /समाचार 
काफिया -अर 
रदीफ़ -भी नहीं है 
बे बहर 
नज़्म 
जिसे चाहते रहे दिन रात, उसे खबर भी नहीं है, 
क्या करूँ जाने जाना मरने को जहर भी नहीं है, 
इश्क के समंदर में जो गोते लगाए, 
हमारी तो अब शामो सहर भी नहीं है l

अच्छी चल रही थी जिंदगी हमारी, 
तेरे बिन जालिम गुजर बसर भी नहीं है l

ढूंढते रहे हम सुख और चैन जहाँ में, 
मेरी गजल में तो बहर भी नहीं है l

अमृत पीने की ख्याहिश तो न थी कभी, 
हमारी किस्मत में तो ज़हर भी नहीं हैl

गमे जिंदगी से नहीं घबराती " उत्साही", 
पर यहाँ तो गमो के दो पहर भी नहीं है ll
कुसुम पंत "उत्साही "
स्वरचित 
देहरादून

जी हाँ खबर हैं ! 
हमको सब्र है ! 
झूठी, सच्ची , 
खट्टी -मीठी 
उड़ती हुई 
छपती हुई 
कुछ रोने की
कुछ सोने की
राजनीतिक नेता
नासमझों को ठेंगा ।
मिडिया की मत पूछो
सब कुछ बिक गया
तिल का राई 
राई का पहाड. 
कमाई के साधन 
प्रचार सूखा 
प्रचंड बाढ़ 
मतों का आंकलन 
कागजों का संकलन
भागम भाग 
सोये वो सोये 
जाग सके तो जाग 
खबर होती जबर
दंगे फैला देते शहर
पुलिस बल का कहर
गरीब हर दिन रहा मर
सड़क पर निवास 
मकानों की आस 
बेघर को घर 
सूखे को नहर 
कब होंगे नसीब में 
टूट जाएँगी सांस 
हर दिन रोंगटे खडे़ 
सड़क पर मरे पडे़
कोई दया नहीं 
कहीं हया नहीं 
विकास के नाम 
हो गये खबरों में काम
कहाँ गरीब को रोटी ? 
कहाँ बेरोजगारों को दाम? 
खबरों से आराम नहीं 
दिन कटता पर शाम नहीं ! 
जी हाँ खबर हैं ।
हमको तो सब्र हैं , 
करो धोखा हमसे ! 
सब ईश्वर को खबर हैं।
स्वरचित -चन्द्र प्रकाश शर्मा 
'निश्छल',

हास्य व्यंग्य पर प्रयास

देखिए यह बात कैसी ,
आम जाम हो गई है ।
छुपाते छुपाते भी 
खबर आज हो गई है।
पड़ोसी के घर रोज ,
खटपट होती है ।
सास बहू लड़े ऐसे,
गदर आज हो गई है।
सबसे रसीला सुनो ,
निंदा रस होवत है ।
कानो में शहद घुले ,
दावत आज हो गई है ।
पड़ोसन की महरी ,
अखबार आज हो गई है ।
रखने को काम पर ,
भगदड़ आज हो गई है।
नीलम तोलानी
स्वरचित

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:गवाह/सबूत"22 जून 201 9

ब्लॉग की रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं बिना लेखक की स्वीकृति के रचना को कहीं भी साझा नहीं करें   ब्लॉग संख्या :-425 ।। गवाह/सबूत ...