Wednesday, April 17

"पन्ने"16अप्रैल 2019

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                                           ब्लॉग संख्या :-360




लिखता हूँ  पढता हूँ  रंग उडते ख्वाब का।
तेरा चेहरा लगता है एक पन्ना किताब का।

वो हंसना रूठ जाना  तेरा  खिलखिलाना।
बातों बे बातों में  युं हीं  लडने  का बहाना।
भूला नहीं जाए  हमसे  नखरा जनाब का।
तेरा चेहरा लगता है एक पन्ना किताब का।

चमकीली  अंखियों  की  रंगत आसमानी।
संग -संग बिजुरी के बरसा आगऔर पानी।
क्या कहना मेरी जां  तेरे चढते  शबाब का।
तेरा चेहरा लगता है  एक पन्ना किताब का।

सांसो की खुश्बू में  गुम  मदहोशी की राते।
कैसे मै जानूंगा  ये तेरी  सरगोशी की बातें।
लब है शबनम में  भीगा  कतरा गुलाब का।
तेरा चेहरा लगता है  एक पन्ना किताब का।

                             विपिन सोहल
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नमन मंच
"भावों के मोती'
दिनांक-
16/4/2019
विषय-
पन्ने
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 जिंदगी की
 डायरी के चंद पन्नो  से शुरू होकर  पूरी किताब में बदलती रहती है
कुछ  पन्ने  सपाट तो कुछ में अंकित है  आड़ी- तिरछी -सीधी रेखाए ,
जब प्रारंभ हुआ सफऱ तो उत्साह और उमंग से लबरेज दोड़ती है,जैसे कोई शब्दों को सहेज कर  लिख रहा हो जिन्दगी की किताब को
अपने सपनो को करीने से सजा रहा है हर पन्ने को
अपने सपनों से, रंग बिरंगी कलमों से उन्हें चिन्हित करता है
अरे ये क्या हुआ
शायद कोई तूफान आया है इस समंदर में,ये जीवन नैया डगमगाने लगी,बिगड़ गया संतुलन समय की कमी सी है
कुछ बिखराव है
जल्दी से इस डायरी केपन्नो पर दो लाइन,कही चार पंक्तियां तो कही पूरी
कविता ,कुछ सजी है
तो कुछ बेतरतीब
कुछ को पढ़ कर चेहरे पर मुस्कान तो
कुछ को पढ़ कर
आंखे नम हो जाती है
कहीं मीठे प्यार के पल तो कुछ कड़वे
अब कुछ  अंतिम पन्ने ही शेष है
पता नही कब कलम
यूँ हाथो में रह जाये
और मेरा आखीरी
पन्ना खाली रह जाये
मैं न रहूंगी तब.......क्योकि वही होगा मेरा अंतिम सृजन
 मेरा अंतिम पड़ाव...  ।।
     स्वरचित
अंजना सक्सेना
इंदौर (म.प्र.)

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।। पन्ने ।।

जिन्दगी की किताब का वह पन्ना खास है
पढ़ लूँ रोज उसे वो सोलहवां मधुमास है ।।

उसकी खुशबू दिल से कभी नही जाती
उसमें लौट जाने की रहती सदा प्यास है ।।

लगता हरदम ज्यों कोई आवाज़ दे रहा है
जब जब रहता यह दिल मायूस उदास है ।।

यूँ तो बहुत पन्ने हैं जिनको रोज पढ़ता हूँ
सबक लेता हूँ मिलती उनसे उजास है ।।

पर यह पन्ना वाकई लाजबाव बेमिसाल है
इससे मिलता सुकून मिलता जीवन साज है ।।

इस पन्ने को सीने से लगा कर रखूँ सदा
इसे पूजूँ ''शिवम" यह बेहद पाक साफ है ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 16/04/2019

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नमन मंच भावों के मोती
शीर्षक      पन्ने
विधा        लघुकविता
16 अप्रैल  2019,मंगलवार

इतिहास के स्वर्णीम पन्ने
नयी प्रेरणा नित जग देते
गौरवशाली अतीत की गाथा
अनवरत पन्ने नित कहते
       वेद ऋचा गीता भागवत
       रामचरित मानस के पन्ने
      कवि हृदय भावों के मोती
       कर देते हैं सबको धन्य
पन्ने नश्वर हैं जीवन सम
बीत रहे और रीत रहे दिन
कुछ नर जग हित कर जाते
कुछ स्वार्थमय रहते लेकिन
         बाल्यकाल से पन्ने पढ़कर
         जीवन में शिक्षित कहलाये
         स्वविवेक से जीवन जीकर
         सबने अपने भाग्य बनाये
भूतकाल में हमने सबने
प्रणय निवेदित पत्र लिखे
स्व मानस पावन भावों से
प्रेयसी शुभ संकेत दिये
          उड़ जाते थे पन्ने लेकर
          दो प्रेमी कपोत मिलाते
          पावन युगल सुधा स्नेह से
         भावी जीवन पन्ने सजाते
पन्नों का आभारी जग है
पन्नो ने नव राह दिखाई
जूझ गए हम संघर्षों से
दुःख शौक करी विदाई।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।
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सुप्रभात"भावो के मोती"
🙏गुरुजनों को नमन🙏
🌹मित्रों का अभिनंदन,🌹
16/04/2019
     "पन्ने"
1
यादों के पन्ने
मन के तहखाने
टूटी दीवारें
2
वक्त के पन्ने
पड़ती सलवटें
झाँकती यादें
3
खुली किताब
पन्ने करे बयान
मेरी कहानी
4
कहती दास्तां
जीवन की कहानी
पन्ने जुबानी
5
कोरे हैं पन्ने
जिंदगी की किताब
बस दो चार

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल

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16अप्रैल2019
         पन्ने
लघुकविता

कोरा कागज का पन्ना है जीवन,
जो भी जी चाहे,लिख लो।
लिखते जाओ,जबतक है साँस,
फिर एक दिन पलटके पन्ने पढ़ना।
क्या,क्या लिखा है तूने इसमें,
इसको यादों में रखना।

दुःख लिखे होंगे,तो दुःखी ना होना,
सुख लिखे हुए को देखकर मुस्कुराना।

दुःख,सुख का मेल है जीवन,
पन्नों को पलटते सदा रहना।

स्वरचित
वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी
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नमन  मंच  भावों के मोती
तिथि।         16/04/19
विषय          पन्ने
***(
इन उदास लम्हों मे बोझिल
सांसे लिए जी रहा हूँ
तुमसे मिलने की आस मे
पल पल तड़प रहा हूँ ।
जो पल संग गुजारे  थे कभी
आज फिर उनमें जीना चाहता हूँ
पुरानी डायरी के पन्ने पलट,अपनी
धड़कनों मे तुम्हें सुनना चाहता हूँ।
.....ये पन्ने तो कोरे है ,
सिर्फ कुछ निशान ,तारीखें है।
हर तारीख की एक कहानी है
तुम्हारी अल्हड़ता ,मासूमियत
से भरी जिन्दगानी  है ।
कलम की स्याही धुँधली हो गयी
पर दिलोदिमाग  मे सभी उजला है
एक पन्ने पर गोल निशान ,
तुम्हारी आँखों का आंसू ढलका है।
वादे संग आंसुओ को
कैद किया था कभी
 गोला बना  कहा था
तुमसे न बिछड़ेगें कभी ।
काश वो पल लौट आता
तुम न जाने कहाँ हो ,पर
अरसे बाद खुले पन्नों में
तुम वही मुस्कान लिए
मेरे सामने खडी हो गई
ये यादों के  पन्ने अब
जीवन भर की थाती है
इन पन्नो मे ही तुम
संग मेरे मुस्कराती हो ।

स्वरचित
अनिता सुधीर श्रीवास्तव
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*भावॉ के मोती *
*  तिथि -  16 अप्रेल 2019
* वार -  मंगलवार
* शब्द -  पन्ने
* विधा -  बंधन मुक्त मुक्तक
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जीवन को जीये ऐसे,जैसे होते रस भरे गन्ने |
जीवन पथ में कदम रखे ,रहे सदा चौकन्ने ||
स्नेह के फेविकोल से जोड़े रखे रिश्तो को |
वर्ना फटते देर ना लगती,जीवन के ये पन्ने ||
* प्रहलाद मराठा
*  मुक्तक स्वयं रचित ,मौलिक सर्व अधिकार सुरक्षित
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तिथि - 16/4/19
विधा - छंद मुक्त
विषय - पन्ने

हाथों में है
किताब जिंदगी की
जिसके पन्ने
अब हो चले हैं पीले
मेरी उम्र सी
यह किताब भी
अब हो गई है
पुरानी और बूढ़ी
इन पन्नों पर
बिखरी है मेरी जिंदगी
पन्नों के बीच दबा
सूखा गुलाब
आज भी अपनी महक से
सराबोर कर देता है
मेरे अन्तर्मन को
उजालों में खिलखिलाती
जुगनू सी चमकती आंखों की
दास्तां बयान करती
अंधेरों में डगमगाती नाव सी
कभी उदास
पथरीले रास्तों से गुजरती
कांटों में उलझी
यह जिंदगी
सारे सुख दुख
बिखेर इन पन्नों पर
कितनी हल्की और
निश्चिंत सी हूँ मैं
आज भी हर दिन
रंगती हूँ
ये पन्ने
न जाने कौन सा पन्ना
हो जाएगा आखिरी पन्ना
और तब
खुलेंगे कुछ राज
जो आज तक
न कह सकी किसी से
या मेरे दिल की
दीवारों की तरह ही
इन पन्नों में दफन
होकर रह जायेंगे
नहीं जानती

सरिता गर्ग
स्व रचित
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1भा 16/4/2019/मंगलवार
बिषयःःः #पन्ने #ः
विधाःःःकाव्यःःः

कोरे पन्ने प्रभु इस जीवन के,
 कुछ अच्छा लिख नहीं पाया।
परोपकार की स्याही नहीं है,
कोरा कागज अभी  धराया।

श्रद्धा सुमन मोती  भावों के,
प्रभु  तुम्हें समर्पित करता हूँ।
शुभ लिख पाऊं कर पाऊं मैं,
केवल यही प्रार्थना करता हूँ।

गंदले पन्ने कभी नहीं हो  पाऐं,
नहीं चरित्र कभी दागदार हो।
जीवन के अंतिम क्षण तक ये
सदा साफ पवित्र शानदार हो।

प्रेम प्रीत  के पन्ने  लिख पाऊँ।
प्रभुभक्ति के पन्ने  लिख पाऊँ।
कुछ ऐसा मै रच पाऊं भगवन,
सुमधुर इतिहास लिख जाऊँ।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
जय जय श्री राम राम जी

#पन्ने#्ने काव्यः ः
1भा.16/4/2019/सोमवार
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इक पन्ने पे लिख के सबकुछ, बोला बेटे का बात।
बस ये ही दे देना समधी, कन्यादान के साथ।
...
नम आँखे और रूधे गले से, ना निकला आवाज।
शेर ने पढ ली उस पन्ने पे, माँग था बाप का मान।
...
ना लिखूँगा कुछ भी इसपर, है बस यही सवाल।
शेर की कविता पूर्ण करो तुम, मन मे भर कर भाव।

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नमन मंच को
दिन :- मंगलवार
दिनांक :- 16/04/2019
शीर्षक :- पन्ने

जिंदगी की किताब से.....
बिखर गए कुछ पन्ने.....
बस उन्हीं पन्नों को.....
हर पल समेटता रहता हूँ मैं....
कुछ पन्ने रहे कोरे...
कुछ पन्नों ने है भाव उकेरे..
बैरंग सी जिंदगी में..
रंग भरने की कोशिश में रहता हूँ मै...
ख्वाब सजाए कुछेक..
आसमां के अँगने..
लगने लगे सपनो के मेले..
उन सपनों को..
पूरा करने की कोशिश में रहता हूँ मैं...
हरपल उदासी का आलम..
लगता हो जैसे मातम...
इस गमगीन मौसम में...
दिल बहलाने की कोशिश में रहता हूँ मै...

स्वरचित :- मुकेश राठौड़
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कोरे पन्ने पर कोरी कहानी लिखना
स्याही से नही बस रूहानी  लिखना।

उथल के समंदर से जो आया वो पानी लिखना
उस रुके पानी में फिर से रवानी लिखना ।

किताबों में जो गुलाब थे वो निशानी लिखना
उन सुखे फूलों की खुशबू  सुहानी लिखना।

क्षितिज पर मिलते धरती आँसमान लिखना
मन आकाश को छूती ग़ज़ल सुहानी लिखना ।

स्वरचित
               कुसुम कोठारी ।

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*मन के पन्ने*
इश्क,समर्पण  और स्नेह से परिपूर्ण पुरुष की कहानी
मेरी कलम की जुबानी
पहली बार देखते ही अपना सर्वस्व
तुमपर न्योंछावर कर दिया था।
खो चला था मैं तुम्हारी सम्मोहित छवि में
बिना जाने ही लगा तुम्हारे लिए ही ये
जीवन बना है ।
बावला मन मान ही नही रहा था।
और बस तुम्हारे आकर्षण के वशीभूत
खींचता ही चला गया और मना भी न कर पाया
सोचने और समझने की शक्ति भी क्षीण हो गयी थी मेरी
बस तुम्हारा होकर ही रह गया ये स्नेही मन।
फिर शुरू हुआ सिलसिला तो अनवरत चलता ही
रहा।और तुम मेरी जिन्दगी का अभिन्न हिस्सा बन गयी।
करता रहा अथक परिश्रम तुम्हारा सामीप्य पाने को
तुम्हारे अन्तर्मन में स्थायी छवि बनाने को
सात फेरे का बंधन कब बंधा मालूम ही नही
पड़ा।
तुम्हारे मुख से निकली बात बन गए मेरे जज्बात
जो लगे तुम्हे खास बस वही सब मेरे हो चले अहसास
एक से बढ़कर एक स्त्रियां जीवन मे आ सकती थी और
जीवन पथ और बेहतर और आलोकित हो सकता था
पर तुम्हारे लावण्य के बाहुपाश और अपनी मर्यादित
परिधि में बंधा मेरा मन कहीं कुछ और सोच ही नही
पा रहा था।
जो कपड़े निकाल देती पहन कर चला जाता
जैसा भोजन दे देती प्रसाद स्वरूप ग्रहण कर लेता।
जिससे कहती मिल लेता और संबंधों को स्थायित्व
भी तुम्हारी ही परिभाषा से देने लगा।
मेरा मुझमे कुछ बचा ही नही
जैसे कहा मानता रहा।
हर पसंद तुम्हारी बना के अपनी पसंद
अपनी भावनाओं का मर्दन करता रहा
की बस तुम मस्त रहो और  अपने संस्कारों
की सिंचित पूंजी को भी तुम्हारे प्यार में त्याग
तुम्हारे ही इर्द गिर्द ताने बाने बुनता ही रहा।
कोई मोलभाव नही कभी कुछ गुरेज नही
इससे ज्यादा समर्पण और कोई तुम्हे दे भी
नही सकता।
तुम्हारी एक बात के लिए किसी भी हद तक
जाने को तैयार ये प्रेमी आज क्यों अजनबी
सा लगने लगा।
हर बात को संशय की दृष्टि से मेरी देखना
ऐसा  क्यों क्या तुम्हें अपने आप पर विश्वास नही।
काश देख लेती दिल के आईने को जिस पर सिर्फ
तुम्हारा ही नाम लिखा है और तुम्हारी ही छवि।
ये मेरी सांसें भी तेरा गई नाम लेकर आति है
पर ऐसा भाव क्यों अब उतपन्न हुआ की मैं
तुम्हारे लायक नही।
पीड़ा मुझे भी होती है जब परपुरुष की अच्छाइयां
उनका व्यक्तित्व गिनाया जाता है और मुझे निम्न से निम्न
महसूस करवाया जाता है अपनी ही सखियों और सहेलियों के सामने।
पर सुनो चाहे कुछ भी सोचो,कहो एक समर्पित हृदय
स्नेही मन और तुम्हारे रूप की परिधि से बंधा ये नाचीज
तुम्हारे लिए हर पल हर क्षण हर लम्हा जीता है और मरता है।
एक आशा की किरण लिए आगे रोज अपने जीवन की लड़ाई लड़ता है अपने आपसे ,अपनो से सिर्फ तुम्हारे सानिध्य की प्रतीक्षा में की कभी तो सुबह होगी
मेरी भी और तुम भी जान पाओगी की पुरुष
निष्ठुर,निर्मोही नही होता ।न ही वह कठोर हृदयी होता है
उसके पास भी स्नेह,आकर्षण और निर्मलता के अहसास
से लबरेज मन है।
तुम्हे जिस दिन ये समझ आ जायेगा उस दिन सात फेरों का वचन और मेरा कर्म भी पूरा हो जाएगा।
साथ ही अपने वजूद की जंग तुम्हारे संग जीत जाऊंगा।
तुम बिन मैं नही और न ही तुम्हारा मेरे बिना अस्तित्व
तुम और मैं अकेले अलग अलग नही
हम दोनों हम ही है।
बस अब मन के पन्ने समेट लेता हूं
कामेश की कलम से
16 अप्रैल  2019
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नमन मंच को
विषय : पन्ने
दिनांक : 16/04/2019
दिन : मंगलवार

पन्ने

आज फुरसत में सोचा
पढूं अपनी ही जिंदगी
पर यह क्या लिखा
परेशान हूँ अभी भी
यह जिंदगी की किताब
भी बड़ी अजीब है।
सोचता हूँ मैं लिख रहा हूँ
पर मेरा लिखा
इसमें कुछ भी नहीं है
मैं तो लिखना चाहता था
इसमें हर पन्ना खुशी का
मन प्रफुल्लित होता
यहाँ हर किसी का
पर यह दर्द, यह घृणा
कौन ‌लिख जाता है
आपस में वैमनस्य
क्यों हो जाता है
देखता हूं लिखा हुआ
मैं कितना गिर गया
मैं तो ऐसा न था फिर
कौन ऐसा कर गया
लिखा किसी पन्ने पर
मेरा घटिया किरदार
कहीं लिखा मैं न
भरोसे का यार
लिखा कभी मैं कितना
अमानवीय हो गया
छोड़ इंसानीयत मैं
सपनों में खो गया
झूठ का सहारा मैंने
अक्सर लिया है
लोगों के विश्वास का
कत्ल भी किया है
अपने रिश्तों में पशुता
दिखाई है मैंने।
जिनसे वादे किए
उम्र भर के लिए
उनसे भी वफा न
निभाई है मैंने ।
मेरे अपनों ने जब
मुझसे मांगा सहारा
मैं कतराया मैंने
किया यूं किनारा
मेरे बूढ़े मां बाप
मुझसे आशा लगाते
मुझे लाज न आई
बहाने बनाते
मेरे कोई सिद्धांत
मेरा कोई धर्म न
कभी देख भी पाया
मैं अपने कर्म न
अपनी ही जिंदगी के
पन्नों को पढ़कर
लिख भी रहा हूं पर
भीतर से मरकर
मुझे समझ न आए
मैं क्यों ज़िंदा हूँ
मैं आज स्वंय पर
ही शर्मिंदा हूं
मैं आज स्वंय पर
ही शर्मिंदा हूं

जय हिंद
स्वरचित : राम किशोर, पंजाब ।
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नमन भावों के मोती
मंगलवार/16--4--19
शीर्षक--पन्ने
विधा --कुंडलिनी/मुक्तक
1
पन्ने  पर गन्ने छपे, लख बालक ललचाय।
लाकर गन्ना वास्तविक,उनको कौन खिलाय।।
उनको कौन खिलाय,मील के हैं ये गन्ने ।
अब भी सुख के साज ,छपे हैं पन्ने पन्ने ।।
2.
पन्ने पन्ने में छपा, गौरव का इतिहास।
अमर शहीदी गाथ का,करा रहा आभास।
अंत समय तक शौर्य का,आलम रहा विशेष---
इसीलिए वो पूज्य हैं, नाम उन्हीं का खास।

******स्वरचित*******
     प्रबोध मिश्र 'हितैषी'
बड़वानी(म.प्र)451551
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सादर अभिवादन भावों के मोती
16-04-2019
पन्ने
उसने अपनी किताब के
कुछ कोरे पन्ने
जान-बूझ कर
हवा में छोड़े पन्ने
उड़ रहे फरफराकर
कुछ काले और गोरे पन्ने
टकटकी बांधे खड़ा मैं
थोड़े सजग थोड़े चौकन्ने
लहर-लहर पतंग
हाथ से बस थोड़ा तंग
पकड़ में न आये मगर
मन को मेरे झकझोरे पन्ने
स्याही जम गई है बर्फ
भाव बन पाये न हर्फ़
ना इसे निचोड़ पाऊँ
ना कलपता छोड़ पाऊँ
कोई और पृष्ठ मिले शायद
ये तो बड़े निगोड़े पन्ने
-©नवल किशोर सिंह
    16-04-2019
      स्वरचित
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नमन सम्मानित मंच
         (पन्ने)
          ***
यदि जीवन  एक  पुस्तक चारु,
  दिन- रैन  शुचित  अदभुत  पन्ने,
    मनोविकृति    प्रायः    गहनतम,
      प्रतिपल सजग मनस को छलने।

कोरे  पन्नों  पर   शुचि  अंकित,
  कटु-मधु     स्मृतियाँ   अगणित,
    अविस्मरणीय काल की सुरभित,
      प्रघटित      घटनाऐं      अदभुत।

सृष्टि चारु  चर-अचर  जीव की,
  मात्र    अनूठा    रंगमच    शुचि,
    कर्मक्षेत्र जीवों  का  बसुधा-तल,
       लेखा जीवन  पुस्तक  पन्नों पर।

नश्वर भोतिकता मायावी संसार,
  पाप-पुण्य   कर्मों   की स्मृतियाँ,
     जीवन पुस्तक के पन्नो पर मात्र,
        रह   जातीं   अंकित   अवशेष।

श्रेयस्कर   जीवन   पुस्तक   के,
   पन्नों  पर  लिखें  कहानी प्रेरक,
     प्रेम  मसि  की   वृष्टि  जहाँ  हो,
       भावी  युग   निरखें   पन्नों  को।
                              --स्वरचित--
                                 (अरुण)

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नमन भावों के मोती
विषय-पन्ने

धूल भरी आलमारी के
दराज से आज ...
पुरानी डायरी जैसे ही निकली
मन बेचैन हो उठा
पन्ने पलटने के लिए
मिट्टी की सोंधी महक समेटे
 ये पन्ने सुनहरे हो चले थे
हृदय पल पल
हो रहा था उद्विग्न...
उन तहरीरों को महसूस करने
जिन्हें बड़ी नफ़ासत से
सजाया था इन पन्नों पर...
पलटते पन्नों ने खोल दी
यादों की खिड़कियाँ...
जिनमें हौले से आकर
कब तुम जिन्दगी का सबब बन गए
पता ही न चला।
सूखे गुलाबों की महक से भरे पन्ने
   बयां कर रहे थे इश्क़ की रुमानियत
जिन्हें तन्हा रातों में
सजाया था तुम्हारी यादों से...
एक कहानी जिसका अंत
लिखने से पहले ही...
बहारों ने खिजां का
दामन थाम लिया..
हाँ,ये कुछ पन्ने है अभी बाकी
कोरे है सूने है मेरे जीवन की तरह
काश तुम आ जाते
और ये पन्ने चमक उठते
मेरी इबादत की कहानी लिखकर
मेरी मोहब्बत की रवानी लिखकर।

स्वरचित
गीता गुप्ता 'मन'
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ये जिंदगी हैं खुले किताब की तरह
फिर भी लगता हैं कुछ पन्ने पढ़ने अभी बाकी हैं
जिंदगी के हर पन्ने को उल्ट कर देख रही हूँ मैं
कुछ पन्ने लिखने अभी भी बाकी हैं .

कहानी मेरी कुछ आधी अधूरी सी हैं
कुछ दर्द भरी जिंदगी की उलझनें हैं
पन्ने मेरे कुछ कोरे हैं जिसमें अभी लिखना बाकी हैं
जिंदगी के इन्हीं पन्नों में लिखने की उम्मीदें बाकी हैं .

जिंदगी सभी के लिये एक खुली किताब हैं
कोई इसके हर पन्ने को दिल से पढ़ रहा हैं
कोई पढ़कर इसके हर पन्ने को फाड़कर फेंक रहा हैं
और कोई वक्त साथ बस पन्ने पलट रहा हैं .

कोरे पन्ने पर हमने भी लिखे कुछ ख्वाब 
कुछ ख्वाब पूरे हुये सपनों को नये पंख मिले
कुछ अधूरे खामोश रह गये
कुछ पन्ने वक्त की स्याही में बिखर गये.
स्वरचित:-  रीता बिष्ट
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नमन भावों के मोती
दिनांक 16/04/2019
वार - मंगलवार
विषय - पन्ने
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यादों के पन्ने
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आज फिर
जिन्दगी की किताब से
फड़फड़ा उठे हैं
कुछ पन्ने यादों के.....
संग - संग
कुछ लम्हे
यादों के जेहन से निकल
आज अचानक
तैरने लगे हैं
फिजाओं में......
कुछ यादों को
संजोया था मैंने
बड़ी ही सिद्दत से
समेटा था जिन्हे
अपनी जिन्दगी की किताब में
वही यादें
पल - पल की
कसक बन गई है
जीने नही दे रही अब
चलो आज मुक्त करती हूँ...
देखती हूँ उन्हें
विलीन होते
खोते से
शून्य में...... ।

      डॉ उषा किरण
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नमन मंच को
दिनांक -16/4/2019
विषय - पन्ने
विधा - स्वतंत्र

मैंने तुम्हारे सामने अपनी ,......किताब खोल कर रख दी

 है .........जिसके हर पन्ने में दर्ज .....

                मेरे एहसास .......मेरे जज्बात....

    तुम आसानी से पढ़ सकते हो ........पर क्या मैं !!

                      तुम्हारी डायरी में .........झांक सकूंगी

..... ! .....कभी .....??
🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁

               तनूजा दत्ता ,  (स्वरचित)
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

नमन मंच🙏
दिनांक- 16/04/2019
शीर्षक- "पन्ने"
विधा- कविता
************
इस जीवन रूपी डायरी में,
वक्त के पन्ने भरे पड़े हैं,
व्यस्तता इतनी हो गई है कि,
हमने कभी खोले ही नहीं |

सहसा एक दिन फिर,
हवा का रुख तेज बहा,
पन्ने उलट पुलट होने लगे,
राज भी अब खुलने लगे |

कुछ पन्ने हसीन यादों के थे,
कुछ पन्ने दर्द बयां कर रहे थे,
जो इतिहास बन खामोश थे,
सहसा जुबान खोलने लगे |

स्वरचित *संगीता कुकरेती*
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नमन"भावो के मोती"
16/04/2019
   "पन्ने"
जिंदगी मिली किताब सी
पन्ने सारे थे कोरे -कोरे..
वक्त के साथ पन्ने भरते रहे
रंगो से सजे थोड़े-थोड़े...
कुछ बेरंग ही रहे.......
कुछ चमकते रहे..
कुछ धूमिल पड़े....।

जिंदगी है एक खुली किताब
पन्नों में है वक्त की फरियाद
पुरानी यादें ...........
पन्नों में फड़फड़ाती..
लिख रही उम्र की कहानी।

खाली पन्ने बचे है....
बस दो -चार........
एक दिन बंद हो जायेगी
जिंदगी की ये किताब..
पन्नों में रह जायेगी...
दिलों की दास्तां...
दरकिनार........।।

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल
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भावों के मोती
१६/४/२०१९
बिषय- पन्ने
अंतर्मन के अंतहीन अंतर्द्वंद्व को
बैठे-बैठे  बस यूं ही लिख लेती हूं,
हर रात डायरी के खाली पन्नों पर।

ये पन्ने कहेंगे कहानी एक दिन,
मेरी अनकही असीमित वेदनाओं की
जो न कह सकी मैं, किसी से कभी भी।

इन पन्नों में दफन मेरे कई राज
जान जाएगीे दुनिया मेरे जाने के बाद।
कहेंगे कहानी मेरी जिंदगी की ये पन्नें,
कब मैं मुस्कुराई और कब रोयी थी।

कब किसी की बातें-मुलाकातें-सौगातें
मेरे दर्दै-दिल की दवा बन गयी थी।
कब अनजानों से मिला था अपनापन
और अपनों के लहजों से पीड़ित हुई थी।

मेरे सुख-दुख,मिलन-विरह, दर्द-खुशी
सबकी कहानी सुना देगें ये पन्ने।
इस क्षणभंगुर जगत में मैं न रहूं भी तो
जिंदा रहेंगे ये मेरे लिखे हुए पन्ने।
स्वरचित - निलम अग्रवाल, खड़कपुर
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भावों के मोती दिनांक 6/4/19
पन्ने

कौन कहता है
बेजान होते हैं
ये कागज के पन्ने
इतिहास लिखा है
इन पन्नों पर

वक्त बदलने की
ताकत रखते हैं
ये पन्ने
" सरफरोशी की
 तमन्ना अब हमारे
दिल में है
देखना है जोर कितना
बाजुए कातिल में है ।"
 लिखे पन्नों ने
जलाई थी अलख
आजादी की

दो प्रेमियों
के प्यार के  गवाह
ये पन्ने

माता-पिता को
तसल्ली देते है
ये खत के पन्ने

खुशियाँ हो तो
सतरंगी है
ये पन्ने
गम में खुद
गमगीन हो जाते हैं
ये पन्ने

बदल गया है
आज पन्नों का स्वरूप
स्मार्टफोन हो गये है
ये पन्ने

स्वलिखित
लेखक संतोष श्रीवास्तव  भोपाल
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नमन भावों के मोती
दिनांक : - १६/४/०१९
विषय : - पन्ने

            📝   पन्ने    📝

यादों की दास्ताँ
विरह की सिसकियाँ
गढ़ी जाती हैं मुझ पर
भावनाओं की आकृतियाँ।

हर पन्ने पर सजती हैं
शब्दों की बहार
रचे जाते हैं ग्रंथ, इतिहास
और प्रेम के मधुर रसधार।

पन्ने - पन्ने जुड़ कर
बनतीं हूँ मैं किताब
अकेले भी सफर करती हूँ
कभी दफ्तर तो कभी प्रेम वाहक बनतीं हूँ
 बनकर किताब मैं
पिढी- दर - पीढ़ी जीवन्त रहती हूँ।

  स्वरचित: - मुन्नी कामत।

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यादों के पन्ने
उकेर रहें घाव
नहीं हैं छाँव

घाव के पन्ने
वक्त का मरहम
भरते घाव

शोर्य के पन्ने
लिख रहे हमारे
वीर सैनिक

रहे न कोरा
सभी के मुस्काएं
जीवन पन्ने

अनेक राज
पन्ने में है दफ़न
अज्ञान हम

मुकेश भद्रावले
हरदा मध्यप्रदेश
16/04/2019

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नमन भावों के मोती ,
आज का विषय , पन्ने ,
दिन , मंगलवार ,
दिनांक, 16, 4, 2019 ,

पन्ने जो  बिखर गये अतीत के , दिल उनको ही ढूँढा करता है |

बीते  हुऐ  लम्हों  की  स्याही  से , जीवन दर्शन को उकेरा  करता  है |

कुछ खट्टे मीठे स्वादों के रस से , स्वाद जिह्वा का बदला करता है |

यादों के अनमोल खजाने में , खुशियों  के  जेवर  ढूँढा करता है |

बीता बचपन संघर्ष आया जीवन में , दिल तो पल सुकूँन के चाहता है |

सब क्यों उलझे धन के पन्ने में , दिल हमेशा मन से सवाल ये करता है |

ऐसा होता है क्यों नये जमाने में , दिल को तो  हर कोई ठुकराया करता है |

अब रुचि ही  नहीं है उत्सर्ग के पन्नों में ,फलदायी पन्ने ही सम्हाला करता  है |

धूल जमीं है  खुशियों के पन्नों में , बस  गम के पन्ने  ही  सजाया करता है |

नये  जमाने  की  किताबों  में ,  दिल परछाईं सदा अपनी   खोजा करता है |

आने वाली हर नई पुस्तक में , दिल इक पन्ना अपना भी चाहता है |

है विरला ही कोई जमाने में , जो कदर दिल के पन्ने की करता है |

स्वरचित , मीना शर्मा , मध्यप्रदेश ,
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नमन मंच को
शीर्षकांतर्गत द्वितीय प्रस्तुति

चार पन्नों पर लिखी जिंदगी..
कर्मों की स्याही गढ़े जिंदगी..
मंजिल पथरीली पगडंडियाँ..
सफर अनवरत करे जिंदगी...

खुली किताब सी है जिंदगी..
पन्ने दर पन्ने पढ़ता रहता हूँ..
लिखी जा चुकी नियति द्वारा..
पर अब तो जीए जा रहा हूँ..

चार पन्नों में सिमटी जिंदगी..
एक एक पन्ना एक बसंत सा..
हर क्षण लगने लगा मुझे अब..
होने लगा है जीवन अंत सा..

पहला पन्ना बचपन का..
दूजा पन्ना तरूणाई का..
तीसरे पन्ने पर लिखी जिम्मेदारी..
चौथा अंतिम पन्ना विदाई का..

स्वरचित :- मुकेश राठौड़

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नमन भाव के मोती
 16 अप्रैल 2019
विषय- पन्ने
विधा -हाइकु
1
पन्ने कहते
इतिहास कहानी
गौरव गाथा
2
पन्नों में कैद
अनुभव संसार
ज्ञान भण्डार
3
हम पढ़ते
पन्नों पर लिखते
जीवन ज्ञान
4
पन्ने निर्मित
औद्योगिक विकास
बांस की लुग्दी
5
हम देखते
जिन्दगी के पन्नों को
परिवर्तन
6
खबरें लाता
अखबार के पन्ने
रोचक ज्ञान

मनीष श्री
स्वरचित
रायबरेली
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II  पन्ने  II नमन भावों के मोती.....

वो एक टक मुझे मैं उसे....
देख रहा था....
मेरे चहरे पर....
वो अपनी निगाहों से...
कोशिश कर रहा था...
कुछ लिखने की...
मैं...
बिना पन्ने बदले किताब के जैसे...
उसकी स्थिर आँखों को...
पढ़ने की हिम्मत जुटा रहा था...

वक़्त बदल जाता है पल में ही...
और हम २ साल में....
जो एक जान थे कभी...
अब अनजान हो गए....

शायद...
गले...सड़े पुराने पन्नों से निकलती गैस से...
दोनों का दम घुट रहा था...
चहरे की किताब पर...
न आँखों की स्याही ने कुछ लिखा...
न लब के पन्ने ही खुले...
हाँ...वक़्त ने पन्ने अलग कर...
एक किताब के...
दो किताबों के कर दिए...
मैं... तुम...

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II
१६.०४.२०१९
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नमन मंच....
विषय... पन्ने
विधा... हाइकु
------/-----/------/-----
1).......

दिल के पन्ने
भावों के आखर हैंं
गीत सुहाने

🙏मंच को नमन🙏
आदरणीय गुरूजन को नमन
🙏🙏🌹🙏🙏
विषय-पन्ने(१६-४-१९)
🙏एक बेटी की पाती अपने स्वर्गीय पिता के नाम🙏

पापा हर वक्त खड़े थे आप हमारे लिए
एक बुलंद सेतु बनकर!!

आज भी आपकी यादों का दिया
दिल में जलता है
झकझोर देती है एक याद
खाने की मेज पर
जब दिन ढलता है
आज भी पापड़ और चटनी
आपकी याद दिलाते हैं
वो तम्बाकू चूने का डब्बा
बार बार सामने आता है
आपका बिटिया रानी कहकर
आवाज़ देना
बार बार रुला जाता है
आपके डायरी के"पन्ने"देख
हृदय भर आता है
ये दिया आपकी यादों का
यूँ ही जलता रहेगा
हमारी साँसों के अंत तक
चाहे आँसू लाख बुझाना चाहें
भयंकर मेघ बनकर!!🙏

👧स्वरचित👧
  सीमा आचार्य(म.प्र.)
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शीर्षक "पन्नें"भावों के मोती
_____________________
खुद्दारी पन्नों से सीखिये जनाब
जो एक बार लिख गये शब्दों से
तो फाड़ दिये गये बेशक
पर ना बदली इबारतें शब्दों की
स्याही और कलम से रिश्ता इनका
जो बच गये लिखे जाने से तो
फिर काम आये सिर्फ जलाये जाने के
भावों के अलावा कुछ ना लिखा
किया व्यक्त वही जो लिखा गया
वचनों के पहरेदार यह मौन
इनके पटल पर दर्ज अटल फैसले
फिर ना किसी से बदले गये
कश्तियाँ बनी इनकी मासूम हाथों से
खुशी पर यहाँ भी दी वादा निभाकर
ना डूबी थी पन्नों की बेशक कश्तियाँ
यह इस पार से उस पार ले गई
दिल की सवार सारी ख्वाहिशों को
पन्नों मे बाँध-बाँधकर समय को
इतिहास की किताब एक बना गये
थे सादे पन्नें पर इजहारों की
अमिट यादगारें बना गये
-----नीता कुमार(स्वरचित)

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शुभ साँझ🙏🌹
भावों के मोती
मंच को नमन
दैनिक कार्य
स्वरचित लघु कविता
दिनांक 15.4.2019
दिन मंगलवार
विषय पन्ने
रचयिता पूनम गोयल

किताब़ के बिखरे पन्नों को , मैं फिर से जोड़ती जाऊँ !
और उन्हें जोड़कर , फिर से मैं , एक नई किताब़ बनाऊँ !!
जरा सी हवा चली , और फिर कोई एक पन्ना उड़कर बिखर गया !
मैं फिर भी , उस पन्ने को उठाकर , उस किताब़ में लगाऊँ !!
क्योंकि एक-एक पन्ना उस किताब़ का , है बेशकीमती !
हरेक पन्ने को जोड़कर ही तो , वह किताब़ बनी !!
वरना तो वह , एक पन्ना ही तो था , हाँ , एक पन्ना ही तो था !
कुछ ऐसा ही है हमारा यह जीवन , बिल्कुल उस किताब़ के जैसा !
इसका एक-एक पल है , उसके एक-एक पन्ने के जैसा !!
इसके पलों को , हमें उन पन्नों की तरह जोड़ते जाना है !
और अन्त समय ( मृत्यु ) में , उस परमपिता परमेश्वर का दरवाज़ा खटखटाना है !!
क्यों...............क्यों..............क्यों............
क्योंकि हमें अपने जीवन के लेखे-जोखे को , चैक करवा के , उस अध्यक्ष के हस्ताक्षर पाना है !
एवं सही-गलत का मुआयना करवा के , अपने भावी जीवन का सही निर्देशन पाना है !!
अध्यक्ष वही , जिसने यह सारी सृष्टि रची 🌹🌹🌹🌹
                                 जय श्रीकृष्णा🌹🌹🌹🌹🌹
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सादर नमन
जीवन मेरा एक अनपढ़ी किताब,
फूलों की महक बनकर खुशियाँ,
कुछ गमों के बादल से,
चलती रहती है दुनियाँ,
जीवन के इन पन्नों पर,
लिखा प्रिय नाम तेरा,
करता है महसूस तुझे,
 ये संगीत मेरा,
कुछ पन्नों पर आँसूओं की स्याही है,
कुछ पर तेरे स्पर्श की यादें,
कुछ निभाए कुछ टूटे,
तुझसे किए मेरे वादे,
जीवन के इस भँवर में,
यादों के पन्ने संभालने हैं,
बिखर गए हैं जो मोती,
प्रेम सूत्र में वो ड़ालने हैं,
*****
स्वरचित-रेखा रविदत्त
16/4/19
मंगलवार
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2भा.16/4/2019मंगलवार
बिषयःःः #पन्ने#
विधाःःःकाव्यःःः

 जीवनरूपी पुस्तक हैं हम
शेष  बचे  कुछ पन्ने इसके।
इनमें  बूढे और  जवान  हैं,
यहां रहे बच्चे नन्हें  सबके।

इस पुस्तक पर हमने यारो,
खट्टी मीठी यादें लिख लीं।
वाद विवाद हुऐ आपस में,
पन्नों पर फरयादें लिख लीं।

रह रह कर जो हमें कचोटें
साफ करें दिल के पन्नों से।
वैरभाव की स्याही दिखे न,
हट जाऐ कालिख पन्नों से।

हो शांतिपूर्ण वातावरण ऐसा ,
जिसे स्वर्णाक्षरों में लिख पाऐं।
आज रहें कल जाऐं तो निश्चित,
दो पृष्ठ सुअक्षरों से दिख जाऐं।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
जय जय श्री राम राम जी

#पन्ने #काव्यः ः
2भा.16/4/2019/मंगलवार

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नमन भावों के मोती
दिनाँक-16/04/2019
शीर्षक-पन्ने
विधा-हाइकु

1.
प्रेमिका पढ़े
चित्तचोर के लिखे
पन्ने प्यार के
2.
पुरानी बातें
पन्ने इतिहास के
पढ़ती पीढ़ी
3.
पुराने किस्से
पन्ने हुए रंगीन
अखबारों में
4.
पन्ने बताते
इतिहास पुराना
हमें जबानी
*********
स्वरचित
अशोक कुमार ढोरिया
मुबारिकपुर(झज्जर)
हरियाणा
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पन्ने
🎻🎻🎻🎻

पन्ने मिले आयु के थोडे़
 मैंने ठीक से कभी न मोडे़
जब थोडी़ सी चेतना आई तो
लग गये एक से एक रोडे़।

यौवन का पन्ना नहीं सम्भला
इसने किया बडा़ हमला
कली अली के चक्कर मे
बिगड़ गया पूरा गमला।

उत्तरार्ध्द का पन्ना बिखर गया
ज़गह ज़गह से झर गया
उसे सँवारने को हाथ बढा़या तो
हालत देख उसकी डर गया।

जीवन तो था अमूल्य पन्ना
पर नहीं रहा यह एक अधन्ना
खो दिया एक अदभुत रत्न
अब नहीं हो सकता कोई यत्न।

अधन्ना पहले दो पैसे को कहते थे।
अन्तिम पँक्तियों में पन्ना रत्न वाला प्रयोग किया है।

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भावों के मोती : प्रदत्त  शब्द - पन्ना
*****************************
स्वतंत्र लेखन
..................
जब से इन हाथों ने क़लम थामना सीखा
तबसे जुड़ गया इक अजीब सा रिश्ता इन पन्नों से
कोरे काग़ज़ पर जब पहली बार अपना नाम लिखा
अजीब सी खुशी से बावला होगया था मन
वो खुशी ,बाल सुलभ मन की थी !
वो आड़ी तिरछी लकीरें
छोटे-छोटे ,आधे-अधूरे अक्षर कब शब्द
और ,ये कब वाक्य बन गए
और मेरी ज़िंदगी का हिस्सा बन गए
कुछ याद नहीं !
एक लंबा सफर तय किया है
मैने इन पन्नों के साथ
छोटी बडी बातें इन पन्नों से जुड़ते चले गए
जैसे जैसे क़लम की पकड़ मज़बूत होती गई
इन पन्नों पर ज़िदगी अपनी कहानी लिखती गई ।
पन्ने भरने लगे
मन की भावनाएँ
नये नये शब्दों का लिबास पहनकर
सज सँवरकर
इन पन्नों को रंगने लगी!
और,समय का पहिया निरंतर घूमता रहा
नये नामों को जोड़ता रहा।
इन पन्नों को सहेजते
इनसे रिश्ता निभाते
अब एक लंबा अरसा गुज़र गया।
बहुत कुछ बदल गया
कई नाम इन पन्नों से मिट गए हैं
और अब तो ये पन्ने भी
सिकुड़ से गए हैं।
आज की दुनिया में इनका वज़ूद
प्रायः मिट चला है
मगर फिर भी
ये उन दिनों की यादों का
मेरे जीवन के सुनहरे दौर का
अनमोल तोहफ़ा है
ये पन्ने
हैं मेरे अपने
सदियों से सदियों तक!
स्वरचित (c)भार्गवी रविन्द्र ....बेंगलूर
    दिनांक : १६/०४/२०१९
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मंगलवार 16 अप्रैल 2019
भावों के मोती - पन्ने
छन्द मुक्त कविता

एक विवाद जन्मा है
एक कोरे पन्ने नें
लगाया है आरोप
एक कलम पर
छीन लिया है कोरापन
बिना सहमति
बिना इजाज़त
अंकित कर दिया है
शब्दों का रेला
एक भीड़ की मानिंद
कुछ तथाकथित भद्रजनों हेतु
प्रयोजनार्थ
चिंतन या मनोरंजन
मिल रही हैं
सफल असफल
मिश्रित अनुभूति
कर लिया गया है
पन्नों का समूह
कैद एक कतार में
अमूल्य निधि की तरह
अब करना होगा
एक आदर्श फैसला
एक पन्ने की नियति का

©® मनीष मिश्रा मणि
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भावों के मोती

विषय- पन्ने
दिनांक-15/4/2019
**********
सबने  सुनाई सुंदर कहानी  पन्ने  की,
मैं सोचता हूँ उन पन्नों के  बारे  में-
जिनपर  अभी  तक  कुछ  न लिख 
पाया मैं
कोरे काग़ज़  है  वो।
भविष्य  की  स्याही जब  पड़ेगी
उनपर
अतीत  की गर्त  हटेगी
सुनहरी सुबह   होगी
भविष्य  क्या  क्या  रंग  दिखायेगा?
हर रंग  जीवन को नई दिशा  दिखायेगा।
हर कोई आशावान, ऊर्जावान
रहेगा।
हर  पन्ने  की  अलग  कहानी
लिखे सभी  अपनी  मनमानी ।
पर होता  है  वही  सही
जो औरों  के  मन की  भी जाने ।

स्मृति श्रीवास्तव स्वरचित
सूरत
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नमन भावों के मोती
विषय -पन्ने

व्यतीत व्यथा
इतिहास के पन्ने
कहते कथा

अपराध के काले पन्ने
आतंक की लाल स्याही ।
व्यतीत की व्यथा
कहती आज की कथा ।
वर्तमान की देहरी पर खड़ा
अतीत दे रहा गवाही ।
अभी न संभाले
तो होगी बस
तबाही और सिर्फ तबाही ।
क्यों अपने विषैले पंजों से
अपनी देह नोंच रहे ।
अपराध की राह छोड़ो
मानवता से ना यूँ मुंह मोड़ो ।
अंधेरे में छुपकर बैठ
भला क्या सोच रहे
उठो जो कुछ बिखराया तुमने
समेटो, तिनका तिनका जोड़ो ।
ना यूँ स्वयं से स्वयं घर तोड़ो ।
बहकावे की गलियां छोड़ो
दिल से दिल को जोड़ो ।
ना यूँ भारत तोड़ो
उठो तिनका तिनका जोड़ो
उठो तिनका तिनका जोड़ो ।

(स्वरचित )सुलोचना सिंह
भिलाई  (दुर्ग )
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नमन मंच को
शब्द पन्ने
16/4/2019
हाइकु
1
दिल के पन्ने
भावना  की स्याही से
दर्द उकेरा
2
जीवन पृष्ठ
सतकर्म है शब्द
ईश लेखक
3
संसार पन्ना
इंसान सारे शब्द
ईश रचता
4
पृष्ठ आदर्श
निभा रहे अक्षर
ख़ुशी व गम
5
धरती पन्ना
शब्द है हरियाली
वृक्ष लेखनी
6
प्यार के शब्द
दिल के पन्नो पर
प्रेमी लिखते
कुसुम पंत उत्साही
स्वरचित
देहरादून

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भावों के मोती
विषय - पन्ने
तिथि -15/4/19
वार - मंगलवार
विधा -मुक्त

जिंदगी के पन्ने (गीत)

जिंदगी के हर पन्ने पर, लिख लिया है तेरा नाम
तुझे पाने की चाहत में, रहता है दिल बेकरार
हर बात में याद आता है, बस तेरा ही खयाल
हर नज़ारे में नज़र आता, तेरी नज़रों का दीदार

जिंदगी के हर मोड़ पर, करती हूँ इंतजार
तेरे संग होने से ही, मुकम्मल है संसार
तू घना वृक्ष है, मैं हूँ तेरी शीतल छाँव
तेरे नाम से मिलकर ही, पूरा होता मेरा नाम

जिंदगी की सुबह तुम्हीं, जीवन की शाम तुम्हीं
जिंदगी की आस तुम्हीं, जीवन की प्यास तुम्हीं
जिंदगी का सपना तुम्हीं, जीवन का सच तुम्हीं
खो जाएं इक दूजे में, नींद और सपना तुम्हीं
स्वरचित - हिमाद्री वर्मा
जयपुर (राजस्थान)
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शुभ साँझ 🌇
नमन "भावों के मोती"🙏
16/04/2019
हाइकु (5/7/5) 
विषय:-"पन्ने"

(1)
विचार बाँटे
अख़बार के "पन्ने"
जग समेटे
(2)
प्रेम किताब
"पन्नों" में बसी याद
छुपा गुलाब
(3)
यादों के "पन्ने"
उम्र की मुंडेर पे
छूटे, बिखरे
(4)
धर्म है जिल्द
जिंदगी की किताब
कर्मों के पन्ने
(5)
पवन लाये
सावन का संदेशा
मेघों के पन्ने

स्वरचित
ऋतुराज दवे
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नमन भावों के मोती
विषय पन्ने

जिंदगी ग़र कहानी होती
तो पन्नों पर उतार लेती.....

जिंदगी ग़र सपना होती
तो नींदों में संवार लेती.....

जिंदगी ग़र दर्पण होती
इक बार तो निहार लेती.....

पर जिंदगी एक हक़ीक़त है
साँसे भी न हमें उधार देती....
                        रजनी रामदेव
                         न्यू दिल्ली

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भावों के मोती
विषय-पन्ने
16/4/2019

हाँ जी!.....जीवन एक किताब है।
    जिसके हर एक पन्नों पर लिखी
     रोज-रोज की हर एक कहानी
      लाजवाब है!....

इस किताब में,
          सुख-दुख की संपूर्ण गाथा है।
          राज की, नाराजगी की,
         जिंदगी की हर व्यथा का
        खुलासा है!...

लिखी है इसमें,
    हर रोज की एक नई परिभाषा
     टूटे बिखरे रिश्तों की भाषा
      कुछ पन्ने बिखर गए
     कुछ लिखने से छूट गए।

चाहते है,
         कुछ लोग जीवन की किताब पर,
         नए पन्ने  है लगाना
        पर..... समझदारी इसी में है
       पहले बिखरे पन्नों को सहेजे,समेटे

        फिर यारों चाहो तो.......
        बेशक नए पन्ने लगाना...
         जी हाँ!.... नए पन्ने लगाना।

©सारिका विजयवर्गीय "वीणा"
नागपुर  (महाराष्ट्र)

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मंच को नमन
दिनांक -16-4-2019
विषय -पन्ने

भावों की स्याही में डूबी
क़लम आज बेक़रार है
लिपिबद्ध होने की ख़ातिर
कुछ कोरे पन्नों की दरकार है
अंतर्मन के सकल भाव बटोरकर
कोरे पन्ने पर आज क़लम लिखेगी
प्रकृति का राग बनकर
जीवन का संवाद लिखेगी
भँवरों का गुंजार बनकर
खिले पुष्पों की सुगंध लिखेगी
मृदु कलियों का क़िसलय बनकर
रसीला मधुमय संसार लिखेगी
चाँदनी की आभा बनकर
चाँद की नई उपमा लिखेगी
नीले नभ की नीलिमा बनकर
जलद यान का भ्रमण लिखेगी
पक्षियों का कलरव बनकर
हौंसलों की ऊँची उड़ान लिखेगी
चटटानों की स्थिरता बनकर
दृढ़ता का एक पैग़ाम लिखेगी
नदियों , झरनों का नाद बनकर
बहते पानी की तरंग लिखेगी
पतझड़ के क़िस्से भुलाकर
वसंत का आगमन लिखेगी
आहतों पर गाज गिराकर
राहतों का आग़ाज़ लिखेगी
चाहतों का साज़ बनकर
प्रेम, एकता के सद्भाव लिखेगी
अंतर्मन का दर्पण बनकर
मन की केवल बात लिखेगी
रिश्ते नातों का सार बताकर
अनुभूतियों का मर्म लिखेगी
व्यथित मन का क्रंदन बनकर
मौन वेदना की तासीर लिखेगी
अपेक्षाओ के दायरे में बँधकर
छटपटाहटों के मायने लिखेगी
जीवन मूल्यों की सौगंघ खाकर
जीवन दर्शन की नई रीत लिखेगी
वत्सल रस का रसपान कर
ममता का सुखद पाठ लिखेगी
सुखों की जीवंतता का वर्णन कर
दुखों की भी पहचान लिखेगी
तृष्णाओं का भार घटाकर
आशाओं का  संसार लिखेगी
सामाजिकता का सरोकार बनकर
समरसता का उपदेश लिखेगी
क़लमकार की ताक़त बनकर
लेखन धर्म का कर्तव्य लिखेगी
कोरे पन्ने पर मचल मचलकर
आज यह क़लम बेबाक़ लिखेगी !

संतोष कुमारी ‘ संप्रीति ‘
स्वरचित
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सभी आदरणीय अग्रजो को सादर नमन

हर्फ दर हर्फ अपनी अधूरी कहानी लिखता हूं
इन कोरे पन्नों पर मैं अपनी बेजुबानी लिखता हूं

मेरी जिन्दगी का मुकम्मल हिसाब कर दो
पन्ना-पन्ना मेरी जिंदगी का किताब कर दो
ये तेरी जिद है  बदलने की तो बदल दे मुझे
बुझा इस दिये को और फिर माहताब कर दो

बस इतनी सी ही बात सुबह शाम लिखता हूं
दिल के हर पन्ने पर बस तेरा नाम लिखता हूं
बेशक मुझे तेरा अता-पता नहीं मालूम मगर
रोज तेरे वास्ते एक नया पैगाम लिखता हूं

मत रोक ऐ दिल, ये भी कर गुजर जाने दे
सीलन भरे इन पन्नों को, बिखर जाने दे
बड़े दिनों से ठहरी है ये जिंदगी अपनी
 ये चाहे जाये जिधर, इसे उधर जाने दे

अभिमन्यु कुमार

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
नमन भावों के मोती ,
पन्ने ,
मंगलवार ,
16 , 4 ,2019 ,

बिखरे पन्ने
एकत्रित करिऐ
चले चलिऐ |

पन्ने अतीत
करिये नहीं प्रीत
भविष्य जीत |

पन्ने दिल के
रहें साफ सुथरे
प्रेम निखरे |

पन्ने गम के
विसर्जन करके
आगे बढ़ते |

प्रेम की गाथा
लेखक ही कहता
पन्ने सजाता |

भाव के मोती
पुस्तक की प्रकृति
पन्ने की ज्योति |

रोज सबेरे
अखबार निहारे
पन्ने बिखेरे |

लड़कपन
लगता है सपन
पन्ने लगन |

उम्र तमाम
अनुभव लगाम
पन्ने गुलाम |

मन किताब
मिला कर्म हिसाब
पन्ने जबाब |

कलम साथी
किताब दिया बाती
पन्ने सजाती |

स्वरचित , मीना शर्मा , मध्यप्रदेश ,
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"नमन-मंच"
"दिंनाक-१६/४/२०१९"
"शीषर्क-पन्ने"
समेट ले कोई उन बिखरे पन्ने को
अलग नही उनका अस्तित्व
एक एक पन्ने के किस्से है
एक दूसरे से जुड़े जुड़े से,

बिखरे पन्ने सिमट जाये तो
बन जायेंगे अनुपम संवाद
धूम मचा देंगें दुनिया में
बदल देंगें इतिहास अनेक,

कीर्ति अपकीर्ति का पाठ पढ़ा के
दिखा देंगें वे राह अनेक
योग्य अयोग्य का गुण बता कर
चुन लेंगे वह नायक एक,

एक एक पन्ने के किस्से है
जीवन के पहलू अनेक
बिखरे पन्ने को समेट ले तो
जीवन के राह दिखाये अनेक।
  स्वरचित-आरती-श्रीवास्तव।

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नमन ... भावों के मोती
विषय पन्ने

1
भावों से सजे
जीवन की किताब
नहीं हिसाब
कैसे रंग रंगीले
यह पन्ने सजीले

2
दिन का पन्ना
रचे नवल भोर
पूरब ओर
सूरज की कहानी
रंगोली सी रचानी

3
चँदा रचाये
प्रेम भरी कहानी
हुई रुहानी
तारों भरी चुनरी
नभ गाये ठुमरी

मीनाक्षी भटनागर
स्वरचित

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नमन भावों के मोती
16-4-2019
विषय:- पन्ने
विधा :- पद्य

जीवन   पुस्तक  के  पन्नों  को ,
विरह दीमक ने जीर्ण किया है ।
जब  से  प्रेम  परीक्षा में  बैठी
उसको  नहीं  उतीर्ण  किया  है ।

कोरे  पन्नों  की   किताब  पर ,
अश्रु लिखित था प्रेम कथानक ।
विक्षिप्त  किया  सन्देह  शूल ने ,
रूप  प्रेम   का  हुआ  भयानक ।

भग्न  हृदय  की  टूट  फूट   के ,
चुभ  गए   किरचे सारी देह में ।
अश्रुन मोतियन  की लड़ी टूट के
बिखर  गई    है  सारे   गेह  में  ।

बन   कर   प्रेम   पताका   पन्ने  ,
श्वास  समीर  के  संग  लहराते ।
अश्रु   भीगे   संदेश   पीया  को ,
अब   मुझसे  बाँचे   नहीं  जाते ।

प्रेम   गुदड़ी   बनी   पन्नों   की ,
शर   शैय्या  सी  चुभती  रहती ।
विरह   हंसिनी  बैठी  पन्नों  पर ,
मोती    आँसू  के चुगती  रहती ।

स्वरचित :-
ऊषा सेठी
सिरसा 125055 ( हरियाणा )
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१६/४/१९
भावों के मोती
विषय-पन्ने
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आ बैठती हूँ झील के किनारे
चेहरे पर मुस्कान लेकर
रोज टूटती बिखरती हूँ
बीते लम्हों की याद लेकर
जाने किस स्याही से लिखे हैं
मेरी किस्मत के पन्ने
खुशियां आती हैं लौट जाती हैं
मेरी जीवन की दहलीज से
ग़म नहीं है तू नहीं पास
यह तो किस्मत है मेरी
जब भी कुछ अच्छा लिखती हूँ
जिंदगी के पन्नों पर
किस्मत की स्याही अकसर
पन्नों पर बिखर जाती है
फिर से बेरंग ज़िंदगी लिए
मैं खुद को वही पाती हूँ
खुद के हालात को सोचकर
अब रोती नहीं मुस्कुराती हूँ
कितना भी दौड़ लूँ ज़िंदगी में
लौटकर खुद को वही पाती हूँ
यह खाली पन्ने किस्मत के
कब खुशी के गीत लिखेंगे
कब खुशियों के कमल
मन की झील में खिलेंगे
तेरे वादों को याद लेकर अकसर
आ बैठती हूँ झील के किनारे
इंतज़ार है कि तू आए लौटकर
दिन कट रहे इसी आस के सहारे
***अनुराधा चौहान***© स्वरचित✍

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नमन
भावों के मोती
16/4/2019
विषय-पन्ने

जिंदगी के कोरे पन्नों पर,
वक्त ने लिखीं इबारतें।
दुःख की स्याही,
ने उकेरे चित्र ।
सुख ने लिखीं,
कविताएं।
आनंद ने गाए गीत।
भरने लगे पन्ने...!!
कर्मों का बना बही-खाता,
अच्छे-बुरे का,
होने लगा हिसाब।
अनुभव बना खजाना,
अनुभव की रोकड़.!
जिंदगी के पन्नों पर,
बिखरी बेहिसाब!!
बाजार में भी नहीं
मिलता ये,
मांगें से भी नहीं मिलता,
मिलता है पन्नों में,
उस बही-खाते में,
जिसे जिंदगी की ठोकरें
लिखती हैं अपनी ही तरह।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित, मौलिक

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