Friday, May 17

"झरना"16मई 2019

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                                    ब्लॉग संख्या :-388
सुप्रभात "भावो के मोती"
🙏गुरुजनों को नमन🙏
🌹मित्रों का अभिनंदन🌹
16/05/2019
  "झरना"
क्षणिका
1
सद्ज्ञान का झरना झरता रहे
मन को आलोकित करता रहे,
जड़ता तनिक भी न रहे,
चेतन मन जागृत रहे ।।
2
झर-झर झरकर झरना
गीत गाता प्रेम का,
बाधाओं से टकराकर भी
सतत् आगे बढ़ता
जीवन जीने का पाठ
हमें पढ़ा जाता ।

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल

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नमन मंच भावों के मोती
शीर्षक     झरना
विधा      लघुकविता
16 मई 2019,गुरुवार

गिरि उत्तुंग से गिरता निर्झर
आकर्षित हर जन को करता
सुधामय शीतल निर्मल जल
सदा हृदय खुशियों से भरता

नित प्रकृति सुंदरता देता
रजत कणों सा वह बहता
ज्ञानी ध्यानी संत समुदाय
ईश्वर भक्ति हेतु है बसता

बहता हिय में ज्ञान का झरना
छल कपट मिथ्या हट जाते
राम नाम का प्याला पीकर
परमधाम मुक्ति जग  पाते

आना जाना होता जीवन
मानस में हो भक्ति निर्झर
जीवन तो होता परमानंद
हर्षित हिय रहे जीवन भर।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

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।। कल का जल ।। 

झर-झर झरता झरने का जल
राज रह गया अपना ये कल 
काज करता अपना ये पल
झर-झर झरता झरने का जल। 

मंद-मंद पवन फुरवाइयो से 
लहराता सागर का ये जल
कल-कल करता अपना ये पल 
झर-झर झरता झरने का जल। 

राज का ताज होगा जिसके सर 
सौ साल बाद पियेगा शुद्ध ये जल
कल-कल मरता-मारता अपना ये पल
झर-झर झरता झरने का जल। 

भाविक भावी
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🌹भावों के मोती🌹
16/5/2019
"झरना"
1)
दिल लगा कर वो मौज मनाते रहे
अश्क झरना युही हम बहाते रहे।।

प्रेम झरना दिखाया जो हमने उन्हें
वो हया से गुलाबी से होते रहे।।

दर्द सह कर दवा जो न लेते कभी
गम को झरना समझ कर के पीते रहे।।

तीर शब्दों से घायल हमें कर गए
मीठे झरने का पानी पिलाते रहे।।

सिलसिला इश्क का गुनगुना वो रहे
शीत झरना अदा हम ही करते रहे।।

वीणा शर्मा वशिष्ठ
स्वरचित

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झरना
*****
मन की गति
अविराम बहना
झरे झरना।

मार्ग प्रस्तर
विषम परिस्थिति
हँसे झरना।

गाओ खुल के
प्रकृति से लो मस्ती
कहे झरना।

डॉ राजकुमारी वर्मा

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16मई19
         झरना
       💐💐💐
नमन मंच,
गुरुजनों,मित्रों।
छंदमुक्त कविता
💐💐💐💐💐
बहता है झरना,
धुन में अपना।
सीखाता है,
जीवन में,
बढ़ते रहो।
कभी रुको ना,
कभी झुको ना।
अपनी धुन में,
चलते रहो।
जीवन है नाम,
चलते रहने का।
झरने की तरह,
बहते रहने का।
💐💐💐💐
स्वरचित
वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी
💐💐💐💐💐💐

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नमन भावों के मोती,
आज का विषय, झरना,
दिन, गुरूवार,
दिनांक, 16,5,2019,

कल कल करता बहता जाता,
ऊपर से नीचे यह आता । 
मनमोहक दृश्य बनाता,
अतिशय ही ये मन को भाता ।
चीर पत्थरों को यह आता,
मर्म पत्थरों का समझाता ।
 धरती का सेवक बन ये आता ,
जल का स्त्रोत यहाँ कहलाता ।
ये सेवा को ही धर्म समझता,
कभी नहीं कुछ हमसे चाहता ।
सदा सम भाव से सेवा करता,
हर प्राणी को अपना समझता ।
हमेशा समरसता हो धर्म हमारा,
झरना यही  हमको समझा रहा ।

स्वरचित, मीना शर्मा, मध्यप्रदेश,

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1भा.16/3/2019/गुरूवार
बिषयःःः झरना
विधाःःःकाव्यःःः

प्रभु बहे प्रेम परिपोषित झरना।
  बहे दीन दुखियन पर करूणा।
    लगाऐं प्रीत गंगा में डुबकी हम,
       सरस भाव जन जन में भरना।

मधुरस हर वाणी में घुल जाऐ।
  प्रभु प्रेम भक्ति हमें मिल जाऐ।
     हो निर्मल निर्झर ज्ञान सरोवर,
       ये आत्मशक्ति हमें मिल जाऐ।

हो सुरभित प्रभु जीवन सबका
   हो मंगलमय शुभ दिन सबका।
     झरना झरे प्रसन्नताओं का तो,
       निश्चित पूरा हो हर मन सपना।

स्वरचितःः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
  मगराना गुना 

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 1भा.#झरना#16/5/2019/गुरुवार



नमन मंच
दिनांक .. 16/5/2019
विषय .. झरना
शैली .. लघु कविता 
'',,'',,'',,'',,'',,'',,'',,'',,'',,'',,'',,'',,'',,'',,'',,'',,'',,'',,'',,

धीरे-धीरे खत्म हो रहा, प्यार का मीठा झरना।
उष्ण हो रही मरूभूमि सा, दिल का मेरे कोना।
पत्थर सी आँखे बन बैठी, प्रीत ने खाया धोखा।
याद तो आती है उसकी पर, मीठा नही झँरोखा ।
..
अच्छे दिन पर हाबी हो गये, बुरे दिनो की बाते।
दोनो को जब तौला तो, लिख दी मन की ये बातें।
छोटे से इस जीवन मे, यादों के सहारे जी लेगे।
पर खुद का सम्मान त्याग दे, तो कैसे हम जी लेगे।
...
कविता को मनभाव समझ कर, सब इसमे ही लिख देगे।
शेर हृदय के सुप्त धरातल को, यादों से सीचेंगे।
तेरे यादों को जीवन के , सबरंगो से भर लेगे।
पर खुद का सम्मान त्याग, बोले कैसे जी लेगे।
....

स्वरचित ..शेरसिंह सर्राफ

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नमन भावों के मोती मंच 🙏
दिनांक - 16/05/2019
वार - गुरुवार
विषय - झरना
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸

         झरना

लिए स्वयं संग जीवन राग,
झर-झर झरना बहता है।
चलना ही जीवन है यारों,
हरदम ही वह कहता है।

जो मन में संकल्प करोगे,
पर्वत में भी राह बनाओगे।
हौसलों के पंख लगाकर,
अंबर को भी छू जाओगे।

दुश्वारियों से डर कर तुम,
हिम्मत हार नहीं जाना।
अपने दम पर मार्ग बनाना,
मील  का पत्थर बन जाना।

धूप-छाँव का खेल है जीवन,
हरदम ही बढ़ते रहना है।
जग में संघर्ष है मूल मंत्र,
झरने सा बहते रहना है।

स्व रचित
        - डॉ उषा किरण
      पूर्वी चंपारण बिहार


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नमन मंच 

।। झरना ।।

झरना झर झर बहता है
कुछ ताल में यह कहता है ।।

कुदरत की हर शय का
अन्दाज अलग रहता है ।।

मस्त है अलमस्त है वह
हर हाल में देखो हंसता है ।।

प्यासे की ये प्यास बुझाये 
बेशक ऊपर से ढहता है ।।

वादे इरादे जब हों उच्च
हजार में एक दिखता है ।।

कौन कहता हुनर नही
हर एक में हुनर बसता है ।।

कवि फटेहाल में रहके
भी छंद अनोखे रचता है ।।

सोचें सब उठेंगे जब झरना
गिर कर भलाई करता है ।।

झरने की क्या करें प्रशंसा
सम्मान में रोज छंद बहता है ।।

परमार्थ में पहला नाम 
झरना 'शिवम' लिखता है ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 16/05/2019

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भावों के मोती
16/05/19
विषय झरना-स्रोत- निर्झर 

निर्झर बन निकल पड़ो

क्यों बांध रखा है स्वयं को
बांध के पानी की तरह
तुम उतंग पहाड़ों का सरगम हो
निर्झर बन निकल पड़ो
सुसुप्त स्रोतो से
बह निकलो नदी की
उन्मुक्त धार बनके
सागर सा अंतर मंथन लिये
प्रशांत हो बैठे क्यों हो? 
क्यों बेकल हो लहरों की तरह आजाद किनारों से खेलते नही
अरमानों को सजाओ
अभिशप्त न करो
अभिलाषाओं का दमन न करों
ये पल ये समय बीते हुवे क्षण
कभी भी नही आयेंगे लौट
जो संजोना हो अभी बस अभी
समय की निर्बाध धारा में
निःसहाय से न बहो
तैर कर आंनद उठाओ
टूटे पत्ते नही कि हवा का झोंका              
या जल तंरग बहा ले जाय तुम्हें
हवाओं के रुख पर हर कोई बहता है
विपरीत दिशा में राह बनाओ
कुछ भी करो बस अभिशप्त न रहो।
युग का महा संगीत सुनो
मन का अह्लाद मुखरित करो
सिर्फ जीने के लिये नही जीयो
गरल नही जीवन अमृत पीयो।

स्वरचित 

          कुसुम कोठरी।

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🌹नमन भावों के मोती🌹
16 मई 2019
,~~~~~~~~
दिन ज़िन्दगी  का 
तीसरा आया 
आपा धापी में  
हमने '
क्या  खोंया' क्या  पाया ?

तुम तुम  ना रही'  
मैं ,मैं  ना  रहा 
बच्चों  की ख्वाईशे  
पुरी  करने  में  
तुम  कुछ  धागे  
बुनती रही '
में  फटे  हालात  
ज़िन्दगी सीता  रहा।

इन सब कोशिशो  में 
ज़िन्दगी 
भीतर से  निकल  कर ' 
आहाते   में आ गई 
कुछ सलवटे  चहरे पर '
लकीरें  सी   बना  गई

समय की 
बदनसिबीयों के  
कुछ पल 
अनजान से  निकले 
भले  ही  उन्हें रोलें
या उन्हे  हसलें ।

खीच  के ' तान ती रही  
ज़िन्दगी  हमे '
समझते   समझाते
भीगें  अरमान जो
आंसूओं का दरिया बने
न कभी  सूखें
न कभी सूख पाते|

शामें उम्र  के 
आस पास  थी 
उमंगें छूट्टिया की  
दे गयी " 
दरखास्त सी |

अपने  जो पराये हो  गए।
रिश्ते  मजबूरियों मानो
 निभाए से  हो गए।

बिते  दिनो  को य़ाद  कर
अाज भी  आहें  भरते |
वो भी क्या दिन थे
झरनों की तरह 
एक दुझे  में  झरते |

काश  आ जाएे  वो  
हसीन पल 
तों फिर बाहों में  भरलें '
साँसों  के  समीप बेठ मेरे 
थोड़ा  विश्राम  करले|

पी राय राठी

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🌹भावों के मोती🌹 🌹सादर नमस्का🌹 
    विषय =झरना
    विधा =हाइकु 
=============
(1)शब्दों से भरे
     भाव से स्नेह झरे
      मन को हरे
       🌹🌹🌹🌹
(2)अश्क झरना
      बहा रही है अम्मा 
       कठोर बेटा
       🌹🌹🌹🌹
(3)देश के लिए 
     वीर हुआ शहीद 
      झरते अश्रु
       🌹🌹🌹🌹
(4)झरती देह
      नही हुआ ईलाज
      गरीबी मार
      🌹🌹🌹🌹
(5)झरती काया
     पास नहीं हैं माया
     दुःखों की छाया
      🌹🌹🌹🌹
(6)ज्ञान झरना 
     सत्संग में बहता
     संतों की वाणी 
     🌹🌹🌹🌹
(7)कर संघर्ष 
     झरनों का संगीत 
      मधुर गीत
       🌹🌹🌹🌹
(8)मेघ झरना
     कर रहा है वर्षा 
     शीतल धरा
     🌹🌹🌹🌹
===रचनाकार ===
मुकेश भद्रावले 
हरदा मध्यप्रदेश 
16/05/2019

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नमन       भावों के मोती
विषय      झरना
विधा        कविता
दिनांक     16:5:2019
दिन          गुरुवार

झरना
🎻🎻🎻🎻

कितना साहित्यिक, शब्द झरना
कितना मनमोहक, होता झरना
झरना बोला, रे मानव तू भी 
अपने  प्रेम से ,झर -ना झर -ना झर -ना।

मनुष्य  प्रेम ,यदि बन जाये झरना
तो रुक जाये ,बेमौत का मरना
बंगाल जैसी ,कभी घटना न हो
सँकरे दायरे में, सिमटना न हो।

शबरी प्रेम का झरना बहा,बेर झूठे न  रहे
राधा प्रेम का झरना बहा,कृष्ण रुठे न रहे
गोपी  प्रेम का झरना बहा,ऊधो ज्ञान लटक गया
विदुर पत्नी के केले का छिलका,नटखट मुरारी गटक गया।

किसी भी झरने में ,कर लो स्नान
मिलेगी नई स्फूर्ति, और प्रान
सोने में सुहागा, हो जायेगा
यदि लग जायेगा, प्रभु से ध्यान।

स्व रचित

सुमित्रा नन्दन पन्त
जयपुर

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नमन भावो के मोती मंच
दिनांक:16/05/19
विषय:झरना

झरने जैसी ही तो है ,
जिंदगी मानुष तेरी।
मलय  से उद्द्गमित ,
साफ निर्मल ग्रहिता ,
निर्झर धारा !
यूँ बहे  निश्छल ज्यो
बचपन की धारा !
चला  गिर से तलहट को,
उच्श्रृंखल,ओज से भरा..
यौवन का  मदमस्त प्रपात!
कौन पथ जाए  किसने जाना ?
राह गदली  चुनें या बने 
जीवनदायिनी सरिता !
किसने जाना?
कर्म फल है यह तो ,
प्यास बुझाये धरा की,
या रह जाये खुद प्यासा...
बने गंगा जमुना या 
बन जाए गंदला नाला ..
झरने जैसी ही तो है ,
जिंदगी मानुष तेरी 
चाहे बदले रूप हजारों,
नियति सागर में समाना !
गिन के मिलती है यह सांसे ,
परम सत्ता में समाना...

नीलम तोलानी
स्वरचित

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आज का विषय झरना,
मेरे सेदोका,
भोर किरण,
झरनों से खेलती,
गुजंनहै भौरा का,
फूलों की घाटी,
बहे गीत वासंती,
हँसती हरियाली।।1।।
भू,चाँद ,तारे,
मन नयन सुख,
अनुपम प्रकृति,
जिसने रचा,
सृष्टि का सौन्दर्य भी,
झरनों का संगीत।।2।।
3/प्रणय छंद,
मौसम लिख रहा,
धरा ली अंगड़ाई,
मेघों के छंद,
झरने का संगीत,
तरुवर झूमते।।3।।
सेदोका कार देवेन्द्र नारायण दासबसना छ,ग,

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भावों के मोती
नमन
झरना
💐💐💐💐
झरना किधर से आता है 
कोई समझ न पता है...
बस हमको देता खुशियॉ
झर झर बहता जाता है।
झरने का बहता पानी
हमको समझा जाता है
जीवन यूँ  ही गतिमय है
बस बहता ही जाता है...
कोई पकड़ न पाता है।
झरने के मीठे जल सा
जीवन अपना हम कर ले
औरों से मीठा बोले 
जीवन जल सा शीतल  हो।
💐💐💐💐
स्वरचित

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सादर नमन
16-05-2019
झरना
किस दाघ से बन तरल
बहते जाते है अविरल
झड़-झड़ झड़ते कोरों से
छुआ है अपने पोरों से
है सुसुप्त कोलाहल कहीं
उद्गम है, कलकल नहीं
पर झरने-सा झरता है
ढुलक रूप यह धरता है
गिरकर जल बिखरता है 
फिर कब, कहाँ सँवरता है
यह कौन-सा झरना है ?
आज पता यह करना है
-©नवल किशोर सिंह
     स्वरचित


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विषय=झरना
🌹🌹🌹🌹

वृद्ध चले काया को नहलाने 
जहाँ बहता सत्संग का झरना

बच्चे चले जीवन अपना संवारने
जहाँ बहाती माँ ज्ञान का झरना 

हमें तो पालना है अपना परिवार 
चले वहाँ कर्मों से अर्थ बहाता झरना

साहित्य का चढ़ता है जब हमें  खुमार  
आ जाते यहाँ भावों के मोती का बहता है झरना
🌹🌹🌹🌹

===रचनाकार ===
मुकेश भद्रावले 
हरदा मध्यप्रदेश 
16/05/2018

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नमन मंच 🙏
दिनांक- 16/5/2019
शीर्षक- "झरना"
विधा- कविता
*************
प्रकृति का अद्भुत नजारा, 
झरने से जब पानी बहता, 
अपनी गति का वो पाबंद, 
शीतल उसका जल हरदम |

ऊँचाई से जब जल गिरता, 
दूध जैसा श्वेत वो दिखता, 
मन को करता बहुत प्रसन्न, 
बड़ा मीठा झरने का जल |

स्वरचित *संगीता कुकरेती*

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2भा.16/5/2019/गुरूवार
बिषयःःझरना
विधाःःःकाव्यःःः

प्रकृति प्रदत्त झरना।
अनबूझ सी पहेली
कब किसे मरना।
ये सोच नहीं बदली
घर आंगन वैर भरना।
कहाँ प्रेम झरना।
बिषमताऐं आती जाती
ममताऐं कहीं मर जाती
स्वार्थ निखरता झरता
तभी संवेदनाऐं झर जातीं।
तेरी अपनी मर्जी भाई
झर ना झर यहां
लौकिक सुख के लिए
सब कुछ कर जहां तहां
झंडे गाढ प्रगति के
फिर देख अपने सच्चे
ईमान का झरना।
सच मान यहीं जीना
यहीं सबको मरना।
सुख से झरना या तुझे
शांति से दूर रहना।

स्वरचितःः.
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
जय जय श्री राम
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2भा16/5/2019/गुरुवार
#झरना#काव्य ः
नमन "भावो के मोती"
16/05/2019
   "झरना"(2)
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नफरतों से बनी है चट्टानें जो
ऐ काश!पिघलकर ....
झरनों संग बह जाए।

इर्ष्या, द्वेश का आवरण 
चढ़ा है  मन में जो....
प्रेममय झरनों सा..
प्रेमधारा बन जाए।

मैं-मैं का अहंकार जो भरा है जो
इस मैं में सारा जहां ....
समाहित हो ..संग-संग
वक्त के झरनों में..
बहते जाएँ.।

आँधी संग आई रुसवाई जो
वो रुसवाई....
प्रेम मिलन के झरनों में प्रवाहित
हो जाए....।

पैगाम प्रीत का तू दे दे खुदा
हर दिल प्रीत का ....
झरना बह जाए...।।

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल

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सादर नमन
विधा-हाईकु
विषय- झरना
स्त्रोत मधुर
मनोहर झरना
शीतल धारा
झरना धार
करती  आलिंगन
कटती शिला
झरना नार
मदमाता यौवन
रोके चट्टान
झरना चाँदी
पर्वत का  श्रंगार
बनके हार
****
स्वरचित-रेखा रविदत्त
16/5/19
वीरवार

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नमन मंच भावों के मोती
शीर्षक झरना,,
16/5/2019
मानव जीवन ऐसा हो जैसे कि झरना
स्वच्छ निर्मल और निरंतर 
बहना 
टेढ़े मेढ़े  राहों में भी 
अपना मार्ग बनाना
नैसर्गिक सौंदर्य से 
सबका मन बहलाना 
कभी पर्वत तो कभी 
चट्टानों से टकराना 
फिर भी कभी हार न मानी 
 नीचे धरा के गले लग जाना
कहीं नालों को अपनाना 
कहीं नदियों में मिल जाना
 चलते ही रहना नियति है उसकी
अंत में सागर में है समाना
 स्वरचित,,,,,

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"नमन-भावों के मोती"
"दिनांक-१६/५/२०१९"
"शीर्षक-झरना"
प्रकृति का श्रृंगार है झरना
हम सब का उपहार है झरना
रूके न कभी, थके ना कभी
अबाध गती से बहे निरंतर।

ना कोई संगी, ना कोई साथी
ये पथिक,राह का अकेला
गिरि से गिरे जब यह धरा पर
मुड़ कर न देखे फिर पर्वत को।

न शिकवा न शिकायत किसी से
नियति मान यह चले निरंतर
एक मति ओ एक गति
चले इसका जीवन अबाध।

निरंतर बहे ऊँचे पर्वत से
नही घबराये राह के कटंक से
मिलते ,बिछुड़ते संगी साथी
रूक कर न सोचें एक पल।

गति ही जीवन है
हमें सीखाता झरना
कर्मपथ पर चले निरंतर
झरना गाये पल पल ,हरपल।
    स्वरचित-आरती-श्रीवास्तव।

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नमन मंच
विषय-झरना-"झरना"
विधा-लघु कविता

बदले दिशा ओ द्वेष
हों हृदय प्रेम प्रवेश
न हों जात-पात
धर्म के बदले डाल-पात
बदले माहौल नेता का
मूड शालीन बने जनता का
बहे शीतल हवा चहुँ ओर
न हो कहीं अकारण शोर
सीखो सबसे प्रेम करना
बहे प्रेम रुपी झरना।

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शुभ साँझ 🌇
नमन "भावों के मोती"🙏
16/05/2019
हाइकु (5/7/5)   
विषय:-"झरना" 

(1)
वक़्त झरना 
स्मृतियों के छींटों में 
हृदय भीगा 
(2)
दर्द जो टूटा
आँसुओं का झरना
आँखो से फूटा
(3)
भावों की वर्षा 
दुःख पहाड़ों बीच   
आँसू झरना 
(4)
आशीष बोध 
वात्सल्य का झरना 
ममता गोद 
(5)
पूनम रात 
चाँदनी का झरना 
नहायी धरा 
(6)
अहं गिरना 
हृदय में समाये  
प्रेम झरना 
(7)
भोर से फूटा 
किरणों का झरना 
आलस टूटा 

स्वरचित 
ऋतुराज दवे

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नमन भावों के मोती
दिनांक - 16/5/2019
आज का विषय - झरना/निर्झर
विधा - हाइकु

रख हमेशा
निर्झर का निर्मल
जल सा मन

बाधाएं सहे
अनवरत बहे
निर्झर कहे

निर्झर मीत
गुनगुनाये गीत
तू दिल जीत

जलप्रपात
ऊँचे-ऊँचे पहाड़
मनमोहक

निर्झर नीर
संग सरिता तीर
शीत समीर

स्वरचित
बलबीर सिंह वर्मा
रिसालियाखेड़ा सिरसा (हरियाणा)

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नमन मंच को
दिन :- बृहस्पतिवार
दिनांक :- 16/05/2019
विषय :- झरना

निर्जन में निर्झर बनकर,
सरगम का स्वर बनकर।
झरता पाषाण शिखर से,
जीवन का संगीत सुनाता।
लेकर स्वच्छ जलधार मैं,
राग मल्हार मैं सुनाता।
प्रकृति को करता पावन,
झर-झर के गीत गाता।
पतझड़ में संघर्ष करता,
वर्षा में फिर लहलहाता।
मनभावन वादियों का,
मैं महाराजा कहलाता।

स्वरचित :- मुकेश राठौड़

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शुभ संध्या 
शीर्षक--।। झरना/निर्झर ।।
द्वितीय प्रस्तुति

झरनों का संगीत सुरीला 
हमको क्या बतलाता है ।।

गिरता है टकराता है पर
कितनों की प्यास बुझाता है ।।

पत्थर से टकराकर निकला
भू पर आना न रूलाता है ।।

आयें किसी के काम जरा
एक यही सन्तुष्टि वो पाता है ।।

सुरमय है न कोई खीझ है
आकर्षण स्वतः बन जाता है ।।

निर्झर से सीखो ''शिवम"
परहित ही उद्देश्य बनाता है ।।

लय सादगी क्यों न होगी 
उस अखण्ड स्रोत से नाता है ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 16/05/2019

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नमन मंच 

झरती ओस, 
पुलकित लताएं 
भू मदहोश !!

कोयल गाती,  
बरसता सावन   
झरते मोती !!

मन की आस,   
झरने सी बहती 
भेट की प्यास !!

स्वरचित : डी के निवातिया

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नमन भावों के मोती,
आज का विषय, झरना,
दिन, गुरूवार,
दिनांक, 16,5,2019,

स्नेह झरना
नहाये खानदान
प्रेम मगन  ।

ज्ञान झरना
नहाये अनजान
बढ़े संज्ञान ।

भक्ति संगीत
प्रेम का है झरना 
आस्था हमारी ।

 वात्सल्य रस
ममता का झरना
तृप्ति हमारी।

 कसमें वादे
मनोहारी झरना
गहरा पानी।

युवा आकांक्षा
असंतुष्ट हमेशा
सूखा झरना ।

नारी व्यक्तित
त्याग प्रेम झरना
 राहत क्लेश ।

स्वरचित, मीना शर्मा, मध्यप्रदेश,

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16/5/19
भावों के मोती
विषय-झरना
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मत रोको बहने दो
भावों के सुंदर झरने को
मत रोको बहने दो
सरगम सा यह गीत बने
सजनी की इसमें प्रीत बहे
चमकें सदा भावों के मोती
लेकर सदा ज्ञान की ज्योति
वाणी की मधुरता को
मत रोको बहने दो
भावों के सुंदर झरने को
मत रोको बहने दो
भावनाओं का जन्म न होता
सुंदर सरल गीत नहीं बनता
साहित्य की नदिया न बहती
जीवन में सरगम न रहती
मत रोको बहने दो
भावों के सुंदर झरने को
मत रोको बहने दो
इसके प्रवाह में बहकर ही
भावों के सुंदर हार बने
साहित्य के ऋतुराज की
यह अनुपम बहार है
मत रोको बहने दो
भावों के सुंदर झरने को
मत रोको बहने दो
बसंत-सी बहार लिए
रचनाओं का संसार सजे
तेज चमकता सूरज जैसे
भावों के सब मोती ऐसे
साहित्य की यह शान है
मत रोको बहने दो
भावों के सुंदर झरने को
मत रोको बहने दो
***अनुराधा चौहान***©स्वरचित ✍
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नमनः भावों के मोती
गुरुवार,दि.16/5/19.
     विषयःझरना
*
अविकल झर-झर झरता झरना।
सिखलाता दुख - आतप  हरना।
चिर    'चरैवेति'   का    उद्घोषक,
बतलाता  जन्म   सफल  करना।

जो  सूखे  कंठों   को  लखकर।
हो विचलित-उर करुणा-कातर।
सह  लेते  पर-हित  विपुल कष्ट,
निर्झर  समान  झरते   झर-झर।

वंदित   होते   जगतीतल   में।
यश  अक्षय  उनके करतल में।
मिलती  जगदीश्वर  अनुकम्पा,
वरदान बरसते  पल  -पल में।।
   -स्वरचितःडा.'शितिकंठ'
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3भा.16/5/2019/गुरुवार
बिषयःःः झरना
विधाःःःकाव्यःःः

मत रोको इनको बहने दो।
  ये भावपूर्ण झरना झरने दो।
     निर्मल मन से निर्झर बहता ,
        इसको निश्छल ही रहने दो।

भरे भाव जो हृदय निकालें।
   जो भी मन में उसे उबालें।
      निर्मल सरिता बहें प्रेम की,
         हम गहराई से मोती पालें।

सभी प्रेमाश्रुओं को झरने दो।
  कुछ भी मन में मत रहने दो।
    भरी भडास सब उसे निकालें,
       स्नेह प्रीत का झरना झरने दो।

नहीं रह पाऐं  गांठे अंतस की
  इन्हें निकाल कर बाहर कर दो।
     झरना कहां प्रेमश्रोत हम खोजें,
      बाहर वैरभाव सागर को मथ दो।

अंतरतम निश्छल निर्मल होने दो।
   मन में प्रेमपुष्प अंकुरित होने दो।
     सौहार्दपूर्ण वातावरण हो अपना
       झरना मोती से भावों का झरने दो।

स्वरचितःः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
जय जय श्री राम
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3*भा. #झरना #काव्य ः
16/5/2019/गुरुवार

नमन "भावो के मोती"
16/05/2019
  "झरना"(3)
मुक्तक
1
झरनों सा झर रहे फूल अमलतास के,
अर्पण कर रहा राहों में वीरों के,
झरकर भी अपने भाग्य पर इतरा रहा
जांबाज जो जा रहा सीना तान के।
2
अब एहसासों का वो उच्छास कहाँ,
अब आँसूओं का वो सैलाब कहाँ,
बरसाती झरनों सा बह के सूख गए,
अब वो दिल का चैन भी बेचैन कहाँ।।
3
तेरी यादें अब जो बह रही है,
सुन लेना जो भी कुछ कह रही है,
मेरे जज्बातों के झरनों से,
दर्द गीत बन गुनगुना रही है।।

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल

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नमन मंच
विषय-झरना
विधा-मुक्त
---------------------------

भावो के शिखर से
गीत,नज्म,गजल के
बह रहे झरने हैं

कहीं ठहरते हाइकु में
कहीं पिरामिड चढ़ते हैं
दोहो की सरिता बन
कहीं गहरे गहरे बहते हैं

वीणा की झंकार पर
ऋतुचक्र में चलते हैं
शिव शंभु के नाद में
उषा की बेला में झरते हैं

सीमा रेखा लांघते
उमा से जा मिलते हैं
नीता की नैतिक भावधारा
मुकेश की मुस्कान में
भावों के मोती झरते हैं

राम की महिमा का नाद
अनुराधा मीना में
दिनकर के शब्द 
अठखेलियां करते हैं

भावों के शिखर से.......

     डा.नीलम .अजमेर

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नमन मंच ।विषय:-झरना 
विधा :-कविता 
प्रस्तर शिला के मध्य से
रिस रिस कर झिरता पानी
अजस्त्र स्त्रोत लेकर बहता
झर झर झरना कहलाता है ।
प्रस्तर की पीड़ा को लेकर
वह प्रवहमान होकर बहता  
जग की पीड़ा को हरता है 
अपना शीतल जल देकर.।
स्वरचित :-उषासक्सेना

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नमन मंच
   विधा- हाइकु
     विषय-निर्झर
********************
1.
बहे निर्झर
चीर गिरी श्रंखल
करता शोर।

2.
छटा छहरी
निर्झर गिरे नीर
बहे समीर।

3.
शीतल उत्स
पवित्र परछाई
चली पूर्वाई।
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राकेशकुमार जैनबन्धु
रिसालियाखेड़ा, सिरसा
हरियाणा

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नमन मंच १६/०५/२०१९
विषय--झरना
लघु कविता

झरना कल कल कर बहता है,
झुलफें भी तो लहराती हैं
गोरी की जुलफों को देखो
वह जल प्रपात सी लहराती हैं।
शीतलता  देता है झरना
जुलफें भी देती हैं सुकून।
कोई झरने में हर्षित होता,
कोई जुलफों में खो जाता है।
दोनों भाते हैं नायक को
मन को शीतल कर जाते हैं।
जब पास झरने के जाते हैं
बस उसमे ही खो जाते हैं
ऐसा ही जादू जुलफों मे है,
हम उनमें ही खो जाते हैं।
मेरा कवि मन जब भी देखे
बस बहक बहक ही जाता है।
लेकिन दोनों को देख देख
नई रचना का सृजन भी होता है।
एक नया सृजन भी होता है।
(अशोक राय वत्स) © स्वरचित
जयपुर

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नमन मंच
झरना

16.05.19

निर्झर....
बस बहते ही रहना जीवन भर

पाषाणों के मध्य है उद्भव
कठिनाई में भी जीवन सम्भव
 राह बनाती स्वयं है धारा
स्वप्न धरातल पर है  उतारा
भाव वेग उद्वेलित होकर 
बहता रहता झर झर झर.....

सौंदर्य प्रकृति का है झरना
होकर  प्रसन्न  बहते रहना
संगीत मधुर उर तृप्त करें
जल जीवन का संताप हरे।
कण कण में शांति भर रही है
शीतलता आत्म मुग्ध होकर...

करते अठखेली हंस युगल
जल क्रीडा करते है पल पल
सूखे कंठो को करके संतृप्त
वसुधा के आँचल में प्रदीप्त
अविरल निश्छल  सौहार्द भरा
सुनहरी छवि  किरणें दिनकर.....

निर्झर....
बहते रहना जीवन भर....

स्वरचित
गीता गुप्ता 'मन'

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सादर नमन
     "  झरना"
मधुर स्मृतियों के सहारे,
जीवन सफर पार है करना,
सुख-दुख तो है बहती नदिया,
हँसते-हँसते पार है करना,
           करके सामना विपदाओं का,
            हौंसलों को मजबूत है करना,
             चट्टानों को चीर कर,
             राह बनाता जैसे झरना,
स्वच्छ विचारों का झरना,
कुलाचे भरते हिरनी समान,
 सुनाई पड़ता झरने सा संगीत,
 आता प्रिय जब तेरा ध्यान 
****
स्वरचित-रेखा रविदत्त
16/5/19
वीरवार

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भावों के मोती
झरना
झर-झ़र झरता झरना
जाने क्या कहता है।
फुर्सत अगर हो तुमको,
रुककर इसकी बात सुनो।

पत्थरों से निकल कर भी
प्रेम का पाठ पढाता है।
मीठा मीठा जल देकर,
सबकी प्यास बुझाता है।

कितना निर्मल इसका तन है
कितना शितल इसका जल हे।
हम भी बनें, ऐसे ही निर्मल
गा-गाकर यह संदेश सुनाता है।
स्वरचित
निलम अग्रवाल, खड़कपुर

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गिरी को चीर
झर झरे झरना
निर्मल जल !

संघर्ष पथ
रखो मन सरिता 
निर्मल भाव !!

मन सरिता
बहे निर्मल जल
शुद्ध विचार !!

झरे झरना
जल श्वेत निर्मल 
मन पावन !!

झरे झरना
बहता हुआ पानी
कहे कहानी !!

जल निर्मल
झर झरे झरना
बहे निर्झर !!

संघर्ष पथ
जीवन की सरिता
जल के जैसी !!

झरे झरना
उर मन के पीर
बहे निर्झर

© रामेश्वर बंग

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स्वरचित--दिन--शुक़वार
भावों के मोती : प्रेषित शब्द : झरना 
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जीवन एक झरना 
यादों का भावों का झरना !
नई सुबह जगा जाती है मन में नयी आशा 
शीतल बयार दोहरा जाती है जीवन की परिभाषा
जीवन एक झरना 
आशाओं का उम्मीदों का !
सुंदर सपनों की तस्वीर आँखों में बसी
कहीं ज़िदगी खिलखिलाकर हँसी 
जीवन एक झरना 
सपनों का ,हसरतों का !
कहीं मिलन ,कहीं जुदाई
कहीं,ख़ुशी,कहींआँख भर आई
जीवन एक झरना
मन के एहसासों का !
स्वरचित(c) भार्गवी रविन्द्र

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नमन भावों के मोती 
१६-५-२०१९
विषय:- झरना 
विधा :-कुण्डलिया

झरना कलकल स्वर करे , बहे बीच पाषाण ।
सुनो ध्यान से क्या कहे , कोई लो पहचान ।।
कोई लो पहचान , रहूँ मैं क्रंदन करता ।
सुनता है जो नाद , हृदय पीडा से मरता ।
पिघला है हिम शैल , पड़े बिछुड़न में मरना ।
झकझर बहता नीर , लोग कहते हैं झर ना ।।

स्वरचित 
ऊषा सेठी सिरस

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भावों के मोती दिनांक 16/5/19
झरना

जिंदगी है 
झरने सी
कभी बहती 
कभी रुकी सी 

इन्सान है
कठपुतली
उस मौला की
कभी बोलती
कभी मौन

बहता झरना
है सुखदायी 
इन्सान ने 
प्रदुषित किए
नदी ताल

है कैसी 
विडम्बना 
लाज लज्जा 
सूख गयी
 इन्सान ने 
चूस लिया
 झरने का पानी

बहता झरना 
मन भाए
आँखो में  
ये समाए 
शीतलता और
सुकून बरसाए

बहने दो 
झरनों को
उन्मुक्त
पर्यावरण हो
साफ स्वच्छ 
है यही आज
उपयुक्त 

स्वलिखित 
लेखक संतोष श्रीवास्तव  भोपाल

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"अंतरात्मा"19नवम्बर 2019

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