Monday, May 20

"अजनबी"18 मई 2019

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                                    ब्लॉग संख्या :-390


🌹मित्रों का अभिनंदन,🌹
18/
05/2019
"अजनबी"
मुक्तक
1
इक अनजान शहर में बनके अजनबी आए थे हम,
न जाने कैसे भूल भूलैय्या में खो गए थे हम,
झूठी चाहतों की मरिचिका में जो भटकते रहे,
मुद्दतों के बाद आज फिर अजनबी से हुए हैं हम ।।
2
राहें मेरी इकदिन एक अजनबी शहर ले आई थी जो,
मिले हम ऐसे भावनाओं से नाता बन गया है जो,
लाख कोशिशों के बाद भी क्यूँ पलभर को दूर न जा सके,
हम ,हम न रहे औ मन के आगे क्यूँ आज हारे हुए हैं जो।।

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल



विधा .. लघु कविता 
**************************
अजनबी तू मुझे अपना सा लगे,
क्या कही हम कभी पहले है मिले।
क्यो नजर आके तेरे चेहरे पे रूक जाती है।
सच बता हम कही पहले भी मिले है क्या कही।
....
क्यो मुझे बार-बार अपना सा तू लगता है,
यही एहसास मेरा तुझको देख जगता है।
पर मुझे याद नही आ रहा की कब थे मिले 
तू बता हम कही पहले भी मिले है क्या कही।
....
तेरे आने से महकने लगा है महफिल ये,
मन मे मेरे भी कुछ बेचैनी सी है।
क्यो नजर ढूँढ रही है तेरे नजरो से मिले,
क्यो तेरे आने से चढी मुझको थोडी मस्ती है।
.....
क्या ये एहसास मेरा पिछले जन्म से है जुडा,
ना कभी तू मिला ना हम कभी तुमसे है मिले।
पर विकल शेर का मन बार-बार कहता है,
हम कभी पहले भी मिले है कही ना कही।
....

स्वरचित मौलिक 
शेरसिंह सर्राफ


विधा -- ग़ज़ल

अजनबी से आज वो हमसे मिलते हैं
उनके यह अन्दाज बहुत ही खलते हैं ।।

बर्षों से जिन्हे दिल में बसा रखा है
मुँह फेर के आज वो हमसे चलते हैं ।।

जमाने के दस्तूर समझ कुछ न कहे
अन्दर ही अन्दर हम आँखें मलते हैं ।।

शिकवा शिकायत भला किससे करें 
क्यों यह दिल संगदिलों से लगते हैं ।।

मगरूर हसीना सब कहे अब जाना 
फिर भी दिल में वो सदा विचरते हैं ।।

आज हुआ मिलन कल होगी जुदाई
मिलन के दिन बहुत ही जल्दी ढलते हैं ।।

अजनबी ही इक दिन होना हमें ''शिवम"
क्यों न प्यार मुहब्बत दिल में पलते हैं ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 18/05/2019


विधाःः काव्यः ः

मै कितना अभागा हूँ भगवन,
तुमको भी नहीं पहचान सका।
अनेक बार तुम आऐ प्रभु जी,
फिर भी कैसे मै अनजान रहा।

स्वयं से भी अजनबी अभी तक,
नहीं मेरी मुझसे ही पहचान है।
क्यों मनमंदिर में छाया अंधेरा,
यहां सतज्ञान शून्य सुनसान है।

नहीं चाहूँ अजनबी रहूं यहां मै,
कुछ तो स्वयं को समझ सकूँ।
क्यों आया इस नश्वर जग में,
कुछ तो इसको समझ सकूँ।

क्यों अवचेतन से पडा हुआ हूँ
मुझे खुद की तक परवाह नहीं।
मैं परोपकार पुरूषार्थ न जानूं,
प्रभु ये प्रेमप्रीत समभाव नहीं।

न रहूँ अजनबी तुमसे वर दो।
स्वयं जान सकूँ मै ऐसे वर दो।
नहीं अनजान दिखे कोई चेहरा,
ये सर्वजगत खुशियों का घर हो।

स्वरचितःः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

1*भा#अजनबी#काव्यः ः
18/5/2019/शनिवार

आज का विषय, अजनबी,
दिन, शनिवार,

दिनांक, 1 8,5,2019,

शहर अजनबी है ये दुनियाँ,
अजनबी लगा मन का संसार ।

ये पल पल रंग बदलता जाये,
समझ में न आये इसकी चाह ।

अजनबी बने जग के गुण सारे,
अवगुणों को लिया मित्र बनाय ।

भटक रहा है मन बाट निहारे,
वो मिलन प्रभु से नहीं कर पाय ।

अवगुण सब जब हम रखें किनारे,
फिर तो ये दुनियाँ मंदिर बन जाय ।

हो सद्भाव का सत्संग कीर्तन,
अजनबी अवगुण बन जायें ।

पडे़ हर प्राणी में ईश दिखाई,
अजनबी कहाँ कोई रह जाय ।

स्वरचित, मीना शर्मा, मध्यप्रदेश,


अजनबी से दिल लगाकर,
गैरों को हृदय से लगाकर,

मिली है मोहब्बत की सजा हमें
चला गया वो दिल दुखाकर।
*
दोस्ती का हाथ बढाकर,
हसीं सपने वो दिखाकर,
हो गए अजनबी आज वो,
छोड़ मोहब्बत की दहलीज पर।
*
पल भर का साथ था उस अजनबी का,
बन गया था हिस्सा मेरी खुशियों का,
साथ था कुछ घंटों का ही बस
रास्ता अलग था हमारी मंजिल का ।
**
स्वरचित-रेखा रविदत्त
18/5/19
शनिवार


शिशु अजनबी बन सब
इस धरती पर चरण रखे
सबसे पहले माँ को देखे
परिजन मिल सारे हरखे

अजनबी तो हम सभी हैं
संस्कार ही संस्कारित करते
जीवन जीना खेल नहीं जग
करते जैसा वैसा हम भरते

अजनबी अंजान बनकर
हम जीवन जीना सीखे हैं
कड़ी तपस्या की मानव ने
महाकवि सद्ग्रन्थ लिखे हैं

अजनबी बन हम आये थे
अजनबी बनकर हम जाते
कितने लोग हैं दुनियां में
जो अपनी पहिचान बनाते।।
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

भावों के मोती
विषय-अजनबी

_______________
क्यों अजनबी-सी लगे
हवाएं जो मुझे छूकर चले
बेगाना-सा एहसास लिए
कहीं कोई तारा टूटे

सागर की लहरें भी चुप-सी
किनारों से हैं कुछ रूठी-सी
अपने ही अंदर कुछ बुनता-सा
सागर भी है गुमसुम-सा

घिरा है घटाओं से घनघोर
बादल हैं गुमसुम न करे शोर
अपने अंदर सैलाब को रोके
क्यों खुद को बरसने से रोके

किसी की तड़प है यह
या अजनबी का है इंतजार
क्यों कर रही फिजाएं आज़
अजनबी-सा व्यवहार

कोई आह है टूटे दिल की 
जो बेचैन होती है कुदरत भी
कुमुदिनी भी खिलती नहीं
रात रही है गुजर

बस चाँद ही है पूनम का
किसी बात पर मुस्कुराता हुआ
चाँदनी को भेज ज़मीं पर
सबको जगाता हुआ-सा

शायद उसे मालूम है
इस बेचैनी का हर राज़
इसलिए चांँदनी ले अाई पैगाम
किसी अजनबी के आने का आज
***अनुराधा चौहान***©स्वरचित
"जिस दिशा में नफरत थी"

प्यार के गांव में

अपनों ने मुझे रोक लिया,
जिस दिशा में नफरत थी
मैं उधर गया ही नहीं l

आशाएं बांटता रहा
दोस्तों के बीच
जीवन यादों से भर गया,
निराशा के अँधेरों में
मैने सफर किया ही नहीं l

राहों में अजनबी मिले
अपनें बनते चले गये
हाथ बंन्धन से भर गया,
जीवन कहता और चल
दिल अभी भरा ही नहीं l

मै प्यार हूँ हर प्रीत का
संस्कार हूँ हर रीत का
मेरी डोर सबसे बंधी रहे,
जिस गीत में मधुर प्रीत न हो
वो गीत मैंने लिखा ही नहीं l

ये वादियां ये चाँद-तारे
ये मौसमों का आना-जाना
मेरी फितरतों की मिसाल है,
जो नफरतों में जीता है
वो किरदार मैनें जीया ही नहीं l

प्यार के गांव में 
अपनों नें मुझे रोक लिया,
जिस दिशा में नफरत थी
मैं उधर गया ही नहीं l

श्री लाल जोशी "श्री"
(तेजरासर) मैसूरू
९४८२८८८२१५

विषय - अजनबी

अजनबी हो तुम मगर 
पहचाने से लगते हो
दो चार मुलाकातों में
क्यों अपने से लगते हो
तेरा साथ पा कर 
मैं खिल सी जाती हूँ
कुदरत के करिश्में पर
हैरां हो जाती हूँ
कहां से ढूंढा तुम्हें
मुझसे मिलाया है
प्रभु का तोहफा ये
मेरे मन भाया है
कैसे जान जाते हो
दिल की हर बात को
पल भर में पूरी करते 
मेरी हर बात को
कैसे कहूँ अजनबी
मेरे दिलदार हो
जिंदगी का मेरी तुम
मीठा सा अहसास हो

सरिता गर्ग
स्व रचित

अजनबी
💐💐💐
नमन मंच।
नमस्कार गुरुजनों,मित्रों।

पहले जो अपने लगते थे,
वो अब अजनबी से लगते हैं,
पता नहीं लोगों को क्या हुआ है,
उखड़े,उखड़े से रहते हैं।

मेरा सुख दुःख उनका लगता था,
उनका सुख दुःख मेरा।

उनके हँसने से शाम होती थी,
उनके साथ होता था सवेरा।

जाने क्या बात हो गई,
वो रूठे से लगते हैं।
पहले जो............

मैंने तो कोई खता नहीं की,
पर वो अनजान बने बैठे हैं।

कब दिल दुखाया उनका मैंने,
याद नहीं आता है।

गलती को मेरी
याद करा दें,
क्यों बिगड़े बैठे हैं।
पहले जो........
💐💐💐💐💐💐💐
स्वरचित
वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी
अजनबी से मुहब्बत हुई। 
भूले खुद को है, मुद्दत हुई। 


दांव हमने लगाया मगर। 
न, मेहरबान किस्मत हुई। 

मुझसे झुकना नहीं आया। 
यू, बेड़ियाँ मेरी गैरत हुई। 

न वो कुछ मेहरबां हुए। 
न कुछ हमसे खिदमत हुई। 

वो मसरूफ है अपने घर।
न हमें उनकी आदत हुई। 

देख लेता है बंद आंखों में। 
दिल को जब भी जरुरत हुई। 

हम जां - बे - हक हो जाएंगे। 
हाय यह कैसी शरारत हुई। 

अब तो ईमान डरने लगा। 
है ऐसे रुसवा शराफत हुई। 

चार बूंदों से बुझती है क्या। 
खैर मौसम को राहत हुई। 

जब से गिरने लगा मयार है। 
नाकाम हर हिफाज़त हुई। 

हवस ने किया दिल में घर। 
बस खतरे में अमानत हुई। 

'सोहल 'बात दिल की कही। 
ऐसी भी क्या हिमाकत हुई। 

विपिन सोहल
अजनबी क्यों
आ जाते हो तुम ?
ख्वाब_बनकर 
मेरी नींदों के सिरहाने ।
पाओगे नहीं मुझको 
पते पर नहीं 
मेरे खुदके ठौर ठीकाने ।

आकर याद मेरी 
तुम्हे ,
तकलीफ हुई होगी ।
खयालात पुछते मुझसे
याद तेरी 
कहाँ रही होगी ।
कुछ ख्वाबो ने क्यूँ
जोड़ लिये
मिलने के बहाने ।

आजनबी क्यूँ
आ जाते हो ?
रोज ख्वाब बनकर,
मेरी नींदो के सिरहाने ।
पाओगे नहीं मुझको 
पते पर नहीं ,
मेरे खुद के ठौर ठीकाने ।

सिलसिलो ने कुछ पते 
जुस्तजू के बताए क्या ?
गेैर को अपना बनाने में
खुद को ,खो आए क्या ?
भवॅर के बीच 
किश्तियों को 
क्यों लेकर आए हो ड़ूबाने ?

अजनबी क्यूँ
आजाते हो तुम,
ख्वाब बन कर 
मेरी नींद के सिरहाने ?
पाओंगे नहीं मुझको 
पते पर नहीं मेरे 
ठौर ठीकाने ।

लोट जाओं सुने हाल 
मन की ,
दरवाजे खिड़किया
सब बन्द हैं
सूखे हुए फ़ूलो में 
अब कहाँ
महकती वो सुगंध हैं।
हाल क्या जानोगे
पूछ कर मेरा
मुस्काने मेरी,
खुद की ही, 
खिलाफत से 
रजा मन्द हैं।

रोज क्यूँ पूछते हो 
अंधेरो से मेरे,
पते ठीकाने।
अजनबी क्योंआजाते हो
ख्वाब बन कर
मेरी नींदों के सिरहाने

पाओगे नहीं मुझको
पते पर नहीं
मेरे ठौर ठीकाने।

पी राय
राजस्थान
अजनबी शीर्षक केंद्रित सृजन

दूर करें अभी अपरिचय का,

काला-नीला कृष्ण दुशाला।
पूर चलें भी अब परिचय का,
तेरा - मेरा प्यार का प्याला।।

अपरिचय यही
हृदय - क्षेत्र ले,
सघन दुखों की
फसलें बोता।

इक क्षण में ही
हृदय जोतकर,
तत्क्षण ही यह
फल को ढोता।

माहुर सा है अपरिचय यह,
यह जीवन पर भारी ताला।
पूर चलें भी अब परिचय का,
तेरा - मेरा प्यार का प्याला।।

है परिचय यह
चेटक की चंटी,
क्षण-क्षण में यह
सुख ले आती।

दुःख की फसलें
स्वतः शुष्क हो,
सुख की फसलें
उग - उग आती।

घातक सा है अपरिचय यह,
सुख की फसलों पर है पाला।
पूर चलें भी अब परिचय का,
तेरा - मेरा प्यार का प्याला।।

तजना भी अब
ग्रंथन कर से,
मुक्त हुए तुम 
मिलना हर से।

परिचय ही तो
ध्यान धारणा,
निराकार की
पूर्ण पारणा।

विचलन सा है अपरिचय यह,
साधक माने शापित छाला।
पूर चलें भी अब परिचय का,
तेरा - मेरा प्यार का प्याला।।

सरिता बहती
तोड़ बंध को
भू परिचय को
सन्मुख होती।

उदधि उर्मियाँ
ऊभ - चूभ हो
तट परिचय को
उन्मुख होती।

सन्मुख - उन्मुख की वृत्ति ही,
जीवन - मंगल की शुभ शाला।
पूर चलें भी अब परिचय का,
तेरा - मेरा प्यार का प्याला।।

हस्त बढ़ाकर
पहल कीजिए,
तोड़ अहं के
अंध बंध को।

तभी प्रेयसी 
जीवन - मंगल
खोल देता है
नंद - रंध्र को।

जीवन - वृत्ति नंदन - वन सी,
वही पहनती सुख की माला।
पूर चलें भी अब परिचय का,
तेरा - मेरा प्यार का प्याला।।

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, मल्लिकार्जुन।। महाराष्ट्र।।

 नमनः'भावों के मोती'
शनि.,दि.18/5/19.
विषयःअजनबी

*
वह कौन अजनबी जल,भू,नभ,अनिल,अनल में।
छिप - छिप के मुस्कराता,सारे सचल अचल में।
यह विश्व-काव्य अनुपम,जिसका स्वरूप रसमय,
अनगिन स्वरों में गुंजित,आकाश,तल-अतल में।।

कूटस्थ मौन द्रष्टा , सबमें बसा हुआ जो।
सुस्थिर सुचित्त ही के ,वश में सदा हुआ जो।
जब आँख चेतना की,खुलती तभी दिखाता,
भीतर निहार पाते ,अपने , मिले दुआ जो।।

-स्वरचितःडा.'शितिकंठ'

शैली .. लघु कविता
*****************
बोल अजनबी क्यो तूने, दिल का दरवाजा खोला है।
बिना इजाजत क्यो मेरे, मन को तूने झिझोरा है।
...
बोल बता क्या तुझको कोई, दुश्मन देश ने भेजा है।
या तुझमे ही पाप है कोई जो तुने दिल खोला है।
...
शेर हृदय पे ताला था तो कैसे इसको खोल दिया।
क्या कोई पत्थर है मारा, जिससे ताला तोड दिया।
....
बोल नही तो मै तुमको, दिल मे ही अपने रख लूँगा।
बाहर से ताला जड कर मै, चाभी तोड कर रख दूँगा।
...
बोल अजनबी क्यो तू आखिर, दूजे दिल मे आया है।
या कि तुझको शेर हृदय ने, अपने पास बुलाया है।
....
सच बोलेगा जो तू तो, सम्राज्य हृदय का दे दूँगा।
झूठ कहाँ तो शेर के मन से, दण्ड तुझे मै दे दूँगा।
....
मत घबरा तू बोल अजनबी, क्या मन मे कुछ शंका है।
या तू खुद से भटक गया और शेर के दिल मे पहुच है।
....
सोच समझ कर बोल मुझे तू, दिल को लगता प्यारा है।
शेर के मन को बाँध दिया, दिल लगता मैने हारा है।

स्वरचित एवं मौलिक
शेरसिंह सर्राफ


लो बजी शहनाई

दूर कहीं शहनाई बजी
आहा! आज फिर किसी के
सपने रंग भरने लगे
आज फिर एक नवेली
नया संसार बसाने चली
मां ने वर्ण माला सिखाई
तब सोचा भी न होगा
चली जायेगी
जीवन के नये अर्थ सीखने
यूं अकेली
किसी "अजनबी" के साथ
जो हाथ न छोडती थी कभी
गिरने के डर से
वही हाथ छोड किसी
और का हाथ थाम चल पड़ी
जिसका पूरा आसमान
मां का आंचल था
वो निकल पड़ी
विशाल आसमान में
उडने, अपने पंख फैला
जिसकी दुनिया थी
बस मां के आस पास
वो चली आज एक
नई दुनिया बसाने
लो शहनाई बजी फिर
लो एक डोली उठी फिर।

स्वरचित

कुसुम कोठारी।


भावों के मोती
शीर्षक- अजनबी
१८/५/२०१९
अजनबी होकर भी तुम
कितने अपने से लगते हो।
जागी रातों में देखे हुए
खुशनुमा सपने से लगते हो।।

चाहता है ये दिल मेरा
करने को हजार बातें तुमसे
चलती रहे जो तमाम उम्र
करनी है ऐसी मुलाकातें तुमसे।
दर्दे-दिल की दवा से लगते हो।

चांद सा रोशन ये चेहरा
कर दिया दूर दिल का अंधेरा।
खाली दिल के पन्नों पर
लिख लिया मैंने नाम तेरा।
रब से कभी जो मांगो थी
उस भूली दुआ से लगते हो।
अजनबी होकर भी तुम 
कितने अपने से लगते हो।।
स्वरचित कविता
निलम अग्रवाल, खड़कपुर


II अजनबी II नमन भावों के मोती....

मैं खुद से अजनबी हो गया हूँ....
आजकल...
लिख नहीं पाता हूँ....
शब्द मुझसे कतराते हैं....
कलम मेरी....
कभी दाएं...कभी बाएं...
फिसलती है....
कभी पैर उठा कर टक टक करती...
मुझे घूरती है...
जैसे मेरे हाथों में कांटे लगे हों....
कागज़ मुझे अंजान से पथ की तरह लगता है...
जिस पर शायद मेरे भाव कभी न चल पाएं....

जब से तुम गयी हो...
मैं खुद को ढूंढ रहा हूँ...
तुम थी तो भी मैं...
मैं नहीं था...
अजनबी था अपने से...
पर तुम में था...
और आज न तुम में हूँ...
न खुद में हूँ....
ढूंढ रहा हूँ खुद को..

शब्द कभी ऐसे घुमड़ कर आते हैं जैसे...
अंजान से पथ पर कई कारवां एक साथ...
निकल आये हों...
और उनमें कहीं एक राही...
अपनों से बिछड़ा...
हर जाते कारवां में हर किसी को....
नज़रों से आर पार तलाशता है...
और फिर अवाक सा...
जाते देखता रहता है....
कभी उँगलियों को चबाता है...
तो कभी...
पैरों के नाखून से...
ज़मीन खोदता है....
शायद अपने को टटोलता है....
कहीं कुछ तो मिले...
और कभी कभी...
जब ऊषणता बढ़ती है...
ऊपर उठती है...
निकलने को... तभी...
अंजान से पथ पर...
चमक दिखती है...
पल भर को..अहसास देती है...
अपने होने का...
पर मृगतृष्णा...
कहाँ अपनी है...
कागज़ के अंजान से पथ पर...
थकी हारी दो बूँदें....
पल भर को चमकती हैं...
फिर खो जाती हैं...
जुदा हो जाती हैं...
अजनबी से... 
अजनबी की तरह...

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II 
१८.०५.२०१९


अजनबी
**
आप क्यों अजनबी बन के मिले
घाव अपनों की बेरुखी से मिले ।

आप से मिल के ऐसा लगा
मुद्दतों बाद जिंदगी से मिले ।

ख़्वाब आँखो में पलते रह गये 
जिंदगी मे हम मुफलिसी से मिले ।

फूल सूखे हुये किताबों में मिले 
मुद्दतों बाद आशिकी से मिले ।

कोई बर्बाद क्यों करे ऐसे 
उन निगाहों की दुश्मनी से मिले ।

स्वरचित
अनिता सुधीर


मुद्दतसे जिस लिए बे करार हूं मैं
सच मानिए उल्फत का बिमार हूं मैं।

कोई तो मुझपे घड़ी भर एतबार किजिए
प्यार दिजिए रे मुझे प्यार दिजिए।
बचपन गुजरा कब आई जवानी पता नहीं
मेरे लिए किसी के दिल में जगह नहीं।
कोई चाहे मुझे प्यार से दुत्कार दिजिए।
प्यार दिजिए रे
कौन मेरा गांव कौन है मेरा शहर
अजनबी सा भटक रहा हूं कब से इधर उधर।
कोई तो मुझे प्यार से पुकार लिजिए
प्यार दिजिए रे
मिलकर यारा तुझसे सुकू मिला है दिल को
तुम दूर भी जाकर भुलोगी नहीं हमको
ऐसा ही तो तुम जरा इकरार किजिए।
प्यार दिजिए रे मुझे प्यार दिजिए।
हामिद सन्दलपुरी


वंदन भावों के मोती
18/5/2019/
बिषय,, अजनबी 
जमाने का दस्तूर है पुराना 
जब काम निकल जाए तो 
अपना भी अजनबी सा बेगाना 
दौलत बालों से कितने रिश्ते पालते हैं 
गरीब को चौखट से ही 
टालते हैं
माता पिता के लिए
घर में जगह नहीं 
दौलत मंदों के लिए
पलक पांवडे बिछाए जाते है,
चाहे वह कितने भी
अजनबी क्यों हो
चाटुकारता से गले से 
लगाए जाते हैं
स्वरचित,,


अजनबी 
अंजान शख्स भी जान से प्यारा लगने लगता है, बिना नाम का 
गहरा रिश्ता जुड़ने लगता है 
अजनबी कब अपना हो जाये 
पता कहाँ चलता है 
ये पल खुशनुमा लगता है 
किन्तु जब पलट जाये ये आलम 
अपने बन जाये अजनबी 
स्वार्थपूर्ति के बाद 
तब दिल को बहुत खलता है 
अजनबी अपने बने 
पर अपने न बने कभी अजनबी. स्वरचित 
शिल्पी पचौरी

###
बातों में तेरी है जादू भरा..
आँखों में छुपा है राज गहरा
इस शहर में क्या काम है तेरा
ऐ अजनबी!क्या नाम है तेरा।

शरारतें भी तेरी दिल को लुभाए
चैन तुझपे लुटा दिया है मैंने
हुनर ये कहाँ से सीखा तुमने
ऐ अजनबी!आए कहाँ से तुम

मेरी गलियों से अब न गुजरना
दिल मेरा लुट लिया है तुमने
करार और न खोना है मुझे
ऐ अजनबी!कह दो कि कौन हो तुम।।

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल


लघु कविता

"दिल की रानी रहे"
ए अजनबी से मेरी मुलाकात थी,
वह शर्माई थी मैं भी अनजान था।

एक नजर उसने देखा पलकें उठा के,
घायल हुआ दिल नजरें झुका के।

पूछा जो हमने बारे में उसके,
मुस्कुराहट में हमको उलझाया उसने।

न जाने वो कैसे करीब आई इतनी,
बन गई हमसफर आज जीवन की मेरी।

कैसे बताऊं दिया क्या है उसनें,
खुशियाँ संजोई हैं दामन में जिसने।

जो कभी अजनबी थी हमारे लिए,
आज हमारी आंखों की रोशनी बन गई है।

वह 'किरण' बन के आई है जीवन में ऐसे,
कि दिल के हमारे अजीज बन गई है।

वह सलामत रहे मुस्कुराती रहे
बस दुआ है यही आज उसके लिए।

खुशियाँ देती रहे गम हटाती रहे,
दिल की मेरे हमेशा वह रानी रहे।

आरजू है यही वह सलामत रहे,
दिल की मेरे हमेशा वह रानी रहे।
(अशोक राय वत्स) © स्वरचित
जयपुर


अजनबी
फ़सल-ए-नफरत का कुनबी है
हमने देखा वो बड़े करतबी है
कुछ लोग वहाँ खड़े चौराहे पर
उनके हाथों में कोई तसबी है
हर रोज है बद-एलानी करते 
कहते वो जहां में कोई नबी है
ठगते है चैन आम रैयतों का
परवरदिगार का कह करीबी है
खुदा तू उनको मुआफ़ कर दे
नादां वो खुद से ही अजनबी है 
-©नवल किशोर सिंह
स्वरचित


 नमन मंच 
18 5 /2019

अजनबी

अजनबी क्यों कर तुम बसंत बहार हुए 
मिले , क्यों कर जीवन का आधार हुए 

अनजाने से आए, जब जाना ही था तुमने 
क्यों कर तुम स्वप्न मेरा साकार हुए 

रस विहीन राहें थी, आस जगाने क्यूँ आए
क्यों कर तुम शीतल जलधार हुए 

ऊष्ण , तीक्ष्ण इस जलते से मौसम में 
क्यों कर तुम वो मधुर बयार हुए 

अभिशप्त नदी के विकल द्वीप सा था जीवन
क्यों कर इस जीवन का नेह प्यार हुए

विलग हुए ,यूँ छोड़ चले वनवासी मन को 
क्यों कर तुम क्रूर काल की मार हुए 

अजनबी अनजाने थे , अनजाने ही रह जाते
क्यों कर मेरे प्रवासी मन की हार हुए

मीनाक्षी भटनागर
स्वरचित


विधा: ग़ज़ल - ठौर पक्का न ये ठिकाना है... 

तुमसे मिल कर के आज जाना है... 
अजनबी दिल का क्या ठिकाना है... 

चाँद तारों का मुस्कुराना है...
इश्क़ में हर समां सुहाना है...

मिल न पायो अगर कभी खुद से....
अजनबी दिल हुआ बेगाना है... 

लोग मिलते नहीं करीबी से....
क्या समझ आये खो के पाना है...

अजनबी शहर अजनबी ही रहा...
हर तरफ देखना दिखाना है... 

तुम कदम चार हट के मिलना यहां...
रौशनी है तो ये ज़माना है....

ये भी ससुराल सा जहां 'चन्दर'...
ठौर पक्का न ये ठिकाना है... 

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II 
१८.०५.२०१९


भावों के मोती 
विषय अजनबी 
तिथि 18/5/19
वार शनिवार 
वो अजनबी अनजाना सा सफर 
अनजान सी राहों का 
अनजाना सा मुसाफिर 
मिला था वो परदेसी कभी 
प्रेम का धागा कच्चा सा 
अहसासो की माला मे गूँधा 
सच्चा मासूम सा रिश्ता 
मासूम सी यादें 
मन के अंतर्मन पर 
चलचित्र की भांति 
मन के पटल पर वो यादें 
सब भर दी है इस बैग मे 
देना चाहती हूँ तुम्हारी यादें 
बांधा था स्नेह की डोर से कभी वापस आने का वादा कर गया था 
हर रोज आती हूँ 
उसके इंतजार मे सूनी पटरी 
सूनी राहों को देखती हूँ 
सूनी आँखो मे है एक आस 
तुम्हारे आने की
कानो मे हर पल है गूँजती 
गाड़ी की सीटी की आवाज 
काले काले मेघ कुछ बरसते है कुछ
मेरे मन के अँधेरे को 
और बढ़ा देते है कर रही हूँ 
इंतजार बस इंतजार 
तुम्हारी यादोँ का कुछ सामान 
है...... मेरे पास 

स्वरचित मौलिक 
#पूनम सेठी 
#बरेली उत्तर प्रदेश


सादर मंच को समर्पित -

🌹🍀 मुक्तक 🍀🌹
***************************
 अजनवी 
🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻

अजनबी वे नहीं हैं जो , 
न परचित पर दिलवाले हैं ।

यकायक मिल भी जायें तो , 
सहृदयता को पाले हैं ।

जो परचित खास होकर भी ,
दुखायें दिल मुखौटे रख--

वही हैं अजनबी पक्के ,
जो दिल से पूर्ण काले हैं ।।

🌺🌴🍏🍊🌷

🍎🌾*** ...रवीन्द्र वर्मा आगरा 
दिंनाक-१८/५/२०१९"
"शीर्षक-अजनबी"
जो शहर था पहले अजनबी
आज लगे अपना अपना सा
जो थे पहले अजनबी 
आज हो गये सगा सगा सा।

जब हासिल करना हो ऊँचा लक्ष्य
"अजनबी"शब्द हमें नही घबराते,
किनारे तक पहुँचने के लिए
अजनबी रास्ते भी हम अपनाते।

पूरा आर्यावर्त हमारा
अपनी धरती, अपना आसमां
अजनबी नही,हम अपनी धरा पर
भला हम ये क्यों भूल जाते?

अजनबी जब मित्र बन जाये
आधी सफलता स्वयं मिल जाते
अजनबी को जब हम अपनाते
मित्रता की सुगंध स्वयं फैल जाते।
स्वरचित-आरती-श्रीवास्तव।


विधाःः काव्यःः#गजल#,एक प्रयास मात्र

क्यों रहें अनमने सभी आजकल,
आओ मिलें नहीं हम अजनबी बनें।

क्या कुछ बचा इस जिंदगी में यहां,
बांट लें प्यार नहीं हम गजनवी बनें।

शिकवा शिकायतें बहुत हो चुकीं
, माफ कर क्यों नहीं हम नवी बने।

अभी तक तो फांके कर लिए बहुत,
शेष चार दिन सच हम लखनवी बनें।

मंजिल हमारी जब उसने बनाई,
क्यों फसाद कर हम मजहबी बनें।

इंसानियत मजहब है अपना सही,
अजनबी नहीं अब हम रहनवी बनें।

स्वरचितःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

#अजनबी#गजलः

2भा.18/5/2019/शनिवार

नमन मंच को
दिन :- शनिवार
दिनांक :- 18/05/2019
विषय :- अजनबी

अब तक न जान पाया उसे..
पल-पल उसका यूँ फिक्र करना..
पल-पल यादों में उसकी आहें भरना..
जिंदगी के इस सफर में..
कुछ तकरार तो कुछ इकरार..
वो पल-पल टोकती मुझे..
हल गलत फैसले से रोकती मुझे..
वो पराये कुल से आई..
पर हर रस्म मेरे कुल की निभाई..
हर आदत से उसकी...
हर आदत से मेरी..
अनजान वो अनजान मैं..
फिर भी न जाने क्यूँ..
प्रीत अजीब सी बंध गई..
जिंदगी की हर सांस सी बन गई..
रिश्तों के इस भंवर में..
सँग चल रही पतवार बनकर..
पार कर हर दरिया गमों का..
चल रही सँग हमराह बनकर..
अब न अजनबी वो..
अब न अनजान मैं...
है मेरी अब जिंदगी वो..
था अब तक नादान मैं...

स्वरचित :- मुकेश राठौड़


विधा -- ग़ज़ल
द्वितीय प्रस्तुति

अजनबी से दिल लगा कर रोये थे
ख्वाबों ख्यालों में कभी हम खोये थे ।।

हकीकत की दुनिया को अब जाना 
फिजूल ही अपनी आँख भिंगोये थे ।।

वो बचपन की मासूमियत क्या थी
रातों रातों भी न कभी हम सोये थे ।।

अब तो दिल पर पत्थर रख चलता हूँ
बेफिजूल ही कितने ख्वाब ढोये थे ।।

दीवानगी ये दिल की कम कर दी है
जब से अजनबी वो हमसे होए थे ।।

सीखें मिलीं जमाने भर कीं हमें 'शिवम'
उन्हीं सीख से हम ये ग़ज़ल पिरोये थे ।।

रीता रीता आज यह दिल रहता है
सोचता है क्यों वो ख्वाब सँजोये थे ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"

स्वरचित 18/05/2019

विषय:-अजनबी 
विधा :-ताटंक छंद 

हुआ मन अजनबी है जब से ,
साथ तभी से ये आँसू ।
टूटी तस्वीर मुहब्बत की ,
पुन: बनाते ये आँसू ।। 

उदासी है अजनबी लगती , 
नहीं अजनबी ये आँसू ।
मन गगन से चाँद जो छिपता ,
देखते अब उसे आँसू ।।

पिया ज़िक्र से बीती उमरिया ,
करें ज़िक्र हैं ये आँसू ।
हुआ बदनाम दिल ये मेरा , 
नहीं बदनाम ये आँसू ।।

जब से जाना तेरा ये सच , 
नहीं मानते ये आँसू ।
पीडा मेरी हार गई है , 
कहाँ हारते ये आँसू ।।

शून्य पड़े मग प्रेम कुंज के , 
पथ निहारते ये आँसू ।
पूछ रहे हूँ कौन अजनबी ,
तुम होते या ये आँसू ।।

बिखरे हैं अवशेष हृदय के , 
भग्न नहीं होते आँसू ।।
भाव हृदय के शून्य हो गए , 
शून्य नहीं होते आँसू ।।

स्वरचित:-
ऊषा सेठी 
सिरसा 125055 ( हरियाणा )


विधा- मुक्तक आधारित नज्म
🍂🍀🍂🍀🍂🍀🍂🍀🍂🍀🍂

अजनबी इस शहर में कितने पडाव मिले
कभी खुशियों के कभी दुख के पहाड़ मिले
जो कहते थे निभायेगे वफा मरते दम तक
वक्त पडा तो वो वफा-ए गली से लापता मिले

वेनकाब करते है रिश्तों को जब तोहमत मिलें
खुद गिरेबान में झांकते हम कितनी वार मिले
लाख इमारतें बनालो रिश्तों की अजनबी तुम
बात जब है चाहतों के बाजार में दरार न मिले

पता होता अजनबी शहर में थे लूटने को मिले
ढूंढते किसे अगर खुद तलबगार ही न मिले
वक्त वक्त पर याद आते हैं भरे जख्म भी
वाद भरने के उस पर मरहम लगाते लोग मिले
स्वरचित


भावों के मोती दिनांक 18/5/19
अजनबी

रिश्ते निभाना 
आसान नहीं 
यहाँ हर कोई
अजनबी नजर
आता है

है रिश्ते 
मतलब के
वक्त जरूरत 
अजनबी भी
रिश्ते बताता है

जब तलक 
रहता वास्ता
माँ बाप से
झूठा प्यार 
दिखाता है
छोड़ देता है 
बेटा ही उन्हें 
अजनबी बन
दोराहे पर 

कितना दर्द 
होता है 
मेरे दोस्त 
जब अपना
अजनबी 
बन जाता है

स्वलिखित
लेखक संतोष श्रीवास्तव भोपाल


******अजनबी********

कुछ वर्षों पहले एक अजनबी से हुई मुलाकात,
दिल मिले और आँखो हुई उनसे चार, 
फिर न हुआ हमसे ज्यादा इंतजार,
बस सजा दिया उनका घर संसार |

ये क्या था समझ न सके हम तो यार, 
अजनबी के दिल से जुड़े हमारे तार, 
आज उनसे ज्यादा नहीं कहीं विश्वास, 
हाँ वो मेरे सजन है वे ही हैं मेरा प्यार|

स्वरचित *संगीता कुकरेती*

विषय -अजनबी
विधा- मुक्त
दिनांक - १८ / ०५ १९
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जब भी मन उदास हुआ
इक कांधा सर के पास हुआ
बिखरा कर जुल्फें कांधे पर
बेकरार दिल को करार हुआ

वो अजनबी मेरे दिल के बहुत करीब रहा
नजरों से दूर मगर निगाहों में रहा

आँख मेरी जब भी भर आई
अंगुलियां तेरी दामन बन गई
ख्वाब में मेरे आकर तूने मेरी
सारी प्यास बुझाई

माना के तू अजनबी रहा
उम्र भर 
पर मेरे ही भीतर मेरा वजूद
रहा उम्र भर

कही-अनकही सारे दर्दोअलम
बांट लेती हूँ तुझसे
तन्हाई में भी कभी तन्हा नहीं रहती हूँ मैं

चाह नहीं पूछुं तुझसे तेरा वजूद क्या
तू है मेरे ईर्द -गिर्द बस यही मेरा यकीन है

तू अजनबी ही सही मेरे साथ है तू।

डा. नीलम. अजमेर


भावों के मोती
18/05/19
विषय - अजनबी 
द्वितीय प्रस्तुति

पहली परिचित मां

जब आंख खोली सब अजनबी थे
न था कोई परिचित ,सभी तो अजनबी थे
पहले पहल एक अद्भुत 
हल्की महक लगी परिचित
मां की महक
अंजान हाथ जब छूते 
तन को लिये स्नेह अपार
एक डर एक सिहरन
और गले से निकलती
छोटी छोटी सिसकियां
ढूंढती फिर परिचित हाथ
और ज्यों ही जननी के
हाथ उठा लेते कम्पित
अशक्त नाजुक देह
फिर एक आंतरिक सुरक्षा के भाव
और निरबोध वो काया 
फिर हुलसत जाती
लिये अधरों पे एक स्मित रेख।

स्वरचित 

कुसुम कोठारी




अजनबी 

जिंदगी ही बह गयी, तेरे इश्क़ की लहर में 
अजनबी से हो गए हैं हम तो तेरे शहर में ।
वो आते हैं हाथ जोड़ने पाँच साल में एक बार, 
फिर मचाते हैं वो लूट, दोस्तो हर पहर में, 
नफरतों के पेड़ लगाते, धर्म जात का ले सहारा 
कब तक भोले लोग मरेंगे, जात धर्म के जहर में, 
कर्ज की मार भी कितनी बुरी है, अहसास हुआ, 
जब मिली लाश पड़ोसी की, कल गांव की नहर में , 
कुछ दिन ही तो हुए थे, शादी को, ओर वो मर गई 
बस पैसे न मिले थे पूरे, जो तय हुए थे महर में, 
चप्पलें तक घिस गई उस दफ्तर के चक्र लगाते, 
कौन इंसाफ दिलाए अब फैले रिश्व्तों के बहर में, 
खेतों में सोना मिला ना बिटिया का ब्याह हुआ, 
कितने आत्मदाह करते है रोज दहेज के कहर में
अब इंसान, इंसान से ही अजनबी होता जा रहा, 
मानवता झुलस गई यारो, स्वार्थ की दोपहर में , 
अजनबी से हो गए हैं हम तो तेरे शहर में ।
अजनबी से हो गए हैं हम तो तेरे शहर में ।

जय हिंद 

स्वरचित रामकिशोर, पंजाब ।

18/05/2019
हाइकु (5/7/5) 
विषय:-"अजनबी" 
(1)
पहले पाँव 
अजनबी से नेता
बाद चुनाव
(2)
नाम दिखते 
अजनबी पड़ौस 
फोन में रिश्ते
(3)
दे रहे धोखे 
अजनबी से रिश्ते 
अपना बन 
(4)
स्वार्थ के संगी
अजनबी से बने 
मुसीबत में
(5)
छूटा जो हाथ 
हो गए अजनबी 
वक्त के साथ

स्वरचित 
ऋतुराज दवे


1
है अजनबी 
दिल की सरजमीं 
पनपा प्रेम 
2
दिल नादान 
अजनबी से प्यार 
हारे भरोसा 

3
प्रेम आहत 
अजनबी दस्तक 
स्वार्थी रिश्ते 
कुसुम पंत 'उत्साही '
स्वरचित


18मई19
विषय अजनबी
विधा हाइकु
1
सहारा देते
रास्ते में 'अजनबी'-
वक्त बेवक्त
2
भरोसा नही
'अजनबी 'ऊपर-
आज का दौर
3
प्यार अधूरा
'अजनबी' के संग-
छल प्रपंच
4
स्वार्थ के रंग
'अजनबी 'दुनिया-
प्यार का भ्रम
5
कर्तव्य कर्म
'अजनबी' हैं राहें -
जीवन लक्ष्य
6
प्यारा संसार
न कोई 'अजनबी'-
दृढ़ विश्वास
7
घना जंगल
'अजनबी' पथिक-
शेर प्रसन्न

मनीष श्री
स्वरचित
रायबरेली











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