Thursday, May 30

"बँटवारा"29मई 2019

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                                       ब्लॉग संख्या :-401
नमन मंच भावों के मोती
शीर्षक     बँटवारा
विधा       कविता
29 मई 2019,बुधवार

अद्भुत कथा बँटवारे की
युगों युगों से चलकर आई
स्वार्थ समाया होता इसमें
हर मानव ने मुंह की खाई

राम रहीम का बँटवारा
धन और धरा का बँटवारा
आज़ादी मिली देश को
होगया पाकिस्तान बँटवारा

मात पिता का है बँटवारा
बहिंन भाई में है बँटवारा
त्याग करें अगर स्वार्थ का
क्यों फिरे नर मारा  मारा

धर्मो को भी बाँट लिया है
गीत सदा स्व धर्म के गाता
सत्य अहिंसा सदमार्ग है
नित बोलो जय भारत माता।।

स्व0रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।
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भावों के मोती
शीर्षक- बँटवारा
हर चीज का बँटवारा करना मगर
माँ-बाप का कतई नहीं।
जिनको ईश्वर ने जोडा है,
उन्हें अलग करने का
तुम्हें कोई हक नहीं।
वरना इनके हृदय के आँसू में
तुम्हारा सुख-चैन बह जाएगा।
मां-बाप को दुःख देने वाले को
ईश्वर भी माफ न कर पाएगा।
स्वरचित
निलम अग्रवाल, खड़कपुर

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#।। बँटवारा ।।#

महाभारतें हो जातीं 
नाम बुरा बँटवारे का ।
हो मुल्क या हो परिवार 
सब सोचें उआरे न्यारे का ।
भाई भाई दुश्मन बन जायें
वो भूलें प्यार गभुआरे का ।
अपनी ढपली अपना राग
इन्तज़ार पत्नि के इशारे का ।
पाई पाई का हिसाब माँगें 
लिहाज न पिता प्यारे का ।
माँ एक तरफ आँसू डारे
क्या हाल लाल विचारे का ।
नीति अनीति की बँधी पोटरी 
बुरा हाल घर के उजियारे का ।
बँटवारे में दिल भी बँट गये 
मकां लेना पड़ा उन्हे भाड़े का ।
वाह दुनियावी दर्द क्या लिखूँ
ये काम है ''शिवम" सरतारे का ।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 29/05/2019

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नमन  मँच  भावों के मोती 
तिथि।         29/05/19 
विषय          बँटवारा
**

बँटवारे का दंश झेलती 
मैं रेडक्लिफ सीमा रेखा हूँ ।
खामोश लबों को  किये रही
आज दिल की कहने बैठी हूँ !
तुमको जाने की जल्दी  थी
तो क्यों आये थे तुम,यहाँ
परिस्थिति से अनभिज्ञ  थे तुम
कागज पर रेखा खींच गए।
घर आँगन बँट गए लोगों के, 
खेत खलिहान तहस नहस हुए 
ऐसी क्या मजबूरी थी 
रातों रात ये काम हुए
कानों कान खबर न हुई 
सबूत ,अल्फाज सब मिटा दिए ।
जाने के पहले  हृदयविदारक
मंजर  तो देखा होता 
कितनी बहु बेटियों पर
जुल्म का नंगा नाच तो देखा होता ।
मैं सीमाओं मे अरसे से बंधी 
अपनी मर्यादा जानती थी ,
बरसों से पीड़ा सहती आई 
अब हृदय विदीर्ण ,लहूलुहान मेरा
मैं रेडक्लिफ सीमा रेखा हूँ ।
घुसपैठियों का वार सहा नही जाता 
सीजफायर का उल्लंघन देखा नहीं जाता 
एक ही अभिलाषा है मेरी 
भारत के नीति नियंता से 
देश के वीर सपूतों से,
खत्म  करो मेरा अस्तित्व
मेरा इतिहास बदल दो 
देश का भूगोल बदल दो 
करो अपनी सीमाओं का विस्तार,
मुझे सीमाओं के बंधन से मुक्त करो
बंटवारे के दंश से मुक्त करो ।

स्वरचित
अनिता सुधीर

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नमन मंच भावों के मोती
शीर्षक-बँटवारा
दिनांक-29/5/2019

सुत ने मां के हार का, लगा लिया है मोल।
झर- झर आंसू बह रहे, सुनकर कड़वे बोल।।1

#बँटवारे ने लील ली ,बाबा जी की जान।
बँटवारा न देख सके, बनते सुत अनजान।।2

पांँच गाँव न दे पाया, हुआ सुयोधन क्रुद्ध।
माधव भी न रोक सके, कुरुक्षेत्र का युद्ध।।3

#बंँटवारे की आड़ में, दिखा लहू का रंग।
टूट गए कच्चे रिश्ते, पड़ा रंग में भंग।।4

शालिनी अग्रवाल
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित
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खुश हो कर त्योहार  मनाने से पहले। 
कुछ सोचो घर द्वार  सजाने से पहले।

देखो भाई बिन क्या तन्हा जी पाओगे। 
अपने आंगन मे दीवार उठाने से पहले। 

मन को  रोशन  कर लेते  खुशियों से। 
तुम  दीपक दो  चार जलाने से पहले।

फिक्र जरा होती  अपनों की गैरों की।
खुद को  लम्बरदार  बनाने  से पहले।

अदब और कायदा  तुम भूल गए हो।
इस  बर्बादी को  यार बनाने से पहले। 

थोड़ा सा  किरदार  बना लेते  अच्छा। 
तुम बंगले मोटर कार बनाने से पहले। 

हम पर  हंसने वालों  कोई  बात नहीं। 
तुमसे  हमें है  प्यार  जमाने  से पहले। 

अभी बहुत लम्बा रस्ता दूर है मजिंल। 
जरा सोच कदम चार उठाने से पहले। 

तौल के अपना दिल  देख कभी लेना। 
सबको झूठा मक्कार बताने से पहले। 

आज दहन करले द्वेष  मन के सोहल। 
ये झूठे पुतले हर बार जलाने से पहले। 

                            विपिन सोहल

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नमन -मंच
वार - बुधवार
तिथि - 29 मई 19
विषय बँटवारा के तहत, मेरी लघुकथा नीम का पेड़

मंगलू के स्वर्ग सिधारने के तुरंत बाद,बड़े बेटे की बहू ने अपने पति से कहा-"अभी तो सारे लोग  इक्कठा है कमला के बापू ।"
"अभी करवा लो, जो भी बंँटवारा करना है वो सबके सामने। 
"हाँ मैं भी यही सोच रहा हूँ।
कल तीये की बैठक के बाद ही बात छेड़ दूँगा।
अगले दिन सोहन ने अपने छोटे भाई को बिठाकर, घर का हिस्सा बाँट दिया बीच में एक दीवार बनाने का फैसला किया,मगर नीम का पेड़ बीच में आ रहा था।
दोनों भाईयों ने कटवाने का निश्चय किया।
तभी बहन मीरा बोली,"इसे तो मत काटो।"
दोनों भाभियाँ तुरंत तुनक कर बोली-"क्या तुम आओगी अपने ससुराल से सफाई करने ?वो तो पिताजी नई काटने देते थे,नहीं तो हम तो कब का कटवा देते।
मीरा  ने भाभियों से बहस करने उचित नहीं समझाऔर अपने दोनों भाईयों को बिठाकर  कहने लगी-
"बताओ भईया इस पेड़ के साथ हमारी कितनी यादें जुड़ी है।
"पिताजी ने कितना संजोकर रखा था इस पेड़ को।
हम तीनों भाई- बहन  इसी के नीचे पले बड़े। खेले -कूदे।वो याद है झूले पर झूलते हुए सबसे ऊंँची डाली को छूना।वो निबोरी खाना।
वो सुबह -सुबह इसकी दातून करनाऔर छोटे- मोटे घाव,फुंसी सब इस नीम ने ही ठीक किये है।

 नीम का पेड़  ऊपर से कह रहा था-" लाख समझा लो,कोई फायदा नहीं बेटी। ये वही करेंगे,जो इनकी पत्नियों ने कह दिया।
"इन्हें कुछ भी याद नहीं आएगा। काट लेने दो इन्हें।
जो पिता के जाते ही  जायदाद के बँटवारे में लग गए  वो मेरी कीमत क्या जाने।
मुझे भी नहीं रहना इनके साथ।
नीम के पेड़ की बातें सुनकर मीरा समझ गईऔर अब उसने कुछ भी याद दिलाना उचित न समझा...

स्वरचित
गीता लकवाल
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भावों के मोती 
सादर प्रणाम 
विषय =बँटवारा
विधा=हाइकु 

बढ़ता जाए
करिए बँटवारा
ज्ञान का धन

स्वार्थ की नीति 
किया है बँटवारा
हिंद व पाक

बचा ही लेता
रिश्तों में  बँटवारा
स्नेह का भाव

पाक की मंशा
कश्मीर हो हमारा
हो बँटवारा

बच्चों ने किया
माँ-पिता बँटवारा
संस्कार खोया

करके गए
देश का बँटवारा
यहाँ अग्रेंज

===रचनाकार ===
मुकेश भद्रावले 
हरदा मध्यप्रदेश 
29/05/2019

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29/5/19
भावों के मोती
विषय - बँटवारा
__________________
बड़ा ही दुखदायी होता
जब बँटवारा सहना पड़ता है
तिनका-तिनका जोड़ा
बनाया सपनों का घरौंदा
जज़्बातों के रंग भरकर
हर एक ईंट को जोड़ा
अरमानों के दीप जलाकर
किया था उजाला घर में
प्यार की बारिश करके
दिल के टुकड़ों को सींचा
एक-एक कोने में रची-बसी
जीवन की अनमोल यादें
कब बेटों ने स्वार्थ में भुला दी
माता-पिता का तोड़कर दिल
घर के बँटवारे पर आ गए
टुकड़े-टुकड़े कर दिए रिश्ते
बँटा आँगन बँट गई दीवारें
खड़ा पेड़ आँगन में सहमा
प्यार से था जिसे सींचा
माँ-बाप भी बँट गए
किस्मत के मारे दोनों बेचारे
बुढ़ापे में एक-दूसरे से दूर
बेटों के हाथों होकर मजबूर
आँसू भरी आँखों से रहे देखते
आँगन के बीच दीवार बनते
किसी के हिस्से में माँ आई
किसी के हिस्से में पिता
बड़ा ही दुखदायी होता
जब घर का बँटवारा होता
***अनुराधा चौहान***©स्वरचित✍

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सादर नमन
29-05-2019
बँटवारा
उलझे पन्नों को जो छांटे थे
फिर संग मिल हम बांटे थे 
पुराने उन पन्नों को पढ़कर
अतीत की सैर दुबारा कर लें 

सघन तरु की छांव में मिलना
मौन होंठ, नयनों का खिलना 
है स्मृतियाँ देती क्यों कसक
चलो, उसका निपटारा कर लें

मन भीड़ में गुम, एकाकी है
दिल में बस धड़कन बाकी है
घुली हुयी जो साँसें अब तक 
आओ, इसका बँटवारा कर लें
-©नवल किशोर सिंह
     स्वरचित

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नमन भाव के मोती 
दिनांक- 29 मई 2019  
विषय-बंटवारा 
विधा -कविता

अजीब दृश्य छाया हुआ
आज घर में बंटवारा हुआ

अपने ही जिस्म का बंटवारा हुआ
आज अपना ही पराया हुआ

बिन माँ के जो न निवाला लिया
आज माँ को छोड़ अलग हो लिया

बापू की आँखों का तारा रहा
आज बापू बेसहारा रहा

घर में मनमुटाव क्या हुआ
आज घर का बंटवारा हुआ

माँ का आंसू निकल ही गया
कलेजों का आज टुकड़ा हो गया

सरहद पर आज पहरा हो गया
बिना इजाजत के जाना मना हो गया

कभी भी बंटवारा अच्छा न हुआ
माँ के चरणों को छोड़ जन्नत न हुआ

नीति और ज्ञान धरा रह गया
आज घर का बंटवारा हो गया

मनीष श्री
स्वरचित
रायबरेली

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भावों के मोती
29/05/19
विषय - बंटवारा 

एक दर्द की ताबीर है बंटवारा
मां बाप के सपनो का उजड़ता महल है बंटवारा
हृदय के दोनो निलय को अलग करना है बंटवारा
जख्म के नीचे  छुपा मवाद  है बंटवारा
टीसता है जो रात-दिन बेपनाह वो घाव है बंटवारा
चाहे देश का हो,घर का या हो दिलों का बंटवारा 
सदा एक नफरत छोड़ जाता है बंटवारा
करना है करो दिल से बैर, द्वेष, राग का बंटवारा
तृष्णा- मोह, क्रोध, लालच, नफरतों का बंटवारा
अभिमान,माया, कलह,अभख्यान का बंटवारा
परम तत्व का हो रहा हर जगह बंटवारा
भुलते हो कल होना है इस देह से भी  बंटवारा ।

स्वरचित

कुसुम कोठारी।

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नमन "भावो के मोती"
29/05/2019
  "बँटवारा"
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सम्पत्ति के स्वार्थ की खातिर
टुकड़ों में घर को विभक्त किया,
खयाल माँ के आँचल का किया होता..
बँटवारा करने से पहले ।।

दिन और रात को बाँट लिया
चाँद और सूरज मिलकर..
खयाल शाम का किया होता.
बँटवारा करने से पहले..।।

हमलोगों ने मजहब को भी..
बाँट लिया रंगों मे...
रंग प्रीत का देखा होता..
बँटवारा करने से पहले ।।

निज स्वार्थ से वशीभूत हो.
रिश्तों में पड़ी दरारें.....
सुनीतियों से परखा होता..
मन का बँटवारा करने से पहले ।।

बहू और बेटी में भेदभाव..
बेटी किसी घर की बनेगी बहू
बहू भी किसीकी है बेटी..
सोच तो लेते एक बार...
इन रिश्तों को बाँटने से पहले।।

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल।।
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नमन मंच 🙏
सभी गुणीजनों को सादर प्रणाम 🙏
शीर्षक- "बँटवारा"
दिनांक- 29/5/2019
विधा- कविता
************
जमीन का तो किया बँटवारा, 
अब तो आसमान भी बँटने लगा, 
इस कलयुग में इंसान का, 
ईमान भी बिकना लगा |

भाई-भाई का मेल न रहा, 
बँटवारा दीवार बनने लगा, 
घर, जमीन के टुकड़े हो गये, 
इंसानियत अब मरने लगी |

बँटवारा बस दर्द ही देता, 
फिर भी इंसान नहीं संभलता, 
गर जो उसकी समझ में आ जाये,
बँटवारा कभी न आये |

 स्वरचित *संगीता कुकरेती*

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🌹🙏जय माँ शारदे,🙏🌹
नमन मंच,, भावों के मोती,,
19 /5/2019/
बिषय ,बंटवारा,,
 वर्तमान में मानव स्वार्थ 
के बशीभूत जी रहा है
मैं मेरा  की पिपासा का 
प्याला पी रहा है
बंटवारे पर बंटवारे 
बट गए दहलीज द्वारे
देश बंटा प़ांत बंटे 
और बंट गया समाज 
 भाई  भाई आपस में बटे
बदल गया  अंदाज
 अब तो   बृद्ध माँ बाप का 
होने लगा बंटवारा
छिन गया मुँह का निबाला
बुजुर्गों की लाठी का सहारा
 स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार

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II बँटवारा II नमन भावों के मोती....

विधा: लघु कथा

उसकी आँखें दीवार पे टिकी थी... कोशिश कर रही थी दीवार के पार देखने की... जो उसके...उसकी पत्नी और बच्चों में खड़ी हो गयी थी... किसी एक दिल के मानने न मानने से क्या होता... हकीकत तो ये थी की दिलों का बँटवारा हो गया था....  

बड़ी महनत से घर बनाया था उसने... पंछी जैसे घौंसला बनाता है.... हर इच्छा पूरी की थी उसने अपने बच्चों की पत्नी की... आजादी थी सब को.... फिर भी न जाने क्या हुआ कि सब उसे छोड़ कर चले गए.... घर में एक परिंदा रखा हुआ था... बस वही था उसके साथ अब.... पिंजरे में... पिंजरे को न उसने कभी ताला लगाया न बंद किया था...  इतने में पिंजरे का पंछी फड़फड़ाया....उसकी आँखें दीवार से हट कर पिंजरे पर लग गईं....पिंजरे से पंछी ने उसे देखा... गर्दन घुमाई... फुर्र हो निकल गया.... उसकी आँखें खुली स्थिर पिंजरे पर टिकी रह गयीं ....पंछी उड़ चुका था... आखिर आजाद पंछी की तरह उड़ना कौन नहीं चाहता...कीमत चाहे कुछ भी हो ! 

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II 
२९.०५.२०१९

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बंटवारा आज शीर्ष कहै,
यह शब्द,
राष्ट्र,
घर,
परिवार को,
तोड़ कर,रख देताहै।
नफरत,घृणा, जलन,ईष्या, बैर को जन्म दे,
खून खराबा,,लड़ाई, हत्या करवाता है।बंटवारा शब्द
घर,परिवार, देश केलिये,
अशुभ अपशुकन है।
इसी शब्द ने,
द्वापर युग मे,
एक परिवार मे,
18/दिन तक महाभारत युद्ध हुआ था।सत्ता, जायदाद, जमीन।जोरुये।
मानव मानव मे युद्ध कराये।बंटवारा शब्द कैसे दिलोदिमाग मे आते है।
जो मानव ता,प्यार, बंधुत्व के विरोधी है।साथियों सबको शुभमध्यान्ह।।

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शुभ साँझ 🌇
नमन "भावों के मोती"🙏
29/05/2019
मुक्तक    
विषय:-"बँटवारा "
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(1)
अदद एक लकीर ने दो मुल्क बना दिए,
भाई को भाई से लड़ा बीज घृणा  लगा दिए, 
धर्म के नाम ये "बँटवारा" भी क्या खूब रहा, 
मानवता की शर्मसार कई बेटे गँवा दिए l
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(2)
"बंटवारे" की पीड़ा सभी ने  जानी है, 
एकता गर्व मिसालें और कहानी है, 
धर्म  और जातियाँ  आते हैं बाद में, 
सबसे पहले हम सब हिंदुस्तानी हैं l

स्वरचित 
ऋतुराज दवे

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नमन भावों के मोती 
विषय - बँटवारा 
29/05/19
बुधवार 
कविता 

नेता   ही  बँटवारा  करके
       जनता  को  लड़वाते   हैं,
धर्म,जाति,भाषा को लेकर
       मन   में   कटुता  लाते हैं ।

इस धरती पर सभी शांति से 
         जीवन  यापन   करते  हैं ,
किन्तु देश के शासनकर्ता 
       उन्हें    बाँटते   फिरते   हैं  ।

ये मजहब की बातें करके 
           जनता  को  भड़काते  हैं ,
और धर्म का झांसा देकर 
           सरहद   पर  लड़वाते  हैं।

भी  नहीं ये देख सके हैं
          नके   प्रेमपूर्ण   मन  को ।
रजनीति  से  दूर  पनपती
         एकसूत्रता  की   हद   को।

ब जनता न मान सकेगी
           नकी   टेढ़ी   चालों   को ,
ह नेता पद का  हक देगी 
           नहित  करने  वालों  को। 

अब बँटवारे की बातों को 
           जनता  कभी  न  मानेगी,
वह अखण्ड भारत को अपना 
            उचित लक्ष्य ही जानेगी।

स्वरचित 
डॉ ललिता सेंगर
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नमन          भावों के मोती
विषय          बँटवारा
विधा           कविता
दिनांक        29-5-2019
दिन             बुधवार

बँटवारा
🎻🎻🎻🎻

बहुत निर्दयी शब्द है बँटवारा
इसमें लहू सूख जाता है सारा
हम इतने  इसमें बँटते हैं
कि अपना कहने में भी नटते हैं।

दीवारें खिंच जाती हैं
मुठ्ठीयाँँ भी भिंच जाती हैं
जीवन भी बँट जाता है
सौहार्द पूरा कट जाता है।

शक्ति अपनी ही क्षीण होती है
दुर्भावना  ही  प्रवीण होती 
भौतिक लाभ मिले भी तो क्या
आत्मा भी तो मलीन होती है।

स्वरचित
सुमित्रा नन्दन पन्त
जयपुर

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शुभ साँझ 🌇
नमन "भावों के मोती"🙏
29/05/2019
हाइकु (5/7/5)   
विषय:-"बँटवारा"
(1)
प्रश्न उलझा 
बाँट ली जायदाद 
कैसे बाँटे माँ 
(2)
शिक्षा असार 
बँटवारा देखती 
माँ चुपचाप 
(3)
जीवन ऋणी 
हिस्से में आ गई माँ 
वो बेटा धनी 
(4)
उखड़ा प्यार 
बंटवारे ने किया 
संकीर्ण द्वार 
(5)
छोटा संसार 
बँटवारे की बाड़ 
घृणा ही पार 

स्वरचित 
ऋतुराज दवे


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नमन भाव के मोती 
दिनांक- 29 मई 2019  
विषय-बंटवारा 
विधा - ग़ज़ल

वीगा जमीन यूँ मकानों में बंट गया।
फिर यूँ हुआ चंद ठिकानों में बंट गया।

बेसबब मुझसे कोई आकर कह गया,
घर का बटवारा विवादों में बंट गया।

भाई ही भाई का दुश्मन बन बैठा,
कोर्ट में पेश संवादों में बंट गया

आपस में झगड़ते रहते थे नित रोज,
भाई का प्यार दीवारों में बंट गया।

आपसी मनमुटाव बढ़ गया इसकदर,
बड़ा सा गोदाम दुकानों में बंट गया।

सुमन अग्रवाल "सागरिका"


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🌹🙏नमन मंच🙏🌹
आदरणीय जनो को नमन
🌹🙏       🙏🌹
विषय-बंटवारा
दिनांक-29/05/19

भाई,भाई एक दूसरे की चिकचिक से तंग थे
गाँववाले भी ये देखकर दंग थे

बंटवारा निश्चित हुआ आज
घर में था सन्नाटा नहीं कोई आवाज

बड़े के ह़क एक कमरा छत आया
तो छोटे ने कहर ढाया
मझला आँगन को अड़ा रहा
तो संझला हक जमाये परछी पर खड़ा रहा

बड़ा चार गिलास, मंझला लोटा ले गया
छोटा चूल्हा-अंगीठी,संझला परात ढो गया

बहूएँ भी सास के जेवर को ललचाती रहीं
तिथीवार रोटी को बुलाती रहीं

बड़े के घर से रोटी खाकर माँ बाहर निकली
छोटे के घर पान उठाया ही था कि बेटे की जुबान फिसली

माँ जानती नहीं बंटवारा हो चुका है आज
तेरा खाना पानी बड़े के घर निश्चित हुआ है आज

माँ फफककर रो पड़ी करती फरियाद है
मेरे बच्चों तुम्हारे घर कभी न हो #बंटवारा
मेरा आशीर्वाद है।।

  ***स्वरचित****
 --सीमा आचार्य--
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देश भारत
क्यों हुआ विभाजित
सत्ता लालसा।।

हुये बेघर
बटवारा दुखद
निरीह मरे।।

बंटा भारत
कैसे हुआ स्वीकार
चाचा व जिन्ना।।

बंटते घर
होते खून खराबे
कैसी नियति।।

बाप बेटवा
बने जानी दुश्मन
घर बटाई।।

ज़ेवर बंटा
जमीन विभाजित
कोई न ले मां।।

भावुक

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सादर नमन
आज का शीर्षक- बँटवारा
      "बँटवारा"
बचपन के दिन वो प्यारे,
कैसे तुम भूल गए,
भूल कर बचपन के सपनों को,
सजा लिए अब सपने नए,
जिस आँगन की धूल में ,
हरदम तुम सने रहे,
क्यों करते हो मेरा बँटवारा ,
आँगन आज ये कहे,
बच्चे पास पड़ोस के,
इस आँगन में चहकते रहे,
आज इस घर के बच्चे ही,
पूरे आँगन को तरस रहे,
खिंची आँगन के बीच ये रेखा,
सुनों ध्यान से क्या कहे,
ना भूल माँ की ममता को,
 आँखों से इसकी आज आँसू बहे।
**
स्वरचित-रेखा रविदत्त
29/5/19
बुधवार
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नमन मंच 
२९/०५/२०१९
मौलिक एवं अप्रकाशित 
विधा मुक्त 
विषय: बॅटवारा,
**************
बॅटवारा,
शब्द मात्र एक,  संदर्भ अनेक !  
बॅटवारा,
कभी कारण, कभी अकारण !
बँटवारा,
आवश्यक कभी अनावश्यक !
बँटवारा,
कभी अर्थगत, कभी अर्थहीन !
बॅटवारा, 
पाने के लिए, कभी खोने के लिए !
बॅटवारा, 
सुख कारक, कभी दुःख कारक !
बॅटवारा, 
कभी हँसाता है कभी रुलाता है !
बॅटवारा, 
कभी दिल से, कभी दिमाग से !
बॅटवारा, 
कभी अपनों से, कभी परायो से !
बॅटवारा, 
कभी नियति से, कभी नियत से 
बॅटवारा, अंतत:, निश्चित, अपितु, 
सहमति से हो जाए तो हितकारी 
असहमति से  हो तो अहितकारी !!
!
स्वरचित: डी के निवातिया

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नमन भावों के मोती,
आज का विषय, बँटवारा
दिन, बुधवार
दिनांक, 29,5,2019

ईश्वर ने दिया सभी को समानता से प्यार  ,

सबके लिए बनाया एक ही धरती और आकाश।

बाँट लिया हमनें ही सब कुछ रखा नहीं विश्वास,

जाति धर्म रंग भेद लिंग भेद कितने भेद की बात ।

बँट गया टुकडों टुकडों में हमारा सभ्य समाज ,

भाई भाई के बीच खड़ी हो गई स्वार्थ की दीवार ।

हुए अजनबी रिश्ते नातें  बँट गया मात पिता का प्यार,

सीमायें देशों की बँट गयीं बँट गया इंसान का प्यार ।

कुटुंब कबीला सब बँट गये हो गये  एकल परिवार

सुख सुविधाएं भी बँट गईं हो गये गरीब  लाचार ,

धीरे धीरे समाज में हो गया  वर्ग भेद का बिस्तार ।

बँटवारे से व्यथित हुआ है अपने पन का भाव ।

लगा है ऐसा घाव जिगर पर भरता ही नहीं है घाव।

स्वरचित, मीना शर्मा, मध्यप्रदेश,
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नमन भावों के मोती आ0 डा0अंजू लता सिंह जी
आज का शीर्षकः- बटवारा

होना चाहिये आपस में केवल सम्पत्ति का बटवारा।
डटे रहें सब सत्य पर नहीं ले कोई झूठ का सहारा।।

घर का मुखिया करे नहीं, बटवारे में कोई पक्षपात।
प्यार बनाये रखने के लिये यही लाख टके की बात।।

परन्तु बटवारे में तो देते हैं सब अपनों को ही धोखा।
झूठ बोलने का छोड़ता नहीं वह कभी कोई भी मौका।।

झगडा बढ़ने पर अन्त में बटवारा न्यायालय में जाता।
आपस में तो बट नहीं पाता माल वकीलों में है बंटता।।

डा0 सुरेन्द्र सिंह यादव
“व्यथित हृदय मुरादाबादी” 
स्वरचित

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शुभ संध्या
#।। बँटवारा ।।#
द्वितीय प्रस्तुति

नदियों का जल बाँट रहे 
आगे बाँटेंगे क्या मेघ ।
शायद कोई युक्ति आए
इंसा बाकई अद्भुत नेक ।
अदभुत तो है ही जाना
मगर नेक में है संदेह ।
हर क्षेत्र में बेशक अनुपम
हो मुल्क या व्यक्ति विशेष ।
नेकी यह भाई भाई से बैर
गई इंसानियत गया विवेक ।
दिल दिमाग से बड़ा था
आज दिमाग की है टेक ।
आपा खोए जरा जरा में 
पापा की सही न देखरेख ।
बँटवारा सुन आँसू आए
अनहोनी की आशंका एक ।
बिगड़े हों अगर बेटे तो
अनहोनी की लिखे सुलेख ।
बँटवारे से पहले पढ़ लें 
गली मोहल्ला क्या प्रत्येक ।
खुद तमाशा बनें ''शिवम"
ऐसी स्वारथ की लपेट ।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 29/05/2019
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नमन मंच को
दिन :- बुधवार
दिनांक :- 29/05/2019
विषय :- बंटवारा

अधनंगी लाशों के अंबार देखे...
बंटवारे में जलते घर बार देखे..
लुटती रही अस्मत नारियों की..
मौन धरे सियासती दरबार देखे..
बंटवारा हुआ था दो मुल्कों का..
हमने खून के उड़ते गुबार देखे..
सत्तामद ने ये क्या करवा दिया..
हर जगह धार्मिक उन्माद देखे..
टूट रहे थे  तब  मंदिर  मस्जिद..
मौन अहिंसा  के पेरोकार देखे..
हर तरफ बस पसरा था मातम..
बिलखते  मासूम चित्कार देखे..

स्वरचित :- मुकेश राठौड़


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नमन भावों के मोती
दिनाँक -29/05/2019
शीर्षक -बँटवारा
विधा-हाइकु

1.
प्रेमी प्रेमिका
बँटवारा अनोखा
प्यार या धोखा
2.
अंग्रेज नीति
बँटवारा हिन्द का
बदनियती
3.
लक्ष्य चुनना
बँटवारा करना
कठिन कार्य
4.
स्वार्थ भावना
बँटवारा दिलों का
टूटते रिश्ते
5.
गुरु व शिष्य
करते बँटवारा
निज ज्ञान का
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स्वरचित
अशोक कुमार ढोरिया
मुबारिकपुर(झज्जर)
हरियाणा

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नमन मंच
विषय -- बंटवारा
विधा --मुक्त
दिनांक--29 / 05 / 19
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कितना कितना
भयावह होता है
बंटवारे की
पीडा़ वहन करना
वो आधी रात
याद है ना
देश का एक हिस्सा
जब मगन हो
स्वतंत्रता की
दिवाली मनाने में
वहीं दूसरी ओर
उन्ही दीयों से
उठी लौ ने 
घर ही नहीं
जज्बात भी
जला कर खाक
कर दिये थे
उधर जल रही थी
लाहौर की गलियां
यहाँ अमृतसर
सच कहूँ तो
जल रहा था
इकबाल का
सारे जहां से अच्छा
हिंदुस्तान
जल रहा था
नानक का ननकाना
सुलगती चिंगारियों ने
कहीं जाहिदा की
रुह फूंकी
कहीं सीता जमींदोज
हुई  थी फिर से
सच सत्ता के लोभी
बैठ गये थे
शीतयुक्त बडे़ 
महलों में
और बेचारी 
आवाम भूला बैठी
सदियों के रिश्ते
एक माँ का
दूध भी बंट गया था
भाई भाई से,
माँ बेटे से,
भाई बहिन से,
बाप बच्चों से
पति पत्नी का
बंटवारा भी
हो गया था
सच तो ये है
वही बंटवारे का दंश
आज तक
सरहदों में बंटकर भी
हृदय से निकला नहीं
धीरे धीरे 
नासूर बन कर
सभी की रगो में
कम और ज्यादा
बह रहा है ।

      डा.नीलम.  अजमेर

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भावों के मोती दिनांक 29/5/19
बँटवारा

जो झेलता है
दर्द बँटवारे का
हो जाता है 
दिल उसका 
तार तार 

आजादी के बाद
बंटवारे का
दर्द  सहा है 
भारतीयों ने

एक घर में 
जब होता है
बंटवारा 
टूट जाते है
बूढे माँ बाप 

मौत दे दे 
भले ही मौला
पर न दे वह
बंटवारा 
जीवन में 

स्वलिखित 
लेखक संतोष श्रीवास्तव  भोपाल

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"नमन-मंच"
"दिनांक--२९/५/२०१९"
"बँटवारा"
मनभेद से मतभेद हुआ
हुआ घर का बँटवारा
चाँद तो एक ही रहा
चाँदनी मध्य ,दीवार कंटिला खड़ा।

ईष्या व लोभ ने किया
बँटवारा का खेल सारा
स्मरण न रहा माँ बाप का प्यार
हो गया घर आँगन का बँटवारा।

माँ बाप के सामने हुआ,
उनका घर का बँटवारा
ये तो हुआ अपराध बड़ा
अपकीर्ति तो होगा ही,होगा

सुदूर परिणाम भी  बड़ा,
आगे आये जब राह कंटिला
भाई ही आते भाई के काम
इसे क्यों भूले नादान इंसान।

माँ बाप ही इस धरती पर
होते है भगवान
उन्हें हम कभी न बाँटे
उन्हें खुश रखना हमारा काम।
स्वरचित-आरती-श्रीवास्तव।

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स्वरचित हाइकु

(1)

हाय! चीत्कार
बंटवारा जरूरी 
करें स्वीकार

(2)
मां और बाबा 
बंटवारा क्यों करो
जीते जी मरो
(3)
खड़ी दीवार
बंटवारे की रार
हा! अश्रुधार
(4)
दो बेटों की मां
बंटवारे में घिरी
 रही बिखरी

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स्वरचित हाइकु 
ड.अंजु लता सिंह 
नई दिल्ली


नमन मंच 
29/5/2019
बंटवारा 
सास बहु के बीच में बंटा पति बेचारा, 
किसे मनाये किसे रुठाये, हुआ जो बंटवारा, 
क्यों न समझे नार ये जिद्दी माँ है वो बेचारी, 
फंस गया है फर्ज के कर्ज में 
क्या करे बेचारा ll

सच है शादी से पहले ना होती थी रार, 
जब से ये संगिनी आयी खींची है तलवार 
भाई बहनो को अलग कर दिया, 
रिश्ते बेमानी हो गए खींची बंटवारे की दीवार ll
कुसुम पंत उत्साही 
स्वरचित 
देहरादून

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भावों के मोती  : प्रदत्त शब्द : बँटवारा 
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रुक रुक कर गुज़री मगर शाम गुजर गई 
अब ये किसे मालूम कहाँ गई ,किधर गई।

बात जो निकली तो बँटवारे पर आ रुकी 
कुछ यादें इधर रहीं तो कुछ यादें उधर गईं ।

न जाने किस मुक़ाम पर ठहरना होगा अब 
हम तो बस वहाँ चल पड़े ये राहें जिधर गईं ।

कुछ लमहे निशात के रख कर भूल गए हम 
उनकी जुस्तजू में बेसबब हमारी उमर गई ।

आने वाले तलातुम का शायद उसे अंदेशा था 
साहिल से मिलकर गले उदास सी हर लहर गई ।

बेआशना सी लगती है ये ज़िंदगी की तस्वीर भी
बेरंग और ख़ौफ़ज़दा सी जहाँ तलक नज़र गई ।

बडी शिद्दत से है इंतज़ार ख़ुशियाँ लौटेगी,हो न हो
हर छोटी बडी गलियों से गुज़रते जाने कहाँ ठहर गई ।

 स्वरचित(c)भार्गवी रविन्द्र .....बेंगलूर ....२९/०५/२०१९
निशात - खुशी , जुस्तजू - तलाश , तलातुम - तूफ़ान ,

बेआशना - अपरिचित ,


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नमन मंच को 
दिनांक-29/05/2019
विषय-बँटवारा
जाने कितने बेघर हो गए जब हुआ देश का बंटवारा ।
जाने कितने जीवन लुट गए जब हुआ देश का बंटवारा । 
जाने कितनी फांसे पड़ गईं जब हुआ देश का बंटवारा ।
बंटवारा बेहद कड़वा होता है,चाहे देश का हो या घर द्वारा।
घर आँगन बट जाते हैं ,बँट जाता है चौबारा ।
वह भी पराया हो जाता है जो लगता था अति प्यारा ।
बंटवारे की आग में जलकर कभी जला बचपन प्यारा ।
बंटवारे में बंट गई ममता ,  बट गया भाई का भाई चारा। 
बहना खड़ी द्वार पर सोचे कहाँ गया आँगन प्यारा ।
बंटवारा एक शब्द नहीं है यह अहसासों का हत्यारा ।
स्वरचित 
मोहिनी पांडेय

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नमन भावों के मोती
आज का विषय, बंटवारा
दिन, बुधवार
दिंनाक 29.5.2019

                   बंटवारा

मिलकर ही जो हो 
हर काम का बंटवारा
जीवन रसमय सा लगे 
फिर यारा
एंकाकी परिवार तभी लगते सूने.. संयुक्त परिवार से जब हारा मानव बेचारा 
सोचनीय बात है यहां
पुरखों की सोच व भावी पीढ़ी की सोच में भी हुआ बंटवारा
बंटवारा हुआ धर्म के नाम पर
ये पचा भी न पाये थे अभी
कि इंसा का  विचारों में भी, होने लगा बंटवारा
उपर चेहरे पर दिखे हंसी
अंदर धधक रही ज्वाला
कैसा -कैसा है ये बंटवारा
कैसे समझे मन ये हारा

एकता कोचर रेलन
हरियाणा
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नमन भावों के मोती 🌹🙏🌹
29-5-2019
विषय:-बँटवारा 
विधा :-हाइकु 

तलाक़ लिखा
बँटवारा दिल का 
आज भी बाक़ी 
धार्मिक हिंसा 
घोषणा बँटवारा 
पीड़ित मर्म 
प्रसव पीड़ा
बँटवारा रिश्तों का 
स्थायी क्रंदन 
ब्रह्मांड सत्ता
बँटवारा अंड का 
सृष्टि निर्माण 
माँ बाँट लेते 
लकीरें नहीं खिंचें
रक्त रंजित  

स्वरचित :-
ऊषा सेठी 
सिरसा १२५०५५ ( हरियाणा )


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