Wednesday, May 1

"श्रमिक /मजदूर "01मई 2019

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        ब्लॉग संख्या :-373



समस्त प्रबुद्ध रचनाकारों को सादर सुप्रभात,नमन एवं वंदन🙏🌹💐🌹।
🌹भावों के मोती🌹
1/5/2019
"श्रमिक "

देख सुनामी धार को,खोना मत तुम धीर।
श्रम की नैया साथ ले,उतरो सागर तीर।।।

स्वेद कणों के नूर से,श्रमिक उर साकार।
श्रम साधना सफल हुई,गेहूं स्वर्णिम हार।।

श्रम ना देखे अँग अपँग, देखे केवल जोश
कर बिन सागर पार कर,गायब सबके होश।।

वीणा शर्मा वशिष्ठ
स्वरचित,मौलिक
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नमन मंच भावों के मोती
श्रमिक ,मजदूर
विधा    लघुकविता
01 मई 2019 ,बुधवार

विश्व मजदूर दिवस आज
धन्यवाद करें मिल उनका
जीते जी कल्याण किया है
भला किया है उनने जग का

झोपड़ियों में सोने वाले
फुटपाथ पर रहने वाले
वे सागर की तह में जाते
मोती माणक ढूंढ के लाते

धरती धधके वर्षा बरसे
तन कंपाती सर्दी  झेले
फफोले शौभित हथेली
जीवन में रहते नित मेले

तनतोड़ कर बहा पसीना
गेंती फावड़ा और कुदाली
सदा साथ रखते हैं अपने
नहीं भूलते कभी  तगारी

श्रमिक बनाता लंबी सड़कें
रेल मार्ग का वह निर्माता
डेम बनाता  नहर खोदता
प्रति खेत पानी पंहुचाता

राष्ट्र विकास वह नियंता
देता बदले में क्या लेता
खून पसीना अर्पण करता
वह रहता रीता का रीता

धरती पुत्र नमन तुम्हे है
कर्मवीर सशक्त कर धारी
जिसने काटी काली राते
धन्य धन्य तू भारत वासी।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

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सुप्रभात"भावो के मोती"
🙏गुरुजनों को नमन🙏
🌹मित्रों का अभिनंदन,🌹
01/05/2019
"श्रमिक/मजदूर"
1
"मई दिवस"
कारखाने हैं बंद
 अमूल्य श्रम
2
श्रमिक घर
शहर पलायन
सूना है गाँव
3
श्रम में जीना
फूटपाथ बिछौना
रुग्ण है काया
4
कर्म में जीना
कठिन परिश्रम
श्रमिक धर्म
5
श्रम का दान
मजदूरी ही कर्म
गरीबी स्नेह

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल
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सादर नमन भावों के मोती

हे मजदूर,
तू ही है कर्ता-धर्ता,
क्यों मजबूर ?

श्रमिक श्रम,
अमीरों की बैसाखी,
कर्म चंदन ।

स्वेद की बूँदें,
तन से यूँ ढलकें,
मही संदल ।

फिर भी भूखा,
पेट पीठ हैं एक,
छवि धूमिल ।

कोल्हू का बैल,
दिन भर खपता,
निचोड़े तन ।

  --  नीता अग्रवाल
       #स्वरचित
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नमन मंच- भावों के मोती
दिनांक-01.05.2019
शीर्षक शब्द- मज़दूर
विधा- मुक्तक
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प्रारब्ध लेकर दैव से मज़बूर है हर आदमी ।
लक्ष्य हासिल के लिए मज़दूर है हर आदमी ।
चाहे गदा हो या कि भूपति संभवित है काज करना,
आबद्ध अभिरुचि में सदा मसरूर है हर आदमी ।।
 गदा=भिखारी ।। मसरूर=खुश
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     " अ़क्स " दौनेरिया
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धूल मिट्टी और  पत्थर।
रास्ते मे जो न हो अगर।
फिर  रहा  कैसा  मजा।
आसान  हो  जो सफर।
राह   दुष्कर  जो  मिले।
मन  में हिम्मत  है फले।
बढते आगे है  सदा जो।
राह की ठोकरों मे पले।
धुंधलायेगी  भी   नजर।
घबरायेगा  भी   जिगर।
गिरने का गम तू न कर।
न पथ से डिगना  मगर।
हिम्मत  बढती  जायेंगी।
मेहनत तेरी रंग लायेगीं।
बस हौसला कायम रहे।
मजिंले  पास   आयेगी।

            विपिन सोहल
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“ मजदूर ”
सर्द हवाओं का नहीं रहता खौफ मुझे
और ना ही मुझे कोई गर्म लू सताती है

आंधी, वर्षा और धूप का मुझे डर नहीं
मुझे तो बस ये पेट की आग डराती है

उठाते होओगे तुम आनंद जिन्दगी के
यहां तो जवानी अपना खून सूखाती है

खून पसीना बहा कर भी फ़िक्र रोटी की
टिड्डियों की फौज यहां मौज उड़ाती है

पसीना सूखने से पहले हक़ की बात ?
हक़ मांगने पर मेहनत खून बहाती है

रखे होंगे इंसानों ने नाम अच्छे – अच्छे
मुझे तो “कायत” दुनिया मजदूर बुलाती है
                      :- कृष्ण कायत

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सुप्रभात,,, नमस्कार भावों के मोती

मजदूर दिवस
"""""""""""""""""
(97))

वेताल बैठा उसी डाल पर
सवाल वही दोहराता है
मजदूर दिवस तो आयात कर लाए
पर दिवस का मान कब दे पाओगे
चौपाल सूनी हो गई गांवों की
जिस्म, लाश लादने को मजबूर
मण्डियां लगती हैं आज भी
शहरों - कस्बों में सवेरे....
जो बिक गये उनके घर
शाम को चूल्हा जला...और
जो ना बिका वो बेचैन बेचारा
सरकारी नलके से पानी पी
थके कदम उठा घर चला
यह इन्सान कब कहलाएगा ?

वेताल बैठा उसी डाल पर
सवाल वही दोहराता है
मई का मजदूर दिवस मजबूर है
जो खून पसीने  से कमाकर भी
क्यूँ आधा खाकर सो जाता है
ख़्वाबों के हिंडोले टूटे आँखों में
व्याकुल बच्चों के चेहरे देख
स्वेद -रक्त बहाकर भी इन्सान
श्रमिक सबल कब बन पाएगा
यह इन्सान कब कहलाएगा ?

स्वरचित       
गोविन्द सिंह चौहान
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मजदूर
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मजदूर का नाम आते ही
एक छवि जेहन में बनती है
दो बलिष्ठ भुजा दो मजबूत पाँव
 बिना चेहरे का एक धड़,
और एक पारंपरिक सोच,
बहुत मजबूत होता है एक मजदूर
कुछ भी असंभव नहीं
शारीरिक श्रम का कोई
भी काम सहज कर सकता है
यही सोचते हम सब,
हाड़ तोड़ मेहनत की मजदूरी
के लिए मालिकों की जी हुजूरी करते
पूरे दिन खून.पसीने बहाकर
चंद रुपयों की तनख्वाह
अपर्याप्त दिहाड़ी से संतुष्ट
जिससे साँसे खींचने भर
गुज़ारा होता है
उदास पत्नी बिलखते बच्चे
बूढ़े माता माता की बोझ ढ़ोते
जीने को मजबूर
एक जमीन को कई मंजिला
इमारतों में तब्दील करता
अनगिनत लोगों के ख्वाबों
का छत बनाता
मजदूर ,जिसके सिर पर
मौसम की मार से बचने को
टूटी छप्पर होती है
गली मुहल्ले शहरों को
क्लीन सिटी बनाते
गटर साफ करते,कड़कती धूप में
सड़कों पर चारकोल उड़ेलते,
कल कारखानों में हड्डियाँ गलाते
संकरे पाताल खदानों में
जान हथेलियों पर लिए
अनवरत काम करते मज़दूर
अपने जीवन के कैनवास पर
छेनी ,हथौड़ी,कुदाल,जेनी,तन्सला
से कठोर रंग भरते,
सुबह से साँझ तक झुलसाते है,
स्वयं को कठोर परिश्रम की
आग में,ताकि पककर मिल सके
दो सूखी रोटियों की दिहाड़ी
का असीम सुख।

 #श्वेता सिन्हा
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"मजदूर/श्रमिक"

कर मेहनत मजदूरी चैन से सो जाते ।
नही की चोरी नही डाला डाका पर
न जाने क्यों हम इज्जत नही पाते ।
शायद दुनिया को  झूठ फ़रेब पसंद
और हमें वो झूठ बोलना नही आते ।
हमको बनावटीपन भी नही आये
इसलिये शायद हम उन्हे नही भाते ।
हम गरीब मजदूरों के तो सिर्फ एक
ईश्वर ही दुनिया में हमदर्द कहलाते ।
खुद सब करते हैं ये दुनिया वाले
मगर हम पर ये इल्जामात लगाते ।
क्यों अन्याय है यह मजदूरों संग
यह प्रश्न सदियों से अनबुझ कहाते ।
वैसे जागरूकता आयी समाज में
अब हम मजदूर दिवस भी मनाते ।
मगर यह दिवस सिर्फ ''शिवम"
सरकारी फाइलों में शोभा बढ़ाते ।
मजदूर तो आज भी मजदूर है
लोग कहाँ उसे इज्जत से बुलाते ।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 01/05/2019
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नमन मंच
01-05-2019
श्रमिक-चोका
फांके की रोटी
फट गई लंगोटी
सूखे निवाले
दिल पे ढुल छाले
आस अधूरे
सपने खुरदुरे
कर अभिक्त
शरीर स्वेदसिक्त
कर्म विविक्त
मन भावविरिक्त
विलुप्त हर्ष
समिधा का संघर्ष
शब्द कटार
निष्ठुर ठेकेदार
सर्व स्वीकार्य
साँस अपरिहार्य
सृज अध्याय
विवशता पर्याय
श्रमिक निरुपाय
-©नवल किशोर सिंह
    स्वरचित

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नमन मंच🙏
सुप्रभात मित्रों 😊
दिनांक- 1/05/2019
शीर्षक-"श्रमिक/मजदूर"
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कौन नहीं है श्रमिक यहाँ,
जो काम करता वो श्रमिक है,
मैं भी श्रमिक, तुम भी श्रमिक,
काम का तरीका बस है अलग |

जो कड़ी धूप में करता काम,
मजदूर उसका होता नाम,
कभी खेतों में खलियानों में,
कभी सड़कों व इमारतों में |

दूसरों के लिए काम वो करता,
मेहनत से वो कभी नहीं डरता,
पसीने से वो सींचता है धरती,
भगवान की है ऐसी मर्जी |

खुले आसमान के नीचे रहता,
धरती होती उसका बिछौना,
तकदीर से समझौता करता,
इच्छाओं में काबू रखता |

बीवी भी उसका साथ निभाये,
पत्थर, मिट्टी सब वो उठाये,
कर्मठ होती है वो नारी,
काम करती वो सारे भारी |

मजदूर दिवस हर दिन मनायें,
श्रमिकों का उत्साह बढ़ाये,
देश के हैं ये सही कर्णधार,
देश की उन्नति में इनका हाथ |

   स्वरचित *संगीता कुकरेती*
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नमन भावों के मोती
दिनांक - 01/05/2019
आज का विषय - मजदूर/श्रमिक

मजदूर दिवस पर समस्त मजदूर वर्ग को समर्पित मेरी रचना

         *शोषित मजदूर*

दयनीय हालात,जीता मजदूर ,
सबको  खुश  रखता  मजदूर ,
दिन  -  रात    करके   मेहनत
नरकी जीवन जीने को मजबूर
क्यों शोषित होता मजदूर .....

कितने महल अटारी बनवाएं,
सुंदर - सुंदर   घर   सजवाएँ ,
खुद  खुले  अम्बर  के   नीचे
क्यों  होता  सोने को मजबूर
क्यों शोषित होता मजदूर....

कितने अन्न खाद्यान्न उपजाता,
जन - जन तक उन्हें पहुंचाता,
सब    जन   पेट   भर    खाते
क्यों  खुद  भूख  को   मजबूर
क्यों शोषित होता मजदूर .....

करता काम कल कारख़ानों में,
बीते   रात   कुँए - खदानों   में ,
होकर   शिकार  अपंगता   का
क्यों  भीख  मांगने को मजबूर
क्यों शोषित होता मजदूर ....

जाने  समझे  इनके  हालात,
चले    लेकर   इनको   साथ,
मिले  हक  खून  पसीने  का
इनके  संकट   हो  जाये  दूर
क्यों शोषित होता मजदूर ....

        रचनाकार
   बलबीर सिंह वर्मा
रिसालियाखेड़ा सिरसा(हरियाणा)
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सादर नमन
विधा-हाईकु
विषय-मजदूर/ श्रमिक

करे निर्माण
दूसरों का आवास
बहा पसीना

बाल श्रमिक
बिखरा बचपन
ठहरा भाग्य

श्रमिक तन
करता मेहनत
सोता निढाल
****
स्वरचित-रेखा रविदत्त
1/5/19
बुधवार
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नमन मंच
दिंनाक .. 1/5/2019
विषय .. मजबूर
विधा .. लघु कविता
********************
.....
देखो तो वो मजदूर ही है, जो राष्ट्र बनाने निकला है।
वो नमो मेरा भगवाधारी वो देश बदलने निकला है।
....
आओ उसका सम्मान करे, कुछ हम भी उसका काम करे।
थोडा सा प्रेम हृदय भर नव भारत का निर्माण  करे।
....
सब दर्द मिटा दे भावों से, जो दर्द झलकता है इससे।
मजदूर दिवस है ये तो क्या, मजबूर नही है हम इससे।
...
मन शेर का क्या कहना चाहे, तुम भाव सभी वो पढ लेना।
बेबस तुम ना थे ना हो तुम भाव सभी मे भर देना।
...
स्वरचित एंव मौलिक
शेर सिंह सर्राफ
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दि-1-5-19
विषय -मजदूर /श्रमिक
आज विश्व मई दिवस पर सद्भावना सहित आत्मीय आह्वान --

    🏵        गीतिका       🏵
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        🌺    उपकार    🌺
         आधार छंद- गीतिका
मापनी - 2122, 2122, 2122, 212
 समान्त - आर,पदांत-करिए तो तनिक
🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻

लख किसी मजदूर को ,उपकार करिए तो तनिक ।
सुख मिलेगा यों दुखी को प्यार करिए तो तनिक ।।

दीन , हीन , गरीब भी  तो  बन्धु  हैं  अपने सभी ,
रह सकें  खुशहाल वे,  साकार करिये तो तनिक ।

हो जहाँ श्रम का निरादर, आह निकले हृदय से ,
चीख दब जाये नहीं ,प्रतिकार करिये तो तनिक ।

है  पराया  कौन  जग में  एक सा  सब  में  लहू ,
प्रेम से हों एक , मृदु व्यवहार  करिए तो तनिक ।

साँस गिनती की  मिली हैं ,  बीतती  हैं  जा रहीं ,
याद रह जाये यही, सुविचार  करिए तो तनिक ।।

               🌷🍀🍑🍎🌻🌺

🌻🌷🍀**...रवीन्द्र वर्मा आगरा
                मो0- 8532852618
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नमन मंच🙏
"भावों के मोती"
सभी गुणीजनों को प्रणाम
🙏🌺🌹🌺🌹
विषय-मजदूर
🌺🌹🌺🌹🌺�🌹🌺
मजबूरी हर मजदूर की दिखा रही संताप
जीवन बीता हाड घिसे मिटा नहीं संताप
🌹🌺
पढना लिखना दूर था , पेट तो माँगे आग
बच्चा बच्चा कर रहा मजदूरी व्यापार
🌹🌺
दूर गगन में चमके तारें चादर बना आकाश
धरती बनी बिछौना उसकी देख लिया संसार
🌹🌺
भूखे भेडिये ताक रहे लडकी कैसे करें विकास
दो जून की रोटी के लिये मजदूरी की आस
🌹🌺
मजबूरी इन्सान की नहीं कराती तब भान
भला बुरा कुछ याद नहीं रोटी तो है प्रधान
स्वरचित
नीलम शर्मा#नीलू
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नमन मंच “भावों के मोती “
१-५-२०१९
विषय-श्रमिक

आज "अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस "के उपलक्ष्य में,,,,
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नव निर्मित रचना,श्रमिकों के नाम,,,,,,,

गीतिका "श्रमिक"
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विधाता छंद में,,,( 1222 1222 1222 1222 मापनी)
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तुम्हारे हाथ से निर्मित,,,,,,महल बनते सदा देखा !
श्रमिक को हर व्यथा अपनी,सहन करते सदा देखा!!
🌿
गरम लू के थपेडों में,,,,चले तुम!   काम करने को,
नमन है साहसी तन को,,,,,,,,तुम्हें सहते सदा देखा !!
🌿
गरीबी है बड़ी जालिम,,,,,,,,नहीं सोंचा अमीरों नें,
जिन्होंने छत दिया सबको ,,उन्हें झुकते सदा देखा !!
🌿
ज़रा सोंचो ! ,,किसानों की ग़रीबी वा व्यथाओं को,
अनाजों को बिका कर,फिर चना चुगते सदा देखा !!
🌿
सभी का घर चले तुमसे,,,,,,,यही सब भूल जाते हैं,
सियासत कर रहे नेता,,,,,,कृषक मरते सदा देखा !!
🌿
फटी धोती,फटा कुर्ता,पहनकर जिंदगी कटती,
उधारी पर चले जीवन,उन्हें घुटते सदा देखा //
🌿
महल पापी लगें हमको,,,,,जहाँ ऐय्याशियाँ चलतीं,
हृदय-"वीणा " बहुत रोती,,श्रमिक तपते सदा देखा !!
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रचनाकार-ब्रह्माणी वीणा हिन्दी साहित्यकार
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विश्व मजदूर दिवस पर स्वरचित कविता
नमन- भावों के मोती

जलने दो चिरागों को महलों में

 जाने कब होली है ,कब दिवाली  है।

मजदूर हैं हम, मजबूर हैं हम

 मजदूर की पूरी दुनिया ही काली होती है।।

हम अमीरों के इमारत की नींव है

 अमीरों की तकदीर हैं ।

खून पसीना बहाकर  पूरा करते

अमीरों का सपना।।

मेहनत मेरी लाठी है

मजबूत मेरी काठी है

 हर बाधाओं को हम कर देते हैं दूर

फिर भी दुनिया मुझे कहती है मजदूर।

उखड़ी सांसे थाम -थाम ,सुबह दोपहर या शाम -शाम।

दिन किसी तरह से बीते है ,न जाने कैसे हम जीते हैं।।

बेदर्द वक्त से हार- हार ,चाहत मन की मार -मार ।

बने बेस्वाद कसैले तीते खाते है,  न जाने हम कैसे जीते हैं।।

जिसके हाथों में छाले हैं ,पैरों में पडी बीवाई है।

उसी के दम से अमीरों के महलों में रौनक आई है।।

रोटी कितनी महंगी है ,ये वो  एक औरत बताएगी।

 जिसने जिस्म गिरवी रखकर एक कीमत चुकाई है।।

अमीरों के बंगलों की हर एक निशा भी होती है रंगीली।

फिर हमारे घरों की लाचारी भी उन्हें लगती है जहरीली।।

शहरों की सड़कों पर उन बेबस लाचारो से पूछो

कौन है जिम्मेदार उनके सपनों का उन हरकारों से पूछो।ः

वह  क्या  जाने   स्वतंत्रता   की   सच्ची    अस्मिता को।

उनके   मन  में  भड़कती ज्वाला की भष्मिता से  पूछो।।

क्यों कैद हुए उनके  सपने  अमीरों की  चाहरदीवारी   में।

 चकनाचूर करते हैं गरीबों के गौरव को अपनी रंगदारी मे।

छत  खुला  आकाश  है  ,हो  रहा  वज्रपात  है।

फिर भी हमारे वेदना के तूफानों का घोर दंश भरा संताप है।।

सूरज की तपती तपिश में हथौडा कर रहा प्रहार

माथे पर टपके मेरे सिंहनाद का पसीना फिर भी मजदूर है लाचार।।

अंतिम  पंक्तियां?.......

मंदिरों के बहरे  पाषाण हम अपने  वज्र छाती से तेरी कब्र खोदने आते है।

हटो हमारे गरीबी के व्योम मेघ पंथ से स्वर्ग लूटने हम आते हैं।।

सत्य प्रकाश सिंह केसर विद्यापीठ इंटर कॉलेज इलाहाबाद........
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नमन भावों के मोती
दिनांक:-01/05/2019
विषय:-मजदूर/श्रमिक
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मजदूर हूँ मैं मजदूर हूँ मैं,
सिर्फ उम्मीदों में जीता हूँ,
सपनो की उड़ान उड़ता हूँ,
पेट की भूख मिटाने खातिर,
खुद को नही बेचता हूँ !

तन पर कपड़े फटे हो,
मगर मन विश्वास भरा,
लेकर चलता हूँ सदा मैं,
कंधो पर बोझ जिम्मेदारी का !
दुख हो चाहे कितने भयंकर,
सदा ही मैं मुस्कुराता हूँ !
मजदूर हूँ मैं मजदूर हूँ मैं
सिर्फ उम्मीदों में जीता हूँ !

तपती धरा और गर्म हवा,
ये ही मेरे साथी बने सदा,
तप्त ईंट को ले सर पर,
पत्नी साथ देती मेरा !
मजदूर हूँ मजबूर नही,
आत्मविश्वास में पलता हूँ,
मजदूर हूँ मैं मजदूर हूँ मैं
सिर्फ उम्मीदों में जीता हूँ !

खुले गगन के साये में,
धरती के ही बाहों में,
दिन गुजरते जा रहे,
अब इन पथरीली राहों में !
ऊपर मुख मुस्कान भरा,
पर अंदर से मैं रोता हूँ !
मजदूर हूँ मैं,मजदूर हूँ मैं
सिर्फ उम्मीदों में जीता हूँ!

अभावों की गठरी में ही,
है सिमटा जीवन ये मेरा,
प्रत्यक्ष में जो दिख रहा,
आत्मसंतोष ही है मेरा !
हँसना-मुस्कुराना भूल चुका
लाचारी से अब जूझता हूँ,
पर हूँ मजबूत बहुत,
मेहनत के आँसू पिता हूँ !
मजदूर हूँ मैं मजदूर हूँ मैं,
सिर्फ उम्मीदों में ही जीता हूँ !

रचना:-राजेन्द्र मेश्राम "नील"
चांगोटोला, बालाघाट ( मध्यप्रदेश )
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1मई2019
श्रमिक/मजदूर
💐💐💐💐💐
नमन मन्च।
नमन गुरुजनों, मित्रों।

दिन,रात करता मेहनत,
पसीना बहाता खेतों में।

फिर भी घर का खर्चा नहीं चलता,
जीता वो बदहाली में।

आधे पेट खाकर रहता,
फ़टे वस्त्र पहनता।
सुबह,सवेरे हल,बैल लेकर,
खेतों में है जाता।

कड़ी धूप में काम करता,
कभी नहीं है थकता।

जब वो अन्न उपजाकर देता,
हमारी थाली में है रोटी आता।।

सबके यहाँ होते महल,दुमहले,
झोपडी में है वो रहता।

खुद का पेट नहीं है भरता,
पर वो अन्नदाता कहलाता।।

स्वरचित
वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी
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1भा.1/5/2019/बुधवार
बिषयःःः #श्रमिक/मजदूर#
विधाःःःकाव्यःःः

 श्रम सिंचित सा मेरा तन है।
    कठोर बना सच मेरा मन है।
       मैं मजदूरी से क्यों घबराऊं ,
          जब मजदूरी मेरा जीवन है।

  जैसे बसन मुझे मिल जाऐं,
     वैसे ही धारण कर लेता हूँ।
         रुखा सूखा जो मिल जाऐ,
            सच वही गृहण कर लेता हूँ।

 श्रम करने से नहीं डरता हूँ।
   मैं मजदूरी से नहीं डरता हूँ।
      हर व्यक्ति मजदूर यहां पर,
         कुछ चोरी तो नहीं करता हूँ।

निद्रा हमें चैन से आती है।
  भिक्षा तनिक नहीं भाती है।
     खूब पसीना मजदूर बहाते,
         तब रोटी इनके घर आती है।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
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भा.1*#श्रमिक /मजदूर#
काव्यः ः
1/5/2019/बुधवार


मंच को नमन
स्वरचित
विषय-मजदूर
विधा-पद्य (हास्य व्यंग)

दुनिया में आए तो,
जवानी होनी चाहिए।
खानदानी खून की,
रवानी होनी चाहिए।।

भूंखा ग़रीब एक ,
रोटी को तरस रहा।
नेताओं को मुर्गा,
बिरयानी होनी चाहिए।।

शास्त्रों में गऊ माता,
गाय को कहा गया।
सांड को भी पापा की,
उपाधि होनी चाहिए।।

आदमी जब पैदा हुआ,
बकरी का दूध पिया।
बकरी भी फर्स्ट गॉड,
मदर होनी चाहिए।।

बेचारा मजदूर दस,
मंजिला बनाए कोठी।
सिर पर गारा ईंटे ,
लदी होनी चाहिए।।

नज़रें झुकाए हाथ
जोड़ कर मांग रहा।
बाबूजी थोड़ी सी,
मेहरबानी होनी चाहिए।।

बिटिया जवान हुई,
हाथ पीले कर देता,
बाबूजी दिहाड़ी थोड़ी,
और होनी चाहिए।।

बेचारे की माँ फटी,
साड़ी को लपेटे फिरे।
फैशन अमीर माँ की,
न कम होनी चाहिए।।

अमीरों की कोठियां,
दूर से चमक मारें।
झोपड़ी ग़रीबों की
रिसती होनी चाहिए।।

अमीरों की बेटियां,
डेट पर जाएं जहाँ।
ग़रीब की बिटिया में,
शरमो हया होनी चाहिए।।
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--गीतकार-राज़ बदायूँनी
बाजार कलां उझानी
बदायूँ(उ.प्र)
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नमन भवों के मोती💐
दिन:- बुधवार
दिनाँक:- 1-5-2019
 विषय:-   मजदूर
विधा:- मुक्त
       " मजदूर दिवस को समर्पित "

नहीं सहेजें
बर्षा जल जो
ग्रीष्म ऋतु के आते।
खोदें गड्डे, पीते पानी
लालच में पेड़ों को काटें।
नहीं बचा जल
जीने के हैं लाले
घर बैठे
मजदूरी भी मारे।

स्वरचित:
डॉ.स्वर्ण सिंह रघुवंशी
गुना(म.प्र.)
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नमन "भावों के मोती"
आज का विषय-श्रमिक/ मजदूर
01/05/19
बुधवार
कविता

मेहनतकश  को  हुनर  सदा  प्राणों से प्यारा,
उससे  ही  चलती  है  उसकी  जीवन  धारा।

प्रातःकाल  सभी    यंत्रों   की   पूजा  करता ,
अनगढ़  चीजों से  वह  सुन्दर साधन गढ़ता।

खून-पसीना बहा वह   दिनभर मेहनत करता,
फिर  भी सबके साथ वह हँसता ,बातें करता।

इतनी  मेहनत  पर भी जीवन शाप  है इसका,
भूख,  गरीबी  का  रहता  संताप   है  इसका।

इसकी   कला  घरों  को नव आकार में लाती,
जीवन  यापन  के   साधन  उपलब्ध  कराती।

पर  इसके श्रम का  कुछ भी न मोल है लगता,
कोई   अंतर   की  पीडा  को  नहीं   समझता।

काश  इसे भी  जीवन  के  साधन  मिल जाएँ,
जैसे  सब  सुख   पाते , वैसे  यह   भी   पाए।

स्वरचित
डॉ ललिता सेंगर
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नमन मंच को
दिन :- बुधवार
दिनांक :- 01/05/2019
विषय :- श्रमिक/मजदूर

मैं ऊँचे ऊँचे महल बनाऊँ..
खुले आसमां तले रैन बिताऊँ..
खाकर गुड़ चना ही भले..
मेहनत से अपनी क्षुधा बुझाऊँ..
श्रमिक हूँ मैं जन्मों से..
श्रमिक हूँ मैं कर्मों से..
धूप,ताप मुझे न डिगाए..
दृढ़ हूँ मैं संकल्पों से..
स्वेद रत्न ही आभूषण है..
मंहगाई भी खर दूषण है...
आत्मसम्मान से जीना सीखा..
मानते मुझे लोग प्रदूषण है..
करता न कोई सम्मान मेरा..
करता सदा अपमान मेरा..
कागजों पर करे सब सम्मान..
मेहनत ही है ईमान मेरा...
भरता पेट सदा अपनों का..
लगाता पैंबद सपनों का..
मेहनत का मैं पर्याय हूँ..
मैं हूँ सौदागर सपनों का...

स्वरचित :- मुकेश राठौड़
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मजदूर दिवस को
समर्पित
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तोड़ती गिट्टी
पीठ पे बंधा बच्चा
लू झुलसाये।।

फूलती सांसें
चलाता वो फावड़ा
रोटी के वास्ते।।

कड़क मेट
हाथ लिये चाबुक
वो खाली पेट।।

धूप या वर्षा
लगेगी जब प्यास
खोदेंगे कुआं।।

फ़टे कपड़े
दिखते अंतः अंग
घूरे मालिक।।

काम जीतोड़
आराम भी हराम
मिले न दाम।।।

राजनयिक
बने जन बधिक
रोते श्रमिक।।

तपता सूर्य
निढ़ाल मजदूर
पैरों में छाले।।

भावुक

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नमन मंच
01/05/19

दोहावली
***
श्रमिक/मजदूर
***

दो पैसे की चाह में,  छोड़े अपना गाँव ।
दर दर ठोकर खा रहे ,पेड़  तले है ठाँव।।

कड़ी धूप मे श्रम करें ,थक कर होते चूर ।
शहरों के फुटपाथ पर ,सो जाते मजदूर ।।

हाड़ माँस पुतले बने ,चिपक पेट अरु पीठ  ।
घर खरचा कैसे चले , नींद न लेते मीठ ।।

उचित मोल इनको मिले , तो  सुधरे  हालात।
नेता सब  वादे करें ,    पूरी  करें  न  बात ।।

श्रमिक दिवस में आज भी ,वैसे ही मजबूर ।
अवकाश सब मना रहे ,काम  उसे मंजूर ।।

राष्ट्र के निर्माण में ,अद्वितीय योगदान।।
कर्तव्य निर्वहन करें ,दे इनको सम्मान ।

कारखाना !जीवन ये , हम सब हैं मजदूर।
परिश्रम का महत्व समझ,करें काम सब पूर ।।

स्वरचित
अनिता सुधीर

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"भावों के मोती
शीर्षक___मजदूर
दिनाँक___01/05/2019
"एक कोशिश "
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हाँ मैं भी मजदूर हूँ
श्रमिक हूँ मेहनतकश हूं
नहीं मैं मजबूर हूँ
मेहनत की खाता हूँ
मेहनत ही मैं करता हूँ
भीगता हूँ पसीने से
मैं धूल मिट्टी से संवरता हूँ
हाँ मैं भी मजदूर हूँ
हाथों में किताबें नहीं
पर दिमाग में ज्ञान है
गये नहीं स्कूल हम
पर अनुभवों की खान हूँ
हाँ मैं भी मजदूर हूँ
ईमान है गहना अपना
परिश्रम है धन अपना
तुम्हारे बना महल
फुटपाथ पर रहता हूँ
हाँ मैं भी मजदूर हूँ
मजदूरदिवस बनाकर
उत्सव मेरा मना रहे हो
दूर हूँ मैं ही इससे
यह कैसी खुशी दे रहे हो
अधिकार बनाओ मेरे
मुझको सम्मान दिला दो
फकीरी की है फितरत
तकदीर की मार हूँ
हाँ मैं भी मजदूर हूँ
----नीता कुमार(स्वरचित)
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नमन"भावो के मोती"
01/05/2019
"श्रमिक/मजदूर"
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मैं मजदूर.....
करके दिनभर मजदूरी
खाता ईमान की रोटी
नहीं तोडता हाराम की रोटी
चाहे पेट भरता थोड़ी-थोड़ी।

मैं मजदूर........
कड़कती सर्दी हो..
या चिलचिलाती धूप हो
चिथड़ों में झाँकती गरीबी हो
हौसलों से न मजबूर हूँ।

मैं मजदूर........
मँहगाई की मार झेलता
रुग्णता है वदन का अंग
पसीने से तर-ब-तर तन
है बाजुओं में सच्चाई की ताकत।
मैं मजदूर........।।

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल
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नमन भावों के मोती 🌹🙏🌹
01-5-2019
विषय:-श्रमिक विधा :-दोहा

रोटी बाँधी पोटली ,  हुआ श्रमिक तैयार ।
जीर्ण पैंट क़मीज़ पहन ,  जाता ढोने भार ।।१।।

सेवा का जो मूल्य ले , बनते श्रम आधार ।
श्रमिक   तपस्या मानता , बनता सेवादार ।।२।।

शारीरिक श्रम जो है करे , कहलाता मज़दूर ।
सारे दिन का परिश्रम , करे  हड्डियाँ चूर ।।३।।

श्रम सीकर मोती लगें , श्रमिक करे अभिमान ।
नमस्कार मजदूर को , उसको दो अधिमान ।।४।।

सब मज़दूरी कर रहे , चाहे है सरकार ।
पत्नी करती चाकरी , पति देखे  परिवार ।।५।।

मज़दूरी को श्रम कहें , कृष्ण कहें हैं कर्म ।
ईश्वर का विंधान यही , श्रम पूजा ही धर्म ।।६।।

सभी जीव श्रमसाध्य हों , रख लें बुद्धि विवेक ।
पूजा समझे कर्म को , मिलते पुण्य
अनेक ।।७।।

कर्मशील हर व्यक्ति को , करिए नमन जरूर ।
नारी करती श्रम जहाँ , ईश न होता दूर ।।८।।

स्वरचित :-
ऊषा सेठी
सिरसा  125055 ( हरियाणा )
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सदर नमन मंच
आज का कार्य--श्रमिक
विषय--- -मजदूर
श्रमिक दिवस की हार्दिक बधाई हम सभी को।
**********************************************
जब भी छोटे बच्चों को सड़कों पे घूमते देखती हु।
पेन,क़िताब हाथो में डायरी लिए फिरते देखती हूँ।
**
सच कहती हूँ देख के उनको मन आहत हो जाता है।
इन मासूमों का सपना भी कहीं तो ग़ुम हो जाता है।
***
थक जाता होगा ये नन्हा दिन भर ईंटे ढोता ढोते!,
देखा है ढाबों पर अक्सर दिन भर बर्तन धोता है।
**
दो रोटी के लालच में दिन भर ये खटते रहते हैं!
तब जा करके शाम ढले इनको दो रोटी मिलते हैं!
**
करवाते मज़दूरी दिन भर तनिक दया न आती है।
निष्ठुर हाथों से हर पल वो इन्हे सताते रहते है।
**
बाल मजदूरी वर्जित है फिर भी हमने ये देखा है।
ढाबे दुकानों पर इनको हर पल खटते देखा है!
**
वो दबंग इंसान है जो क़ानून को धत्ता बतलाते ।
निज़ दौलत के बल पर वो सजा से वरी हो जाते हैं!
**
बाल दिवस पर चर्चा करके झूठी आहें भरते हैं।
उन बच्चों के हित में हम कहाँ कभी कुछ करते है।
**
बाल श्रमिक निषेध दिवस पर यही संकल्प उठाओ
ज़ालिम हाथों से हर एक मासूम को मुक्त कराओ।
@ मणि बेन
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नमन मंच को
शीर्षकांतर्गत द्वितीय प्रस्तुति

जिनके हौसलों के आगे...
दम तोड़ती है चट्टानें..
जिनकी मेहनत के आगे..
नस्तमस्तक हो पहाड़..
जिनके तन से..
होता स्त्राव स्वेद का..
है वही तो..
शिल्पकार सृष्टि का..
श्रम जिसका अपरिमित..
कोई नहीं इनसे अपरिचित..
निर्जन को करे आबाद..
हौसलों से लिखे इतिहास..
श्रम में न शर्म करे..
भले धूप कितनी गर्म करे..
चीर वसुधा का सीना..
सुखद करे सबका जीना..
उद्घृत करता अन्नकण को..
संतुष्ट करे जो जन-गण को..
सदा संयमित रखे विचार..
श्रम ही है उसका आधार..
ईमान इनका डोले न..
अपशब्द कभी बोले न..
सहता रहे हर अपमान..
न माँगे कभी सम्मान..
श्रम ही उसका सम्मान है..
श्रम ही उसका प्रमाण है..
श्रम मेव जयते..
श्रम ही सदा विजयते..

स्वरचित :- मुकेश राठौड़
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मजदूर को समर्पित ये मेरी रचना
"मजदूरी"
डरी हुई, घबराई सी
बड़ी दूर से आई थी
एक आवाज थी थकी हुई,
एक आवाज थी दबी हुई,
मशीनों से झुलझी हुई
मालिकों से कुचली हुई,
गरीबी का दंश झेलती
पृकृर्ती का रंज ठेलती,
बेचारी ये मजदूरी
मजबूर ये मजदूरी।

चिलचिलाती धूप में
पसीने से नहाई हुई,
परिवार का पेट भरती
सूदखोरों की जेब भरती
जिंदगी से रोज लड़ती
ये कारखानों वाली मजदूरी।

धुप में जलती,
बारिसों में भीगती
पूरी दुनियां में,
लोकतंत्र से प्रश्न करती
ये काश्तकारों वाली मजदूरी।

बर्तनों को साफ करती
ये काम वाली मजदूरी,
गंदे नालों में उतरती
अंजाम देती मजदूरी,
विकाश के नाम पर
नेताओं की जुबान पर,
देखता हूँ रोज बिकती
ईमान वाली मजदूरी ।

गजब की इंसानियत है
गजब का है ये ऊँचा इंसान
खुदगर्ज, स्वार्थ का पुलिंदा
मन में केवल झूठा अभिमान,
और जिसके नीचे भी
है एक दूसरा भी इंसान,
जिसके सपना नहीं, अनुमान नहीं
नफा नहीं, नुक्सान नहीं,
आँखे केवल हुक्म की फरियादी
छूट चुके सारे अभिमान,
इसी दूसरे इंसान का
अभिशाप है ये मजदूरी,
इसी दूसरे इंसान के
साथ है ये मजदूरी ।

गरीबी का दंश झेलती
पृकृति का रंज ठेलती
परिवार का पेट भरती
सूदखोरों की जेब भरती
जिंदगी से रोज लड़ती
बेचारी ये मजदूरी,
मजबूर ये मजदूरी।।

श्रीलाल जोशी "श्री"
तेजरासर,बीकानेर
(मैसूर)9482888215
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नमन मंच को 🙏🙏
दिनांक _1/5/2019
विषय _श्रमिक /मजदूर
विधा _कविता
🍁🍁🍁🍁🍁

कैसे दूं बधाई

कैसे दूं बधाई!!
ईंट,  भट्टी में तपकर भी
कर रहे जो, भवन निर्माण।
ख्वाहिशों की फटी चादर  को
उम्मीदों के धागों से सी लेते हैं
जिंदगी में इनके सौ वजह हैं रोने के
एक बहाने पे हंस के जी लेते हैं।
तुम्हीं कहो,  कैसे दूं बधाई.....
बंधुआ मजदूरी से इनको निजात कहाँ
मुक्ति कब मिले जाने गुलामी से
हकदार नहीं कि आंखों में ख्वाब पालें
ख्वाहिशें लापता हो गयीं,  चले जहाँ रोटी बुलाए
कहो तो दे दूं मजदूर दिवस की बधाई....
जब भी नयी सत्ता के आने की बात हो
चमक जाती आंखें इनकी,  बढ़ जाती हैं उम्मीदें
झुठा ही सही थाली में रोटी नजर आती है।
चलो,  सब मिलकर,  दे दें....
मजदूर दिवस की हार्दिक बधाई
🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁

तनुजा दत्ता (स्वरचित)
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नमन         भावों के मोती
विषय        मज़दूर
विधा          कविता
दिनांक       1मई 2019
दिन            बुधवार

मज़दूर
🎻🎻🎻🎻

भयंकर लू में भी अपना काम करते हैं
ठिठुरती सर्दी में अपनी शाम करते हैं
काम करते हुए जैसी भी ज़गह मिल जाये
ये वहीं थक कर विश्राम करते हैं।

चलते हुए इंजन का गरम स्वभाव
अपने आसपास दिखता मशीनी बिख़राव
मशीनों की उलझी टेडी़ मेढी़ ठाँव
कहाँ मिल पाती इनको शीतल सी छाँव।

बिजली के ऊँचे खम्बों की चढा़ई
मौसम कहाँ बरतता इनसे ढिलाई
जनवरी की बेरुखी और जून का ताप
कौन कर सकता इनके कौशल की माप।

मज़दूर देता प्रगति को गति
मज़दूर असंतुष्ट यानि भीषण क्षति
मज़दूर ही जब  श्रम कुशल करता
योजना बनती एक अनुपम कृति।

मज़दूर !कुशल निर्माण के हिस्से हैं
इनमें हमारी प्रगति के किस्से हैं
जब तक हर हाथ के पास काम न हो
लुभावने आश्वासन केवल घिस्से हैं।

स्वरचित

सुमित्रा नन्दन पन्त
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नमन भावों के मोती
बुधवार/1-5-19
विषय-मजदूर
विधा --कविता

मजदूर का आत्म कथ्य
*********************
हमने युगों युगों का इतिहास लिख दिया।
तुम पढ़ नहीं सको ,तो हमारा है दोष क्या।

हमारी साँस धूल से सनी हुई जो है।
देखते हो ये सड़क ,बनी हुई जो है ।

बांध की ऊंचाइयों पर हम चढे सदा।
हर नदी का पुल हमारी पीठ पर सधा।

ये तार जिनसे दौड़कर,प्रकाश हो रहा।
मेरी भुजा का हर कहीं एहसास हो रहा ।

खेत की मिट्टी में हमारा ही बीज है।
ये कौन कह रहा कि ,हम गंदे गलीज हैं ।

ऊंचे भवन जो बन रहे हैं ,इस तरफ हुजूर।
हमको वहाँ ढूंढिए मिलेंगे हम जरूर ।

हर तरफ हम दीखते,पर हैं नहीं मशहूर।
नींव के नजदीक हैं,कहते हमें मजदूर।
कहते हमें मजदूर।।
कहते हमें मजदूर।।।

*****स्वरचित**********
    प्रबोध मिश्र 'हितैषी'
बड़वानी(म.प्र)451551
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"नमन भावों के मोती'
01 /05 /19 --बुधवार
आज का शीर्षक-- "श्रमिक/मजदूर"
==========================
"नज़्म" --"मई दिवस"
-------------
मजदूर को पुकारने, ..  आया मई दिवस,
कुछ गलतियां सुधारने, आया मई दिवस।
जिनकी वज़ह से, . धर्म युद्ध हार गए हम,
उन शत्रुओं को मारने, .  आया मई दिवस।
पूँजी के चक्रव्यूह में,.  फंसा है अपना हक़,
वो चक्रव्यूह उखाड़ने,. . आया मई दिवस।
जिनके लहू ने बख्शी है, हमको ये रंगीनी,
उनका करज उतारने, .  आया मई दिवस।
ये हाथ ही, इस देश की तक़दीर हैं सुनलो,
सत्ता का मद उतारने, आया मई दिवस।
मेहनत की रोटियों पे,जो रखते बुरी नज़र,
उस नज़र को ललकारने,आया मई दिवस।
========================
"दिनेश प्रताप सिंह चौहान"
(स्वरचित)
एटा --यूपी
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नमन- मंच
मुक्तक
वार-बुधवार
तिथि-1मई19
मजदूर

श्रम से ,कभी नहीं घबराता मजदूर
अपनी मेहनत पर ,कऱता सदा गुरूर
फिर भी वो जूझता ,हरदम गरीबी से
रहता ,पाई पाई के लिए सदा मजबूर ll

स्वरचित
गीता लकवाल
गुना(मध्यप्रदेश)

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,नमन मंचः"भावों के मोती"
बुध.,दि.01/5/19.
विषयःश्रमिक/मजदूर

घनाक्षरीः
*
भौतिक प्रगति के ,समृद्धि-साधना आधार,
श्रम - साधना  की , अभिनंदना अजय हो।
शक्तिमान  श्रम  के , चरण   गतिमान   रहें,
गढ़ें  सभ्यता  के  , कीर्तिमान  शिवमय हो।
नर - नारियों  का  समवेत , श्रम - योगदान,
विश्व  - वंद्य   बने , श्रमजीवी  सुखमय  हो।
शोषण - प्रवंचन से , मुक्त हो श्रमिक - वर्ग,
धरा बने  स्वर्ग विश्व - मानव  की  जय हो।।

              -- स्वरचितःडा.'शितिकंठ'
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नमन  मंच
1/5/2019
बुधवार
विषय -मजदूर /श्रमिक

क्या  लिखने  भर
से  मजदूर  दिवस
साकार  होगा
लिखा  तो  सदियों
से  जा  रहा  है
और आगे  भी
लिखा  जायेगा
किन्तु क्या  श्रमिक
को  कभी  उचित
मजदूरी  दिलायेगा
दिन  -हीन  की
भावना  से  क्या
वो  ऊपर  उठ  पायेगा
ओला, उबर वालों
को  हम  खूब  पैसे देते
किन्तु  रिक्शा  वाले
से  करते  मोल  भाव
बड़ी -बड़ी  दुकानों  से
महंगे  फल लेते
किन्तु  ठेले  वालों
से  करते  चिक-चिक
कैसे  जाये  चीजे  सारी  बिक
ठेकेदार के  होते  ठाठ -बाट
मजदूर  के  कौन  पूछे  हालात
डिजिटल  इण्डिया
कहीं  मार न  डाले
मजदूरों  के  पेट  पर  लात
आओ  मिलकर  बदले
मजदूरों  के  हालात
स्वरचित
शिल्पी  पचौरी
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भावो के मोती
विषय- मजदूर
विधा - ताटक छंद
दिनांक- 01/05/2019
वार - बुधवार

विधा - ताटंक छंद!
विधान – ३० मात्रा, १६, १४ पर यति !
कुल चार चरण, क्रमागत दो-दो चरण तुकांत !अंत मे वर्णिक भार २,२,२ !

रुग्ण मजदूर आहत जीवन, घर में बच्चे भूखे है!
शोषण की भीषण चिंगारी ,झेल रहे तन रूखे है!
पेट पालना मुश्किल होता , मिलती नही मजूरी है!
मँहगी है खाने की चीजे , दौड़ धूप मजबूरी है !!

कच्ची कुटियाँ पानी टपके , छप्पर हुआ पुराना है!
आधे कपड़े फटे हाल सब , तरसे देख जमाना है!
रोज सवेरे लाला आकर , कर्ज मांग दुत्कारे है !
कैसे जीना जाल घनेरा, दर्द भरी चित्कारे है !!

नार बाँध पीछे बच्चे को , काम सदा ही जाती है!
जोखिम में नर खुद को डाले,तो रोटी मिल पाती है!
शोक मोज वैभव की दुनियाँ, इष्ट वर्ग की थाती है!
विवश प्राण मे जलती रहती ,घृणा क्रोध की बाती है!!

लगता ऐसा सूट बूट में, जन्मे वो अविनाशी है !
श्रमिक वर्ग सिर धरी तगारी,नोकर बने सियासी है!
ईट शैल ऊँची दीवारे, सोचो कहाँ बिमारी है!
पेट भरे नित मजदूरों का,यही कामना प्यारी है!!

हुई प्रगति सारी दुनियाँ में, मजदूरों का कंधा है!
शोषण करके महल बनाये, शोषक करता धंधा है!
नियम बने है धनवानों हित, डाल रहे नित फंदे है!
न्याय व्यवस्था ऊँची मंजिल,निर्धन छोटे बंदे है !!

शिक्षा सुविधा खान पान की , बच्चा सबकुछ  पाता हो!
वर्ग भेद की छुट्टी कर दो , श्रमिक न्याय मिल जाता हो !
शोषण धारा के वीरों का , बुरा अंजाम आएगा!
भूखे नंगों की दुनियाँ में, कोलाहल मच जाएगा!!

छगन लाल गर्ग विज्ञ!

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नमन मंच को
विषय : मजदूर
दिनांक : 01/05/2019

मजदूर

माटी से मैं दिन भर खेलूं,
सर्दी गर्मी सबको झेलूं।
ना अधिक पाने की खुशी,
न है डर कुछ भी खोने का,
सच कहता हूँ गर्व है मुझको,
अपने मजदूर होने का।
न मैं करता चोरी चकारी,
न गद्दारों संग है यारी।
जी चुराउं न किसी काम से,
मेहनत ही लगे मुझे प्यारी।
लंबी तान के सोता हूँ मै,
लोभ न किसी बिछौने का,
सच कहता हूँ गर्व है मुझको,
अपने मजदूर होने का।
न मैं हिंदू, ना मैं मुस्लिम,
ना मेरा कोई मजहब धर्म ।
हाथ फैलाना सीखा ही न,
करता हूँ निष्ठा से कर्म ।
जाप करूं भगवन का बैठे,
अच्छा है बोझा ढोने का,
सच कहता हूँ गर्व है मुझको,
अपने मजदूर होने का।
ना मैं मारूं हक किसी का,
न मैं करता हेराफेरी।
उंचे उंचे ख्वाब न दिल में,
अच्छी गुजर रही है मेरी।
मन में है संतोष भरा बस,
सुख चैन से सोने का,
सच कहता हूँ गर्व है मुझको,
अपने मजदूर होने का।
अपने मजदूर होने का।

जय हिन्द
स्वरचित : राम किशोर, पंजाब ।
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"नमन-मंच"
दिंनाक-१/५/२०१९"
"श्रमिक/मजदूर"
याचना जिसे आता नही
दया का जो पात्र नही
निमग्न है जो अपने कर्मों में
वह है श्रमिक,श्रम करें भरपूर।

जिसके चेहरे पर शिकन अनेक
माथे पर जिसके स्वेद कण
कह दे बहुत कुछ, बिना कुछ कहे
वह है श्रमिक,श्रम करें भरपूर।

अदम्य साहस, कौशल व लगन
है सहचर जिसका सदैव
इच्छा, अभिलाषा से जो कोसों दूर
वह है श्रमिक,श्रम करें भरपूर।

आजीवन रहे जो संर्घषरत
सुबह ओ शाम,बस काम ही काम
अपनी इच्छा का जो करें ना मोल
वह है श्रमिक,श्रम करें भरपूर।

अफसर नही बन पाते जो
रह जाते बस बनकर मजदूर
ऐसे है हमारे श्रमिक वर्ग
हम उन्हें सम्मान दे भरपूर
स्वरचित-आरती-श्रीवास्तव।

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शुभ मध्याह्न , मित्रों
भावों के मोती
मंच को नमन
दैनिक कार्य
स्वरचित लघु कविता
दिनांक 1.5.19
दिन बुधवार
विषय श्रमिक
रचयिता पूनम गोयल

है बात समय -समय की
कि किसी ने की ,
करके अत्याधिक श्रम ,
बहुत थोड़ी-सी कमाई ।
तो किसी ने
क्षणभर में ही ,
तुच्छ आनंद हेतु
अपनी क़ीमती दौलत लुटाई ।।
श्रम करके ,
श्रमिक कहलाना ,
है बहुत गौरव की बात ।
एवं अपने परिवारजन हेतु ,
आजीविका कमाना ,
नहीं कोई शर्म की बात ।।
बहाकर पसीना ,
शरीर का ,
प्राप्त होता
अल्प मात्रा में धन ।
फिर भला कोई
क्यों न करे ?
स्वयं पर गर्व ।।
धन-लक्ष्मी का
करें मान सभी ,
क्योंकि परिश्रम से कमाई जाती ।
इसकी उपयोगिता
जीवन के , प्रत्येक क्षेत्र में
देखी जाती ।।
श्रम करो ,
श्रमिक बनों ।
एवं आगे ही ,
आगे बढ़ो ।।
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शुभ साँझ 🌇
नमन "भावों के मोती"🙏
01/05/2019
   छंदमुक्त कविता
विषय:-"मजदूर"

जिसके हिस्से मौसम का,आया एक ही रूप,
रोज कुआं खोद पानी पीते,हाथ में आई धूप,

श्रम का हो मोल भाव, तिरस्कार कभी खूब,
परिश्रम की चक्की में पिसती जाती भूख,

क्या बूढ़ा, क्या बचपन जब पेट करे  मजबूर,
हाथों में बस मिट्टी है, और चाँद बहुत है दूर,

श्रम को बस सम्मान मिले हर लेंगे हर शूल,
शोषण न हो अधिकार मिले दुःख जायेंगे भूल l

स्वाभिमान की जिंदगी, स्वेद हैं श्रम के फूल
छोटी-छोटी खुशियों में बस जीता है मजदूर l

स्वरचित
ऋतुराज दवे
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मज़दूर
मज़दूर दिवस
मज़दूर दिवस

मज़दूर दिवस पहचान बना है श्रम बलिदान का,
कर्म करना ही पहला धर्म हो, हर एक इंसान का,
न जाने क्यों हीन दृष्टि से देखा जाता है मज़दूर,
जब हर इंसान मज़दूर है, अपने अपने काम का !!
!
डी के निवातिया
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दर्द में भी हरदम मुस्कराता हूँ
मजदूरी ना मिले तो फिर भी नहीं घबराता हूँ
भूख ने मुझे जिंदगी के कई रंग दिखा दिये
हाथों में कुदाल और सर पर तसला हैं .

काम ज्यादा करता हूँ
मिलती मजदूरी कम हैं
कैसे बताऊं मैं मजदूर अपना गम
सबके लिये बानाता हूँ सपनों के महल
रहता हूँ घास की झोंपडी में .

रहता हूँ कई दिन भूख और प्यास से
लेकिन फिर भी मन में जलाता हूँ उम्मीद की आस
हज़ारों तमन्नायें हैं मेरे मन में
शाम को कुछ बेहतर मिलेगा यही सोचकर मैं मजदूर मजदूरी करने चल देता हूँ .

मैं मजदूर हूँ कोई मजबूर नहीं
अपनी मेहनत के बल पर आगे बढ़ता हूँ
जीता हूँ शान से अभिमान से
करके मेहनत दो जून की रोटी कमाता हूँ .

खाता हूँ रूखी सूखी
गाता हूँ राम भजन
रहता हूँ मग्न
जीता हूँ आत्मसंतोष का जीवन .
स्वरचित:-  रीता बिष्ट

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नमन मंच
विधा-हाइकु
विषय-श्रमिक
दिनांक-1मई 2019

बचपन से
भाल पर लकीर
मजदूर के।

नंगे बदन
बचपन बिताया
दयनीय था।

चहेरे पर
युगों का खालीपन
ढीला जबड़ा।

मेहनत की
मूक निराश छवि
खाली उदर।

शक्ति स्वरूप
ईश्वर की रचना
क्या ऐसी ही है ?

निराशा भरा
तमयुक्त जीवन
रहा सदैव।

शान्त खामोश
पर धधकी आग
बन खतरा।

सूखा काँटा-सा
संग्राम को तैयार
जागा शोशित।

शासक सोचे
विद्रोह की चिंगारी
भड़क उठी।

युग नूतन
अब मजदूर का
हिला शासन।

राकेशकुमार जैनबन्धु
गाँव-रिसालियाखेड़ा,सिरसा
हरियाणा

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नमन भाव के मोती
दिनांक 1 मई 2019
विषय- मजदूर /श्रमिक
विधा- कविता

हांड मांस युक्त मेरी काया
मजबूत जिगर हमने  पाया
मेहनत कर्तव्य मुझे भाया
स्वेद जल से रहा नहाया

मजबूर हुआ पर न घबराया
खुशियों पर कभी न इतराया
संघर्षों पर अफ़सोस न आया
कर्मों पर मुझे रोष न भाया

तेज धूप में गया तपाया
सर्दी बारिश में इठलाया
मजदूरी को भी गया तड़पाया
पर उफ़्फ़ तलक न भाया

अट्टालिकाओं को चमकाया
सौंदर्य का रूप दिखाया
विकास की ज्योति जलाया
कर्मशील श्रमिक का कर्तव्य निभाया

जीवन पथ से न घबराया
अपने घर का मान बढ़ाया
परिवार का दायित्व निभाया
मैं मजदूर अनोखा भाया

©स्वरचित
मनीष श्री
रायबरेली

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नमन भावों के मोती नमन  आ0 अनुराधा नरेन्द्र चौहान जी

आज का कार्य श्रमिक

मजदूर /श्रमिक

होता है जो संसार में सबसे अधिक मज़बूर।
कहलाता है ही बेचारा इस संसार में मज़दूर।।

करते अधिकतर जन उस लाचार का शोषण।
होता नहीं उसका व उसके परिवार का पोषण।।

पहले तो थी नहीं उसके काम की कोई सीमा।
पर फिर की गई निश्चित आठ घन्टे की सीमा।।

होता है वही इस संसार में सबसे अधिक लाचार।
सहन करता है वह बेचारा सब ही का अत्याचार।।

करता नहीं परिश्रम मुंह चलाता है जो मुहजोर ।
कहता है वही परिश्रम करने वाले को कामचोर ।।

रख कर सिर पर  अपने ले जा रहे है कितना बोझ।.
रक सकते जितना उससे अधिक लादा जाता बोझ।।

डा0 सुरेन्द्र सिंह यादव
“व्यथित हृदय मुरादाबादी
स्वरचित
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मजदूर
01.05.19

श्रमिक

श्रमिक मैं तुम पर कभी,
कलम चला नहीं पाई ।
कलम भी हठी हो गई,
मगर स्याही सूख नहीं पाई।

 कैसे लिखू तुम्हारी कथा?
 दर्द भरी है तुम्हारी व्यथा।
 तन पर नहीं तुम्हारे कपड़ा।
 गर्मी सर्दी तू ही तड़फा।

गर्म हवाएं तपती धरा,
 नंगे पैर तू ही चला ।
तपती ईंटों को सर धरकर,
गुनगुनाता है फिर भी भला ।

खुले आसमान में सोता है,
ना एसी और कूलर भला।
 ठंडा पानी भी नहीं मिलता,
 सूख जाता है तेरा गला।

 कितने महल तूने बनाए ,
तुम्हारे नसीब में छत न आए।
 खुले अंबर नीचे सोकर ,
कितनी ही तू रात बिताए !

कौन समझेगा तू है लाचार।
 सोई हुई है हमारी सरकार।
मेहनताना जब नहीं मिलता है
रोता है तू तार तार।।

एमके कागदाना
 फतेहाबाद हरियाणा

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नमन "भवो के मोती "
01/05/2019
" मजदूर "

मेहनत कहे मजदूर से साँचा सुख बटोरा
तन का सुख न देख बंदे मन मेहनत संग खिल जाये

 क्यों रोये ?क्यों बौराये, खुशियाँ उपजे आँगन तेरे
देख ! दौड़ा चक्र समय का, मेहनत बन फूल जीवन तेरा महकाये

कर्म ने दिया थपेड़ा ,मेहनत तेरा हथौड़ा
थाम हाथ मेहनत का, जीवन खुशबू बन खिल जाये

कर्म  दौड़ेगा   राह में तेरे  , मेहनत से  हाथ मिला
सोना बन चमकेगा सब मीत बन सीने से तुझे लगाये
स्वरचित -
 अनीता सैनी
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नमन भावों के मोती ,
विषय , श्रमिक , मजदूर ,
बुधवार ,
१,५,२०१९ ,

हर सिक्के के दो पहलू होते ,

लोग इसी को दुनियाँ कहते ।

धूप छाँव का चले सिलसिला ,

जो तपा धूप में चैन से सोता ।

मेहनत जिसका होता गहना ,

उसकी शान का है क्या कहना ।

कहे पसीना स्वाभिमान से जीना ,

मुठ्ठी में तुम आसमान को करना ।

दैव दैव  बस आलसी ही पुकारे ,

किस्मत को कोसते वक्त  गुजारे ।

पूँजीवाद ने यहाँ काम बिगाडा़ ,

श्रम का मोल नहीं मिलने पाया ।

अंधविश्वास  ने  किया  कबाड़ा ,

शिक्षा से ही कर लिया किनारा ।

जीना श्रमिक का दूभर देखा जब ,

शासन ने कुछ इंतजाम किया तब ।

अभी जरूरत है बहुत सुधार की ,

आवश्यकता है हमारे सहयोग की ।

स्वरचित , मीना शर्मा , मध्यप्रदेश ,

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नमन मंच
दिनांक   :1 मई 2019
विषय  : श्रमिक  / मजदूर

दूसरों  के   मारकर  हक   आदमी  मगरूर   है ।
इस  जहाँ  में  जिंदगी  का  ये  बड़ा  नासूर है ।।

 पेट  घुटनों  में  दबाकर  सो  रहा जो  रात  भर ।
 मेरी खातिर वो मसीहा है जो  इक  मजदूर  है ।।

               निजात


नमन मंच

दिनांक-१-५-२०१९
विषय - मजदूर

शीर्षक - बंधुआ मजदूर

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बंधुआ मजदूर
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हाँ सच ही तो है
मैं ही हूँ तुम्हारी
बँधुआ मजदूर ।
  सौंप दिया था मुझे
मेरे पिता ने
तुम्हारे हाथों
होकर मजबूर ।
चुकाने को शायद कोई
पुराना हिसाब
हाँ तभी तो कर रही हूँ
सुबह से शाम
शाम से सुबह
मजदूरी और आदाब।
एक मजबूर की तरह
जिसका न कोई मान
और हाँ तभी तो
 सह भी लेती हूँ
सारे अपमान
जो करते हैं तुम्हारे बच्चे
और फिर उनके बच्चे ।
चलता रहेगा यह सिलसिला
सदियों तक ।
जब कभी फड़फड़ाये पंख
निकलने को बाहर
इस लक्ष्मण रेखा से
छनकने लगीं पांवों में पड़ी बेड़ियाँ
खनकने लगीं हथकड़ियाँ
बस इसीलिए​ तो
कर रही हूँ सारा काम
बिना  विश्राम
 मजदूरी, लिए बिना दाम ।
सर्दी,गर्मी और बरसात
कभी तो आयेगी वो रात
जब मुक्त होकर
इस   बंधन से उड़ जाऊँगी
उस अनंत की ओर
जिसका न ओर-छोर
न महल न गेह
हो जाऊँगी विदेह।

पुनीता भारद्वाज
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शुभ संध्या
विषय-- मजदूर
द्वितीय प्रस्तुति

काश उनके सर पर छाया हो
उनको भी मिले मान सम्मान ।
जिन्होने अपना स्वेद बहाकर
बनायीं अट्टालिकायें आलीशान ।
उनके लिये भी कोई छुट्टी होती
जैसे सभी के लिये है प्रावधान ।
वह भी चैन और सुकून पाते
कुछ सुख का होता उन्हे भान ।
नही भूमिका उनकी कम कहीं
फिर क्यों नही उनका गुणगान ।
उनके श्रम का कर्जदार है
यह दुनिया यह जग जहान ।
चलो न्याय का बिगुल बजायें
करें कुछ उनके हित का ध्यान ।
मानव हैं मानवता की आखिर
कुछ तो ''शिवम" बढ़ायें शान ।
समभाव की सोच को जगायें
इसमें खुद का भी है कल्यान ।
ऊपर वाला खुश होगा हम पर
हैं तो आखिर सब उसकी संतान ।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 01/05/2019
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दिनांक-01/05/2019
दिन-बुधवार
शीर्षक-श्रमिक/मजदूर
विधा-मुक्तक

श्रम से श्रम करता रहा,रहा सदा मजबूर
रात दिवस चलता रहा,पर मंज़िल है दूर
दुनिया मे पाई नही,जिसने कुछ पहचान
महल बनाकर भी रहा,झोपड़ में मजदूर।

बहा पसीना रात दिन , जलता जाये खून
साथ  सहारा  न  कोई  , न  कोई  कानून
खाने को गाली  मिली , पिये  हमेशा  गम
श्रमिक बिना संसार में,कौन है अफलातून।

स्वरचित
~प्रभात
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भावों के मोती  दिनांक  1/5/19

श्रमिक

है मेहनतकश
श्रमिक
भारत के
है संलग्न
उत्थान करने में
भारत का
विकास  में
योगदान
दे रहे भारत के
है महान श्रमिक
भारत के
औद्योगीकरण
के कर्णधार है श्रमिक
है बधाई सभी
श्रमिक  भाईयों  को
एक मई है
मजदूर दिवस

स्वलिखित
 लेखक संतोष श्रीवास्तव  भोपाल
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नमन भावों के मोती
दिनाँक -01/05/2019
शीर्षक -श्रमिक , मजदूर
विधा-हाइकु

1.
श्रमिक आता
दो जून रोटी वास्ते
आँसू बहाता
2.
चुप बैठे हैं
बेचारे मजदूर
भाग्य कोसते
3.
जरूरी माँगे
माने ये सरकार
मजदूर की
4.
खुले में बैठे
महलों के निर्माता
भूखे श्रमिक
5.
खून पसीना
दीन हीन श्रमिक
निर्बल काया
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स्वरचित
अशोक कुमार ढोरिया
मुबारिकपुर(झज्जर)
हरियाणा

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2भा.1/5/2019/बुधवार
बिषयःःः #श्रमिक/मजदूर#
विधाःः छंदमुक्त

आज मजदूर दिवस पर
आप सभी को
बधाई और श्रम से जीने की
शुभकामनाऐं देता हूँ।
मैं श्रमिक हूँ
अपने बलवूते पर
कमाता हूँ
गर्मी सर्दी बर्षा हर मौसम में
अपना खून पसीना
खेत खलिहान पर्वत
सडक मैदान
सभी क्षेत्रों में बहाता हूँ।
अपने श्रम के बल पर
अपनी रोजी रोटी कमाकर
अपना और बच्चों का पेट
शान से भरता हूँ।
इस राष्ट्र निर्माण में
मेरा श्रम चारों ओर
दिखाई देता है।
मै हरामखोर भिखारी नहीं
अपनी मेहनत से कमाया ही
हमेशा खाता हूँ
सरकारी खजाने या
किसी के रहम से नहीं
बल्कि अपने श्रम सीकर के दम पर
अपना और अपने देश का
भाग्य मजबूर नहीं
मजबूत हाथों से लिखता हूँ।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
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भा.#श्रमिक/मजदूर# छंदमुक्त
1/5/2019/बुधवार


नमन मंच
प्रदत्त शब्द श्रमिक/ मजदूर
दिनांक- १/५/२०१९

विधा - कविता

श्रम से करता हूँ मैं प्रहार
निज भाग्य पर कर्म वार।
स्वेद कणों से तर-बतर
होता मैं नित प्रति पहर।

खड़ा करता हूँ सबके मकां
ले अपने स्वप्नों का कारवां।
जो आता मेरे समीप सच
करता नहीं उसको निराश।

श्रम अर्जित जीविका मेरी
होता नहीं मैं कभी उदास।
आधी रोटी का हो जुगाड़
फिर भी रहता हूँ मैं हुलास।

मखमली बिछौना बिना नींद
पूरी करता दिन की थकान।
वसुधा के धूल कणों में ही मुझे
शैय्या-सुख मिलता फूल समान।

जी नहीं चुराया मेहनत से
पर बना न पाया सिर पर छत।
कभी कभी मेरा जीवन ही
बन जाता नींव का प्रस्तर।

मेरी लाशों पर चढ़कर
बने हैं आलीशान महल।
खत्म हुई मलबे में दबकर
अभिलाषा जो मेरी थी।

---बृजेश पाण्डेय विभात
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नमन माँ शारदे
मजदूर
1मई 2019
हाइकु
1
मै मजदूर
खुशियाँ बिखेरता
स्वप्न सुदूर
2
पत्नी श्रमिक
वेतन नहीं कोई
झिड़की खाती
3
जीवन दूर
श्रमिक  मजबूर
रोटी जुटाता
4
है मजबूर
महिला मजदूर
सपना दूर
कुसुम पंत उत्साही
स्वरचित
देहरादून

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शुभ साँझ 🌇
नमन "भावों के मोती"🙏
01/05/2019
हाइकु (5/7/5) 
विषय:-"मजदूर"
(1)
वो बनाते
मजदूर दिवस
हम मनाते
(2)
श्रम सम्मान
मजदूर चाहत
हाथ को काम
(3)
शोषण दुकां
मजदूरी बेमोल
स्वेद का तौल
(4)
घर से दूर
हालात मजबूर
है मजदूर
(5)
शोषण चक्की
मजदूर जीवन
पिसता श्रम

स्वरचित
ऋतुराज दवे
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मंच को नमन
दिनांक - ०१/५/२०१९
विधा- मुक्तछंद कविता
विषय - मज़दूर

साल के ३६५ दिन मैं तुम्हें  तन मन अर्पित करता
केवल १मई को मेरा दिवस तुम्हें याद  आता
हाँ , वही अंतरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस ...
मैं भी जानता हूँ ,मानता भी हूँ
आज ही है जन्मदिवस मेरा जन्म मेरा

भोर की पहली किरण संग ले आई
 असंख्य बधाई,संदेशों  का पिटारा
हर मंच सजा हुआ रंगमंच बन गया
आज का  महानायक मैं ही तो हूँ

ना तन बेचता हूँ
ना मन बेचता हूँ
 मैं केवल और केवल
अपना मुक्ताभ श्रम बेचता हूँ
मेहनत मज़दूरी करके खानेवाला
तुम्हारा एक मामूली मज़दूर ही तो हूँ

मात्र एक संज्ञा भर हूँ
तुम्हारे मस्तिष्किया शब्दकोश में
मेरी अपनी इस संज्ञा को
निज पैतृक विरासत में अपनाया
मेरे वंशजों ने अनगिनत पीढ़ियाँ खपा
अपनी पहचान ही तो बनाई
 सुनो ! मेरी यह उद्घोषणा छद्म नहीं
पहचान असली ही तो बताई

मेरे मस्तक पर सोहे ललाट
थिरकते श्रम बिंदु के ठाट
चट्टानों ने अपनी गर्दन है झुकाई
हाथों का फावड़ा देख
बंजर ज़मीन दहल गई
कल तक थी जो वीरान अनजान
आज बगिया-सी महक गई

सूरज का तेज़ निज तेज़ में मिलाता
आलीशान भवनों की शान भी शरमाई
जब रात्रि का अंधकार भयावह लगता
तब चाँद ने चाँदनी मुझ पर छितराई

मैं रूखा-सूखा खाकर भी मालामाल तुम्हें आलीशान बंगलो में  भी मलाल
तुम्हारा दिन कटता नही
चैन रात में भी पाता कहाँ ?
अच्छा खाता पीता और पहनता
मानसिक रोगी ही बनकर जीता
ऐसा अभिशापित तेरा अमीरी संसार
मेरे वजूद पर क्योंकर इतरा लेता ?

मेरी बोली लगाती यह अमीरी तेरी
पर अनमोल है मज़दूर हैसियत मेरी
कभी धन तो कभी पद से करे प्रहार
मेरा पारिश्रमिक तेरे शोषण का शिकार
मेरे श्रम का शोषण करके
तू पूँजीपति बन जाता
तू सूट बूट वाला पढ़ा लिखा वर्ग भी
मज़दूर सटीक व्याख्या कर पाता ?

मैं मज़दूर बड़ा उदार बन कह रहा
मेरी बातें विवाद विषय मत बनाना
तुम नीर क्षीर विवेकी बनकर
युग युगांतर के बलिदान को समझाना

कब से  बेहिसाब चला आ रहा
मेरे ३६४ दिनों का हिसाब
नोट करना चाहो तो नोट कर लो
चाहे छाप दो एक मज़दूर किताब
मेरे मज़दूर शब्द का विवेचन नही
अरस्तू वाला ‘विरेचन’ होना चाहिए
मेरी अपूर्ण अभावी दुनिया पर
विश्व में शास्त्रार्थ होना चाहिए
कार्ल मार्क्स का पुनर्जन्म होना चाहिए
न्याय करे मेरी अनुभूतियों संग
ऐसा कोई रचनाकार होना चाहिए ...

✍🏻 संतोष कुमारी ‘संप्रीति ‘
स्वरचित
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नमन मंच
०१/०५/२०१९
विषय--श्रमिक/मजदूर

जेठ महीना झुलसा तन तड़प रहा मजदूर है,
सर्दी गर्मी या हो बारिश बिलख रहा मजदूर है।
कितना भी हम जतन करें मिले नहीं अब चैन,
नेता और साहुकारों के हाथों पिस रहा मजदूर है।
(अशोक राय वत्स) स्वरचित
जयपुर


भावों के मोती
मजदूर
हां, मजदूर हूं मैं
श्रम से नहीं दूर हूं मैं।
खुन पशीने की रौटी खाकर
जमीं पर ही सो जाता हूं।
कल की कौई परवा नहीं
आज खुशी से बिताता हूं।
धन- पद की कोई चाह नहीं
संतोष को ही अपनाता हूं।
श्रम ही पूंजी है अपनी
और  पशीना ही गहना है।
सुख- शांति से बड़ी कोई दौलत नहीं
मेरा तो यही मानना है।
स्वरचित
निलम अग्रवाल,खड़कपुर
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1/5/19
भावों के मोती
विषय- श्रमिक/मजदूर
मजदूर हैं नहीं मजबूर
मेहनत से करते ग़मों को दूर
सर्दी,गर्मी या बरसात में
दिखता उनको काम ही काम
हमारे सपनों को देकर आकार
सुंदर सुंदर महलों की
श्रम से नयी तस्वीर बनाते
गिट्टी पत्थर सिर पर ढोकर
श्रम से बदलते अपनी किस्मत
करते भविष्य को उज्जवल
बदलते देश की  तस्वीर
योगदान इनका सबसे बड़ा
यही हैं असली कर्मशील
बहाते अपना खून-पसीना
होकर यह बड़े ही धीर
फ़िर भी गुमनाम होकर जीते
सिर पर अपने ईंटें ढोते
नहीं मिलता इनको कोई इनाम
नहीं रखता इन्हे कोई भी याद
कभी नहीं बदले इनकी किस्मत
सहनी पड़ती सदा ही जिल्लत
मंहगाई की मार भी सहते
रोज रात के आगोश में
भविष्य के नये सपने बुनते
सुबह मिलाकर गिट्टी गारे में
अपने सपने भी दीवारों में चुनते
यही उनकी असली किस्मत है
एक दिन उनके परिश्रम को याद करो
क्योंकि आज मजदूर दिवस है
***अनुराधा चौहान***©स्वरचित ✍
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नमन भावों के मोती
मजदूर दिवस की सभी को हार्दिक बधाई व शुभकामनाएँ 🌹🌹🙏🙏

मैं मजदूर हूँ,
मगरूर इस दुनिया में , बहुत मजबूर हूँ ।
खेत खलिहान हो ,
चाहे ईट भट्टी से तपता मैदान हो ।
झुलसता बदन ,तपता मन लिये ,
करता रहता अथक श्रम ,
कि मेरे भी घर दो वक्त की रोटी का सामान हो ।
स्वेद सागर में डुबकी लगा ,
धनवानों के लिए जुटाता,
हीरे मोती से कीमती  रत्न ।
फिर भी अपने घर नही ला पाता पेट भर अन्न ।
मेरे अनमोल स्वेद की लड़ी ,
नहीं लगा पाती अपने घर ,
पेट भर अन्न की झड़ी ।
मैं मजदूर हूँ, हाँ मै बहुत मजबूर हूँ ।
विश्वकर्मा बन बनाता औरों के स्वप्नों का महल ,
पर नहीं दे पाता अपने परिवार को
बारिश में टपकती छत का कोई हल ।
औरों की फाइलें पहुंचाता दफ्तर दफ्तर
सबके सपने सच करने लगाता फाइलों पर मुहर
और देखो मेरे जीवन जीवन पर धनवानों ने
ढाया कैसा कहर ।
सबकी फाइलें पास करते करते
मेरे जीवन की फाइल जानें कहां अटक गई ।
धन और धनवानों की भूल भुलैया में भटक गयी।
फट गया दिवा स्वप्नों का कनस्तर ,
घावों पर लगाने पैबंद
नहीं मिल रहा कोई अस्तर ।
हां मैं बहुत मजबूर हूँ,
मैं मजदूर हूँ

(स्वरचित )सुलोचना सिंह
भिलाई  (दुर्ग )

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नमन
भावों के मोती
१/५/२०१९
विषय-मजदूर

मजदूर तुम बहुत सुखी हो
जो आज को जीते हो
न तुम्हें चिंता कल की
न ही भविष्य की
घर हो न हो
छत हो न हो
फिर भी नित नए घर बनाते हो
घरवालों के सपने सजाते हो
दबा के चंद सिक्के मुट्ठी में
बिना किसी चाह व शंका के
तुम अपना चूल्हा जलाते हो
न तुम्हें चिंता पद की न रूतबे की
न दिखावे की न किसी चोरी की
दिनभर अथक परिश्रम बस
बिना किसी तृष्णा के
बिना किसी लोभ के
कितनी मीठी नींद सो जाते हो
जरा देखो उसे
जिसके घर भी है रुतबा भी है
पद भी है साजोसामान भी
और आराम भी
फिर भी उसका जीवन
घिरा है तृष्णाओं से चिंताओं से
बीतती रात शैया में करवटें बदलते
सुविधासंपन्न ये आदमी कितना दुखी है
किंतु हे मजदूर तुम बहुत सुखी हो  ।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित मौलिक

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नमन मंच भावों के मोती को
दिनांक-1/5/2019
विषय -मजदूर
जी हाँ मजदूर हूँ मैं
कौन कहता है मजबूर हूँ मैं ?
मैं ही तो बनाता हूँ गगनचुम्बी इमारतों।को
मैं ही तो संवारता हूँ चमचमाते आशियानों को
क्या हुआ जो नहीं जुटा पाता हूँ अपने परिवार के ठिकाने को?
मानो या ना मानो हमारे श्रम का लोहा सबने माना है ,
ये अलग बात है कि सबका व्यवहार हमारे साथ मनमाना है ।
रोज कुआँ खोदता हूँ रोज प्यास बुझाता हूँ ।
अपनी हालत पर डरता हूँ , घबराता हूँ
हजारों  स्कूल अस्पताल हमने बनाएं है
पर उनके दरवाजे फिर हमारे लिए नहीं खुल पाएं हैं ।
एक दिन मजदूर दिवस मनाकर क्या दिखाते हो?
क्या हमारी मजबूरी का एहसास हमें दिखाते हो ?
अरे मजदूरों के श्रम से अमीर बनने वालों
हमारे श्रम की चोरी करने वालों
हमारी मजबूरी का मज़ाक बनाने वालों
एक दिन मजदूर जब अपनी जिद पर उतर आएगा
उसी दिन श्रम एवं श्रमिक का अहसास तुम्हें हो जाएगा ।
तो सवांर दो हमारी जिंदगी को थोड़ा
अपनी तिजोरियों को जरा खोलो थोड़ा ।
तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा
बस थोड़ा जीवन हमारा सवंर जाएगा ।
स्वरचित
मोहिनी पांडेय
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"रात/रजनी "15जुलाई 2019

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