Tuesday, May 7

"उम्र/आयु "7 मई 2019

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        ब्लॉग संख्या :-379


नमन मंच भावों के मोती
शीर्षक उम्र ,आयु
विधा लघुकविता

07 मई 2019,मंगलवार

उम्र तेरा क्या ठिकाना
उम्र ही जीना सिखाती
उम्र का होता तकाजा
उम्र सत्यता हमें बताती

शैशव गुजरे माँ सानिध्य
वात्सल्य ममता का पहरा
कैसे कब पैरों बल चलते
कान्ह यशोदा स्नेह गहरा

विद्यालय समर्पित बचपन
पढ़ते लिखते खाते पीते
डिग्री होती निज हाथों में
हम रहते रीते के रीते

गृहस्थ जीवन युवा अवस्था
जो जीवन की मुख्य तपस्या
जीवनयापन कला है अद्भुत
शुद्ध सात्विक हो दिनचर्या

काल चक्र चलता रहता है
उम्र गतिशील आगे बढ़ती
मायाजाल उलझे हैं सारे
जरावस्था अति अखरती

सब अंजाने पागल बन कर
पल पल उम्र सदा हम खोते
परहित डग चरण रखे जो
सुखसागर नित खाते गोते

उम्र रहते ऐसा कर जाओ
जग भी तुमको याद रखले
कभी उम्र का पता नहीं है
निज कर परोपकार करले।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

 ।। उम्र/आयु ।।

उम्र ही बीत गयी उन्हे मनाने में 

रीता रहा दिल जाने अन्जाने में ।।

जिन्दगी ने मजे लिये मुझसे
मुझे प्यासा पपीहा बनाने में ।।

कदम कदम पर काँटे बिछे थे
हम फूल चाह में रहे मुस्कुराने में ।।

वक्त आयेगा वक्त आयेगा सोचा
तभी मजा आयेगा हंसने हंसाने में ।।

उम्र के अंतिम पड़ाव पर आ गये
लगे अब अपने किस्से सुनाने में ।।

एक उम्र कम पड़ जाती प्यार में 
ये समझ आया इस अफ़साने में ।।

पास रहकर मिल न सके ''शिवम"
अब मीलों फसले उनके ठिकाने में ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 07/05/2019


दिनांक-०७-०५-२०१९

हर #उम्र से गुजरता है इंसा
दिल बच्चों सा चाहता है।

लगाकर आग शहर में
खुद हिफ़ाज़त चाहता है।

गुनाहों का सरताज़ बना बैठा पाक़
घर में अपने अमन चाहता है।

पाप के पुलंदे की शहंशाही तो देखो सीमा
हैवानी मिल्कियत बसाकर होना ख़ुदा चाहता है।😪

***स्वरचित***
-सीमा आचार्य-(म.प्र)
उम्र के जो निशां नज़र आने लगे। 
वो खिजा़बों में जुल्फें रंगाने लगे।

सूरत पे अपनी न आये यकीन। 
तो आईने मे लकीरें बताने लगे। 

दूर से हम उन्हें नहीं आते नजर। 
पास जाएं तो नज़रे चुराने लगे।

चश्मा हुआ जब से है चश्में-जां। 
कहो किस तरह से निशाने लगे। 

लज्जते जिन्दगी है वही की वही। 
हाय मुझको ये चावल पुराने लगे। 

नाज़ जिनके उठाए हैं उम्र भर। 
लो वो खताएं हमारी गिनाने लगे। 

विपिन सोहल

गुणीजनों को प्रणाम
07/05/19 मंगलवार
विषय-उम्र/आयु
विधा- नज्म
खो गये हैं जो हैं पल.....उम्र के पडाव में
कोई ढूढों अब मुझे....... लम्हों की बरसात में
भटके साहिल और किश्तियां..... चाहत के बाजार में
उम्र सारी कट गई......खुशियों
के इंतजार में
मुझको ढूंढते रह गये .......अरमान
रात माहताब में
ले चलो नासाज दिल को.......दर्द देता बात बात में
जी लूँ अब तो मैं.......क्यों कर में
रखूं उम्र को दराज में

स्वरचित
नीलम शर्मा#नीलू

उम्र/आयु
💐💐💐
दिन गुजरते रहे,
उम्र बीतती गई।
कल,आज और कल में,
जिन्दगी गुजरती रही।

कल का तो कुछ याद नहीं,
पर आगे का सोचे हम।

कुछ करें खुद के लिये,
कुछ औरों के लिये करें हम।

उम्र का क्या है,
वो गुजर हीं जायेगी।
पर जो कर्म किये अच्छे,
तो कल वही जिंदगी में,
काम आयेगी।

आयु हो लम्बी,ये नहीं जरूरी।
पर जितनी हो आयु,
उसमें हम करें खास कुछ
ये है जरूरी।

जाना है ऊपर,
बीतती जा रही है आयु।
जितनी भी दी खुदा ने,
हैं काफी,होना नहीं दीर्घायु।।
💐💐💐💐💐💐💐
स्वरचित
वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी
विधा .. लघु कविता
************************

जैसे-जैसे उम्र बढी है, शोखी मुझमे आयी है।
झूठ है ये की आयु बढे तो, बुद्धि बढती जाती है।
....
क्यो दिल करता है मेरा मै, उछल-उछल के गाऊँ।
सारी मस्ती अभी करू जो, बाद मे ना कर पाऊँ।
...
बाद मे उम्र का रोना होगा, बुढे आयु को ढोना होगा।
सारी मस्ती मन मे रहेगी, रहमों पर फिर जीना होगा।
....
आओ फिर झूमे और गायें भावों को भर खुशी मनाए।
बात नही जो शेर की अच्छी, तो कोने मे जा गरियाए।
....
स्वरचित एंव मौलिक
शेर सिंह सर्राफ
भावों के मोती दिनांक 7/5/19

उम्र / आयु
विधा - हाइकु 

उम्र है भ्रम 
घटती है ये उम्र 
छोटा जीवन

जन्म खुशियाँ
मौत एक सच्चाई 
आयु तमाशा

जितनी उम्र 
उतनी है कहानी
कब्र सुहानी

उम्र पड़ाव 
रूके जब जिन्दगी 
सब है खत्म

मौत है जेल
जिन्दगी एक रेल
उम्र का खेल

स्वलिखित 
लेखक संतोष श्रीवास्तव भोपाल

जय हनुमान ज्ञान गुणसागर।
नहीं करते कोई उम्र उजागर।
तुमने अमरता श्री राम से पाई,
प्रभु करें पार हमको भवसागर।

जय कपीश तुम हो वलवीरा।
हम सबकी तुम हरते हो पीरा।
निशदिन प्रभु भजन हम गाऐं,
तुम हो संयम विवेक के हीरा।

नवयुवक अथवा उम्रदराज़ हो।
बीमार दुखी या कोढ खाज हो।
जो भी आऐं हनुमत चौखट पर,
उनके घर आंगन में रामराज हो।

हनु सब मनोकामना पूरी करदें।
हर हृदयांचल शुभभावना भर दें।
जिऐं सभीजन यहां भरपूर आयु,
दुनिया में मंगल हो मंगल वर दें।

स्वरचित ः
इंजी.शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

शीर्षक --उम्र/आयु
दिनांक--7-5-19
विधा --दोहे
1.
उम्र रोज ही बढ़ रही, दिन दिन घटती आयु।
वडिल आशीष दे रहे,होवे पुत्र शतायु।।
2.
उम्र डेढ़ दो वर्ष में, सीखें आधे शब्द।
आधे बाकी जिन्दगी .में होते उपलब्ध।।
3
पूर्ण उम्र खटते रहे, बना न पाय मकान।
उदर मगर भरता रहा,ढकी न तन की आन ।।
4.
बचपन, किशोर,वृद्ध हैं, जीवन के आयाम।
देह उम्र भर चाहती,मेहनत व व्यायाम।।
5.
स्वच्छ देह हो व्यसन नहिं, पा सकें अधिक आयु ।
उम्र समन्वय योग से,होती है दीर्घायु ।।

******स्वरचित*******
प्रबोध मिश्र 'हितैषी'
बड़वानी (म.प्र)451551

🌹 उम्र / आयु 🌹
🍓🌱 छंद--मनहरण घनाक्षरी 🌱🍓
******************************
🍑( वर्णिक-- 8, 8, 8, 7 ) 🍑
🐟🐟🐟🐟🐟🐟🐟🐟🐟

धर्म कर्म भक्ति शक्ति, संगठन जनशक्ति ,
ईश्वर का कार्य जान, आयु संग करिये ।

धन बल रूप रंग , नश्वर क्षणिक आयु ,
इनका करें न मान , सत्य रूप धरिये ।

ज्ञान ध्यान आन बान , परमार्थ हेतु भान ,
उम्र के अनुसार , सत कर्म चलिये ।

जीवन है मूल्यवान,गिनती की साँस प्राण ,
बीते उम्र नहीं आय , व्यर्थ नहीं ढलिये ।।

🍓🌻🍍🌻🍑

🌻****.. रवीन्द्र वर्मा, आगरा


उम्र/आयु
💐💐💐💐
उम्र का क्या ?
ये एक गिनती मात्र है..
हम बढे जाते हैं
रोज़ नई मंज़िलो की तरफ..
एक भाई था मेरा गुजरा
अपनी जवानी में...
थम गई ज़िन्दगी अपनी
बनी कहानी सी।
थी उम्र सत्रह की
पर सोच बुजुर्गों वाली..
वो गया मंदिर
पूजा की अर्चना कर ली
गुम हुई चप्पल भाई की वो नई वाली...
साथी बोले ,पहन कोई भी पुरानी वाली
था वो बच्चा, मगर मन का सच्चा
मैं खाली पाँव ही जाऊंगा
न करूंगा चोरी ,करने यहां आया सज़दा।
चला गया वो उस जहां में
करा हमें तन्हा।
💐💐💐💐💐
स्मृति श्रीवास्तव
सूरत
(स्वरचित)

सादर अभिवादन
उम्र
उलझा धागा प्रीत का, मोह में
भटक रहे कहाँ, किस खोह में ?
कूर्म-कवच से बाहर तो आईये
सुप्त-भावों को हौले से जगाईये

यह उम्र तो महज एक गणना है
दिल देखिये जी, भरा बचपना है
आरोही उम्र का रोना न बनाइये
दिल खोलकर हुजूर मुस्कुराइये

मौत आनी है आयेगी एक दिन 
इस उम्र का क्यूँ करे पल-छिन्न
बीतते पल को छककर बिताईये
उम्र को हमउम्र बन आजमाईये
-©नवल किशोर सिंह
07-05-2019
स्वरचित

(उम्र/आयु)
********
जन्म मृत्यु के मध्य अवधि का,
सम्बोधन शुचि आयु चारु,
कालचक्र गतिमयता की,
मात्र धरोहर अनुपम आयु।

आयु के आधीन जगत में,
काया संवर्धन एवम ह्रास,
अपरिहार्य परिवर्तन जीवन की,
मूल अवस्थाओं मे चत्वारि।

आयु के अनुरूप देह में,
तेजस शक्ति का संचार,
सप्त सुरों की लयमयता सा,
वाणी का स्निग्ध व्यवहार।

साररूप में आयु धरा पर,
शुचि अनुभव मंजूषा चारु,
गणनायोग्य स्वाँस जीवन की,
स्वयं ब्रह्म का प्रेमोपहार।
--स्वरचित--
(अरुण)

नमन भावों के मोती 
विषय - उम्र /आयु 

1

पीठ पे बिठा 
समय का पहिया 
उम्र ले भागा 



बड़ी सयानी 
नयनों से झांकती 
उम्र कहानी 



उम्र ने दिया 
अनुभव खजाना 
बुजुर्ग बांटे 



उम्र ले आई 
जगमग पिटारा 
यादों से भरा 



चाँद की उम्र 
जानकर क्या करे 
शीतल छाया 


उम्र के पैर 
ठहरते ही नहीं 
चलते तेज 



भागती उम्र 
छुट जाये ना साथ 
पकड़ो खुशी 

(स्वरचित )सुलोचना सिंह 
भिलाई (दुर्ग )

शीर्षक :- आयु/उम्र

उम्र के आगोश मे,कर रहा इंसान समर्पण।
पल-पल कर रहा,मौत को मौन समर्थन।

बढ़ रही पल-पल आशाएं,
कहीं जिंदगी में निराशाएं।
आयु नित्य सदा बढ़ रही,
आशा का सूरज गढ़ रही।

खेल रही आशा के उपवन में,
खिलते है पुष्प जैसे चमन में।
कहीं दुखों के बादल बरस रहे,
कहीं सुखों के चमन महक रहे।

उम्र कर रही कहीं,स्नेह व अपनत्व का आचमन।
कहीं ढलती उम्र में,इसां जी रहा अपना बचपन।

ढलती उम्र सहाती अपमान,
बमुश्किल मिलता सम्मान।
ताने बाने सहती अपनों के,
ढहाती है महल सपनों के।

एक पल को सोचकर देखो,
फिर बच्चा सा बनकर देखो।
उम्र खुद अब तुम्हें चिढ़ाती है,
हौसलों को तुम्हारे डिगाती है।

जी लो जिंदगी अब जी भर,यही पड़ाव अंतिम है।
कर लो मन में है जो ठाना,यही अवसर अंतिम है।

सफल जिंदगी का ढल गया सूरज,
निढाल,निस्तेज सी होती अब सूरत।
जूझती रही जीवन की जद्दोजहद में,
स्तब्ध होने को है जैसे माटी की मूरत।

निशब्दता का घेरा है,छाया घना अंधेरा है।
उम्र के साथी साँसों पर न हक़ तेरा है न मेरा है

स्वरचित :- मुकेश राठौड़

आज के प्रद्दत शब्द उम्र आयु पर मेरे कुछ हाइकू---

उम्र जो ढली 
उम्र का पतझड़ 
उदासी चली 
2---
न हो उदास 
ये उम्र का पड़ाव 
सभी को आते 
३----
उम्र में बोई 
तजुर्बे की फसलें 
खुद ही काटी 
4---
कहाँ भुलाई 
उम्र तेरी याद में 
मैंने बिताई 
५----
उम्र तपाया 
अनुभव ताप में 
कुंदन काया 
६----

जिसे संवारा 
उन्मुक्त आकाश में 
उड़ चले वो 
७---

उम्र जो ढली 
मंजर गुमसुम 
बढ़ी बेकली 
8--
ढलती उम्र 
जरुरी होता साथ 
एक दूजे का 
9---
आज भी ताके 
उम्र भर नजरें 
राह तुम्हारी 
१०--
उम्र गुज़ारी 
अनुभव बताये 
जग पराये 
११ 
उम्र की अग्नि 
तपाये तन मन 
मन के छाले 
12---
उम्र गुज़ारी 
मुहब्बत में तेरी 
खुद को छली 
13-----

आज भी टाँके 
ये उम्र के सितारे 
बूढी अँखियाँ 
१४ 
वक़्त ने दिया 
अनुभव के प्याले 
उम्र ने पीया। 

15---
उम्र में ओढ़ा 
मर्यादा की चादर 
निज़ संस्कार 
१६ 
जीवन चक्र 
बढ़ता हर पल 
कर सु कर्म 

@ मणि बेन द्विवेदी

भावों के मोती 
तिथि - 07/5/19
वार - मंगलवार 
विषय - आयु / उम्र 

लिखा कर ,आये थे 
उम्र अपनी ,धरा पर 
जैसे जैसे हम बढ़ते गये 
वैसे वैसे उम्र कम होती गई 
अंत में ..,जाना पड़ा --हमे 
छोड़ कर इस संसृति को 
रोता बिलखता छोड़ कर 
क्योंकि ....,
उम्र की सीमा खत्म हो गई थी 
जो ,मिली थी --जन्म के समय 

शशि कांत श्रीवास्तव 
डेराबस्सी मोहाली ,पंजाब


नमन मंच भावों के मोती 
07/05/19
विषय उम्र 
**
गिरते ,उठते ,चलते 
आ पहुँचे 
उम्र के इस पड़ाव पर
कब कहाँ जिंदगी की शाम हो जाए
ख्याल आया ,
चलो यादों की किताबें खंगाले
कुछ पन्ने पलट 
कुछ बीता निकाले ।
मन रीता रीता सा हो गया 
लगा कहीं कुछ खो गया ।
कुछ सपने 
वक़्त की आँधिया उड़ा ले गयीं
कुछ नसीब का खेल 
समझ भुला दिया ।
जो पाया ख़ुशी मे आँखे नम करें 
जो खोया है क्यों कर गम करें ।
उम्र के इस पड़ाव पर 
ऐसा लग रहा
स्वयं से रूबरू हुए ही नहीं 
वक़्त हाथों से फिसलता जा रहा ,
हारी नही है हिम्मत 
हौसले बाकी है
कैसा भी हो समय 
फिर खड़े हो जायेगे
गिरते उठते चलते 
फिर दौड़ लगाएंगे ।

स्वरचित
अनिता सुधीर श्रीवास्तव



जब आये थे इस दुनियाँ में हम,
अपनी मुठ्ठी में उम्र ले लाये थे।
जियेंगे जी भर के जिंदगी हम,
यही एक हसीन ख्वाव लाये थे।

गुजर गया लड़कपन खेल में,
यौवन ने ली जब अंगड़ाई है।
आयु बीत रही अल्हड़पन में,
कदर इसकी समझ न आयी है।

जब पड़ा है कदम गृहस्थी में,
हुई संघर्षों से तब हाथापाई है।
उम्र ढल गई बच्चों के पालन में,
थैली आयु की हो गयी खाली है।

मुड़ मुड़ कर अब देख रहा पथ में,
कहाँ पर पूँजी अपनी सब गँवाई है।
जो सपना लेकरआया थाआँखों में,
जीवन की वो डगर कहाँ भुलाई है। 

नहीं लौटता गुजरा लम्हा आयु में
सोच समझकर पूँजी ये लगानी है।
हर पल की कीमत होती दुनियाँ में,
बात ये समय रहते हमें समझनी है।

स्वरचित, मीना शर्मा, मध्यप्रदेश

"नमन-मंच"
"दिंनाक-७/५/२०१९"
"शीर्षक-उम्र/आयु"

कौन सा उम्र पर करूँ गुमान
मैं अज्ञानी समझ ना पाऊँ
आधी उम्र निकल गई 
दुनिया को समझने में,

आधी उम्र निकल गई
दुनिया को समझाने में
उम्र ,उम्र का फर्क है भाई
दुनिया लगी बताने।

आधी उम्र हम श्रोता बने
आधी उम्र हम वक्ता
निणार्यक तो सदा ,जगवाले निकले
हम तो सिर्फ दृष्टा।

बुढ़ापा मे जग ने कहा
अब उम्र निकल गया तुम्हारा
मैं तो यह सोच सोच चकराया
कौन सा वह उम्र था जिसे 
लोगोंने सही बताया।
स्वरचित-आरती-श्रीवास्तव।

कोई कह दे उम़ से कुछ समय ठहर जाए 
गुजरा हुआ बचपन फिर लौट आए 
एक बार पुनः धूम मचा लूं 

लड़ झगड़ रूठों को मना लूं
वह छीन छीनकर खाना वह छिपना छिपाना पल में रूठ पल में मान जाना 
इसमें अपनापन भी जज्बात भी थे 
इक माला के मोती जैसे हालात भी थे 
अब तो बस हालातों में बँध कर रह गए 
सारे जज्बात आँसू बन बह गए 
काश होता कि उम़ के संग नदिया से बह जाते 
भावों के मोतियों को कलम से कह पाते ।

उम्र के हर पड़ाव पर है कुछ जुनून ।
कुछ रंगत रहिये जिन्दगी के साथ ।
सोचिये सकारात्मक भरिये उल्लास ।
आज नही तो कल बनेगी जरूर बात ।

जिन्दगी इतनी बुरी भी नही होती ।
कुछ न कुछ हर एक में होता खास ।
जो जुनून जगाये लगे ज्यों मधुमास 
हर उम्र सिखाये हंसाये करें प्रयास ।

हर उम्र में कुछ न कुछ निहित है ।
एक में गर रही चूक रहे उदास ।
तो दूजे में जरूर आयेगी उजास ।
बचपन जवानी बुढ़ापा ये हैं क्लास ।

कोई न कोई आयेगी हमको रास ।
हर हाल में करना है हमें यह पास ।
हंसे रोयें या हम रहें 'शिवम' हताश ।
ये हमारी जिन्दगी बन रही इतिहास ।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 07/05/2019

र्वत पर जमी बर्फ की तरह
बेशर्म उम्र के अनुभव का पहरा
चेहरा बदल कर जिंदगी

कितने पहरे लगा देती है।

कभी उजली धुप सी
कभी भरा हुआ आकाश
और कभी डूबते सूरज का
अंतिम पैगाम सुना देती है।

बचपन, जवानी और बुढ़ापा
स्थितियां धरा के रूप सी
जिंदगी वक्त के साथ-साथ
आखिरी सलाम बता देती है।

सिद्धान्तों में पलकर जीना
सुख को सलाम देना है
रोटी से रिश्ता तोड़कर
सूना शमशान दिखा देती है
चेहरे बदल कर जिंदगी
कितने पहरे लगा देती है।

श्रीलाल जोशी "श्री"
तेजरासर, बीकानेर ।
(मैसूर)

विषय - उम्र 

चल रही समय के साथ 
आंकलन सांसों का करती जाओ 
सूख रहा नयनों का नीर 
धरा से प्रीत जताती जाओ 

उम्र समय की दासी 
साँझ सी ढलती जाये 
हाल पूछ बुढ़ापे से 
कर याद जवानी रोये 

समझ ने सहलाया मन 
बिंब यादों का उभर आया 
वक्त के घनघोर भंवर में 
उम्र का एक पड़ाव नज़र आया

तन के मन में झाँकी उम्र 
स्वयं को धसती पाई 
अंबर की घनघोर घटाएँ 
धरा की बाँहों में सिमटी जाये 

ढ़हती मीनारें इच्छाओं की 
छाया उम्र की मिटती जाये 
समय के पथ पर चलती 
उम्र तन से विमुख हो जाये 

झाँक रही उस पथ की यादें 
समय तूफ़ान से घबराती थी 
खंडहर तन की थी साथी 
कभी उम्र उस पर मुस्काती थी 

ओढ़ रही वो समय की चादर 
अंकुर नया खिलाया था 
सिमट रहा वो समय के हाथों 
उम्र का ताबीज पहन धरा पर आया था |

स्वरचित -
-अनीता सैनी

 मन भावों के मोती
दिनाँक-07/05/2019
शीर्षक-उम्र , आयु

विधा-हाइकु

1.
बढ़ती उम्र
जीवन सफर में
घटते दिन
2.
बढाती आयु
हर जीव जंतु की
ये स्वच्छ वायु
3.
हरे दरख्त
करते शुद्ध वायु
बढ़ाते आयु
4.
घटती उम्र
लापरवाह युवा
बढ़ता नशा
5.
सफेद बाल
अनुभव बताते
उम्र कितनी
*********
स्वरचित
अशोक कुमार ढोरिया
मुबारिकपुर(झज्जर)
हरियाणा
नमन मंच
दिनांक 7/5/19 
विषय उम्र

विधा मुक्त

रफ्ता रफ्ता जिंदगी
ढलती चली गई
मोड़ थे अनेक पर
फिसलती चली गई
लम्बा था वो कारवाँ
राहगीर थे अनेक
कुछ राजदार थे
कुछ बने बागबां
चलते हुए अब हुई 
शाम जिंदगी की
खुशियां समेट ली है
दामन में हर किसी की

प्रवीणा त्रिवेदी(अरुण)

 नमन मंच
दिनांक-07/05/2019
विषय-उम्र

विधा-कविता

जिंदगी की कश्मकश में
राह में मिलते हैं
अनगिनत कठिनाईयां
उम्र बढ़ती हीं जाती है
बढ़ने के साथ 
देती रहती है परेशानियां
युवा अवस्था वाला
खुशी व उल्लास
छीन लेती है उम्र
हमसे और देती है
तो केवल दर्द,असहनीय पीड़ा
हे ईश्वर हे जगत के पालनहार
दूर कर दें दर्द 
सभी
काश! ये उम्र बढ़ती ही नहीं कभी
न आती बुजुर्ग अवस्था 
न जाते हम जग को छोड़
फैलाते सफलता का परचम चहुंओर।

©®कुमार संदीप
मौलिक, स्वरचित

नमन भावों के मोती 
07-5-2019
विषय :-आयु/ उम्र 

विधा :- कुण्डलिया

( १ )

काया बूढ़ी हो नहीं ,जिसकी सोच जवान ।
आयु को मत सोचिए , निकला तीर कमान ।।
निकला तीर कमान , नहीं मन होय निराशा । 
नेक कर्म की सोच , भरे मन में है आशा ।
कहे मोतियाबिंद , देख मत तम की छाया ।
करती सोच इलाज , दिखे जब ढलती काया ।।
( २ )
होती गरिमा उम्र की , उस पर हो अभिमान ।
मनसा वाचा कर्मणा , लिख लेता इंसान ।।
लिख लेता इंसान , उम्र दर्पण दिखलाए ।
मुख पर बनती रेख , उम्र लिखती ही जाए ।
करो नेक सब काम , लगे आयु नहीं रोती ।
कोई भी हो उम्र , उसी की गरिमा होती ।।
✍️
स्वरचित :-
ऊषा सेठी 
सिरसा 125055 ( हरियाणा )

नमन मंच
७/५/२०१९
विषय--उम्र/ आयु


उम्र एक पड़ाव है
सोचने का समय है
कहती है विचार कर
नादानी बनती काल है।
पहचानो अपनी ताकत
छोड़ो मन की गफलत
आयु से कर ले समझौता
यही है हमारे दिल की आहट
यदि पहचानोगे उम्र को
जिओगे हर एक पड़ाव को
बन जाएगा जीवन जन्नत
यदि सुन पाओगे समय आहट को।
(अशोक राय वत्स) स्वरचित
जयपुर
नमन मंच को
विषय : उम्र/ आयू
दिनांक : 07/04/2019

विधा : गजल

उम्रों के फासले

मिट जाएं गहरे घाव मगर,
मिटते नहीं निशां सनम।
उम्रों के फासले हैं,
अब अपने दरमियां सनम।
हम भूल ही जांएगे,
तेरा गम भी धीरे धीरे,
पर टीस उठती दिल में,
जांउ भी मैं कहां सनम,
उम्रों के फासले हैं,
अब अपने दरमियां सनम।
तेरे नाम का नशा भी,
उतरे न मेरे दिल से,
तेरी याद संग न छोड़े,
जाता हूँ मैं जहां सनम,
उम्रों के फासले हैं,
अब अपने दरमियां सनम।
तेरे इश्क में ओ यारा,
सुध बुद्ध भी खो गयी है,
मुझे खाली खाली लगती,
है जिंदगी विरान सनम।
उम्रों के फासले हैं,
अब अपने दरमियां सनम।
दिन सोच सोच निकले,
रातों को जागता हूँ।
कैसे गुजरें पल यह मेरे,
मुश्किल तेरे बिना सनम,
उम्रों के फासले हैं,
अब अपने दरमियां सनम।
चाहा न तुमने भी क्यो,
मेरा हाल ए दिल तो पूछते,
एक बार जान लेते,
कितना हूं परेशान सनम,
उम्रों के फासले हैं,
अब अपने दरमियां सनम।
उम्रों के फासले हैं,
अब अपने दरमियां सनम।

जय हिन्द
स्वरचित : राम किशोर, पंजाब ।

भावों के मोती :शब्द : उम्र
......................................
ऐ ! उम्र ए रफ़्ता जरा ठहर........

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चलो फिर उन्हीं राहों से हम तुम गुज़र के देखते हैं
साथ- साथ कुछ दूर और सफ़र कर के देखते हैं ।

रुक जाएगा वक्त जो तुम रुक जाओ चलते-चलते,
चंद लम्हे संग जी लें ,कुछ देर यहीं ठहर के देखते हैं ।

इधर तुम हो और तुमसे बावस्ता तमाम हसरतें हमारी ,
उस जानिब क्या है,वहाँ किसी दम चलकर के देखते हैं ।

नूर की चादर सी फ़ैल जाती है ,सुना है तेरे मुस्कुराने से,
शब ए तारीक़ी में उस जानिब कभी रुख़ कर के देखते हैं ।

तेरे आने की ख़बर से गुलिस्ताँ में है हर सूँ बड़ी गर्मजोशी ,
हथेलियों पे चलो आज शबनमी सहर रंगकर के देखते हैं।

ख़्वाबों की बारिशें हैं, भीगा-भीगा सा ये मौसम भी हँसी है,
पानी में तस्वीर उतारें , मुट्ठी में बूँदों को भरकर के देखते हैं ।

जाते-जाते जाने क्या सोचकर रुक गई शाम दहलीज़ पे,
ये शाम यादगार हो जाए चलो ऐसा कुछ कर के देखते हैं ।

ज़िंदगी बेवफ़ा सही पर कोई एक लम्हा तो होगा मेरे नाम , 
ऐ ! उम्र ए रफ़्ता ज़रा ठहर,कुछ और सबर कर के देखते हैं ।

कुछ यादें ,कुछ वादे, कुछ ख़ुशियाँ ,कुछ ग़म है मेरे दामन में 
आज चलो ! इन्हें हम अहले -ज़हाँ की नज़र कर के देखते हैं ।
सर्वाधिकार सुरक्षित (c) भार्गवी रविन्द्र 

बावस्त -संबंधित , ज़ानिब - की ओर ,शब ए तारीक़ी -रात के अँधेरे में 

समत -की ओर , अहले-जहाँ -दुनिया वाले

नमन मंच
विषय उम्र
मंगलवार 7.5.2019


आओ सपनों के चिराग जलाए हम
उम्र की दहलीज पर निखर जाए हम 

बचपन की मुस्कानों पर 
कल्पना की उड़ानों पर 
शरारत पर कुर्बान जानों पर 
आओ सपनों के चिराग जलाए हम 
उम्र की दहलीज पर निखर जाए हम 

यौवन का नशा सलोना हो 
ना गाना हो ना रोना हो 
खुशियों का एक कोना हो 
आओ सपनों के चिराग जलाए हम 
उम्र की दहलीज पर निखर जाए हम

जब दुख का घना अंधियारा हो 
ना दिखता कहीं उजियारा हो 
नजर ना आए किनारा हो 
आओ सपनों के चिराग जलाए हम
उम्र की हर दहलीज पर निखर जाएं हम

जब फुर्सत के फसाने हो 
न जीने के कोई बहाने हो 
उम्मीदों ने ना गाँव बसाने हो 
आओ सपनों के चिराग जलाए हम
हम उम्र की दहलीज पर निखर जाएं हम

मीनाक्षी भटनागर
स्वरचित

II उम्र/आयु II 

ग़ज़ल - हाथ से रेत की मानिंद फिसल जाऊँगा....


हाथ से रेत की मानिंद फिसल जाऊँगा....
मौत का हाथ पकड़ चुपके निकल जाऊँगा.... 

तू अगर साथ दे काँटों में भी खिल जाऊँगा... 
भोर के तारे सा हर राह में जल जाऊंगा... 

रात ज़ीने पे रुकी होगी अभी पर मैं तो....
ख्वाब बन कर तेरी आँखों में फिसल जाऊँगा...

ज़िन्दगी कहते रहें वो है तमाशा दो दिन...
मैं मगर उम्र तमाम याद में पल जाऊँगा....

कर के वादा यूं मुकरना नहीं बस में 'चन्दर'...
तू अगर चाहे तो मैं राख में ढल जाऊंगा...

II स्वरचित -सी.एम्.शर्मा II 
०७.०५.२०१९

#उम्र_ग़ज़ल 

ख़ुद थक के डूब जाएगा मजधार किसी दिन 
क़श्ती लगेगी ज़िंदगी की पार किसी दिन ।

मजबूत करो हौसलों से ख़ुद की ख़ुदी को
बाज़ू ही बनेंगे तेरी पतवार किसी दिन ।

इस्लाह मिले रोज़ जो उस्ताद की सादिक़
मशहूर होंगे अपने भी अशआर किसी दिन।

ख़ुद अपने हुनर की ज़रा आवाज़ सुनो तुम
दुनिया सुनेगी फिर वही झंकार किसी दिन ।

धीमी ही सही चाल लगातार चलें गर
मंज़िल भी पाएगी यही रफ्तार किसी दिन ।

चालीस श'अर हो गए हैं उम्र ग़ज़ल के 
मक्ता भी हो ही जाएगा तैयार किसी दिन ।

मां बाप के रहते जो नहीं बांटी मिल्कियत 
फिर होगा तमाशा सरे बाज़ार किसी दिन ।

तहज़ीब जो फर्जंद को हम अपने सिखाएं 
इज़्ज़त न हो इबनत की कभी तार किसी दिन ।

उम्मीद के सूरज के मुकाबिल रहे कब तक 
ऐ 'आरज़ू' छठ जाएगा कुहसार किसी दिन ।

-अंजुमन 'आरज़ू'©


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शब्दकोश:-

फर्जंद =बेटा 
इबनत =बेटी 
कुहसार =कोहरा

नमन
भावों के मोती
७/५/२०१९

विषय-उम्र/आयु

ढलती उम्र के साथ कृश होती काया
मन को उलझाए सांसारिक माया।
फंसता गया मन मृगमरीचिका में
मोहपाश जीवन उलझाया।

बुढ़ापा जाल कसता गया,
छीजती जा रही काया।
भूल भजन भगवान का,
मनवा चैन कहां पाया।

न समय के तू साथ चला,
न विचारों को बदल पाया।
जीवन भर जो बोया तूने
बढ़ती उम्र में सामने आया।

काया-माया नहीं है तेरी,
भ्रम में उलझी बुद्धि मेरी।
समय नहीं थमता कभी भी,
यह न कभी भी समझ आया।

वानप्रस्थी न बन पाया,
गृहस्थी में मन उलझाया।
बांध रखे खुद को बंधन में,
मुक्त उसे न कर पाया।

अभिलाषा चौहान

 नमन भावों के मोती
दिनांक-7/5/2019
विषय -उम्र

मानव जीवन सौ वर्षों का एक उपहार
बचपन जवानी बुढ़ापा यह सब हैं पड़ाव।
बचपन का वह खेलना खिलखिलाना
जीवन जीने को सब कुछ सीखना ।
धीरे-धीरे उम्र रफ़्तार पकड़ती जाती है
हसरतें ख्वाहिशें कुछ पूरी कुछ यूँ ही अधूरी रह जाती हैं।
कभी खुद उम्र की गिनती पर नहीं होता विश्वास ,
उम्र के इस पड़ाव पर आ गए इसका भी नहीं होता अहसास ।
वह तो आइना करा देता है यह अहसास ,
और इस सच्चाई पर करना पड़ता है विश्वास ।
पर हम तो उसी कशमकश में जीते हैं ,
रोज जिन्दा रहने के गुर सीखते हैं।
कभी बचपन यादों में आता है ,
कभी जवानी का नशा नहीं जाता है ।
उम्र चाहे कितनी भी होती है,
मन में बचकानी चाहें भरी होती हैं।
कभी- कभी यह अहसास होता है,
उम्र तो केवल आंकड़ों का खेल होता है।
यही सोचने की बात है, हमारे कैसे ख्यालात हैं।
यह कड़वा सच कि उम्र हो गई है ,
लगता पूरी तरह निराधार है ।
मन तो इन अहसासों से पूरी तरह आज़ाद है।
वह अभी भी बच्चों की तरह हँसता खिलखिलाता है।
अपने उम्र के दावों को पूरी तरह झुठलाता है ।
स्वरचित 
मोहिनी पांडेय
आज का विषय.......

उम्र

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घटते घटते घट जायेगी
सांसे तेरी जीवन की
तू सोचेगा उम्र कटी है
मियाद मगर कम जायेगी
तेरे जिंदा रहने की

जितनी सांसे मिली प्रभु से
रब की माला फेरा कर
जीवन है कुछ करने को 
सद् कर्म सदा तू किया कर

पंच तत्व का ये बलिंडा
एक दिन फुट जायेगा
माटी तन है तेरा फिर 
माटी में मिल जायेगा

ये जो थोडी़ उमर मिली है
नेक काम तू कर ले बंदे
सांसो की इक डोर है दिल की
ना जाने कब छोडे़ तेरा साथ रे बंदे ।

डा.नीलम .अजमेर

नमन भावों के मोती
दिनांक-7/5/2019
विषय -उम्र


उम्र का पड़ाव

उम्र का पड़ाव अस्सी के पार हाथ में सामान,
चलने में लाचार बेचारी बुढ़ापे से है परेशान।

झुकी कमर से चलना आज हो रहा है दुस्वार,
सुख-दुख मिलता नसीब से यही जीवन का सार।

बहू-बेटा से परेशान उस पर पडी वक्त की मार,
चल दी राह में तन्हा ढूँढ रही रहने को घरद्वार।

सपनों से सजाया घर अपना एक पल में छूट गया,
प्यार से बना माँ बेटा का अनमोल रिश्ता टूट गया।

अब नहीं रही माँ की ममता न रहा कोई भी प्यार,
जिसे पाल-पोसकर बड़ा किया सपने संजोये हजार।

बेसहारा बुढ़िया खोज रही अपनेपन का एहसास,
भटक रही राह में शायद कहीं मिल जाये आवास।

ख्वाब संजोये बेटा के लिए और सुविधा दी तमाम,
हर पल देती बच्चों को सहारा और ऐश-आराम।

शायद मेरे कर्मों की सजा है मुझे तेरा जैसा बेटा मिला,
इतिहास दोहरायेगा, इसी मोड पायेगा तू खुद को खड़ा।

सुमन अग्रवाल "सागरिका"
आगरा






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