Wednesday, May 8

"आंधी/तूफ़ान "8/ मई 2019

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        ब्लॉग संख्या :-380


शीर्षक आँधी, तूफान
विधा लघुकविता

08 मई 2019,बुधवार

जीवन ही संघर्षी होता 
आँधी तूफ़ा चलते रहते
अनवरत लड़ते हैं इनसे
वे प्रगति पथ आगे बढ़ते

आँधी तूफानों से खेले नर
इनसे क्या जग में घबराना
कर्मवीर टकराता निशदिन
नहीं लेता वह कभी बहाना

आँधी आती तूफ़ा आते
उड़ जाते घर और छप्पर
पेड़ पौधे धराशाही होते
भारी वस्तुएं उड़ती ऊपर

सागर में तूफान आते हैं
नाविक सदा नाव में घूमे
वह टकराता तूफानों से
जीवन मृत्यु को नित चूमे

नित अम्बर अंगारे बरसे
धरती धधक रही गर्मी से
गर्म आंधियां दुपहरी की
मन मचलता है तपन से

शिक्षा देती स्वयं प्रकृति
संघर्षों से कैसे लड़ना 
आँधी आवे तूफ़ा आवे
जीवन होता आगे बढ़ना

सुख दुःख यश अपयश 
यह कभी सत्य न होते
धूप छाँव आती जाती है
कर्मशील कभी न रोते।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

कुछ हवाओं की खबर से सदमे में शहर है। 
एक हम हैं जो कलेजे में तूफान लिए बैठे हैं।


तुम अपने दिल की करोगे यह मालूम तो था।
फिर उनका क्या जो तेरे अरमान लिए बैठे हैं।

सुना के मेरे चार ही मिसरों को मशहूर हुआ। 
एक हम गुमनाम जो पूरा दीवान लिए बैठे हैं।

दुआ खैरियत की यहां हर एक ने की रब से। 
एक हम हैं जो मौत का सामान लिए बैठे हैं। 

अब कौन पूछे हैं यूं मुहब्बत को इस दौरे दहर। 
वाकई दीवाने हैं ये जो दिलों जान लिए बैठे हैं। 

विपिन सोहल

तिथि - 8/5
विषय - आंधी/ तूफान
विधा - दोहा


आँधी में चट्टान हैं , वो वीरों में वीर
सीमाओं पर हैं डटे, अरि का सीना चीर

तूफानों से सामना , पर्वत से टकराय
ऐसे हैं वो सूरमा , जग सारा थर्राय

ऋतुएं बदलेंगी सदा , तू काहे घबराय
तूफानों के बीच भी , सुगम राह मिल जाय

तूफानों से नहि डरे , आगे बढ़ता जाय
काम सभी जो साध ले वही सफलता पाय

आंधी तूफां कुछ नहीं , गर मन में ले ठान
कभी जीत ले जिंदगी , कभी लुटा दे जान

सरिता गर्ग

नमन भावों के मोती,
आज का विषय, आँधी, तूफान,
दिन, बुधवार,

दिनांक, 8,5,2019,

कर्म सभी करते हैं अपना, जग की रीत पुरानी है।
प्रकृति हमारी करे सहायता , ये होती वरदायिनी है।
छेड़छाड़ जब मानव करता,
बन जाती विनाशनी है।
जीवन पथ अति दुर्गम होता, रोज परीक्षा देनी है।
जग ये रंगमंच कहलाता, किरदार में जान फूंकनी है।
निर्देशक ईश्वर जो होता, उसे पात्रों की परख करनी है।
सामना तूफानों का करना, सद्पुरुषों की यही कहानी है।
सुख दुख जीवन में आता रहता,
रफ्तार न इससे रूकनी है।

स्वरचित, मीना शर्मा, मध्यप्रदेश,

नमन भवों के मोती💐
कार्य:- शब्दलेखन
बिषय:- आंधी
दिनाँक:- 8-5-2019

जाती नहीं है याद,न होगा अब सबेरा।
यूं गुजर रहे हैं दिन,हो चंद घड़ी का मेला।।

चलती है आंधियाँ सी,कभी उठता गुवार तेरा।
पलकें झुकाये रखना, कहीं छल न ले बसेरा।।

टुकड़ा तेरे आँचल का,कभी सर पे आशियां था।
उसको बचाये रखना, मेरी मौत पे कफ़न सा।।

होगया है वक्त जर्जर,न सांसों का अब सहारा।
थी जिंदगी मेरी धूप,तुम घना साया।।

न आयेगी अब सांझ,न होगा कभी सबेरा।
दिल हो गया है पत्थर,तन बन गया है कांटा।।

( मेरे कविता संग्रह से )
डॉ.स्वर्ण सिंह रघुवंशी, गुना(म.प्र.)
आँधी/तूफान ।।

अन्दर भी तूफान है

बाहर भी तूफान है ।।

फिर भी इंसा कितना
बेसुध और अन्जान है ।।

एक बुलबुला हवा का
और हजारों अरमान हैं ।।

तूफानों से घिरी जिन्दगी
प्रभु का न हमें ध्यान है ।।

तेरा मेरा मेरा तेरा यह
इंसान की पहचान है ।।

प्रकृति की सुधि विसारी 
जिसका हमपे अहसान है ।।

उससे ही खिलवाड़ कर
खतरे में अब जहान है ।।

नित नये नये तूफानों से
हो रहा हमारा मिलान है ।।

उत्तरदायी खुद हम इसके
फिर भी नही यह भान है ।।

सारी सृष्टि इंसा से 'शिवम'
हो रही आज हैरान है ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 08/02/2019

तूफान की तरह आया समय गुजर गया
लेकिन ए मन वहीं ठहर गया 
आशा निराशा में में घिरे हुए थे हम 

आँधी की तरह निकल गए कहीं खुशी और गम 
सोचा था खुशियॉ बटोर भर लेगें दामन 
गम खड़ा सामने फेलाए हुए फन 
जो भी मिला उसी को लुटाते चले गए 
हर गम को धुऐं सा उड़ाते चले गए
इतनी कटी और भी कट जाएगी जिंदगी 
मन भावों के मोती सी संवर जाएगी जिंदगी 
जमाने से न कोई शिकवा न गिला 
जो भी कुछ मिला मुझे मुकद्दर से मिला ।


भावों के मोती
8/05/19
विषय आंधी-तूफान 


सूरज नीचे उतरता गया
मानो सागर में नहाने जा रहा हो
दिनभर का उत्ताप अब सहा नही जाता 
रोम रोम जला ,
जीवन और उजाला देता
खुद को झुलसाता 
कितनी सदियां यूं जलता रहेगा 
आह भरता है तो आंधियां आती 
कराहता है तो तूफान बनते 
रो भी नही सकता ,
बाहर आने से पहले 
आंसू वाष्प बन जाते
कभी बादलों से पनाह लेता
कुछ राहत पाता पर वहाँ भी न रह पाता 
आखिर जग ,जीवन 
उस की धूरी पर ही तो घूमता
न जाने कब तक जल जल
यूं सागर में डूबता रहेगा
सूरज नीचे उतरता रहेगा

स्वरचित 

कुसुम कोठारी ।

नमन मंच
दिनांक .. 8/5/2019
विषय .. आँधी तुफान

विधा .. लघु कविता
***********************
.....
गम बेच रहा हूँ मै, खरीदार ढूँढता हूँ।
चुपके से नही मै ये, खुलेआम बेचता हूँ।
वो आके खरीदे जिसे हर गम की हो परख,
इक बार नही मै ये बार-बार बेचता हूँ।
....
आँखो से निकलते मेरे आँसू को समझ ले।
गम उसका हुआ जो मेरी बातो को समझ ले।
वर्षो से तडपते हुए इस दिल का ये गम है,
कुछ मोल नही बस ये कि गम मेरा समझ ले।
.....
गम बेच रहा हूँ मै खरीदार ढूँढता हूँ।
मासूम मेरे दिल का गुनहगार ढूँढता हूँ
ये शेर का गम है बडे नाजों से है पला ,
जो इसको सम्हाले उसे मै आज ढूँढता हूँ।
....
आँधी नही तूफान मेरा गम है बवन्डर।
जो गम सम्हाले मेरा वो होगा सिकन्दर।
जो कोई खरीदार हो वो आ मिले मुझे,
गम उसको मिलेगा कि जिसका होगा मुकद्दर।
.....
गम बेच रहा हूँ मै खरीदार ढूँढता हूँ।
चुपके से नही मै ये खुलेआम बेचता हूँ।
वो आके खरीदे जिसे हर गम की परख हो,
हा शेर अपना गम बडा बेबाक बेचता हूँ।
.....
स्वरचित एंव मौलिक
शेरसिंह सर्राफ

बिषय:- आंधी, तूफानदिनाँक:- 8/5/2019

ग़ज़ल

अपनों से रिश्ता निभाना सीख लिया।
मेरे मन के ख़्वाब सजाना सीख लिया।

तेरी चाहत थी एक पल के लिये,
तूने असली रंग दिखाना सीख लिया।

जो वादा किया वो निभा न सके,
झूठी बातों में फसाना सीख लिया।

मुद्दतों से अश्क़ बहाये हमने अब,
ग़मों में भी मुस्कराना सीख लिया।

आहटें आँधिया की दस्तक दे रही,
तूफानों से भी टकराना सीख लिया।

कभी आ न सकी जीवन में बहार मेरे,
पतझड़ को गले लगाना सीख लिया।

आँखों से अश्क़ बहते मोती की तरह,
टूटे दिल को बहलाना सीख लिया।

स्याह रातों में जुगनुओं को देखकर,
अंधेरों में जगमगाना सीख लिया।

अब हम भी खुश हैं जीवन में "सुमन"
पन्नों पे कलम चलाना सीख लिया।

सुमन अग्रवाल "सागरिका"
आगरा

विषय :- आंधी/तूफान

तूफानों से घिरा हूँ...
पर हौसलों से न हारा हूँ..
जज्बातों से लड़ा हूँ..
संघर्षों से भरा हूँ..
जीवन हूँ मैं..हर राह पर जीता हूँ..
कभी-कभी खुद से लड़ता हूँ...
अकेले में अश्क भी बहाता हूँ..
गम के साये इतने घने है कि..
रातों में गले लगाकर सोता हूँ..
जीवन हूँ मैं...कभी न हारा हू..
रंगबिरंगी इस दुनिया में...
मिले कई अपने बेगाने..
उन सबके साथ मैं..
चंद सपने बुनता हूँ..
पल-पल श्वांस तंतुओं से...
हृदय पट को सीलता हूँ...
जीवन हूँ मैं...गमों के साये में पलता हूँ..
राह नहीं आसान कोई..
हटा कर कांटे पत्थर खुद ही..
उन राहों पर चलता हूँ..
संघर्ष मेरा तूफानों से..
हौसलों से पार कर जाता हूँ..
जीवन हूँ मैं...
हर दरिया दर्द का पार कर जाता हूँ..
उठते बवंडर कई..
इस भवसागर में..
ज्वार-भाटे से सुख-दुख..
हर रोज में सहता हूँ...
जीवन हूँ मैं...कभी न हारता हूँँ...

स्वरचित :- मुकेश राठौड़

विषय- आंधी /तूफान
विधा- हाइकु
1
आँधी के झोंकें-
मही पर बिखरे
पेड़ों के पत्ते
2
आंधी उड़ाती
मकानों के छप्पर-
धूल गुबार
3
तूफ़ान आता
जीवन उजाड़ता-
प्रकृति कोप
4
प्यार की आँधी
जिन्दगी की कहानी-
विश्व आधार

मनीष श्री
स्वरचित
रायबरेली
दिनांक- 8/5/2019
शीर
्षक- "आँधी/तूफान"
******************
आँधी देख जो डर गये, 
वो वही रुक गये, मगर
आँधी चीर जो आगे निकले, 
आज वो "अंबानी" बन गये |

यूँ तो तूफान आते ही हैं, 
जीवन लक्ष्य हिलाते हैं,
दृढ़ संकल्प जो ले वो, 
"कलाम" बन जाते हैं |

क्रान्ति की आँधी में, 
सर पर कफन बाँध, 
जो वीर चलते हैं वो ही, 
सच्चे देशभक्त होते हैं |

कभी प्यार की तो कभी, 
नफरत की आँधी चलती है, 
भावनायें जिसकी सही हो, 
सफलता उसको मिलती है |

स्वरचित *संगीता कुकरेती*

ये आंधी आऐं तूफाँ आऐं।
झंझावत चाहे जितने आ जाऐं।
प्रभु नहीं मिटेगी तेरी हस्ती,
न निराश चाहे कितने आऐं।

हम संघर्षों का नाम जानते,
प्रभु आशीष ले करें वंन्दगी।
जिल्लत से नहीं जीवन जिऐं,
सच संघर्षों का नाम जिंन्दगी।

हम कर्माधारित करें तपस्या
कर्म प्रधान सब विश्व जानता।
करें प्रेमप्रीति से निश्चित प्रगति,
शत प्रतिशत यह विश्व मानता।

तूफानों से कभी डिगें नहीं हम।
बाधाओं से कहीं डरें नहीं हम। 
सिर पर कफन बांधकर चलते,
क्या दुश्मन से भी लडे नहीं हम।

आंधी चाहे जितनी आ जाऐं।
काली बदली कितनी छा जाऐं।
भारत माँ का हर वीर सपूत ही,
लाखों गोली सीनेपर खा जाऐ।

ईशाराधना मिल सभी करें हम,
नहीं कभी आंधियों से घबराऐं।
सहयोग करें सहयोगी बन फिर
चाहे जितने तूफानों से टकराऐं।

स्वरचितःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.



जीवन की अभिलाषा लेकर
प्रतिपल पुलकित रहती हूँ।
आशाओं से दीप्त दिशाओं 
में ही आगे बढ़ती हूँ।

कितनी ही आँधी आ जाए
मेरे जीवन के पथ में ।
पर मैं अपने लक्ष्य- मार्ग से
कभी न विचलित होती हूँ।

मेरा जीवन - लक्ष्य राष्ट्र की
सच्ची सेवा करना है ।
मानवता की उचित प्रेरणा
हर इन्सां को देती हूँ।

सब मिलकर समाज के हित में 
निज कर्तव्य निभा पाएँ।
उनके मन में राष्ट्र-भक्ति का
ही एक मंत्र मैं भरती हूँ।

स्वरचित 
डॉ ललिता सेंगर

"आँधी/तूफान"
################
प्यार से बना था घर..
खुशी से जी रहे थे हम
सुबह से शाम .......
था सभी में उमंग..
बड़ा प्यारा था हमारा चमन
फूलों से खिला था...
घर आँगन.....
नेह का गहरा था रंग..
ना जाने......
कैसे मिला रंग में भंग...
चलता रहा......
घात ,,आघात.....
आहत होता रहा मन..
ईर्ष्या,, द्वेष..वैमनस्यता से..
बढ़ रहा था दवाब.....
आया एक दिन ऐसा तूफान
विभक्त हो गए हम......
टुकड़ों में बँट गये हम....
रह गया तू...तू...मैं...मैं
मैं ...गिरा.....इधर..
तू.....गिरा.....उधर...
किसी को नहीं खबर...
कहाँ-कहाँ गिरा कौन...
तिनका तिनका बिखर गया
अब भला.......
इसे समेटे कौन....!!!!!!

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल

शीर्षक- आंधी/तुफान

गीत "राही "

हंसते गाते चल ओ राही, हंसते गाते चल! 
जीवन की नय्या मे साथी, पतवार घुमाते चल! !

सुख दुख तुझसे हारेंगे 
आंधी तुफा थक जाएंगे! 
धुप छांव ढल जाएगी 
होगी रजनी शीतल! 
हंसते गाते चल ओ राही, हंसते गाते चल------------------!!

लालच के दाने बिखरे है 
और माया मोह के फंदे है! 
भूख प्यास को वश मे कर 
पंछी सा उडता चल !
हँसते गाते चल ओ राही, हंसते गाते चल ------------------!!

काम क्रोध मे कर कंजूसी 
तु बैर का बैरी बन! 
प्रेम भाव का बन व्यापारी 
इज्जत से तनकर चल !
हंसते गाते चल ओ राही, हंसते गाते चल ---------------!!

सागर छोटा बन जाएगा 
आएंगे नभ के तट 
झटपट झटपट चल साथी 
बिता जाए पल-पल
हँसते गाते चल ओ राही हंसते गाते चल! 
जीवन की नय्या मे साथी पतवार घुमाते चल! !

सरल सुरेश 
स्वरचित मौलिक रचना

नमन मंच को
शीर्षकांतर्गत द्वितीय प्रस्तुति


होती जब कुपित प्रकृति...
लाती तब तूफान प्रकृति..
हर तरफ मंजर तबाही का..
बिखेरती प्रकोप प्रकृति..

करती आगाह जन को..
न बिगाड़ अपनी संस्कृति..
कर संरक्षण हरपल इसका
है जीवन आधार प्रकृति..

आंधियाँ लाती बवंडर कई..
बना जाती घर खंडहर कई..
लीलती जानें मासूमों की..
ढहा जाती अहंकार कई..

उठते समुद्री तूफान देखो..
लाशों के कई अंबार देखो..
कर लो संरक्षित पर्यावरण..
फिर खुशियों के अंबार देखो..

स्वरचित :- मुकेश राठौड़

"शीर्षक-आँधी/तूफान
खंडहर देख यह लगता है
गुजरा होगा तूफां यहां से
कभी गुलजार रही होगी यहाँ जिंदगी
आज पसरा है विरान यहाँ पर।

खंडहर बनने से पहले
जमकर संर्घष तो किया होगा
मानव ने जो भूल किया,
उसे कैसे तुमनें सहा होगा।

पेड़ काट कर जो बन रहे बिल्डिंग
उसका परिणाम तो तुमने देखा होगा।
स्पर्द्धा से भरे इस युग में
पेड़ काटने से बचाना होगा।

तूफान आने से पहले
हमें सचेत रहना होगा
तूफान घबराये जिस आग से
वह आग हमें बनना होगा।
स्वरचित-आरती-श्रीवास्तव।

 नमन
भावों के मोती
८/५/२०१९

विषय-आंधी/तूफान

वक्त की बेरहम आंधी चली,
उजड़ गया खिलता गुलशन।
बागबां‌ देखता रह गया,
कैसे उजड़ा गुलशन।
न कली फूल बनी,
न पौधों पर आया यौवन।
उजड़ी उसकी दुनिया,
अश्रु से भीग उठे थे नयन।
एक तूफान के आने से,
टूट गए सारे सपने।
दर्द ने कराई पहचान,
कौन हैं अब अपने।
मुंह फेर कर खड़े हैं,
जिन्हें था गुलशन प्यारा।
कौन बनता है भला,
तूफान में किसका सहारा।
झूठे आंसू और हमदर्दी से,
जख्मों पर छिड़कते हैं नमक।
आंधियां दे जाती है सदा,
मन में सदा के लिए कसक।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित मौलिक

विषय --आँधी ,तूफान
8/5/2019::बुधवार

एक तूफ़ान
आया प्राकृतिक
और दूसरा 
मन के भीतर
आंतरिक
नितांत अपना
एक बबंडर ने
प्रकृति उजाड़ी
और दूजा बिगाड़ गया
मनोदशा
दोनों का था वेग बराबर
दोनों का उद्वेग बराबर
पर!!!!
बाहरी तूफ़ान गुज़र गया
छोड़ कर कुछ
बचे निशान
और अंदर का तूफ़ान
है बदस्तूर जारी
रजनी रामदेव
न्यू दिल्ली
स्वरचित

आंधी/तूफान

जब कदमों पे विश्वास हो,
ओर हौसलों का साथ हो।
फिर आंधिओं का डर कैसा,
जब जीत का अहसास हो।
कोई डर न रख तूफानों का,
न बोझ उठा एहसानों का।
तेरे हाथ में तेरी तकदीर छुपी,
बस ले सहारा भगवानों का।
यह आंधिआं तो नयी नहीं,
संग जिंदगी के चल रही।
तेरे हौसले से पस्त होंगी,
यह भी भला टिकती हैं कहीं।
इन आंधिओं से न डर यार,
मंजिल सामने तेरी है उस पार।
रुकती नहीं कभी भी आंधिआं,
बस हौसलों की है दरकार।
तूफानों का साथ ना छूटे,
लहरों का मजा तैराक ही लूटे।
जो डर जाए तूफानों से,
उसकी तो बस किस्मत रूठे।
समय है अब भी संभल जा,
उम्मीदों का जला ले दीया।
चट्टानों जैसे हौसलों के आगे,
आंधिओं की औकात है क्या ।
आंधिओं की औकात है क्या ।

विषय -आंधी / तूफान

आगे बढो आगे बढो
राह में रुको नहीं
पथ में भटको नहीं
आंधी आए या हो तूफान
तुम कभी डरो नहीं
वीर तुम भगो नहीं
गार्ग में रुको नहीं
काल से भी डरो नहीं
जीवन है अनमोल
यह मिलेगा न दुबारा
डर छोड़ आगे बढ
दुनिया में मिसाल बन
आंधी तूफान हैं बाधाएं
हंस कर मुकाबला
आगे बढ आगे बढ
दुनिया में मिसाल बन
(अशोक राय वत्स) स्वरचित
जयपुर


जय हिन्द

स्वरचित : राम किशोर, पंजाब ।


हरपल प्रतिपल जो अड़ा रहा
मन का सच लेकर जड़ा रहा
औरों की खातिर खड़ा रहा
तूफानों के, सुनाए तराना
ऐसा होगा कौन दीवाना

मन में बसता गाना हो
औरों का दर्द भी जाना हो
इंसा का कहां ठिकाना हो
तूफानों ने जलाए चिरागा
ऐसा होगा कौन दीवाना

रख लेता मन में अंगार
कर्म ही जिसका अधिकार
खुल जाएं सारे बंद द्वार
तूफानों में साथ निभाना
ऐसा होगा कौन दिवाना

मीनाक्षी भटनागर
08/05/2019
ाइकु (5/7/5) 
विषय:-"आँधी/तूफ़ान " 

(1)
स्वार्थ की आँधी 
उखड़ी भावनाएँ 
बिखरे रिश्ते 
(2)
ओले विकार 
समय का तूफ़ान 
उड़े सँस्कार 
(3)
रोटी न काम 
गरीब की जिंदगी 
रोज तूफ़ान 
(4)
तैरता झूठ 
ख़बरों का तूफ़ान 
डूबता सच 
(5)
संकल्प टिके 
सामर्थ्य का तूफ़ान 
विरोधी उड़े 

स्वरचित 
ऋतुराज दवे
हम घबराऐं विपदाओं से तो,
ये निशदिन आसपास घूमेंगी।
करें मुकाबला डटकर इनसे गर
निश्चित सफलताऐं चरण चूमेंगी।

ये आंधी आकर चली जाऐगी।
कम कभी ज्यादा हमें डराऐगी।
बुलंन्द होंसले रखें अगर हमेशा,
नहीं प्रगतिपथ से डिगा पाऐगी।

मनसे करें अभिनंदन तूफानों का,
अभिमान नहीं आऐ इस अंतस में।
प्राकृतिक दृश्य तो आते हीे रहते हैं
क्यों रहें कभी हम असमंजस्य में।

धरती माता सब कुछ तो देती है।
क्या बदले में हमसे कुछ लेती है।
आंधी तूफाँ आजोश भरें जीवन में
ये प्रकृति अपनी परीक्षाऐं लेती है।

स्वरचितःः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

तूफानों से घिरी जिन्दगी
चलने में है तेरी शान ।
क्यों डरें क्यों रूकें हम 
परम पिता की हैं संतान ।
उससे प्रीति जोड़ ले बंदे 
उसका ही है यह जहान ।
हिला नही पायेंगे तुझको
कितने आयें आँधी तूफान ।
एक साधे से सब सधे है
क्यों नही करे इसका भान ।
इधर उधर ढूढ़े सहारा 
जानकर क्यों रहे अन्जान ।
तुझमें ही है वह समाया
आँधी भी होगी हैरान ।
गर तूने वह जड़ जमायी 
होगी जग में ऊँची शान ।
रेत के महल बनाने के 
क्यों रखे व्यर्थ अरमान ।
बुलबुला सी यह जिन्दगी
क्यों न करे 'शिवम' ध्यान ।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 08/05/2019

विषय :-आँधी / तूफ़ान 
वि
धा :- कुण्डलिया
( १ )

दर्पण दिल का टूटता ,जब आता तूफ़ान ।
सभी सलीक़े छूटते , टकराते नादान ।।
टकराते नादान , बिखर कुनबाहै जाता ।
आँसू जाते सूख , एक दरिया बह जाता ।
बन जाते अनजान , जिन्हें तन करते अर्पण ।
पत्थर बन अपशब्द , तोड़ते दिल का दर्पण ।।
( २ )
अंदर चलती आँधियाँ , तोड रही है देह ।
विरहिण बैठी सोचती , कब बरसे गा मेह ।।
कब बरसे गा मेह , याद आँधी ही रहती ।
उड़ी संग ले प्रेम , रहे धारा इक बहती ।
बहुत जमी है धूल , हुआ मैला हृत मंदिर ।
रुके नहीं तूफ़ान , चले जो मन के अंदर ।।

स्वरचित :-
ऊषा सेठी 
सिरसा 125055 ( हरियाणा 

विधा-हाईकु
विषय- आँधी


रिश्ते जमीन
नफरत की आँधी
उड़े विश्वास

आँखों में धूल
अविश्वास की आँधी
मिलते जख्म

आँधी की मार
मधुबन विरान
माली हैरान
****
स्वरचित-रेखा रविदत्त
8/5/19
बुधवार

भावों के मोती : प्रेषित शब्द : आँधी/तूफ़ान 
************(********************
अभी हाल ही में उठे समुद्री तूफ़ान पर .....मेरी ये पंक्तियाँ 

————————————————————-
१)ये खामोशी की कैसी तड़पती गूँज है,
जो ,टकराकर मेरी साँसों से लौट गई।
समन्दर में उठा ये भीषण तूफ़ान कैसा 
जिसके अट्टहास से दिशाएँ काँप गईं।
जाने कितने किनारे बह गए चक्रवात में 
जाने कितने घरौंदे ये संग बहा ले गई।
इसके तांडव से कौन अछूता रह सका 
जाने कितनी ज़िंदगियाँ ये उजाड़ गई ।

२)तुम स्नेह प्यार का अखंड दीप बन जलते रहो 
आँधी तूफ़ान में भी जिसकी रौशनी कम न हो 
फ़क़त खुशी की जुस्तजू में कयों भटकता है 
ये जिंदगी है ,मुमकिन ही नहीं इसमें ग़म न हो ।
स्वरचित(c)भार्गवी रविन्द्र ..........बेंगलूर 
दिनांक ०८/०५/२०१९

नमन सम्मानित मंच
(आँधी/तूफ़ान)
************

भीषण स्वरूप समीरण का,
धूलकणों संग वेग तीव्रता,
मेघमालिका के गर्जन संग
चित्रित करते आँधी-तूपफ़ान।

चक्रवात तूफ़ान धरणि पर,
सर्वभूत क्षति के शुचि कारक,
भौतिकता विध्वंसक क्रूर,
चर-अचर जीव के संहारक।

अतिवृष्टि आँधी के सहचर,
तूफ़ान रचाते ताँडव असह्य,
दानवता की क्रीड़ा चहुँ दिशि,
मानवता का क्रन्दन असह्य।

अज्ञान तिमिरमय तूफ़ानों से,
क्षत-विक्षत मानव प्रजाति,
ज्ञानदीप प्रज्वलन अपेक्षित,
मानवता संरक्षण हित।
--स्वरचित--
(अरुण)

मन भावों के मोती
हाइकु आँधी, तूफान, 


आँधी चुनाव
गालियों की बौछार
कितना शोर।

तूफान मोदी
विपक्ष परेशान 
हाल बेहाल।

तूफान बदी 
मानसिकता हावी
सच्चाई हारी।

बेरोजगारी
आई तूफान आँधी
छायी उदासी।

अभिभावक
भावनाओं की आँधी
अकेलापन।

तूफान फोनी
नुकसान तमाम 
सब हैरान।

स्वरचित, मीना शर्मा, मध्यप्रदेश,

 II आंधी /तूफां II शुभ रात्रि... 

मैं अपने टुकड़ों को...

इकट्ठा कर रहा था...
भीतर उमस बढ़ रही थी...

बाहर कहीं ढोल नगाड़े बज रहे थे...
तो कहीं चीख पुकार से मातम छाया था...
मन सहम सा गया...
घर के खिड़कियाँ दरवाज़े...
सभी बंद कर दिए...
फिर भी...
शोर कम नहीं हुआ....
कानों में रुई डाली...
पर शोर...
सांयें सांयें करता हुआ....
आंधी की तरह....
चीखने लगा भीतर....

दुनिया से भाग जाना सरल है...
पर मन से...?
भीतर...
ज्यादा भयावह था....

सफ़ेद बादलों के चहरे...
जाने पहचाने से...
काले पड़ गए...
आँखों के आगे अँधेरा...
घुप्प अँधेरा....
गैरों में अपने...
अपनों में गैर नज़र नहीं आये...
डूब गयी आँखें....
पर सब और सियाह...
सब स्याह....

बारिश होने लगी...
तूफां थमा तो...
इकठ्ठा करने लगा...
अपने को...
फिर से..
बिखर जाने को...

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II
०८.०५.२०१९

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