Wednesday, June 5

"पर्दा"05जून 2019

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                                       ब्लॉग संख्या :-408


नमन मंच
दिनांक .. 5/6/2019
विषय .. पर्दा
********************
......
उठा दो राज से पर्दा, कोई ना बात रहने दो।
जो कहना है कहो तुम भी, मुझे भी आज कहने दो
....
रहे अब क्यो झिझँक कोई, जो अब हम एक हो बैठे।
नही पर्दा कोई अच्छा जो, दिल से एक हो बैठे।
....
कहो हे प्रियतमा, क्या रात अपनी यू ही गुजरेगी।
नही बोलोगे तो फिर प्यार पूरी, कैसे फिर होगी।
.....
चलो छोडो हटाओ, लाज का पर्दा समा जाओ।
तुम अपने शेर के मन से,सरक कर  हृदय तक आओ।
....
चलो इतिहास लिखने है, हम अपने मन की कहते है।
गिरा के सारे पर्दो को, मिलन हम आज करते है।
......

शेरसिंह सर्राफ
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।। पर्दा ।।

खिड़कियों में पर्दे हैं पर
बदन पर पर्दे हैं नदारत ।
खुदा जाने कौन सी अब
लिखने जा रही है इबारत ।
फाड़ कर पेन्ट पहन रहे 
ये कौन सी भला है शरारत ।
पर्दा नाम की चीज नही 
ये कैसा है आधुनिक भारत ।
आँखों का पर्दा न बातों का
यह संस्कृति पर है सामत ।
सीख देना 'शिवम'मुसीबत
सुनूँ शब्द तुम्हे कौन आफत ।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 05/06/2019
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आप की नजदीकियों क्यों दुश्मनों से आजकल। 
बढ रही है  दूरियां क्यों  हम दोस्तों से आजकल।

पूछें भी तो क्या कहें हम हाले दिल उनसे कभी। 
उलझने की हिम्मत नहीं  उलझनों से आजकल। 

क्या  कहें  सीने में  कुछ  है  अजब सी हलचले। 
दिल की  बनती ही नहीं  धडकनों से आजकल। 

जो़र  मुझ पर  अब किसी का है नहीं  मेरे सिवा। 
मन हुआ आजाद इन सब  बन्धनों से आजकल। 

बे-कदर है  बे-मजा़ है  सच्ची मुहब्बत  इन दिनों। 
पत्थरों की  दोस्ती है  अब  आईनों से आजकल। 

बेपर्दगी  और  बेहयाई है  रवायतें  इस दौर की। 
कर रहे  परहेज है  सब  चिलमनों से आजकल। 

                                           विपिन सोहल 
स्वरचित

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🙏भावों के मोती🙏
 5/6/19 
विषय-पर्दा 
 विधा-हाइकु  ●●●●●●●● ●●
1)
हटाओ पर्दा 
घर भीतर बैठा 
दर्शन कर ।।
2)
चांद धरती 
बीच पवन पर्दा
फाड़ के आया।।
3)
परदा फटा
मीठी शान्ति तलाश 
कुछ तो कर।।
4)
अंधेरा पर्दा 
अमावस की रात 
रोका मिलन ।।
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 क्षीरोद्र कुमार पुरोहित
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,🙏🌹🌹जय माँ शारदे ,,🙏🌹🌹
नमन मंच भावों के मोती
बिषय पर्दा,,
5/6 /2019/
 प़भु तेरे दर पे सिर झुकाया है हमने 
अपने गुनाहों से पर्दा हटाया है हमने
करो न करो माफ मर्जी तुम्हारी
आइना अपना दिखाया है हमने
ठुकराये हुए जमाने से हम तो
दर्द अपना तुम्ही को सुनाया है हमने
मझधार में है कश्ती ए मेरी
ऐ बेड़ा तुम्ही को थमाया है हमने
चलो.अब तो कर लें दीदार तेरे
जज्बा ए दिल में अपने जगाया है हमने
स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार
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नमन भावों के मोती,
आज का विषय, पर्दा
दिन, बुधवार
दिनांक, 5,6,2019

प्रभु आपसे नहीं जब कोई पर्दा,
क्यों हम जग से पर्दा कर रहे हैं।

सच्चे साथी हैं जब आप ही हमारे,
जग से फिर हम क्यों डर रहे हैं।

क्या कर रहे हैं हम सब यहाँ पर,
आप तो सब कुछ देख रहे हैं।

छुप कर के दुनियाँ से जो कर रहे,
परिणाम से क्या हम बच सके हैं।

जग में झूठी आशा लालसाओं का,
कभी पार क्या हम क्या पा सके हैं ।

अपनी आत्मा  से हम  करके पर्दा,
क्या कभी सुखी हम रह सके हैं।

जग में जब कर्म ही करना है हमको,
मेहनत व्यर्थ फिर क्यों कर रहे हैं।

काम कुछ हम अच्छे ही कर लें,
खुद को हम क्यों छलते जा रहे हैं।

कभी पर्दा से हल क्या  कोई निकला, 
समस्या फिर  हम क्यों बढ़ा रहे हैं।

रहने दें जो हम  मन को अपने उजला,
खुद ही संताप सब दूर हमसे जा रहे हैं।

स्वरचित, मीना शर्मा, मध्यप्रदेश,

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भावों के मोती
5/06/19
विषय पर्दा /परदा

नर्म पर्दो से झांकती जिंदगी। 

क्या है जिंदगी का फलसफा 
कभी नर्म पर्दों से झांकती खुशी सी जिंदगी
कभी तुषार कण सी फिसलती सी जिंदगी
कभी ख्वाबों के निशां ढूंढती जिंदगी 
कभी खुद ख्वाब बनती सी जिंदगी 
आज हंसाती कल रूलाती जिंदगी 
लम्हा लम्हा बिखरती सिमटती जिंदगी 
कभी चंद सांसों की दास्तान है जिंदगी 
और कभी लमबी विराने सी फैली जिंदगी 
हर बार निकलता एक लफ्ज है लब से 
क्या है जिंदगी ? क्या यही है जिंदगी ?

स्वरचित 
               कुसुम कोठारी ।

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विश्व पर्यावरण दिवस की आप सभी को बहुत बहुत शुभकामनाएं 🌳🌲🌴🍀

     शीर्षक-"पर्दा"
       चंद हाइकु 
****************
         वृक्षारोपण 
       बना पर्यावरण 
       छाँव का पर्दा 

        नारी घूँघट 
    कमजोरी समझा
      बेपर्दा किया

        स्वार्थी बना
   संस्कारों को भुलाया 
     अक्ल पे पर्दा

      जाली का पर्दा
   माँ कालिका मंदिर
       दर्शन इच्छा 

       अच्छा या बुरा
      देखता न मानव
       आंखों पे पर्दा 

   स्वरचित *संगीता कुकरेती*

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नमन मंच भावों के मोती
शीर्षक   पर्दा
विधा      लघुकविता
05 जून 2019,बुधवार

पर्दा होता स्वयं सुरक्षा
आन मान सम्मान देता
पर्दा अति जरूरी जग में
गोपनीय तन को रखता

भक्त ईश्वर में क्या पर्दा
नर नारी आवश्यक पर्दा
गुरु शिष्य सम्मान में पर्दा
स्वामी सेवक मध्य पर्दा

माया मोह का पड़ा है पर्दा
कोई जीवन जान न पाया
जन्म मृत्यु मध्य जीवन को
रोया हँसा पीया और खाया

जीवन रहस्य छिपाता पर्दा
बिन पर्दे के क्या जीवन है
करो काम सदा हितकारी
खिले अद्भुत प्रिय उपवन है।।

स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

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पर्दा है पर्दा पर्दे के पीछे
   सतरंगी चाले
चल रहे हैं लोग 
     बना रहे हैं बातें
कर रहे हैं हैं जोग
   ना कोई काम होता
स्वारथ का साथ होता
   अपना मतलव पूरा होता
जनता का साथ होता
    पर उनका हित कुछ नहीं
ये सब पर्दे के पीछे
 आगे लच्छेदार भाषण होता
स्वरचित एस डी शर्मा

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नमन मंच
दिनांक .. 5/6/2019
विषय .. पर्दा
विधा .. ग़ज़ल

चेहरे पर से पर्दा मैने उठाया भी नहीं।
आईना में देख कभी शर्माया भी नहीं।

जीवन में खुशियाँ थी गमों में बदल गई,
खुशी से एक पल, बिताया भी नहीं।

जो भी संजोये ख्वाब, सारे बिखर गए,
कभी जी भरके मन मुस्कराया भी नहीं।

वो दिल में दस्तक देने आते तो हैं मगर,
मुद्दतें गुजर गई, हमने जताया भी नहीं।

उनकी बेरुखी से दिल बैचेन सा रहता है,
जो वादे किये थे उसने निभाया भी नहीं।

तुम खास हो मगर हम ठहरे आम इंसान,
इसीलिए चाय पर हमें बुलाया भी नहीं।

तेरा इंतजार करती रही दिन-रात ”सुमन”
दीये तले अंधेरा चराग़ जलाया भी नहीं।।

सुमन अग्रवाल "सागरिका"
          आगरा

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नमन मंच-भावों के मोती
दिनांक-05.06.2019
शीर्षक-"परदा "
विधा - मुक्तक
🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹
                     (01)
दिल को कभी मेरे सनम!तरसा न रखो तुम।
रुख  पर  जो  मेरे सामने परदा न रखो तुम।।
मुँह का अजी दिलबर  मुझे दीदार करादो,
मुझ से हया का वासिता इतना न रखो तुम।।
                      (02)
रुख को तेरे देखे बिना ये दिल न रहेगा ।
परदा  हटेगा  चाँद    मुकाबिल न रहेगा।।
कर दे महर इस हाल पर ऐ मेरी ज़ुलैख़ा!
कहता हूँ सच कि दिल मेरा बिस्मिल न रहेगा।।
🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹
        "अ़क्स " दौनेरिया
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नमन सम्मानित मंच
        (पर्दा)
         ****
यामा  के  नित  चारु  अंक में,
  तिमिर गहन  का  शाश्वत पर्दा,
    मुख मयंक पर यदा कदा शुचि,
      मेघमालिकाओं     का     पर्दा।

मुख्य  भूमिका  चारु  सृष्टि  में,
  पर्दे    की     निर्वहन    निमित्त,
    संरक्षित   करना    शुचितामय,
      कुत्सित  दृष्टि   से   बसुधातल।

लज्जा  अवनत  पलक युगल,
  मदभरे   लोचनों     हित   पर्दा,
    कामिनी हितार्थ  घूँघट अदभुत,
       प्राचीनकाल   से   शुचि   पर्दा।

आवासकक्ष को सज्जित करने,
  वस्त्र   सुनिर्मित    अनुपम   पर्दे,
    ईश्वर  मात्र    धरणि   पर  शक्ति,
      मुक्त  विकारों   से   जो  कर  दे।

मानस  पर  मानुष  के अतिशय,
  अज्ञान -तिमिर  का धूमिल पर्दा,
    मातु       शारदे!   वीणावादिनी,
     करदे    ज्ञान-राशि    की    वर्षा।
                            --स्वरचित--
                               (अरुण)

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सादर नमन
विषय-पर्दा
 हाँ मैं पर्दा हूँ,
कभी किसी की गलतियों पर ड़ाला जाऊँ,
कभी बन हया का पर्दा चेहरे पर ड़ाला जाऊँ,
बन दौलत का पर्दा किसी के पाप छुपाऊँ,
कभी ड़ल यौवन के चेहरे पर सबको रिझाऊँ,
हाँ मैं पर्दा हूँ,
चारों ओर अब तो यही माहौल है,
झूठ की हर तरफ घोल है,
सत्य यहाँ अनबोल है,
पर्दे का जीवन में बहुत मोल है,
हाँ मैं पर्दा हूँ,
शौहरत का बन पर्दा दागी चेहरे छूपाता हूँ,
खौफ का पर्दा बन थोड़ी इंसानियत बचाता हूँ,
झूठ का पर्दा जब बन उठता हूँ,
सत्य के दर्शन कराता हूँ,
हाँ मैं पर्दा हूँ,
मन मुताबिक बन जाऊँ,
ऐसा मैं पर्दा हूँ,
***
स्वरचित-रेखा रविदत्त
5/6/19
बुधवार

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नमन       भावों के मोती
विषय      पर्दा
विधा       कविता
दिनांक     5-6-2019
दिन         बुधवार 

पर्दा
🎻🎻🎻

आँखों का पर्दा बहुत ही झीना
लेकिन यही है अलग नगीना
जब तक यह आँखों में रहता
सब ओर एक सौहार्द बहता। 

बड़े पर्दे भी बिल्कुल ज़रुरी हैं
पर वे तो केवल मजबूरी हैं
पर्दा हटा दो तो सब कुछ नग्न
लोग इसे उघाड़ने में रहते मग्न। 

पर्दे की शालीनता हमारे हाथ
यही रहती है मानव के साथ
जब  हो जाती है यह भंग
छाते सब ओर आसुरी रंग। 

स्वरचित
सुमित्रा नन्दन पन्त 
जयपुर

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नमन-मंच
वार - बुधवार
तिथि - 5 मई 19
लघुकथा-पर्दा के अंतर्गत मेरी रचना पछतावा

क्यूँ रो रही हो, अब लक्ष्मी?
लाख समझाया.,मत डालो बेटे की गलतियों पर पर्दा।"
मगर तुम,कहाँ सुनती थी।
हर बार ,हाँ हर बार ,जब भी मैंने इसे डाँटा ,तुम आड़े आकर उसका पक्ष लेकर मेरे ही खिलाफ हो जाया करती थी ।
मैं लाख कहता,"वो गलत दिशा में जा रहा है.।मगर तुम मेरा बेटा ऐसा नहीं है.बस थोड़ा नादान है. कहकर टाल देती।"
"हर साल फेल होता रहा ।5 साल हो गये 11रवीं में..
और तुम कहती रही वो उसके टीचर उससे चिढ़ते है।नंबर नहीं देते।
रात- रातभर पढ़ता है मेरा बेटा।"
जब रात में उसके बिस्तर पर न पाकर पूछता,कहाँ है दीपक?
तो कहती पढ़ने गया  है दोस्तों के पास।
लाख बार कहा ,"सँभाल लो इसे,मैं अपना बिजनस सँभालू या इसपर नजर रखूँ पर बस तुम मेरा दीपू,.मेरा दीपक कह सर पर चढ़ाती रही।
लो आज तुम्हारा दीपक बुझ गया।

"उन्हीं लोगों ने मार डाला ,जिनके धंधे में फँसकर जाने कितने गलत काम करने लगा लगा था।रात -रात गायब रहकर ,लड़कियों कि सप्लाई करने लगा था ,तुम्हारा बेटा।"
तश्करी, ड्रग्स का धंधा और न जाने क्या क्या..
"अब क्या कहोगी बोलो?"
उठो,चलो अपने लाडले को अंतिम विदाई ...
 कहते हुए ,राजेश की आँखे झर झर बह रही थी और गला भर गया....
 दीपक को कँघे पर उठाकर खुद को कोस रहा था,".मैं क्यूँ सारा दोष ,लक्ष्मी पर गढ़ रहा हूँ।माँ तो होती ही ऐसी है। बेटे के प्यार में अँधी।इस बेचारी को तो जैसा वो बोलता मान जाती थी पर मेरी आँखो पर तो पर्दा नहीं पड़ा था न।
मुझे तो शक था न कि दीपक कुछ तो गलत कर रहा है।"

मैंने क्यूँ नहीं छानबीन की
थोड़ा सा कड़क हो जाता .ज्यादा  से ज्यादा क्या होता दोनो खफा हो जाते। मुझसे दूर हो जातेपर आज मेरे घर का चिराग...
भाड़ में गया ऐसा बिजनस ..जिसमें मैं रात-दिन डूबा रहता हूँ ...
कहते कहते..अश्कों को थामने की कोशिश  कर रहा था।
मगर वो रूकने का नाम नहीं ले रहे थे
मगर ,अब पछतावे के सिवा।कुछ न बचा..

स्वरचित
गीता लकवाल
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नमन मंच 
5/6/19
विषय -पर्दा 
**
परदे  को महज  पर्दा  न समझ 
नजरों  की हया कहलाती है 
जब चाँद नजर आता  है हमें 
बस ईद तभी हो जाती है ।

है अब न चलन इस पर्दे  का
परदे  से  निकल  अब बाहर आ 
आखों  में  शरम बाकी रखना 
परम्परा  के  संग  तू आगे बढ़ 
दुनिया को निज मुट्ठी में  कर।
**
स्मृति श्रीवास्तव स्वरचित



सादर नमन
05-06-2019
पर्दे
तेज हवा का झोंका आया
मुट्ठीभर किरणें भी लाया
खिड़कियों के पर्दे हिल गये
ज्योति बिंब कई खिल गये
तम की कारा में एक इंसान 
रश्मियों को देख हुआ हैरान
आत्ममुग्ध, जग से अंजान
हिलते पर्दों पर दिया ध्यान
फैला है बाहर नीला वितान
अनगिन राग-रंग विद्यमान
रश्मि-पुंज को जो लाना है
पर्दों को महज सरकाना है 
-©नवल किशोर सिंह
    स्वरचित

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नमन "भावो के मोती"
05/06/2019
   "पर्दा"
################
देखकर  चाँद  को जलता  है  दिल,
बादलों का पर्दा अभी बहाल रखिए।

रुपहले  पर्दे  की  लुभाती  है दुनिया,
वास्तव दुनिया का हाल-चाल रखिए।

रुला  रही  है  इस कदर जिंदगी  मुझे,
अश्कों के लिए पर्दे सा रुमाल रखिए।

पर्दे के पीछे है चाँद सा मुखड़ा,
हसरतें कुछ  ऐसी पाल रखिए।

आँखों  में चढ़ गया जो अहं का  चश्मा,
घर की खिडकियों पे पर्दा जाल रखिए।

बेटे की गलतियों पे पर्दा न ढाँकिए,
बेटी  का  भी जरा  खयाल  रखिए।

फैशन में बेपर्दा न करो वदन का,
पोशाक अपनी बेमिसाल रखिए।

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल

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नमन मंच को
दिन :- बुधवार
दिनांक :- 05/06/2019
विषय :- पर्दा

ये परदे से झांकता..
तुम्हारा ये अक्स..
जैसे बादलों से झांकता चंद्रमा..
अपनी धवल चंद्रिका फैला रहा..
स्वच्छंद मुस्कान से तुम्हारी..
हृदय उपवन लहलहा रहा..
कुदरत की हो कुशल कारीगरी...
या महताब की कोई जादूगरी...
परदा भी तार तार हो रहा..
अक्स पर पसरकर तुम्हारे..
इस स्याह अंधियारे में...
और निखर आया अक्स तुम्हारा..
लज्जा की मूरत तुम...
प्रेम की अद्भुत सूरत तुम..
तुमसे ही खिले हर उपवन..
हो सृजित हर कली तुमसे..
हो वो खिलखिलाता चमन तुम..
झील से ये द्वय नयन..
खिलते जैसे इसमें कमल..
सोमरस छलकाते ये..
मादकता लहराते ये..
सुंदर छवि अलौकिक तुम्हारी..
प्रेमसुधा बरसाते ये..

स्वरचित :- मुकेश राठौड़

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दिनांक-5-6-2019
विषय-पर्दा
विधा-कविता

स्वरचित-
शीर्षक- "पर्दा"

पर्दे में पैसा हो
पर्दे में  हुस्न
वंशजों ने माना
विचार ना थे रूग्ण

पर्दे में  खाना
पर्दे में ही नहाना
पर्दे में खाएं हम 
भूलें सब खम

बेपर्दा इन सबकी 
पहचान नहीं है
आन बान शान
और मान नहीं है

ढक जाए 
गुलबदन
ताले में 
टिके धन

मूक रूप निखरेगा
उघड़ा तो बिखरेगा
पर्दे में नूर हो
दर्शक मजबूर हो

स्वाद,दरस झूमेंगे
आसमान चूमेंगे
पर्दा परंपरा है
भले ना अपनाओ
शब्दों के से पर्दे से
थोड़ा तो झांक जाओ.   
  ____
डा. अंजु लता सिंह
नई दिल्ली

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नमन-भावो के मोती

दिनांक-05/06/2019

विषय- पर्दा 

रंगमंच बदल गया 

पर्दा निःशब्द था।

न जाने कौन सा मेरा

 निर्दयी प्रारब्ध था।।

पर्दे के पीछे फूलों ने ले ली

 तन मन की अगड़ाई।

पर्दे के पीछे चांद छुपा था

मेरे पास थी तन्हाई।

मन में वेदना ,मस्तक में आधी 

होठों पर थी हया की लाली

निःशब्द पर्दे ने ही छुपाई।

स्वरचित 
सत्य प्रकाश सिंह प्रयागराज

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5/6/19
भावों के मोती
विषय-पर्दा
_________________
हटा कर अँधेरे का पर्दा
उजाले का दामन थामकर
निकल पड़ी नयी राह पर
अपनी खुशियों की चाह लिए
कब तक पर्दे में दुःख सहती 
खुद को टूटने-बिखरने देती 
क्या मिला अब तक उसे
पर्दे के बँधन में बँधकर
रिवाजों से नाता जोड़कर 
माँ,बेटी,बहन,पत्नी बनकर
पूरी निष्ठा से जीती रही
कष्ट सहती रही
रिश्तों को स्नेह से सँवारती
हरदम तिरस्कार सहती रही
फिर क्यों जिये डर-डरकर
मन को मारे मर-मरकर
हटा दिया डर का पर्दा 
कर गर्व से सिर ऊँचा 
हौसलों की उड़ान भरने
नये कीर्तिमान रचने लगी
फिर भी भूली नहीं कर्त्तव्यों को
स्नेह प्रेम से सींचकर
नारी बन ममता की मूरत
रिश्तों को सहेजती है अब भी
***अनुराधा चौहान***©स्वरचित✍

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नमन भावों के मोती
दिनाँक - 5/6/2019
आज का विषय - पर्दा

2122    2122    212

आपने देखा किनारा कर लिया,
याद तेरी में गुजारा कर लिया,

जुल्फ का #पर्दा गिरा था इस कदर
दिन उजालों में अँधेरा कर लिया,

मामला था ये दिलों का इसलिए
दिल हमारा अब तुम्हारा कर लिया,

आप मानो चमकता ये चाँद हो
खुद को मैंने सितारा कर लिया,

आपने देखा नहीं पलट कर भी
आपकी रजा में नज़ारा कर लिया,

स्वरचित
बलबीर सिंह वर्मा
रिसालियाखेड़ा सिरसा (हरियाणा)
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नमन"भावो के मोती"
05/06/2019
  "पर्दा"(2)
1
पूरी जिंदगी
रंगमंच का पर्दा
घंटों में बीता
2
पर्दे के आगे
अभिनय दुनिया
यथार्थ भागे
3
मेघों का पर्दा
उषा हुई व्याकुल
रवि झाँकता
4
पर्दे के पीछे
चाँद सा वो मुखड़ा
नैनों ने देखा
5
पर्दे में रहा
सादगी में ही भला
तन,आबरु
6
मान,सम्मान
 बेपर्दा न करना
लिहाज रख
7
जुल्फों का पर्दा
शर्माती रही गोरी
सावन घटा

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल

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आज का विषय पर्दा ।
पर्दा हर जगह होता ।।
जब मेघ श्रृखलाऐ घिर आती तपन सूर्य होते पर्दे मे ।
चाँद की चद्रिका भी होती परदे मे ।
असर होता चकवा चकवी पर ।
आज सब बेपर्दा हो रहे ।
शायद इसीलिऐ मर्यादाऐ गुम हो रही ।
राजनीति भी.बेपर्दा महत्व घट रहा ।
नीतियां नही किसी भी कार्य मैं ।
देखो न मानव ने सभी नीतियां छोडी ।
बोल भी.बेपर्दा हुये कोई क्या बोल रहा.होश ंनही ।
ओजोन परत पर्दा.से धरा सूर्य दोनो के बीच ।
देखो छिद्र उसमे भी हो रहे ।
पर्दा ही अच्छा सबके लिऐ ।



शुभ संध्या
विषय-- ।। पर्दा ।।
विधा -- ग़ज़ल
द्वितीय प्रस्तुति

सच का पर्दाफ़ाश एक दिन होता है
झूठ कभी न कभी यहाँ पर रोता है ।।

सच का दामन पकड़ो सच रहता है
क्यों बेवजह झूठ असत्य को ढोता है ।।

बन्द मिलेंगीं सारीं राहें देखी परखीं 
वक्त कीमती है उसे क्यों खोता है ।।

कण कण में वही एक समाया है
हवा हर जगह है हवा कोई रोका है ।।

झूठ पर पर्दा एक बड़ी ही भूल है 
खुद को ही देना बड़ा यह धोखा है ।।

झूठ पर पर्दा प्रभु से दूरी है 'शिवम'
प्रभु से दूर कोई सुख स्वप्न सँजोता है ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 05/06/2019



1*भा.5/6/2019/बुधवार
बिषयःःः#पर्दा#
विधाःः काव्यः ः

   प्रभु से क्यों करते पर्दा
     सबको जो नंगा कर देता।
        छोडें सबकुछ इसके ऊपर,
           ये पलभर में चंगा कर देता।

बुरा भला सब इस पर छोडें।
  रागद्वेष से सबही मुख मोडें।
     प्रेमपात्र बन जाऐं एकदूजे के,
        वेपर्दा हो सबको ही हम जोडें।

मोहमाया का पर्दा छाया।
 ये अंतर्मन की मैली काया।
   है अंन्तर्यामी सबका स्वामी,
      करते प्रभु सब वेपर्दा माया।

 आओ परस्पर प्रीति बढाऐं।
   संकीर्ण भाव हम सभी मिटाऐं।
     रखें खोलकर कर दिल की बातें,
       फिर विश्वास आपसी सभी बढाऐं।

स्वरचितःः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

1* भा. #पर्दा#काव्यः ः
5/6/2019/बुधवार

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"नमन-मंच"
"दिनांक-५/६/२०१९"
"शीर्षक-पर्दा"
कृतज्ञ रहूँगी मैं तुम्हारा
मत काटो इस नीम को
प्रकृति का यह अनुपम उपहार
है हमारे खिड़की का पर्दा आज।

बुरी नजर से यह बचाती
है घर मे बहु बेटी सुरक्षित
इसके ओट मे बैठकर
निहार लेती वो कुदरत को।

है हमारे घर मे एक ही पर्दा
जो बढ़ाते दालान की शोभा
गर पेड़ तुम काट डालोगे
खिड़की फिर हम बंद रखेंगे

अनुनय करूँ मैं तुमसे
मत काटो इस नीम को
पर्दा मे हमें रहने दो
बेपर्दा मत होने दो।
स्वरचित-आरती-श्रीवास्तव।

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नमन
भावों के मोती
५/६/२०१९
विषय-पर्दा

पड़ा है आंखों पर पर्दा,
एक दिन उठ ही जाएगा।
मिटा के प्रकृति को मानव,
तू भी बच न पाएगा।

वृक्षों को काटता निशिदिन,
लगाता एक न पौधा।
तेरी करनी से इकदिन,
ये चमन उजड़ ही जाएगा।

मिटा दी हरियाली तूने,
खड़े अब कंक्रीट के जंगल।
तोड़ डाले पर्वत तूने,
खड़े किए कचरे के पर्वत।

उजड़ती इस धरा की पीर,
जब तक तू समझ पाएगा
हो चुकी होगी तब देर
कुछ भी बच न पाएगा।

हटा लें आंखों से पर्दा,
हकीकत को समझ ले तू।
प्रकृति के बिना तू भी,
जीवित न बच पाएगा।

सूखती नदियों की पीड़ा,
बढ़ाती प्यास धरती की।
धरा का जल जो सूखा,
तो कल तेरा बच न पाएगा।

भूल बैठा माया में तू
हकीकत क्या है जीवन की
हटा लें अब तो ये पर्दा
तभी ये कल बच पाएगा।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित मौलिक

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नमन भावों के मोती
विषय-पर्दा
विधा-लघु कविता
शीर्षक-
"हटा लो पर्दा"

तरस गए हम 
तुम्हारी एक झलक को
काली घटा-सी 
मुखमंडल पर छाई है
हटा लो #पर्दा
इन गहरी काली जुल्फ घटाओं का
चाँद-से मुखड़े की
छटा बिखरने तो दो।

राकेशकुमार जैनबन्धु
रिसालियाखेड़ा, सिरसा
हरियाणा

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नमन मंच को
विषय : पर्दा 
दिनांक : 05/06/2019

पर्दा 

यह पर्दा जो उठ गया तो, 
सामने आ जाएगी,  
किसी की गरीबी,  
किसी की बदनसीबी। 
यह पर्दा जो उठ गया तो, 
लोग तो सारे हंसने लगेंगे,  
किसी की मजबूरी पर,  
पढ़े लिखे की मजदूरी पर।  
यह पर्दा जो उठ गया तो,  
लोग तानों भरे सवाल करेंगे,   
हर खूबसूरत यौवन पर,  
होते जिस्मों के शोषण पर। 
यह पर्दा जो उठ गया तो,  
सवाल हजारों  उठेंगे, 
सफेद पोश ऊज्ज्ले चेहरों पर , 
काली कमाई के लाखों ढ़ेरों पर । 
यह पर्दा जो उठ गया तो, 
विश्वाश की डोर बिखरने लगेगी,  
अपनों द्वारा होते षडयंत्रो से,  
बिकाऊ होते लोकतन्त्रो से । 
भगवान करे यह पर्दा यूं ही रहे,  
गम सह न पाओगे,  
जिंदा रह न पाओगे । 
जैसे भी है़ दुनिया चलायमान है़,  
यह पर्दा तो समझो स्वंय भगवान है़।  
जय हिंद 
स्वरचित : राम किशोर ,  पंजाब ।

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शुभ साँझ 🌇
नमन "भावों के मोती"🙏
05/06/2019
हाइकु (5/7/5)   
विषय:-"पर्दा"  
(1)
मोह का पर्दा 
स्वार्थ ने किया अंधा 
सत्य न दिखा
(2)
जीवन मंच 
अभिनय करते 
गिरा परदा 
(3)
भारी पड़ता  
गलतियों पे पर्दा 
भविष्य दुःखा 
(4)
उसूल फेल 
पर्दे के पीछे मेल 
भ्रष्टों का खेल 
(5)
मुस्काती रात 
बादलों के पर्दे से 
झाँकता  चाँद 

स्वरचित 
ऋतुराज दवे

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पर्दा बेपर्दा
बीच सड़क बेटी
लूटें लफंगे।।

पर्दा सभ्यता
पवित्र आवरण
आज न दिखे।।

डालते पर्दा
अपनों की खामियां
ये है बढ़ावा।।

बुद्धि पे पर्दा
बिपत्ति के समय
ये आत्मघाती।।

आंख पे पर्दा
सच नही दिखता
अपनी कमी।।।

गंगा भावुक
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नमन भावों के मोती
दिनाँक-05/06/2019
शीर्षक-पर्दा
विधा-हाइकु

1.
प्यारी दुल्हन
ले हाथ वरमाला
खड़ी पर्दे में
2.
दुल्हन खड़ी
पिया इंतज़ार में
पर्दे की ओट
3.
रूप दिखाओ
खड़ा इंतज़ार में
पर्दा उठाओ
*********
स्वरचित
अशोक कुमार ढोरिया
मुबारिकपुर(झज्जर)
हरियाणा

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भावों के मोती दिनांक 5/6/19
पर्दा 

बहुत इज्जत 
 छुपा कर
रखता है पर्दा 
चौखट की लाज
रखता है पर्दा 

भोपाल का
पर्दा और जर्दा 
रखता है 
खास अपने में 
देहरी पर पर्दा 
तम्बाकू का जर्दा 
पहचान थी
भोपाल की

लेखक कवियों का
खास विषय रहा है
पर्दा 
फिल्मों में  खूब
चला है 
पर्दा 

औरत की इज्जत 
पुरूषों पर नकेल
रहा है
पर्दा 

पर्दा खुद कहता है
कहानी अपनी
खुद ने झेले हैं 
घाव अनेक 
पर न आने दी 
आँच 
पर्दे के पिछवाड़े पर

स्वलिखित 
लेखक संतोष श्रीवास्तव भोपाल

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नमन मंच को
दिनांक--5/6/2019
विषय----पर्दा
शर्म, हया मे जो समझे
रखते हैं वो पर्दा
फूहडपन सा जिनका जीवन
क्या समझे वो पर्दा
सागर की अनंत गहराई में
छुपे रहते मोती, माणिक
वो भी छुपा के रखता है
बिछा के जल का पर्दा
जग है झिना,जीवन झिना
विचित्र है ये माया 
द्रौपदी के एक लीर ने
बचाई लाज है
बन माया का पर्दा
काम,क्रोध, मद,लोभ
सब छाये जीवन में
छलते सब मानव को
डाल अज्ञान का पर्दा
करबद्ध करुँ प्रार्थना
नित है माँ शारदे
कर्मशील सब बन जाये तो
लक्ष्य अडिग बन जाये
हट जाये सब पर्दे स्वतः ही
जो कृपा आपकी मिल जाये ।
स्वरचित -------------🙏

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