Thursday, June 20

"पदक"18जून 2019

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ब्लॉग संख्या :-421
नमन मंच भावोंके मोती
शीर्षक     पदक
विधा       लघुकविता
18 जून 2019,मंगलवार

स्वर्ण रजत कांस्य पदक
यह ग्रीवा की शोभा नहीं।
खून पसीना कड़ी तपस्या
जो करता जग पाता वही।

पदक प्रतीक होते गौरव के
लगन परिश्रम का परिणाम।
जो जूझते प्रतियोगी बनकर
उसको मिलता है यह दाम।

उच्च मध्य निम्न स्तर जग
जँहा चाहो स्थान बनाओ।
मानव जीवन मिला हमें तो
परहित भक्ति भाव सजाओ।

पदक नहीं हैं खोटे सिक्के
जौहरी कीमत इनकी जाने।
समूचा जीवन करे समपर्ण
कोहिनूर को सब पहिचाने।

स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

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नमन भावों के मोती,
आज का विषय, पदक
दिन, मंगलवार
दिनांक, 1 8,6,2019,

पदक विजेता बनने का ख्वाब,
कितनी ही आँखों में पलता है।

कर्मवीर के लिए हमेशा जीवन में
कर्तव्य पथ ही पदक होता है ।

आजादी के परवानों का मकसद,
उन्हें अशेष सलाम दिया करता है।

है पदक यही तो सम्मान उनका,
जो कि दिलों में हमारे रहता है ।

कोई खिलाड़ी पदक जीत जब,
अपने राष्ट्रगान का सुख पाता है।

उसके भावों का उद्वेग न पूछो,
राष्ट्र का गौरव बढ़ ही  जाता है ।

जब सैनिक की व्याहता के हाथों में,
पदक वीर मृत पति का आता है।

हृदय समंदर की गति न पूछो,
बेताब छलकने को रहता है।

ज्ञान और विज्ञान का सागर ,
पदक का शोध करता रहता है।

इन्हीं महापुरुषों की वजह से,
देश प्रगति की सीढ़ी चढ़ता है।

पदक बढ़ाते हैं उत्साह कर्मठ का,
जीवन बहती धारा बनता है ।

शुभ कर्मों का परिणाम हो दुगना,
अगर प्रसंशक मिल जाता है ।

ध्वेय हमारा यदि अटल नेक हो,
मंजिल पे पहुँचना पदक होता है।

स्वरचित, मीना शर्मा, मध्यप्रदेश,

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नमन मंच
दिनांक .. 18/6/2019
विषय .. पदक
************************

जीवन के इन संघर्षो से, क्या मै तप कर आओगा।
लड कर ही मर जाऊँगा या, मै वो पदक ले आऊँगा।
चाह यहाँ सबकी आँखो मे, सब ही कर्म के योगी है।
क्या मै उन पर विजय प्राप्त कर, इस अम्बर पर छाऊँगा।
......
खुद पर है विश्वास मुझे पर, थोडी सी ही शंका है।
सबके सब ही कालजयी है, मन क्यो मूढ सा लगता है।
क्या अर्जुन की भाँति युद्ध से, पहले मोह ने जकडा है।
मिले सारथी माधव सा जी, राह मे पुष्प ही बिखरा है।
......
शेर की ये अभिलाषा क्या इस, मानव मन से इतर दिखे।
श्रेष्ठ पदक की चाहत मे , मन मेरा मन से विकल दिखे।
क्या जो चाहे मन पा लेना, ये ही जीवन का मकसद है,
क्या पदक बिना इस जीवन मे कोई भी नही अब जंक्सन है।
.....

स्वरचित ... शेरसिंह सर्राफ
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नमन मंच भावों के मोती
18/6/2019/
बिषय,,*(पदक)
मेरा अंतर्मन जो कहता
मेरी कलम वही उतारती
नि:शब्द मोती के भावों 
को संवारती
नित ही देखती नाटक
ए जमाने के 
वही सच्चाई निकल जाती
गीतों के बहाने से
जो ब्यथाऐं झेली 
काव्य माल में पिरोती
कटु अनुभवों को 
हृदय में संजोती
 मैं जानती हूँ इसको 
लोग नकारात्मक सोच 
कहेंगे
रचनाओं को पढ़कर
इक कोने में रख देंगें
 किसी ""पदक"" या सम्मान की
अब इस दिल में चाह नहीं
ए जमाना क्या सोचे 
इसकी भी परवाह नहीं
दुनिया की नजर में भले 
न  हो मेरा नाम है
आईना दिखाना मेरा
काम है
,,स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार,,

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18/6/2019
नमन भावों के मोती।
नमन गुरुजनों, मित्रों।
          पदक
         💐💐
पदक लेकर जो आता है,
बहुत सम्मान वो पाता है।

जग में होता है नाम ऊंचा,
वही विजयी कहलाता है।

चाहे हो खेल जगत,
चाहे कोई भी प्रतियोगिता।

जिनकी लगन होती है उसमें,
वही पदक को पाता है।

राष्ट्र का गौरव वही है,
उसी पर राष्ट्र नाज करता है।

मेहनती जो होता है जग में,
वही पदक को पाता है।
💐💐💐💐💐💐💐💐
स्वरचित
वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी
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नमन मंच
18/6/2019
प्रदत्त विषय-पदक
🌹🌹🌹🌹🌹🌹
.............

है चाह मुझे भी
कि एक अदद पदक मुझे भी मिले

मानती हूँ नहीं हूँ उतनी विज्ञ
जितने ज्ञानी यहाँ इस मंच पर मिले

प्रयास सतत करती हूँ
जो दिल में है वही
कागज़ पर उतारती हूँ
फिर चाहे तिरस्कार मिले या पुरुस्कार मिले 

सीख रही हूँ विद्वानों की नगरी में
चलना
बहुतायत में पढ़ना,समझना फिर
भावों को मोती में पिरोना
विभिन्न प्रकार के पुष्प मुझे
इस मंच की बगिया में मिले ..!!
💐🌺🌿🎋🌺💐

@वंदनासोलंकी
©️स्वरचित
🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

।। पदक ।।

पदक भी देती है कभी जिन्दगी
पटक भी देती है कभी जिन्दगी ।।
जिन्दगी एक शतरंज का खेल है
कभी पांसा पलट देती है जिन्दगी ।।

सबक मिले तब जाकर पदक मिले 
डरे नही जिन्दगी से बेझिझक मिले ।।
जिन्दगी को जिन्दादिली से जो जिये  
एक दिन उनको उनके हक मिले ।।

आत्म सन्तुष्टि भी कोई यहाँ शय है 
हमको तो बस उसकी ही लय है ।।
हक न कोई किसी का छीना कभी
धुन पक्की रखी तो मिली  जय है ।।

कुछ बिन सिंहासन भी यहाँ राजे हैं
कुछ सिंहासन पाए भी बजे बाजे हैं ।।
चन्द्रमा के सामने कोई कितना सजे
पर उसके सामने 'शिवम' सब आधे हैं ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 18/06/2019

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जय मां शारदे !
नमन मंच -भावों के मोती
दिनांक-18/6/2019
शीर्षक- पदक

नहीं पदक की कामना, नहीं राज का मोह।
धीर छबीली ले रही ,  अंग्रेजों की टोह।।

 अलख जगाई जल गई ,हरिक दिल में मशाल।
भागे भारत छोड़कर ,  अंग्रेजों के लाल।।

पदक नहीं झांँसी मिले, रानी की थी चाह।
 अरि का हो कैसे दमन, रानी ढूंढी राह।।

शालिनी अग्रवाल
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित
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दि- 18-6-19
शीर्षक- पदक
सादर मंच को समर्पित -

       🏵🌻   गीतिका   🌻🏵
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        🌺☀  पदक  ☀🌺
मापनी - 122 , 122 , 122 , 122
🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷

नये  पदक   के   गीत गाने  बढ़ेंगे ।
नयी  सोच से  दम  जुटाने  बढ़ेंगे ।। 

उठो जाग जाओ, नवल भोर आई ,
चलें  खेल  के लक्ष्य  पाने  बढ़ेंगे ।

नहीं गैर  कोई  मनुज, बन्धु अपने ,
सभी को पदक  फिर जिताने बढ़ेंगे ।

गया  बीत जो वक्त  आता  नहीं है , 
लक्ष्य  को  सभी जीत  जाने बढ़ेंगे ।

हमें  है  भरोसा  जवाँ  हौसलों पर ,
अटल जोश हिम्मत दिखाने बढ़ेंगे ।

न हिंसा ,न अलगाव पनपे वतन में, 
मिले  जीत ,  दूरी   घटाने  बढ़ेंगे ।

यही है  जरुरत , बढ़ें  जीत को हम , 
पदक  भारती  को  दिलाने  बढ़ेंगे ।। 

        🌹🍀🏵🌻🦃

🌹🍀**...रवीन्द्र वर्मा आगरा 
          मो0- 8532852618

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नमन-मंच को
दिनांक-१८/०६/२०१९

पदक का आगाज........

पड़ी है मन के भीतर 

एक सुषुप्त आवाज़।

आतुर है  सच को जानने

कैसा है यह मौन आभास।

चाहत है मन के अंदर

जीत जाऊं पदक मैं एक आज।

इस आस की मिट्टी लेकर मैं

मैं आशा के दिये बनाता।

देश के लिए जीतता मैं पदक......

कब सजेगी पदकों की बारात  ?

घर-घर दीप जलेगा

 देश को रहेगा हम पे नाज।

स्वरचित
 सत्य प्रकाश सिंह केसर विद्यापीठ इंटर कॉलेज प्रयागराज
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मंच कोनमन। दिन मंगलवार
18/6/2019
विषय :-पदक।विधा-कविता
पदक की चाह 
खुशियों की तलाश
सफलता का मुकाम
होता है. यह पदक ।
किसी को यूं  ही 
नही मिल जाता 
खून पसीना बहाकर
ही मिल पाता पदक ।
ज़िंदगी में सभी को 
नही हासिल होता
किसी किसी के ही
गिरेबान में सजता.है पदक।
स्वरचित :-उषासक्सेना

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आज का विषय ::----पदक ।
चाह नही पदक मिले मुझे ।
चाह नही मिले वाह वाही ।।
एक चाहमेरी मात्र छोटी सी ।
कार्य करू ऐसे सेवा उपकारों से भरे ।
रिश्ते नाते निभा सकु शिद्दत से सबका स्नेह मिले ।
ऐसी सक्षमता देना ईश्वर मुझे सबको एक.सूत्र मे बांध सकु बिखरा न रहे परिवार मेरा ।
यही पदक मुझे मिले सबको हँसते मुस्कराते देखू मिलेगी.खुशिया अपार ।
पदको से सजी हो दिवारे अल्मारियाँ ।
सकुन संतुष्ठी नमिले तो पदक किस काम के ।
स्वरचित :---दमयंती मिश्रा 
गरोठ मध्यप्रदेश ।

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किसी ईनाम की हसरत है न दरकार मुझे।
एक आपकी चाहत है बहुत सरकार मुझे।

मुहब्बत सच में हो , हासिल सिफर होगा।
इस हकीकत से कहां था के इनकार मुझे।

तुम्हारे काम आया हूं , बहुत अफसोस है।
दिया क्या खूब क़रार है तुमने बेकार मुझे।

बहुत अच्छा सिला नेकी ने है बख्शा हमें।
किया मशहूर बड़ा एलानिया बदकार मुझे।

जिन्दगी हार के तुझसे मैं अब लौट चला।
दिखाई देती है तो, मौत की ललकार मुझे।

                                  विपिन सोहल
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1*भा.18/6/2019/मंगलवार
बिषयःः# पदक#
विधाःःकाव्यःः

न कोई चाहत पदक पाऊँ मैं,
  बस अपना दायित्व निभाऊँ।
    कुछ सदभावनाऐं पूरी कर लूं,
      मैं यहां केवल कर्तव्य निभाऊँ।

सद्कर्तव्य करूं तो निश्चित,
 एकदिन सुखदफल पाऊंगा।
   मैं पदकों के पीछे क्यों दौडूं,
     आत्मसम्मान आप पाऊंगा।

कोई प्रेमालंगन मुझको कर ले।
  मुझे प्रेमप्रीत से बांहों में भर ले।
     ये प्रेमानुभूति हृदय में हो जाऐ,
        स्वमेव पदक आंखों में भरलें।

स्वर्ण रजत कांस्य पदक पाते हैं।
  कुछ पदक झूठे हाथों मै जाते हैं।
    सच्चे हकदार पदक नहीं ले पाते,
      ये कहते पदक यहां बिक जाते हैं।

स्वरचितःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय 
मगराना गुना म.प्र.
जय जय श्री राम राम जी
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1भा.#पदक#काव्यः ः

18/6/2019/मंगलवार


नमन भावों के मोती
विषय- पदक
विधा-दोहा, मुक्तक

-----------------------दोहा-----------------
______________________________

 दीन दुखी का दुख हरे, वो सच्चा इंसान। 
उसको खुशियों का पदक, देते हैं भगवान।।

 कर्मवीर को ही मिले, पदकों का सम्मान। 
अडिग रहे वो लक्ष्य पर, चाहे जाए जान।।

-----------------------मुक्तक---------------
______________________________

जो श्रम करते हैं अथक। 
उसको ही मिलता पदक। 
आत्मशक्ति विश्वास से-
जाते हैं ध्रुव सा चमक। 
______________________________
-वेधा सिंह
स्वरचित
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**भावों के मोती** शीर्षक- "पदक"                          मानव जीवन पाकर हम सब धन्य हुए।                             जीवन दाता 'ईश्वर' के अति कृतज्ञ हुए।
अब हमको मानवता को जगाना होगा।
अपना दायित्व  निष्ठा से निभाना होगा।
******************************
इस जग से ईर्ष्या,वैमनस्य हटाना होगा।
एकदूजे को निःस्वार्थ गले लगाना होगा।
यही माँ-भारती को पूर्ण समर्पण होगा।
यही हमारा"पदक" व जीवन दर्पण होगा।।
(स्वरचित)     ***"दीप"***

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नमन मंच
दिनांक-१७/६/२०१९
"शीर्षक-पदक"
मिले पदक प्रतिभावान को
कोशिश खड़े मुस्काये
मेहनत और प्रतिभा दोनों मिल
पदक हमें दिलाये।

जीवन के आपाधापी में
पदक है एक छाँव
प्रशंसा दिलाये, मान बढ़ाये
कर्म की महत्ता बतायें।

विशिष्टता का भाव लिए
श्रेष्ठ भाव जगायें
पदक दिलाये हमें समृति
निरसता ना जीवन मे आये।

प्रतिज्ञा एक नीज मन से
पदक चाहे न मिले
प्रयास मे कमी ना आये
जीवन सदा मुस्काये।

क्षण क्षण बदलते इस दुनिया मे
जीने का ललक न कम पड़ जाये
जीवन स्वयं है एक पदक 
इसे न भूल जाये।
स्वरचित-आरती-श्रीवास्तव।

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नमन मंच को
दिन :- मंगलवार
दिनांक :- 18/03/2019
शीर्षक :- 🎖पदक🎖

कलम का पुजारी हूँ..
शब्दों के जाल बुनता हूँ..
पदकों की लालसा नहीं..
सँग श्वेत पत्र लेके चलता हूँ..
जो समझ ले भावों को..
तो सम्मान मिल जाता शब्दों को..
खेल यही अब..
दिन-रात मैं खेलता हूँ..
लिखता हूँ ख्वाबों को..
संजोता हूँ भावों को..
पदक मिले न मिले कोई..
समेट लेता जज्बातों को..
जिंदगी आनी जानी है..
यही इसकी रवानी है..
खेल किस्मत के बने हैं सब..
बस चंद दिनों की कहानी है..
कितने तुफां पल रहे अंदर..
किसी को कह न सके..
कुछ जज्बात ऐसे भी हैं..
जो बिन बताए रह न सके...
हारने का शौक कभी पाला नहीं..
पर जीत भी कभी मुकम्मल न हुई..
चल ही रहे अनजान सफर पर..
बस! अभी मंजिल मयस्सर न हुई..

स्वरचित :- मुकेश राठौड़
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नमन "भावो के मोती"
18/06/2019
     "पदक"
1
प्राप्ति "पदक"
परिश्रम अथक
खुशी के पल
2
मान "पदक"
दृश्य मनमोहक
श्रम राहत
3
"पदक "सम
उपकारिता धर्म
मोल न कम
4
सच्चाई धर्म
"पदक "से भी बड़ा
मन हो हरा
5
कर्म सम्मान
सुखद परिणाम
"पदक" मान
6
ईमान धर्म
मानवता को मिला
"पदक"मान

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल।
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नमन 🙏भावों के मोती
विषय:-पदक
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अब न कोई आस है न चाह मुझे 
मिला पदक कभी न जो पास मुझे
आपके स्नेह की प्यास बस मुझे
यही रहे बना अब एहसास मुझे

छोटी छोटी खुशियों के पल बाँट लो
हर पल जीत का तुम साथ बाँट लो
छू कर रहोगे आसमां तो मिलेगा
पदक तुम्हें 
एक जुनून पैदा करो और खुद को तराश लो

नीलम शर्मा #नीलू

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भावों के मोती
18 06 19
विषय - पदक
द्वितीय प्रस्तुति

पदक एक खास
जिंदगी के इम्तिहान में पास
जीवन आये रास
दुविधा का नाश
फिर बंधा मोहपास
स्वप्न सा उल्लास
घर में हो उजास
अपने हो आस-पास
प्रभु से अरदास
सुख का अहसास
मन में विश्वास
मंजिल हो पास
दुखों का ह्रास
जिंदगी सुखद सुवास।

स्वरचित
कुसुम कोठारी ।

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शुभ संध्या
विषय -- ।। पदक ।।
द्वितीय प्रस्तुति

पदक प्रोत्साहन बढ़ाता है
हुनरमंद में हुनर जगाता है ।।

पदक का प्रचलन पुराना है
आज भी कारगर कहलाता है ।।

मगर बच्चों में जब इसका जादू
अति हो तो नुकसान दिलाता है ।।

पदक में राजनीति हो जाना 
आपसी द्वंद मतभेद लाता है ।।

पदकों में पारदर्शिता हो तो 
सुखद लाभप्रद माना जाता है ।।

वरना पदक में लाभ कम 'शिवम'
हानी ज्यादा नजर आता है ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 18/06/2019

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पदक मिले
करते जोड़ तोड़
यही चलन।।

शीर्ष पदक
लगाते हैं बाज़ार
यही व्यापार।।

बिका पदक
मुह मांगी क़ीमत
हुआ कत्थक।।

बेचा पदक
ग़रीबी की कसक
कौड़ी के भाव।।

पदक हाट
कौन बने सम्राट
लगाये घात।।

गंगा भावुक
18.06.2019
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नमन भावों के मोती
दिनाँक-18/06/2019
शीर्षक-पदक
विधा-लघुकथा

             बिटिया अनायास ही मेरे दिमाग को झकझोर कर देने वाला सवाल पूछ उठती है। पापा ; इस धरती पर इंसान की तादात दिन प्रतिदिन सुरसा राक्षसी के मुख की तरह बढ़ती जा रही है। इसके बावजूद धरती पर वनस्पति, वन्य जीव जन्तु विलुप्त होते जा रहे हैं।कई प्रजातियां तो नष्ट होने के कगार पर हैं।इसका क्या कारण है पापा ? 

' बिटिया, इसका कारण इंसान ही है ।

इंसान अपने स्वार्थ वश कुदरत को मुट्ठी में लेकर सारे नियम कायदे ताक पर रख देता है ताकि वह कुदरत से बड़ा होने का तमगा ( पदक) भी स्वयं ले सके।

स्वरचित
अशोक कुमार ढोरिया
मुबारिकपुर(झज्जर)
हरियाणा

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नमन् भावों के मोती
18जून2019
विषय पदक
विधा कविता

स्वेद बहाकर ये संसार
आज यहाँ तक आ पहुँचा
निर्वस्त्र घुमन्तू ये मानव
ब्रान्डेड कपड़ों में जा पहुँचा
कदम ताल करते करते
पाँव बढ़ाकर चाँद पर पहुँचा
ढ़िबरी में पढ़कर ये विश्व
सौर ऊर्जा तक पहुँचा
नंगे पांव घूमने वाला 
आज अंतरिक्ष जा पहुँचा
तोते से चिट्ठियां भेजने वाला
इंटरनेट तकआ पहुँचा
विश्व विकास का ये ढांचा
बिना पदक के आ पहुँचा
कठिन श्रम का विकल्प नहीं
आप पदक खुद घर पहुँचा
स्वेद बहाकर ये संसार
आज यहाँ तक आ पहुँचा

मनीष श्री
रायबरेली
स्वरचित

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नमन          भावों के मोती
विषय         पदक
विधा          कविता 
दिनांक       18,6,2019
दिन            मंगलवार 

पदक
🎻🎻🎻🎻

पदक हमारा उत्साहवर्धन  करते
ये हमारे नाम का गर्जन करते
ये हमारे काम की पहचान है
हमारी निष्ठा की मुस्कान है। 

अर्जुन पुरस्कार द्रोण पुरस्कार 
आज भी करते हम नाम को नमस्कार 
इन पदकों के नाम पुरातन है
इनको नमन करता आज भी आसन है।

पदक !कार्य कुशलता का प्रमान है
पदक! कार्य कुशलता का सम्मान है
पदक! कार्य कुशलता का गुणगान है
पदक! कार्य कुशलता की मधुर तान है। 

स्व रचित 
सुमित्रा नन्दन पन्त

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2भा. 18/6/2019/मंगलवार
बिषयःः ः#पदक#
विधाःःःछंदमुक्त,व्यंग्य

पदकों की चाह नहीं
 फिर भी पदक मिल गये
मैने कभी चाहा नहीं मगर
बहती गंगा में हाथ धुल गये।
विगत बर्षों से हमारे देश में
पदक लौटाने की बाढ आई है
मानें सरकार समाज की 
जान लेवा आफत आई है।
हमारे देशी विदेशी पदक 
दिल या धोंस से बहाऐ जा रहे।
इन्हें फेंककर अपनी संवेदनशीलता
पुरजोर दिखा रहे।
आज पदकवीर कहीं दिखाई नहीं देते।
हमारे वीर पराक्रमी 
बुद्धिजीवी,श्रमजीवी ,
तनजीवी,मनजीवी,धनजीवी,समाजसेवी
ज्ञानवान बुद्धिमान,पहलवान
सभी अपना अपना
पदक फेंकने या लौटने का
 हुनर दिखा रहे थे या उपक्रम कर रहे थे
पीट रहे थे ,पिटवा रहे थे 
मार रहे थे ,मरवा रहे थे 
फिर भी बोलने की तनिक भी
आजादी नहीं थी 
बेचारे भोंक कर बता रहे थे
क्या सरकार सचमुच
पूरी संवेदनशून्य हो गई है
ये हमारे मुखिया को गाली देते
मारने, मरवाने की धमकियां देते
फिर पदक कैसे रखते
क्यों कि बेचारे  यहां
बेचैनी महशूस कर रहे हैं।
बताते भारत से बुरा कोई देश नहीं है
पता नहीं फिर भी यहां
घुसपैठियों की संख्या क्यों कम नहीं है।
मै चाहता हूँ ऐसे 
वरिष्ठ बुद्धिजीवियों ,समाजसेवियों 
कलाकारों ,नेताओं ,अभिनेताओं का
बिशेष सम्मान करना चाहिए
जिन्होंने ऐसे विकट समय
परिस्थितियों में भी 
स्वदेश का मान सम्मान बढाया।
देश विदेश में अपने पदक लौटाकर
 नाम कमाया।
आतंकवादियों ,बलात्कारियों
अलगाववादियों का होंसला बढाया।
उन्हें शतशत नमन
आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है
वह फिर से ऐसी मिशालें 
और भी पेश करेंगे
अभी कहीं छोट मोटे 
पदक लौटा रहे हों अब
स्वर्ण, रजत ,कांस्य के स्थान पर
हीरा या पारसमणि पदक लौटाकर
सारे समाज पर अहसान कर
अपनी संवेदनशीलता का
परिचय देंगे।
साथ ही सरकार के 
चुने मुखिया को नीचे उतारकर
सरकार चलाऐंगे वास्तविकता
पदकों की दुनिया को बताऐंगे।

स्वरचितःः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
जय जय श्री राम राम जी
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2*भा.18/6/2019/मंगलवार
#पदकः#छंदमुक्तः, व्यंग्य



भावों के मोती दिनांक 18/6/18

छंदमुक्त कविता

पदक

जिन्दगी है
 मैदान
इन्सान 
खिलाड़ी
खेल खिलाती है
 किस्मत
कभी हार 
तो कभी 
गले लगते है
पदक 

जीत  पर 
न गुमान करो
ए इन्सान
हार पर
 न हो हताश
ये पदक आज 
उसके गले है तो
कल होगा 
तुम्हारे

भेदते रहो लक्ष्य
मत हटो 
मेहनत और लगन
से पीछे
हार  भी
 हार जाऐगी
तुम्हारे आगे 
वरण करेगा 
पदक  तुम्हारा 

पदक की 
लालसा में
ईष्या  मत 
पालना 
मेरे दोस्त
करो प्रतिस्पर्धा  
 ईमान से

पदक है पहचान
प्रतिष्ठा  का
करो अपना नाम 
ऊँचा और ऊँचा

स्वलिखित लेखक
 संतोष श्रीवास्तव  भोपाल

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नमन् भावों के मोती
18जून19
विषय पदक
विधा हाइकु
द्वितीय प्रस्तुति

अपार खुशी
मेहनत सार्थक 
पदक प्राप्त

लक्ष्य आसान
पदक से प्रेरणा
सफल राह

भारत रत्न
नागरिक सम्मान
देश पदक

यश प्रतिष्ठा
सर्वोच्च उपलब्धि
पदक मान

खिलाड़ी चाह
ओलंपिक पदक
जीवन राह

मनीष श्री
स्वरचित
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नमन मंच १८/०६/२०१९
विषय-- पदक

मनोबल बढता है पदक से
मन हर्षित हो जाता है पाकर इसे।
हर व्यक्ति लगा है इसी पदक की होड़ में
जब से होने लगी राजनीति पदक में
होने लगे जन जन में द्वेष पदक को लेकर
अपनानी होगी ईमानदारी हमें पदक को लेकर
खेलों मे मारा मारी है इसी पदक को लेकर
जब होती है भावना भाईचारे की पदक में
मिलता है उत्साह इस पदक को पाकर
लेकिन छिन जाता है चैन जब मेहनत होती बेकार
(अशोक राय वत्स) स्वरचित
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शुभ साँझ 🌇
नमन "भावों के मोती"🙏
18/06/2019
हाइकु (5/7/5)   
विषय:-"पदक " 

(1)🏅
भीड़ थी जहाँ 
पदक ने बताया 
तुम हो कहाँ 
(2)🥇
श्रम न व्यर्थ 
सफलता कहानी 
कहे पदक
(3)🥇
जीता था जग  
गरीबी ने हराया   
बेचा पदक
(4)🥈
पदक दौड़ 
बचपन को भूले 
खामोश झूले 
(5)🏅
पदक पीछे 
छुपी है मेहनत 
शौर्य की गाथा 

स्वरचित 
ऋतुराज दवे

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