Friday, June 28

" परिवर्तन"27 जून 2019

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ब्लॉग संख्या :-430
विधा लघुकविता
27 जून 2019,गुरुवार

प्रकृति स्वयं परिवर्तनशील है।
कलियां चटके पुष्प महकते।
षड ऋतुओं का अद्भुत संगम
अति आनंदित कभी बहकते।

सुख दुःख लाभ हानि यश 
धूप छाँव जीवन भर चलती।
कभी नाव को मिंले किनारा
कभी सागर लहरों में बहती।

बचपन गया बुढ़ापा आया
पर जीवन ने बहुत सिखाया।
चँचल काया चँचल माया 
भक्ति पथ नव मार्ग बताया।

जन्म मृत्यु शाश्वत परिवर्तन
अवगत होकर नर अनजाना।
परोपकार के पथ चल नित
मुक्तिधाम बस तेरा ठिकाना।

स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।


🌹मित्रों का अभिनंदन🌹
27/
06/2019
" परिवर्तन"
तांका
1
बेटी विदाई
पिया संग है जाना
रिश्ता भी नया
खुशियों भरा जहां
गृह परिवर्तन।
2
गर्मी बेहाल
ऋतु परिवर्तन
उमस बाद
हुई जो बरसात
राहत है तत्काल ।।

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल।।


नमन गुरुजनों, मित्रों।

समय बड़ा परिवर्तनशील।
बच्चे होते जवान एक दिन,
फिर हो जाते प्रौढ़, फिर बूढ़े।
अपने मन से सृष्टि ना चलती,
ऊपरवाला चलाता है अपने अनुकूल।
समय बड़ा परिवर्तनशील।

पौधे बढ़कर पेड़ बन जाते,
फल, फूलों से वो भर जाते।
फिर आता पतझड़,सारे पत्ते झड़ जाते,
ये लगता मन के प्रतिकुल।
समय बड़ा परिवर्तनशील।

मौसम एक से कभी ना रहते,
कभी सर्दी,कभी गर्मी में बदलते।
कुछ भी रहे ना सदा एक सा,
ये जाना नहीं भूल।
समय बड़ा परिवर्तनशील।

स्वरचित
वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी

विषय-परिवर्तन

प्यार करो तो ये मत सोचो क्या सोचेगी ये दुनिया
आज तुम्हें जो थूक रही है कल पूजेगी ये दुनिया।

रीति नीति यह जग की कुछ नूतन तुम अपनाओ ना,
#परिवर्तन है नियम चराचर कल मानेगी ये दुनिया।

ज्ञानी ऊर्जित शिक्षा कुंजी ,भविष्य स्पष्ट देखती है
विद्या ज्ञान बढ़े उतना जितना बांटेगी ये दुनिया।

अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर की शाश्वत पूंजी संस्कार,
भारत में तुष्टि......की रीति ना मानेगी ये दुनिया।

धारा समय की बड़ी प्रबल, प्रवाह से बच ना पाओगे,
चढ़ते सूरज को अर्घ्य देकर क्या बतलाती ये दुनिया।

सुख दुख में रहना समभाव है कहना विद्वानों का,
मौलिक भावों और स्वतंत्रता को पूजेगी ये दुनिया।

शालिनी अग्रवाल
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित



विषय (परिवर्तन)
विधा- दोहे

धरणी को लगता भला ,परिवर्तन का गीत ।
नियम चराचर है सुखद, है यह सुंदर रीत।।1

परिवर्तन को पूजिए, दे कुदरत संदेश।
चलता राही जीतता, अपना देश- प्रदेश।।2

परिवर्तन की कामना, लाती मीठा नीर।
नैनों के पट खोलिये, धरिये मानव धीर।।3

शालिनी अग्रवाल
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित
27/6/2019


कार्य:-शब्दलेखन
बिषय:-परिवर्तन
विधा:-मुक्त

आज के इंसान की
सबसे बड़ी त्रासदी है-
समय
पल पल की जिंदगी
जो घूम रही है
चक्रव्यूह में फंसी
दिन रात
मकड़ी जाल में
हरे हुये पांसे ' कलि ' की तरह।
जिसे-
फैलते बिखरते सिमटते
हमने स्वयं निर्मित किया 
एक दायरे में।
तब भी-
जीते जागते अनुभव
पुनरावृत्त हो रहे
" युग परिवर्तन " की तरह।
डॉ.स्वर्ण सिंह रघुवंशी, गुना (म.प्र.)



विषय .. परिवर्तन 
***********************

वृन्दावन सा धाम जहाँ है, जमुना जी का घाट।
वहाँ पे राधा देखे आस, साँवरे कब आओगे॥
....
शाम से हो गई रात, मुरलिया की ना छेडी तान।
विकल हो राधा ढूँढे आज, श्याम तुम कब आओगे॥
....
नयना सिन्धु समान , छलकता आँखो से है प्यार।
कहे वो किससे अब मनभाव, श्याम तुम कब आओगे॥
......
दिल पे रख के हाथ, सोचे क्यो परिवर्तित है श्याम।
शेर मन डूबा है श्रीश्याम, बताओ कब आओगे ॥
......
कल-कल छल-छल जमुना जल से, तीब्र अँश्रु की धार।
बिखर गए सोलहो श्रृँगार , साँवरे कब आओगे॥

स्वरचित एंव मौलिक
शेरसिंह सर्राफ


विषय:परिवर्तन
विधा; गीत

हर इंसान कहे अपना किस्सा, हर दौर का अपना गीत,
यूँ करो न जुगाली पुरानी,अपनाओ नई जीवन रीत।

हर दौर हर जमाने में,एक नवीन जमाना मांगे
आज काफिले गाड़ियों के ,ढूंढे कहाँ दिखते तांगे 
नित नए अविष्कार नित नई है तकनीको की बातें
ढब अलग है देश के ,अब उजली सी गाँवो की राते

चाहे नभ हो धरा या जलधि हो, मेरा भारत रहा जीत 
यूँ करो न जुगाली पुरानी,अपनाओ नई जीवन रीत 

बदल रहा है देश बदलना होगा तुमको भाई जी
#परिवर्तन अकेला स्थाई ,बाकी सभी अस्थाई जी
छू रहा नित नये शिखर, देश मेरा है सबसे आगे 
कहाँ हिम्मत किसी रिपु की ,शौर्य सेना का देख भागे 

चाँद बदले कलाएं नित मौसम बदले ग्रीष्म सावन शीत
यूँ करो न जुगाली पुरानी,अपनाओ नई जीवन रीत

नीलम तोलानी
स्वरचित।

शीर्षक- परिवर्तन
परिवर्तन है नियम इस संसार का

कौन भला इससे बच पाया है।
आज जो मेरा है, 
क्या पता कल तेरा हो जाएगा।
आज जहां अंधेंरा है,
कल उजाला हो जाएगा।
मौसम की तरह
लोगों को बदलते देखा है।
अपनों को अपनों से
किनारा करते देखा है।
मुस्कुराती आंखों में
अश्कों को उभरते देखा है।
दुनिया के रंगमंच में
किरदार बदलते रहते हैं।
कल के नायक को
खलनायक में ढलते देखा है।
ना करना अहंकार अपने धन का
कल जो सिंहासन पर विराजे थे
आज उन्हें राहों पर चलते देखा है।

स्वरचित कविता
निलम अग्रवाल, खड़कपुर

विषय- परिवर्तन

टूटी कड़िया ,आंसू लड़ियां

मांग रही हैं परिवर्तन।।

भूखी रातें ,नंगे तन

मांगे रहे है परिवर्तन।।

सत्ता करे तांडव नर्तन........

कब्र शहीदों की मांगे परिवर्तन

कफन में लपेटे उनके तन।।

नारी मांगे परिवर्तन

सत्ता करें करुण क्रंदन।।

राम रहीम की धरती मांगे परिवर्तन

ये काबा ये काशी है उत्थान पतन।।

नारी रोये व्याकुल मन, नयनों से गिरे अंजन

नंगे तन के जादूगर नोचें तन

देखो उस बेवा के माथे की शिकन।।

समाज के सूदखोर करें अनंत धन गर्जन।।

कांप उठी सागर की लहरें

संस्कृति मांगे परिवर्तन।।

गली दलितों की मांगे परिवर्तन

भूख के एहसास को ओढ़े

नंगे तन, मौन मन।।

स्वर मांगे परिवर्तन

धुआं उठे आग जले

कब होगा परिवर्तन.....

सर्प उठावे सहस्त्र फन

कुचल ना पावे में मौन मन

कब होगा इनका नियमन

कब होगा परिवर्तन.....

आओ अब करें कीर्ति कुसुम का हम चयन.

कब होगा परिवर्तन...

प्रवह मान जीवन निवर्तन..

मौलिक रचना
स्वरचित
सत्य प्रकाश सिंह केसर विद्यापीठ इंटर कॉलेज प्रयागराज


विषय-परिवर्तन
🌺🌿🌹
🌺🌿🌹

आज स्वयं को देखा दर्पण में 
ओह!कितना परिवर्तन
आ गया है मुझमें

बालों में सफेदी
झलकने लगी है
चेहरे पर सलवटें
दिखने लगी हैं

आँखो में न रहाअब पहले सा तेज
त्वचा भी दिखने लगी है निस्तेज

फिर स्वयं को ही 
मैंने ढाढस दिया
परिवर्तन तो शाश्वत सत्य है
कह कर खुद को समझा दिया

ये तो शारिरिक बदलाव हैं
अवस्थानुसार सबके 
संग हुए हैं

परन्तु विचार तो मेरे उम्र के साथ परिपक्व हुए हैं

दौलत शोहरत की अब
चाह न रही
कौन क्या कहेगा
इसकी अब परवाह नहीं

एक सुकून सा
आ गया है जीवन में
बड़ी शांति मिल रही है
इस परिवर्तन में

अनुभव की सीढ़ियां
चढ़ कर आई हूँ
अब नहीं मैं पहले सी
मायूस और घबराई हूँ

भीड़ में खुद को
पहचानना जानती हूँ
अपनी दुनियां में 
मस्त रहना जानती हूँ

बदलाव की बयार
धीमे से सही मेरे जीवन में तो आई है
बहुत खुश हूं मैं कि मेरी ज़िंदगी
इस सुखद मोड़ पर मुझे लाई है ..!

@वंदना सोलंकी©️स्वरचित

27-06-2019
परिवर्तन

कितने बदल गए हो तुम?
पेड़ की एक डाली पर बैठा मैं,
और दूसरे पर तुम।
मेरे चोंच से चूते चहचह,
और तुम्हारे कण्ठ से मधुर कलरव
परिचयक,परस्पर प्रेम का,
अपनेपन का अनंत अनुभव
कालचक्र की त्वरित होती गति,
कुदरती करिश्मा या तूफान की यह नियति
तूफान से टूटती हुई डाली
और मुझसे अलग होते तुम
अपना अलग आश्रय लेता मैं
और अपने आप में खोते तुम
एक मोड़ पर थके-माँदे खड़े तुम
और अरसे बाद हमारा मिलन,
अकस्मात ही, अनायास ही,
मैं कदाचित खड़ा रहा वहीं,
पर कितनी दूरी तक चल गए तो तुम
सच, परिवर्तन परिभाषित तुमसे ही,
मैं तो उन्हीं भावों से भरा रहा,
पर कितने बदल गए तो तुम?
-©नवल किशोर सिंह
स्वरचित


विषय - परिवर्तन
बाल-गीत

एक मासूम परिवर्तन... 

सपनो का एक गांव बसालें
झिल मिल तारों से सजालें 
टांगें सूरज ओंधा, टहनी पर
रखें चाँद सन्दुकची में बंद कर
रोटी के कुछ झाड़ लगा लें 
तोड़ रोटिया जब चाहे खा लें
सोना चांँदी बहता झर झर 
पानी तिजोरियों के अंदर 
टाट पर पैबंद मखमल का
उड़े तन उन्मुक्त पंछियों सा।

स्वरचित 

कुसुम कोठारी ।

शब्द-लेखन। दिनांक..२७-६-२०१९.
विषय:: परिवर्तन ::

निर्मेघ गगन शशि विहीन क्यों,
बिन बादल ये बरखा कैसी।
आंसुओं से धरती सींची किसने,
मानव मन उद्वेलित क्यों है।।१।।
बिन श्रृंगार है ये दुल्हन कैसी,
बिन दूल्हे की ये बारात कैसी।
मात-पिता बिन ये घर है कैसा,
भाई-भाई का क्यूँ बदला रिश्ता।।२।।
ममता,स्नेह,प्रेम विलुप्त हुआ क्यों,
रिश्ते-नाते इक-दूजे से भाग रहे क्यों।
शायद, ये काल -चक्र का नग्न- नर्तन है,
शायद ये कलयुग का भावी परिवर्तन है।।३।।
(स्वरचित) ***"दीप"***


"शीषर्क-परिवर्तन"
किया मैंने उसका हृदय परिवर्तन
हुआ एक सुंदर आगाज,
किसी तरह से तैयार न था
पढ़ाने को उस बिटिया का बाप।

बेटा को पढ़ा लिखा कर 
भेजा उसे विदेश
जब आई बिटिया की बारी
घर मे होने लगा क्लेश।

बेकार है बिटिया को पढ़ाना
सोच रहा था पिता
बस इतना पढा़ दे ,
बस जाये उसका घर संसार।

समझाया उसे हजार बार
हुआ उसका हृदय परिवर्तन
पढा़ लिखा कर बिटिया को
बना दिया अफसर।

चलाया उसने फिर एक मुहिम
समझाने लगा हर पिता को
बिटिया होना गुनाह नही
बदलो अपनी पुरानी सोच।

परिवर्तन है जीवन का नियम
अब समझ जाओ तुम
पढ़ाओ अपनी बिटिया को
परिवर्तन को अपनाओ तुम।

स्वरचित-आरती -श्रीवास्तव।


*** परिवर्तन ***
**************
है परिवर्तनशील जगत
यह दुनिया चलनेवाली है
इस धरती की परिक्रमा अरे!
मॉनसून बदलनेवाली है

पूरबवाला सूरज भी तब
पश्चिम जाकर इठलाता है
ढ़ल जाता है इस ओर और
उस ओर ज्योत फैलाता है

यह परिवर्तन जीवन की
हर दिशा बदलनेवाला है
कहीं बरसती है दौलत
और कहीं हुआ दीवाला है

परिवर्तन हीं तो जीवन है
फिर इससे भय खाना कैसा
कल मरना है सब मरते है
फिर इससे घबराना कैसा

कुछ नन्हीं कलियों को देखो
कल कुसुमित हो जाना है
खिले हुए जो पुष्प आज
कल उनको मुरझा जाना है

संघर्षों में चलनेवाला हीं 
अपनी मंजिल को पाता है
दृढ़ निश्चय करनेवाला हीं
काँटों में राह बनाता है

साँस-साँस में होता अंतर
पात-पात में है परिवर्तन
आज दुखों से है मन बोझल
होगा कल सुख काआवर्तन...
**********************
स्वरचित 'पथिक रचना'


विधाःःकाव्यःः

परिवर्तन प्रकृति का अटल सत्य,
यह तो प्रतदिन होता ही रहता है।
आज जन्म लिया बालक ने अपने,
शिशु किशोर फिर बूढा बनता है।

यहां प्रभात फेरियां खूब निकलतीं।
श्रीराम कृष्ण की मंगल धुन बजतीं।
पहले झांझर ढोल मजीरे बजते थे,
सुबह आरती शाम संझाती सजती।

अब युग परिवर्तन की हवा चली है।
क्यों शोर हुआ ये नित गली गली है।
कभी भोर सुहावनी लगती थी जो,
हमें नहीं लगती अब वही भली है।

सब भक्ति भाव डूबा परिवर्तन में।
नहीं सुखद भावनाऐ किसी मनमें।
पूर्ण रूप से हो गया एकाकी मानव,
प्रभु कैसा परिवर्तन हो गया जन में।

स्वरचितःः ः
इंजी.शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र. 

1*भा.#परिवर्तन #काव्यः
27/6/2019/


""***"" परिवर्तन ""***""

विकासक्रम प्रथम सिद्धांत है प्रकृति का,
यहां परिवर्तन भी प्रकृति अनुकूल ही होंगे,
ध्वस्त होंगे वो सभी बने नियम और कायदे
जो जीवन यापन में कदाचित प्रतिकूल होंगे,

हाथी की कोई सूंड भी ना हुआ करती थी,
ना जिराफ की हुआ करती थी लंबी गर्दन,
यह संभव हुआ विकासक्रम की वजह से,
प्रकृति स्वयं करे अपने अनुकूल परिवर्तन,

उत्थान पतन के भंवर जब फंसा विश्वगुरु,
तब दुनिया में भी कहां हमारा समर्थन था,
तब गुलामी की बेड़ियों से हम जकड़े थे,
गौरव वैभव छिन जाना एक परिवर्तन था,


#दिनांक------27/06/19

परिवर्तन
सच्चाई जिंदगी का
‌‌ समय चक्र
सुख दुख के फेरे
मनुज रहे घिरे

नव सौन्दर्य ‌‌ ‌ 
ऋतु परिवर्तन 
अवश्यंभावी
नियम प्रकृति का
‌‌‌ धरा सृजन शील

#स्वरचित
#धनेश्वरीदेवांगन"धरा"
#रायगाढ़(छत्तीसगढ़) 


 नमन भावों के मोती 🌹🙏🌹
27-6-2019
विषय :-परिवर्तन 
वि
धा :- छंद मुक्त कविता 

अहो ! 
अहोरात्र पृथ्वी का 
विवर्तन
छहो ऋतुओं का 
परिवर्तन 
जो कल था 
वह कभी नहीं 
जो अब है 
वह अभी नहीं 
शनै शनै , पल पल 
प्रकृति परिवर्तित होती है ।
कुछ दिखाई देता नहीं 
कुछ सुनाई देता नहीं 
कब आवर्तित होती है ।
सब ग्रह नक्षत्र 
घूम रहे हैं 
सिर नीचा कर सत्ता के 
पग चूम रहे हैं 
जन्म जन्मांतरों से 
परम सत्ता के चक्कर 
काट रहे हैं ।
सिर झुकाए हुए एक 
महा संदे़श बाँट रहे हैं ।
" ठहरना मृत्यु है 
चलना जीवन है 
परिवर्तन में निहित संजीवन है 
घूमना फिरना 
चलना चक्कर काटना 
ही ऋति है 
वरना 
जड चेतन संसार 
की इति है ।" 

✍️
स्वरचित :- 
ऊषा सेठी 
सिरसा 125055 ( हरियाणा )


"परिवर्तन"
################
परिवर्तन ये प्राकृतिक हैं---
परिवर्तन दिन से रात का..
परिवर्तन नित्य चाँद का..
परिवर्तन उम्र पड़ाव का..
परिवर्तन नश्वर काया का..
परिवर्तन हर मौसम का...
लेकिन-----
परिवर्तन क्यों सद् व्यवहार में है
परिवर्तन क्यों प्रेम भाव में है.
परिवर्तन क्यों ईमान में है...
परिवर्तन क्यों नेक काम में है
परिवर्तन क्यों रिश्तों में है..
परिवर्तन क्यों सच्चाई में है
परिवर्तन क्यों मधुरता में है
परिवर्तन क्यों आस्था में है.।।

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल।


दिनांक :- 27/06/2019
शीर्षक :- परिवर्तन
एक पुरानी रचना प्रेषित कर रहा हूँ...

क्या परिवर्तन हुआ है कल में और आज में,

कल भी नारी जलती थी सति प्रथा की आग में,
आज भी नारी जलती है दहेज प्रथा की आग में,

क्या परिवर्तन हुआ है कल में और आज में,

कल भी युद्ध होते थे सत्ता की चाह में,
आज भी लड़ते है लोग सत्ता की चाह में,

क्या परिवर्तन हुआ है कल में और आज में,

कल भी होता था चीर हरण भरे दरबार में
आज भी होता है वस्त्र हरण बीच बाजार में,

क्या परिवर्तन हुआ है कल में और आज में,

स्वरचित :- मुकेश राठौड़

कच्ची गलियां कच्ची सड़कें....
नंगे पाँव थे खेले सब हम....
धूल मिट्टी में कपडे सने थे...
एक ही जैसे सब थे तुम-हम....

पक्की गलियां पक्की सड़कें....
साफ़ सजीले कपड़ों में हम....
चाल चतुरंगी बातें बहुरंगी....
मन से नौटंकी हो गए हम....

ब्लैक एंड वाइट दिन थे जब...
सपने सब के अपने थे तब....
रंगीन हुई जब से ये दुनिया....
रंगीन हो गए सब ही हम....

चरण वंदन नमस्कार की भाषा...
अब किसको कहाँ है भाता....
पीठ अकड़ी सर अकड़ गया...
हाय हेलो में ही सब सिमटे हम....

चार सदस्य हैं चार ही कमरे....
चार ही गाडी घर में हैं रखे....
कोई किसी को रोके न टोके..
इतने स्वतंत्र हो गए हैं हम....

मार काट के खेल हैं अब....
गाली-गलौच बिन बात नहीं...
ऊंचे ऊंचे मकान बना के....
नींव अपनी से हिल गए हम...

सुबह सुनहरी कैसी होती....
चाँद कब आता जाता है....
मोबाइल टीवी में देखें सब...
रोबोटिक से हो गए हम....

हर मर्ज़ की गोली खाते....
कोई चुपके से नशा चढ़ाते....
पैसे के लालच में हैं भागे....
कितने भुख्खड़ हो गए हम....

माँ की लोरी पापा की डांट...
पाषाण युग की है जैसे बात...
भाई को न बहना चिढ़ाए...
सोफिस्टिकेटेड हो गए हम.....

जाएँ तीर्थ और धाम को हम...
बुजुर्ग बसा कर बृद्धाश्रम...
तिलक लगा जयकारे लगाएं...
सबसे बड़े भक्त बने हैं हम....

वही है हाड मांस के पुतले...
सूरज चाँद सितारे वही हैं....
बदला अच्छा बुरा सभी कुछ...
पर इंसान क्यूँ हो गए गुम....

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II 
२७.०६.२०१९


आज का विषय, परिवर्तन
दिन, गुरुवार
दिनांक, 2 7,6,2019,

परिवर्तन प्रकृति का स्वाभाविक है,
नहीं योगदान कुछ मानव का।

आज प्रकृति का दोषी मानव है,
कब परिवर्तन होगा इस स्वभाव का ।

बंजर होती धरती घटते जंगल हैं,
समापन हो रहा है अब जल का ।

ये परिवर्तन क्या प्रकृति का है,
या परिवर्तन है मानव मन का।

रिश्तों को देती प्रकृति बराबर है,
हमें ही भान नहीं अब रिश्तों का।

ईश्वर ने सबको वस्त्र हीन भेजा है,
षड्यंत्र हमारा ही अमीर गरीब का ।

इनसे अलग हुआ जो परिवर्तन है ,
उससे विकास हुआ है मानवता का ।

असर दिखता ये परिवर्तन का है,
मिला तौहफा हमें आजादी का ।

घट रहा अज्ञानता का अंधेरा है,
घर घर में प्रकाश है शिक्षा का ।

संसार नारी का पहले से बदला है,
अवतरण नया है कोमलांगी का ।

स्वरूप जाति धर्म का बदला है ,
ढाँचा बदल गया है समाज का ।

पाबंदी युध्दों पर कुछ हद तक है,
रोकथाम हुई है पाशविकता पर ।

ये सब परिवर्तन की ही बातें हैं,
अच्छाई के संग अस्तित्व बुराई का ।

परिवर्तन मानव मन का जरूरी है,
खुलेगा द्वार तभी तो विकास का ।

स्वरचित, मीना शर्मा, मध्यप्रदेश,


शीर्षक-- ।। परिवर्तन/बदलाव ।।
द्वितीय प्रस्तुति

धूल भरी आँधी जाऐगी उड़
सिर्फ थोड़ा सा झुक न मुड़ ।।

हर जगह हवायें और धूल है
समझ सच्चाई वक्त से न कुढ़ ।।

वक्त ही पूजा गया सदा यहाँ
न पूजे गये कभी गुण अवगुण ।।

बदलाव सृष्टि का शास्वत सत्य
क्यों मायूस होता उसको पढ़ ।।

वन में बीते चौदह वर्ष राम के 
होने को पहले ही योग्य निपुण ।।

वक्त ने बधाई दी राजतिलक की
वक्त मिलाए 'शिवम' सबका धुर* ।।

धुर* - अक्ष , श्रेष्ठ स्थान

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 27/07/2019


परिवर्तन 

है परिवर्तन 
प्राकृति का नियम
कभी शीत 
तो कभी ग्रीष्म 
बरसात है 
पावन ॠतु
चहुंओर फैली
हरियाली और
खुशहाली 

चलता रहता 
दौर परिवर्तन का
अंधविश्वास 
अंधकार का 
हो अंत
फैले उजियारा 
हर घर 

आज खरी 
उतरती हैं 
बेटियाँ 
हर चुनौती का
करती सामना
डट कर

बेटियाँ हैं सहारा
माता पिता का
यह भी है 
एक कहानी
परिवर्तन की 

करें स्वागत
परिवर्तन का
ढलें और ढालें
अपने को 
नये युग में 

स्वलिखित 
लेखक संतोष श्रीवास्तव भोपाल


 नमन " भावों के मोती " पटल
वार : गुरुवार 
दिनांक : 27.06.2019

आज का विषय : परिवर्तन
विधा : काव्य 

गीत 

परिवर्तन का दौर निराला ,
कोई नहीं बच पाये है !
आज नहीं कल स्वीकारोगे ,
समय यही समझाये है !!

रंग बदलता आसमान भी ,
सूना सूना सा ताके !
हरियाला आँचल धरणी का ,
कितनी पीड़ा को ढाँके !
रोज़ यहाँ दिन रात बदलते ,
मन की पीर सुनाये है !!

मौसम भी किलकारी देता ,
रोज़ हमें ठगना जाने !
यहाँ नियति भी रोज बदलती ,
देखो अपने पैमाने !
कहीं नहीं ठहराव मिलेगा ,
घड़ी यही दोहराए है !!

बदला बदला सा समाज है ,
रिवाज़ यहाँ लगे बदले !
कल तो भूला भूला लगता ,
हमको आज ज़रा ठग ले !
दुनिया बदली , हमें बदलना ,
सबके मन को भाये है !!

स्वरचित / रचियता :
बृज व्यास
शाजापुर ( मध्यप्रदेश )


विषय-परिवर्तन

समय की गति और परिवर्तन की रति
सत्य है इन दोनो में ,ना होती कभी यति
समय को कब ,कौन रोक पाया है ,कहो !
परिवर्तन के मायने सबके सामने तो कहो
क्या हमने पाया है ?क्या हमने खोया है ?
इसके नाम पर भला क्यों निज विवेक खोया है ?
कभी महसूस किया है क्या तुमने !!!!
समाज अस्त -व्यस्त हो चला है
त्रस्त जनता का मन सिसक रहा ,
जीवन मूल्यों का ह्रास होने लगा
संक्रमण पाक रिश्तों में हो रहा ,
रक्त -रक्त का प्यासा बन चुका 
फिर भी तुम शान से कहते हो -
समाज में परिवर्तन हो रहा है !
व्याभिचार नरभक्षी बन गया है
भ्रष्टाचार जड़ खोख़ली कर गया
मानवता खुलेआम शर्मसार हो रही
बेटियों की अस्मत संकट में है जो
बलात्कार से तार तार हो रही !!
वृध्दों का जीवन बदहाल हो गया
घर की चौखट वृद्ध आश्रम हो गई
स्वार्थ नसों मे रक्त बनकर दौड़ रहा
परमार्थ भाव पीड़ा से दम तोड़ रहा
फिर भी शान से तुम कहते हो —
मेरे समाज में परिवर्तन हो रहा है !!!
अम्बर से आग बरसने लगी है
धरती तपन से झुलसने लगी है
जंतुओं की जातियाँ विलुप्त हो रही है
वन उपवनों की संख्या हाशिए पर है
ऋतुओं ने अपना रूख मोड़ लिया है
प्राकृतिक आपदाओं ने शिकंजा कस लिया है
प्रदूषण की हवा साँसों को तोल रही 
ज़िंदगी हमें किश्तों में जीने दे रही है
फिर भी तुम शान से कहते हो—
समाज में परिवर्तन हो रहा है !!!
इस परिवर्तन पर आज विमर्श होना चाहिए
या ज़िंदगी को इसकी शर्तों पर चलना चाहिए

✍🏻संतोष कुमारी ‘ संप्रीति ‘
मौलिक एवं स्वरचित

शीर्षक-परिवर्तन
🙏🏻🌺🌹🌷🌸🥀🙏🏻

पगार कम थी तो महगांई कम थी।
पगार बढ़ गई तो महगांई बढ़ गई
फिर परिवर्तन क्या हुआ ?
सीमित साधन थे इच्छाएं छोटी थी
साधन बढ़ गए इच्छाएं बढ़ गई
फिर परिवर्तन क्या हुआ ?
आपसी तालमेल था तब मीडिया नहीं था
मिडिया है तो लोगों में आपसी तालमेल नहीं है
फिर परिवर्तन क्या हुआ ?
मन मुटाव कम थे तो रिश्ते गहरे थे
मन मुटाव बढ़े तो रिश्तों में दूरियाँ बढ़ गई
फिर परिवर्तन क्या हुआ ?
तकनीक कम थी तो खर्च कम था
तकनीक बढ़ी तो खर्च बढ़ गया
फिर परिवर्तन क्या हुआ ?
जब जोश था तब होश नहीं था
अब होश है तो वो जोश नहीं है
फिर परिवर्तन क्या हुआ ?
जब हिम्मत थी तब साधन नहीं थे
अब साधन हैं तो हिम्मत नहीं है
फिर परिवर्तन क्या हुआ ?
जब कागज़ था तब लेखनी नहीं थी
अब लेखनी है तो कागज़ नहीं है
फिर परिवर्तन क्या हुआ ?
जब अमन चैन था तब धन नहीं था
अब धन हैं पर अमन चैन नहीं है
फिर परिवर्तन क्या हुआ ?
********************
स्वरचित
अशोक कुमार ढोरिया
मुबारिकपुर(झज्जर)
हरियाणा


27/06/19
गुरुवार 
कविता 

युग-परिवर्तन की बेला में कुछ अप्रत्याशित क्षण आते हैं 
जनता में उथल-पुथल मचती,ऊँचे पहाड़ हिल जाते हैं। 

हर दिशा नये शासन की जय-जयकारों से गुंजित होती ,
जनता के सेवक नयी सोच से अपना लक्ष्य बनाते हैं। 

जब भी समाज में मानवता का कोई लंघन करता है,
तब निश्चित ही इस पृथ्वी पर एक युग-अवतार उभरता है।

वह स्वयं त्याग-तप के बल पर अपना कर्तव्य निभाता है,
तब देश उसी से प्रेरित हो जीवन का पथ अपनाता है।

अब उसी युग - पुरुष ने सत्ता की बागडोर को थामा है,
उसकी कर्मठता से विपक्ष में जबरदस्त हंगामा है।

अब भ्रष्टाचार और हिंसा का नामो-निशां नहीं होगा,
चहुंओर प्रगति के सोपानों पर भारत का परचम होगा। 

स्वरचित 
डॉ ललिता सेंगर

27/6/19
भावों के मोती
विषय-परिवर्तन

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परिवर्तन की लहर चली
हर गाँव गली शहर
हो रहे अविष्कार
फैला ज्ञान का प्रकाश

परिवर्तन की लहर चली
ऊँचाईयों को छूने लगी
मंगल पर पहूँचते यान
भारत का जग में नाम

परिवर्तन की लहर चली
शराफ़त दम तोड़ने लगी
भ्रष्ट्राचारियों का बढ़ता साम्राज्य
जनता का होता हाल-बेहाल

परिवर्तन की लहर चली
कर रही रिश्तों पर असर
सिमट रहे परिवार
कम हो रहा आपसी प्यार

परिवर्तन की लहर चली
संस्कारों की बलि चढ़ी
पाश्चात्य संस्कृति ने पाँव पसारे
घर के संस्कार बाहर निकाले

परिवर्तन की लहर चली
इंसानियत पर हावी हुई
मानवता भूल इंसान बना हैवान
मासूमियत के लेता प्राण
***अनुराधा चौहान***©स्वरचित

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"भाषा"19 जुलाई 2019

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