Tuesday, July 2

"अधिकार "02जुलाई2019

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ब्लॉग संख्या :-435

दिनांक-02/06/2019

अधिकारों के आधार पर 

स्वतंत्रता की बदली कब बरसेगी..........

हृदय फूल की पंखुड़ियों पर 

कर्तव्य बिंदु बनकर कब छलकेगी।

मूक हृदय के स्पंदन में 

अस्तित्वों की ज्वाला कब धधकेगी।

युगो-युगो की सुप्त वेदना 

अधरों की लहरों पर कब थिरकेगी।

अनुभूति व्यक्त हुई स्नेहिल

गीली आंखों से ,आंसू कब ढलकेगी।

सारे स्नेहिल सत्य हुए यदि

उल्का बनकर टूट- टूट कर कब चमकेगी।।

आशाओं का धवल श्रृंगार बनकर

निर्मोही पाषाणी छाती पर

गंगा बनकर कब निकलेगी।

पीकर सब आनंद मौन हूँ

रजनी के अंगों पर..............

स्वरचित 
मौलिक रचना
सत्य प्रकाश सिंह केसर विद्यापीठ इंटर कॉलेज प्रयाग राज



किस अधिकार की,
करते हैं हम बात ।
जो बंद हैं किताबों में ।
या बंद हैं कुरानों में ।
कहाँ हैं ?
मेरे अधिकार ।
मैं, नारी,
सदिया बिती सारी ၊
चाहत थी सदियों से,
कुछ तो बोलू ၊
अपने दिल का दर्द,
अपनों के सामने खोलू ၊
लेकिन हर बार,
लगा दिया जु़बा पर ताला ၊
कभी अपनों ने तो कभी,
धर्म के रखवालों ने ၊
चाहत जो रह गई अंदर ၊
उसे आज भी नही मिला,
खुला आसमां, खुला समंदर ၊
बंद रह गई बस..
बंद दरवाजे,कहानी,
किताबों के अंदर ।

@प्रदीप सहारे

विधा लघुकविता
02 जुलाई 2019,मंगलवार

एक सिक्के के दो पहलू
होते हैं अधिकार कर्तव्य।
सुखमय सुन्दर जीवन का
महल बनता है अति भव्य।

मातपिता का प्रिय अधिकार
सदसँस्कार बालक में भरना।
कलुषित आदत सदा हटाकर
प्रगति पथ नित इंगित करना।

शस्य श्यामल वसुंधरा सुत
अधिकारों से आगे बढ़ते ।
डटे हुये कर्तव्य पथ पर
मंजिल ऊपर वे नित चढ़ते।

परमपिता सबका परमेश्वर
बागवान है वह धरती का।
सर्वाधिकार वह सम्पन्न है
रखे ध्यान सर्व करनी का।

स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

2/7/2019/
बिषय ,,अधिकार,,

ईश्वर द्वारा प्रदत्त जीवन उपहार
प्रणेता जगत का रचनाकार
इशारों पर चलती सृष्टि संसार
फिर मानव क्यों परेशान बेकार
क्यों स्वयंभू बन छीनें अधिकार
भाई को जायदाद बेटी को पढ़ने का
पत्नी को समकक्ष बच्चों को बढऩे का
बृक्षों पहाड़ों को अडिग नदियों को बहने का
ए सुरमई साँझ भोर सूरज को निकलने का
हम क्यों बाधक बनें इनकी गति में
तत्पर रहें सदैव प्रगति में
सबको मिले समान अधिकार 
सकरात्मक हो सबका ब्यवहार
स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार,,

अधिकार है अगर तो फर्ज़ है
इन दोनों में आपस में तर्ज़ है ।।

खाली अधिकारों को जताना
इंसान का एक इंसानी मर्ज़ है ।।

बचपन में बच्चे को माँ का दूध
मगर माँ की सेवा में किसे हर्ष है ।।

राष्ट्र का हर एक नागरिक जाने 
नागरिक सुविधा लेने का अर्थ है ।।

मगर न समर्पण राष्ट्र के प्रति 
और उलटा करता बेड़ा गर्क है ।।

अधिकार से पहले पहचानो फर्ज़
इसमें अपना समाज का उत्कर्ष है ।।

सिर्फ अपने अधिकारों को जताना
एक बहुत बड़ा झूठ है यह हर्ज़ है ।।

अधिकार से पहले होती 'शिवम' शर्त
दुनिया में कुछ भी न होता बेर्शत है ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 02/07/201

शीर्षक-"अधिकार "
विधा- कविता
****************
मत मारो मुझे कोख में,
आना चाहूँ मैं भी बाहर, 
लड़की हूँ तो क्या हुआ? 
क्या मुझे नहीं जीने का अधिकार? 

माँ की पीड़ा समझी मैंने, 
पापा का चाहूँ मैं भी प्यार,
लड़की हूँ तो क्या हुआ? 
क्या मुझे नहीं जीने का अधिकार? 

खुली हवा मैं आना चाहूँ, 
पढ़ लूँ मैं भी अक्षर चार, 
लड़की हूँ तो क्या हुआ? 
क्या मुझे नहीं जीने का अधिकार? 

स्वरचित *संगीता कुकरेती*

विधा:छंदमुक्त

आओ आज कुछ तुम्हें सुनाऊं 
एक छोटी सी गाथा बतलाऊं 
एक कहानी अधिकारों की 
एक कहानी नाजुक फूलों के 
प्रेतों में ढल जाने की 
एक मानव दूजे मानव पर 
बोलो क्यों कर मांगे अधिकार 
ईश्वर की असीम रचना के 
हम सब हैं सम अधिकारी 
सदियां बीती युग भी बदले 
पौरुष ने रची अधिकारों की माया 
सबसे पहले स्त्री आई 
कर्तव्यों का नाम दे पहनी 
जंजीरों की माला 
पुत्री भार्या माता बन कर 
निर्वाह करें कर्तव्यों का 
अधिकारों की बात जो आई 
चूल्हे चौके बात सिमट आई 
एक अधिकार साहूकारों का 
मजदूरों को बंधुआ बनाया 
पीढ़ी बीती मिली न शिक्षा 
उधार धन बेदर्द प्रकृति 
किसान खुदकुशी तक पहुंचाया 
हाय !यह कैसी अधिकारों की माया 
एक अधिकार मोह का समझो 
बीती जवानी बुढ़ापा आया 
सारा रोब संतान जमाया
पाला पोसा जैसे तुमने 
सब अपने सुख की ही खातिर 
यह कोई डेबिट क्रेडिट ना 
मांगे जो सुख बदले में 
अपना आपा आप संभालो 
रख लो भर जेबे सावन में ,
आये एक दिन पतझड़ भी।
अधिकारों की बात छोड़ो दो 
कर लो खेती सम्मान की
युग बदला बदली है बातें!

नीलम तोलानी
स्वरचित

बिषयःःः #अधिकार#
विधाःः काव्यः

अधिकार कर्तव्य एक दूजे के पूरक,
हम प्रभु तुमसे ही अधिकार मांगते।
जब दीनहीन हम सब दीनदयाल के,
तब जबरन अपना अधिकार मांगते।

क्यों गिरधारी तुमने जन्म दिया है।
अपना वरदहस्त हमें दान दिया है।
हम नहीं किसी से करें शिकायत,
जब तुम्हें ही अपना मान लिया है।

निर्धारित कुछ कर्तव्य मानते हम।
क्यों फिर तुमसे अधिकार जताते।
कर्म प्रधान निहित हमें उपदेशों में,
नहीं करते मगर अधिकार बताते।

नहीं किसी के शुभदायक हैं हम।
नहीं परोपकार के लायक हैं हम।
सबजन के तुम अधिकारी दाता
करें याचना केवल याचक हैं हम।

स्वरचितःः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

विषय - अधिकार ( हक) 

जीना हो आसानी से तो 
जीवन मे सब सहना सीखो, 

जिसको अपना सको अपना लो 
कुछ को नजर अंदाज कर लो, 

खुद के मरने से ही मिलता है स्वर्ग 
यहाँ जो मिला उसे न बनाओ नर्क, 

छीनो न "हक" निर्बल जन का 
अपनी कोशिश से पावो जितना चाहो, 

जीना नही आसान अगर तो
कर प्रयत्न आसान बनाओ ।

स्वरचित 

कुसुम कोठारी ।

विषय-अधिकार
***
**************
अधिकार की तो सब बातें करते हैं
कुछ कर्तव्य की भी बात करें तब तो कोई बात बने..

संविधान ने सबको समान अधिकार दिए हैं
भाषानुगत,जातिगत, धर्म ,वर्ग सबमें समानता दिखे तब तो कोई बात बने...

बेटा बेटी एक समान, बेटियां हैं घर की शान 
मगर अधिकारों में भी समानता हो
तब तो कोई बात बने....

वृद्ध होते माता पिता की जायदाद पर हक़ तो जमा लिया
अपने कर्तव्यों का भी भान रहे
तब तो कोई बात बने...

सरकार को कोसने में सब माहिर हैं
हक़ की बात सभी करते हैं कुछ फ़र्ज़ की बात करें तब तो कोई बात बनें...

इस देश के हम सब वासी हैं ये हक हमें बख़ूबी याद हैं
कुछ फ़र्ज़ निभाने की ज़िम्मेदारी भी लें
तब तो कोई बात बनें....

@वंदना सोलंकी©️स्वरचित

कविता 

अधिकारों की बात उसी मानव को शोभा देती है ,
जिसके अंतर्मन में जलती कर्तव्यों की ज्योति है।

कर्मवीर ही जीवन में लक्ष्यों को हांसिल करते हैं ,
अकर्मण्य लोगों में बातें अधिकारों की होती है।

साक्षी है इतिहास कि जग में जो कर्तव्य निभाता है ,
उसकी कर्मठता ही गौरव की अधिकारी होती है।

अधिकारों का लाभ उठाकर सब समर्थ बन जाते हैं,
पर अधिकारों के पर्दे में दानवता विष बोती है।

जाति-धर्म और लिंग को लेकर सब आपस में लड़ते हैं ,
जबकि आज के युग में सब पर एक दृष्टि ही होती है।

है सबको अधिकार राष्ट्र का सफ़ल नागरिक बनने का
पर उसके हित मातृभूमि की सच्ची सेवा होती है।

स्वरचित 
डॉ ललिता सेंगर


विषय - अधिकार
विधा - कविता 
एक समाज ऐसा बन
स्त्री को समान अधिकार मिले 
न पर्दे में छिपी रहे बड़ों के मान के नाम पर
न छली जाये आडम्बर के नाम पर
बस बढ़ती रहें वो प्रगति पथ पर 
अखंड राष्ट्र निर्माण के काम पर 

पढ़ लिखकर वो अपनी पहचान बनाये 
जीवन को अपने आत्मनिर्भर बनाये 
चार दीवारी में कैद होकर ही वो ना रहे 
अवसरों का उसे खुला आकाश मिल जाए 
अशिक्षित रहकर अपने बहुमूल्य जीवन को 
निरर्थक बना कर वो व्यर्थ ना गंवा ये 

सक्रिय रहे अपनी ख्वाहिशों के लिए
ख्वाहिशों के भंवर को दिल में कैद ना कराये 
दूसरों की भावनाओं को समझने के साथ साथ
खुद की भावनाओं का सम्मान करना सीख जाए
नारी उन्मुक्त सोच और समझ को भी 
समाज में पूरा मान सम्मान और स्थान मिल जाए

बस कर्तव्य की मूरत बनने के साथ
अधिकारों की भी नारी हकदार बन जाए
कंधे से मिलाकर कंधा पुरुष से 
नये संसार की नींव को मजबूत वो बनाए 
सशक्त बनाकर स्वयं को नारी 
देश को सुदृढ़ और सम्पन्न बनाएं
स्वलिखित /मौलिक
हिमाद्री वर्मा
जयपुर (राजस्थान

विधा- गद्यलेखन
दिनांक-2/7/2019

हर देश काल में समाज में व्यक्तियों के पास कुछ अधिकार एवं कर्तव्य होते हैं।
वास्तव में यह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। अंतर है तो केवल दृष्टिकोण का कि हम किसे महत्व देते हैं।
हमारे संविधान में दोनों को समान महत्व दिया गया।लेकिन मेरा व्यक्तिगत मत यह है कि कर्तव्य की पौध मुरझा जाती है जब अधिकारों की उस पर चढ़ाई हो जाती है।
सन 1975 में हमारे देश के लोकतांत्रिक इतिहास में कुछ ऐसा ही दुष्काल आया जिसे नाम दिया गया आपातकाल।
इमरजेंसी के दौर पर चाहे तो इतिहासकार कितना ही लिख सकते हैं।
लेकिन आज भी कुछ खास परिवर्तन नहीं आया जैसे ही ही हम अपने कर्तव्य की अनदेखी करना शुरू कर देते हैं वही शुरू हो जाता है आपातकाल और अधिकारों की लड़ाई।

शालिनी अग्रवाल

अधिकार

करें अधिकार की 
बात बाद में 
पहले बने कर्मठ
मेहनती और 
ईमानदार

है अधिकार
सब के बराबर
चाहे बेटा हो
या हो वह बेटी

जल और जमी 
पर है सबका
अधिकार
चाहे वो हो 
कोई अमीर या
हो कोई गरीब

अधिकार है 
सब को
जीने का
हर जीव
हर प्राणी को

करो ईश 
वंदना सब
इतने उपजे 
संसाधन जग में 
न कोई रहे 
भूखा प्यासा 

स्वलिखित 
लेखक संतोष श्रीवास्तव भोपाल

स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

कविता
################
छोड़कर बातें अधिकार की
दिल से दिल की बात करें
सुख -दु:ख में हम साथ रहें
एक दूजे को हम थाम लें।

अधिकार कितना तेरा-मेरा है
क्या रखा है इन बातों में
मैंने तो खुद को ही हारा है
अब मेरा जीवन भी तुम्हारा है

फर्ज तूने अपना निभाया है
मैंनें भी कर्तव्यों को जीया है
फिर क्या तेरा और क्या मेरा है
अधिकार के लिए न लड़ना है

कुछ खामियाँ मुझमें है
कुछ खामियाँ तुझमें है
फिर भी हँसके साथ रहना है
अधिकार से गलतियाँ न गिनाना है।

अधिकार के लिए क्यों लड़ना है
इससे ही मन में अहं आता है
बैरभाव से रिश्ता इसका गहरा है
खुशी-खुशी इस जीवन को जीना है।।

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल।।

Usha Saxena मं
विधा:- कविता ।
अधिकार:-
रामराज्य की सुखद कल्पना
बीते युग की बात बन गई ।
कर्तव्यों की कड़ी धूप ढल
अधिकारों की छाव बन गई ।
राजनीति की कुटिल चाल में
कूटनीति अब ढाल बन गई 
प्रजातंत्र की बातें करते करते
प्रजा स्वयं ही दास.बन गई ः
स्वरचित :-उषासक्सेना



आज का विषयः-अधिकार


होता आ रहा है हम पर युग से अत्याचार।
करते रहते शोषण हमारा नहीं देते अधिकार।।

है जो भूमि हमारी जमाते उस पर अधिकार।
शक्ति के बल पर करने नहीं देते प्रतिकार।।

मचा देते है यह अत्याचारी भयंकर हाहाकार।
करते हैं मनमानी लठ देवता का करते प्रहार।।

बहुत हुआ, सहन नहीं किया जाता अनाचार।
करबध्द प्रार्थना करतार, तू ही दिला अधिकार।।

डा0 सुरेन्द्र सिंह यादव
“व्यथित हृदय मुरादाबादी”
स्वरचित


शीर्षक-अधिकार
*********
छोटा सा पौधा खड़ा,
भर रहा है आहें,
बड़ी कठिन है जिंदगी,
मेरी जीने की राहें।
मेरा भी बढ़ने का ,
आज पूरा है अधिकार,
फिर मानव क्यों करता है
मेरे पनपने का बहिष्कार।
मानव का भी कर्त्तव्य है
जाने मेरे भी अधिकार।
जीने की मुझे स्वतंत्रता दे दो
ले लो चाहे तुम सारी।
पर्यावरण शुद्ध रखने की
जिम्मेदारी है हमारी।
पेड़ों को बचाने की
समझदारी है तुम्हारी।
ले अधिकार ,कर्त्तव्य निभायें
है समझदारी हमारी।
**************
स्वरचित
अशोक कुमार ढोरिया
मुबारिकपुर(झज्जर)
हरियाणा


विषय - अधिकार 

अधिकारों की लगी जमात , 
भूले कर्तव्यों की बात ।
राम कृष्ण सा जीना सीखो
भोला सा विष पीना सीखो ।
परहित की भूले डगर , 
छिड़ा अधिकारों का समर ।
कर्तव्य की सुघड़ जमीन पर 
उपकार के बिखराओ बीज 
लहलहाएगी फसल 
अधिकारों को सहेज ।
दलितों ,शोषितों के ,अधिकार दिलाओ, 
परोपकार की मधु सुधा पिलाओ ।
दुख के बादल छट जायेंगे 
भेदभाव सब मिट जायेंगे ।
अधिकारों के समर में बलि चढ़े जो 
फिर वो सुख जीवित हो ,घर आयेंगे ।

(स्वरचित )सुलोचना सिंह 
भिलाई (दुर्ग )

नमन भावों के मोती
दिनाँक - ०२/०७/२०१९ 
दिवस - मंगलवार
विधा - हाइकू 
विषय - अधिकार
****
कर्तव्य संग, 
समान अधिकार 
दे संविधान !!
!
देश की शान,
कर्तव्य-अधिकार
बढ़ाये मान !!
!
क्यों करें भेद, 
एक खेत की खेती 
बेटा या बेटी !!
!
पूरब या पश्चिम 
समान अधिकार 
उत्तर या दक्षिण 
!
वृद्ध माँ-पिता, 
मिले प्यार सम्मान 
है अधिकार !!
!
स्वरचित : डी के निवातिया

विषय - अधिकार
विधा - छंदमुक्त कविता

कुछ नारियों को आज भी वो सब अधिकार नही मिल पाए है जिनकी वो हकदार है। आज भी बहुत से घरों में बेटा-बेटी में भेदभाव किया जाता है। राजस्थान व हरियाणा के कई स्थानों पर कन्या भूर्णहत्या जैसे कुकर्म आज भी किये जाते है। आज भी बेटी होने पर घरों में मातम मनाया जाता है। बहुत से लोग अपनी पत्नी को जीवनसाथी न मानकर दासी मानते है। उनके साथ मारपीट करते है। ऐसी महिलाओं को समर्पित मेरी ये रचना।

शीर्षक - नारी होने का अधिकार

कुछ नारी है बहुत लाचार,
करती नही कोई प्रतिकार।
नारी को कब मिल पाया है
नारी होने का अधिकार।।

माँ चाहे बच्चों से प्यार,
माँ होने का मिले अधिकार।
बैठा देते है वृदाश्रम में,
बच्चें देते है उनको दुत्कार।।

पत्नी चाहे पति से सम्मान,
घर मे हो उनका भी मान।
अधिकार कहाँ मिलता उनको,
बस मिलता हर पल अपमान।।

बेटी चाहे समान अधिकार,
क्यो करते बेटी पर अत्याचार।
हो अगर बेटा बेटी एक समान
तभी सँवरेगा समाज का आधार

शवि चाहे ये अधिकार,
मिले सबसे उसे दुलार।
बन जाए एक ऐसा समाज,
जहाँ न करे कोई अत्याचार।।

स्वरचित - सरला सिंहमार 'शवि'

धन्यवाद


"अधिकार"
1
मेरा जीवन
पूर्ण है अधिकार
माता व पिता
2
वृद्ध सदस्य
खुशी का अधिकार
हमारा फर्ज
3
विवादास्पद
अधिकार का क्षेत्र
देश विभक्त
4
बड़ों के पास
स्नेह का अधिकार
माँगता मन
5
बेटा या बेटी
शिक्षा का अधिकार
मिले समान

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल।


अधिकार )



माटी चंदन 
मिटना अधिकार 
प्राण न्यौछार 



कर्तव्य पथ 
खो गए अधिकार 
ढूंढें संसार 



करो मनन 
निजता अधिकार 
होता हनन 



मनु पुकार 
समता अधिकार 
प्राणों से प्यार 



पूजा अजान 
धर्म के अधिकार 
करो स्वीकार 

(स्वरचित )सुलोचना सिंह 
भिलाई (दुर्ग )


छंदमुक्त
(अधिकार) ***************************
अधिकार,
शाब्दिक अभिप्राय
प्रभुत्व।

अधिकार के,
सामान्यतः दो रूप हैः-
विधिक एवं प्राकृतिक।
विधिक वे अधिकार,
जो विधिसम्मत और मानव,
समाज के रीतिरिवाजों पर,
आधारित है,जिन्हें समय की,
आवश्यकतानुरूप परिवर्तित,
या निरसित किया जा सकता है।
प्राकृतिक अधिकार,
प्रकृति द्वारा प्रदत्त,जो
संस्कृति विशेष,रीति रिवाज,
या शासन-विधान पर,
निर्भर नहीं।
प्राकृतिक अधिकार,
सार्वभौमिक एवं,
अविच्छेद्य,
होते है।

भूतल पर मानव,
कर्मणि जन्मा है।
उसे "कर्मषु कौशलम" की,
उक्ति को चरितार्थ करते हुए,
कर्म मे रत रहना है।
उसके कृत कर्म के अनुरूप,
फल मिलेगा,जो उसके,
अधिकार मे नही।
फल का निर्धारण,
ईश्वर एवं उसके,
लौकिक स्वामी के,
हाथ में है।
गीतासार भी,
यही हैः
"कर्मण्येवाधिकारस्ते,
मा फलेषु कदाचन।"
-स्वरचित-
(अरुण)



"***"**""अधिकार""**"***"

अधिकार मिला है सभी को जीने का,
फिर क्यों अधिकार नहीं हमें मरने का,
ऐक्छिक मृत्यु का हक क्यों छीन लिया,
हक नहीं किसी को मृत्युदंड तय करने का,

दण्ड विधान का हक हो सिर्फ कुदरत को,
जो स्वयं ही सम्पूर्ण श्रृष्टि की संचालक है,
सम्पूर्ण चराचर जगत की यही पोषक है,
नर पशु पक्षियों की भी यही पालक है,

स्व जन्म के कारणों से अनभिज्ञ हैं हम,
स्व मरण का भी कारण क्यों ना तय करें,
अगर जन्म ना कोई हमें दे सकता हो,
फिर कैसे हम किसी और के हाथों मरें,


"शीषर्क-अधिकार"
इस धरा पर सबको है
स्वतंत्रता से जीने का अधिकार
मूक पशु का रक्त बहाकर
क्यों बनाये अपना आहार।

किसने अधिकार दिया है उन्हें
फैलाये वे समाज में दंगा
जो थे पहले भाई भाई
अब है उनमें रुसवाई।

सभी बच्चों को है
शिक्षा का समान अधिकार
क्यों कोई बच्चा बाल मजदूर बन
काम करे दिन -रात।

हमें दिलाना है उन्हें
अधिकारो का ज्ञान
अपना भविष्य सँवार कर
बन सके भारत के कर्णधार।
स्वरचित-आरती-श्रीवास्तव।

Damyanti Damyanti 

विषय ,,अधिकार
बात अधिकारकी करते सभी ।
कर्यत्व भी जुडे साथ यह भी माने ।
दोनो हो साथ तो कार्य संपन्न हो सफल।
हर व्यक्ति केवल पद अधिकार है चाहता ।
घर परिवार समाज देश हर जगह ।
स्वच्छ हो जीवन करे न बात अधिकार की ।
पर्यावरण के प्रति रहे सजग हर मानव ।
अधिकार के साथ सबक भी हो कर्यत्व कर्म का ।
सबका होगा जीवन सफल यह सचाई समझे सभी ।
स्वरचित ,,दमयन्ती मिश्रा 
गरोठ मध्यप्रदेश ।

विधा कविता
दिनांक 2,7,2019
दिन मंगलवार

अधिकार
🍁🍁🍁🍁

अधिकारों का उपयोग होना चाहिये
अधिकारों का नहीं भोग होना चाहिये
अधिकार होते जन कल्याण के लिये
अधिकार होते सबके त्राण के लिये।

जो काम लेता अपने अधिकार जन हितार्थ
और भूल जाता अपने कुछ निजी स्वार्थ 
वह लोगों के दिल में रहता है
उसका व्यक्तित्व अलग कुछ कहता है।

जो दुरुपयोग करते हैं अधिकारों का
ध्यान नहीं रखते हैं बेचारों का
वे श्रद्धेय कहाँ हो पाते हैं
वे दिल से ही मिट जाते हैं।

स्वरचित
सुमित्रा नन्दन पन्त
जयपुर


विषय अधिकार 
***
कथित सभ्य सुसंस्कृत उन्नत समाज में 
मानव लड़ रहा अधिकारों के लिए 
क्यों नहीं ऐसी व्यवस्था बनती 
सभी सिर उठा कर जिये
समता का भाव लिए ।

शिक्षा ,कानून आजादी ,धर्म भाषा 
काम हो सबका मौलिक अधिकार 
क्या कभी चिंतन कर सुनिश्चित किया 
क्यों नहीं बना अब तक वो उसका हक़दार।

समता के नाम पर क्या किया तुमने 
आरक्षण का झुनझुना थमा हीन साबित किया
बांटते रहे रेवड़ियाँ अपने फायदे के लिए 
सब्सिडी और कर्ज माफी से उन्हें बाधित किया। 

मानव अधिकार की बातें कही जाती हैं 
अधिकार के नाम पर भीख थमाई जाती है 
देने वाला भी खुश और लेने वाला भी खुश 
इस लेनदेन में जनता की गाढ़ी कमाई जाती है।

क्यों नहीं ऐसी व्यवस्था बनाई जाती है 
जहां अधिकार की बातें बेमानी हो जाए 
ना कोई भूखा सोए ,न शिक्षा से वंचित हो
भेदभाव मिट जाए,हर हाथ को काम मिल जाये ।

योजनाएं तो बनाते हो पर लाभ नहीं मिलता 
बिचौलिए मार्ग में बाधक बन तिजोरी भरते है
कानून का अधिकार है,लड़ाई लंबी चलती है
लड़ने वाला टूट गया बाकी सब जेबें भरते है।

महंगी शिक्षा व्यवस्था है कर्ज ले कर पढ़ते है
नौकरी गर न मिली तो कर्ज कैसे चुकायेगें
कर्ज देने मे भी बीच के लोग कुछ खायेंगे
बेचारा किसान दोनो तरह से चपेटे में आएंगे।

आयोग बना देने से,एक दिवस मना लेने से
रैली निकाल लेने से ,कुछ नहीं होगा 
मानव पहल तुम करो ,दूसरे के अधिकार मत छीनो
खोई हुई प्रतिष्ठा के वापस लाने के हकदार बनो ।

स्वरचित
अनिता सुधीर

दिनांक, 2,7,2019,

माँगने से भीख नहीं मिलती ,

कोशिश से ही मिलते हैं मोती ।

हो दायित्वों के पालन में कभी,

अधिकारों की बात नहीं होती ।

व्यवस्थित समाज के लिए कभी,

मर्यादाएं हो सकतीं गलत नहीं ।

ये तो पालन कर्ता की है मर्जी ,

वो अराजक बने या सभ्य शहरी।

नियमों में समाहित जीवन सुखी,

कर्तव्य व अधिकार होते हैं सभी।

जब से हो गये हम सब मतलबी,

शासन करने की नीयत है जागी ।

निर्बल दीन दुखियों के कारण ही ,

अधिकारों की बात चली आयी।

हद हो जाये जब निरंकुशता की,

तब चलती नहीं है अधिकारों की।

सजगता हो अगर अधिकारों की,

करनी पड़ती है कोशिश पाने की।

इच्छा हो जब कर्तव्य निर्वहन की,

हम बात करें तब अधिकारों की ।

विधा :हाइकु
विषय: अधिकार/हक

1.
समता हक
मौलिक अधिकार
दे संविधान
2.
आता दिवस
मानव अधिकार
दिसम्बर में
3.
गर्भस्थ कन्या
हाथ जोड़ माँगती
जन्म का हक

- हरीश सेठी 'झिलमिल'
स्वरचित


ाइकु (5/7/5) 
विषय:-"अधिकार " 
(1)
भीतरघात 
अधिकार की आड़ 
देश पे वार 
(2)
देश आज़ाद 
अधिकार जो जागे 
मिला स्वराज 
(3)
स्वार्थ के होते 
अधिकार जागते 
कर्तव्य सोते 
(4)
बदनसीबी 
अधिकार हारता 
जीते गरीबी 
(5)
भेजा आश्रम 
अधिकारों से प्यार 
भूले संस्कार 

स्वरचित 
ऋतुराज दवे

विधा-हाइकु

(द्वितीय प्रस्तुति)

1.
हक हमारा
भ्रष्टाचार मिटाना
कर्त्तव्य प्यारा
2.
बेटी का हक
पैतृक संपत्ति में
संवैधानिक
3.
सद कर्त्तव्य
अधिकार न छीनों
एक दूजे का
4.
सबको मिले
शिक्षा का अधिकार
एक समान
5.
आज़ादी वास्ते
अधिकार को लड़े
वीर जवान
*********
स्वरचित
अशोक कुमार ढोरिया
मुबारिकपुर(झज्जर)
हरियाणा

-----अधिकार-----

अधिकार!अधिकार! अधिकार!
हम बात करते हैं अधिकार की
हम मांग करते हैं
अपने अधिकार की
बन्द, रैली, तोड़-फोड़
हड़ताल ताबड़तोड़
करते हैं बस
अधिकार पाने के लिए
पर वहीं
भूल जाते हैं
अपने कर्तव्यों को
अनैतिकता पर जाने के लिए
आजादी के अधिकार से
क्यों बढ़ रहे अपराध
धर्म की आड़ में
नित क्यों हो रहा घमासान
शिक्षा एक अधिकार है पर
सीखने सिखाने में क्यों व्यवधान
अधिकारों को पाना हैं
कर्तव्यों की राह चलना होगा
बन एक नागरिक श्रेष्ठ
कुंदन से तुझे तपना होगा

स्वरचित
बलबीर सिंह वर्मा
रिसालियाखेड़ा सिरसा (हरियाणा

विषय.. अधिकार

अधिकार की मांग हो रही 
भूल गए मानवता को।
अधिकारों की होड़ मची है,
भूल गए संस्कारों को।
अधिकार मिला है रक्षा का
पर मानव हो गया भक्क है।
हर व्यक्ति लड़ाई लड़ता है,
पाने को निज अधिकारों को।
क्यों बन जाता है वह पिशाच
इन अधिकारों की लेकर आड़।
आओ मिल कर के जतन करें
दुरूपयोग न हो अधिकारों का।
जो भी हनन करे अधिकारों का
दंडित भी हो वह अधिकारों से।
हाथ जोड़ कर है विनती
न हनन करो अधिकारों का।
जो हनन करेगा अधिकारों को
अपने अधिकार भी खो देगा।
बन जाएगा वह शत्रु सभीका 
अपनी गरिमा भी खो देगा।
(अशोक राय वत्स)© स्वरचित
जयपुर


मैं नारी हूँ, कहती आज चीत्कार ।
ना सहना मुझे अब जुल्म अत्याचार ।।
अव्वल रहूँ पुरुष प्रधान समाज में ।
अब लेना है मुझे अपना अधिकार ।।

कर न पाऊँ यदि यंत्रणा का प्रतिकार ।
हाय ! मुझे होगा स्त्री जन्म पर धिक्कार।।
तोड़ दूँ समाज के सारे रीति नीति ।
हरदम ही मिले स्त्री को सम्मान सत्कार ।।

#स्वरचित
#धनेश्वरी देवांगन "धरा""
#रायगढ़ (छत्तीसगढ़)


दिनाँक -2/7/2019
विषय- अधिकार
मैं अपने देश में सुरक्षित रहूँ ,
यह मेरा अधिकार है ।
मुझे सारी सुख सुविधाएं मिलें,
यह मेरा अधिकार है ।
मैं किसी भी विषय में कुछ भी बोलूँ
यह मेरा अधिकार है ।
मैं कानून को मानूँ या न मानूँ ,
यह मेरा अधिकार है ।
प्रत्येक व्यक्ति केवल यही है जानता ,
कि यह मेरा अधिकार है ।
अरे अधिकारों की दुहाई देने वालों ,
कभी कर्तव्यों के बारे में भी सोचा है?
कर्तव्यों ने ही तो अधिकारों की फसल को सीचा है ।
बोया कुछ भी नहीं फसल की आस लगाए बैठे हो ?
क्यों अपने मन में रेगिस्तान में जलधार बहाए बैठे हो ?
किया कुछ नहीं सब कुछ पाने की आस लगाए बैठे हो ?
अरे कर्तव्य और अधिकार एक ही सिक्के के दो पहलू है ।
एक चलता है तो दूसरा आता है ।
एक कमाता है तो दूसरा खाता है ।
तो अधिकारों की ख्वाहिश रखने वालों 
कर्तव्यों के खाते को भरो तभी अधिकार आता है ।
स्वरचित
मोहिनी पांडेय

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"विधि/विधान"20नवम्बर 2019

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