Thursday, July 4

"अपराध/गुनाह " 04 जुलाई 2019

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ब्लॉग संख्या :-437

शीर्षकःअपराध/गुनाह
*
प्यासे को भी जल देने,
की मन में साध नहीं है।
'वांछा समुद्र पीने की'
पाले, क्या ब्याध नहीं है?

परहित में जीना - मरना,
नर का आदर्श रहा है।
श्रीराम , कृष्ण , गाँधी ने,
कितना कुछ नहीं सहा है?

निज आत्मा के दर्पण में,
सच्चा स्व-रूप पहचानो।
सब में अपने को देखो, 
अपने सा ,सबको मानो।

क्या पाप - पुण्य की बातें,
अपराध - बोध फिर कैसा?
मिल दूषित जल , गंगा में,
निर्मल गंगा - जल जैसा।

-डा.'शितिकंठ'


शीर्षक अपराध,गुनाह
विधा लघुकविता

04 जुलाई 2019,गुरुवार

स्व लाभ हित करनी करते
बन अपराधी जीवन जीते।
नित अपराध करे अनवरत
जन जीवन मे वे सब पिटते।

अपराधों की बड़ी सूची हैं
मानव पर दानव हैं भारी।
निज कर्तव्य सदा भूलते
सभी दुःखी उनसे नर नारी।

अपहरण चोरी करते नित
लोभी लंपट घूम रहे सब।
वकीलों का मिंले संरक्षण
न्याय मौन होजाता है तब।

संसद बैठी मौन क्यों है
कड़े कानून क्यों नहीं बनते?
सद्बुद्धि संस्कार गए कँहा
सुपथ पे नर क्यों नहीं चलते ?

स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।


विषय .. अपराध/गुनाह
***********************

ना राहत रूह में मेरे, जो तू मिलती नही हैं।
बेचैनी जिस्म में मेरे , जो तू मिलती नही है।
गुनाह ए इश्क है तुमसे, मेरे जज्बात सुन लो,
अजब सा दर्द है दिल में, जो तू मिलती नही है।
***
बना कर रख दिया मुझको, दिवाना लोग कहते है।
कोई ताना तो कोई दिल लगी, हर रोज करते है।
मै बेबस हूँ मुझे हर ओर , तू ही तू नजर आए,
करार ए नूर ना मिलता , जो तू मिलती नही है।
***
मै प्यासा हर जनम से हूँ, तुझे बस ढूँढता रहता।
तेरी गलियों जाकर मै तुझे ही, ढूँढने मै घुमता रहता।
मोहब्बत है इसे अपराध , ना कहना कभी मेरा,
लो मँजनू ''शेर'' भी अब तो, जो तू मिलती नही है॥
****

स्वरचित एंव मौलिक
शेर सिंह सर्राफ 
देवरिया उ0प्र0

बिषय अपराध,,, गुनाह,,
अपराध पे अपराध करता है आदमी
ईश्वर से भी न डरता है आदमी
बड़ा ही अद्भभुत निराला बर्तमान
गुनाहों के देवता पाते सम्मान
अपराध पर अपराध करते जाते
फिर भी प्रबुद्ध बहुमुखी शांतिप्रियता के धनी कहलाते
वाह रे कलयुग तेरी महिमा निराली
उल्लू बैठे हर डाली डाली
अपराधी चापलूस पहने हुए ताज
बेधड़क बेकौफ करते हैं राज
काश गुनाहगारों का खत्म हो समाज
फिर तो मेरे भारत में भी हो जाए राम राज
स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार


शीर्षक- अपराध/गुनाह 
#############

रचना

मेरे दिलबर, मेरे आशिक, मेरे सनम,
क्यूँ मेरे दिल में ही समाये जाते हो?

झुकी नजरों से मैं कैसे करूं इज़हार?
जो उठी नजर तो दिल ही लिये जाते हो।

ये कैसा गुन्हा हो गया नजरें उठाकर?
गुमास्ता जिगर को असीर किये जाते हो।

इज़्तरारे मुहब्बत मोहताजे दीवानगी, 
तुम तो गुन्हा पर गुन्हा किये जाते हो।

मुरौव़त सी मुहब्बत की ये कैसी तरतीब?
तसव्वुर में तुम ही मुश्कुराये जाते हो।

हो जाये महफ़ूज ये बेकसूर मुहब्बत,
परस्तिश में मुन्नवर चराग किये जाते हो।। 

स्वरचित
मीनू "रागिनी "
04/07/19

गुमास्ता- खोया हुआ।
जिगर-दिल।
असीर- कैदी, बंदी।
इज़्तरारे- विवशता भरी।
मोहताजे- आश्रित हुई।
मुरौव़त - भली।
तरतीब- सिलसिला।
तसव्वुर- कल्पना।
महफ़ूज- सुरक्षित ।
परिस्तिश- पूजा, प्रार्थना।
मुन्नवर- रोशन।।

बेगुनाहों को दुनिया में फँसाया जाता
इंसानियत को सरेआम जलाया जाता ।।

गुनाहगार सरेआम घूमें मस्ती मारें 
बेगुनाहों को जेल भिजवाया जाता ।।

गायें यहाँ मारी मारी फिरें बेचारीं 
स्वान को साबुन से नहलाया जाता ।।

गुनाहगार यहाँ कौन नही हैं मगर 
बड़ों का गुनाह यहाँ छुपाया जाता ।।

जीवित में यहाँ कोई नही पूछता है
मरने पर आँसुओं को बहाया जाता

भलमानषी की कोई कदर न यहाँ
यहाँ सर्पों को दूध पिलाया जाता ।।

इंसा के कई रूप होते हैं दुनिया में
कब कौन रूप में वह पाया जाता ।।

गुनाह की ओर कब कौन मुड़े 'शिवम'
पहले से अनुमान नही लगाया जाता ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 04/07/2019ो


"शीर्षक-गुनाह/अपराध"
कब तक मानव तू करें गुनाह
मैं प्रकृति, तुम्हारी माँ समान
पेड़,काट कर ,कर रहे उजाड़,
पानी धरा का घटता जाये,

क्यों मानव ,तू समझ न पाये।
पानी धरा का सुख रहा
ग्लेशियर भी अब पिघल रहा,
कर न सकोगे कोई उपाय।

गर हरियाली कम हो जाये
फिर कैसे अंबर धरती को सींचे
क्यों बैठो हो आँखें मींचे।
तेरी माँ कर रही पुकार,

उठो जागो मेरे लाल
मैं तुझे कर रही आगाह
तूफान, भूंकप क्यों बार बार
बिन पानी कैसे जिओगे?

मानो समझो,मेरी बात,
पेड़ लगाने का करो आगाज
मानव अब तू मत करो गुनाह,
हर मानव एक पेड़ लगाओ,

हरियाली फिर छा जायेगी
फिर माफ कर दूँगी,तेरा गुनाह
समय रहते चेतो आज
हे मानव तू मानो बात।
स्वरचित आरती-श्रीवास्तव।

विधाःः काव्यःः प्रार्थना

मात शारदे वंदन अभिनंदन,
हम नहीं लाऐ हैं उपहार।
बस तेरे दर्शन के अभिलाषी,
माँ तू हमपर कर उपकार।

ज्ञान दान हमें देती माता,
तुम उमा,रमा ,बृह्माणी।
सारा जग ये शीश नवाता,
माँ तुम्ही जग कल्याणी।

मै अपराधी शरण मांगता,
तुम केवल वरदानी माते।
नहीं चाहें हम सुख संपदा,
देंय ज्ञान शुभदानी माते।

अपराध नहीं कर पाऊँ कोई,
पुरूषार्थ परोपकार कर पाऊँ।
किस कारण यह जीवन पाया,
जय सत्य स्वीकार कर पाऊँ।

सबका भला हो मातेरानी,
यहां ज्ञान के दीप जला दें।
हम अपराधों से दूर रहें माँ,
इस मन में ज्योति जला दें।

स्वरचितःः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
जय जय श्री राम राम जी

2भा.#अपराध/गुनाह#प्रार्थना ः
4/7/2019/गुरुवार

विषय-अपराध/गुनाह
******************
आज एक गुनाह करते करते मैं बच गई
मेरी रूह ने चेताया और मैं सम्भल गई....

चली थी मैं मन की बात सुन मन की करने
मगर मेरे दिल की धड़कन सुनाने लगी थी एक धुन नई...

जल्द शोहरत दौलत पाने का ख्याल मन में आया था
उनकी बहशी नज़रें देख मेरी नीयत बदल गई....

सौ अपराध करके वो खुद को मसीहा कहते हैं
जैसे नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली
हज करने को गई...

**वंदना सोलंकी**©️स्वरचित

04-07-2019
अपराध
मन में कुसुमित है स्नेह-सुमन
कृष्णप्रिया की साध
सगरों उपवन में व्याप रहे
परिमल प्रेम अगाध
मुरली की धुन मन मोह रही
छटा मदिर सुखराय
पथ लखते पथराई अँखिया
आ जा छलिया नाथ

रीति नीति की शिक्षा देत हैं
लखते कहाँ विराध
प्रीत जल उर भरे अति गहरे
तैरन नहीं सुगाध
तेरी करनी तू ही जाने
मन मेरे विश्वास
नैनन में चाहत के डोरे 
यह कैसा अपराध ?
-©नवल किशोर सिंह
स्वरचित


गुनाह/अपराध"
1
अद्भुत रिश्ता
गुनाहो का देवता
बना फरिश्ता
2
भाग्य का मारा
बेगुनाह भी फंसा
मिली है सजा
3
तोड़ा उसूल
गुनाह भी कुबूल
हुई जो भूल
4
भूला संस्कृति
बालक अपराध
मन विकृति
5
हत्या मासूम
संगीन अपराध
विस्मित न्याय
6
दिल को सजा
नजरों का गुनाह
न्याय न मिला
7
नादान दिल
कठघरे में खड़ा
ईश्क गुनाह

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल।

विषय --अपराध/गुनाह
दिनांक--4-6-19
विधा --दोहे
1.
सब कुछ घर में हो भरा,सोना,
चांदी,नोट।
अगर न रोटी इक मिले, भरे अपराध खोट।।
2.
अपराधों के सरगना, ऊपर तक है पैठ।
जेब न उनकी गर भरी, तुरत जायँगे ऐंठ।।
3.
भुजबल,दलबल से सजे,
अपराधों के शेर।
जनता इक जुट हो अगर, हो जाएंगे ढेर।।
4.
अपराधों की सेज पर,सजते सुख के साज।
अपराधी ही बन रहे, इस युग की आवाज।।

******स्वरचित*******
प्रबोध मिश्र 'हितैषी'
बड़वानी(म.प्र.)451551


""*"*"*""अपराध""*"*"*""

कभी कभी सदकर्म भी हमारे,
अपयश का कारण बनते हैं
और कभी कुछ दुष्कर्मी तत्व
यशस्वी बनकर भी फिरते हैं,

धनबल और बाहुबल उनके,
अपराध भी सैकड़ों जन्मते हैं
जुएं हत्याए तस्करी के माध्यम
वो राजनीतिज्ञ जहां में बनते है,

विपुल सम्पदा बहुधा ही तो
अपराध की जननी होती है,
दुर्जनता अपनी पहुंच बनाने
सज्जनता भी जग मैं खोती है,

नीति निपुणता पूर्वजों से मिलती,
संस्कार मिलते मां और बाप से,
शिक्षा दीक्षा गुरु जनों से मिलती,
यही "दुर्गा" खुद कहते हैं आप से

दिनांक, 4, 7, 2019,

हाथ उठाकर पूछे एक बेवश ,
तकदीर मेरी मुझको बता,
मेरा गुनाह क्या है ।
जीवन मेरा क्यों इतना दुरूह,
हर इक दिन अपना क्यों ,
चुनौतियों भरा है ।
अभाव हैं क्यों इतने अधिक ,
जूझते जूझते ही क्यों मेरे ,
सपनों का महल ढहा है ।
होती बेकार क्यों अपनी मेहनत ,
अधूरी ही रहीं ख्वाहिशें मेरीं ,
पसीना भी बहा है ।
बस ईमान ही है अपनी अमानत,
न जाने फिर भी क्यों जमाना,
हमें दुत्कार रहा है ।
यहाँ पर कर रहा है जो गुनाह ,
क्यों शान से वो आखिर ,
दुनियाँ में जी रहा है ।
रहे हैं क्यों परेशान हम ही बेवश ,
खबर ही नहीं है उनको,
नहीं अपने गुनाह का पता है ।
कभी तो कुछ बोलें मेरे मालिक ,
दुनियाँ में क्यों अन्याय का,
ये सिलसिला चला है ।
हम पर भी जो हो जाये करम ,
चल जाये पता हमको भी,
धरती को क्यों जन्नत कहा है ।

स्वरचित, मीना शर्मा, मध्यप्रदेश,

दिनांक : 04.07.2019
आज का शीर्षक : 
अपराध / गुनाह
विधा : काव्य

गीत 

पलते हैं अपराध जहाँ पर ,
जीवन इक अभिशाप है !!

निर्धनता जहाँ द्वार खड़ी हो ,
अँधियारों के डेरे हो !
खुशियाँ जहाँ चिकोटी काटे ,
समय खड़ा मुँह फेरे हो !
पाप पुण्य में भेद न कोई ,
वहीं पले बस पाप है !!

जहाँ अशिक्षा पैर पसारे ,
ज्ञान पे बस पर्दा डाले !
जूझ रहें हो नित अभाव से ,
पड़े पैर में हों छाले !
राह न सूझे इधर उधर की ,
गुनाह छोड़ता छाप है !!

संगत से मिलते हैं सुख तो ,
संगत दुख का कारण है !
संगत ही अपराध कराये ,
संगत ही बस मारण है !
जहाँ जान की कीमत भूले ,
रोज विपद का जाप है !!

सुविधाओं का नशा चढ़े गर ,
पलते कभी गुनाह यहाँ !
सरमायेदारों की सेवा ,
पनपे हैं अपराध यहाँ !
कभी प्रवृति भी रंग लाती ,
सबब बने बस आप हैं !!

अपराधों का संरक्षण भी न ,
सचमुच है अपराध बड़ा !
मौत खड़ी है सम्मुख फिर भी ,
सिर पर है अपराध चढ़ा !
राजनीति भी रंग देती है ,
भुगते जनता श्राप है !!

सदाचरण को जाने समझे ,
नैतिकता का पाठ पढ़ें !
यहाँ अवनति गर्त है जानो ,
इसमें कभी गिरे न पड़ें !
संभल संभल कर डग भरना है ,
वरना तो संताप है !!

स्वरचित / रचियता : 
बृज व्यास
शाजापुर ( मध्यप्रदेश )

आज का शीर्षकः- अपराध / गुनाह

सुरसा के मुख की तरह बढ़ रहे हैं अपराध।
घट तो रहे वह नहीं लग नहीं रहा अवरोध।।

राजनैतिक संरक्षण में, कुछ करते अपराध ।
यह कर के डाला जाता विरोधियों पर दवाब।।

विऱोधी मतदाता को नहीं डालने नहीं देते मत।
कमज़ोर वर्ग से जबरन डलवाये जाते थे मत।।

अपराध करने वाले तो रखते हैं शक्ति विकट।
हर दल मे लगी होड़ है उनको देने की टिकट।।

देगे अपराधियों को अगर राजनैतिक संरक्षण।
मिलता रहेगा उनको अपराध करने का आरक्षण

डा0 सुरेन्द्र सिंह यादव
“व्यथित हृदय मुरादाबादी”
स्वरचित


गुरुवार

किस रास्ते पर आज बढ़ रहा है आदमी ,
हर क्षेत्र में गुनाह कर रहा है आदमी |
शिक्षा ,कला या खेल- सभी में है छल-कपट ,
अब मन्दिरों में जुर्म कर रहा है आदमी |
पैसा ही आज धर्म और पैसा ही मर्म है ,
पैसे पर अब ईमान धर रहा है आदमी |
रिश्तों का कोई मूल्य न दीखता समाज में,
अपनों के दिल में घाव कर रहा है आदमी |
वे सत्य, अहिंसा के सब आदर्श कहाँ है ,
क्यों अपनी संस्कृति से हट रहा है आदमी |

स्वरचित
डॉ ललिता सेंगर


Damyanti Damyanti 
पराध आज बड रहे सतत ।
किस पल क्या घटित हो पता नही ।
बडती स्वार्थहित कुछ भी कर सकते ।
अच्छे कर्म करने होते अपराध होतेहे बुरे भाव ।
मन को साधो वसतत अच्छे आचरण से.संलग्न रहे ।
अपराधो मैं निश्चित कमी होती ।
आँखे नाक कान मन बुद्धि सब जुडे सुदंर संस्कार से ।तो अपराध नही ।
आतंकवाद बनाया हमने बुराईयों को पनपाया हमने ।
तो आऐ बडे आत्मा की ओर सुने उसकी मन की ंही ।
स्वरचित ,,दमयन्ती मिश्रा ।


शीर्षक ः-अपराध/गुनाह।
क्या अपराध था २६/११का।
जो निरापराध को मार गये।
मेहन्दी लगे उन हाथों पर।
तुम चिर निद्रा मे सुलागये।
स्वयं २७हूरो की अभिलाषा मे।
जय श्रीराम को चुनते हो।
रमजान मे स्वयं रमाकर।
अस्लामिको के प्राण हरते होः
निरापराध पर प्रहार सदा से।
खुब हर रोज अपराध करते हो।
क्या हुरो का खजाना है वहां।
जो इतना गुनाह.करते हो।
रहम रहमान शब्द क़ी जरा।
एक बार सब्र से पढ लेते।
न इतने गुनाही बनते।
जो स्वयं मनन करतै।
कुछ आतातायी आकाओ ने।
आतंकवाद का पाठ पढाया।
बिना बिचार कर चल पड़े।
मानव की सूरत मे दानव जैसा कृत्य किऐ।

स्वरचित
राजेन्द्र कुमार अमरा


दिन गुरुवार

अपराध
🍁🍁🍁🍁

जीवन का काला पृष्ठ अपराध
भरा है इसमें केवल अवसाद
यह मरते दम तक पीडित करता
जीवन भर चलता है विवाद।

अपराध! यानि शान्ति का ह्वास
अपराध! यानि बुरी लतों का वास
अपराध! यानि जीवन का नाश
अपराध! यानि जेल में ग्रास।

यदि हो जाये पहले ही अपराध बोध
यदि थम जाये उस समय छाया क्रोध
तो समीकरण सुधर सकते हैं
शान्ति से भी रह सकते हैं।

स्वरचित
सुमित्रा नन्दन पन्त
जयपुर

विधा-हाईकु
विषय- गुनाह

गुनाह बोझ
कंधें कमजोर
आत्मा जर्जर

देख सच्चाई
प्रायस्चित के आँसू
धोते गुनाह

गुनाह कर्म
बेईमानी ड़गर
दुख मंजिल

दहेज लोभ
समाजिक गुनाह
बलि दुल्हन
***
स्वरचित-रेखा रविदत्त
4/7/19
वीरवार

र्थ की रेशमी चादर
ताने मनुष्य
भूल बैठा...
नैतिकता
मानवता
अखबार की सुर्खियाँ
अक्सर
बयां करती है
उसके कुकृत्य.....
अपनी छुद्र पिपासाओं
की पूर्ति के लिए....
जाने कितने अपराध
करता है ...
भौतिक सुखों के लिये
जाने कितने बार किया है
रिश्तों को कलंकित...
हजारों बार मानवता
शर्म से
सिर झुकाने को
मजबूर हो गयी..
गुनाह भी मजबूर हो गए
अपनी परिभाषा ...
बदलने के लिए
जब नन्ही बच्चियाँ
भी सुरक्षित नहीं...
कैसा है ये समाज....!!!
और फिर कटघरे में
खड़ी कर देता है स्त्री को
प्रश्न उठाते है उसके पहनावे पर
उसके चरित्र पर उँगली ...
एक के बाद एक अपराध
और चेहरे पर न मलिनता है
न अपराध बोध...
जाने किस धारा में बह रहा है
आधुनिकता का लबादा ओढ़ कर
हमारा समाज.....!!!!!

स्वरचित
गीता गुप्ता 'मन'


4/7/19
गुनाह 
हाइकु 
-----------
1)
प्रेम महान
सजा है बेतहाशा 
क्या ये गुनाह?
2)
प्यार गुनाह
बेवफाई की सजा 
वफा को मिले ।।
3)
जग ने हँसा 
गरीबी का गुनाह
खुदा ने किया।।
4)
रुठे अपने
सच जो कहा मैंने 
कैसा गुनाह।
----------------------------
क्षीरोद्र कुमार पुरोहित

विषय अपराध/गुनाह

1
झूठा दिखावा-
गुनाह की दुनिया
धवल वस्त्र
2
विधर्मी लोग
गुनाह दलदल-
कौन उबारे
3
छल प्रपंच
अपराध प्रबल-
ठगे से लोग
4

गुनाह बड़ा
कानून की उपेक्षा-
सविंधान में
5
सच रूठता-
होता बड़ा गुनाह
झूठ बोलना
6
आत्मा झंकृत-
करता प्रायश्चित
गुनाह भूल

मनीष श्री
स्वरचित
रायबरेली

विषय - गुनाह / अपराध 

नन्ही नन्ही अबोली बेटियों साथ 
नित हो रहे पैशाचिक अपराध हैं ।
चंड मुंड , महिषासुर, रक्तबीज का 
आज लगा धरा पर अंबार है ।
कहीं नगमा बनती नैना है 
कहीं नैना बनी निगार ।
प्रेम की पावन पवन में 
यह कैसी घुली विषधार है ।
मानव हो , इस धरा पर मानवता ही 
ईश्वर का अनुपम उपहार है ।
फिर फैल रहे क्यों घिनौने अपराध हैं ? 
मनु का मनु से कैसा विवाद है?
हर्ष की सरिता में क्यों घुला विषाद है?

(स्वरचित) सुलोचना सिंह 
भिलाई (दुर्ग )


लघु कविता

अपराध मेरा बस इतना है।
दिल से मैने तुमको चाहा है।।

अपने जैसा निश्छल समझा
और हँसकर गले लगाया है।
पर इस दुनिया के दोहरेपन ने
बस धोखे से मुझे नवाजा है।

अपराध मेरा बस इतना है।
इस दिल ने तुमको पूजा है।।

चाहे कष्ट सहे या दुखी रहा
आभास न किसी को हो पाया।
खुद कंटक पथ पर चला सदा
पर पुष्प बिछाए सबके पथ पर।

अपराध मेरा बस इतना है।
यह दिल मेरा बहुत ही भावुक है।।

सोचो जो सदा पतवार बना
उसके हिस्से बस सैवाल मिला।
जिसने सबको पूजा हर पल
क्यों कर बस उसे संताप मिला।

अपराध मेरा बस इतना है।
मेरा मन गंगा सा पावन है।।

कितनी भी अग्नि परीक्षा लो
तपकर कुंदन सा निखरुंगा।
कितना भी विषवमन करे कोई
मैं तो चन्दन सा महकूंगा।

अपराध मेरा बस इतना है।
मेरे दिल ने सभी को चाहा है।।
(अशोक राय वत्स)© स्वरचित
जयपुर

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"हिंदी/हिंदी दिवस "विविध विधा ,15 सितम्बर 2019

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