Sunday, July 7

"स्वतंत्र लेखन" 07जुलाई 2019

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ब्लॉग संख्या :-440

अकेला,
अपने ही बंधनों में 
बंधा रहा हूँ मैं,

दीवारें, 
मेरे भीतर की
मुझे रोक लेती है अक्सर
मुझे बंधन तोड़ लेने से,
इक दर्द, इक डर
मेरे मन के इर्द-गिर्द
फिरता रहता-घिरता रहता
बुलबुले सा उठता रहता,
मैं तोड़ नहीं सकता बंधन
फांद नहीं सकता
परंपराओं की दीवार
रिश्तों की दीवार।
जीवन के अंधेरों में
कभी रौशनी भी होती है
कोई सूरज दिखाई देता है
मन की खिड़कियों से
फिर मैं खोजता हूँ
कुछ अपने वाले रिश्ते
अपने वाले लोग,
बड़ी बेरुखी सी मिलती है
मेरी नजरों को,
मेरे बंधनों को तोड़ने
वही बुलबुले उठते हैं
फिर मिट जाते हैं
और मैं रह जाता हूँ
इस जीवन के आसरे में
नितांत अकेला
बस अकेला।

श्रीलाल जोशी "श्री"
तेजरासर, बीकानेर


विषय .. सहारा
***********************

सहारा किसका ढूँढ रहा है कि जब,
श्रीनाथ है नाव खेवईया।
रख उन पर विश्वास भवों से,
वो ही पार लगईया॥
सहारा किसका....
***
कर्म रथी बन धर्म पे ही चल,
मन में नाथ को अपने रख कर।
गर विश्वास प्रबल होगा तक,
वो ही है पार लगईया॥
सहारा किसका.....
***
विष में अमृत भर देता वो,
जनम मरण को तर देता वो।
मीरा का भगवान वही है,
वो ही नाग नथईया॥
सहारा किसका.....
***
वो ही श्रीहरि वो ही राघव,
वो ही कृष्ण कन्हैया।
शबरी की बेरी में वही है,
वो ही रास रचईया॥
सहारा किसका.....
***
शेर के अन्तर्मन में वो है,
इस जग के कण-कण में वो है।
क्यों मूरख बन भटक रहा है,
जब वो राह दिखईया॥
सहारा किसका....
***
स्वरचित एवं मौलिक
शेर सिंह सर्राफ 
देवरिया उ0प्र0

सपनों की महफ़िल

अपनों की महफ़िल हो,या

सपनों की हो महफ़िल
जर्जर सम्बन्धों के सायों में
उम्मीदों के दीप कहाँ रखूं?
घनघोर आँधियों में
दीप के प्रकाश की
उम्मीदें रखना वैसा ही है, जैसे
शवों में स्पन्दन की चाह!
आरोपित मिठे भ्रमों का
अहसास भी सूखे फूलों में
गंध ढुँढने जैसा है।
अपनों की महफ़िल हो या
सपनों की महफ़िल...
अड़ियल विश्वास और
ये रेंगते बुढ़े झूठ
रेशमी परिधानों में लिपटे
कुटिल मुस्कानों की मदिरा के साथ
लटकी गर्दनों को हिलाकर
स्वाभिमान को सजा देने की
स्वीकृति देते हैं।
और...
बेचारा बेबस अकेला सच
बेउम्मीद होकर
गुनाहों के कम्बल ओढ़
कारावास चला जाता है,जहाँ
असहाय,बदरंग लिबास को
बदल-बदल कर
अपराध बोध में नृत्य करता
छल भरी मनुहारों के अर्थ खोजता
ख़ामोशियों की खुरदरी 
जमीन पर सो जाता है।

✍🏻 गोविन्द सिंह चौहान,,,भागावड़

07 जुलाई 2019,रविवार

अशोक चक्र राष्ट्र चिन्ह 
राष्ट्र पक्षी स्वयम मोर हो।
आन बान शान तिरंगा
वह देश विश्व मे अग्रज हो।

जन गण मन हो राष्ट्र गान
वंदे मातरम राष्ट्र गीत हो।
सब सुखमय विश्व कामना
जग जन का प्रिय मीत हो।

अहिंसा परमोधर्म मार्ग हो
सत्यमेव जयते मूल मंत्र हो।
सबका साथ विकास नारा
परम प्रिय जँहा लोकतंत्र हो।

गङ्गा यमुना बहती झर झ्रर
अडिग हिमालय रक्षक हो।
बद्री द्वारिका पुरी रामेष्वर
स्वर्ग सदा हर जन समक्ष हो।

स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।


दिनांक-07.07.2019
क़ाफ़िया-आने
रदीफ़-लगे
वज़्न-122 122 122 12
ग़ज़ल
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मुझे मेरे हमदम मिटाने लगे ।
मेरा आशियाना जलाने लगे ।।
🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹
क़लम थक गई उनको लिखते ग़ज़ल,
तफ़क्कुर यु हीं गुनगुनाने लगे ।।
🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹
कभी भी न देखा मगर लोग सब
ग़लत उसको इन्सां बताने लगे ।।
🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹
सनम ने जो आशिक़ को फटकार दी,
वफ़ाओं के जमघट ठिकाने लगे ।।
🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹
लिखा ख़त किसी ने अजब यार को,
लिफ़ाफ़ों में दिल आने जाने लगे ।।
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स्वरचित-राम सेवक दौनेरिया "अ़क्स"
बाह-आगरा (उ०प्र०)

एक भयावह स्वप्न
🍁🍁🍁🍁🍁🍁

पानी
 आने के रस्ते, सब पाट दिये
बेतरतीब से उनमें, प्लौट काट दिये
नदी सूख गई, न रहा बिल्कुल पानी
बादल का बरसना भी ,रहा सब बेमानी।

सूखी नदी में शुरु हुआ, फिर नया खेल
ट्रक डम्पर शौवल वहाँ ,सारे ही दिये पेल
बजरी दोहन का धन्धा ,एकाएक पनप गया
पानी के स्थान पर ,चाँदी का सिक्का खनक गया।

क्या पानी की ज़गह पर, रेत चाहिये?
क्या फसल की ज़गह, बंजर खेत चाहिये?
क्या नदी में लहरों की, उमंग न हो?
क्या नदी में जीवन की, कोई तरंग न हो?

बडी़ सूझबूझ वाली, है ये हमारी प्रकृति
पर्वतों से ही वर्षा के ,पानी को मिलती है गति
फिर यही पानी, नदी और तालाब बनाता
धरती का ऐश्वर्य, चारों ओर बढा़ता।

हम पेड़ काटते, जल बहाव में करते बाधा
यहीं से कर लेते हैं,अपनी खुशियों को हम आधा
पानी धरती में जाये,तो ही पार पडे़गी
वरना एक दिन पानी की,बहुत ही बुरी मार पडे़गी।

पानी नदी और पर्वत बिन,होगा कैसे जाने विकास
आँवला ही न मिला तो,कहाँ से लाओगे फिर च्वयनप्राश
सब ओर दिखेगा,बस केवल नाश ही नाश
प्रदूषण का साम्राज्य होगा,बिखरेगी हर ओर,लाश ही लाश।

दिनांक, 7,7,2019.

**आँसू **

था बंद अरमानों को रखा

लेकिन आँसू बाहर आ गए ।

जो छुपायी थी व्यथा ,

वो दास्तां सब कह गए ।

कितना समझाया इन्हें था ,

लेकिन बागी ये तो हो गए। 

खोल कर आँखों के पट,

झट ये झांकने बाहर लगे।

इनको चाहिए ताजा हवा ,

यादों के संग ये ढ़ल गए ।

बस स्पर्श पाकर प्यार का ,

झट से आजाद पंछी हो गए ।

हँसता रहे इन पर जमाना,

बेपरवाह ये कितने हो गए ।

दे गये संदेशा एहसास का,

शामिल पराई पीर में हो गए ।

पूरा खाली खजाना पीर का, 

वो हमदर्द दिल के कर गए ।

स्वरचित, मीना शर्मा, मध्यप्रदेश,

 ।। चाट का ठेला ।।

कब पकड़ जाऊँ बेटा मैं अपनी खाट 

सोचता हूँ सिखा दूँ तुम्हे बनाना चाट ।।

गोलगप्पे बनाना तुम सीख ही गये हो 
और बचीं हैं डिश अब केवल आठ ।।

समोसा कचोड़ी भी कोई खास नही
पर बर्गर के अब दिख रहे हैं ठाट ।।

मैं बर्गर न जानूँ पर बर्गर किंग की 
दुकान जब से देखी नींद है उचाट ।।

सबके संग तो है ही अब ठेले वालों
संग भी सरासर अन्याय और घात ।।

सबके काम आज छिन रहे सिर्फ
बड़े ही कमायें जमायें अपनी धाँक ।।

पन्नी पहनके गोलगप्पे न पिलाने से
मुझे मिली थी एक दिन भयंकर लात ।।

ये बड़े भी बड़ी अकल को भिड़ायें 
छोटों को दिलायें हर जगह ही मात ।।

उनके पेट नही भर रहे छीनें रोजी
खैर जैसे भी प्रभु दे रहा दाल भात ।।

''शिवम्" समस्या छोटों को हुई है
छोटों की लगी अब हर जगह बाट ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"

🍑🌿🌻 गज़ल 🌻🌱🍑 ****************************
काफिया - आनी , रदीफ़ - लिखेंगे
****************************
🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒

दिलों की मुकम्मल कहानी लिखेंगे ।
हुई जो मुहब्बत वयानी लिखेंगे ।।

कभी जो मिले थे अकेले - अकेले ,
सभी से छिपाकर रवानी लिखेंगे ।

फिजा में घुले थे रसीले फसाने ,
जवाँ थी शरारत जवानी लिखेंगे ।

जहां में सुने हैं सुरीले तराने ,
वयाँ थी हकीक़त जुबानी लिखेंगे ।

लवों से वयाँ कर गये वो गमों को ,
मिलें काश जी भर रुहानी लिखेंगे ।

सभी को मुहब्बत कहाँ मिल सकी है ,
जहाँ की जहालत गुमानी लिखेंगे ।

पढी़ थी इबारत दिलों ने मिलन की ,
गढी़ जो इमारत निशानी लिखेंगे ।।

🌹🌿🌻🍑

🍓🌱***.... रवीन्द्र वर्मा, आगरा

बिषय ,,स्वतंत्र लेखन. 
जहाँ कोई सुनता नहीं
वहाँ दुखड़ा सुनाने से क्या फायदा
जहाँ से कोई खुश भी न हो
उस दर पे आने जाने से क्या फायदा
जिस महफिल में तेरी कदर ही नहीं
वहाँ गीत गुनगुनाने से क्या फायदा
मुस्कराहटों पे हो न कोई पहल
फिर खिलखिलाने से क्या फायदा
तेरी बातों का मन.में जज्बा न हो
दिल की लगी को बताने से क्या फायदा
जिस शहर तेरा नाम गुमनाम हो
वहाँ तेरे ठिकाने से क्या फायदा
जो कभी तेरे दिल के नजदीक न हो
उसको अपना बताने से क्या फायदा
कभी हाथ मदद के बढ़ाऐ न हों
फिर ऐसे जमाने से क्या फायदा
जिन शब्दों में कोई दुआ ही न हो
फिर ऐसे तराने से क्या फायदा
स्वरचित,, सुषमा,, ब्यौहार

विषय: स्वतंत्र लेखन एवं दृश्य श्रव्य 

माँ को बेटी का संदेश

मेरे हालात रंक से भी बदतर हो गये है,माँ
जहां तूने रानी बनाकर विदा किया था।
फटी चटाई पर सोती है तेरी रानी बिटिया,
उस पलंग पर नहीं जो दहेज में दिया था।

हारकर संदेश भेज रही हूँ , मेरी सार लेलो,
तन के साथ साथ धन के भी लोभी है माँ।
मेरा ससुराल किसी कैद खाने से कम नही,
कोई नहीं सुनता मेरी, वो भी मनमौजी है माँ।।

भाई को भी बताना तेरी बात सच हो गयी,
कहता था तुझे शराबी सईंया ढूंढ के दूंगा।।
बाबू जी को भी कहना घर भी गिरवी रख दे,
चेताया है दमाद ने, 'नहीं तो तलाक दे दूंगा'।।

माँ कोई काम नहीं आये तेरे वो सोने के कंगन, 
जिन्हें बेचकर तुने ढेर सारा दहेज दिया था।
और नही काम आयी विचोलिये को दी अंगूठी,
जिसने लड़के को सभ्य, सुशील करार दिया था।।

जल्दी से सार लेना कहीं ये सन्देश आखरी न हो,
मुझे घर से निकालने की साजिश चल रही है माँ।
कहीं जला ही न दे, कई बार गैस खुला रह चुका,
बस यूँ समझना कि अंतिम सांस चल रही है माँ। 

-:-स्वरचित-:-
सुखचैन मेहरा


नमन
कहाँ कहाँ पेड़ (हाइकु)
1)
पद्य मे पेड़ 
धरती पर एक
कवि लिखना।।
2)
पेड़ संगीत
धरती मंच पर
गायन गीत ।।
3)
पेड़ का पाठ 
गुरु शिष्य पढ़ाना
धरा में लिख ।।
4)
पेड़ की हवा
डॉक्टर जी बांटिये
मुफ्त की दवा 
5)
नेता जुबानी
कम भाषण पर
पौधे में पानी।।
6)
केक न काटो
जन्मदिवस पर 
पेड़ को छाँटो ।।

क्षीरोद्र कुमार पुरोहित

स्वने नहीं देती।
तंत्र सृजन
पंचमी शुक्ल पक्ष आषाढ़
मिट्टी ,चांदी का मुकुट...... किसान स्वर्ग का सम्राट

मिट्टी चांँदी का मुकुट पहने
अपने यौवन पर इठलाती है
मरघट की ठंडी बुझी राख
गुबार धुएं में सुलग जाती है
हां मिट्टी की वो अबोध मूरतें
गरूर क्यों इतना इतराती हैं
अंग-अंग में कसक भरी है
मृत होते इंदु की बेदर्दी सूरतें
मंद-मंद क्यों मुस्कुराती हैं
समय के ऐ काले सूरज
तुम मेरा शंखनाद सुनो
गवाह है अंबर के दहकते शोले
चीरते तिमिर का हुंकार सुनो
उपासना में बसी है वासना
कुपोषण का संस्कार सुनो
परछाई के ऐ काले सूरज
मेरा होता पल-पल तिरस्कार सुनो

स्वरचित.....
सत्य प्रकाश सिंह केसर विद्यापीठ इंटर कॉलेज इलाहाबाद

नमन भावों के मोती
स्वतन्त्र लेखन
अश्क अपनीआंखों में आने नहीं देती
मैं दुनिया को हंसी उड़ाने नहीं देती।

मेरे दर्द मेरे हमसफ़र हैं सुनी राह में
और किसी को साथ आ
औरों की बातों पर ध्यान देना छोड़ दिया,
वेवजह भावनां को आहत होने नहीं देती।

चांद सूरज की चाह मैंने कब की थी
मन के चिराग को बुझ जाने नहीं देती।

वक्त के साथ मौसम बदलते रहते हैं
मैं मौसमों को रौब जमाने नहीं देती।

चांदी सोने से मेरा कोई वास्ता नहीं 
मिट्टी की सोंधी खुशबू जाने नहीं देती।

स्वरचित- निलम अग्रवाल, खड़कपुर

ग़ज़ल
क़ाफ़िया-ता
2122 1212 22

लफ्ज़ को जब टटोलता हूं मैं,
तब कहीं जा के बोलता हूं मैं।

गम छुपाता रहा ज़माने से,
अश्क आंखों में रोकता हूं मैं।

मुश्किलें हैं तमाम राहों में,
ये तो मुद्दत से सोचता हूं मैं।

अक्स तेरा नज़र नहीं आता,
फिर दुआओं में खोजता हूं मैं।

तिश्नगी बुझ रही बुझाने से,
ओस मुट्ठी में रोकता हूं मैं।

बज़्म तेरी भरी रकीबों से,
अब नहीं खुद को थोपता हूं मैं।

चांद तारे भी तोड़ लाता था,
अब तो ख़ुद ही से बोलता हूं मैं।

शालिनी अग्रवाल
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित
7/7/2019

विधाःः अतुकांत,#व्यंग्यःः

देखिए देखते देखते ही 
गजब हो गया।
आज नेताओं रहनुमाओं ने
इंसान से हमें क्या क्या बना दिया
हम आदमी थे मगर हमें
राम ,रहमान,जेम्स एडमिन
तथा बल्देव सिख बना दिया।
बिशेषता ये कि इनमें से ही 
कुछ दलित, कुछ गलित ,सडित
और कुछ को फलित बना दिया।
हैं इंसान लेकिन हमें
स्वर्ण, रजत और कांस्य जैसी धातु
जातियों में बांट दिया।
किसी को आरक्षण
किसी को भक्षण संरक्षण तक नहीं
कोई इसके लिए भिक्षा मांग रहा है
कहीं बेरोजगार 
शासकीय नौकरी के लिए
जोर जोर से चिल्ला रहा है
परंतु हमें भी बडा 
अच्छा चस्का लगा है भ्रष्टाचार का
कोई दूसरा अचार नहीं भा रहा।
यहां केवल भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार
जोरों से पनप रहा।
दुराचार, अत्याचार, बलात्कार,व्यभिचार 
सभी अचार अच्छे लग रहे।
मगर शिष्टाचार, सदाचार, सद्व्यवहार
न जाने क्यों
बहुत ही बेस्वादु लग रहे।
चाय,पकौड़े बेचना ,कुछ करना
हमें और हमारे नेताओं
रहनुमाओं को सुहाता नहीं
इसे हमारी तौहीन समझते हैं
लेकिन चोरी ,चकारी,आगजनी ,अपहरण को
को हम और हमारे आका 
शायद सबसे अच्छा समझते हैं।
अलगाववादी हमें प्रशिक्षण देते हैं तो
वरिष्ठ नेता संरक्षण प्रोत्साहन।
बलात्कारी, आतंकवादी अच्छे कहाते हैं।
मारकाट करना ,गाली गलौच करना
हमारी नैतिकता और 
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में
समा गया है।
अब प्रजातंत्र नहीं 
भीडतंत्र हावी हो गया है।
राम तो कहीं रहीम मारा जा रहा है।
क्या ऐसा लोकतंत्र सराहा जा रहा है।
मानवीयता बिक रही है
संवेदनाऐं मर रही हैं
प्रतिदिन बेटियां चीत्कार कर
अपनी आबरु खो रही हैं।
नौजवान आतंकवादी बनाऐ जा रहे हैं
हम इसे मानवतावादी मानकर
उनपर अपने पदक लुटा रहे हैं। 

स्वरचितःः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

नजरें झुकाई तो नज़ाकत हो गयी।
उठाई नजरें तो शिकायत हो गयी।।

चार हुई नजरें तो कयामत हो गयी।
पलकें बंद की तो इबादत हो गयी।।

चले जो अकेले तो मुसीबत हो गयी।
हुऐ तुम साथ जब शरारत हो गयी।।

आया हाथों में हाथ रियायत हो गयी।
बंधे जन्मों के लिये शहादत हो गयी।।

स्वरचित
मीनू "रागिनी "
06/07/19

विषय-स्वतंत्र सृजन
ऑडियो/वीडियो पर प्रस्तुति
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""नवगीत""

भारत के आंगन में गूंजा,
अब जागृति का गान रे!
द्वार-द्वार ने किया सुबह की,
उषा का सम्मान रे!!

अंधियारी सी छा आई थी,
धरती पर विश्वास की,
बैठी रही निराशा अब तक,
लाली प्रगति प्रभात की!
उन्नति पथ पर हमने किये अब,
अपने पग गतिमान रे!
द्वार-द्वार ने किया ................

जीर्ण शरीर मे नवजीवन जागा, 
दुख की शैया छोड़कर!
महलों ने अब हाथ बढाये,
दूर दृष्टि से देखकर!!
निकल पड़े अब मस्ती में हम,
करने नव निर्माण रे!
द्वार-द्वार ने..........................

अनुशासन का राज मिला है,
मेरे भारत देश को,
त्याग विषमता को अब हमने,
संवारा पुनः परिवेश को!
उत्तर से दक्षिण तक जगा,
मानव में सम्मान रे!!
द्वार-द्वार ने किया.............

रचना-राजेन्द्र मेश्राम"नील"
चांगोटोला, बालाघाट

स्वतंत्र लेखन 
मापनी -122 122 122 122
समांत -आया ,पदांत - न होता 
***** 
सवालों में तुमको फसाया न होता ।
निग़ाहों से तुमको गिराया न होता

कहानी हमारी अधूरी न होती 
जमाने ने हमको सताया न होता ।

वफ़ा की उम्मीदें लगाये रहे हम
मुखौटे में मुख यूँ छिपाया न होता ।

बदलती रही ये हवायें !दिशायें
ठिकाना सफर में भुलाया न होता।

सितारों के आगे जहाँ था बसाना
'अनीता' दिया ये जलाया न होता ।

अनिता सुधीर

विषय-स्वतंत्र लेखन
***************
*ज़िंदगी एक किताब*

ज़िंदगी 
एक किताब
की तरह होती है
जब पुरानी होने लगती है
तो उसकी ज़िल्द फटने लगती है
पन्ने बिखरने लगते हैं
लिखावट धुंधली होने लगती है
तब प्यार के गोंद से उसे
चिपकाकर नया कलेवर पहना दीजिये
एक एक पन्ने को सहेज कर चिपका दीजिये

तब वो फिर से नई सी संवर जाएगी
जो पढ़ने में दोगुना मज़ा देगी

कुछ लोग सिर्फ प्रस्तावना या
उपसंहार भर पढ़ते हैं
और फिर ज़िंदगी की पूरी किताब का सार समझने का दम भरते हैं
उनके इस आधे अधूरे ज्ञान के
चक्कर में कितने अध्याय छूट जाते हैं

मज़ा तो तब है
जब आप हरेक अध्याय,
हरेक पन्ना ध्यान से पढ़िये
खुद को सवालों के कटघरे में
खड़ा करिए
अपने व्यक्तित्व को ज़िंदगी से
बड़ा करिए
प्रतिदिन एक नया सबक 
लीजिए..
.
जरूरी अध्याय,
खास वाकियों पर
इम्पोर्टेन्ट के 
बुकमार्क लगा दीजिये
हर दिन इससे 
एक नई सीख लीजिए
इसे पढ़िये,
गुनिये और आत्मसात कीजिए
गीता की तरह पवित्र ग्रंथ मान
इसे शिद्दत से पढ़ा 
कीजिये....

सिर्फ सजावट की वस्तु समझ
अलमारी के किसी कोने में न सजा देना
बल्कि धरोहर समझ दिल के करीब
सदा रखा करना
ज़िंदगी को जीने का भरपूर मज़ा लीजिए....

ज़िंदगी की किताब तब
ज्यादा दिन चलेगी
क्योंकि ये जिंदगी दोबारा न 
मिलेगी ।।

@वंदना सोलंकी©️स्वरचित

विधाः- कविता(हास्य सृजन)

शीर्षकः-प्रभु जी मुझे रहने का सिखाओ उत्तम तरीका।

नाम बिगाड़ना किसी का नहीं है कोई उत्तम सलीका।
यह तो है अपमान करने किसी का अजब ही तरीका।।

कुछ करे तो आता नहीं है कुछ को तारीफ का सलीका
आता तो उनको बस नाम बिगाड अपमान का तरीका।।

शरमाता लड़कियों से, नीरस कह करते खड़ी खटिया।
नहीं शरमाता तो कहते वह बहुत ही बड़ा है रसिया।।

दान करना मेरा भी नहीं है उनको किंचित है भाता।
मूरख लक्ष्मी का मान नहीं करता, बेददर्दी से लुटाता।।

करूं नहीं अगर मैं फजूलखर्च, खर्च में करूं किफायत।
कहते मुझको है पूरा मक्खी चूस तथा कंजूस निहायत।।

बोलता हूँ मैं बहुत अधिक कहते वह मुझको बकवादी।
कहते करा दो बन्द मुह इसका करवा के इसकी शादी।।

रहूं अगर चुप, कहते सूम बड़ा, होगी नहीं उसकी शादी।
बढ़ेगा नहीं वंश करेगा यह तो खान दान की बरबादी।।

पढ़ता हूँ लग्न से पूरी, चिड़ाते कह कर मुझको पढ़ाकू।
करूं अगर नाक में दम उनकी कहते है मुझे हलाकू।।

करूं सहयोग पत्नी से मैं, पुकारूं मीठी वाणी से नाम ।
पहनाते कैसे कैसे हार मुझको बताते जोरू का गुलाम।।

रहूं प्रेम से साथ पत्नी के तो भी होती मुसीबत बड़ी भाई।
नामर्द है पीटता नहीं बीबी को, संभालेगा कैसे यह लुगाई।।

कैसे बचूं इन दुष्टों से भगवन मैं जिनका है विचित्र चरित्र।
बांटते जो पत्नी पीटने वाले को, मर्द होने का प्रमाणपत्र।।

घूमें अगर चहूँ ओर महिलायें मेरे, करते व्यवहार अजीब।
मान गुरु चरण पखारें ,सिखाओ हमे ऐसी उत्तम तरकीब।।

चिढ़ाते रहते इस प्रकार जो, प्रभु उनसे पिंड मेरा छुटाओ।
रहूँ कैसे जो नही चिढ़ाया जाऊँ, ऐसे रहना मुझे सिखाओ।।

डा0 सुरेन्द्र सिंह यादव
“व्यथित हृदय मुरादावादी”
स्वरचित
 II त्रिवेणी II नमन भावों के मोती... 

१.

बारूद और माचिस की जरूरत नहीं....
बन्दूक गोली का भी क्या करना....

बस ज़ुबाँ के दो बोल काफी हैं ! 

२.
कम बोलना बहुत अच्छा है....
बोलने से पहले तोलो.....

नेता सब आजाद हैं !.....

३.
हम धर्म निरपेक्ष है नास्तिक नहीं....
सब धर्म इंसानियत सिखाते हैं....

कितने अंध-विश्वासी हैं हम !

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II 
०७.०७.२०१९

विषय - स्वतंत्र लेखन 

बीजांकुर

जलधर भार से नीचे झुके
चंचल हवा ने आंचल छेड़ा
अमृत बरसा तृषित धरा पर
माटी विभोर हो सरसी हुलसी
हृदय तल में जो बीज थे रखे
उन्हें प्यार से सींचा स्नेह दिया
क्षिती दरक ने लगी अति नेह से
एक बीजांकुर प्रस्फुटित हुवा 
सहमा सा रेख से बाहर झांके
खुश हो अंगड़ाई ली देखा उसने
चारों ओर उसके जैसे नन्हे नरम, 
कोमल नव पल्लव चहक रहे
धरित्री की गोद पर खेल रहे 
पवन झकोरों पर झूल रहे 
अंकुर में स्फुरणा जगी
अंतः प्रेरणा लिये बढता गया।

सच ही है धरा को चीर अंकुर
जब पाता उत्थान है
तभी मिलता मानव को
जीवन का वरदान 
सिंचता वारिध उस को
कितने प्यार से
पोषती वसुंधरा ,
करती उसका श्रृंगार है
एक अंकुर के खिलने से
खिलता संसार है।

स्वरचित

कुसुम कोठारी।

 प्रतियोगी छात्रों का दर्द
********************


सरकार कोई भी बन जाए,हम सबको भला कौन सुनता है
अपने हक के खातिर हमको,सड़को पर लड़ना पड़ता है। है नेता सभी एक जैसे , बस इनका अलग मुखौटा है।
इनके ही कारण हम सबको,घुट-घुट कर जीना पड़ता है।।

अवसाद ग्रस्त हो जाते हैं, मन में कुंठा भर आती है।
सरकार विफल साबित होकर,परिणाम न जब दे पाती है।
तब मजबूरन हक के खातिर, सड़कों पर आना पड़ता है।
सरकार विरोधी नारे भी, तब हमें लगाना पड़ता है।।

तब दमन हमारा सत्ता के, बल पर सरकारें करती हैं।
पीट लाठियों से सड़कों पर, हमको चोटिल करती हैं।
एक नौकरी की खातिर, हमें दर्द बहुत सहना पड़ता हैं।
हँसते है हम बाहर से, हमें अंदर से रोना पड़ता है।।

दर्द हमारे मन का क्यों, सरकारें देख नही पातीं हैं।
नीति नही स्पष्ट बनाती, निर्णय कर ना पातीं है।
एक साल बस और चाहिए, घर पर कहना पड़ता है।
जिंदा हम दिखते हैं सबको, पर घुट कर मरना पड़ता है।।
रविशंकर 'विद्यार्थी'

सादर नमन भावों के मोती 
दिनांक 07-07-19
रविवार
स्वतंत्र लेखन 
विषय - *उपकार* 
विधा - छंदमुक्त 

जिए स्वयं के लिए तो क्या जिए, 
परमार्थ ही तो जीवता आधार है l
स्वार्थ से न सिद्धि जीव को मिले, 
सत्कर्म दूसरों के हित उपकार है l

धरा भी धीरता से नित्य हित करे 
लुटाए त्याग, समर्पण,परमार्थ येl
मिसाल है नहीं कभी ये उफ़ करे, 
झेलती है बोझ, बिना स्वार्थ ये l

परोपकारी वृक्ष भी कुर्बान होते सदा, 
पल्लव, फल, फूल न्योछावर करे l
परहित में स्वमूल, तन, लुग्दी, तना, 
जीवन श्वास मनुज को अर्पण करे l

सभ्यता प्रदाता रही सरिता सदा, 
नीर खुद का ही परहित है धारती l
तृषा तृप्त करे युग युगान्तर से, 
कर्म पथ पर अविरल नहीं हारती l

भानु दिव्य रश्मियाँ तप्त होती सदा, 
उपकार नित्य ये उदय अस्त हो करेl 
अरुणिमा सुख दुख में भी प्रदीप्त है, 
पथ कर्मनिष्ठा सेआलोकित है करे l

चंद्र शीतल चन्द्रिका संग में सितारे, 
परहित कारने ही फ़लक पे हैं भरे l 
निशा के तम को विनष्ट करते सदा, 
स्निग्धता प्रसार,व्योम अंक से करे l

पर्वत विस्तार उन्नत भाल खड़े हैं, 
सरहद,प्रहरी,मुल्क रक्षक ये रहे l
हिम, आतप, आँधी, तम में नित, 
वनस्पति,जल निधि उदगम ये रहे l 

उपकारी इनसे होना सीखें हम, 
न्योछावर परहित स्वयं को करें l
परपीड़ा, परोपकार अपनाकर, 
जीवन में अलौकिक प्रकाश भरें l

स्वरचित मौलिक 
कुसुम लता पुन्डोरा 
आर के पुरम 
नई दिल्ली

"स्वतंत्र लेखन"
################
दिल को चूभती क्यों रही,खंजर नहीं हूँ मैं।
तूफां उड़ा ले गए, वो रेत बवंडर नहीं हूँ मैं।।

वास्ता जमीं से है, मिट्टी की बनी हूँ मै।
नजरें है झुकी, मगर अंबर नहीं हूँ मैं।।

अश्कों का दरिया हूँ, समंदर भी सही।
आँखों से गम बहता जाए निर्झर नहीं हूँ मैं।।

इंसा हूँ भावनाएँ है मन में भरी हुई।
तूफां को रोक सकूँ,वो ईश्वर नहीं हूँ मैं।।

इजहार प्यार का कभी तो करते सनम।
इतना बताते क्या मन की सुंदर नहीं हूँ मैं।।

इतबार करके देख लिए होते कभी तो।
दिलबर हूँ मगर सितमगर नहीं हूँ मैं।।

आओगे जब कभी ढूँढते हुए मुझे।
चंदा की चाँदनी से कमतर नहीं हूँ मैं।।

"पूर्णिमा"जो मेरा चाँद मुझे कहता रहा।
जुगनू हूँ इसलिए फलक पर नहीं हूँ मैं।।

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल।।

नमन भावों के मोती 
विषय- स्वतंत्र सृजन - 
असम्भव सम्भव होगा
07/07/19
रविवार 
छंद मुक्त कविता 

आज असम्भव सम्भव होगा
यदि जन-जन का एक रंग होगा 
जाति- धर्म का भेद न होगा 
राष्ट्रभाव ही लक्ष्य रहेगा 
प्रगति-मार्ग पर साथ चलेंगे 
हर मुश्किल को साथ सहेंगे
नामुमकिन को मुमकिन करके
हम असीम आकाश छुएंगे 
सीमाएँ सब रहें सुरक्षित 
ऐसे पहरेदार बनेंगे 
शत्रु कभी न घात लगाए
ऐसे सावधान सब होंगे 
भ्रष्टाचार का अंत निकट है
अब बन रहा विधान विकट है 
जयचंदों पर भी संकट है 
उनके जीवन में कंटक है 
सूर्य सत्य का अब चमकेगा
न असत्य भू पर धमकेगा 
सभी बनेंगे सत् आचारी
कोई न होगा अत्याचारी 
जन परहित का काम करेंगे 
सुख-दुख में समभाव रखेंगे 
जीवन सुखमय हो जाएगा 
कहीं न दुख गहरा पाएगा 
बच्चे, वृद्ध और बालाएँ 
हो उपलब्ध उन्हें सुविधाएँ 
हरी-भरी यह प्रकृति रहेगी
नदियों में शुचि धार बहेगी
भारत एक मिसाल बनेगा 
विश्व- पटल पर नाम करेगा 

स्वरचित 
डॉ ललिता सेंगर

वीर (आल्हा) छंद आधारित लघु रचना
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अरी सखी
------------

नयनों से क्यों आँसू छलके,
सखी बताओ क्या है पीर।
किस जुल्मी ने तुम्हें सताया,
उसका सीना दूं मैं चीर।।
रोने से कब बात बनी है,
सखी रहो मत तुम गम्भीर।
कोई खड़ग दुधारी हो तो,
हमको बनना है शमशीर।।
~~~~~~~~~~
मुरारि पचलंगिया

नमन भावों के मोती । सभी आदरणीय प्रबुद्ध गुणी जन को सादर नमन वंदन करती हूँ। आज के स्वतंत्र विषयांतर्गत मेरी भी एक रचना जो सत्य घटना पर आधारित है, आपलोगों के समीक्षार्थ यहाँ पोस्ट कर रही हूँ--

**वह वृद्धा अम्मा**
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जीवन के उस मोड़ पर 
पहुँच चुकी थी वो वृद्धा,
खुद की देखभाल करने में असमर्थ, 
फिर भी न जाने क्यों वह
रोज़ दिखती मुझे 
सघन आम्र वन के बीचोंबीच
से गुजरने वाली पगडंडी 
के पास एक घनी छायादार 
आम्र वृक्ष तले बैठी रहती थी,
कुछ गुण-धुन में लगी रहती,
तो कभी पास से गुजरने वाले 
राहगीरों को 
एकटक नज़रों से निहारा करती,
उसकी कातर निगाहें,
दिल को अंदर तक बेध जाती थी, 
मैं जब भी उस पगडंडी से होकर गुजरती
बरबश ही मेरी निगाहें 
उस वृद्धा पर जाकर टिक जाती
जब भी हमारी नजरें मिलती 
लगता वो कुछ कहना चाहती है 
पर समय की विवशता 
मेरी भावनाओं पर अंकुश लगा देता
मैं चाहकर भी उसकी बात नहीं सुन पाती।
एक दिन उसकी करुण आवाज 
"रूको बेटी , एक बात बता दो फिर जाना"
ने मेरे पाँव बाँध दिए और मैं रूक गयी
फिर पूछा "बताओ अम्मा क्या बात, 
और तुम रोज यहाँ
सबेरे से शाम तक क्यों बैठी रहती"
उसके चेहरे पर शुकून भरी मुस्कान देख 
मेरा मन उसकी बात जानने को उत्सुक हुआ
फिर अम्मा ने कहा, 
बेटी, बहुत साल पहले मेरा बेटा 
"देश सेवा के लिए जा रहा हूँ , 
अगर लौटा तो आपको ले चलूँगा "
कह कर गया था पर बहुत साल बीत गया
आया नहीं अभी तक 
मैं यहाँ बैठ कर रोज़ 
उसकी ही राह देखती हूँ , 
कभी तो वह आएगा, 
बताओ बेटी कभी तुम मेरे बेटे से मिली हो?
मुझे पिछले साल पहले कि
वह घटना याद आ गई 
सीमा पर हुए आतंकी हमले में 
वृद्धा का बेटा भी शहीद हो गया था 
मैं भयभीत हो गई 
क्या अम्मा को बेटे के मौत की बात नहीं पता
मैं अपनी भावनाओं पर काबू रखते हुए बोली, 
हाँ अम्मा, आपके बेटे से मेरी मुलाकात है
उसने मुझसे कहा था
गाँव जाना तो मेरी माँ से कहना 
उसका बेटा भारत माँ के काम आ गया 
अब वह चाहकर भी उसके पास नहीं आ सकता 
इतना सुनते ही अम्मा धरती पर लेट गई 
मैं अम्मा को उठाना चाही , 
उठो अम्मा उठो , उठो अम्मा उठो 
पर वह न उठी , उसके नब्ज को देखा तो 
मेरा दिल बहुत घबरा गया 
क्योंकि अम्मा परलोक सिधार चुकी थी।
-- रेणु रंजन



शीर्षक-बंधन

भ्रष्टाचार भ्रष्टाचार सब पुकारें
उपचार करे न कोय
मिला नहीं है जब तक उनको
बन बैठे हैं बेचारे
तुम्हीं बताओ आज हमें
कौन हैं अछूते
रिश्वत लेते जो पकड़ा जाए
रिश्वत देकर ही वह छूटे
तुम्हीं बताओ आज हमें
कौन से बंधन टूटे ।

स्वच्छ वायु चाहिए सबको
पेड़ लगाए न कोय
खाँसी, टीबी, दमा, कैंसर
तोड़े जीवन के बंधन ।
प्यार प्रेम गहरा था
बैठा करते इकट्ठे
आज किसी को वक्त नहीं
कौन सी रेलगाड़ी है छूटे ।
तुम्ही बताओ आज हमें
कैसे ये बंधन टूटे ।

पानी पानी सब पुकारे
सदुपयोग करे न कोय
त्राहि त्राहि खूब मचेगी
पानी कहाँ से लाएंगे
पेट्रोल पंप की तर्ज पर
पानी पंप देख पाएंगे
तुम्ही बताओ आज हमें
कौन से बन्धन टूटे ।

स्वरचित
अशोक कुमार ढोरिया
मुबारिकपुर(झज्जर)
हरियाणा

छंदमुक्त नवगीत

मेरा बचपन साफ सलोना,
गुड्डा गुड़िया मेरा खिलौना ,
दुनिया की कोई समझ ना मुझको ,
रौंद दिया हैवानो ने ,
नोंच नोंच कर खा लिया मुझको ,
धरती के इंसानों ने ।
मैं तो मानूं हर इंसान में ,
भगवन स्वंय समाया है ।
हर किसी को अपना मानूं ,
कोई न यहां पराया है ।
पर मेरे विश्वास को तोड़ा ,
हवस के शैतानों ने ,
नोंच नोंच कर खा लिया मुझको ,
धरती के इंसानों ने ।
नोंच ---------------------------------,
---------- इंसानों ने ।
काम के मद में अंधा इंसान ,
हद से आज गुजर रहा ।
पाप पुण्य को भूल कत्ल वो ,
अपनों का ही कर रहा ।
रिश्तों की मर्यादा तोड़ी ,
अपनों और बेगानों ने ,
नोंच नोंच कर खा लिया मुझको ,
धरती के इंसानों ने ।
नोंच --------------------------------- ,
----------------- इंसानों ने ।
मानवता अब शर्मसार है ,
शर्म नहीं करता इंसान ।
नन्ही कलियों को रौंदते ,
मुक्ति का फिर देते नाम ।
कुचले बचपन को भी मुक्ति ,
क्यूँ कहा विद्वानों ने ,
नोंच नोंच कर खा लिया मुझको ,
धरती के इंसानों ने ।
नोंच ------------------------------- ,
---------------इंसानों ने ।
मैं तो मर गई पर मैं पूछूं ,
कब तक सहते जाओगे ।
अच्छा हुआ जो मुक्ति मिल गई,
कब तक कहते जाओगे ।
क्यूँ न सूली पर लटकाया,
तथाकथित भगवानों ने,
नोंच नोंच कर खा लिया मुझको ,
धरती के इंसानों ने ।
नोंच ------------------------------- ,
---------------इंसानों ने ।
डर और भय की यह तलवारें ,
आखिर कब तक लटकेंगी ।
मेरे जैसी कितनी कलियाँ ,
कब तक यूं ही भटकेंगी ।
रूह तेरी क्यूँ ना झकझोरी,
नित नित के अफसानों ने ,
नोंच नोंच कर खा लिया मुझको ,
धरती के इंसानों ने ।
नोंच ------------------------------- ,
---------------इंसानों ने ।

स्वरचित : राम किशोर , पंजाब ।

विषय- स्वतंत्र लेखन
_________________
प्रदूषण बना दानव
लील रहा है शुद्ध हवा
घोल रहा उसमें जहर
नदियों की निर्मल धारा छीन
धकेल रहा दलदल की ओर
प्रदूषण के भय से हो रहा
पर्यावरण असंतुलित 
ओजोन परत छलनी हो रही
बदले हैं मौसम ने मिज़ाज
प्रदूषण के दानव से अब
काँप उठी है धरा 
ग्लेशियर पिघलते हुए
अपना अस्तित्व खो रहे
कट रहे हैं जंगल
पक्षी बनते जा रहे इतिहास
प्रदूषण के दानव से
कब तक बचने का करोगे प्रयास
धकेल रहे हैं हम खुद
खुद इस महादानव की और
इसकी गिरफ्त में आकर
भूलें सब दुनियादारी
सुख-सुविधाओं के नाम पर
खुद बुलाई अपनी बरबादी
अब शायद ही कभी
आएगा शुद्ध हवाओं का दौर
और कभी पहले जैसी सुहानी भोर
***अनुराधा चौहान***©स्वरचित

।। इंतजार ।।

अतिथि के इंतजार में 
छुट्टी ली है आज हमने,
सोचा खातिरदारी का
मौका मिलेगा आज हमें,
किन्तु अब तक हुआ नही
आगमन उनका।

मन मे नई-नई योजनायें
उमड़-घुमड़ कर रही,
सुबह से शाम हो गयी
आने के इंतज़ार में,
किन्तु अब तक हुआ नही
आगमन उनका।

आशाये गर कर रही
शाम, संध्या, रात 
होने को है आयी,
इंतज़ार हो अब कितना
फिर भी डटा रहा, किन्तु
नही हुआ आगमन उनका।

भाविक भावी

दिनांक/७/७/२०१९
"स्वतंत्र लेखन
"शिष्टाचार"
कुछ दिन पहले जब मैं अपनी परिचित महिला से मिलने उनके घर गई,तो वे काफी गुस्से से भरी बैठी थी। हालांकि वे बहुत ही भली व मेहनती हैं। उनके पति का हाल ही में एक्सीडेंट हुआ था।
अतः उनके घर मेहमानों का आना जाना बहुत बढ़ गया था मेरे हालचाल पूछने पर वे गुस्से व दुख से बोली"तंग आ गई हूं मैं ऐसे शिष्टाचार से।
मैंने पूरी बात जाननी चाही,तो बताया कि पति को देखने कम से कम एक या दो परिवार रोज ही आ रहे है।आते हैं हाल चाल जानने, लेकिन भोजन तक बैठे ही रहते हैं,पति की बीमारी की वजह से राशन,सब्जी-भाजी की व्यवस्था मुझे ही करनी पड़ती है।हफ्तेभर की राशन पानी दो दिन में ही चट कर जाते हैं। पति के बीमारी की वजह से बच्चों के स्कूल, ट्यूशन की जिम्मेदारी भी मेरे ऊपर आ पड़ी है। फिर मेहमानों के जाने के बाद अस्त व्यस्त घर को ठीक करते -करते मैं बीमार सी होने लगी हूं। ऐसे में न बीमार पति की सेवा कर पा रही हूं,और न बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान दें पा रही हूं।
उसकी बातें सुनकर मैं सोच में पड़ गई,क्या हमारा शिष्टाचार सिर्फ बीमार को देखने भर को है या आगे बढ़ कर उनकी मदद भी करनी चाहिए।
स्वरचित-आरती-श्रीवास्तव।


विषय :- स्वतंत्र लेखन

है वह किरिट हिंद का..
आवरण लिया हिम का..
बनकर प्रहरी रक्षा करे..
है बुलंद परचम वह हिंद का..
गंगाजल जिसके चरण पखारे..
चट्टान सा अडिग खड़ा वह राष्ट्र द्वारे..
सुगंध भरती केसर की क्यारी..
हरसिंगार जिसका करे श्रृंगार..
मंत्रमुग्ध करता वातावरण यहाँ का..
रहती सदा यहाँ बसंत सी बहार...
ऋषि-मुनियों की यह तपोभूमि..
रिद्धि-सिद्धि समृद्धि का उद्भव यहाँ से..
है यह औषधीय धरोहर हिंद की...
संस्कृतियों का होता प्रादुर्भाव यहाँ से..
गोद में जिसके विराजे..
केदारनाथ व बद्री विशाल..
अद्भुत व रमणीक है यह..
हिमालय की पर्वतमाला विशाल..

स्वरचित :- मुकेश राठौड़


सभी सुधीजनों के समक्ष प्रस्तुत।
विषय -------- प्रेमभाव, , मैत्री भाव
🙏🙏🙏🙏🙏🙏
1
है
कहाँ 
प्रभाव 
प्रेम भाव 
मन मुटाव 
बढ़ता दुराव 
खटास भरे भाव 
2
ये 
जग 
अभाव 
मैत्री भाव 
असत्य रिश्ते 
नहीं हैं फ़रिश्ते 
प्यार को तरसते 
कुसुम पंत उत्साही 
देहरादून

दिनांक -7/7/2019 
विषय - स्वतंत्र

छूकर मेरी ज़ुल्फ़ों को 
एक झोंका हवा का आया
कोई राग ग़ुनगुनाने 
मेरे चेहरे पर नूर छाया !
🌸🌸🌸🌸🌸🌸
कुछ पल चुरा के ख़ुशियाँ 
दामन में आज भर ली
होकर सवार तरणी 
मैं मौजों में आज मिल ली !
🌸🌸🌸🌸🌸🌸
छूकर मेरी ज़ुल्फ़ों को ...
एक झोंका हवा का आया
कोई राग गुनगुनाने
मेरे चेहरे पर नूर छाया ।
🌸🌸🌸🌸🌸🌸
जल ही जल है समाया 
मन उमड़ घुमड कर आया
लहरों की ये रवानी 
बनी दिल की एक कहानी।
🌸🌸🌸🌸🌸🌸
छूकर मेरी ज़ुल्फ़ों को ....
एक झोंका हवा का आया
कोई राग गुनगुनाने
मेरे चेहरे पर नूर छाया ।
🌸🌸🌸🌸🌸🌸
मैं उड़ चली हूँ नभ में 
हमसाया सा कौन आया
ना बाँधों बंधनों में 
विराग मुझको भाया !
🌸🌸🌸🌸🌸🌸
छूकर मेरी ज़ुल्फ़ों को ...
एक झोंका हवा का आया
कोई राग गुनगुनाने
मेरे चेहरे पर नूर छाया !
🌸🌸🌸🌸🌸🌸
ना रूठी मैं किसी से 
फिर इल्ज़ाम क्यों लगाया
मन ने मन को साथी 
सजदे से उसके पाया ।
🌸🌸🌸🌸🌸🌸
छूकर मेरी ज़ुल्फ़ों को ....
एक झोंका हवा का आया
कोई राग गुनगुनाने
मेरे चेहरे पर नूर छाया !

✍🏻 संतोष कुमारी ‘ संप्रीति ‘
मौलिक एवं स्वरचित

जय माँ शारदा 
...नमन सभी को...🌷🙏
स्वतंत्र सृजन अंतर्गत मेरी की प्रस्तुति सादर....
----------------------------------------------------
कदम कदम पर यहाँ दिखावा,और छलावा जारी है |
क्या से क्या होते जा रहे,ये कैसी लाचारी है ||

मानवीय मूल्यों की खातिर, कितनों ने बलिदान दिया |
अपना सर्वस्व समर्पण कर ,भारत को गौरव गान दिया ||
अनगिन गौरव गाथाओं की,स्मृति आज बिसारी है|
कदम.........जारी है ||

रोता है आज यहां बचपन ,थकित जवानी दिखती है |
वृद्धावस्था है बोझ बनी ,बस गम की निशानी दिखती है ||
स्वार्थ पूर्ति के लिए , रिश्तों में भी गद्दारी है|
कदम.... जारी है ||

नारी शक्ति का मान और ,सम्मान जहां की प्रथा बनी |
मानवता भी है शर्मसार, क्या आज वहां की व्यथा बनी ||
पुण्य पुरातन धर्मधरा पर ,चीत्कार क्या भारी है |
कदम....जारी है ||

सर्व धर्म समभाव यहां,दुनिया के लिए मिसाल बना |
आज स्वार्थ का चढ़ा रंग,खुद अपने लिए सवाल बना ||
आने वाले कल को क्या.? सौंपने की तैयारी है |
कदम...जारी है ||

आज सियासत के ढंग ने,सारे पैमाने बदल दिये |
इस वोट बैंक के चक्कर ने,सब रंग सुहाने बदल दिये ||
अपना उल्लू सीधा करने ,होती बेहद मक्कारी है|
कदम.... जारी है.

रोक सकें तो रोकें आओ, हावी होती पशुता को |
नेह और अपनेपन के ,रंग से रंगें मां वसुधा को ||
कर्तव्य निभाने की "सरस" ,अपनी भी जिम्मेदारी है.
कदम......जारी है
---------------------------------------

प्रमोद गोल्हानी सरस
कहानी-सिवनी म. प्र.
#स्वरचित

नमन !"भावों के मोती"🙏
07/07/2018
ंद हाइकु -"सँध्या/साँझ"पर 
(1)
जीवन "सँध्या" 
यादों के क्षितिज पे 
डूबता तन 
(2)
मुस्काये चाँद 
वसुंधरा की गोद 
खेलती "साँझ" 
(3)
जगते दीप 
"साँझ" की देहरी पे 
सो गया दिन 
(4)
"साँझ" की छटा 
निशा के आग़ोश में 
रवि सिमटा 
(5)
वक़्त प्रहरी 
निशा के आने तक 
"साँझ" ठहरी 
(6)
रवि को विदा 
साँझ रही अकेली 
पंछी भी जुदा 
(7)
धरा की ओट 
रवि की करवट 
साँझ प्रकट 

स्वरचित 
ऋतुराज दवे

विषय-- जीवन 
विधा---मुक्त 
----------------------
आ गई साँझ जिंदगी की 
कुछ साँसे बाकी है
अब तो आ जाओ कि
तुम्हारा इंतज़ार बाकी है

मौसम कितने आए कितने चले गए 
तुम्हारे प्यार का मौसम आना बाकी है 

दुःख की दस्तक ,सुख की आहट आती रही
तेरी ही एक झलक का आना बाकी है

कलियों पे शबाब का नशा छा गया 
बस कलियों पे भँवरों का आना बाकी है

धधक रही है जमीं विरह की ज्वाल से
झूमकर आसमां का बरसना बाकी है ।

डा. नीलम, अजमेर


गीत--जो न बात होती है
********************
कई दिन तक तुम्हारी,
जब न हमसे बात होती...
हाँ,कई दिन रात होती...
मेरे नैनों की निर्झरणी,
से फिर बरसात होती है....
बहुत बरसात होती है
हाँ, कई दिन रात होती है.....

कभी बैठे अकेले जब,
मैं तुमसे बात करता हूँ,
हाँ,तुमको याद करता हूँ,
तुम्हारी बात करता हूँ,
मैं रोना मुस्कुराना फिर,
दोनो साथ करता हूँ....
हाँ, दोनो साथ करता हूँ...

कोई पूछे अगर मुझसे,
की, दिल में कौन रहता है?,
सदा जो मौन रहता है,
नही कहता पलट कर कुछ,
की, इतना कौन सहता है?,
भला ये कौन सहता है?,

भला वो दर्द क्या जाने?
जो,न प्रियतम से विछड़ा हो,
की,जिसका दिल न उजड़ा,
न, जिसका भाग विगड़ा हो...
अमावस से घनी काली-
अंधेरी रात होती है,
हृदय पर घात होती है,
अजब हालात होती है...
मेरे नैनों की निर्झरणी,
से,फिर बरसात होती है...
बहुत बरसात होती है...
हाँ कई दिन रात होती है....

छुपाये पीर अंतस में,
बड़ा बेबस समंदर है,
उससे और बेबस तो,
हमारे दिल का मंजर है...
उधर लहरों में बेचैनी,
इधर हलचल सी अंदर है..

मेरे दिलवर कभी तो तुम,
सराहो आह को मेरी,
सम्भालो बाँह को मेरी,
सँवारो राह को मेरी,
समझ लो चाह को मेरी,
तेरा मिलना ही जीवन में-
हंसीं सौगात होती है...
खुशी की बात होती है...
जो मुझसे दूर होते हो,
बुरी हालात होती है...
मेरे नैनों की निर्झरणी,
से,फिर बरसात होती है..
बहुत बरसात होती है...
हाँ कई दिन रात होती.....

मैं अक्सर सोचता हूँ कि,
गगन के चाँद-तारों को,
अम्बर के सितारों को,
सजा देता तुम्हारे माँग में,
जो तुम मेरे होते....
धूप की चादर बिछा देता,
घास की नर्म विस्तर पर,
मैं रख देता स्वप्न-सुन्दर-सजीले,
तेरी पलकों पर....
पर हाँ ये सच है की,
तू नही यादें तुम्हारी हैं,
कई टूटे से सपने हैं,
जो पलकों पे भारी हैं..
तुम्हारी याद से दिल में,
अजब हालात होती है,
बड़ी उत्पात होती है,
हाँ, उल्कापात होती है...
मेरे नैनों की निर्झरणी,
से फिर बरसात होती है...
बहुत बरसात होती है...
हाँ कई दिन रात होती.....

कई दिन तक तुम्हारी,
जब न हमसे बात होती...
हाँ,कई दिन रात होती...
मेरे नैनों की निर्झरणी,
से फिर बरसात होती है....
बहुत बरसात होती है
हाँ, कई दिन रात होती है.....

© राकेश पाण्डेय

*जीवन -चक्र *

इस संसृति में आना है --पुनः
जाने के बाद
यह कालचक्र चलता रहता है
अनवरत...
किस रूप में --किस जीव में
जन्म होगा पुनः
पता नहीं....
आज जन्म हुआ -जीव का
मानव रूप में...
धीरे -धीरे...
युवावस्था से वृद्धावस्था तक
सफर तय किया --फिर
चला गया --काया छोड़कर
एक नई काया की तलाश में
अनंत यात्रा पर...
जिसे परलोक कहते हैं
हाजिरी लगाने ---को
लौटकर...
किसी, नई उदरस्थ काया में
नये रूप में आने को
अगले चक्र के अंत तक ||

शशि कांत श्रीवास्तव
डेराबस्सी मोहाली -पंजाब
©स्वरचित रचना

दिन :- रविवार
दिनांक :- 07/07/2019
विषय :- स्वतंत्र लेखन 

टपकी है बूंदे, 
बरसात की ऋत आई, 
तन हुआ तर-बतर, 
मन पर विभोरता छाई... 
झूम के आये बादल, 
मन‌भटकता किस ओर,
प्रकृति ने भी किया स्वागत,
नाचता जंगल में मोर.. 
सुना है मेघ, 
हो जाते हैं पागल, 
झमाझम बरसते हैं,
काले काले बादल.. 
न जाने ये किस पल, 
बूँदें हो रही है अब मुखर, 
बढ़ने लगी गड़गड़ाहट,
प्यास दिलों की हुई तर.. 
गर्जन करने लगी तड़ित, 
धुल कर कालिमा व्योम की, 
बूँद बनकर आयी धरा पर,
उमंग ऋतु सावन की..

शोभा गोयल
स्वरचित
मेरे लफ़्ज़ों से....
@© सर्वाधिक सुरक्षित

पर्यावरण 
संरक्षित करना
जन कर्तव्य।। 1
जीवनदात्री 
नदियाँ प्रदूषित 
है विडम्बना।। 2
धार्मिक रीति 
जल- वायु- दूषण 
का हैं कारण।। 3
वृक्षारोपण 
जन- जीवन- हित
करें हमेशा।। 4
मानव मन
के संग स्वस्थ तन
है सार्थकता।। 5
स्वास्थ्य हमारा
बिगड़ रहा अब
इसे बचाना।। 6
योग-ध्यान से
सुखमय जीवन 
हमे बनाना।। 7
(स्वरचित)

Usha Saxena मं
रविवार -7/7/2019
स्वतंत्र लेखन 
सबद:-
सबद ही धरती 
सबद अकाशा 
सबद प्रकटभयो 
ज्ञान प्रकाशा ।
सबद ज्ञान की 
उज्जवल भाषा
घट-घट सबद
बना परिभाषा ।
आत्म ज्ञान जब 
हमने जाना ,
त्तत्व ज्ञान 
परख पहिचाना ।
ओंकार की 
महिमा जानी 
अंतर्निहित
जान हुये ज्ञानी ।
ब्रह्म ज्ञान कोई 
जान न पाया 
जो जाना सो 
कह नही पाया ।
सबद बोल कभी 
जाये न खाली
बोल के मोल की 
बात निराली ।
स्वरचित -उषासक्सेना

शीर्षक - हाँ मैं एक नारी हूँ

हाँ मैं एक नारी हूँ,
मैं ही जीवनधारी हूँ।
करे विनाश पापों का,
दुर्गा रूप विनाशिनी हूँ।।
हाँ मैं एक नारी हूँ....

लक्ष्मी बन घर सजाती हूँ,
शारदा बन ज्ञान सिखाती हूँ।
अन्नपूर्णा की बन देवी मैं,
हर घर खुशहाली लाती हूँ।।
हाँ मैं एक नारी हूँ....

कभी माता बन पूजी हूँ,
कभी वेश्या बन भोगी हूँ।
कभी बनती तेरी दासी,
मैं रुपयों में तोली हूँ।।
हाँ मैं एक नारी हूँ....

कभी अग्नि में जलती हूँ,
कभी कोख़ में मरती हूँ।
कभी हिंसा के ही कारण,
फाँसी पर मैं झूलती हूँ।।
हाँ मैं एक नारी हूँ...

मैं ही संस्कृति बचाती हूँ,
परम्पराओ को निभाती हूँ।
समाज की मैं नीवं बनी,
जीवन आधार बनाती हूँ।।
हाँ मैं एक नारी हूँ.....

धन्यवाद...
स्वरचित सरला सिंहमार 'शवि'
करनाल (हरियाणा)

कोर
गुम हो गया था काफी समय से 
आज आईना देखा तो एक 
पहचाना सा शक्श लगा
फुरसत से निहारा तो 
खुद से मुलाकात हुई फिरसे
सोचता था शायरी गूंगी होती है
पर पता न था लफ्ज भी बेइंतेहा
आवाज कर लेते है।
नशा तेरी मोहब्बत का आदी बना गया
तलब समय के साथ और बढ़ती जा रही है।
एक खामोश अहसास है मेरा इश्क
क्या अब भी जताना पड़ेगा।
बढ़ती उम्र के साथ और गहराता जा रहा है
ये इश्क मेरा और भी पकता जा रहा है।
देखो अब मान भी जाओ,ये बरसात ऐसे ही 
तुम्हारे शहर में लगातार नही हो रही है।
इश्क मेरा बूंदों के मानिंद गिर रहा है
तुम हाथों की कोर से समेटो तो जरा
कामेश की कलम से

विधा - लघुकथा 

बौछारें

रात से पानी बरस रहा था , आज रामकुमार बगीचे में पानी डालने नही गये । बरामदे में शेड के नीचे बैठ कर वह बारिश का आनंद ले रहे थे , तभी उनक पत्नी रमा चाय ले कर आ गयी , सोने में सुहागा हो गया, अब बारिश का मजा दुगना हो गया और चाय का चार गुना ।
तभी उनका चार साल का पोता नन्दू आ गया और गोद में बैठ गया । सच में अब रामकुमार अपने को दुनियाँ का सबसे भाग्यशाली आदमी समझने लगे । तभी अंदर से बहू संगीता की आवाज आई :
" नन्दू कोई काम नहीं है क्या ? चलो होमवर्क पूरा करो सुबह से बाबा की गोद में चढ़ गया अरे उन्हें तो कोई काम है नहीं , वह यह भी नहीं कर सकते कि बाजार से दूध सब्जी ले आये बैठे बैठे खाने की आदत जो पड़ गयी है ।"
रामकुमार धडाम से आसमान से जमीन पर गिर गये थे , दिल को चोट ज्यादा लगी थी । खैर रमा जा चुकी थी इसलिए बेईज्ज़ती थोड़ी 
कम लगी ।
रामकुमार कमरे में गये बंडी पहनी जिसमें पैसे थे और झौला ले कर बाजार निकल गये ।
अब संगीता , रमा से उलझ रही थी 
" आप से इतना भी नहीं होता कि मैं , आफिस की तैयारी कर रहीं हूँ तो रोटी ही सेंक दे , आप दोनों ही ऐसे रहते हो इस घर में जैसे कोई वास्ता ही न हो ।
रमा रोटी सेंकने लगी और रामकुमार भिन्डी काटने
लगे ।
संगीता और सुनील दोनों ही अच्छी नौकरी करते थे और काम के लिए किसी नौकर को रख सकते थे ,लेकिन रमा और रामकुमार रहते है क्यो सात-आठ हजार खर्च किये जाए ? 
अगले दिन फिर बारिश जारी थी , कोई कुछ भी कहे जब तक नन्दू बाबा जी की गोद में न बैठ जाए उसे चैन नहीं मिलता ।
इतवार का दिन था , संगीता और सुनील भी बारिश की वजह से बरामदे बैठे चाय पी थे । 
तभी नन्दू , रामकुमार जी का हाथ पकड़ आया और बाल-सुलभ मन से बोला :
" बाबा जी आप तो रोज बगीचे में पानी डालते है फिर आज क्यो नही डाल रहे ? " 
रामकुमार ने कहा :
" बेटा बारिश में प्रकृति खुद वृक्षों और पौधों को सींचती है , उस समय वह उम्मीद भी नही करते कि कोई उन्हे सींचे और उनकी सेवा करे ।"
रामकुमार अब भावुक हो गये और बोले :
" बेटा जब तक माता पिता के हाथ पैर चलते रहते है वह अपने परिवार और बच्चों के लिए बहुत कुछ करते रहते है , उस समय उन्हें देखभाल की जरूरत नहीं होती , प्रकृति की तरह वह खुद अपनी देखभाल करते हैं लेकिन जब गर्मी में झुलसते है असहाय हो जाते है तब वह पानी के सींचने की उम्मीद करते है ।" 
कहते हुए रामकुमार की आँखो में आंसू आ गये ।
नन्दू तो कुछ नहीं समझ पाया लेकिन शायद संगीता और सुनील पर कुछ बौछारें पड़ी हों ।

स्वलिखित 
लेखक संतोष श्रीवास्तव भोपाल


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