Tuesday, July 9

"परवाह /चिंता " 09जुलाई 2019

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ब्लॉग संख्या :-442


विधा लघु कविता
09 जुलाई 2019,मंगलवार

कैसी चिंता कैसी परवाह
सब सोच होती है मन की।
योगा और व्यायाम करो 
चिन्ता करो सदा ही तन की।

चिंता चिता जन्मदात्री है
हृदयाघात होता है इससे।
जीवन में सद्कर्म करो 
सुख शांति आती है उससे।

चिंता मोल से न बिकती
हम चिंता को खुद लेते हैं।
सबकी अलग स्व सोच है
कर्मफलों को सब चखते हैं।

दैहिक दैविक भौतिक चिंता
इनकी नहीं कोई चिकित्सा।
सकारात्मक सोच अगर है
फिर होती परवाह की रक्षा।

स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

विषय - परवाहदिनांक - 09/07/19

🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

जब मैं जागु निगाह पहली उन पर ही जाये। 
दिल में बसे वो मेरी पलकों में समा जाये।। 
कुछ इस तरह करे वो परवाह मेरी की मैं। 
उन्हें सोचूं और वो मुझ में ही नजर आये।।

मैं बनूं राधा उनकी वो मेरे कान्हा बन जाये।
संग ग्वाल-बाल कान्हा कजली वन को जाये।।
ऐसी मधुर सरस मुरली बजाये मन मोहन।
सुध-बुध खो व्याकुल सा मन राधे दौड़ी आये।।

श्रद्धा से झुकें जब नयन वो ही प्रभु बन जायें।
मिले दिल ऐसे की नयन दोनों के भर आयें।। 
फिर जो दिल की बात चले बहे प्रेम ऐसा।
खो कर उन में न रहूं मैं बस वो रह जाये।।

हो रोशन वो इस तरह दिनकर ही कहलाये।
शोभित उनके प्रकाश से जग सारा हो जाये।।
मैं धरा पर उग आऊं बन कर नन्हा पौधा।
प्रदीप्त हो सौंदर्य प्रेम का अमर हो जाये।।

स्वरचित
मीनू "रागिनी "
09/07/19

सुप्रभात
विषय:-परवाह/चिंता
वि
धा:-चौपाई छंद
🍂🍁🍂🍁🍂🍁🍂

चिंता चिता दोऊ समाना ,
हरि चरणों में ध्यान लगाना ,
तजी मोह की गठरी माया ,
राम नाम का भजन तु गाना ।

राम दुलारे हैं हनुमाना
जग को प्यारे हैं ये माना ,
मिटते इनसे कष्ट अपारा,
भजता इनको जग है सारा ।

स्वरचित
नीलम शर्मा #नीलू

दिनांक .. ९..७..२०१९
विषय .. परवाह /चिन्ता 

************************

पूर्ण रूप से प्राप्त हुआ तो मैने ये स्वीकार किया।
ना चिन्ता परवाह मुझे ईश्वर पे मैने छोड दिया॥

सुख दुख का सम्राज्य रहा है ये तो आता जाता है।
मन मे जो विश्वास रहा मेरा ना कभी कुम्हलाता है॥

पीतवसन धारी ईश्वर का शेर रहा अनुरागी है।
किसकी क्यो परवाह करू जब साथ मे कृष्णमुरारी है॥

हरि दर्शन के साथ कर्म को अपने देना मान सभी।
ईश्वर को है कर्म ही प्यार सबके होता साथ वही॥

भाग भंगिमा मस्त रहे भावों से मोती भरा रहे।
सुन्दर ये उपवन मेरा शब्दों के पुष्प से भरा रहे॥

स्वरचित एंव मौलिक

शेर सिंह सर्राफ

परवाह नही करता अब जमाने की
आदत सी पड़ गयी भूल जाने की ।।

की जब तक परवाह बेमुरव्वत जमाने
की राह न मिली मंजिल के ठिकाने की ।।

कितना क्या नही खोया हमने इसके
चलते डरे सनम की सुधी लाने की ।।

लोग क्या कहेंगे यही कश्मकश रही 
मन डरा सोचा लोगों के बतियाने की ।।

उनकी बातें आज भी वही बिन सिर
पैर की हमें सजा मिली लजाने की ।।

आज टप-टप आँसू बहें गया जमाना
सूझे न तदबीर अब उन तक जाने की ।।

क्यों न बेपरवाह हुए क्या जरूरत थी
हमको अपने इस इश्क के छुपाने की ।।

इश्क कहाँ छुपाये छुपता सर चढ़ बोले 
आज जरूरत पड़ी कलम उठाने की ।।

''शिवम्" बेपरवाही भी कुछ जरूरी है
जमाने की तो आदत पलटी खाने की ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 09/07/2019

बिषय ,,परवाह ,,चिंता,
नव पीढ़ी में दौड़ रहा नव रक्त
का संचार
चिंता चिंतन का बिषय 
बिखरते परिवार
शिक्षित होकर ज्यादा बुद्धिमान
हो गए
वृद्ध माँ बाप की परवाह नहीं
हम, दो ,और हमारे दो में खो गए
वर्तमान में अनेकोंनेक वृध्दाश्रम खुल रहे
आधुनिकता के दौर में संस्कार धुल रहे
इसे परवरिश की न्यूनता या कहूँ मजबूरी
क्यों जिगर के टुकड़े कर लेते हैं दूरी
वो भी क्या दिन थे
सम्मलित रहती थीं चार चार पीढ़ी
दुख सुख में बन जाते परस्पर सीढ़ी
चिंता ,सहयोग मर्यादा. सम्मान
कहाँ गया अखंड भारत का अभिमान
आज के हालात पर रो रही बसुंधरा
क्यों इंसान का जमीर ओंधे मुँह आ गिरा
क्यों करते आपस में निम्न स्तर का वर्ताव
बढ़ती जाती दूरियां ,मेलजोल का अभाव
गर न चेतें तो केवल मकान रह जाऐंगे
घर तो समाप्त ही ,केवल सामान रह जाऐंगे
स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार


आज का विषय, परवाह, चिंता
दिन, मंगलवार

दिनांक, 9,8,2019.

जो अपनों की परवाह न होती ,
सूरज इतना तपता क्यों। 

जब सोया रहता है जग सारा,
चाँद बेचारा जगता क्यों ।

गर परवाह न होती देश की , 
कोई घर छोड़ के जाता क्यों ।

हिम से लदे पहाडों पे बेवजह ,
जीवन अपना बिताता क्यों ।

परवाह इष्ट को न होती भक्तों की,
पत्थर को पूजा जाता क्यों ।

जो प्रेम न होता जो आराध्य से ,
कोई इतना शीश झुकाता क्यों ।

प्यार न होता जो मानवता से ,
जग में गुरू ज्ञान को देता क्यों ।

परवाह न होती जो आदर की ,
एकलव्य यहाँ होता क्यों ।

परवाह न होती जो वादों की ,
राजा वनवासी होता क्यों ।

जो परवाह न होती भार्या की तो ,
महाभारत युद्ध होता क्यों ,

परवाह की डोर ने ही तो बाँधा ,
वरना जग ये सारा होता क्यों ।

स्वरचित, मीना शर्मा, मध्यप्रदेश

दिनांक-09/07/2019

विषय-चिंता

रंग महल में राजा सोए

हम तो चिंता में रोए।

जीवन के लाखों गम ढोंए

बीज अंगारों के किसने बोये।।

दुःख में दुखी हो मन की माला

सुख के मोती कौन पिरोए।।

ह्रदय सागर की अथाह वेदना को

समुद्र अश्रु में कितने जलयान डुबोये।

प्रेम में पागल पथिक मतवाला

पथ का राही, पथ उजाला।।

पथ पर राही चलने में

साथी की आशा निर्बल।

पंथी न बन बंदी का गात्र का

मोह बलात रोको प्रतिपल।।

पंथी पथ की चिंता क्या

द्वंद समर में हो नेत्र सजल।।

जो राह शिला अवरुद्ध करें

शक्ति समर्थ है से बढ़ता चल।।

मौलिक रचना
सत्य प्रकाश सिंह केसर विद्यापीठ इंटर कॉलेज प्रयागराज

शीर्षक-परवाह/ चिन्ता

जमाने की परवाह करनी छोड़ दी
दिलो-दिमाग को ईश्वर से जोड़ ली।
कौन यहाँ क्या लेकर आया है
और भला क्या लेकर जाएगा
दुनिया के इस रंगमंच में बस
हर कोई अपना किरदार निभाएगा।
व्यर्थ की चिंता से मुंह मोड़ ली।
दिलो-दिमाग को ईश्वर से जोड़ ली।।

झूठे हैं रिश्ते नाते, झूठे हैं ये बंधन
सच्ची है ये आत्मा, जो है सबसे पावन
जिससे मिलने के लिए भटकते
कस्तूरी मृग से, मुनिजन वन-वन।
मोह माया से बंधे सारे रिश्ते तोड़ ली।
दिलो-दिमाग को ईश्वर से जोड़ ली।।

स्वरचित- निलम अग्रवाल, खड़कपुर

🌹 गीतिका 🌹
***************************
🍀 परवाह 🍀
छंद - विधाता ( मापनी युक्त मात्रिक )
मापनी-1222 ,1222 ,1222 ,1222
समान्त-आया ,पदांत-ही नहीं तुमने
🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻

बड़ी परवाह करते पर ,
बुलाया ही नहीं तुमने ।
रहीं मजबूरियाँ कैसी ,
बताया ही नहीं तुमने ।।

हमारे प्यार की चिन्ता
रहे चुप थे न उफ तक की ,
घुले दिन-रात यादों में
जताया ही नहीं तुमने ।

कभी हम भूल से भी हो गये
तुम से अलग जाना ,
चले आते तभी छुप कर
भुलाया ही नहीं तुमने ।

बहुत दिन हो गये मितवा
कहाँ तक याद कर जीयें ,
हुआ है हाल क्या दिलवर
सुनाया ही नहीं तुमने ।

तुम्ही तो झेलते रहते
जमाने की सभी बातें ,
कसक सहते रहे खुद ही
बँटाया ही नहीं तुमने ।

लगी परवाह मन में यह
कि आओगे कभी तो तुम ,
गिने हैं चाँद-तारे जग ,
गिनाया ही नहीं तुमने ।

चले आओ तनिक मीता कि
दिल की बात कह जाओ ,
न यों कहते चले जायें ,
बचाया ही नहीं तुमने ।।

🏵🍀🌸🌻🌷

🍑🌲🌲**...रवीन्द्र वर्मा आगरा 

विधाःः गजलः
लिखने का एक प्रयास कर रहा हूँ,सादर

क्यों किसी की परवाह करें हम,
अपनों से ही हमें फुरसत नहीं है।

वफाऐं जिंदगी में चाहते हैं मगर,
हमें कोई परवाहे मुहब्बत नहीं है।

कलेश पास नहीं फटकता हमारे,
परवाह फिक्र हमें नफरत नहीं है।

जलालत मलालत अपनों की करें ,
क्या परवाह उनकी जरूरत नहीं है।

यूंही परवाह कबतलक करते रहेंगे,
बताऐं क्यों खुदा की रहमत नहीं है।

बहुत बेले पापड मुशीबत में हमने,
यूं परवाह करते रहें सहमत नहीं है।

सोंपे परवाह सब चिंताऐं उसे ही,
कष्ट सिर उठाने की जहमत नहीं है।

स्वरचितःः ः
इंजी.शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

भावों के मोती
विषय-परवाह
09/07/2019

अंधेरे की परवाह नही,
कल भी सूरज निकलेगा!
रोशनी की चाह नही,
कल भी सूरज निकलेगा!!

बेशक काँटे ही काँटे हो,
अपने पहचाने पथ पर,
चलता रहूँगा मैं सदा ही ,
सपनों के स्वर्णिम रथ पर!
दूं झुकने जरा निगाह नही,
कल भी सूरज निकलेगा!
अंधेरे की परवाह नही,
कल भी सूरज निकलेगा!

अब निंदित आँसूओं को,
सागर तक पहुंचा दूँ मैं,
सुख संकल्प भरा आँगन हो,
जीवन सरल बना दूँ मैं !
मुश्किलें भरी कोई राह नही!
कल भी सूरज निकलेगा!
अंधेरे की परवाह नही,
कल भी सूरज निकलेगा!!

रचना-राजेन्द्र मेश्राम "नील"
चांगोटोला, बालाघाट ( मध्यप्रदेश )

विषय --परवाह/चिंता
दिनांक--9--7--19

विधा ---मुक्तक

1.
संसाधन सीमित सभी,करते स्वयं तबाह।
आबादी नित बढ़ रही,तनिक नहीं परवाह।
अन्न व पानी जुगत में,जुटे सतत दिन रात--
सब कुछ कठिन कठिन लगे,सूझ न पाती राह।
2.
संसाधन सीमित अगर,बच्चे क्यों हों रोज।
सीमित जमीन घट रही,भूख घटाती ओज।
करते चिंता बाद में,पहले ही लें सोच--
कम सन्तति,कम आय हो, तऊ मनाएं भोज।

******स्वरचित*******
प्रबोध मिश्र 'हितैषी'
बड़वानी(म.प्र.)451551

🌹🌹🌹🌹🌹
परवाह

कल्पना में विचरती मैं,
नव उमंग भरकर पांखों में।
देख मौसम की अंगड़ाई,
मधुमास संवरता आँखों में।

चमक रही घन बीच दामिनी,
हिय में आग लगाती सी।
विरह ज्वर में तपित काया,
बूँद लगे सुलगाती सी।

दादूर, मोर वन में हर्षित,
मन आँगन मेरा सूना सा।
रह - रह जब बादल गरजे,
हिय विह्वल होता दूना सा।

मुरझाती कलियाँ अब वेणी की,
गहराती रजनी न लुभाती है।
बरखा संग करती अठखेली,
पुरवाई मुझे न सुहाती है।

काश! तुमको परवा होती,
घनश्याम श्यामल बन आते।
निज नेह फुहार जो बरसाते,
मेरे रोम - रोम पुलकित हो जाते।

स्व रचित
डॉ उषा किरण

विषय - परवाह चिंता 

मुझे याद आया 

वो उछल कूद करता चिंता रहित बचपन।

वो कच्ची सी साफ सड़कें मधुर सी स्वर लहरी 
वो बैलों के गले मे बंधी घंटियों की रुन-झुन ।

वो दूर वादियों से स्वर्णिम आभा लिये भास्कर
वो सूरज से पहले उठ कर्म पथ पर चल पड़ना ।

वो हवा का सुमधुर आवागमन आलस को हरना
वो कल-छल बहता निश्चल नदियां व झरना।

वो कोयल की कूहूक पीपीहे का गाना
वो पेडों की डाल पर झूले पड़ जाना।

वो साफ निलाम्बर, लिये तारों की बारात
वो चांद का पत्तों में छुप - छुप जाना ।

वो उछल कुद करता चिंता रहित बचपन......

स्वरचित

कुसुम कोठारी।

विषय : - परवाह / चिंता

कपकपाती हाथों में थामे
एकदूजे का हाथ देखा
जहाँ रिश्ते बनते ही टूटते है
वहाँ एक वटवृक्ष को 
उड़ेलता छाँव देखा। 

अधखुली पलके, लड़खडाए वाणी
पर बुलंद उनका आत्मबल देखा
सिखा रही थी जो रिस्ते के मायने
विश्वास, कदर और करता
एक -दूसरे के लिए परवाह का अथाह समंदर देखा। 

काश हमारे युवा पीढ़ी यह देख पाते
और इसे महशुस करते
तो शायद तलाक की गुँज
कुछ कम सुन पाते
रखते है आयने को सहेजकर
पर रिश्ते को बार- बार
टूटकर बिखरते देखा। 

बदलते परिवेश में
पनपते धोखा और अविश्वास देखा
बईमानी सी लगती अब जिंदगी
अपनों को ही अपनों के
सीने पर करता वार देखा। 

कुछ पल की ही चिंता
फिर सबको अपने में रमते देखा
तुम साथ हो तो स्वर्ग यह धरा है
उस बुजुर्ग दंपति को
चुपके कानों में 
यह फुसफुसाते देखा। 

स्वरचित : - मुन्नी कामत। 

विधा कविता
दिनांक 8.7.2019
दिन मंगलवार

चिन्ता
🍁🍁🍁

आज मानवता चिन्ता की सेज पर लेटी है
इसमें माँ है बहन है और साथ में बेटी है
दरिन्दे बेधड़क सड़कों पर घूमते हैं
अपनी क्रूरता पर खुशी से झूमते हैं।

सब हैं चिन्तित असुरक्षित परिवार 
सब ओर मचा है हाहाकार
सँवेदनायें इतनी शून्य हो गईं
कौन किसके आगे करे पुकार।

कई ज़गह तो ज्वाला जलती है
पर कई ज़गह साँझ यूँ ही ढलती है
उन बेचारी बेटियों की कैसे कहें
जिनकी जि़न्दगी कोरे हाथ मलती है।

बेटी से रौनक है हर घर में 
फिर दिन क्यों निकलता है डर में
क्या सभ्यता है हमारी पतझर में
या शौर्य तड़पता भय के ज्वर में।

स्वरचित
सुमित्रा नन्दन पन्त
जयपुर

शीर्षक - परवाह /चिंता 
विधा - छंदमुक्त 

कभी देह सुखी दिखती है पर, 
मन की चिंता का अंत नहीं l
कष्ट, विषाद पीड़ा न जिसको, 
ऐसा कोई भी संत नहीं l

मुस्कान लबों पर रखते हम, 
अंतर्मन में तो सैलाब है l
प्रचंड,अविराम अंतर्द्वन्द है, 
मन का न कोई ज़वाब है l

परवाह नहीं अपनी लेकिन, 
सबकी चिंता में मन जलता l
निर्बल हो जाता हृदय कभी,
पथ में हौसला नहीं मिलता l 

पग पग पर सुख दुख नदिया, 
बांह पसारे खड़ी है रहती l
चिंता उसमें निमग्न होकर, 
विडंबना जीवन की कहती l

अवसादग्रस्त होते हम मानव, 
पीड़ा,उपेक्षा या हो अपमान l
चिंता हौसले पस्त है करती, 
चिंता तो होती चिता समान l

संकट,विपत्ति,विषाद क्षणों में, 
चिंताग्रस्त हम हो जाते हैं l
उदास, निराश,हतोत्साह हो, 
विवेक स्वयं का खो जाते हैं l

आजीवन मानव जीवन क्यों, 
चिंता की आग में जलता है l
हर उम्र की चिंता भिन्न भिन्न, 
कभी चैन अमन न मिलता है l

कुंठा, नफ़रत, अभिमान से, 
परिवार यहाँ बिखरते हैं l
तनाव,अवसाद के साए में, 
रिश्ते यहाँ सिसकते हैं l

खुशियाँ होती हैं क्षणभंगुर, 
गमों से गहरा नाता होता l
हँसी अस्थाई क्षणिक सी है, 
चिंता का कोई अंत न होता l

कुसुम लता पुन्डोरा 
आर के पुरम 
नई दिल्ली

विषय चिंता 
विधा दोहा +चौपाई 
माँ और बच्चों के संबंध को और उनके एक दूसरे के प्रति चिंता और परवाह को इस विधा में दिखाने का प्रयोग किया है । क्षमसाहित
**
#दो0 #
***
मातु पिता के प्रेम का , कौन चुकाये मोल।
उनका हम आदर करें बोले मीठे बोल ।।
***
# चौ0 #
**
माना चिन्ता चिता समाना।माँ का मरम कोई न जाना।।
हर आहट पर सहमी जाये।संतति अब तक घर नहि आये।।
सब कहते है चिन्ता छोड़ें।कैसे अपनों से मुख मोड़ें।।
रक्त से सींच कर बड़ा किया।दिन और रात को एक किया।।
रोम रोम में बसते तुम सब।तुम बिन जीवन व्यर्थ लगे अब।।
***
#दो0#
****
किस्मत वाले लोग वो,मातु पिता हो साथ ,
पूछो जा उनकी दशा,शीश न कोई हाथ ।
****
#चौ0#
***
अब हम बच्चे बड़े हो गये।अपने पैरों खड़े हो गये।।
आप साथ सदा देती रहीं।जेबें खुशी से भरती रहीं।।
शिक्षा जो आप देतीं आयीं।मुश्किल में मदद करती आयी।।
हम बच्चों का आप सहारा ।आप बिना कुछ लगे न प्यारा।।
रोग न कोई घेरे माँ। आपकी परवाह करते माँ।।
***
#दो0#
***
सारी चिन्ता छोड़ के ,मातु करो आराम।
हम बच्चों को आप अब ,करने दो कुछ काम।।
***

स्वरचित
अनिता सुधीर

माँ की चिंता--
तेरी चिंता में घुलूँ ,मन में चुभते शूल।
बेटी तू दुख पा रही,कैसे जाऊँ भूल।।

बेटी की तसल्ली--
मेरी चिंता मत करो ,माँ, पापा,संज्ञान
होनी तो होकर रहे ,तुम सब भी लो मान
(संज्ञान- भाई का नाम)

पिता की हिम्मत--
चिंता तेरी क्यों करें ,तू है कितनी वीर
जो कोई दुख दे तुझे ,रख देगी तू चीर

भाई का आश्वासन--
भाई बहना साथ हैं, चिंता की क्या बात
कोई क्यों पहुंचा सके , बहन तुझे आघात

सरिता गर्ग

परवाह / चिन्ता
विधा- छंदमुक्त कविता

वक्त नहीं उन्हें 
परवाह 
करने की हमारी
हमने उनकी 
यादों में 
काट दी जिन्दगी 

चिता भी 
है बड़ी बेशरम
जलाती रहती है
शरीर
और कहती है 
चिंता से
जला इन्सान का
तन

करते रहे 
माता पिता 
परवाह
बच्चों की
जिन्दगी भर
बुढ़ापे में 
छोड़ दी
चिन्ता 
बच्चों ने

करों परवाह
शरीर की
रखोगे 
चुस्त दुरुस्त 
तो नहीं 
करनी पड़ेगी 
चिन्ता 
बीमारी की 

करता है 
मौला परवाह
बन्दों की
फिर क्यों
फिक्र करे
फकीर 

स्वलिखित 
लेखक संतोष श्रीवास्तव भोपाल

विषय:-चिंता
विधा :-राधेश्यामी / मत्तसवैया 

( १ )

मन के छोटे से कमरे में , कितनी रहती हैं चिंताएँ ।
ख़ुशियों के खिले ग़ुलाबों पे , कुछ कहती हैं ये रेखाएँ ।।
मन पर जब आच्छादित होती ,बहती नयनों से धाराएँ ।
मन जीत नहीं पाता इनको , ख़ुशियाँ बाहर से लौटाएँ ।।

( २ )

चिंता भयंकर चिता से , चिंगारी सुलगा जाती है ।
मुर्दों को है चिता जलाती , अरु ये ज़िंदा खा जाती है ।।
मन अवसादित रहता इनसे , हारे को खूब डराती है ।
जीते मन को जो चिंतन से ,पास नहीं उसके आती है ।
(३ )

चिंता एक भी हो हृदय में , ख़ुशियों पर वो भारी होती ।
दीमक बनकर रहे चाटती , झरते रहें आँख से मोती ।।
चुभती रहे किरकिरी इसकी ,सिक्ता कण सम चिंता होती ।
ख़ुशियों की सौतन बनकर ये ,उनके पथ में काँटे बोती 

स्वरचित :-
ऊषा सेठी 
सिरसा


विषय परवाह/ चिन्ता
विधा हाइकु
1
आपदा आयी
परवाह किसको
बाढ़ बहायी
2
प्रकृति नष्ट
बेपरवाह लोग
संकट योग
3
बालक मन
न कोई परवाह
दिल उछाह
4
माँ की चिन्ता
भविष्य का निर्माण
वात्सल्य प्यार
5
सुंदर कल
जीवन का निर्वाह
पिता की चिन्ता
6
कटते पेड़
बढ़ता प्रदूषण
चिन्ता भीषण

मनीष श्री
स्वरचित
रायबरेली

दिनांक :- 09/07/2019
विषय :- परवाह/चिंता

परवाह नहीं जमाने की...
अपने दिल की करता हूँ...
लेकर मन में हौसले नए..
तुफानों सँग लड़ता हूँ..
परवाह नहीं जमाने की..
मैं सत्य सदा लिखता हूँ..
रम जाता हूँ अपनी धुन में..
जब गीत नया लिखता हूँ...
परवाह नहीं जमाने की..
ख्वाबों को परवाज देता हूँ..
गम के अंधियारों में सदा..
खुद को आवाज देता हूँ..
परवाह नहीं जमाने की..

स्वरचित :- मुकेश राठौड़

#विधा:काव्य:
#रचनाकार:दुर्गा सिलगीवाला सोनी:

***""***चिंता:परवाह***""***

चिंता न तू अपने भविष्य की कर,
ना वर्तमान की तुझे करना परवाह
बस कर्म पथ पर तू डटे ही रहना,
अवसर भी हैं संभावनाएं हैं अथाह,

सुख और दु:खों में कटती है उमर,
कभी राह सरल कभी कठिन डगर,
जीवन यापन ही एक संघर्ष है तेरा,
उस रब को तेरी पल पल की खबर,

दुनिया को समझ एक नदी समय की,
और धारा भी इसकी कुछ विपरीत,
जो तैर गया वो लग ही जाएगा पार,
वर्ना बह जाना है इस जगत की रीत,

सिर्फ परवाह कर तू रिश्तों नातों की,
और चिंता कर तू सभी अपनों की,
श्रेष्ठ कर्मों से यहां मिलती है मुक्त्ति,
कर्मों को ही बना सफलता की युक्ति,

विधा कविता
द्वितीय प्रस्तुति

अब कोई परवाह नही करता
बचपन के आनन्द का ख्याल नही करता
मासूमों के जीवन की परवाह नही करता
सुंदर भविष्य की बात नही करता

अब कोई परवाह नही करता
न्याय और निष्ठा की बात नही करता
सत्य और नैतिकता का मार्ग नही चुनता
जीवन दर्शन का विचार नहीं करता

अब कोई परवाह नहीं करता
माँ-बाप,गुरु आज्ञा शिरोधार्य नहीं करता
अपनी ही चिन्ता में बात नही करता
परिवार वृक्ष की छाया पर एतबार नही करता

अब कोई परवाह नहीं करता
धर्म- कर्म का पाठ नही पढ़ता
जीवन मर्म नही गुनता
सामजिक कर्म नही करता

अब कोई परवाह नही करता
मोहब्बत पर भी विश्वास नही करता
सात जन्म के बन्धन की अब बात नहीं करता
जीवन-मरण का भान नही करता

अब कोई परवाह नही करता

मनीष श्री
स्वरचित
रायबरेली
"परवाह/चिंता"छंदमुक्त
################
बड़ों का सम्मान...
छोटों को करे प्यार....
माता-पिता बच्चों को देते..
ऐसे ही संस्कार....
जीवन पथ पर चलना होता..
राह यह नहीं आसान...
दीन-दुखीयों और लाचार का.
करते सदा परवाह....
और विनम्र हो व्यवहार...
संतान के ऐसे गुणों को देखकर...
खुशी है मिलती...
फिर भी...
सभी माता-पिता को..
संतान के भविष्य की..
चिंता बड़ी सताती...
गर मिले आशीर्वाद प्रभु का..
सफलता हाथ है आती...।।

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल ।।
Damyanti Damyanti 

 आज का विषय ,,,,परवाह ,चिंता ।
कल किसने देखा चिंता फिर.क्यो ।
आज जीवन कैसे जीऐ परवाह करे ।

अपने आचार विचार व्यवहार कर्तव्यों की ।
कल बीत गया उस.लकीर को क्यों पीटे ।
अगर पाना हे सकुन तो आने वाले भविष्य को सजाये ।
संस्कृति संस्कारो से भविष्य. हो उनका ।उज्जवल ।
परवा उनकी करे तो देश का भविष्य होगा उज्जवल ।
चिंता आज यही सबसे बडी ।
भोतिकता मे सोच विकराल व विकृति हुई ।
करनाभी हमे सोचना भी ।बागडोर होगी उनके हाथों मे ।
शासन शासक सभी है ऐसे जिन्हें परवाह नही वतन की ।बस चिताएं भी यही ।
स्वरचित ,,दमयन्ती मिश्रा ।
गरोठ मध्यप्रदेश ।

8/7/2019
ज कुछ हल्का फुल्का सा
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हाँ, परवाह है तुम्हारी
तुम्हारे मान-सम्मान की
तभी तो,लड़ पड़ती हूँ सभी से
बिना अपनी परवाह किये।
यही,प्रेम की पराकाष्ठा है शायद
सीमाओं को नही जानना चाहती
मात्र,
प्रेम की परिधि में रहना चाहती हूं
राधा सा निश्छल प्रेम...
मीरा सी निश्छल भक्ति ....।
परवाह समाज की
अब नही,क्योकि
समाज की रूपरेखा भी
हमने ही बनाई।
धिक्कार दिया उस समाज को
जो अंकुशों पर चला करता था।
निडर खड़ी रहती हूँ अब अकेले
बेपरवाह...।
साथी शब्द की महत्ता को
उसके प्रति कर्तव्यों को
शिद्दत से अपनाना कर
बेख़ौफ़,बेपरवाह जीना चाहती हूँ।।
हाँ, मीरा,राधा,लक्ष्मी रानी बन
बेरवाह जीना चाहती हूँ।

वीणा शर्मा वशिष्ठ


विषय - चिंता / परवाह 



सांसत प्राण 
चिंता चिता समान 
दर्द अंजाम 



लक्ष्य को साध 
मोहपाश ना बांध 
चिंता को त्याग 

मन उपवन में चिंतन की कुटिया शांत 
आयेगा स्वप्निल सुनहरा प्रभात ।
जीवन नगर में खुशियों का सुंदर प्रांत 
छोड़ो चिंता वाली बात ।
नेक कर्मों की कर शुरुआत 
अपनी राह चलता चल 
मिटेंगें अंधियारे 
होंगें रोशन गलियारे ।
मिट्टी के खिलौने, 
नियति के आगे बौने ।
मिटा चिंता की लकीर
मन मस्त मौला फकीर ।
परवाह नगरी 
प्रेम प्रीत की गगरी 
छलकी, टूटी, बिखरी ।
कल आज और कल 
सब प्रभु के नाम कर 
ना स्वयं को छल 
चलता चल ,पल प्रतिपल ।

(स्वरचित) सुलोचना सिंह 
भिलाई (दुर्ग )
मोहब्बत के बदले तुमसे वफा चाहती हूँ,
हो ख्याल मेरा भी ये परवाह चाहती हूँ,
सपनों की दुनियाँ में तन्हा जीकर,
बैठ अकेले में आँसू बहाती हूँ।
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होती ना दुनियाँ की परवाह अगर,
कटता हमदम तेरे साथ ये सफर,
दुख के काँटों पर चलती हँसकर,
चला जो होता तू हाथ थामकर।
**
दूर रहकर भी हमसे परवाह करनी मेरी,
दिल को मेरे भाती थी ये अदा तेरी,
याद आता है वो स्नेह तेरा और,
मुस्कुरा कर भूल जाना हर खता मेरी
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स्वरचित-रेखा रविदत्त
9/7/19
मंगलवार
शीर्षक-परवाह , चिंता
विधा-हाइकु 

1.
माँ की चिंता
बेरोजगार बेटा
गुजारा कैसे
2.
चिंता है भारी
आतंक महामारी
समाधान क्या
3.
चिंता विषय
बढ़ती जनसंख्या
ढूंढो उपाय
4.
चिंता कारण
जवान हुआ बूढा
जीना बेहाल
5.
जीना दूभर
भ्रष्टाचार कारण
चिंता मन में
6.
सफेद बाल
चिंता की है निशानी
पिचके गाल
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स्वरचित
अशोक कुमार ढोरिया
मुबारिकपुर(झज्जर)
हरियाणा



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"भाषा"19 जुलाई 2019

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