Monday, July 22

"नटखट बचपन/नटखट बुढ़ापा"20 जुलाई 2019

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ब्लॉग संख्या :-453

भावों के मोती🌹
😊"नटखट बचपन,नटखट बुढ़ापा"😊
20/7/2019

""
मेघों की बारात चली""
*******************

चली-चली बारात चली
मेघों की बारात चली
हाथी,घोड़े,चूहे,बिल्ली
मोर-मोरनी साथ चली।।

मेघ बनाते गजब रूप से
चूड़ी, पैसे,चँदा जैसे
कभी है दिखते यम के भैंसे
कभी राम और सीता जैसे।।

रात सुहानी घिर है आई
खेल पहेली मन को भाई
रात में मस्ती भरती ताई
किधर छुपा, ढूंढो है नाई।।

हम तो नन्हे-मुन्ने सच्चे
समझ न पाए मन के कच्चे
नाई ढूंढ कर हारे बच्चे
रूप बदल दे जाते गच्चे।।

अभी दिखी मेघों की मटकी
पलकें झपकी तभी वो चटकी
बिजली जोर-जोर से कड़की
चटकी मटकी पल में भटकी।।

मेघों का यह रूप सलोना
नही कोई चाहता है खोना
कुदरत का अनमोल खजाना
चाहता हर बूढा भी पाना।।😊

वीणा शर्मा वशिष्ठ
स्वरचित
मौलिक

नमन मंच-भावों के मोती
दिनांक-20.07.2019
विषय- नटखटबचपन/नटखट बुढ़ापा

विधा- एक भाव प्रवाह
======================
(आ० वीणा जी की रचना से अभिभूत होकर)
🔺🔺🔺🔺🔺🔺🔺🔺🔺🔺🔺🔺
आए आए घन कजरारे
गड़ गड़ गड़ गड़ लिए तड़ारे
तड़ित कामिनी साथ चली है
जो मुँह फट है हिली डुली है
बरस पड़ें उत्पात मचादें
नहीं झड़ें यूँ ही टरकादें
इनकी आदत बचकानी है
यह बूढ़ों ने सनमानी है
जिनकी फ़ित्रत बालक जैेसे
कभी कभी है पागल जैसे
शैशव मैंने भी झेला है
क्या क्या कर्म नहीं खेला है
गुल्ली डंडा मिची मिचट्टर
उत्कूर्दन पेडों पर चढ़कर
चोट लगे परवाह नहीं थी
दुनिया की भी चाह नहीं थी
नटखट जीवन बाल्यकाल का
नहीं ज्ञान कुछ देख भाल का
इसी तरह बूढ़ों की बातें
करते हैं यूँ ही संघातें
कूड़ा करदें साफ जगह में
करें बखेड़ा बिलावजह में
बीता यौवन सठिया जाते हैं
हठ से बाज़ नहीं आते हैं
कुछ तो देवालय जाते हैं
कुछ कुछ यूँ ही मस्ताते हैं
इसी लिए कहना पड़ता है
यह क्रमबद्ध भाव जुड़ता है
बादल नटखट,वानर नटखट
बचपन और बुढ़ापा नटखट।।
========================
"अक्स" दौनेरिया

🙏🌹🙏🌹🙏
20/07/2019
"नटखट बालमन"
छंदमुक्त
################
बड़ा चुलबुला बच्चों का मन
होता बेफिक्री का जीवन...
खयालों खाबों की दुनिया..
सपने होते अजीबोगरीब..।

सफेद बादलों को समझते रहे
उड़ा है आकाश में कपास..
भिन्न-भिन्न आकृतियाँ...
जैसे बातें करने को तैय्यार..
जिज्ञासा...बालमन...
आकाश में तैरते हो कैसे..।

उछलता-कूदता जीवन..
सड़कों के किनारे..
गड्ढों में भरे हो बरसाती पानी
फिर तो छप-छप छपाक..
किचड़ में चाहे लिपटे हाथ-पाँव...
चाहे माँ की खानी पड़ेगी डाँट
परवाह कौन करे...
पहले हो जाए छप-छप छपाक....।

गुड्डे गुड़िया का ब्याह रचाते..
सज-धजके हम बाराती जाते..
पत्तों की पूरियाँ बनाते....
लड्डू मेवा घर से चुराते...
भोज हम छककर खाते...
मिले अब वो स्वाद कहाँ.....।

पेड़ों की टहनियों में झूला झूलना..
बंदरों को भी देता रहा मात.
हाथ-पैर की हड्डियां टूटे..
छिलने कटने की कहाँ थी परवाह.....।।

स्वरचित पूर्णिमा साह
पश्चिम बंगाल ।।
 नमन मंच भावों के मोती
नटखट बचपन,नटखट बुढ़ापा
विधा लघुकविता

20 जुलाई,2019,शनिवार

बचपन जीवन नटखटपन 
मन चाहता वह सब करते।
चँचल चपल करें मस्तियां
मिल उड़ान दिग्दिगंत भरते।

सदा खेलना और कूदना
हँसना गाना और चिल्लाना।
नटखट अद्भुत होता जीवन
खाना पीना और सोजाना।

बुढ़ापा जीवन नटखटपन
प्रिया भार्या साथ बिताते।
दिनभर पौत्र पौत्रियों संग
खुद हँसते परिवार हँसाते।

जीवन के अंतिम पड़ाव में
जो गुजरा वह सब भूलें।
नटखट बनकर मन बहलाते
रहते सदा मन फूले फूले।

स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

।। आया पचपन याद आया बचपन ।।

बहुत याद आने लगीं अब
वह बचपन कीं यारियाँ ।।

जवानी में मिल न पाया
रहीं बड़ी जिम्मेदारियाँ ।।

अब भी न मिलें वो मित्र 
बनी रहें हरदम दुश्वारियाँ ।।

फिर भी जब मिलता वक्त
करूँ मिलने की तैयारियाँ ।।

हकीकत में न तो ख्वाबों में
घूम आता बागों की क्यारियाँ ।।

जहाँ हिल-मिल जाया करे थे
खिली होती थीं फुलवारियाँ ।।

तोड़ते थे फूल आम बेर 
खाया करते थे गालियाँ ।।

उन गालियों में मिठास थी
वो वक्त की थीं बलिहारियाँ ।।

अब वो वक्त न बचपन 'शिवम'
वक्त हाँका मारकर टिटकारियाँ ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 20/07/2019


जिंदगी का खेल हैं ये अजब-गजब 
कहाँ से कहाँ लेकर जाती हैं ना जाने कब 
बचपन से लेकर जवानी पर पहुँच गई 
जवानी से बुढ़ापे पर चली गई .

बचपन की बातें जवानी में याद आती 
जवानी की बातें बुढ़ापे में याद आती 
कभी हंसाती कभी रुलाती 
कभी जिंदगी से दूर कभी पास लाती .

बचपन खूबसूरत यादों का पिटारा 
जिसमें था जग सारा 
जवानी जोश और उमंग आगे बढ़ते कदम 
बुढ़ापा सबका मिलाजुला संगम.

दो पल की ये जिंदगानी हैं 
आज बचपन कल बुढ़ापा और जवानी हैं 
चलो आज जी भर कर जी ले रुत सुहानी हैं 
ना जाने फिर कल कौन सी नई कहानी हैं .

चलो आज गीत ख़ुशी के गाते हैं
बचपन जवानी बुढ़ापे को खुशियों संग मनाते हैं 
हँसते मुस्कराते ख़ुशी के पल बांटते हैं 
जिंदगी के इस सफर में हर दिन एक प्रेम और भाई चारे का रिश्ता बनाते हैं .
स्वरचित :- रीता बिष्ट

नमन मंच 🙏
दिनांक- 20/7/2019
शीर्षक-"नटखट बचपन/नटखट बुढ़ापा 
विधा- कविता
************
बचपन के दिन याद आ रहे आज, 
नटखट तब हम बहुत होते थे यार,
बहानों में कोई न था हमारा सानी,
जमकर करते थे तब हम मनमानी |

पेट दर्द का वो नटखट बहाना, 
धीरे-धीरे जान गया सारा जमाना, 
विद्यालय जाने से बचाता था यारों, 
मेरे दोस्त भी ऐसे ही थे वो चारों |

बरसात में विद्यालय रोज जाना, 
खूब भीगने का मिलता था बहाना,
कागज की नाव बनाकर हम तैराते,
मिट्टी में लथपथ होकर घर आते |

छुपन-छुपाई,खो-खो का खेल खेलते,
रोज शाम को एक-दूजे के संग होते, 
कहाँ गये वो नटखट दिन सुहावने?
वक्त की सुई फिर से कोई घुमा दे |

स्वरचित *संगीता कुकरेती*

नमन मंच भावों के मोती
20/7/2019/
बिषय नटखट,बचपन,,/नटखट बुढ़ापा

सही कहा बुढ़ापा लड़कपन का पुनरागमन
नटखट बुढ़ापा, नटखट बचपन
बचपन की जिद भोजन मनमाना
बात बात पर नाराजगी ,रूठ जाना
बच्चों को भी दादा दादी लगते प्यारे
नाना नानी के होते नयनों के तारे
बूढ़े और नन्हे हाथों से एक दूसरे का आलिंगन
पोपले मुख से लेते परस्पर चुंबन
किस्से कहानियों में खिलखिलाकर हँसना
पीठ पर बैठा घोड़ा बनकर चलना
चल रे घोड़े टुम्मकटूं नन्हे के कोड़े खाना
स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार

।। नटखट बचपन/नटखट बुढापा ।।
द्वितीय प्रस्तुति

गाँव का वह बूढ़ा बरगद
याद उसे मेरी सब हरकत ।।

कम न थी मुझमें शैतानी 
गिलहरी संग खींचातानी ।।

पूँछ पकड़ता था चुपके से
जाता था दुबके दुबके से ।।

देख रहा था एक दिन बन्दर
सुलग रहा था अन्दर अन्दर ।।

सबक सिखाने की सोचा 
रास्ते में एक दिन दबोचा ।।

सुवह सुवह का वक्त था
पेट में गुड़ गुड़ सख्त था ।।

बैठा था वो बन्दर पेड़ पर
मैं जा रहा था जब मेड़ पर

हाथ का लोटा उसने छीना
कमबख्त ने पीछे से चीन्हा ।।

बैठ कंधे पर मारा चाँटा 
बन गया था मेरा पराँठा ।।

मैं भौंचक्का जा दूर गिरा 
सबक सिखाया सिरफिरा ।।

थी उससे न दुश्मनी ''शिवम"
पर किये का फल पाए हम ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 20/07/2019


विषय -नटखट बचपन/नटखट बुढापा
****************
मुन्ना मांगे चॉकलेट
पिज़्ज़ा और बर्गर
दादाजी को चाहिए 
गरम जलेबी,ठंडी रसमलाई
दोनों अड़े अपनी जिद पर
हमारी तो भई शामत आई..

मुन्ना चॉकलेट दिखा दिखा कर
दादू को चिढ़ाए
दादू अपने में मगन 
जलेबी रसमलाई चट करते जाएं

मुन्ना भी जलेबी खाने को 
ललचाने लगा है
दादू की ओर हसरत से
ताकने लगा है

पहले तो दादू ने
मुन्ने को जीभ चिढाई
फिर जलेबी रसमलाई 
मुन्ने को प्यार से खिलाई

मुन्ने ने भी बड़ी दरियादिली
दिखलाई
अपने हिस्से की चॉकलेट
दादू को थमाई

कौन है बूढ़ा,कौन है बच्चा
कोई देखे तो खा जाए गच्चा
दोनों नटखट दोनों शैतान
एक दूजे पर छिड़के जान

तभी तो कहते हैं ज्ञानी विद्वान
बच्चे बूढ़े एक समान
बच्चे होते मन के सच्चे
वृद्धावस्था में सब बन जाते बच्चे

बच्चा तो बच्चा है ही
बूढ़ों का तो दिल बच्चा है जी
दोनों अवस्थाओं का मज़ा लीजिए
सभी उस दौर में जाएंगे,,समझ लीजिए ।।

✍️वंदना सोलंकी©️स्वरचित

नमन "भावो के मोती"
20/07/2019
"बचपन/बुढ़ापा"
1
रुई पहाड़
विस्मित बालमन
नभ पे कैसे?
2
पोपली बातें
बच्चे सुन हँसते
स्व तुतलाते
3
है मस्तमौला
बच्चों संग बुढ़ापा
जग भुलाया
4
बच्चा औ बुढ़ा
माता की दादागिरी
बखूबी चली
5
घोडा सवारी
बुढ़ापे की दवाई
मुफ्त में पाई

स्वरचित पूर्णिमा साह
पश्चिम बंगाल।।

नमन भावों के मोती
आज का विषय, नटखट बचपन, नटखट बुढ़ापा,
दिन, शनिवार
दिनांक, 20,7, 2019.

हो गयी शनिवार की आधी छुट्टी
अब होगी खूब बच्चों की मस्ती ।
अभी घर में नहीं है पापा मम्मी ,
करेंगे धमाल अब पूरी दोपहरी ।
कागज के खिलौने व चित्रकारी,
बनायेंगे बच्चे और दादा दादी ।
खायेंगे चाकलेट आइसक्रीम भी,
घर में नहीं अभी माँ टोकने वाली।
दादा दादी को शुगर की बीमारी,
बच्चों को फौरन सर्दी हो जाती ।
कभी-कभी तो मन का खायेंगे ,
पड़ी जरूरत तो दवा भी खा लेंगे।
आखिर कब तक यूँ मन मारेंगे ,
कुछ तो जीवन का सुख भी लेंगे।
बन जाते बच्चों संग बूढ़े भी बच्चे,
चुपके चुपके शरारतें करते रहते ।
कहते होते बूढ़े बच्चे एक समान,
जिन्दादिली से ये चरितार्थ करते ।

स्वरचित , मीना शर्मा, मध्यप्रदेश,

नमन भावों के मोती
20/7/2019::शनिवार
चित्रलेखन

पचपन में बचपन

मेरे बचपन फिर लौट के आजा
आजा एक झलक दिखलाजा....
दिल चाहे आज नाचूँ गाऊँ
बिना बात ही मै मुस्काऊँ......
न परवाह हो किसी काम की
और न चाहत हो आराम की.....
मै आगे और माँ है पीछे
छोटी छोटी बातोँ में रीझे....
बाबा को जाने न दूँ मै
थाम के उँगली संग चल दूँ मै....
प्यारी सी मिलती है झप्पी
और कभी हल्की सी थपकी......
मान मनौअल् मेरा होता
जब भी रूठू एकपल को मै.....
आजा बचपन मेरे अँगना
मेरे अँगना...मेरे अँगना.....
बाँह पसारे तुम्हें बुलाऊँ
आज तुमको गले लगाऊँ
नाती पोतों के सँग आकर
मिला मुझे पचपन में बचपन
रजनी रामदेव
न्यू दिल्ली

बिषय,, नटखट बचपन,,,, नटखट बुढ़ापा,,
बिधा,, भजन,,
मैया काहे कहे नटखट बचपन 
खूब शैतानी करे तेरो मोहन
आधी.रात मेरे घर आवै
सीके सै मटकी जो गिरावै
।थोड़ो खावै बहुत बगरावै
माखन दहिया गिरा गिरा कै
कीच मचा दई आंगन ।।
आधी रात मुरलिया बजावै
सब गोपिन खौं नाच नचावै
काहू को जो भय नहीं खावै
ऐसी तान सुनावै कान्हा
लूट लियो है मेरो मन।।
तू तो कहती नन्हों कन्हैया
बड़ो नटखट है तेरो छैया
मोह रहो बलदाऊ को भैया
पाँच बरस नैक सो छोरा
बात करै जैसे पचपन।।
मैं या पै बली बली जाऊं
रोजई या खौं माखन खबाऊं
अब न कबहुँ तोहे धमकाऊं
मेरी गली में रोजई अइयो 
धन्य होय मेरो जीवन।।
स्वरचित सुषमा ब्यौहार 
द्वितीय प्रस्तुति ,,भजन,,


🌹भावों के मोती🌹
साल भर बाद की रचना आज पुनः प्रेषित🙏
20/7/2019
***********
भावों के मोती
31-5-2018
बचपन से पचपन

पचपन में भी बचपन रखिये
जवां सदा मन खुद में रखिये।

माना तन है थका थका सा
मन मानस को जवां ही रखिये।

बचपन से पचपन है आया
दौरे लुत्फ उठाते रहिये।

खट्मीठी बातों की गठरी 
अंत समय तक साथ है रखिये।

छूट गया सो छूट गया है
हाथ जो आया , थामें रखिये।

बचपन से है कठिन चढ़ाई 
हौसले बुलंद सदा ही रखिये।

वीणा शर्मा वशिष्ठ
स्वरचित

नमन मंच
दिनांक २०/७/२०१९
शीर्षक-"नटखट बचपन/नटखट बुढ़ापा"
बादल तुम रूक जाओ आज
रूको ठहरो सुनो बात
बुढ़ा हुआ तो क्या हुआ
दिल तो है बच्चा समान।
कोई नही अब मुझसे करे बात
तुम मान लो मेरी बात
लुका छिपी तुम्हारे साथ
थोड़ी देर मैं खेल लूं आज
फिर थक कर मैं सो जाऊँगा
फिर करना तुम चाहे बरसात
सभी गये पिकनिक पे आज
मुझसे कोई ना पूछे बात
जी भर कर मैं खेलूं आज
नटखट आज भी उतना हूँ
नही ये बचपन की बात
तुम्हारे साथ मैं दौड़ लगाऊं
तोतली भाषा में कहानी सुनाऊं
कोई नही समझे मेरी बात
गर तुम आज चले गये
फिर न मुझसे मिल पाओगे
आज नही तो कल फिर आओगे
फिर तुम बहुत पछताओगे
बुढ़े भी बच्चें समान
दोनों में है कई समानताएं
दोनों को सिर्फ खाने ,
खेलने की परवाह
बुढ़ापा तुझसे करें फरियाद
सुन लो बादल तुम आज मेरी बात।
स्वरचित-आरती-श्रीवास्तव।
नमन मंच भावों के मोती 
20/07/19
नटखट बचपन /नटखट बुढापा
[ गीतिका ]
आधार छंद- प्रदीप
विधान- 29 मात्रा, 16,13 पर यति, 
प्रदीप (29 मात्रा) = चौपाई (16 मात्रा) + दोहा का विषम चरण (13 मात्रा) 
समान्त- आन, पदान्त- को। 
****

बच्चे बूढ़े नटखट दोनों, होते घर की शान हैं,
भांति भांति के फूल घरों में,रचते हैं उद्यान को।

नटखट बचपन मीठी यादें ,पूंजी है इंसान की,
पचपन में दिल बच्चा रखिये,उतरता तन ढलान को।

बच्चों की नादानी प्यारी ,बुढापे का समय कटे 
मन संस्कार के बीज पड़े ,आस लगे उत्थान को ।

एक प्रभू की सब संतानें ,सबका सम अधिकार है ,
बात बात पर क्यों अकड़े सब ,छोड़ें निज अभिमान को ।

स्वरचित
अनिता सुधीर

नमन मंच
दिनांक .. 20/7/2019
विषय .. नटखट बचपन/ नटखट बुढापा 
************************

जीवन का यह चिर सत्य जो,
चलता रहा निरन्तर ।
बचपन मे नटखटपन है तो,
बुढापा रहे तदन्तर ॥

बालापन में नटखट बातें,
यौवन की कठिनाई।
शेर बुढापा का दर्शन ये,
जीवन को सच्चाई॥

पोते से दादा बनने तक ,
क्रम का लेखन है ये।
दोनो मे नटखटपन है पर,
जीवन कठिन बहुत ये।

स्वरचित ... शेर सिंह सर्राफ

नमन "भावो के मोती"
20/07/2019
"नटखट बुढ़ापा"
छंदमुक्त
###############
बचपन सा ही नटखट होता बुढ़ापा..
फिर से आ जाता है बचपन सलोना.....
उत्तरदायित्व हो जाते पूरे..
रह जाता है खुद को जीना..
ऐसे में..नाती पोतों का साथ
सोने पे सुहागा........।

अच्छा लगता..बच्चों के साथ
नादानियों को जीना....
बुढ़ापे की पोपली बातें...
बच्चों की तोतली बातें....
तुकबंदी चलती दिन और रातें
बहुरानी जी बन जाती "हंटरवाली".....
दादा-दादी को याद दिलाती
आराम और दवा की बातें..
बच्चों की कान खिंचाई होती
पढ़ाई-लिखाई जो भूली होती

गुमसुम होकर दादा-दादी..
मन मारकर सो तो जाते..
ईशारों से छुप-छुपकर बातें करते....
छुट्टी का इंतजार करते रहते..

अवसर मिलते ही घोड़े बनते.
पीठ पर बिठाए मासूम सलोना..
घूमते घर का कोना-कोना...
पापा-मम्मी भी रह न पाए..
हँसते-हँसते लोट-पोट हो जाए.....।।

स्वरचित पूर्णिमा साह
पश्चिम बंगाल ।।

बिषयः #नटखट बचपन /नटखट बुढापा#
विधाःः काव्यःः

समान रूप हमें दोंनों दिखते,
नटखट बचपन और बुढापा।
बचपन में चुलबलापन होता
उम्र हो पचपन कहते स्यापा।

बचपन रोता कभी इठलाता।
ये दौड भागकर हमें नचाता।
पडा बुढापा कहीं खटिया पर
पर नटखटपन धूम मचाता।

नई इच्छाऐं प्रतिदिन करता,
रोज मांगता खेल खिलौने।
कभी मांगते टाफी बिस्किट,
गुडडा गुडिया खूब सलोने।

लगते बच्चे बूढे बहुत चटोरे,
चाट चाट कर साथ खेलते।
बच्चों से भी बडेे बूढे जिद्दी,
जब जी चाहे अपनी ठेलते।

बचपन में भोलापन होता है।
इसमें वैरभाव नहीं होता है।
बूढे अनुभव की खान हैं तो,
बच्चों में नटखटपन होता है।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

" भावों के मोती " 
पटल 
वार : शनिवार 
दिनांक : 20.07.2019
आज का शीर्षक : 
नटखट बचपन / नटखट बुढापा 
विधा : काव्य 

गीत 

चेहरे पर है हंसी छलकती ,
दिल में अब वह भाव कहाँ है !!
आज मित्रता पूछ रही है ,
बोलो मेरा ठाँव कहाँ है !!

है पचास को पार कर लिया ,
कुछ खोया कुछ पाया !
खूब कब्बडी , खो खो खेले ,
अमराई की छाया !
गुम है खेतों की पगडंडी ,
पहले जैसे ठाँव कहाँ हैं !!

ना अपनापन बस भटकन है ,
ऐसे अटक गये हैं !
कारे कारे बदरा रीते ,
ऐसे रीत गये हैं !
बोली जैसे लावा उगले ,
बहे प्रीत की नाव कहाँ है !!

तौर तरीके बदले बदले ,
अपनों में खोये है !
समरसता अब खोई खोई ,
टूटे और रोये हैं !
राजनीति है रामायण ना ,
घर घर में वह भाव कहां है !!

टन टन टन घण्टी मंदिर की ,
नहीं जगाती अब है !
घर में बजते हैं अलार्म अब ,
सुबह जगाती कब है !
अपनों से नाते हैं बदले ,
शीतल सी वह छांव कहाँ है !!

परिवर्तन देखे हैं हमने ,
बहुतेरे स्वीकारे !
जातिभेद और घटी अशिक्षा ,
प्रीत न है हर द्वारे !
पहले चलती थी अपनी अब ,
घरवाली का पांव यहाँ है !!

खुशियों का बंटवारा सीखें ,
हंसते सदा रहे हम !
अपनापन केवल बांटें हम ,
दूजी बांह गहे हम !
आज पराये अपने कर लें ,
मित्र कहो वे दाँव कहाँ हैं !!

स्वरचित / रचियता :
बृज व्यास
शाजापुर ( मध्यप्रदेश )

तब और अब

इक ओर बचपन खेल रहा है
हर बाधा को ठेल रहा है
इक ओर बुढा़पा दस्तक देता 
आई विपदा झेल रहा है।

इक ओर दिखता ऊर्जा स्त्रोत
नित नये उत्साह से ओतप्रोत
इक ओर दिखती रीती गागर
धुँधली होती जाती ज्योत।

जीवन के यह कैसे रुप 
शीतल छाँह जलती धूप
मनुष्य तेरी हिप हिप हुर्रे
हिप हिप हुर्रे हिप हिप हूप।

यौवन काल में लिखा था यह सत्य

स्व रचित
सुमित्रा नन्दन पन्त

मन भावों के मोती
दिनाँक-20/07/2019
शीर्षक-नटखट बचपन 

🙏🏻🌹🌹🌹🌹🙏🏻
बचपन के खेल निराले
गुल्ली डंडा आँखमिचौली।
उछलकूद हँसी खुशी से
खेले हम हमजौली।
🌷🌷🌷🌷🌷🌷
याद पुरानी सब बचपन की 
अब भी मन में ताजा।
कहती अम्मा शाम हो गई
अब तो घर पर आजा ।
🥀🥀🥀🥀🥀🥀
बड़े प्यार से भर बाँहों में
कितने लाड दिखाती
लोरी देकर थपकी देकर
अम्मा मुझे सुलाती।
🌺🌺🌺🌺🌺🌺
चला थाम कर हाथ पिता के
पथ पर चलना सीखा।
प्रथम गुरु माँ बाप मेरे
जीवन का मिला सलीका।
🌸🌸🌸🌸🌸
खेल खेल में बनते बंदर
चलें चाल मस्तानी ।
बचपन तो बचपन था जिसमें
करते हम मनमानी।
🌷🌷🌷🌷🌷
स्वरचित
अशोक कुमार ढोरिया
मुबारिकपुर(झज्जर)
हरियाणा

नमन भावों के मोती
20 जुलाई 19 शनिवार
विषय-बचपन,बुढापा
विधा-बाल कविता
💐💐💐💐💐💐
अटकन मटकन दही चटकन
मधुर यादें सता रही बचपन
नाजो नखरे नटखट नर्तन
सुघर सलोना सुन्दर बचपन
नव उमंग नव उल्लासों वाला
अकड़म बकड़म अल्हड़ बचपन
चंचल चपल प्यारा बचपन
तीनों कालों में न्यारा बचपन
पांच दस पन्द्रह बसन्तागमन
देखते देखते बीता बचपन
बीता लड़कपन बीती जवानी
दर्शन को फिर आतुर बचपन
बुढापा थक कर चूर चूर कहे
लौटकर फिर आ नन्हा बचपन
💐💐💐💐💐💐
श्रीराम साहू अकेला
💐💐💐💐💐💐
भावों के मोती दिनांक 20/7/19

नटखट बचपन / नटखट बुढापा

नहीं सोचा था 
बचपन में 
बुढापा आऐगा 

कागज की नाव 
बुढ़ापे तलक 
लकड़ी की 
हो जाऐगी 

मम्मी पापा की
फटकार 
अब यादें 
रह जाएंगी 

मास्साब 
की छड़ी 
निशान 
छोड़ जाएंगी 

बचपन में 
स्कूल की टाटपट्टी 
खींचन कर गिराना
बुढ़ापे तलक
अपनों को 
गिराने का
शौक बन जाऐगा

बचपन में 
मालपुआ 
खाने की पसंद 
बुढ़ापे में 
फीके खाने तलक
आ जाऐगी

बुढ़ापे में तो 
नटखट बचपन
याद आऐगा 
है विडम्बना यही
बचपन में 
नटखट बुढापा
याद आता नहीँ 

स्वलिखित 
लेखक संतोष श्रीवास्तव भोपाल

शुभ संध्या
।। बचपन/पचपन ।।
तृतीय प्रस्तुति

गाँव में एक भालू आया 
भालू ने करतब दिखाया ।।

भालू देखा पहली बार 
खुशी मिली मुझे अपार ।।

हाथी से मैं डरता था 
गली से जब गुजरता था ।।

कुत्ते उन्हे भैंकते थे 
मन में प्रश्न कौंधते थे ।।

पूछें जब दादा से हल 
टालें वो कल कल कल ।।

बचपन के सवाल सारे 
आज भी खड़े द्वार हमारे ।।

स्वान को ही क्यों नफरत
क्यों उसकी है ये फितरत ।।

जब किये सवाल टेड़े
दादा मेरे गुस्से में हेरे ।।

अभी से न दुनिया जान
बचपन होता है वरदान ।।

चाहूँ तुझे रखना नादान 
काटे न तूँ बड़ों के कान ।।

यही मेरी सच्ची सीख 
ज्यादा ज्ञान भुलाये प्रीत ।।

बेटा बहुत प्रश्न हैं उलझे 
जो नही सुलझाये सुलझे ।।

मैं चाहूँ तूँ जिये बचपन
तूँ बात करे ज्यों पचपन ।।

वाह 'शिवम' दादा की बातें 
मेरे लिये वो बनी सौगातें ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 20/07/2019

नमन मंच 
“ भावों के मोती “
20.7.2019
शनिवार 
आज का शीर्षक -

“नटखट बचपन
नटखट बुढ़ापा “

विधा - ग़ज़ल 

प्रथम प्रयास 
🙏
एक ग़ज़ल 

बचपन दूर कहाँ होता है 
सपना चूर कहाँ होता है ।।

हर पल के सपने अपने हैं
रब को मंज़ूर कहाँ होता है।।

कुछ शेष बचे,कुछ पूरे हैं
सब भरपूर कहाँ होता है ।।

#नटखट बचपन मजबूर कभी
बुढ़ापा मजबूर कहाँ होता है।।

#नटखट बुढ़ापा बचपन सा,
जीवन से दूर कहाँ होता है।।

दोनों नटखट ,दोनों पागल
रब का ही नूर वहाँ होता है।।

देखा ‘ उदार ‘ हमने ऐसा
बचपन भरपूर वहाँ होता है।।

स्वरचित 
डॉ० दुर्गा सिन्हा ‘ उदार ‘

नमन भावों के मोती 🌹🙏🌹
20-7-2019
विषय:-नटखट बचपन / नटखट बुढ़ापा 
विधा :- पद्य

जब आती है वृद्धावस्था , 
नटखट मन पर लगता ताला ।
दादी जी जब करें शरारत , 
बहू मारती व्यंग का भाला ।

नहीं सोचते वो भी इक दिन ,
होंगे बूढ़े और लाचार ।
तरसे गी बचपन को वय तब ,
होंगे बूढ़े पर नहीं बीमार ।

मन जब बचपन में लौटता ,
बुढ़ापा स्मरण नहीं रहता है ।
नटखट बचपन की स्मृतियों की ,
खिड़की खोल कुछ कहता है ।

शाखामृग बन जाता नटखट , 
स्मृतियों की शाखाएँ झूलता ।
सब बच्चों की सब शरारतें , 
बूढ़ा नटखट बन के भूलता ।

स्वरचित :-
ऊषा सेठी
सिरसा 125055 ( हरियाणा )

नमन भावों के मोती 🌹🙏🌹
२०-०७-२०१९
!

िन वो अच्छे थे या बुरे थे टल गए,
पल जवानी के थे बुढ़ापे में ढल गए,
अब न वो शै: रही न रवानी रगो में,
पर परिंदे के वक़्त की धूप में जल गए !!
!
बचपन बूढा होता है, या बूढा बचपन होता है 
इस पहेली में मानस अपना जीवन खोता है
खोई अपनी मदमस्त,अल्हड़,अठखेलियों में 
नादाँ जवानी क्या जाने, दोनों का मन रोता है !!

बचपन निहारे बूढ़े को उम्मीदे भारी पाने को 
बूढ़ा बेबस कैसे समझाए अपनी लाचारी को,
बचपन खोया संग जवानी फिर भी खाली हाथ,
खोज रहा हूँ फिर से बचपन खुशियां पाने को !!
!
स्वरचित : डी के निवातिया


विषय:-नटखट बचपन / नटखट बुढ़ापा ( बाल कविता )
विधा :- पद्य

दादी दादी मैं भी अपनी ,
गुड़िया का ब्याह करुँ गी । 
गुड्डा लेकर आए गी राधा ,
स्वागत बारात मैं करूँ गी ।

सुनते ही गुड़िया के ब्याह की , 
दादी को सब याद आ गया ।
साठ वर्ष पीछे जा पहुँची , 
ब्याह रचाना याद आ गया ।

जा पहुँची दादी बचपन में , 
लाठी दूर चला कर मारी ।
पहले मुझे दहेज दिखा दे , 
फिर खाने की करें तैयारी ।

हैरानी से बहू ने देखा , 
करते सासु को सब तैयारी ।
गुड्डा देखा जब घोड़े पर ,
आई बिजली सी होशियारी ।

चलो चलो सब द्वार पे पहुँचो , 
दादी ने की बारात अगुवानी ।
राधा और बाराती भौचक्के ,
जाए नहीं उनकी हैरानी ।

पहले रिबन दूल्हा काटे गा ,
फिर चम्पा दूल्हे पर वारे पानी ।
दादी गुड्डे से रिबन कटवा कर , 
पोती को कहती पी ले पानी ।

गुड्डे गुड़िया को वरमाला पहना ,
दादी पीट रही थी ताली ।
नाच उठी थी दादी ब्याह में , 
व्हील चेयर रखी थी ख़ाली । 

स्वरचित:-
ऊषा सेठी
सिरसा 125055 ( हरियाणा )

भावों के मोती
शीर्षक- नटखट बचपन
जब नटखट बचपन याद आता है,
दिल फिर से बच्चा बन जाता है।
बात-बात में जीद पे अड़ जाता है।
परेशान करके सबको बड़ा सुकून पाता है।
कभी ये चाहिए तो कभी वो चाहिए।
कभी यहां जाना है कभी वहां जाना है
कभी चाट पकौड़े खाने को
कभी रबड़ी जलेबी पे मन ललचाता है
दिल फिर से बच्चा बन जाता है।
स्वरचित- निलम अग्रवाल, खड़कपुर

भावों के मोती 
सांध्य नमन् 
कलम चलाने का एक प्रयास 

बचपन आया सभी को भाया 
करते दुलार नहीं कोई पराया
ये जाऐ तो लौटकर नहीं आयें 
यादों का महल सदा साथ पाया

बचपन जाता है सरर सरर
जवानी ढूंढे नई-नई खबर
मजे मार ले अभी वक्त है सही
बुढ़ापा आ रहा ढ़ाने को कहर

मुकेश भद्रावले 
हरदा मध्यप्रदेश


विषय-नटखट बचपन

नटखट बाल कृष्ण
बड़ा नटखट है रे 
किशन कन्हैया 
स्वांग रचइया 
ताक झांक करे 
टोह लगावे ,
कहां मैया दधी छुपावे 
कंही जाय अगर
सखीयन संग बाहर,
चटक चटक 
माखन खाऊँ
ग्वाल बाल सब 
बाट जोवते 
उन्हे बुलाऊँ
धाय-धाय सब को 
दूध मही पिलाऊँ,
गोरो गोरो 
नवनीत खिलाऊँ 
फिर उन संग मिल 
खेलन जाऊँ 
धोरी कारी गैया 
लेई-लेई वन जाऊं
जमुना तट चढी कदम्ब 
बंसी बजाऊं
सांझ ढली गैया ले 
घर आऊं 
मैया की गोदी 
सर धरी सुख नींद
सोई जाऊं।
स्वरचित।

कुसुम कोठारी।

विधाःः काव्यःः

अरमान धरे रह जाते हैं कुछ के तो
यदि घर आंगन में बालक नहीं खेले।
हमें नटखट बचपन बहुत सुहाऐ,
सचमुच उछलकूद घर चौवारे खेले।

मुस्कान इनके विश्वास की द्योतक,
मानें हमें हमारे अवश्य संभालें।
कुछ नटखट बच्चे पानी में कूदते
पता उन्हें हमें अपने बडे निकालें।

अपने बूढे बच्चे झुंझलाते कहीं तो,
कभी चेहरे पर मुस्कान सी खिलती।
जल्दी कहीं अगर आ जाऐ बुढापा,
न अरमान खुशी मुखडे पर दिखती।

आऐ लडकपन नटखटपन सब में
हर मानव मन प्रफुल्लित होता है।
बचपन और बुढापा जीवन में आए,
हर जन मन नहीं मुस्कित होता है।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
जय जय श्री राम राम 

2भा.#नटखट बचपन, नटखट बुढापा#

******नटखट बचपन******
*** और गरीबी***

नटखट बचपन हमें रोने ना दे,
हंसने भी ना दे भूख गरीबी की,
गैरों को हम कैसे अपना कहें,
कभी मिली ना मदद करीबी की,

जन्म से दरिद्रता विरासत हमारी,
परवरिश भी मिली अभाव में,
दुख और अवसाद के मारे हैं हम,
अनिश्चितता ही मिली स्वभाव में,

सुरक्षित हैं बच्चे सभी अमीरों के,
किसे परवाह है हमारी इक्षा का,
मुफलिसी बन गया भाग्य हमारा,
दुर्भाग्य ही विषय है प्रतीक्षा का, 

ना खेलकूद ना और ना लाढ़ प्यार,
शरारत ना भाग्य में स्कूली शिक्षा,
पेट की आग में जलता बचपन,
जिंदगी लेती है कठिन परीक्षा
शीर्षक :- नटखट बचपन/नटखट बुढ़ापा

आँगन खेलता लल्ला...
दादू दादू का करता हल्ला...
शोरगुल से चहचहाया आँगन..
शरारतों से खिलता उपवन..
कुछ यूँ याद आ गया बचपन..
घोड़ा बनाता दादू को..
जुबां चिढ़ाता दादी को..
खटरपटर करता दिनभर...
शरारत से आह्लादित होता मन..
कुछ यूँ याद आ गया बचपन..
पहन चश्मा दादू का...
रौब जमाए दादी पर..
मम्मी पापा फटकार लगाए...
झट से दादी की गोद आए..
देखकर नटखट लल्ला की हरकत...
कुछ यूँ याद आ गया बचपन...
करता सदा वह मनमानी...
तरह तरह के मुंह बनाए...
सबकी करता नकल वह...
खुशियाँ लहलहाती दामन..
कुछ यूँ याद आ गया बचपन..

स्वरचित :- मुकेश राठौड़

नमन -भावों के मोती 
तिथि - 20-07-2019
विषय - नटखट बचपन /नटखट बुढ़ापा 

एक कविता ...

बचपन तो बचपन होता है 
जहाँ कोई फ़िक्र नहीं ,
मस्ती सदा छाई रहती है 
बचपन के खिलते मौसम में 
बचपन तो बचपन होता है ,
लो आ गई छुट्टी गर्मी की 
मिली मुक्ति पढ़ाई से ,और 
गये घूमने घर , दादा --दादी 
और , नाना --नानी के जहाँ 
मचाई खूब धमा चौकड़ी 
वहाँ देख कर अच्छा लगा 
कि --लौट कर आया उनका 
बचपन फिर से एक बार ...,
संग हमारे ....., मिलकर 
साथ साथ हमारे,खेल खेल कर 
मानो वो जी रहें हो कुछ पल को 
अपने बचपन को संग हमारे ,
बचपन तो बचपन होता है 
चाहे ,वो हो बालपन या बुढ़ापा...||

शशि कांत श्रीवास्तव 
डेराबस्सी मोहाली ,पंजाब .

सादर नमन
नटखट बचपन/नटखट बुढ़ापा
खेल रहा है बचपन देखो,

दादा-दादी की बाँहों में,
खुशियाँ बिखेरनी हैं,
इनकी राहों में,
बाल हठ और पचपन का बचपन,
महफिल अपनी जमाए हैं,
इन नन्हें सितारों को,
प्रेम से अपने चमकाए हैं,
रूठ कर दादा का बैठना,
दादी को सताए है,
लेकर खिलौना बचपन चला,
नटखट बुढ़ापा खिलौना छिपाए है,
जवानी की भागदौड़ में,
सुनहरे लम्हें जो गवाएँ थे,
पौत्री के बचपन के साथ,
सपने सारे सजाए हैं।
**
स्वरचित-रेखा रविदत्त
20/7/19
शनिवार
 "क्या हुआ हूं, और मैं क्या होना चाहता हूं। 
फिर से बच्चा बन के मै खिलौना चाहता हूं। 


घर के आगंन मे थी बिखरी हंसी की रोशनी। 
उन खुशी की लडियों को पिरोना चाहता हूं। 

माँ की गोदी से कोई शै, मुझे प्यारी नहीं थी। 
खोई उस जन्नत को फिर से पाना चाहता हूं। 

जिसने चलना सिखाया, चल के मिलने जाऊँ। 
बाबा के कंधे चढ ऊंचा सबसे होना चाहता हूं। 

कितनी यादें बह के आई आसुंओ के साथ मे। 
भाई-बहन संग एक थाली में खाना चाहता हूं। 

रूठ कर बिछडे मेरे अपने, बड़े सब क्यों हुए। 
टूट कर बिखरे ये मोती सब संजोना चाहता हूँ। 

लिख रहा हूँ जाने कैसे हाले दिल मत पूछिये। 
रोके रुके न अश्क, दामन भिगोना चाहता हूं। 

फिर से बच्चा बन के मै खिलौना चाहता हूं। 
फिर से बच्चा बन के मै खिलौना चाहता हूं।

विपिन सोहल

विधा---मुक्त 
******************
था बचपन अल्हड़ नटखट 
वो भरी दुपहरी घर से बाहर
पेड़ों पर की बंदरकूद
और वो झूलों की लंबी पींग 

बस अलमस्ती का आलम था 
खेलकूद और पढ़ाई दोनों का
अजब संतुलन था
गुल्ली डंडा, गुलाम लकड़ी 
कंचों और पतंगो में ही मनमस्त था

आई बेला पचपन की 
लिए बुढ़ापा साथ में 
फिर याद आने लगी 
बचपन की अल्हड़ता

सोए ख्वाब फिर जाग गये
वो नटखट पल फिर याद रहे
अपने नाती पोतो के संग 
फिर जीवंत वो पल हुए 

काम का बोझ कुछ कम हुआ 
कांधे पर जिम्मेदारी का भी
अब इतना दाब ना रहा
मन में बस उल्लास रहा

बचपन और बुढ़ापा फिर 
एक हो गया 
दोनों का नटखटपन घरभर
के नाक में दम भर रहा। 

डा. नीलम

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"कांच /शीशा ""10अक्टुबर 2019

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