Saturday, July 27

"मेहंदी /हिना "24जुलाई2019

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ब्लॉग संख्या :-456


दिनांक 24/07/2019
विषय मेहंदी

शीर्षक कविता

दूधिया हाथ मे,चांदनी रात मे,
बैठकर यूँ न मेहंदी रचाया करो
सुखाने के बहाने इस तरह
तुम चाँद को मत जलाया करो

सोचता हूँ कैसे महकने लगता है
बदन इसलिए गीत ख़ुश्बू भरे
तालियों से गवाह देता सदन
भूल जाते है अपनी हँसी फूल 
सब सामने उनके सामने मत मुस्कुराया करो।।
✍️✍️
@हार्दिक महाजन


नमन मंच भावों के मोती
शीर्षक मेहंदी, हीना
विधा लघुकविता

24 जुलाई 2019,बुधवार

मेहंदी पिसती है पत्थर पर
फिर उसमें आती है लाली।
सच्चा स्नेह सजना सजनी में
मेहंदी कर बन जाती काली।

ललनाओं का प्रिय सृंगार है
हाथ सजाती और दिखाती।
साथ सहेली सदा बैठकर
भिन्न विभिन्न वे चित्र बनाती।

हिना कर कमलों की शौभा
यह सौभाग्य प्रतीक चिन्ह है।
लाल रंग है स्नेह उदाहरण
अमरप्रेम का चिन्ह अभिन्न है।

व्रत उपवास करने से पहले
तीज गणगौर रक्षा बंधन पर।
हिना बनती कर प्रिय शौभा
परम ईश प्रभु के वंदन पर।

स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम


 शीर्षक-- मेहंदी/हिना
प्रथम प्रस्तुति


लगाती होगी हाथों में हिना 
लिखती होगी वो मेरा नाम ।।

खुशी में झूमके फिर चूमती 
होगी उसे सुवह और शाम ।।

उसका अल्हड़पन उसका
रूप मेरे लिये रब का ईनाम ।।

मेहंदी की मादकता क्या
बताऊँ छलके हाथों जाम ।।

हाथ की ऊंगली ज्यों डूबी 
पैमाने में नशा होना आम ।।

सुन्दर सजीली नशीली है
वो ज्यों 'शिवम' दर्द की बाम।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 24/07/2019

दिन बुधवार
दिनांक 24.7.2019

मेहन्दी माहात्म्य
☆☆☆☆☆☆☆☆

मेहन्दी आयोजन की ही खूबी थी,
हर महिला मेहन्दी में डूबी थी,
यह मेहन्दी की ही आहट थी,
हर महिला के होठों पर मुस्कराहट थी,
मेहन्दी रच जाने पर थे उनके विजयी भाव
एक दूसरे के प्रति थे पूरे सदभाव,
मेहन्दीमय शाम थी,
ललनाओं के नाम थी,
गरिमा भी नाम कर गई,
और शालिन शाम कर गई।

मेहन्दी !सुन्दर विधा श्रंगार की,
मेहन्दी ! सौन्दर्य के उदगार
की,
मेहन्दी ! सौन्दर्य का अनुपम उदबोधन,
मेहन्दी !हर ललना का अनुमोदन,
मेहन्दी ! भाव समन्वय का,
मेहन्दी ! उत्साह हर वय का,
मेहन्दी ! मधुर धुन है उत्सव की,
मेहन्दी ! रूनझुन खुशियो के भव की,
मेहन्दी ! शुभारम्भ है उत्सव का,
मेहन्दी ! प्रारम्भ है नव नव का।
मेहन्दी ! मेल मिलाप का इक मण्डप है,
मेहन्दी ! सौहार्द प्रेम का अनुपम जप है।
मेहन्दी ! की भाषा विलक्षण है,
मेहन्दी ! माधुर्य निमन्त्रण है,
मेहन्दी !अपना रंग भरती है,
मेहन्दी !सबमें उमंग भरती है।

स्वरचित
सुमित्रा नन्दन पन्त


हिना

बहुत खूष थी हिना,
जब टहनियों से ,
अलग होकर ।
बंद हो रही थी ,
एक बॅग में ।
सोच रही थी मन में ।
होके खुद बरबाद ।
करुंगी किसी को अाबाद ।
सम्मिलित होकर व्याह में ।
बैठूगी दुल्हन के हाथ पर ।
तारीफ होगी,
मेरे रंग की,उसके रुप की ।
खूष थी हिना ।
हुवा वैसा,चाहा जैसा ।
गोरे हाथो पर सज़कर,
ससुराल गई गोरी -हिना,
साजन की तारिफ,
फिर एक बार खूष 
गोरी- हिना ।
कुछ दिन बाद,
दहेज लोभीयों ने,
सुख चैन छिना ।
गोरी के हाथो से,
ना निकली थी हिना ।
जली गोरी एक दिन ।
सह रही थी,दर्द दोनों ।
रो रहीं थी हिना अब,
टहनियों को छोड़कर ।
समा गई गोरी अंत में,
अपने बाबूल को छोड़कर ।

@प्रदीप सहारे


दिनांक .. 24/7/2019
विषय .. मेंहदी

***********************

सोलह कर श्रृँगार सजनिया, अपने पिय के द्वार चली।
हाथ मे मेंहदी पाँव महावर, बाबुल का घर छोड चली॥
बिलख रही है सखी सहेली, बिलख रहे है मात-पिता।
पति के पदचिन्हों पें चलकर, पिय के घर वो आज चली॥
**
जिस घर मे वो पली बढी थी, अब तो वो ना उसका है।
जन्मभूमि अरू कर्मभूमि मे, ये कैसा विधि बन्धन है ॥
जिनको अब तक अपना माना, वो बस नाम के अपने है।
हाथ की मेंहदी पाँव महावर, सिन्दूर ने जीवन बदला है॥
**
भारत की नारी का जीवन, ऐसी अलग कहानी है।
गंगा गाय अरू तुलसी जिसमे, ऐसी जीवन वानी है॥
शेर कहे मन मार के रहती धर्म की जो अनुरागी है।
भारत मे यदि धर्म है जिन्दा, नारी ही जीवनदायी है॥
**
स्वरचित एंव मौलिक 
शेर सिंह सर्राफ




नमन-भावो के मोती
दिनांक-24/07/2019


आ गए दिन सावन के

मेहदी लगाकर श्रृंगार किया

क्या थी ऐसी अथाह वेदना 

क्यों तूने मेरा तिरस्कार किया

सानिध्य की थी मैं प्यासी तेरी

मृगनयनो की तासी थी मैं तेरी

हर्ष हमारा क्यों छीना तुने

प्रेम संसर्ग को क्यों बेधा तूने

एक ठिठोली खिलती थी

स्पर्श तुम्हारा रंगीली थी

अखियां मेरी छबीली थी

बैरन रतिया नशीली थी

प्रत्येक पहर मेरे रैना बिन तेरे कैसे रहेंगे

मधुयामिनी की बैरन स्मृतियां कैसे सहेंगे

प्रथम मिलन की मधुर स्मृति थी

कैसी तेरी निष्ठुर ठिठुर कृति थी

बिस्तर की हर सिलवट पर महक तुम्हारी आती थी

विरह वेदना का आघात सहूगी मैं अपने मन पे

क्यों तुम छोड़ गए मुझे वृद्धावस्था के यौवन पे

निर्जीव देह रह गई मात्र श्वासों के ऋण तन पे
मौलिक रचना
स्वरचित....
सत्य प्रकाश सिंह केसर विद्यापीठ इंटर कॉलेज प्रयागराज


मन मंच"भावों के मोती 
दिनांक-24-7-2019
विषय-हिना/ मेहंदी

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*सावन *
समांत - आरा<> अपदांत 
गीतिका 
,राधिका छंद पर,,
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प्रथम चरण दोहा का -१३ मात्रा किंतु यति गुरू लघु,,दूसरा चरण ९ मात्रा अंत दोगुरूआवश्यक है,
"सावन आगमन"
🌾🌾🌾🌾🌾
🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀
🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
सावन की झरैं फुहार,,स्वाति जल धारा !
पावस की मधुर बहार,,,,,पवन मतवारा !
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महकै #महँदी चहुंओर,,,गमकता उपवन,
फूलैं नवरंगी फूल,,,,,,,,,चमन हरियारा !
**
करतीं सजनी बरजोर,,पिया सँग चहकैं,
रच गईं #मेहँदिया लाल,,,मगन दिलदारा!
**
मद मस्त नाचता मोर,,देखि घन छावत,
पिक,मोर पपीहा बोल,,,,,करैं गुलजारा!
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झंकृत है'तान-मल्हार,,गावती सखियाँ,
प्रीतम सँग झूलैं नारि,,,,,सजनवा न्यारा !
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हरि-धानी चूनरि धारि,,,,,,धरा मुस्काए ,
देता धरणी को प्यार,,,जलद घन प्यारा!
**
मन-वीणा" गावत गान,बदरिया बरसौ,
सब सखियाँ हुईं विभोर,बजै करतारा !!!!
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🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀
ब्रह्माणी वीणा हिन्दी साहित्यकार
#स्वरचित सर्वाधिकार #सुरक्षित

दि- 24-7-19
विषय- मेंहदी / हिना 
सादर मंच को समर्पित --


😡🌹 मुक्तक 🌹😡
*************************
🍀 मेंहदी/हिना 🍀
🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

चाँद मुबारक, खिली चाँदनी ,
दिल धड़कन बढ़ी है ।

मेंहदी लगे हाथ थिरक रहे ,
पिय से मिलन घड़ी है ।

खुशी सुहानी , संगीत बहे , 
मीत भी सध-बुध खोये --

अमृत राग घुले तन-मन में ,
उर आलिंगन कड़ी है ।।

🌹🌻🍀🌷

सुन्दर हिना शोभित कदम प्रिय , 
मोहक पैंजनिया पहनत है ,

हाथनि मेंहदी रची सुन्दर ,
ध्यान लगाय पइयाँ उठत है ।

भाग्यवान वे नैना मगन हो , 
सुछवि निरखत , सुनि धुनि मन मोहे ,

नथुली छवि मुख पहरावन सोहि ,
प्रिय को बहुत पनिया उमड़त है।। 

🌹🌾🌸🍀🌻🌿🌷

🌻🌿🌿 ***....रवीन्द्र वर्मा आगरा 


 नमन-भावो के मोती
द्वितीय प्रस्तुति 
दिनांक24/07/2019

विषय-मेहंदी

मेहदी रहे सबका अखंड........
बिंदिया चमके सदैव प्रचंड

दमक लालिमा की सुर्ख महावर
मध्य मांग में भरे सिंदूर
मैं पिया की अमिट एक बंधन बन जाऊं........
कर के आऊं जब मैं सोलह श्रृंगार
गेसू में महके गजरे का प्यार
मैं पिया के मस्तक का चंदन बन जाऊं........
लालिमा मेरे अधर की
ओढ के माधुर्य का चादर
मैं पिया के नैनो का अंजन बन जाऊं.........
बन के दमकूँ मै कुमकुम सी
मधुर मोहिनी सी गुनगुन
मैं पिया के कुंडल का कुंदन बन जाऊं........
रूप रस रची गंध की
भ्रमर गुंजित मदमस्त सुहाग
मैं प्रीत पिया की पावस अभिनंनदन बन जाऊं...
पैरों में ठहरे दस्तूर महावर
पायल की हो झंकार
मैं पिया के की दहलीज बंधन बन जाऊं..............

स्वरचित
@# सर्वाधिकार सुरक्षित
सत्य प्रकाश सिंह केसर विद्यापीठ इंटर कॉलेज प्रयागराज


वीर जवानों की गाथा आज सबको मैं सुनाता हूँ।
मैं उनकी ही आज़ादी में लेता साँस हूँ।
मैं भारत माँ के प्रणय हेतु,करता अहसास हूँ।
मैं गाकर गाधा वीरों की मन से मुस्कुराता हूँ।
वीर जवानों की गाथा आज सबको मैं सुनाता हूँ।

वीर जवानों की गाथा आज सबको मैं सुनाता हूँ।
मेहंदी भी न उतरे जिन हाथों की उसे विधवा होना पड़ता हैं।
क्या सुनाऊँ अमर वीर जवानों की गाथा मैं फ़ौजी नहीं होते वो शहीद उनके पीछे उनके परिवार का बलिदान होता हैं।
बहन के हाथों राखी बाँधी वो कलाई खुल जाती हैं।
वीर जवानों की गाथा आज सबको मैं सुनाता हूँ।

वीर जवानों की गाथा आज सबको मैं सुनाता हूँ।
तिरंगे में लिपटी वीर जवान की साँसें जो,
तिरंगे में लिपटी वीर जवान की साँसें जो,
तिरंगे में वीर जवान मेरा जो शहीद हुआ।
वो तिरंगा मेरे वीर जवान पर ही दर्शाता हैं।
वीर जवानों की गाथा आज सबको मैं सुनाता हूँ।

वीर जवानों की गाथा आज सबको मैं सुनाता हूँ।
जम्बू कश्मीर पर पांव धरे,भरी जवानों ने हुँकार,
गूँजने लगा अंबर अब कांपने लगे दुश्मन सब,
सुनकर मेरे वीर जवानों की ललकार कांपे सारे दुश्मन।

वीर जवानों की गाथा आज सबको मैं सुनाता हूँ।
वीर जवानों की गाथा आज सबको मैं सुनाता हूँ।

सबसे बड़ा प्यार ये हैं।।
क्या आपमें है इतना प्यार।।

✍️✍️
@हार्दिक महाजन


मेंहदी/हिना
द्वितीय प्रस्तुति
💐💐💐💐
हाथों की शोभा बढ़ाती है,
ये मेंहदी है,रंग लाती है।
जैसे भी इसकी डिजाइन दो,
ये हाथों में वैसे हीं सज जाती है।

सबके हाथों में सजती है,
पिसकर ये रंग लाती है।
फिर भी कभी उफ्फ नहीं करती,
ये हसीनाओं को सजाती है।

शादी हो या कोई त्योहार,
सबमें सजता इससे रूप, श्रृंगार।
जब ये हाथों में सज जाती है,
ललनाएं इठलाती है।

वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी
स्वरचित


दि.24/7/19.
शीर्षकःमेंहदी/हिना
*
दुख-सुख रहस्य विग्यान बिना ,
है सुकवि सयाना बना कौन?
जो दे न सके - मुस्कान किरन,
उस अनुगुंजन से भला मौन।
किलकती कनक की कान्त किरण,
गहरा उत्ताप - ताप सहकर।
मादक मेंहदी का वर्ण सुघर,
खुल-खिलता आब-दाब गहकर।।
-डा.'शितिकंठ'


भावों के मोती
24/07/19
विषय-मेंहदी

बरस ऋतु सावन की आई 

अल्हड़ शरमाती ,इठलाती ,
मेंहदी रचे हाथों में 
बरसता सावन भर
मुख पर उड़ाती ,
हाथों में चेहरा छुपाती 
हटे हाथ , निकला 
ओस में भीगा गुलाब ।
संग सखियों के जाना 
पाँव में थिरकन , हृदय है झंकृत
तार-तार मन वीणा बाजत ,
रोम-रोम हरियाली छाई
सरस ऋतु सावन की आई ।
डाल-डाल पर झुले सज गये ,
आ सखी पेग बढ़ाएं ,
रुनझुन पायलिया झनकाएं
छनक-छनक गाए ,
गीत सुनाए, जिया भरमाए
नींद चुराए ।
चारों ओर छटा मनोहर छाई
बरस ऋतु सावन की आई ।

स्वरचित
कुसुम कोठरी ।


शीर्षक:-मेंहदी/हिना
🌿🌿🌿🌿🌿🌿
लगा के पिया के नाम की मेहंदी
गोरी अपनी ससुराल चली 
आंखों में सुहाने सपने सजाए
डोली में हो सवार चली..

बड़ा ही चटक रंग आया था हिना का
सखियां छेड़े खूब प्यार मिलेगा सजना का
मंद मंद मुस्काए दुल्हनियां
डोली में हो सवार चली...

मेंहदी का रंग भी न छूटने पाया था
कि ससुराल वालों ने कहर बरपाया 
मेंहदी लगे हाथों संग नई दुल्हन 
दहेज की आग में जली...

✍️वंदना सोलंकी©️स्वरचित


24/7/19
भावों के मोती
विषय- मेहंदी/ हिना
____________________
टूटकर बिखरती मेहंदी,
फिर भी नहीं मिटती मेहंदी।
पिस-पिस पत्थरों से,
हाथों में रचती हैं मेहंदी।

हमारी संस्कृति है मेहंदी,
सुहागिन का श्रृंगार है मेहंदी।
मेहंदी बिन नारी शोभा अधूरी,
सावन की तीज है मेहंदी।

बहनों का प्रेम है मेहंदी,
भाईयों की उम्र की दुआ है मेहंदी।
पिया नाम रचे जब हाथों में,
दुल्हन का सुहाग है मेहंदी।

नारी का असीम स्नेह है मेहंदी,
प्रीतम का अगाध प्यार है मेहंदी।
बिना मेहंदी कोई रौनक नहीं,
त्यौहारों की शान है मेहंदी।

उत्सवों की परंपरा है मेहंदी,
युवतियों की जान है मेहंदी।
मेहंदी मिटकर भी चहेती है,
नारी के जीवन का रंग है मेहंदी।
***अनुराधा चौहान***©स्वरचित 

नमन भावों के मोती 
विषय - मेहंदी/ हिना
24/07/19
बुधवार 
कविता 

मेहंदी हाथों में अपना जब लाल रंग दिखलाती है,
सबके मन की खुशियाँ पलभर में द्विगुणित हो जाती हैं।

चहक-चहककर सब अपनी उन लाल हथेली की शोभा ,
प्रियतम से फिर मधुर प्रेम का अतुल भाव झलकाती हैं।

नवल -वधू हो या बालाएँ सबके मुख की चिर आभा,
मेहंदी के रंग के सम पल-पल और निखरती जाती है। 

पर मेहंदी के मन से कोई आज तलक न पूछ सका,
क्यों खुद का अस्तित्व मिटा वह सबका प्रेम बढ़ाती है। 

परहित में खुद मिट जाना ही उसकी जीवन - नियति है,
सबके मन को हर्षित कर ही स्वयं परम -सुख पाती है।

स्वरचित 
डॉ ललिता सेंगर


दिनांक, 24,7,2019,

औषधि भी है श्रृंगार भी मेंहदी, मेंहदी है बहार ,
लेकर आती है जीवन में मेंहदी स्वप्न हजार ।
मेंहदी सजे हाथों से जब जाती है दुल्हन पिय के द्वार,
आशाओं और उम्मीदों के झूले पर मन रहता है सवार ।
जीवन का मतलब है देना मेंहदी का है इतना ही सार,
मिटकर ही ले आती है मेंहदी खुशबू रंग और प्यार ।
नारी का जीवन मेंहदी सा समर्पण में ही है अधिकार,
त्याग के रंग से रंग दे घर को नेह की खुशबू से करे गुलजार।

स्वरचित, मीना शर्मा, मध्यप्रदेश,


दिनांक- 24/7/2019
विधा- गीत
**************
कैलाशपति शिव आज बने हैं दुल्हा, 
गौरा ने भी लगा ली हाथों में आज हिना |

नंदी की सवारी कर पहुँचे शंकर हिमालय, 
ढ़ोल,नगाड़ों की धुन से गूँज रहा देवालय |

मेंहदी से हाथों में गौरा ने शिव का नाम लिखा है, 
शिव, शक्ति संग देखो आज अटूट बंधन बँधा है |

हुआ विवाह सम्पन्न, विदाई घड़ी अब आई, 
मात-पिता की आँखों में आँसू की नदी भर आई |

बेटी खुश रहना पिया संग आशीष ये मिला है, 
मेंहदी हाथों में सजी रहे सदा हमारी यही दुआ है |

स्वरचित *संगीता कुकरेती*


नमन.मंच भावों के मोती
24 / 7 2019
बिषय ,,मेंहदी,,/हिना
कुछ कह जाएगी कुछ दिखा जाएगी
ए मेंहदी तो मेंहदी है रंग लाएगी
एक मेंहदी रचाकर बनती दुल्हन
एक सजते हैं हाथ जब आता सावन
जिन्हें देख देख मुस्कुराते साजन
लाल लाल हाथों से मन हो मगन
है चार दिन के लिए ज्यादा न टिक पाएगी
एक मीरा ने लगाई कृष्ण नाम की
वो तो हुई दीवानी श्याम नाम की
एक राधा ने रची अंग अंग में हिना
वो पल न रहें राधा के बिना
वो तो राधा श्याम की कहलाएगी
वहीं भक्ति की मेंहदी का रंग कुछ और है
जो इस रंग में सरावोर है
ए ऐसा है रंग न छूटे कभी
इसी रंग में रंग जाओ सभी
फिर त़ नैया किनारे से लग जाएगी
स्वरिचत,, सुषमा ब्यौहार


सादर नमन साथियों
तिथिःः24/7/2019/बुधवार
बिषयःः# मेंहदी/हिना#
विधाःः काव्यःः

मेंहदी रचे सुहागिन हाथों ,
लगे महावर पांवों में।
खूब सजे सजन मोहन को,
बैठी सुंन्दर छांवों में।

सखी सहेली धूम मचाऐं,
पुलकित मन के बागों में।
गजरा लगा के हर्षित होऐं
जब पहुँचे पिय की बांहों में।

हरित हरी ये हिना पीसतीं 
सिलबट्टे पर हाथों से।
स्वमेव हो जाते रक्तिम,
जब हिना पीसती हाथों से।

मेंहदी रचती बडता प्यार।
सुखी रहे सजनी संसार।
रहें सुहागिन सारी ललना,
प्रफुल्ल रहे सारा परिवार।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.


नमन् भावों के मोती
दिनांक:24/07/19
विषय:मेहंदी/हिना
विधा:हाइकु

1
पिया के संग
आयी विदायी घड़ी-
मेहंदी रंग
2
मेहंदी रची-
दुल्हन बन चली
बाबुल अश्रु
3
मेहंदी चिंता
बिटिया हुई बड़ी-
दहेज काल
4
मेहंदी रंग-
दुल्हन का श्रृंगार
हल्दी के संग
5
हरी पत्तियां
हिना परवरिश-
उत्सव रंग
6

मनीष श्री
स्वरचित
रायबरेली



भावों के मोती
24/07/19
विषय-मेंहदी 
द्वितीय प्रस्तुति

एक सूरज सा वर
ढूंढ दे री मैया मोरी ,
मां दिखा देना चूनर की
ओट से मुझे एक बारी। 

मां रंगवा देना एक
नीले अंबर सी चुनर ,
सुन ना मां ! जड़वा देना
झिलमिलाते उसमें तारे। 

मां चांद मत देना चाहे
चांदनी का गोटा लगा देना,
मां छोटा सा घूंघट डाल
मुझे भी साजन घर जाना। 

मां खनकती सतरंगी
पहना देना हाथों में चूड़ियाँ ,
याद आयेगी तेरी जब मां
मैं खनका दूंगी मेरी चूडियाँ । 

मां एक रुनझुन पायल
पहना देना मेरे पावों में ,
बजेगी जब पायल मेरी
झंकार होगी तेरे आंगन में।

मां हाथों में रचवा देना
सुरंगी" मेंहदी "सखियों से,
जब-जब हथेली देखूंगी 
सब को देख लूंगी यादों से।

मां दूर से ही मेरा होना
अनुभव कर लेना तुम ,
मुझे अपने आंचल में
भर लेना मां दो हाथों से तुम।

स्वरचित

कुसुम कोठारी।



नमन "भावो के मोती"
24/07/2019
"मेहंदी/हिना"
चोका
################
प्रीत साजन
हिना मनभावन
सजनी हाथ
भेजा पी को पैगाम
सताए याद
नैनों से बरसात
झूमा सावन
अधूरी लगे रात
जागी है आस
सरहद से पैगाम
तेरा हो साथ
थोड़े दिन के बाद
दिवस,रात
नैनों का इंतजार 
मन आतुर
बुलाए पी को पास
साजन आए
तिरंगें में लिपटे
नैना बरसे
अँसूवन से भीगे
मेंहदी हाथ
खामोश हुई हिना
सावन रोया
व्याकुल है अँगना
टूट गया कँगना ।।

स्वरचित पूर्णिमा साह
पश्चिम बंगाल ।।


(मंहदी/हिना)
**********
नारी के श्रंगार का,
मेंहदी अंग अभिन्न,
विना हिना के चारु,
रीति -रिवाज अपूर्ण।

हिनावर्ण चित्ताकर्षक,
मादक, एवम महरून,
खिल जाते उरभाव,
मनश्रंगारिक सा पूर्ण।

मेंहदी खिलता रंग नही,
अंश संस्कृति चारु,
कारक सशक्त सौभाग्य,
प्रेयसि को मिलता प्यार।

मेंहदी टीका शुभ शगुन,
प्रेम अटूट बनाये,
शीतल रक्खे गात को,
भाल अतीव सजाये।
--स्वरचित--
(अरुण)


नमन "भावो के मोती"
23/07/2019
"मेंहदी/हिना"
1
मेंहदी हाथ
प्रीत की बरसात
साजन साथ
2
मेंहदी रंग
पत्थर पे पिसके
दूनिया देखे
3
प्रीत के रंग
पत्थर करे जंग
मेंहदी संग
4
प्रेम में जीना
समर्पित है हिना
खुशबू भीनी
5
साजन प्रेम
हाथों में गहराई
मेंहदी रंग
6
हिना के रंग
पत्थर पे पीसके
खूब निखरे
7
मनभावन
सावन की मेंहदी
खुशियाँ देती

स्वरचित पूर्णिमा साह
पश्चिम बंगाल ।।


भावों के मोती
बिषय-मेहंदी
लग गई मेहंदी, मेरे हाथों में
क्यूं आ गई, पिया की बातों में
बस दो-चार ही मुलाकातों में
अब जाना होगा देश पिया के

चम-चम चमक रही बिन्दिया
छम-छम छमक रही पायलिया
ओढ़कर लाल-लाल चुनरिया
अब जाना होगा देश पिया के।

स्वरचित- निलम अग्रवाल, खड़कपुर


नमन मंच
दिनांक २४/७/२०१९
शीर्षक-मेहंदी
मेहंदी का शौक कैसे हो पूरा
माँ मेरा हाथ है अधूरा,
लगा के मेहंदी हाथों में
जाना है मुझे सजना के घर,
सुनकर मुनिया की ऐसी बातें
माँ ने दी उसे दुनियादारी की सीख।
ये तो है अमिरों के चोंचले
हम तो ऐसे ही भले
तेरे तो फिर भी हाथ अधूरे
मेरे दोनों हाथों में नही रची मेहंदी कभी
फिर भी ब्याही गई तेरे बापू के साथ
मत उदास हो बिटिया आज
लगा दूंगी पांवों में मेहंदी
लाल चुनरिया पहनकर जाना तुम
सुन्दर वर के साथ,
रखेंगा तुझे वह हथेली पर
मेहंदी बन कर उसका जीवन
महकाना तुम जीवन भर।
स्वरचित-आरती-श्रीवास्तव।

तृतीय प्रस्तुति
मेहदी...।
मेरा देश मेहंदी के रस्मों से चमकता है .....

मेहंदी के रंगों में हम नाम सनम लिखते हैं
कुमकुम की चमक से श्रृंगार निखरता है

फिर रात के आंचल में एक चांद सवरता है।
चुपचाप इशारों में एक बात प्यार की कहता है।।

एक चांद है अंबर में, एक चांद है मेरे दिल में।
श्रृंगार सनम मेरा, तेरे प्यार से सजता है।

हाथों में सजे चूड़ी, माथे पर चमके बिंदिया।
मेरी धानी चुनर में तेरा प्यार महकता है।

मेरे बिछिये पायल हर प्रीति निभा देगें।
पैरों की महावर से दस्तूर ठहरता है।

स्वरचित......।
सत्य प्रकाश सिंह केसर विद्यापीठ इंटर कॉलेज प्रयागराज


नमन "भावों के मोती"🙏
24/07/2019
िधा:-पिरामिड 
विषय:-"मेहंदी" 

(1)
है 
कला 
मेहंदी 
अलंकार 
प्रीतम प्यार 
कल्पना संसार 
त्यौहारों का श्रृंगार 
(2)
है 
मौन 
संवाद 
ओढ़ी लाज 
शर्मीली रात 
मेहंदी का साथ 
हाथों में मन बात 
(3)
है 
आग
विरह
प्रेम आस 
फीका त्यौहार
मेहंदी उदास 
पिया नहीं है पास 
(4)
है 
नारी 
मेहंदी 
खिली,हँसी 
घर की चक्की 
पिसी और रची 
प्रीत खुशबू बसी 

स्वरचित और मौलिक 
ऋतुराज दवे, राजसमंद(राज.)


नमन मंच
शीर्षक-- मेहंदी/हिना 
द्वितीय प्रस्तुति

हर हुनर है उसमें
हर कलाकार है ।
दिल ऐसे ही न 
उसका तलबगार है ।
कल देखी हिना 
क्या चमत्कार है ।
कोई दो राय न वो
कुशल चित्रकार है ।
बैठी द्वारे बोली वह
सहेली का श्रंगार है ।
हँसमुख बोलचाल 
बड़ी मिलनसार है ।
मेहंदी में न सानी
मगर तेजतर्रार है ।
नाम हाथ में रानी
वो पूरी हकदार है ।
झूमें मन देखकर 
वो ऐसी बहार है ।
देखी मेहंदी कला
जब से एक बार है ।
तब से वो जादू
दिल पर सवार है ।
एक हस्ती हुनर
उसमें हजार है ।
लगे ज्यों रब का 
खुले दिल प्यार है ।
मेरी किस्मत का
उससे सरोकार है ।
कला का पुजारी हूँ
'शिवम'कला संसार है ।
चली बात मेहंदी की
वो प्रथम दावेदार है ।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 24/07/2019

विषयः- मेंहन्दी/ हिना

आया सखी सावन का सुहाना महीना ।
सज रहीं सभी नारियां लगा कर हिना।।

रचे प्यारी को पान कु प्यारी को मेंहदी।
फिर रचातीं हैं पूरे मनोयोग से ही मेंहदी।।

अछूते नहीं लगे हैं अब तो पुरुष भी हिना।
रहते नहीं वह भी अब मेंहदी लगाये बिना।।

हो गयी अब उपरोक्त कहावत भी पुरानी ।
लगाते हैं मेहंदी अब दोनों राजा और रानी।।

डा0 सुरेन्द्र सिंह यादव
“व्यथित हृदय मुरादाबादी”
स्वरचित

भावों के मोती"
#दिनांक २४"७"२०१९"
#विषय"हिना"मेहंदी"
#विधा"काव्य"
#रचनाकार"दुर्गा सिलगीवाला सोनी"

*****सोलह श्रृंगार*****

नारी हिन्द की जब करे श्रृंगार,
मेहंदी कुमकुम महावर गले का हार,
सुहागन सजती साजन के लिए,
माथे की है बिंदिया पति का प्यार,

जितनी रचती है हाथों की मेहंदी,
उतना मिलता है साजन का प्यार,
सगुन यही है हर एक ग्रहणी का,
गजरे सा महके उसका घर परिवार,

मेहंदी रचे हाथों में खनकती रहे,
रंगीली चूड़ी और कंगन की झंकार,
लुभाती रहे सदा ही साजन को,
कजरारे नैनों की ये कटीली धार,

मंगल कामना से ये धारण करती है,
सर्व मंगल का सूचक है मंगल सूत्र,
आशीर्वचन बुर्जुगों से इसे मिलता,
दूधो नहाओ और फलों शत पूत,

नथनी झुमकों में ये लगे उर्वशी,
बिछुआ पायलिया इसके मनभावन,
कमरबन्द पहन जब बिजली गिराए,
विश्वामित्र का भी हिल उठे आसन,


मेहँदी

मेहंदी मे रचे,छिपे मेरे नाम को
रह रह अधरों से लगा लेतीं हैं
सखियां जब पकड़े है चोरी
शरमा के नजरें झुका लेतीं हैं।
कर मेरी दुल्हन सोलह श्रृंगार
देखे राह आँखों में काजल डाल
नथ तुम अधरों से मत लिपटो
अब इन अधरों पर मेरा अधिकार।

स्वरचित
अनिता सुधीर







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"कांच /शीशा ""10अक्टुबर 2019

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