Sunday, July 28

"स्वतंत्र लेखन" 28जुलाई 2019

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ब्लॉग संख्या :-460


28 जुलाई 19 रविवार
विषय-मुक्त लेखन

विधा- हाइकु
💐💐💐💐💐💐
आज का हाइकू 

1/ श्रीरामअकेला 
मुद्रा के बाज़ार में 
बिके न धेला 
2/ सूरजमुखी 
को देख,चंद्रमुखी 
बहुत दुखी 
3/ पेट की खाई 
समन्दर से ज्यादा 
है गहराई 
4/ भूल से कभी 
भूल नहीं करना 
भूल कर भी 
5/ हे राम हाय 
बेचारी जनता है 
दुधारू गाय 
श्रीराम अकेला 
बसना,छ.ग. ९४२५५७२१८४

। मेरी रूस यात्रा ।।🌻

पहला भाग :-
पहली बार बैठना प्लेन का 
नही था सफर वह ट्रेन का ।।

मुझे याद वो पंद्रह जुलाई थी
किस्मत खुश नजर आयी थी ।।

था वह बहुत पुराना ख्वाब
चमका किस्मत का आफ़ताब ।।

मिली जन्म दिन की सौगात
गुजरी थी वह प्लेन में रात ।।

तीन वर्ष की वह पढ़ाई थी 
रशियन यूँ न मुझे आयी थी ।।

हुई थी जब वो मेरी सहर
देखा था वह मास्को शहर ।।

निकला एयरपोर्ट से बाहर 
भूल गया वह रूप शायर ।।

शुरू हो गयी रशियन भाषा
मुझको लगा खुद में तमाशा ।।

द्राव्स्तवीत्ये काक जिला 
मेरे मुँह से ये शब्द निकला ।।

बोलने लगा मैं दोबरी ऊतरा 
मैं बन गया था रशियन पुत्रा 

गुडमोर्निंग हाऊ आर यू 
अर्थ जो न गया दिल छू ।।

बहुत जल्दी मैं वहाँ से ऊबा 
याद और आयी वो महबूबा ।।

यह था यात्रा का पहला पार्ट 
मैं बन गया था 'शिवम' स्मार्ट ।।

क्रमश:

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 28/07/2019


28 जुलाई 2019,रविवार

जन्म मृत्यु मध्य जीवन में 
हम स्वप्न साकार करते हैं।
यह जिंदगी चार दिनों की
निज स्वार्थ मग्न रहते हैं।

हम नश्वर हैं मृत्य सत्य है
पंचतत्व जगति सत्य है।
रैन बसेरा सा यह जीवन
माया मोह सब असत्य हैं।

रामनाम सत्य है जीवन का
रामनाम अमृतमय प्याला।
परमपिता हैं दिव्य भव्यमय
कैसा जीवन अद्भुत निराला?

चमत्कार है सुख जगति में
जितना खोजे उतना लाते।
कर्मो के बल पर ही हर जन
परमधाम सुख पद है पाते।

स्व0 रचित,मौलिक


स्वतंत्र विषय लेखन
*
-जीवन की धन्यता-

दोहा मुक्तकः
साहस-शौर्य स्वदेश-हित,जो देता तन-प्राण।
प्राण-दान से उच्चतर , अन्य कौन सा दान?
दान - आत्म कर जगत में , पाता अक्षय कीर्ति,
कीर्ति-रहित जीवन विफल,जाने सकल जहान।।
*
सुख-सुविधा के लोभ-वश,तजते नर शुचि धर्म।
धर्म-हीन कब सोचते,क्या सुकर्म - अपकर्म?
कर्म - शुभाशुभ या कहें , कर्तव्याकर्तव्य,
अकर्तव्य-वश मति-मलिन , हो जाते बे-शर्म।।
--डा.'शितिकंठ'
गोविंद प्रसाद गौतम

नमन मंच आप लोगो के समक्ष प्रस्तुत है मेरी एक रचना शीर्षक है धर्मयुद्ध... कुछ त्रुटि हो तो क्षमा करे... धन्यवाद 
********************


जीवन के इस धर्मयुद्ध मे, तुमको ही कुछ करना होगा।
या तो तुमको लडना होगा, या फिर तुमको मरना होगा।
फैला के अपनी बाँहो को, अवनि अवतल छूना होगा।
या तो अमृत बाँटना होगा, या फिर खुद विष पीना होगा।
.......
देखेगी कुछ आँखे तुमको, संसय भरी निगाँहो से।
पुछेगे कुछ लोग प्रश्न , तेरी हर बात इशारो से।
खुद पर रख विश्वास शेर फिर अच्छे दिन आयेगे,
खुद ही उत्तर मिल जाएगा , दिव्य तेरे हर कार्यो से।
........
किसको क्या कहना है जबकि, ईश्वर तेरे साथ खडा।
इस दसो दिशन्तर अरिहन्ता का, हाथ तेरे सिर पे जो रहा।
कर्म के रथ पर चढ कर तुम फिर, धर्म का अंगीकार करो।
जीवन मे जो मिला तुम्हे वो, दिल से वो स्वीकार करो।
********************
स्वरचित एंव मौलिक 
शेर सिंह सर्राफ 
नई बाजार देवरिया, उ0 प्र0


28/7/2019
विषय- स्वतंत्र लेखन

विधा- ग़ज़ल
बह्र- 212 212 212

जिंदगी मुस्कुराती रही,
धूप सी झिलमिलाती रही।

यूंँ तो मुश्किल जहां में बहुत,
कुफ्र से मांँ बचाती रही।

कारवाँ दूर से देखता,
माँ दुआएं लुटाती रही।

बदनसीबी खड़ी दूर है ,
माँ दिलासा दिलाती रही।

रोशनी शम्स की दिख गई,
हौसलों को बढ़ाती रही।

आतिशें भी फ़ना हो गई,
दोजहां मांँ लुटाती रही।

थी ख़सारा ख़सारा फिज़ा,
माँ बहारें बुलाती रही।

माँ की तौफ़ीक थी ये बशर,
ख्वाहिशें जगमगाती रही।

मांँ का दर्जा बहुत है बड़ा,
वो मुकद्दर जगाती रही।

आस औलाद की खैरियत,
मन्नतों में निभाती रही।

दर्द दामन में अपने लिए,
अश्क हरदम छुपाती रही।

शालिनी अग्रवाल
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

विषय स्वतंत्र लेखन
विधा गीत

दिनांक 28/7/19
###############

रौनकें देख हुआ हर दिल के साथ झूम लूं।
प्रीति थी भरी यूं की हर नजर को चूम लूं।।

मदहोश एक जाम सी शाम ढली ढली उठी।
डोलियाँ थीं जब चलीं लजा कली-कली उठी।। 

आश थी मिलन की औ' दिल में कुछ डरी डरी।
प्रेम, प्यार, स्वप्न से चली दुल्हन भरी भरी।।

सपने थे सजे वो की मन मचल - मचल गये।
रात तो रूकी नहीं बस दिल सहम सहम गये।।

बहार थी आई नहीं बदन झुलस झुलस गया।
होंठ सिल दिये गये की मन तड़प तड़प गया।।

सावन तो बरसा नहीं सूखा शहर - शहर रहा।
दर्द था जो दिल में घुलता जहर - जहर रहा।।

कहर वो दिये गये कि जुल्म सिहर- सिहर गये।
कह कुछ सके नहीं यूं दिल सुलग सुलग गये।।

स्वरचित 
मीनू "रागिनी"

बिषय#रामनाम,आश्चर्य# 
अभिव्यंजना,भई वाह
विधाःः काव्यःः

बहुत बडे हैं बुद्धिजीवी भई वाह।
राम नाम ही इनको आफत वाह।
कुछ अर्थशास्त्री अर्थ ढूंढते इसमें,
रामनाम आतंकी नारे लगते वाह।

श्रीराम मर्यादा पुरूषोत्तम जानें।
आदर्शपुरूष बुद्धिमान नहीं मानें।
ऐसी सोच आश्चर्य होता भई वाह,
क्यों बुद्धिजीवी ऐसे अपनी ठानें।

रामनाम तो भजन राम का भजते।
भक्त सीताराम अपने मन से रटते।
मरीअक्ल कहीं कहते जो भई वाह,
बुद्धि भ्रष्ट हुई जिन्हे राम खटकते।

मरामरा कह बाल्मीकि बने थे संत।
राम नाम की महिमा गाते साधुसंत।
रामनाम ले बिष घोले कैसे भईवाह,
प्रेम राम प्रेरणा सबके राम श्रीमंत।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
जय जय श्री राम राम जी

#रामनाम आश्चर्य#काव्यःः
भई वाह अभिव्यंजना
28/7/2019/रविवार


विषय- स्वतंत्र लेखन
विधा- ग़ज़ल
बह्र- 212 212 212

जिंदगी मुस्कुराती रही,
धूप सी झिलमिलाती रही।

यूंँ तो मुश्किल जहां में बहुत,
कुफ्र से मांँ बचाती रही।

कारवाँ दूर से देखता,
माँ दुआएं लुटाती रही।

बदनसीबी खड़ी दूर है ,
माँ दिलासा दिलाती रही।

रोशनी शम्स की दिख गई,
हौसलों को बढ़ाती रही।

आतिशें भी फ़ना हो गई,
दोजहां मांँ लुटाती रही।

थी ख़सारा ख़सारा फिज़ा,
माँ बहारें बुलाती रही।

माँ की तौफ़ीक थी ये बशर,
ख्वाहिशें जगमगाती रही।

मांँ का दर्जा बहुत है बड़ा,
वो मुकद्दर जगाती रही।

आस औलाद की खैरियत,
मन्नतों में निभाती रही।

दर्द दामन में अपने लिए,
अश्क हरदम छुपाती रही।

शालिनी अग्रवाल
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित


विषय स्वतंत्र लेखन
विधा गीत

दिनांक 28/7/19
###############

रौनकें देख हुआ हर दिल के साथ झूम लूं।
प्रीति थी भरी यूं की हर नजर को चूम लूं।।

मदहोश एक जाम सी शाम ढली ढली उठी।
डोलियाँ थीं जब चलीं लजा कली-कली उठी।। 

आश थी मिलन की औ' दिल में कुछ डरी डरी।
प्रेम, प्यार, स्वप्न से चली दुल्हन भरी भरी।।

सपने थे सजे वो की मन मचल - मचल गये।
रात तो रूकी नहीं बस दिल सहम सहम गये।।

बहार थी आई नहीं बदन झुलस झुलस गया।
होंठ सिल दिये गये की मन तड़प तड़प गया।।

सावन तो बरसा नहीं सूखा शहर - शहर रहा।
दर्द था जो दिल में घुलता जहर - जहर रहा।।

कहर वो दिये गये कि जुल्म सिहर- सिहर गये।
कह कुछ सके नहीं यूं दिल सुलग सुलग गये।।

स्वरचित 
मीनू "रागिनी"
28/7/19

विधाःः काव्यःः

बहुत बडे हैं बुद्धिजीवी भई वाह।
राम नाम ही इनको आफत वाह।
कुछ अर्थशास्त्री अर्थ ढूंढते इसमें,
रामनाम आतंकी नारे लगते वाह।

श्रीराम मर्यादा पुरूषोत्तम जानें।
आदर्शपुरूष बुद्धिमान नहीं मानें।
ऐसी सोच आश्चर्य होता भई वाह,
क्यों बुद्धिजीवी ऐसे अपनी ठानें।

रामनाम तो भजन राम का भजते।
भक्त सीताराम अपने मन से रटते।
मरीअक्ल कहीं कहते जो भई वाह,
बुद्धि भ्रष्ट हुई जिन्हे राम खटकते।

मरामरा कह बाल्मीकि बने थे संत।
राम नाम की महिमा गाते साधुसंत।
रामनाम ले बिष घोले कैसे भईवाह,
प्रेम राम प्रेरणा सबके राम श्रीमंत।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय

मित्र एक मिर्जा गालिब का, घर पर उनके आया ।
बढ़कर प्रसन्नता से आगे, मिर्जा ने गले लगाया ।।

बड़े प्रेम से उन्होंने, पास अपने मित्र को बैठाया ।
बनाकर एक जाम बड़ा सा, पेश उन्हें फरमाया ।।

बोलीं बेगम आकर,बरपा रहे हो आप कैसा कहर ।
भाई जान को मेरे पिला रहे हो आप,क्यों जहर ।।

कहकर इतना उन्होंने, जाम मित्र का फैंक दिया ।
आकर लब तक जाम उनके, छूट कर टूट गया ।।

शान में मित्र की,किया मिर्ज़ा ने पेश सुन्दर शेर ।
मित्र को उनके बहुत ही भाया,मिर्ज़ा का वह शेर ।।

“हमें अपनों ने मारा है, गैरों में कहाँ दम था ।
कश्ती मेरी डूबी वहाँ, पानी जहाँ कम था ।।"

सुनकर शेर, मिर्ज़ा की बेगम को भी तैश आया ।
शेर के मुकाबले उन्होंने, बब्बर शेरों को सुनाया ।।

हुआ था जिस दिन, मिर्जा जी से हमारा निकाह ।
निकला था बरबस मुंह से मेरे, सुबहान अल्लाह ।।

निकलती है अब तो, दिल से सिर्फ यही आह ।
कर दे करम मुझ पर,उठा ले अब मेरे अल्लाह ।।

हैं इनके सभी अपने, सिर्फ बदबख्त व बदशक्ल ।
मिर्जा जी भी तो हमारे, हैं अक्ल से ही पैदल ।।

बताईये आप इन्हें , जब अपनों ने ही था मारा ।
करा नहीं क्यों इन्होंने, उन से तब ही किनारा ।।

होता पानी जहाँ कम, होती हैं वहाँ ही चट्टाने ।
गये मिर्ज़ा जी वहाँ क्यों, गई अक्ल घास खाने।।

डा0 सुरेन्द्र सिंह यादव
"व्यथित हृदय मुरादाबादी"
स्वरचित

नमन मंच-भावों के मोती
दिनांक-28.07.2019
बह्र-फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन

मात्राभार-122 122 122 122
क़ाफ़िया-आत
रदीफ़-होगी ।
विधा-ग़ज़ल
=========================
मुहब्बत की जब जब मुलाक़ात होगी ।
कसम से कसम की अजब बात होगी ।।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~
पुरानी मुहब्बत तो मत्रूक कर दी,
अभी प्यार की फिर शुरूआत होगी ।।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~
भरोसे बुतों के तो हम जी लिए अब,
ख़ुदा की महर की अलामात होगी ।।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~
ज़रर मुझको है जो सताने लगे तुम,
लगे है उदू की करामात होगी ।।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~
बुरा तो नहीं मैं समझते हो मुझको,
उठेगी जो महसर शिकायात होगी ।।
======================
स्वरचित-राम सेवक दौनेरिया "अ़क्स"
बाह -आगरा (उ०प्र०)


भावों के मोती 
28/7/19
विषय- शतरंज 

विधा- हाइकु 
---------------------
1)
जीवन बाजी 
शतरंज खिलाडी
क्षीरोदजीतो।।
2)
मोहरा बन
राजनीति का खेल 
शातिर जीता ।।
3)
छोटा पैदल
दांव पेच का खेल
वजीर मारे ।।
4)
युध्द लड़ाई 
शतरंज का खेल 
शान्ति संदेश ।।
---------------------
क्षीरोद्र कुमार पुरोहित

नमन-भावो के मोती
स्वतंत्र सृजन...


शैशव का स्वप्न......... यथार्थ का सच

इतिहास उन्हीं का होता है
जो पांव अनल पर रखता है
तप कर अगणित चोटें सहकर
तब स्वर्ण खरा उतरता है
किसी के गले का हार बनता
किसी के कर्णो का बुंदक
हर स्त्री के बाहों का बंधक

बीच भंवर में पतवार को थामो .......
लहरों में जरा उतरकर
चलो निरंतर तुम मत बैठो
हाथों को यूं मल मलकर
गगन चूमने के खातिर
निज पंखों का विस्तार करो
लक्ष्य को भेदने वाले
कंटक संघर्षों का पथ स्वीकार करो

जुल्फों को ढक लेते हैं......
अंतर्मन की साया को
मन की मादकता को डस लेते हैं
जीवन पथ की काया को
जीवन की इस आपाधापी को......
तुम स्वीकार करो
आर करो या पार करो
हर कंटक पथ स्वीकार करो
कष्टों के आलिंगन को
अंगीकार करो या तो तेज धार करो......

संतान बचाने को हिरनी भी
सिंहो के संग अड जाती है
हो बात आन पर जब तोपो संग भी
जंगी तलवारें भी लड़ जाती है

स्वरचित.....
सर्वाधिकार सुरक्षित@#$
सत्य प्रकाश सिंह
प्रयागराज

दिनांक-28/7/2019
शीर्षक- तुम क्या जानो??
तु
म क्या जानो??
कितना मुश्किल होता है,
नारी का एकल जीवन,
अब चाहे विधवा हो या विच्छेदित,
बड़ा ही दुस्कर होता है जीवन,
कहीं पुरुषों की लालची सहानुभूति,
या फिर स्त्रियों के तानो के बाण,
बार-बार-लगातार भेदती है अंतर्मन को,
अब चाहे हमने पुरुष को छोड़ा हो,
या फिर पुरुष ने हमे,
पर दोषी तो हमी हैं 
हर हाल में,
हाँ... हाँ मैं सच कहती हूँ,
तुम क्या जानो??
अकेलेपन की पीड़ा या 
वैधव्य के दर्द को,
सफेद साड़ी में लिपटी देंह,
बिन चूड़ियों के हाथ,
श्रृंगार विहीन काया उसी तरह,
जैसे सूखी नदी ने 
अपना तट छोड़ा हो,
हर तरफ रेत ही रेत हो,

हाँ... हाँ मैं सच कहती हूँ,
तुम कहा जान पाओगे??

एक अकेली स्त्री का संघर्ष,
जब जीवन की तमाम जरूरतों के लिये,
जद्दोजहद करना पड़ता है,
कितना मुश्किल होता है?

किन्तु मैं जानती हूँ!,
क्योंकि मैंने सहा है,
उस पीड़ा को जो दुस्सह है,
इसलिये मैं पूछती हूँ,
की मुहल्ले की सब स्त्रियां मिलकर,
क्या एक अभागन को?
ए अहसास नही दिला सकतीं,
कि तुम अकेली नही हो समाज में,
हम हैं तुम्हारे साथ,
हर सुख में, दुख में,पीड़ा में ,
खुशी में...
जो भी होगा बाट लेंगे.,
संग-संग मिलजुलकर काट लेंगे...
💕स्वरचित- हेमा जोशी💕

विधाः गजलः ः

नहीं भान मुझे कभी मरूंगा।
गजलों में अपनी मै जिंदा रहूंगा।1/

उधारी में मिली जो जिंदगानी,
उस पर हमेशा मैं फिदा रहूंगा।2/

माना कि वफादार मै नहीं हूँ,
फिरभी किसी का खुदा रहूंगा।3/

भले तुम जाओ मुझे छोडकर,
नहीं तुमसे मगर मै जुदा रहूंगा।4/

बद्दुआ चाहे जितनी मुझे देदो,
तुम्हें हमेशा ही मै सदा रहूंगा।5/

भूल जाऊं क्या सच बजूद मेरा,
नजर उसकी मै यदाकदा रहूंगा।6/

मानाकि शिथिल हूँ भावनाओं से,
क्यों न हनुमान की मै गदा रहूंगा।7/

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

दिनांक -28/07/2019
दिन -रविवार 

विषय-स्वतंत्र लेखन 
======================

(रचना -प्रेम भाव)
=========================
खुशियां फैले जग में सारी,
फैले मानवता का प्यार।
प्रेम भाव हो चहुँ दिशा में,
मानवता की हो जयकार।
नमन करूं भारत माता को,
मिटे जगत से अत्याचार।
राग द्वेष की बहे न धारा,
हिंसा मुक्त हो जगत हमारा।
मानवता व प्रेम भाव का ,
करें आपसी हम व्यापार।....
खुशियां फैले जग में सारी,
फैले मानवता का प्यार।
प्रेम भाव हो चहुँ दिशा में,
मानवता की हो जयकार।...
कर्म करें मन में हो भक्ति,
इतनी दाता देना शक्ति।
मानवता का फैले प्यार,
खुशियों भरा होवे संसार।
मन में सबके होने लगे अब,
मानवता का ही संचार।
खुशियां फैले जग में सारी,
फैले मानवता का प्यार।
प्रेम भाव हो चहुँ दिशा में,
मानवता की हो जयकार।...
(स्वरचित /मौलिक रचना) 
.......भुवन बिष्ट
रानीखेत(उत्तराखण्ड)

28.7.2019
रविवार 

स्वतंत्र विषय लेखन 

मन खोज रहा
🌹🌹🌹

मन खोज रहा पावन मन को जो शुद्ध प्रेम से भरा हुआ 
मन खोज रहा पावन तन को जो शीतल शांत रहा अनछुआ ।।

जीवन उत्कर्ष निभाने को तन-मन का संगम अविरल हो 
मन भटक रहा साधक बन कर अनुराग वृष्टि से घिरा हुआ ।।

तप करने को मन का संयम तन के संयम से जुड़ता है 
मन माया -मोह के बंधन तज मन के इक प्रण पर रुका हुआ।।

मन साध रहा है प्रकृति को मन के भीतर की अग्नि को 
मन आतप-अग्नि से तप कर वर्षा के जल से धुला हुआ ।।

संयम ‘ उदार ‘ गहना लेकर मन सदा सजाया धीरज से 
मन प्राण प्रेम और प्रीति पगे
प्रियतम प्रतीति से जगा हुआ।।

स्वरचित 
डॉ० दुर्गा सिन्हा ‘ उदार ‘

नमन मंच 
28/07/19
***

जिंदगी की chemistry को अक्सर कहते सुना है ,
Chemistry के सिद्धांत से रिश्तों की केमिस्ट्री
***

जिंदगी की mystry को
सुलझाती है chemistry 
Pressure कम रखना 
दिल में volume बढ़ाना
बॉयल जी कह गए हैं 
उनका मान तो रखना ।
रिश्तों में गर्माहट रखना 
जीवन में volume बढ़ेगा
Charles जी की theory मान
Ideal equation बनाना।
Ionization potential कम रख कर
Electron Affinity बढ़ाना
Sharing के साथ साथ 
Electro valent मजबूत bondig बनाना।
Negative catalyst से दूर रहें 
Promotors जीवन में लाना
Position की क्यों लड़ाई 
Hysenberg की uncertanity हटाना।
Kekule सी संरचना रख कर 
Resonance को बढ़ाना
जीवन का Reaction mechanism
समझ,ध्यान ये जेहन में रखना
रिश्तें कहीं बन न जायें history...
जिंदगी की mystry को
chemistry से सुलझाना।

स्वरचित
अनिता सुधीर

भावों के मोती"
#दिनांक"२८"७"२०१९"
#विषय"स्वतंत्र लेखन"

#विधा"काव्य"
#रचनाकार"दुर्गा सिलगीवाला सोनी"

"""*****"""लक्ष्मण""""*****"""

निस्वार्थ भाव से था अर्पण किया,
तन मन धन त्याग ही समर्पण था,
था लक्ष्मण के मन में भी भ्रात प्रेम,
कृतज्ञ हृदय उनका एक दर्पण था,

ना तो राजपाठ ना ही स्त्री का सुख,
ना ही मान सम्मान का आकर्षण था,
सर झुकता था निज अग्रज चरणों में,
गुरुजनों से मिला यही प्रशिक्षण था,

किया सुख का त्याग दुख का वरण,
सिर्फ त्याग था नहीं ये प्रत्यर्पण था,
किंचित मात्र को भी ना डिगने वाला,
सुमित्रा पुत्र ही वो क्रोधी लक्ष्मण था,

वन भ्रमण था उनका संक्रमण काल,
ना ही नींद ना चैन बस जागरण था,
अग्रज अनुज के मध्य क्या रिश्ता है,
स्वयं लक्ष्मण ही एक उदाहरण था,

इंद्रजीत से भी जीत मिली थी रण में,
कर्तव्य परायणता का ये पुरस्कार था,
ब्रह्म शक्ति के घात से वो बचने वाला,
श्री राम का उन पर बड़ा उपकार था,

वो थे शेष अवतार मानव के रूप में,
नारायण की रची यह सब माया थी,
निशचर हीन करना था इस धरा को,
पितृ दशरथ सदकर्मों की ही छाया थी,

"दुर्गा"आग लगाती उनकी वाणी थी,
हाथियों सा बल था उनकी बाहों में,
लक्ष्य भेदक शौर्य भी था प्रबल उनमें,
समतल होते थे पर्वत उनकी राहों में,

भावों के मोती 
28/07/19
स्वतंत्र लेखन


विधा छंद मुक्त कविता

ऋतु परिक्रमा

गर्मी का मौसम आता है
तपती दोपहरी लाता है
सन्नाटे शोर मचाते हैं
गर्म थपेड़े देह जलाते हैं
तन बदन कुम्हलाते हैं
फूल सभी मुरझाते हैं।

जब बरखा की रुत आती है
हरियाली साथ में लाती है
जब काली घटा छा जाती है
कोयल मीठे गीत सुनाती है
पुरवाई मल्हार गाती है
विरहित हृदय अकुलाते हैं। 

जब सर्दी का मौसम आता है
धूप सुहानी प्यारी लगती है
दोपहरी आंगन मुस्काती है
शाम जल्दी दीप जलाती है
रातें लम्बी दिन छोटे हो जाते हैं
सोंधे पकवान जी ललचाते है।

बसंत मधुमास बन आता है
धरा इंद्रधनुषी रंग जाती है
मयूर सुंदर नृत्य दिखाते है
तितली भंवरों की ऋतु आती है
पपीहरा पी की राग सुनाता है
नव कोंपल फूल खिल जाते है।

स्वरचित

कुसुम कोठारी।

जीवन के हर मोड़ पर
गुलाब खिले और मुरझा गये
याद देकर भूल गये

फिर जमानें याद आ गये।

गांव की पगडंडियों, खेतों की मेड़ों
तालाब की तलहटी या चारागाह में गुज़ारा
बचपन क्या था?

शहरों की गलियों, मीनारों,कतारों
ट्रेनों,-बसों में दौड़ते, भागते जीवन का
आखिर स्वप्न क्या था?

उम्र की चारदीवारी में घूम कर रूक जाना
ठहर जाना उसी मोड़ पर, ऐ जीवन!
आखिर तेरा मकसद क्या था?

पनघट के वो गीत कहां है?
बालपनें की प्रीत कहां है?
हर घर जो अपना सा घर था
वो भूली सी रीत कहां है?
लौट कर उस मंजर से
फिर कहां अकेले आ गये?
सूनीं हवेली के दरख्त
कब से ताक रहे थे रस्ता
आज जब पट खुले यादों के
पत्ते-पत्ते मुरझा गये।
जीवन के हर मोड़ पर
गुलाब खिले और मुरझा गये
याद देकर भूल गये
फिर ज़माने याद आ गये।।

श्रीलाल जोशी "श्री"
तेजरासर,बीकानेर।

नमन "भावो के मोती"
28/07/2019
"स्वतंत्र लेखन"

################
डर मुझे भी लगा फासला देखकर।
खामोश ही भली... ये अदा देखकर।।

बात जो दिल की कहती रही हर वक्त।
मैं बिखर ही गई ......भावना देखकर।।

आप भी अब चुपचाप जो हो गए।
पूछती हाल मैं ..डाकिया देखकर।।

दिल से अब न रहा वास्ता किसी का।
प्रेम को भूलती..... बेवफा देखकर।।

मंजिल की ख्वाहिश ही अब न है।
पर मैं बढ़ती गई...रास्ता देखकर।।

मर्ज क्या है मुझे भी नही अब पता।
लग गई जो बिमारी... दवा देखकर।।

तड़पते हाल में...........आपने छोड़़ जो दी।
बंद आँखों को क्यूं कर लिए वेदना देखकर।।

स्वरचित पूर्णिमा साह
पश्चिम बंगाल।।

नमन मंच भावों के मोती
28/7/2019
बिषय मुक्त लेखन

कजरी,, बारहमासी
हरे रामा लागो री आषाढ़ श्याम नहीं आए री आली
सावन हले हिंडोलना रे सावरिया रामा
हां हां रे सावरिया रामा
हरे रामा सब सखि झूलन जाऐं
राधे पछतावें रे हरी।।
भादों रैन अंधेरी रे सावरिया रामा
हां हां रे सावरिया रामा
गरजे और घुमड़ाय जिया घबराबै रे हरी।।
क्वार कुसुम रंग हो रए रे सावरिया रामा
हां हां रे सावरिया रामा
पाती लिखी न जाए ,,(श्याम नहीं)
कार्तिक महीना धरम के रे सावरिया रामा 
हां हां रे सावरिया रामा
हरे रामा सब सखि गंगा नहाय
राधे पछतावें रे आली
अगहन ठाड़ी अगनैया रे सावरिया रामा 
हां हां रे सावरिया रामा
उड़ रहे पटचीर (श्याम)
पूस में पड़े तुषरवा रामा
हां हां रे सावरिया रामा
सब सखि रुइया भरायें
श्याम कब आवेंगे आली
माघ में रहत उपासी रे सावरिया रामा
हां हां रे सावरिया रामा
पूज रही इतवार हरी खों 
मनावै री आली
फागुन हो रहे फगुआ रे सावरिया रामा 
हां हां रे सावरिया रामा
उड़ रहो रंग गुलाल
राधे पछतावें रे आली
चैत्र में फूले वन टेसू रे सावरिया रामा 
हा हा रे सावरिया रामा
दादुर बोल पपीहा जिया
भरमावै रे आली
बैसाख महीना धरम के रे सावरिया रामा
हां हां रे सावरिया रामा
सब मिल पूजन जाऐं 
हरी खों मनावें रे आली
जेठ में तपै रोहणी रे सावरिया रामा
हां हां रे सावरिया रामा
और ऊपर को घाम 
जिया घबराबै री आली
स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार

II स्वतंत्र लेखन II नमन भावों के मोती.... 

ग़ज़ल - मुझे तोडा नज़र तेरी ने हर इलज़ाम से पहले....


झुकी है आँख उसकी डर में अब अंजाम से पहले... 
कि सूरज ढल गया है आज तो बस शाम से पहले...

मकाँ को छोड़ कर मुझको हरिक दिल घर बसाना है...
मरूं क्यूँ रोज़ हर पल ही मैं जीवन शाम से पहले....

वफ़ा में चाँद तारे टांक दिए सब उसकी चूनर पे...
मगर मैं लुट गया सरेराह मंज़िले गाम से पहले...

नज़र थी आसमाँ पर ओ दिवारें खींच ली ऊंची....
हवा के एक झोंके ने ढहाया बाम से पहले....

जहाँ की तुहमतें 'चन्दर' हिला मुझको नहीं पायीं... 
मुझे तोडा नज़र तेरी ने हर इलज़ाम से पहले....

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II 


नमन "भावों के मोती"🙏
28/07/2019
कविता :-"सावन राजा... "

सावन राजा, बरखा रानी,
प्रजा पे कर दो मेहरबानी,
सूखा न रहे,न रहे कोई प्यासा, 
धरा की गोद में भर दो पानी 
सावन राजा, बरखा रानी....

झरनों में आ जाये जवानी,
झूमें,गायें,भरें जोश तूफानी, 
हरिता में सरिता मनभावन, 
चले काग़ज़ की नाव सुहानी 
सावन राजा, बरखा रानी....

मेघ मृदंग औ नृत्य दामिनी 
धरतीपुत्र लिखे श्रम कहानी 
टिप टिप टिप बूँदों की सरगम 
गाये पवन बहे हो के दीवानी 
सावन राजा, बरखा रानी....

मुस्काये पात, हर्षाये प्राणी 
प्रीत झरे और बंटे गुड़ धानी 
जीत जाये फिर देखो बचपन 
उम्र ने भी तुमसे हार है मानी 
सावन राजा, बरखा रानी....

प्रजा पे कर दो मेहरबानी,
सूखा न रहे,न रहे कोई प्यासा, 
धरा की गोद में भर दो पानी...
सावन राजा, बरखा रानी....

स्वरचित और मौलिक 
ऋतुराज दवे,राजसमंद(राज.)

शुभ संध्या
भावों के मोती
28/7/2019

स्वतंत्र लेखन
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*दिल की अदालत*

ये मेरे अंदर जो मैं हूँ
वही मैं क्षत विक्षत पड़ी हूँ
उसके कातिल तुम हो
पर मेरे पास कोई सबूत नहीं है
इस बात का...
क्योंकि मैं एक बेजबान
लाचार रूह हूँ
जो अपनों से पराजित हो चुकी हूँ
सबूत के अभाव में..
किसी ने मेरी चीख पुकार
नहीं सुनी
क्योंकि कुछ पीड़ाओं की
ध्वनि नहीं होती
इसलिए वो रह जाती हैं
अनसुनी..
फिर भुला दी जाती हैं
साक्ष्य के न होने पर
और तुम बाइज़्ज़त
बरी कर दिए जाते हो
इस ज़मीनी अदालत में.
पर क्या उस अदालत से
तुम बच पाओगे...??

@वंदना सोलंकी©️स्वरचित

"क़दम बढ़ा के चल"

मंजिल की राह अभी बाकि है,

दूर खड़ी पथ के राहगीर,
क़दम बढ़ा अभी सफ़र शेष है, 
मुश्किलों का सामना कर आगे बढ़,
कुछ कांटों से भी टकराते हैं, क़दम 
मन में धैर्य और विश्वास भर के चल,
नदी में नौका की पतवार,
मुश्किल लहरों से टकराती है,
संघर्षों के सफ़र में नौका पार लग जाती है,
मंजिल का मुसाफिर आगे बढ़ ,
क़दम बढ़ा के चल, मंजिल अभी बाकि है,
सत्य की राह में झूठ मिथ्या प्रपंच का जाल बिछा है,
तू निडर अडिग लक्ष्य भेद के चल,
क़दम बढ़ा के चल ओ ! राहगीर,
नदी के बालू में हरी घास के अंकुर भी सूर्य तप सहते हैं,
नदी की भीषण बाढ़, तूफान, से टकराते, 
ज्वार-भाटा की लहरों में अडिगता का परिचय देती है,
एक दिन नदी का सौंदर्य का प्रतीक बन कर ,
खुशियों से हरियाली भर-भर के श्वेत बालू में लहराते हैं
तू भी अडिग लक्ष्य भेद के दृढ़ संकल्प कर,
क़दम बढ़ा के चल, मंजिल अभी बाकी है,
स्वरचित :- सुनीता पंवार


दिनांक .. 28/7/2019
विषय .. कारगिल विजय/ विजय दिवस

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खींचा लेना रक्त चन्दन, मध्य मस्तक केंन्द्र पर ।
लालिमा भर लेना अपने, श्वेत नेत्रम् चन्द्र पर ॥
**
खींच लेना उस जिव्हृा को, बोले जो अपशब्द पर।
मातृ- गौरव छिन्न ना हो, याद रखना तुम मगर॥
**
धर- पकड, उसको पटक कर, छाती पे चढ जाना पर।
शीश कटने से प्रथम, मरना तू उसको मार कर ॥
**
कारगिल के युद्ध सा, विजयी रहे हर बार तुम।
भारतीय गौरव के रक्षक, चूमे आसमान तुम॥
**
वीर गौरव से भरा, इतिहास भारत भूमि का ।
मार कर मरते है जो, गर्वित है हम उन वीर का॥
**
चीर कर उसके हृदय के, रक्त से धोना धरा।
मर के भी ना गिरने देना, शेर भारत का ध्वँजा॥
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मान तुम, सम्मान तुम हो, देश के अभिमान पर।
हम ऋणी है, तेरा जीवन देश के सम्मान पर॥

शेर सिंह सर्राफ

नमन मंच को
दिनांक-28/07/2019
दिन-रविवार

विषय-स्वतंत्र लेखन
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इंद्रवज्रा छंद में एक रचना
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हे श्याम प्यारी! विनती हमारी।
निष्काम पूजा करुँ मैं तुम्हारी।
रासेश्वरी हो सब की दुलारी।
आनंद रूपा सुन लो हमारी! 

देखो,न जाना तज प्रीत मेरी।
मैने निभाई हर रीत मेरी।
वादा निभाना अपना किशोरी
राधे कृपा में करिये न देरी।।

झूठे सहारे जग के भुलाएँ।
माँ नाम तेरा हम नित्य ध्याएँ।
चाहें गमों के घन स्याह छाएँ।
भूलें तुम्हें वो दिन ही न आएँ।।

नैनों बसा हो शुभ रूप तेरा।
जिव्हा विराजे सत नाम तेरा।
पाना तुम्हें हो बस काम मेरा
होवे तुम्हारा उर में बसेरा।।

मणि अग्रवाल©
देहरादून


शुभ साँझ
ग़ज़ल का प्रयास


प्यार में पगी ये खूबसूरत रूबाई है 
कशिश दिल की पहली अँगड़ाई है ।।

जिसने शोर मचाया है इस दिल में 
दिल के दरीचे से ये खबर आयी है ।।

देखूँ रोज कुछ हलचल इस दिल में 
देख सकते जो मेरी ये लिखायी है ।।

किसी प्रेयसी का रूप इसमें समाया है
कहा सबने जिसने भी नजर घुमायी है ।।

दबे थे आँसू ख्वाबों के खंडहर तले 
कसक है 'शिवम' जो दी दिखायी है ।।

बेसबब वक्त की हवा से जूझता रहा
अब कुछ रहमत उसकी कहलायी है ।।

दवा अब भी मुस्तक़िल नही मिली है
एक दीदार की अर्ज सनम से लगायी है ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 28/07/2019

#विधा------ - मुक्तक*
#दिनांक------28/07/19

देश-धर्म-हित हेतु वो बनता है रक्षक
देशवासियों के प्राण का है संरक्षक
वीरगति हो प्राप्त कहलाये वो शहीद
जहर दे दिया तट पर शत्रु बना है तक्षक

मैं वीर जवान मेरा नाम वतन कर दो
वतन मेरी कर्म- भूमि, मुझे दफन कर दो
जज्बा सीने में ,शहीद ही होना चाहूँ 
हर जनम में तिरंगा मेरा वतन कर दो
🇮

माँ ने कलेजे से ,अपने कलेजे के टुकड़े को लगाया होगा
पिता टूटा होगा,जब अपने सपूत को टुकड़ों में पाया होगा
सिंदूर, चुड़ी सुहाग सारे आँसू के सैलाब में बह गये होंगे
जब तिरंगे से लिपटा वीर शहीदों का शव घर पे आया होगा
🇮

#स्वरचित*
#धनेश्वरी देवांगन. "#धरा"*
#रायगढ़ (#छत्तीसगढ़)*

विषय - स्वतंत्र विषय आयोजन 
सादर मंच को समर्पित --


☀️ गीतिका ☀️
***********************
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

मिलते हैं यहाँ दिल से , दर्पन की तरह हम ।
हो जायें कभी ओझल , धड़कन की तरह हम ।।

हमको हैं सदा प्यारी , खिलती हुई कलियाँ ,
बस जायें किसी मन में , गुलशन की तरह हम ।

दीवाना बना देतीं , मद मस्त ये वादी ,
खो जायें हँसी आँचल , बचपन की तरह हम ।

फूलों की महक हमको , महकाती रही हैं,
उलझे रहे भँवरों की , गुंजन की तरह हम ।

जो प्यार से मिलते हैं , दिल अपना डुबो कर ,
टँक जाते उसी चूनर , तुरपन की तरह हम ।

दुनिया के झमेले में , अवसाद भी पाये ,
कुछ दंश भी झेले हैं , उतरन की तरह हम ।

आसान नहीं था कभी , मिल जाय भी मंजिल ,
गिर कर भी रहे उठते , फिसलन की तरह हम ।

बीते हुये लम्हों के , यादों के झरोखे ,
डूबे हैं भरी उल्फत , तड़पन की तरह हम ।

खुशी और गम सँजोये , सरी राह जिन्दगी ,
यों साथ निभाते रहे , बर्तन की तरह हम

🌹🌴☀️🌻🌺

🏵🌻**.....रवीन्द्र वर्मा आगरा 
Damyanti Damyanti

आज का विषय,,स्वत्रंत लेखन 
नारी की मर्यादा को इंगित करती कुछ पक्तियाँ 
वनपथ पर सीताजी व ग्राम बधचठियो की बाते ।

अरे आप कहाँ से आये,कहाँ जाना ।
कोनसे गाँव सेहोक्यो वन जा रहै ।
बोली माँ सीता हम राजा दशरथजी के पुत्र व पुत्रवधु।
अयोध्या हमारा धाम ,क्यो छोडा ये बताऔ तो ।
माता पिता की आज्ञा से छोडा भवन ।
ये तो बताओ सखी,कोन सा प्रियतम है ।
कोन सै आपके देवर ।
सीता मुस्कुराते हुऐमीठी वाणी बोली ।
ये गौर वर्ण देवर मैरे,कुछ लज्जा ई ।
इशारे से बताया सावलै सलौने पिया मेरे ।
कैसी विधी लिखी विधना ने ,महलवासी चले काँटो भरी राहे ।
कुछ भी हो सखियों इन तीनो हमारे मनहर लिया ।
स्वरचित,,, दमयन्ती मिश्रा ।

नमन मंच

कभी घुलकर हवाओं में,

मुझे सरगम सुनाती हो!
कभी रहती खयालों में,
कभी नींदे चुराती हो!!

कभी बनकर हया का बुत
लजाती हो फिजाओं को,
बनी हो रात की रानी,
तुम्ही गुलशन सजाती हो!

बड़ी कोमल मुलायम तुम
लगे हो मोम के जैसी,
कभी तो खुद पिघलती हो,
कभी मुझको जलाती हो!

तुम्हारे रूप यौवन का,
जमाना है बड़ा पागल,
निकलकर सामने से यूँ,
हमे कितना लुभाती हो

झलक देखे तुम्हारी"नील"
मचला यूँ कशक लेकर,
सुबह-ओ-शाम देखो तो,
मुझे पागल बनाती हो!

रचना-राजेन्द्र मेश्राम "नील"

नमन मंच
दिनांक २८/७/२०१९
स्वतंत्र लेखन

लघुकथा"एहसास"
अनिला आज अपने अलावा दो जन का और खाना बना लेना"अपने पति के फोन पर फरमाइश सुनते ही अनिला ने गुस्से से फोन पटक दिया और गुस्से से बड़बड़ाने लगी"इनको मेरा जरा भी ध्यान नही, अभी १५दिन उसके घर पर रहकर सिर्फ एक दिन के लिए जेठ वह जेठानी, जेठानी के मैके गये है, कल ही तो वे लौटने वाले हैं,और आज ये फिर से किसी को आमंत्रित कर डाले।
आज वह थोड़ा आराम के मुड़ में थी,१५दिन से काम करके वह बिल्कुल थक चुकी थी, परन्तु आज फिर से नई फरमाइश,उसने मन ही मन ठान लिया ,चाहे आज जो हो जाये आज वह अपने परिवार के अलावा किसी और के लिए भोजन बनायेगी ही नही, चाहे उसके लिए उसके पति को होटल से ही खाना क्यों नहीं मंगवाना पड़े।
दोपहर १२बजते ही डोरबेल बज उठी, उसने अनमन्यस्क भाव से दरवाजा खोला और यह देखकर आश्चर्य चकित रह गई कि दरवाजे पर उसके स्वंय के भैया भाभी खड़े हैं,अब तो उसके खुशी का ठिकाना ही नही रहा, एक ही शहर में रहने के बावजुद भी वह अपने भैया भाभी से बहुत दिन से नहीं मिल पाई थी,जो उसके माँ पिताजी के समान थे, माँ पिताजी के मृत्यु के बाद भैया भाभी ने ही उसे संभाला था और इतना अच्छा घर वर देखकर उसकी शादी की थी,अब तो उसमें गज़ब की फुर्ती आ गई थी, गैस पर दोनों चुल्हा पर दो दो कुकर चढ़ा कर अपने भैया भाभी की मनपसंद खाना बना डाली, तब तक उसके पति भी आफिस से आ गये थे,सबने गरमागरम भोजन का लुत्फ उठाया,और उसके भैया भाभी उसके अनेक तारिफ कर रहे थे कि इतना जल्दी इतना स्वादिष्ट भोजन तैयार किया परन्तु वह मन ही मन शर्मिंदा थी।
उनलोगों के जाने के बाद उसके पति उससे बोले"अनिला तुम मेरे भैया भाभी के लिए इतना कुछ करती हो,तो एक दिन के छुट्टी में मैंने सोचा की क्यों न मैं तुम्हे तुम्हारे भैया भाभी से मिला दूँ,,तुम उनसे अचानक मिल कर बहुत खुश होगी, यही सोचकर मैंने तुम्हें पहले नहीं बताया,साथ ही तुम हर मेहमान का स्वागत हमेशा चेहरे पर मुस्कान लिए करती हो तो मैं समझ ही नही पाया कि तुम्हारे अंदर क्या चल रहा है"अब अनिला को यह एहसास हो चुका था की दूसरों में बुराई ढ़ूढ़नें से पहले अपने अंदर झांकना चाहिए।
स्वरचित-आरती-श्रीवास्तव।

भावों के मोती
विषय- स्वतंत्र लेखन

_____________________
भारत को आजाद कराने
आज के दिन जन्मे आजाद
माता इनकी देवी जगरानी
पिता थे पंडित सीताराम

मध्य प्रदेश में जन्म लिया
रहने वाले थे भाबरा गाँव
बचपन से ही दृढ़ निश्चयी
स्वाभिमानी बालक थे आजाद

देशभक्ति से ओतप्रोत थे
दिल में क्रांति की ज्वाला थी
अंग्रेजों के गले की फांस बन गए
आजादी उनका जुनून बन गई

आजाद जिएंगे आज़ाद मरेंगे
नारा सदा यह बुलंद किया
भारत की आजादी के लिए
तन-मन अपना वार दिया

देश सुरक्षा सबसे पहले
बाँध कफ़न अंग्रेजों से भिड़ गए
आखिरी दम तक न मानी हार
करते रहे महासंग्राम

खाई थी कसम आजाद रहूँगा
भारत माता को आजाद करूँगा
धरती की गोद में त्यागे प्राण
आज़ाद थे मरते दम तक आजाद रहे

आजाद भारत की खातिर
शहीदों ने दी कुर्बानियाँ
खुशहाली का आशीर्वाद दिया
खुद ने सही जल्लादियाँ

आओ फिर एक बार आजाद
जात-पात के झगड़े मिटाने
बढ़ रहा है देश फिर से
आपसी टकराव की ओर

आओ फिर एक बार आजाद
भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाने
जिसकी गुलामी में जकड़ा भारत
कर रहा है त्राहिमाम

बेटियों के ऊपर बढ़ रहे
इंसानी भेड़ियों के अत्याचार
आओ फिर एक बार आजाद
इस डर से करो उन्हें आजाद

***अनुराधा चौहान***©स्वरचित
नमन् भावों के मोती
दिनांक:28/07/2019
विषय:सावन

विधा:कविता

सावन की ऋतु आयी
मेंघों ने दुन्धभी बजायी
घटाघोर बदली है छायी
स्वागत में फुहार आयी

सावन की ऋतु आयी
दादुर ने आवाज लगायी
रिमझिम-रिमझिम वर्षा आयी
मौसम में रौनक है छायी

सावन की ऋतु आयी
फसलों की हुई बोआई
कृषकों की मौज है आयी
धानों की खूब हुई रोपाई

सावन की ऋतु आयी
झूलों की बाहर है आयी
कजरी की धुन दे रही सुनायी
हाथों में मेहंदी गयी रचायी

सावन की ऋतु आयी
दंगल ने धूम मचायी
नागपंचमी की तिथि आयी
गुझियों संग गुड़िया है छायी

सावन की ऋतु आयी
पिया मिलन की बात सुहाई
नयनों ने है प्यास बढ़ायी
दिल की धड़कन दे रही सुनाई

सावन की ऋतु आयी
बहना राखी लेकर आयी
प्यार सजा भाई की कलाई
जमके खायी गयी मिठाई

मनीष श्री
स्वरचित
रायबरेली

स्वतंत्र लेखन 

छंदमुक्त कविता 

मेरी प्यारी सोनचिरईया

कहाँ कहाँ न ढूंढा
कहीं न मिली वो
कभी आ खिड़की से
झांकती थी वो
बड़े प्यार से
बुलाती थी वो
कभी घरोंदा 
बनती थी वो
कभी दाना 
चुगती थी वो
कभी खुले 
आसमां में 
उन्मुक्त 
उड़ती थी वो
बहुत तमन्नाएं
रखती थी वो
जाने कहाँ 
गुम हो गयी वो
तरसता हूँ 
देखने के लिए उसे
शायद मिल जाए
कहीं वो
मेरी प्यारी
सोनचिरईया 

स्वलिखित लेखक संतोष श्रीवास्तव भोपाल




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"कांच /शीशा ""10अक्टुबर 2019

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