Sunday, August 4

"स्वतंत्र लेखन" 04अगस्त 2019

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ब्लॉग संख्या :-466

ये सावन कैसा है
जरा मिल कर बताओ
बरसा है बादल तेरे आँगन में

तो उसे हमारा घर भी बताओ।

तुम्हें तो प्यास न हो शायद
ये दिल तो मुद्दत से प्यासा है
बरसा दो मुस्कुराहटों की बारिश
मन में मिलन की जिज्ञासा है।

हर शाम इन्तजार का सूरज
ढल जाता है राहों में तेरी
तुम कभी तो आओगे
भूल से गलियों में मेरी।

रात भी तन्हा, चांदनी भी तन्हा
पल-पल उदास रहूँगा
तुम कभी मिलोगे किसी राह में
बस आँखों से सारी बात कह दूँगा।

श्री लाल जोशी "श्री"
तेजरासर, बीकानेर।
(मैसूर 


अनकहा अहसास
रोज कर लेता हूँ बाते चंद 
सितारों और चांद से साथ ही 

एक गुफ्तगू अपने आपसे 
जब चाँद अपने जुनून पर 
आता है रात की दहलीज को
और देते है सितारे उसका साथ
गजब मंजर छा जाता है
फिर आ जाती है याद 
जेहन में तेरी,
फिर बस सिर्फ एक काश 
के अलावा कुछ नही होता है 
पास मेरे,बस समझा कर 
तसल्ली दे लेता हूँ अपने आपको
जो हुआ वही लिखी लकीर था
बस ऐसे ही एक और रात गुजर 
जाती है तमाम रातों की तरह
हौले से।
सुबह फिरसे निकल पड़ती है
फिरसे खामोशी की चादर ओढ़े हुए।
रह जाता हूँ फिरसे तन्हा,
बस सिर्फ मैं और और सिर्फ मैं
एक अनकहा सा अहसास लिए।
कामेश की कलम से
3 अगस्त 2019


नमन मंच भावों के मोती 
विषय मित्रता
विधा विधाता छन्द

तिथि। 04/08/19
*******
मंच के सभी सम्मानित आ0 मित्रों को मित्रता दिवस की शुभकामनाएं 
****
न हमको शाम की चिंता,न हमको रात का डर है
मिले जो तुम मुझे मित्रों, न कोई मौत का डर है
मित्रता के इन पलों में, जिन्दगी तुम ठहर जाओ,
दिलों में एक बेचैनी ,जब मिले कोइ न खबर है।

कलम को जब मित्र जाना,सफर पूरा हुआ माना
पिरोते भाव शब्दों में, निडरता से लिखे जाना
मित्रता जब मुझे थामे ,कलम निडर निष्पक्ष चलती
नहीं कोई मित्र ऐसा, स्वयम को स्वयम से जाना।
****

स्वरचित
अनिता सुधीर श्रीवास्तव

नमन मंच ,भांवो के मोती
विषय स्वतंत्र लेखन
विधा काव्य

04 अगस्त 2019,रविवार

पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण
चारों धाम विराजित है।
बद्री रामेश्वर पुरी द्वारिका
भगवन भू नियोजित हैं।

सागर पैर पखारे भारत माँ
हिमगिरी खड़ा बना प्रहरी।
शस्यश्यामला भारत माता
लूम झूम रही है हरी भरी।

गङ्गा यमुना पावन नदियां
नित प्रवाह मयी वह बहती।
खेतों में धन धान्य उपजता
किये पाप जीवन के हरति।

रवि उदित होता पूरब से
रक्तरंजित रश्मियां फैले।
खग कलरव करता प्रातः
बालक क्रीड़ांगन खेले।

अद्भुत सुन्दर भव्य भारत
मातृभूमि मिली है सबको।
गौरव गाथा प्रिय अनौखी
सदा नाज़ होता है हमको।

पञ्च तत्व से सुसज्जित 
वतन हमारा विश्व में प्यारा।
रज कण चूमे हम मिलकर 
हिंदुस्तान जग में है न्यारा।

स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

नमन मंच-भावों के मोती
स्वतन्त्र लेखन
दिनांक-04.08.2019

विषय-सावन
विधा-मुक्तक द्वय
====================
यह सावन अनुपम सावन है,हरी दूब है मखमल जैसे ।
चहुँदिश आच्छादित नभ घन है,हरी दूब है मखमल जैसे ।।
सब कुछ अतिशय सुन्दर लगता,लेकिन मन का हाल अजब है,
लगता साथी बिन कब मन है?हरी दूब है मखमल जैसे ।।

सावन में सुन्दर लगती है तरुणाई अरुणाई उनकी ।
मीठी बोली जिमि रस घोले हाव भाव पहुनाई उनकी।।
क्या क्या चाव नहीं भरती है उर आँगन में हँसी ठिठोली ,
धीमे से उन्मत्त बनाए प्रणय रीति सुखदाई उनकी ।।
======================
स्वरचित- "अ़क्स" दौनेरिया

नमन 'भावों के मोती'
विषय: स्वतंत्र लेखन
दिनांक: 04.08.2019


छंद मुक्त

बढ़ रही हैं दूरियां (आज का सच)

बढ़ रही हैं दूरियां, कुछ मेरी बेसमझी से
तो कुछ तेरी नादानियों से |
तेरे बार-बार सॉरी! के दोहराव से
मैं हैरान हूँ तेरी इन हरकत बचकानियों से
बढ़ रही हैं दूरियां, कुछ मेरी बेसमझी से
तो कुछ तेरी नादानियों से |

प्यार के मामले में बेसमझ हूँ ये ख्याल रखना
क्या पता कब शक के लपेटे में
आ जाओ......
आपकी..... रोज-रोज की आनाकानियों से
बढ़ रही हैं दूरियां, कुछ मेरी बेसमझी से
तो कुछ तेरी नादानियों से |

छोडनी होगी मुझे मेरी बेसमझी और तुम्हें नादानियाँ
बिगड़ते देखी हैं मैनें लोगों की बनी बनाई कहानियां
कोई नहीं बच पाया आज तक इन तानातानियो से
बढ़ रही हैं दूरियां, कुछ मेरी बेसमझी से
तो कुछ तेरी नादानियों से |

स्वरचित
सुखचैन मेहरा

नमन मंच भावों के मोती
04/08/2019
विषय-स्वतंत्र लेखन

*********************
बम-बम भोले,शिव भोले,
तेरी जय-जयकार,
शीश नवायें तुझको बारम्बार!

हम अज्ञानी करते निशदिन,
शामो सहर तेरा गुनगान,
त्रिकालदर्शी शिव शम्भू मेरे,
दुख जाने तू सकल जहान!
महाशक्ति संग महाकाल के,
आये है हम मिलकर द्वार!
शीश नवायें................

रक्षा करो हे औघड़दानी,
सारी धरती डोल रही,
पाप हरो और आतंक मिटाओ,
भारत माता बोल रही!
सारी धरती स्वर्ग बनाओं,
बस इतना सा करो उपकार!
शीश नवायें..........

दीप जला दो हम सबके मन मे,
सरल,शुद्ध और नेक बने,
प्रीत की तुलसी हर घर-घर उगे,
मुश्लिम-हिन्दू एक बने!
प्यार करें मह एक दूजे से,
मानवता का भरो भंडार!
शीश नवायें.......

स्वरचित-राजेन्द्र मेश्राम "नील"
चांगोटोला, बालाघाट ( मध्यप्रदेश )

टोमी

टोमी मेरा प्यारा बच्चा

है अभी उमर में कच्चा ।।

बडे़ प्यार से इसको पाला 
इसकी खातिर पिया प्यला ।।

सबसे पहले ससुर रिसाये 
बड़े यतन उन्हे समझाये ।।

सासो माँ फिर मारीं ताने 
गाय के गुण लगीं बताने ।।

गाय हमें बिल्कुल न भाये 
मोडर्न युग के हम कहाये ।।

सोसायटी हमें क्या कहेगी 
गाँव के गँवार हमें बकेगी ।।

कौन भला इन्हे समझाये 
हरदम ही यह बड़बड़ाये ।।

गाँव के हैं गाँव की धौंकें 
जरा जरा सी बात पे भौंकें ।।

गाय भला अब पाले कौन 
जिसे बताया हुए वो मौन ।।

शर्म करे वो कुछ न बोले 
उनकी चुप्पी को हम तौले ।।

इज्जत मिट्टी में मिला रहे 
सास ससुर हमें जला रहे ।।

जीना मेरा दुश्वार किये हैं 
टोमी पाल कर पंगे लिये हैं ।।

धर्म संकट में कभी पढ़ूँ 
पर सोसायटी पहले गढ़ूँ ।।

ये तो कुछ दिन के मेहमान 
मुझे करना इसमें मिलान ।।

कहले जिसे जो कहना है 
टोमी मेरा है मेरा रहना है ।।

उखाड़े जिसे जो उखाड़ना 
छोड़ीं जग की बातें ताड़ना ।।

हर तरफ 'शिवम' पंगे हैं 
यह जिन्दगी है या दंगे हैं ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 04/08/2019

4/8/2019
नमन मंच।
सुप्रभात गुरुजनों, मित्रों।


झनन झनन झन पायल बाजे,
राधा यमुना तट को चली।

झटकी चले तो छलके गगरिया,
धीरे चले तो रोके कन्हैया।

छोड़ो कन्हैया मोहे घर है जाना,
सास ननदिया देंगी मुझे ताना।

कैसे मैं छोड़ूं राधे जब सामने तुम हो,
दिल कैसे धीर धरे।

राधा कृष्ण की जोड़ी अमर है,
नाम जपते जीवन ढले।

झनन झनन झन पायल बाजे,
राधा यमुना तट को चली।

वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी
स्वरचित

तिथिःः4/8/2019/रविवार
बिषयःः #दोस्ती#

विधाःः क्षणिकाऐं
1)
स्वार्थ की डोली में
दोस्ती कहार
नहीं मिलता करार
झूठी सिर्फ़ दिखावटी वहार।
2)
कहीं हैं श्री कृष्ण सुदामा
दोस्ती जीने का बहाना
फिर वही राग पुराना
कहीं चाहिए दोस्ती की बैशाखी
मनमानस हमारा पापी।

स्वरचितः ः
इंजी शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
जय जय श्री राम राम जी

# दोस्ती#क्षणिकाऐं
4/8-2019/रविवार

 पथरा गई मेरी आंँखें ,अब तेरे इंतजार में ।
नहीं होता काम अब, हूँ बहुत लाचार मैं ।।


लौट आ बेटे मेरे ,बहुत अकेला रहा मैं ।
थक गया हूँ अब, नहीं चल पाता मैं ।।

बेटे के जन्म से, बहुत खुश हुआ मैं ।
परदेस की रौनक में ,याद नहीं रहा मैं ।।

कितने दुःख सहे पर,खामोश सदा रहा मैं ।
कैसे तेरी बुराई करता, बाप तेरा हूँ मैं ।।

अंत समय आना, यही इच्छा रखता हूँ मैं।
अपना कंधा देना, थोड़ा सम्मान पाऊंगा मैं ।।

आजा अब लाल मेरे, बहुत प्यार करता हूँ मैं।
अपने चंद लमहे मुझे दे ,चैन से जाऊंगा मैं ।।

वीणा वैष्णव 

कांकरोली
4-8-19
(वर्तमान हकीकत को दर्शाती, एक बुजुर्ग की जुबानी 

भावों के मोती दिनांक 4/8/19
स्वपसंद लेखन
लघुकथा 

भईया मेरे राखी के बंधन को निभाना 

घर का माहौल बोझिल है । आज राखी के दिन भी सरला गुमसुम सी बैठी है । नहीं तो अब तक वह घर सिर पर उठा लेती थी: 

" माँ मैं कौन सा सूट पहनूँ, अभी तक राखी भी नहीं खरीदवाई आपने इस बार तो गणेश जी की बड़ी राखी लूंगी मयंक भईया के लिए और हाँ , माँ उन्हे गुलाब जामुन पसंद है , एक किलो ले लेंगे ।"

सब कुछ एक क्षण में बदल जाऐगा सोचा भी न था ।

पिता जी स्वाभिमानी है , कारोबार में घाटा हो गया था और भईया का आईएएस मे सिलेक्शन होने के बाद पोस्टिंग दूसरे शहर में हो गयी थी , उनके आने की भी कोई खबर नही थी । इस बार राखी सूनी सूनी थी ।

रात के 9 बज रहे थे । मौहल्ले की सभी बहनों ने अपने भाईयों को राखी बांध दी थी , और बाहर सन्नाटा था ।

अपने बचे पैसों से सरला एक राखी और दो पेड़े भर लाई थी । 

माँ ने दरवाजे की कुण्डी लगा दी थी , पापा सो गये थे और सरला सोने का उपक्रम कर रही थी ।

अचानक दरवाजे पर खट खट की आवाज ने सरला को विचलित कर दिया । माँ ने दरवाजा खोला । मयंक बेहद थका सा खड़ा था , वह कार से निकला तो सुबह से था लेकिन जगह जगह बरसात के कारण रास्ते बंद थे । तभी मुरझाया चेहरा लिए सरला आई । माँ ने एक सांस में घर के पूरे हालात बता दिऐ । 
चाय नाश्ते के बाद सरला राखी लाई और मयंक को बान्ध दी । पिताजी अंदर के कमरे से बाहर के हालचाल देख रहे थे । तभी मयंक ने चेक बुक निकाली और दो लाख रूपये भर कर सरला को देते हुए बोले : 

" सरला, भाई बहन का राखी पर रिश्ता सिर्फ मिठाई गिफ्ट तक सीमित नहीं रहता है , सुख से ज्यादा दुख परेशानी में साथ निभाने का है , सरला यहाँ इतना कुछ हो गया लेकिन तुमने नहीं बताया, खैर अब पापा तो पैसे लेंगे नहीं, लेकिन इन पैसों को फिर से कारोबार में लगा कर घाटा दूर करना और अगले साल हम फिर पहले की तरह राखी मनाएंगे । " 
इस राखी पर सरला की , मयंक के प्रति भ्रान्तियाँ दूर हो गयी थी और उसके चेहरे पर मुस्कराहट आ गयी थी । माँ के चेहरे पर संतुष्टि थी और पापा अगली सुबह नये जोश के साथ कारोबार शुरू करने वाले थे ।

स्वलिखित लेखक संतोष श्रीवास्तव भोपाल

04/08/2019
सभी मित्रों को समर्पित 🌹🌹
ाइकु (5/7/5)
(1)
प्रेम है डोर
"मित्रता" की पतंग
तूफां में संग
(2)
"दोस्ती" की नींव 
विश्वास का मकान
चूमे आसमाँ
(3)
"दोस्ती" हमेशा
भरी जेब की जैसे
भले दो पैसे
(4)
धन गरीब
"दोस्ती" से भरा घर
रंक अमीर
(5)
ना कोई तार
"दोस्ती" करे संवाद 
प्रेम संचार
(6)
"दोस्ती" बेशर्त
मरते दम बाँटे
सुख या दर्द
(7)
पिरो के मन 
सुई - धागे सी "दोस्ती" 
सिलते गम
(8)
कर्तव्य पथ
मित्रता को दे मान
चलते "राम"
(9)
कृष्ण-सुदामा 
मित्र की पहचान 
हृदय स्थान 

स्वरचित 
ऋतुराज दवे, राजसमंद
नमन भावों के मोती
स्वतंत्र विषय लेखन
तिथि-04अगस्त2019
वार-रविवार
विधा-ग़ज़ल

2122 1212 22(112)

क्या कहें कैसी तेरी आदत है,
तुमको मुझसे ही क्यों शिकायत है।

पूछे तन्हाई से मेरी जो तू,
बस मुझे तेरी ही जरूरत है।

मैंने कब छेड़ी हैं लटें तेरी,
ये हवाओं की ही शरारत है।

तुम उठाती हो जब निगाहों को,
ख़ुद से ही करता दिल बगावत है।

इस क़दर छाये जीस्त पर वो मेरी,
कत्ल की जैसे कोई चाहत है।

दिल को अपने तो लाख समझाया,
पाल क्यों बैठा उसकी हसरत है।

बज़्म में आये इस तरह से वो,
चार सू जैसे बस कयामत है।

देखकर तुमको लगता है अब यूँ,
ज़िन्दगी बस तेरी ही नेमत है।

इश्क़ होगा मेरा मुक़म्मल 'रण',
ऐसी शिद्दत से की इबादत है।

पूर्णतया स्वरचित,स्वप्रमाणित
सर्वाधिकार सुरक्षित

अंशुल पाल 'रण'
जीरकपुर,मोहाली(पंजाब)

भावों के मोती
विषय-स्वतंत्र लेखन
=============
पानी से जीवन हँसे,
पानी से प्रकृति सजे।
पानी जीवन की मुस्कान,
पानी ही ले-लेता जान।

पानी नहीं तो त्राहि-त्राहि,
पानी-पानी तो त्राहि-त्राहि।
पानी जीवन,पानी मृत्यु,
पानी बिन न चले संसार।

घन नहीं बरसे तो मन तरसे,
घन जोर से बरसे,मन हर्षे।
पानी-पानी अंदर बाहर,
जन-जन पानी को कोसे।

मुश्किलों के बीच जीवन से प्रीत,
पानी के बीच बचपन और जीव।
बहा घर-द्वार नदी की धारा,
ढूँढतीं फिरें ज़िंदगियाँ आसरा

बिखरते सपनें निहारे नयन,
कुदरत के आगे असहाय बैठ।
वर्षा प्रकोप बनकर बरसी,
ज़िंदगी आसरे को तरसती।

अपना महत्व बताए पानी
अपना क्रौध दिखाए पानी
पानी जीवन का आधार है 
पानी ही है मौत का द्वार
***अनुराधा चौहान***© स्वरचित

मंच को नमन 
दिनांक-04-08-2019
विषय-सावन का महीना

सावन का महीना
--------------राज़ बदायूँनी

सावन का महीना गयो आय।
कॉवरिया कॉवर लाय रहे।।
प्रिय भोले को रहे मनाय।
कॉवरिया जल भर लाय रहे।।

ये तो झूमत नाचत जाय रहे।
कछु हँस मुस्कावत जाय रहे।।
कोई गाते बजावत जांय।
कॉवरिया जल भर लाय रहे।।
सावन का-----------------

कछु साईकिल पे असवार भये।
कोई नंगे पॉव जाय रहे।।
कछु मोटर कार से जांय।
कॉवरिया जल भर लाय रहे।।
सावन को------------------

कोई काशी वनारस जाय रहे।
कोई हरिद्वार से लाय रहे।।
कछु कछला से भर लांय।
कॉवरिया जल भर लाय रहे।।
सावन को-----------------

कोई कॉवर खड़ी मन भाय रही।
कोई कॉवर डाक लुभाय रही।।
कछु दौड़त भाजत जांय।
कॉवरिया जल भर लाय रहे।।
सावन को------------------
----------------
गीतकार-राज़ बदायूँनी
बाजार कलां उझानी
जनपद -बदायू्ँ उ.प्र

"नमन भावों के मोती"
दिनांक :- 4/8/19. 
'मन पसन्द लेख़न

"युवा-वर्ग को आह्वान"
******************
सखे! पग अपना बढ़ा रे!
कब तक मिलेगी रोशनी, 
इस टिमटिमाते दीप से। 
बिन बूँद कैसे मिलेगा, 
मोती चमकते सीप से। 
रूढ़ि-पथ जर्जर हैं अब, 
निर्माण कर नव रीति से। 
मीत गफलत को तजो अब,आश का सूरजउगा रे! 
सखे!पग अपना बढ़ा रे! 
निर्झर जल-धारा बन अब,
राह सुगम तू करता चल। 
बाधाओं से मत घबरा,
दूर सभी को करता चल। 
दीन - हीन दुखियारों के, 
कष्ट-निवारण करता चल। 
कैद हैं सपने युगों से, मुक्ति का सपना सजा रे! 
सखे!पगअपना बढ़ा रे! 
दीप बनके हर दिशा से, 
तिमर-तम को दूर कर दो। 
द्वेष की पुख्ता दीवारें, 
तोड़ चकनाचूर कर दो। 
पेट कोई भूखा रहे ना, 
अन्न-धन भरपूर कर दो। 
अब समय है निकालो जो,तीर तरकश में पड़ा रे! 
सखे!पगअपना बढ़ा रे! 
माँ 'भारती' तुमको पुकारे, 
सब बंधनों से मुक्त कर दो।
कष्ट सब उसके मिटा दो, 
सब सुखों से युक्त कर दो। 
हैं बंटे बैठे जो धड़ो में, 
सभी को संयुक्त कर दो। 
द्वेष नगरी से निकल अब,प्रीत-पथपर ड़ग बढ़ा रे।
सखे!पगअपना बढ़ा रे।
*****************************************
स्वरचित व मौलिक, 

एल. आर. राघव "तरुण" 
बल्लबगढ, फरीदाबाद।

नमन "भावो के मोती मंच "
सुप्रभात मित्रों 🙏🙏

दोस्त दिवस 
बधाई हो अपार
साथ है सदा 
बचपन के मित्र
बिखर गये कई ।

पति सानिध्य 
आजीवन मित्रता 
लिया संकल्प ।
दुःख सुख का साथ 
बना रहे ये प्रेम ।

माँ की मित्रता 
साझा की सब बात
निस्वार्थ स्नेह 
सीखा सांसारिक ञान 
मिला आँचल छाँव ।

बच्चों का प्यार
बढता उनके साथ 
हुई सम्पूर्ण 
छूले नई ऊचाईयां 
दिल की यही प्यास ।

#स्वरचित 
# नीलम श्रीवास्तव

नमन भावों के मोती
दिनांक : - 4/8/019

गोल्डन गर्ल " हिमा दास "

जब चयनित ट्रेनिंग के लिए हुई थी
खुश बहुत थें पापा की 
लाडो बेटी को
तीन वक्त का खाना
अब मिल पाएगा
ना हो कुछ हासिल तो क्या
कुछ दिन तो कट जाएगा। 

कहाँ पता था कि 
हिमा ऐसा इतिहास रच देगी
दौड़ -दौड़ कर
आसमां से तारे तोड़
पापा का गोद भड़ देगी। 

मिटा दी सब
ऊँच - नीच की खाई
हिमा ने ऐसी दौड़ लगाई
तोड़ती है वह नित नएँ रिकॉर्ड
दौड़ती ऐसी वह युवा जोश। 

थी गुमनाम जो कल तक
आज कहते सब उसे गोल्डन गर्ल है
अपने हौसले से लिखीं 
वह अपनी तकदीर
कोहिनूर बन चमकी है। 

स्वरचित : - मुन्नी कामत।

#दिनांक"४"८"२०१९:
#विषय: एक्छिक लेखन:
#विधा:काव्य:
#रचनाकार:दुर्गा सिलगीवाला सोनी:

*"""_"""* समय *"""_"""*

चले सतत निरन्तर और लगातार,
चलते रहना ही है इसका आधार,
यह नित्य क्रमशः ही चलता जाए,
जो ना रुके वही तो समय कहलाए

वह भूतकाल कभी हुआ करता था,
अब यह भविष्य अपना कहलाता है,
एक क्षण को भी कभी ये रुके नहीं,
यही वर्तमान भी अपना बन जाता है,

पल पल बदले समय का मिजाज,
खेल इस समय के कितने निराले हैं,
ये प्रतिकूल हुआ अंधकार है जग में
अनुकूल जो हुआ तो फिर उजाले है,

एक पल एक क्षण या घड़ी भर को,
वश इस पर ना किसी का चलता है,
जैसे चढ़ता है सूरज हर एक पल में,
पराक्रम सांझ के ढलते ही ढलता है,

यह तो राजा को भी एक रंक बना दे,
हरिश्चंद्र की कहानी भी एक सीख है,
धर्मराज भी खुद ही उलझे थे पांसे में,
समय की तो सकुनी से भी प्रीत है,

कभी तो ये समय ना काटे कटता है,
कभी तो समय का बड़ा ही अभाव है
कैसे काटे होंगें उन्होंने वो चौदह बरस,
हृदय में श्री राम के कितने ही घाव हैं,

"दुर्गा"तुम भी समय की करो प्रतीक्षा,
वो समय एक दिन जरूर ही आएगा,
वक़्त के घावों ने तुम्हे जो दर्द दिए हैं,
तुम्हें मरहम खुद वक़्त ही लगाएगा,

 सम्मानित मंच
4 - 8 - 19 , रविवार
मन पसंद .... रचना
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गीतिका
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मन चंचल मन बावरा, नहीं मानता बात,
कभी बढ़ाता प्रीत यह,कभी घात-प्रतिघात

बड़ी पहेली मन बना, अजब गजब से खेल
सुबह शाम देखे नहीं, करता है उत्पात।

मनमानी जो भी करे , बन जाता है क्रूर,
इधर उधर देखो सखा, दिखलाते औकात।

मन में उठते भाव पर , रखना सदा लगाम,
बिना नियंत्रण मन रहे, बिगड़ेंगे हालात।

बंधन या निर्वाण का, मन बनता आधार,
सरल सहज यह बात है, वेद वाक्य विख्यात।।
~~~~~~~~~
मुरारि पचलंगिया

शीर्षक, आखिर क्यो ??
😔😔😔😔 
आखिर क्यो होता है तलाक 
आखिर क्यो होता है तलाक 
औरतो पर अत्याचार
आखिर क्यो औरत ही यह 
सितम सहती है 
और घुट घुट कर रहती है 
पुरुष भी तो तलाक लेता है 
वो कैसे खुश रहता है 
आखिर क्यो होता है तलाक
पुरुष अपने बच्चो को 
त्याग कर एक नया घरौंदा बसाता है 
आखिर क्यो होता है तलाक 
औरत पर जो ढाये सितम पुरुष ने ,
वो सब भूल जाती है
आखिर क्यों??
और उसी के बच्चो को ले जाकर उनके लालन-पालन में जुट जाती है
अपनी खुशियों का कर त्याग 
वो सिर्फ एक माँ बन जाती है 
करना पड़े उसे हर समझौते को 
स्वीकार वो सहज कर पाती है
आखिर क्यो होता है तलाक
बस अपने बच्चो के खातिर 
मर मिटने को तैयार हमेशा रहती है 
आखिर क्यो होता है तलाक
एक दिन उसके बच्चे हो 
जाते हैं बड़े पढ़ लिख कर विद्वान
उसी औरत का कर जाते हैं अपमान
वृद्धा आश्रम पहुँचाना हो 
या बनाना हो घर की
नौकरानी उसे बना जाते हैं
आखिर क्यों ??
आखिर क्यो होती है ऐसी औरत 
हर दर्द सहज सह जाती है फिर भी 
बेटा बेटा करके नही वो थक पाती है 
आखिर क्यों ??
आखिर क्यो बनाया औरत को 
इतना निर्मल और निश्छल 
कि सबके पापो को वो 
अपनी ममता करुणा प्रेम
से माफ कर पाती है
आखिर क्यों ??
मैं पूछती हूँ क्यो होता है तलाक ???
पुरुष को कोई सजा नही 
मन से कोई गिला नही
बस मौज मस्ती में चूर है 
दर्द और प्रेम से दूर है
आखिर क्यो आखिर क्यो ??
स्वरचित -हेमा जोशी

वारः- रविवार
विधाः- हास्य व्यंग्य सृजन
शीर्षकः- दूसरे की पत्नी पर कविता लिखियो नाय
श्रध्देय काका जी एक रात घर हमारे थे आये ।
बोले पड़ा है खाट पर, चरण मेरे छूता तू नाय ।।
हड़बड़ाकर हो गया मैं तुरन्त ही एकदम खड़ा ।
अगले ही मैं, उनके चरणों में जाकर था पड़ा ।।
प्यार से भरा चाँटा गाल पे हमारे उन्होंने जड़ा ।
उस चाँटे में उनके आया आनन्द मुझको बड़ा ।।
आने से पहले मिले थे तुम्हारी माताजी व पिताजी ।
दोनों ने तुमको प्यार तथा आशीष मेरे हाथ भेजी ।।
रहते थे तुम चुस्त, तथा दीखते थे बड़े होशियार ।
ढ़ीले ढ़ाले से पड़े हो कैसे तुम अब बरखुरदार ।।
बोला शर्मा कर, लिखना कविता रहा हूँ मैं सीख ।
दे दीजिये आप ही काका, मुझे कोई उत्तम चीज़ ।।
लिखना कविता पत्नी पर दूजे की कभी तुम नाय।
दूजी की पर लिखोगे, रहोगे सदा कुटाई करवाय।।
कुपित हुई तो वह स्वयं ही, तुमको पीटेगी आय ।
वरना पति उसका तो हर हाल में ही कूटेगा जाय ।।
खिल गईं बांछे मेरी,बोला जाता हूँ मैं पत्नी के पास ।
सुनाता हूँ जाकर उसको कविता मैं बहुत ही खास।।
अच्छी नहीं है बात तुम्हारी देती हो बहुधा मुझे डाट ।
डाट से हो जाता है दिमाग मेरा सोलह दूना आठ ।।
बोले काका, खोपड़ी में तेरी मगज़ लगता है नाय।
कविता करने को कहा मैंने सत्य बोलने को नाय।।
उठो मेरे अल्बेले सनम, ले आई हूँ मैं चाय बनाय।
सुन्दरतम नार के रूप के रस पान का पाया भाग्य।।
कर लिया प्राप्त व्यथित हृदय, इतनी शीघ्र ही ज्ञान।
मुस्कुराते हुये हो गये काका भी तुरन्त अर्न्तध्यान ।।
समझ में मेरी आया नहीं काका रहे थे क्यों मुस्काय।
दोनों बार ही तो मैने झूठ बोला था किंचित भी नाय।।
डा0 सुरेन्द्र सिंह यादव
“व्यथित हृदय मुरादाबादी”
स्वरचित

नमन" भावों के मोती "🙏
शुभ दोपहर,🌹💐🌹💐🌹
विषय- विरह
विधा- इन्द्रबज्रा छंद
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इन्द्रबज्रा छंद
221 221 121 22

मुखडा
बातें सुहानी कुछ आज लाओ
देखो नहीं यूँ कुछ पास आओ

अंतरा

आजा झडी सावन ने लगायी,
आँखें बही बारिश लौट आयी,
वादा किया है तुम भी निभाओ,
वो प्यार के गीत मुझे सुनाओ ,

देखो नहीं यूँ.........

अंतरा

यादें रुलाने मुझको लगीं हैं,
रातें सुहानी तड़फा रही हैं ,
दूरी मिटाने अब साथ आओ,
बातें करेंगे तुम पास आओ,

देखो नहीं यूँ........ ........

अंतरा

बीते दिनों म़ें फिर खींच लायीं,
देखो बहारें फिर झूम आयीं ,
काली घटाएं तुम साथ आओ,
प्यारे पिया को तुम भी लुभाओ

देखो नहीं यूँ........ टेक

स्वरचित
नीलम शर्मा#नीलू
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दि- 4-8-19
विषय- स्वैच्छिक 
सादर मंच को समर्पित -

🌸 गीतिका 🌸
**************************
छंद- भुजंग प्रयात 
( वाचिक मापनी युक्त )
मापनी- 122 , 122 , 122 , 122
समान्त- अलना , अपदांत
🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀

जिधर देखिए भेड़िये हैं , सँभलना ।
नहीं है सरल शान्ति से दाल गलना ।।

गयी बात यह खौफ बिन हम जिये थे ,
मगर अब कठिन, राह से बच निकलना ।

यहाँ तो निगाहें करें ताक-झाँकी ,
बड़ा ही जटिल है बचा जिस्म चलना ।

जहाँ राक्षसी हो गयीं भावनाएँ ,
कहाँ रोंद दे कौन ,कब , मौत छलना ।

करें रात-दिन खौफ बहशी जुनूनी ,
न संवेदना है नहीं दिल पिघलना ।

न जाने कहाँ खो गये मूल्य नैतिक ,
हमें चाहिए आज सूरत बदलना ।

बढ़ें साहसी मात दें मिल सभी को ,
तभी हो सकेगा वतन शान्ति पलना ।।

🍊💧🌸🌹

🌴🌻**....रवीन्द्र वर्मा आगरा 

नमन मंच
दिनांक ४/८/२०१९
स्वतंत्र-लेखन
मित्रता दिवस विशेष।
हाइकु
१)
जीवन नैया
मित्र बने साहिल
पार लगाये।
२)
मित्र अमोल
जीवन है बगिया
खुशबू भरे।
३)
जीवन राग
मित्र बने संगीत
गाये जिंदगी।
४)
मित्र हमारे
सुख दुख के साथी
नीरस भागे।
५)
परम मित्र
क्यों ठाकुर सुहाती?
सत्य बताये।
स्वरचित-आरती-श्रीवास्तव


 नमन भावों के मोती
दिनाँक-04/08/2019
विषय -कर बुरा,हो बुरा

विधा-लघुकथा

एक समय की बात है कि एक पहाड़ी पर एक साधु रहता था।उसके पास शिवाय एक कुटिया के कोई धन संपत्ति न थी। वह शिवाय दो वक्त की रोटी के कोई इच्छा न रखता था।

पहाड़ी की तलहटी पर बसी एक छोटी सी बस्तीसे भीक्षा मांगकर वह जीवन यापन करता था।वह हर रोज पाँच सात घरों से रोटी लेकर वापिस अपनी कुटिया में चला जाता था।

साधू का हर रोज भीक्षा मांगना एक औरत को पसंद नहीं आ रहा था।वह उस साधू से ईर्ष्या करने लगी।यहाँ तक कि उसने साधू को ज़हर देकर मारने की योजना बना डाली और रोटी में ज़हर मिला देती है।

संयोग से उस दिन वह साधू सबसे पहले उसी घर में चला जाता है। रोटी लेकर अपने पात्र में रख लेता है और छः सात घरों से रोटी लेकर वापिस अपनी कुटिया में चला जाता है। कुटिया में जाकर भोजन करता है।सात रोटियों में से दो रोटी बच जाती हैं।वह ज़हर वाली रोटी उन्हीं में थी क्योंकि वह सबसे नीचे थी।

रविवार का दिन था।बच्चों ने मिलकर पहाड़ी पर जाने का मन बना लिया था। पहाड़ी पर घूमते हुए बच्चे थक गए थे उन्हें प्यास भी लगी थी। वे उस साधू की कुटिया में पहुँच गए।बच्चे साधू से प्रणाम करते हुए बोले-"साधू जी, हमें प्यास लगी है और हम थक गए हैं।" साधू बोले-"आओ ! बैठो , विश्राम करो। पानी पीओ।" उनमें से एक बच्चा बोला-"साधू जी, मुझे तो भूख लगी है।" साधू ने कहा -"बेटे पात्र में दो रोटी रखी हैं, आनन्द से खाओ।" उस बच्चे ने रोटी खाई और चन्द मिनट बाद ही भगवान को प्यारा हो गया।उसके साथियों ने तुरंत बस्ती में जाकर यह घटना बताई।बस्ती से काफी लोग एकत्रित होकर साधू के पास गए ।

जैसे ही लोगों की भीड़ ने उस मृत बच्चे को देखा।उसी समय भीड़ में शामिल एक औरत चिल्लाने लगी-"हाय! ये क्या अनर्थ हो गया है। ये तो मेरा ही बेटा है।" 

वह विलाप करते हुए कहती है-"साधू को मारने के लिए मैंने ही रोटी में ज़हर मिलाया था। मैं दूसरे का बुरा चाहती थी। मेरा ही बुरा हो गया।"

स्वरचित
अशोक कुमार ढोरिया
मुबारिकपुर(झज्जर)
हरियाणा

 नमन मंच
आयोजन - मनपसन्द लेखन 
व दृश्य श्रव्य प्रस्तुति

वार - रविवार
तिथि - 04/08/2019
विषय - हास्य व्यंग्य
विधा - घनाक्षरी
==============

लन्दन से पढ़कर , भारत में एकबार ,
डाॅक्टर ये सोचता था , रुपया कमाऊँगा |

करता शराबियों का , डाॅक्टर इलाज वह ,
उसका था दावा यही , दारू छुड़वाऊँगा |

आकर शराबी इक , बोलता है डाॅक्टर जी ,
मेरी छुड़वाय दो तो , फीस देके जाऊँगा |

दारू बीस बोतल थी , पुलिस ने छीन लिया ,
''माधव'' सुना था नाम , आज मान जाऊँगा |

#स्वरचित
#सन्तोष_कुमार_प्रजापति_माधव
#कबरई_महोबा_उ_प्र_

नमन मंच को 🙏🙏
दिनांक _४/८/२०१९
स्वतंत्र लेखन 
िधा _ चौपाई छंद

हे कान्हा हम दास तुम्हारे। हृदय नाथ हम तुमसे हारे।।
हरहु नाथ मोहि पीर घनेरी। मुझे बना लो अपनी चेरी।।
तुम्हे छोड़ किस राह चलेंगे। निज मानस ही नित्य छलेंगे।।
प्रेम भाव तुमसे मोहि नाथा। गाऊँ नित्य तुम्हारी गाथा।।

सकल सृष्टि के पालक तुम हो। किन्तु नन्द के बालक तुम हो।।
तुम्ही दया के सागर प्यारे। तुम्ही नेह करुणाकर प्यारे।।
तुम्ही प्रेम हो तुम्ही साधना। तुम्ही ईश हो तुम्ही वंदना।।
चरण शरण दे दो यदि हमको। छोड़ चलूं नश्वर इस जग को।।

तनुजा दत्ता (स्वरचित)

Damyanti Damyanti

 नमन मंच भावो के मोती 
स्वपंसद लेखन |
लघु कथा |जरुरत मंद की मदद|

एक बार अमित घूमते घूमते घर से दूर निकल गया |गर्मी का मोसम प्यास लगी |कही पानी दिखाई नही दिया |मात्र एक घर किसी अमीर का |अमित गरीब था वेशभूषा भी वैसी ही |पर मरता क्या नही करता |हिम्मत करके पीने के लिए पानी मागा पर अमीर नहीं पसीजा |वह प्यासा ही लौट गया |जैसे तैसेघर लौटकर पानी पीकर प्यास बुराई|
कुछ समय बीता वही अमीर राह भटक कर इधर उधर मारा मारा फिरकर अमिव की झोपडी मै पहुँचा |पीने के पानी मागा |अमित पहचान गया |पर अमित ने प्रेम से बिठाकर पानी पिलाया |कुछ जो पास था खिलाकर बिदाकिया |अमीर ने रुककर कहा आपने मदद करबडा उपकार किया|जो सोन व खाने की व्यवस्था की |अमित उसे घर तक छोडने गया ||
वहाँ अमीर नेउसका सत्कार करना चाहा |तब अमित ने पूरी घटना सुनाई |ओर कहा साहेब जरुरत मदं की सेवा परमोधर्म है |यही ईश्वर सेवा है |
स्वरचित ,,दमयंती मिश्रा

द्वितीय प्रस्तुति
छंद - सरसी 
सरसी छन्द में गीत 
विधान - 27 मात्राएँ , 16, 11 पर यति , अंत में गाल ।
समांत - आस,
****

एक डाल के सब पंछी हैं ,सबमें है कुछ खास।
किसी कमी पर कभी किसी का,मत करना उपहास।

सिक्के के दो पहलू होते , जैसा करें विचार,
पतझड़ बाद बहारें आतीं,ये जीवन का सार।
सुख दुख तो आना जाना है,मन क्यों करे उदास,
चार दिनों का जीवन बाकी,करो हास परिहास।।
किसी कमी ...

सरल नहीं है मंजिल पाना ,ऐसा रखिये ध्यान,
निष्ठा और समर्पण करते ,मंजिल को आसान।
आत्मविश्वास की ताकत से,करें नित्य अभ्यास,
जो डरे नहीं बाधाओं से ,वही रचे इतिहास ।।
किसी कमी पर ...

साथ भला क्या ले जायेगा,निज कर्मों को छोड़,
अब अच्छे कर्मों से अपने,खाते में कुछ जोड़ ।
परोपकार में तन लगा दें,भूखे को दे ग्रास।
सतकर्मों से मिट पायेगा,धरती माँ का त्रास।।
किसी कमी ...

जो होना वो होकर रहता ,कहता कर्म विधान,
डर डर के जीवन क्या जीना ,रखिये स्व अभिमान।
आशाओं का दीप जला के,मन में करें उजास,
भाग्य का लेखा कहाँ टला , राम गये बनवास।।
किसी कमी...

एक डाल के सब पंछी हैं ,सबमें है कुछ खास।
किसी कमी पर क भी किसी का,मत करना उपहास।

नमन मंच 
4,8.2019
रविवारीय आयोजन
मनपसंद विषय लेखन 

सावन गीत 
💦

सावन आय गयो मनभावन
💦💦💦💦💦💦
सावन आय गयो मनभावन
गरजे-बरसे मेघा आँगन।।

धरती प्यासी,मनवा प्यासा,
प्यासा सब संसार
सबके मन की बात सुने है,ये
सावनी बयार
बदरा रिमझिम बरसे आँगन
भीगे सावन, भीगे तन-मन।।

झीनी-झीनी पड़े बुँदरियाँ धरती पर हरियाली
धरती ओढ़े धानी चुनरिया,घर-घर में ख़ुशहाली
घर-घर लग गए झूले आँगन
मायका आज हुआ मनसायन।।

ढोलक-ताल मंजीरे बजते,
गीतों की रुत आई
झूला झूलें,कजरी गाएँ,सखियाँ
हैं मुसकाई
हिलोरें लेता है सबका मन
सुख से भरा सभी का आँगन।।

बाबुल के घर आँगन बेटी,लाई
देखो ख़ुशियाँ
त्यौहारों का मौसम आया,हरी-भरी है दुनियाँ
सजन का सूना कर के आँगन
सजाए बाबुल का घर-आँगन।

स्वरचित 
डॉ० दुर्गा सिन्हा ‘ उदार ‘

 नमन"भावो के मोती"
सभी को मित्रता दिवस की हार्दिक बधाई🌹🌹
04/07/2019
िषय:---"मनपसंद"
################
प्रेम का पाठ सभी को हम पढ़ा देते हैं।
सोए भावो को भी उल्फत से जगा देते हैं।।

दूनिया वाले कुछ भी कहे परवा नहीं।
हर हाल में भी प्यार करके दिखा देते हैं।।

मंजूर है दे दो अब कोई सजा।
नफरतों को भी हम चाहत सिखा देते हैं।।

झेलकर दूनिया के सारे जुल्म औ सितम।
हम शिकवे गिले मन से भुला देते हैं।।

दिल की गली हो कितनी भी अंधेरी।
प्रीत का दीया चौराहों पे जला देते हैं।।

आँधियाँ हिंसा की चाहे चले जोरों से।
लेकर जान हथेली पर भी दिखा देते हैं।।

याद रखेगा जमाना हमें मरने के बाद।
दुश्मनों को भी हम दिल से दुआ देते हैं।।

नफरतों के तूफानों से तू न घबराना दोस्त।
हम खुशी से गमों को भी निभा देते हैं।।

दूनिया से बैर भाव को मिटा करके।
दोस्ती का फूल हर दिल में खिला देते हैं।।

स्वरचित पूर्णिमा साह
पश्चिम बंगाल ।।

नमन भावों के मोती 
विषय - विषय मुक्त 
04/08/19
रविवार 
गज़ल 

जमाना न जाने चला है किधर, 
नहीं राह मंजिल की आती नजर।

जो इंसा को गुमराह करती सदा, 
वही सबने जीवन की पकड़ी डगर।

न संवेदना है , न है दिल्लगी,
यूँ लगता है रिश्तों से सब बेखबर।

उदासी का मंज़र है चारों तरफ,
तमन्ना दिलों की गयीं हैं बिखर। 

चलो मिलकर हम एक वादा करें,
कि लाएं नई जिंदगी की लहर।

सही अर्थ जीवन का जाने सभी,
हो पूरा खुशी से सुहाना सफ़र।

स्वरचित 
डॉ ललिता सेंगर


शुभ साँझ
ग़ज़ल

तिश्नगी आँखों की जाती नही 
सुकून यह रूह कहीं पाती नही ।।

मिले मुद्दतों से हम बड़े शौक से 
बेरूखी रब की समझ आती नही ।।

दो पल की ही वो कहायी दिलाशा 
कौन कहे स्वप्न में अब आती नही ।।

और भी नश्तर चुभा दर्देदिल पर 
कैसे कहूँ गजब वह ढाती नही ।।

सुनी बात हँसकर ऊँगली दबायी 
क्यों कहूँ सूरत अब तड़फाती नही ।।

जादूगरनी ने जादू किया दिल पर
वो दवा 'शिवम' कहीं कहाती नही ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 04/08/2019

नमन मंच भावों के मोती
3/8/2019
बिषय स्वतंत्र लेखन
सावन.आया रे मन भाया 
फुर फुर उड़त फुहार
झूला झूलें नंदकुमार
छाई बदरिया रे मतवाली नीली नीली काली काली
मंद मंद सुगंध पवन की धीमी चलत वयार।।
झूला डाला कदंब की डारी
झूल रहे हैं कुंजबिहारी
आप झूलें सारी सखियां झुलावें
छाई मस्त बहार।।
एक श्याम गोपियां बहु सारी

चकित भए नारद मुनि भारी
जित देखो उत श्याम श्यामा लीला करत अपार।।
सुंदर सोहें बांकेबिहारी
गले बैंयां डालें वृषभानु दुलारी
मनमोहन की छवि देख देख मोह रहो संसार।।
झूला झूलें नंदकुमार
स्वरचित ,भजन,
सुषमा ब्यौहार

 तृतीय प्रस्तुति

क्षणिका दोस्ती

***
छोटी सी दुनिया थी मेरी 
एक मैं और एक दोस्ती तेरी ,
दोस्ती वो सच्ची थी
पल में कुट्टी ,पल में मुच्ची थी।
मैं जब भी राह भटकी 
तुम हाथ मेरा थाम के
सहारा बन जाते 
वर्षों बाद भी मेरी दुनिया
उतनी ही छोटी 
और तुम्हारी!
2)
दोस्ती की नींव 
के पत्थर ,
बहस करते हुए 
मित्रता की बुनियाद 
मैं संभाले हुए 
तभी कांच की 
छनाक आवाज 
किरक चुभी थी
दीवारों में दरार 
पड़ी तभी थी ।

स्वरचित 
अनिता सुधीर

 भावों के मोती
4/08/19
बिषय-स्वतंत्र लेखन

विधा-अतुकान्त कविता

एक बूंद का आत्म बोध

पयोधर से निलंबित हुई
अच्युता का भान एक क्षण,
फिर वो बूंद मगन 
अपने में चली,
सागर में गिरी,
भटकती रही अकेली,
उसे सागर नही
अपने अस्तित्व की चाह थी,
महावीर और बुद्ध की तरह,
वो चली निरन्तर,
वीतरागी सी,
राह में रोका एक सीप ने ,
उस के अंदर झिलमिलाता
एक मोती बोला,
एकाकी हो कितनी म्लान हो,
कुछ देर और
बादलों के आलंबन में रहती,
मेरी तरह स्वाती नक्षत्र में
बरसती तो देखो,
मोती बन जाती
बूंद ठिठकी,
फिर लूं आलंबन सीप का !!
नही मुझे अपना अस्तित्व चाहिये,
सिद्ध हो विलय हो जाऊं, 
एक तेज में।

कहा उसने.... 
बूंद हूं तो क्या
खुद अपनी पहचान हूं 
मिल गई गर समुद्र में क्या रह जाऊंगी,
कभी मिल-मिल बूंद ही बना सागर ,
अब सागर ही सागर है,बूंद खो गई !
सीप का मोती बन कैद ही पाऊंगी ,
निकल भी आई बाहर तो 
किसी गहने मे गूंथ जाऊंगी,
मैं बूंद हूं ,स्वयं अपना अस्तित्व,
अपनी पहचान बनाऊंगी। 
स्वरचित
कुसुम कोठारी ।

मन भावों के मोती 
मंचस्थ सभी मित्रों को मित्रता दिवस की अनंत शुभकामनायें 🌹🌹🙏

ेरी दोस्ती के सदके 
जी उठे हम मर के ।

संघर्षों की भीषण धूप में 
खिले मित्रता का रूप अनूप 
मित्र तब सच्चा फरिश्ता लगता है ।
कंटकों के सघन वन में जो चुने फूल 
सदाबहार वो रिश्ता रहता है ।

मित्रता हो ऐसी ज्यों गंगा का नीर , 
हर ले जीवन की हर पीर ।

निराशा के बादल जब छाये, 
मित्र उम्मीदों का सूरज बन उग आये ।

हों अंधेरी जब गम की रातें 
जुगनुओं की झिलमिल पांतें 
बन मित्र थामते बाँहें ।

सर्व दोषों की इति 
अथ दोस्ती ।

(स्वरचित )सुलोचना सिंह 
भिलाई (दुर्ग )

भावों के मोती दिनांक 4/8/19
स्वपसंद 
विधा छंदमुक्त 
इतर

सच्चा दोस्त 

मित्र कहो या
दोस्त कहो
फ्रेंड हो या
हो वह कोई 
हमसफ़र 
होना चाहिए 
वह सच्चा साथी

बुरे वक्त में 
साथ निभाएँ 
अगर हो 
राह गलत
सही राह पर 
वह लाएं 

बिगड़ा 
एक दोस्त 
बिगड़ता है
दस को 
करो दोस्ती
सोच समझ कर
चाहे देश हो 
या विदेश

मत तोड़ो विश्वास 
माता पिता का
हैं वह सच्चे दोस्त 
जीवन के

करो नमन 
उस दोस्ती को
जो दें साथ
नि:स्वार्थ 
जीवन में 

स्वलिखित 
लेखक संतोष श्रीवास्तव भोपाल

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"कांच /शीशा ""10अक्टुबर 2019

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