Tuesday, August 13

" ओढ़नी/चुनरी "13अगस्त 2019

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ब्लॉग संख्या :-476


 नमन मंच भांवो के मोती
विषय ओढनी, चुनरी
विधा काव्य

13 अगस्त 20189,मंगलवार

शेरावाली वैष्णव देवी
नित लाल चुनरी पहने।
जय हो जोता वाली माँ
भव्य छटा के क्या कहने।

श्वेत चुनरी माँ भगवती
वीणापाणी हंसवाहिनी।
माँ अज्ञान हरण करती
तुम जग की प्रकाशिनी।

हरित चुनरी माँ वसुधा की
रंग बिरंगे सुमन खिलते हैं।
शस्यश्यामल प्रिय भूमि पर
हिन्दू मुस्लिम गले मिलते हैं।

लाल चुनरी पहने दुल्हन
लाल महावर हाथ सजाती।
लाल लाल है तन मन सारा
कभी लजाती कभी शर्माती।

चुनरी है सृंगार ललना का
मंगल अवसर धारण करती।
रंग बिरंगी चुनरी पहन कर
प्रमुदिता सबका मन हरती।

सत्य अहिंसा राष्ट्र प्रेम की
हिलमिल सब चुनरी पहने।
दया धर्म की डगर बढ़े हम
भारत माता हो धन धन्य।

स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।
भावों के मोती🌹
13/8 /2019
"ओढ़नी"
******************
लिपट तिरंगा ओढ़नी , आज वीर घर आया है
भारत माँ चरणों तले , अपना शीश चढ़ाया है
न रोना तू प्यारी लाडो,, जय जय भारत बोलना
एक नही,दस नाग मिटा,भाई ये घर आया है।।

भूमि है ये वीरों की,तन मन सब न्यौछावर है
अंग भंग का डर नही,साहस मन का सागर है
बुरी नजर से देखे जो,भारत माँ की भूमि को
रक्त ओढ़नी देते है,मौत के हम सौदागर है।।

सुन ओ मेरी प्यारी बहना,राखी जब भी आएगी
धागा मेरे नाम का लेकर,सरहद पर तु जाएगी
मुश्किल से तू न घबराना,पग पीछे न ले आना
गीदड़ भभकी से न तेरी,चुनर कभी घबरएगी।।

क्रमश:

स्वरचित
वीणा शर्मा वशिष्ठ

चुनरी तेरे रूप हजार....
अभिनेत्री का फैशन बने तू
निर्धन की तू लाज 
माँ ओढे़ तो आँचल कहलाए 
दुल्हन का श्रृंगार 

चुनरी तेरे रंग हजार
लाल में बिटिया बने दुल्हनिया
श्वेत पिया वियोग दर्शाये
हरी मेरी धरती माँ की ओढ़नी 
पीली में माँ शारदा सकुचाए

चुनरी तेरे ढंग हजार 
सिर पर ओढ़े ग्रहलक्षमी
गले में ओढ़े कुवारी नार
कमर पर बाँधे लक्ष्मी बाई
बन मारे दुष्ट हजार
नमन-भावो के मोती
दिनांक-13/08/2019
विषय-चुनरी

चुनरी है धानी गोटेदार......

कर के आऊं जब मै सोलह श्रृंगार 

तेरे नैन मुझे देखें, मेरे कजरे की धार......

मेरे होंठ हया की लाली है
कानों में मधुर प्रीति की बाली है।।

हार सजा है कुंदन का
खिले फूल चंदन का
गेसू में हो गजरे का प्यार।।

नैनों में हो अश्रु की जलधार।

जब मैं करके आई सोलह श्रृंगार....।।

मांग मेरी सिंदूर भरा
है टीका उसका पहरेदार।।

मेरे कंगन तुझे बुलाते
बिन सजना ,के ये बेकार
जब मैं करके आई सोलह श्रृंगार ...।।
.
हाथ में भीनी खुशबू है
मेहंदी है ,चुनरी है धानी गोटेदार।।

हाथ में खनके चूड़ी है 
पैरों में पायल की झंकार
मैं करके आई सोलह श्रृंगार....।।

बिन सजना के है बेकार.........

सत्य प्रकाश सिंह केसर विद्यापीठ इंटर कॉलेज प्रयागराज

चुनरी

फटी चुनरी सम्हालती,
किसान की बीटियां ।
धरती में करती बोना,
एक एक बीज़ का ।
देखती खेत का,
कोई खाली ना रहें कोना ।
संजोती हैं सपने,
अपने परिवार,देश के लिए ।
अंकुर के साथ,
आशा होती पल्लवित ।
अपने सपनो की ।
निष्ठुर प्रकृति,
नही देख पाती सपनो को ।
कर देती खेत को लबालब ।
बाढ़ के प्रकोप से ।
बूझते हैं सपने,
उसके संग ।
प्रकृति को करके सर्मपण ।
करती जीवन अर्पण ।
उसी चुनरी संग...

@प्रदीप सहारे

नमन मंच
भावों के मोती
विषय -चुनरी
**********************
हरी-हरी सी चुनरी तेरी,
पीले फूलों का शृंगार,
सज- धज कर तैयार धरा है,
गाते है मस्त बहार!

महक रहे वन उपवन सारे,
फूलों की सुरभि से !
मोर पपीहा तान सुनाते,
रागिनी,दुंदुभि से!
हरे कंच से पात पेड़ पर,
लगते सृष्टि का उपहार!
सज -धज कर तैयार धरा है,
गाते है मस्त बहार..........

आकार ले रहे हरे हरे तृण,
आसक्ति के बंध निराले,
एक दूजे से लिपट रहे है,
लताओं के सुंदर जाले!
मिल ही गया अनमोल खजाना,
झूम गया संसार !
सज- धज कर तैयार धरा है!
गाते हैं मस्त बहार....

धानी चुनरी चारो ओर ही,
ओढ़ी सी दिखती है,
लगता है ऐसे की जैसे,
कोई दुल्हन सी बनती है!
क्या जंगल मैदान भी देखो,
छाई हरियाली भरमार!
सज-धज कर तैयार धरा है,
गाते है मस्त बाहर......

स्वरचित-राजेन्द्र मेश्राम "नील"

शीर्षक-- ओढ़नी/चुनरी
प्रथम प्रस्तुति

कल रँगायी मैंने चुनरी 
आज भयी पिया से दूरी ।।

सच कहूँ सखी मेरी 
किस्मत बड़ी अधूरी ।।

कभी पिया का संग तो 
कभी तंग हाथ मजबूरी ।।

दोनो कभी न हुए संग
बीती जाय उमर पूरी ।।

अब न भाये चूनर ये
और न जेवर न चूड़ी ।।

पिया गये परदेश उन्हे
भाये न कहीं अंगूरी ।।

कौन महूरत ली चुनरी 
अब मैं ये चुनरी घूरी ।।

जिस दिन से लेकर आयी
करूँ पति से नित चिरौरी ।।

पति रिसाने मनाय न माने 
उन्हे कमाई दिखी जरूरी ।।

मैं ही 'शिवम' रूठी रही
गई बजार संग थी नूरी ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 13/08/2019

दि- 13-8-19
विषय- चूनरी 
सादर मंच को समर्पित -

🏵🍀 दोहा गज़ल 🍀🏵
******************************
🌹🌻 चूनरी /ओढ़नी 🌻🌹
🌺🍀🌺🍀🌺🍀🌺🍀🌺🍀🌺

नयनाभिराम चूनरी , सरसों फूली पीत ।
अमुआ बौरे बाग में , गूँजत भँवरे गीत ।।

ऋतु वसंत का आगमन ,खिली लता बहुरूप ,
सतरंगे गहने सुमन , सुरभि सुधा संगीत ।

छटा मोहिनी देख कर , हिय में उठत हिलोर ,
आये अभी न साजना , याद सताये मीत ।

कोयल कूके बाग में , चहुँदिश नाचत मोर ,
मन-मयूर विचलित ठगा , पिय बिन जियरा रीत ।

वासंती चूनर रँगी , लँहगा , चोली साज ,
बिन हरजाई सून है , कंटक चुभन प्रतीत । 

यों ही चला न जाय अब , मन-भावन मधुमास ,
पिया मिलन की बाट में , यादें करते बीत ।

आ जाओ मन मीत अब , पथराये हैं नैन ,
तड़पत जियरा रात-दिन , होय न वक्त व्यतीत ।।

🌹🌻🍀🌺🌴

🌷☀️**....रवीन्द्र वर्माआगरा 

नमन मंच भावों के मोती
13/8/2019
शीर्षक-ओढ़नी/चुनरी
🌹🌹🌹🌹🌹🌹
अमावस की गहन निशा
काली ओढ़नी पहन कर आई 
दिल डूबने लगा घोर अंधकार देख
तभी पूर्णिमा की रात
श्वेत ओढ़नी धारण कर आई
रात ने ओढ़ी चमचमाते 
तारों की मोतियों वाली ओढ़नी
चाँदनी रात चंदा सङ्ग खिलखिलाई
धानी चुनर पहने धरती मुस्कराई
उषा लाल रंग की ओढ़नी पहने
लहराती बलखाती चली आई
तभी वीर जवानों की एक टोली
केसरिया रंग पहने प्रभात फेरी लगाती नज़र आई
समवेत स्वर में वंदे मातरम का नारा सुन भारत माँ मुस्कराई..
सुंदर निज सृजन देख प्रकृति भी गर्व से मुस्कराती दी दिखाई..!!

✍️वंदना सोलंकी©स्वरचित
नमन भावों के मोती
13अगस्त19
विषय: ओढ़नी /चुनरी
विधा :हाइकु 

ओढ़नी ओढ़
मजदूरी को बढ़ी
घर को छोड़

ओढ़नी ओढ़ी
छोड़ी बाबुल ड्योढ़ी
पिया आंगन

ढकती तन
ओढ़नी बने अस्त्र
क्रूर समाज

फ़टी ओढ़नी
निर्धन की बेटियां
अश्रु पूरित

नव्या नवेली
चूनरी है सहेली
यौवन रंग

पुष्प चुनरी
प्रकृति भी दुल्हन
आभा बिखरी

वीर शहीद
तिरंगे की चुनरी
राष्ट्र सुरक्षा

मनीष श्री
स्वरचित
रायबरेली
विधाःः काव्यःः

आया रक्षाबंधन मनभावन,
सावन सबका पावन त्योहार।
धरती ओढली हरित चुनरिया,
ये श्रंगारित होकर तैयार।

धानी चूनरी ओढे वसुधा,
मनभावन मनमोहनी लगती।
रंगबिरंगी ओढनी ओढे ,
अपनी बसुंधरा अच्छी सजती।

रक्षाबंधन घर बिटिया आई।
सावनी पर्व पर खुशियाँ छाई।
हुलसित फिरती मायके अपने,
लगता घर भर दुनियाँ लाई।

हमें सुहावना घर लगता है।
सुखद सुखी हमें घर लगता है।
उडती जाऐ चूनरिया इसकी,
नहीं बहना बिन घर लगता है।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
जय जय श्री राम राम जी

नमन-भावों के मोती मंच 
दिनांक-13/08/2019
विषय:छंद मुक्त कविता 

चुनरी तेरा सामाजिक विस्तार
चुनरी तू एक गहना है
तुझ बिन श्रृंगार अधूरा है
जब दुलहन माथे पर सोहे
लाल चुनर गोटे संग भावे
विदा करे पीहर से सब मिल 
बहता नीर सभी अपनो के
पर यह खुशी के आँसू है।

चली विदा ससुराल की राह
होकर सब बराती मदमस्त 
तभी आ गई गऊ माता सामने
वाहन चालक खुद दूल्हा था
माँ को बचाने में संतुलन खो बैठा
टक्कर हो कर वाहन पलटा
दूल्हा वही शहीद हुआ ।

छूनर का रंग डूब गया 
अश्रु और रक्त मिल कर
पहुंची ज्यो ससुराल में वह
उतरा सब श्रृंगार तुरत 
ओडी श्वेत चुनर उसने तब
भावहीन हो बैठी तब
काली चुनर मे आई तब
करने रूदाली सब बैठ संग 
चीजों की चूनर फैल गई
दूल्हे की अन्तिम यात्रा पर
धीरे धीरे संन्नाटे की 
चुनरी ओढी परिवारों ने
चुनरी तेरे रंग अनेक 
पर रहती सदा तू दृश्य अदृश्य ।

# स्वरचित 
# नीलम श्रीवास्तव, लखनऊ उत्तर प्रदेश

विषय - चुनरी
दिनांक - 13 - 08 - 19
विधा - गीत
=======================≠==========
पहचान चुनरिया है सम्मान चुनरिया है |
हर रंग से सजी ये धनधान चुनरिया है ||

दहलीज़ में रहे तो ताउम्र खिलखिलाती ,
कर पार दे कभी जो खुद ज़िन्दगी मिटाती ,
हो ज़िन्दगी उसी की दुश्वार हर कदम पर -
मुँह मोड़ता रहे फिर संसार हर कदम पर ,

खुद राह भूलती तो अपमान चुनरिया है |
पहचान चुनरिया है सम्मान चुनरिया है ||

जिद पर अगर अड़े तो छू आसमान लेती ,
दे मान ये सभी को सर पर जहान लेती ,
तुम प्यार से कहो तो हर बात मान लेती -
हो छेड़ती कभी हो सब भूल जान लेती ,

रख प्यार से सजाकर मुस्कान चुनरिया है |
पहचान चुनरिया है सम्मान चुनरिया है ||

है आग से नहीं कम रख दे सभी जलाकर ,
रहती अगर घरों में सब कुछ रखे सजाकर ,
हर रंग में सजी है रौनक रखे बनाकर -
बेरंग जो कभी हो रख दे सभी मिटाकर ,

मत भूलना कभी भी हर आन चुनरिया है |
पहचान चुनरिया है सम्मान चुनरिया है ||

रानी कोष्टी 
गुना म प्र 
स्वरचित एवं मौलिक

नमन मंच
दिनांक .. 13/8/2019
विषय .. चुनरिया 
**********************

ओढ के बंधेज की, धानी रे चुनरिया।
नैहर से गोरी ससूराल चली॥
***

अमवा पे झूला झूले, सखी और सहेलिया।
नयना में अाँसूओ को बाँध चली॥
***

भईया को राखी बाँध, रोती रही बार-बार।
कितने बरस बाद आ के मिली॥
***

माई बापू छोड गये, भाई भाभी से वो बोले।
हरदम सताए तोरी याद रे॥
***

सब दिन भूल जाए, राखी के जो दिन आए।
हमके सताए तोरी याद रे॥
***
ओढ के बंधेज की, धानी रे चुनरिया।
नैहर से गोरी ससुराल चली।
***
स्वरचित .. शेर सिंह सर्राफ

नमन भावों के मोती
विषय ओढ़नी/चूनर
विधा कविता
दिनांक 13.8.2.19
दिन मंगलवार

ओढ़नी/चूनर
🍁🍁🍁🍁🍁

ओढ़नी सभ्यता की, परिचायक है
ओढ़नी होना, सुखदायक है
ओढ़नी के, अपने अपने रुप हैं
इसमें शामिल, सभी सामान्य और भूप हैं।

जब भी ओढ़नी गई फिसल, सभ्यता हिल गई,
जब भी ओढ़नी गई सम्भल,सभ्यता भी खिल गई
ओढ़नी नहीं है कोई, मात्र एक आवरण
ओढ़नी है बल्कि एक,सुन्दर सभ्य आचरण।

भाषा की ओढ़नी हटी,सब कलुषित हो गया
शब्द शब्द उधड़ गये,सब दूषित हो गया
आरोपों प्रत्यारोपों के ,बादल भी इस तरह घिरे
मौसम सुहाना होता होता, पूरा प्रदूषित हो गया।

लाज की ओढ़न हटी,आँख से अंगारे फूट गये
सारे मानवीय रिश्ते,शान्ति पथ से छूट गये
स्वार्थ और अहंकार ने,ओढ़नी भी फाड़ दी
देखते ही देखते,सब आपस में ही रुठ गये।

स्वरचित
सुमित्रा नन्दन पन्त

भावों के मोती
13/08/19
चूनर
हाइकु

ध्वज चूनर
देश पर कुर्बान
है अरमान।

नीली चूनर 
चाँद सितारे सजे 
नभ ने ओढ़ी

श्रृंगार धरा 
ओढ़े चूनर हरा
पुष्पों से सजा

चूनर लाल 
दुल्हन का श्रृंगार
खुशी अपार ।

मीठी स्मृतियां
समय की चूनर 
सहेजे हुए।

उड़ती जुल्फें 
मदमाता यौवन
भीगी चूनर ।

माँ की चूनर
कठिन डगर में
शीतल छाँव।

घर की लाज
जिम्मेदार समाज
मैली चूनर।

स्वरचित
अनिता सुधीर

 द्वितीय रचना
विषय ओढनी ,चुनरी
विधा काव्य

13 अगस्त ,मंगलवार

श्री श्याम की ओड़ी चुनर
श्री राधा ने साथ निभाया।
चुनरी ओड़ी प्रिय गोपाला
राणा मीरा गरल पिलाया।

भक्ति की चुनरी भिलनी ने
धारण कर ली श्री राम की।
झूठे बैर प्रेम से खाकर भी
राम मुक्ति दी शांतिधाम की।

पतिव्रत चुनर अनुसूया की
त्रिदेव शिशु गोद खिलाया।
लाड़ प्यार दिया पुत्रों सा
मातृस्नेह स्व क्षीर पिलाया ।

चुनरी ओड़ ली पांचाली ने
कौरव इज्जत के संग खेले।
चीर हरण दुःशासन हारा
भर भर आँसू पांडव देखे ।

चुनरी पहनी राष्ट्रभक्ति की
प्रिय पुत्र को पीठ पर बांधा।
निकल पड़ी झांसी की रानी
आई नहीं रणक्षेत्र में बाधा।

लाल रंग चुनरी का कहता
हँसो हँसाओ इस जीवन में।
मलय बहार के झौंखे चलते
बार बार न आवे उपवन में।

स्व0 रचित
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

 नमन मंच भावों के मोती
13/8//2019
बिषय ,,चुनरी ,,ओढ़नी

हरितिमा की ओढ़ चुनरिया चली धरा मिलने अंबर से 
दुल्हन सा श्रिंगार कर खुद को
ढका मखमली चादर से
कितना सुंदर. प्रकृति का अनुपम. उपहार
लगता मानों कर रही पुरवइया से मनुहार
बड़ी बेसब्री से रहता सुहाने 
मौसम का इंतज़ार
जैसे चकवा चकोर करते इक दूजे से प्यार
पर मर्यादा के बंधन में बंध हो गए ए लाचार
हमको भी इनसे बहुत कुछ सीखना है इनसे
पाश्चात्य के दौर में होते जा रहे हम पीछे
सिर पर ओढ़नी डालना
बुजुर्गों को सम्मान देना है
लाज शर्म की.चुनरी ओढ़ 
यही पैगाम देना है
बिन पैरों की दौड़ में भूल गए हम सभ्यता
इसके हम हघ जिम्मेदार जो फैली रही रिजकता 
स्वरचित सुषमा ब्यौहार

नमन मंच को 
13/8/2019
चुनरी /ओढ़नी 
1
लाल चुनरी 
दुल्हन शरमाये 
हिय चुराए 
2
रात्रि दुल्हन 
तारो सजी चुनरी 
दूल्हा है चाँद 
3
धानी चुनरी 
इठलाती दुल्हन 
छलकी आँखे 
4
ओढ़ी ओढ़नी 
पहन के पायल 
पिया की बनी 
5
चाँद दुल्हन 
तारे जड़ी चुनरी 
रात्रि ढुकाव 
6
घाटी दुल्हन 
केसरिया ओढ़नी 
उढ़ाता हिंद 
7
धानी चुनरी 
तिरंगा बना वस्त्र 
ओढ़े सैनिक 
कुसुम पंत उत्साही 
स्वरचित 
देहरादून

नमन "भावो के मोती"
13/07/2019
"ओढ़नी/चुनरी"

पहन के आई थी जो सफेद चुनरिया,
उम्र के साथ मैली हो गई चुनरिया,
माया नगरी की माया में फंस गई,
दाग से भर गई मेरी कोरी चुनरिया।।

ओढ़नी ओढ़ ली लाल रंग की,
चल पड़ी हूँ मैं डगर प्रीत की,
लेकर सात फेरे व सात वचन,
अब बन गई मैं बन्नी साजन की।

हरी-हरी चुनरी धरती ओढ़ ली,
नीला आकाश के मन को मोह ली,
प्रेम संदेशा ले आया सावन,
नहाई धरती थी फुहार रस की।।

स्वरचित पूर्णिमा साह
पश्चिम बंगाल।।

नमन '' भावों के मोती ''
दिनांक :- 13/08/19
विषय :- ओढ़नी /चुनरी
🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳

ओ रंगरेज मोहे रंग दे चुनरियां ,
तीन रंग में डाल के,
जिसे ओढ़ हिंद की सेना,
खेले अपनी जान से,
पहला रंग केसरी रंगना, 
जो प्रतीक सौर्य और शान का 
ओ रंगरेज...... 
दूसरा रंग सफेद ही रखना 
जो प्रतीक शांति और सत्य का 
ओ रंगरेज.....
तीसरा रंग हरा रंग देना,
जो प्रतीक हरियाली और खूशाली का ।
ओ रंगरेज .......

Uma vaishnav
मौलिक और स्वारचित

भावों के मोती
बिषय- ओढ़नी
लाल ओढ़नी ओढ़ कर
शाम सुहानी लगती है।
अभिसार में खड़ो कबसे
रात की रानी लगती है।
पंक्षी सारे घर को लौटे
सुर्य भी थक गया हो जैसे
सबको आराम फरमाने की
ये लत पुरानी लगती है।
चंदा-तारे राह तक रहे
आसमां पे आधिपत्य का
उनकी ये बैचेनी सचमुच
हमको प्यारी लगती है।
स्वरचित- निलम अग्रवाल,खड़कपुर

विषय=चूनर/ओढ़नी
🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳
तीन रंग की ओढ़ के चूनर
लहराती ममता का आँचल
गंगा-यमुना इसकी बेटियाँ
बेटा इसका हिंद महासागर
हिमालय पहरेदार बना खड़ा
कश्मीर सिर का ताज बना
एकता-अखंडता इसका श्रृंगार
सभ्यता-संस्कृति गले का हार
तिरंगे की पहनाकर ओढ़नी
आजादी के मतवालों ने
धरती माँ की शान खातिर
तन-मन अपना वार दिया
वीर सपूतों ने अपने
जीवन का बलिदान दिया
इसकी खातिर मर-मिट गए
तिरंगे में लिपटकर सो गए
पीछे छोड़ बिलखता परिवार
जान वतन के नाम कर गए
यह वीर जवान भारत माँ के
न झुके कभी न झुकने वाले
दिल में बसाए एक ही बात
तिरंगा है हमारा अभिमान
प्रतीक शक्ति का रंग केसरिया
संपन्नता का प्रतीक बना रंग हरा
आपस में सुख-शांति बनी रहे
सफेद रंग देता संदेश सदा
जीवन में सदा रहे गतिशीलता
कहता है नीले रंग का चक्र यही
हिल-मिलकर रहो सब साथ सदा
भेदभाव मिटाकर जात-पात का
भारत माता कहे अपने लाल से
इस तिरंगे की रखना शान सदा
***अनुराधा चौहान***©️ स्वरचित

शुभ संध्या
नमन मंच
विषय -- ओढ़नी/चुनरी 
मात्रिक छंद 
द्वितीय प्रस्तुति

मेरी चुनर का रंग लाल 
आ जाना मेरे महिपाल ।।

मिलूँगी मेले में मैं आज 
हो रही है हल्की बरसात ।।

भींगने का भी मजा न्यारा
हो जाएगा मिलन हमारा ।।

झूला झूलेंगे मिल साथ 
दोनो डाल गले में हाथ ।।

आ रही देव उठनी पास 
याद के पल रहें ये खास ।।

फिर बँध जाऐंगे हम डोरी 
तुम चाँद और हम चकोरी ।।

यह चूनर मोहे है भाये 
यह पसंद तुम्हारी कहाये ।।

ये यादों के सुहाने पल 
चलें संग साथ बनें संबल ।।

मेरी बात न तुम विसराना
है कसम 'शिवम' जरूर आना ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 13/08/2019

 नमन,🙏🙏
"भावों के मोती"
विषय:-ओढनी ,चुनरी
िधा :-सयाली छंद

1)))
ओढ़नी,
उढ़ा पिया,
सजाऊँ प्रीत तेरी,
नेह उर,
जगाऊँ।

2)))

चुनरिया,
लाल भाये,
मोहे पीया बुलाये,
नेह झूला,
झुलाते,

3)))
धरा,
हुइ मतबाली,
करे श्रृंगार हरियाली,
मिला योवन,
नवजीवन ।

4)))
करें
श्रृंगार हरियाली
ओढनी बादल की
माँगे हरी
वाली

स्वरचित
नीलम शर्मा #नीलू

नमन मंच भावों के मोती
दिनांक-13/8/2019
शीर्षक- ओढ़नी
विधा- राधिका छंद

राधा झूले हैं झूल,
पेंग दे सखियांँ।
मन में बसते हैं कृष्ण,
ढूँढती अखियांँ।।
निधिवन में रचता रास,
ओढ़नी धानी।
कान्हा से पहले नाम,
राधिका रानी।।

शालिनी अग्रवाल
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

भावों के मोती दिनांक 13/8/19
चुनरी

जो 
लहराई
चुनरी 
गगन में 
गूंजे 
जय माता दी 
के जयकारे 

जो ढांका 
माँ ने
चुनरी से
ममतामयी 
गोद 
याद आई

ओढ़ी चुनरी 
बेटी ने 
दुल्हन बन
चली ससुराल 
वो

हैं चुनरी
तेरे 
रूप अनेक
लाल 
है चुनर
सौभाग्य की

सफेद 
है चुनर
अंतिम यात्रा की

तिरंगी चुनर है
आन मान और
देश के शान 
वीर शहीदों की

करो मान
ओढ़नी की
इसमें 
बसी है
माँ 
बेटी 
बहू
और 
बहन 
हमारी

स्वलिखित 
लेखक 
संतोष श्रीवास्तव भोपाल
सादर नमन
विषय- ओढ़नी/चुनरी
नभ में संतरी चुनरी लहराई है,
धरा पर हरितीमा छाई है,
**
प्रकृति की ओढ़ कर चुनरी,
बनी धरा स्वपन सुंदरी,
**
मनमोहनी नार अलबेली,
साजन के लिए बनी पहेली,
**
शर्म हया से नैन झुकाकर,
पूर्ण हुई प्रेम पिया का पाकर,
**
संस्कारों की ओढ़ कर चुनरी,
पिया के वो आँगन उतरी,
**
कर्तव्य की चुनरी सिर पर रख कर,
सहनशक्ति की मूरत बनकर,
**
जीवन सफर में पग बढाकर,
अपना सुख सब गवाँकर,
**
परिवार की खुशी में हँसती है,
मातृत्व की चुनरी बच्चों पर ढकती है।
***
स्वरचित-रेखा रविदत्त
13/8/19
मंगलवार

नमन मंच
दिनांक-१३/८/२०१९
शीर्षक-चुनरी"
प्रेम चुनरिया ओढ़ कर आई तेरे द्वार
अब तो गले लगा लो सजना खत्म करों तकरार
सावन मास तो लाता है,सबके लिए मधुमास
बीती ताहि बिसार दो,मिटाओ मन गुब्बार।

लाल चुनरिया ओढ़ कर,मईया आई दरबार
अब तो दरश दिखा दो मईया,भक्त खड़े हैं द्वार
भक्तों की मंडली पुकार रही है आज
एक तेरा ही नाता भला, बाकी सब बेकार।

हरी चुनरिया ओढ़ के धरनी हुई तैयार
अबकी सावन खूब रिमझिम, भरपूर हुआ बौछार
पशु, पक्षी सब खुश हुये, प्रकृति हुई निहाल
हरियाली सब देख कर,कृषक श्रम सकार।
स्वरचित आरती श्रीवास्तव।

नमन मंच
विषय :- ओढ़नी / चुनरी

प्रेम बाँसुरी की धुन साँवरे
बडी़ गजब रे तुने बजाई
ना हूई तेरी मुझसे सगाई
ना शादी तुने मुझसे रचाई
तट कालिन्दी पे आ कान्हा
प्रियतम प्रीत कैसी निभाई
पूरे कर जतन रे तूने साँवरे
प्रीत की साँची रीत निभाई
कलंक ना लगने दिया मुझे
प्रेम की नगरीयाँ तुने बसाई
प्रीत ओढ़नी ऐसी बन्धाई
वृन्दावन में प्रेम धूम मचाई
रंगरेजा बन तु साँचा कान्हा
राधा संग प्रेम चुनरी रंगाई

मधु पालीवाल
स्वरचित
13 / 8/ 2019

नमन" भावों के मोती"
13-08-2019
ओढनी /चुनरी 
नारी के श्रृंगार में, अहम श्रृंगार ओढ़नी होती है ।
बाकी सब तन को सजाते ,वो चार चांँद लगाती है।।

सर पर बोझ नहीं ओढ़नी, सर का ताज होती है।
सुंदरता के साथ साथ यह ,बुरी नजर से बचाती है ।।

धूप में ओढ़नी सर पर ,छाया सी हो जाती है।
बेटी दौड़ कर, मांँ की ओढ़नी में छिप जाती है ।।

औरत का गहना है ओढ़नी, पहचानअपनी बनाती है।
सुंदरता में अपनी मिसाल, सदा ही दे जाती है।।

वीणा वैष्णव
कांकरोली

:भावों के मोती:
#दिनांक:13"8"2019:
#विषय:ओढ़नी:चुनरी:
#विधा:काव्य:
#रचनाकार: दुर्गा सिलगीवाला सोनी

***& चुनरिया &***

सतरंगी मोरी अलबेली चुनरिया, 
साजन के मन को भाई है, 
सलमा सितारों से बनी किनारी,
बैसाखी मेले से लिवाई है, 

घाघरा चोली मिलती जुलती है 
दर्जी से मैंने सिलवाई है, 
रेशम की जिसमे लगी कढ़ाई,
रंगरेज़ से रंग चढ़वाई है,

कस के ना खींचो चुनरी साजन 
तुमसे मेरी राम दुहाई है, 
फट जायेगी मोरी चुनरिया, 
समझूंगी तू हरजाई है,

ओढ़ लिया तेरे नाम की चुनरिया, 
बिंदिया भी मन को भाई है, 
निंदिया भी तूने मेरी छीन लिया है, 
मेरे सपनों का तू सौदाई है,

रचनाकार"*" दुर्गा सिलगीवाला सोनी 
भुआ बिछिया जिला मंडला 
मध्यप्रदेश

नमन भावों के मोती
आज का विषय, ओढ़नी, चुनरी
दिनांक, 13.8,2013,
वार , मंगलवार

लहर लहर लहराये तिरंगा, 
सजनी के मन भाये ,
तीन रंग की ओढूँ ओढ़नी,
साजन से मँगवाये ।
रंग श्वेत है कितना प्यारा, 
शांति सत्य सिखलाये ।
केसरिया रंग अति मनभावन,
त्याग उत्साह जगाये ।
हरे रंग की धानी चुनरिया,
समृद्धि वैभव लाये ।
जल्दी से ले आओ सजनवा,
तिरंगी ओढ़नी हमको भाये।
उत्सव पन्द्रह अगस्त आया, 
नई ओढ़नी पहन के जायें ।
मान करें हम स्वतंत्रता का,
झंडे पर बलि बलि जायें ।
सम्मान बढ़ाएं अपने देश का,
जयकारा मातृभूमि का लगायें ।
अंत समय फिर यही चुनरिया,
ओढ़ विदा हो जायें ।
आन बान शान भारत की हम,
अपने दिल में बसायें।

स्वरचित, मीना शर्मा, मध्यप्रदेश,

नमन- भावों के मोती 
दिनांक-13/08/2019
विषय- चुनरिया 
द्वितीय प्रस्तुति 

मेरा तन चुनरिया से चमकता है.......

फिर रात के आंचल में एक चांद सवरता है।

चुपचाप इशारों में एक बात प्यार की कहता है।।

एक चांद है अंबर में, एक चांद है मेरे दिल में।

श्रृंगार सनम मेरा, तेरे प्यार से सजता है।

हाथों में सजे चूड़ी, माथे पर चमके बिंदिया।

मेरी धानी चुनर में तेरा प्यार महकता है।

मेहंदी के रंगों में हम नाम सनम लिखते हैं।

कुमकुम की चमक से अब श्रृंगार निखरता है।

मेरे बिछिये पायल हर प्रीति निभा देगें।

पैरों की महावर से दस्तूर ठहरता है।

स्वरचित......।
सत्य प्रकाश सिंह केसर विद्यापीठ इंटर कॉलेज प्रयागराज

नमन मंच🙏
13/8/2019
विषय-ओढ़नी/चुनरी
िधा-हाइकु
द्वितीय प्रस्तुति
**†******
धानी चुनरी
वसुंधरा ने ओढ़ी
नववधू सी

लाल ओढ़नी
सूरज की लालिमा
रक्तिम आभा

तिरंगा ध्वज
ओढ़ कर चुनरी
लिपटी काया

गगन रोए 
नीली चुनरी ओढ़े
चाँद खामोश
✍️वंदना सोलंकी©स्वरचित

चुनरी/ओढ.नी
#विधा---------गीत*
#दिनांक*-------- 01/08/19

लहर - लहर लहराये सखी री मेरी चुनरिया ।
साँवरिया के मन खूब भाये मेरी चुनरिया ।।

माथे बिंदिया चमके, पैरों में पायल खनके ,
हाथों में चूड़ियाँ खनके,दिल में साजन‌ धड़के ।
बनूँ मैं दुल्हनिया इतराये मेरी चुनरिया‌ ,
लहर- लहर लहराये ...........।
साँवरिया के मन .............।।

कभी ढलक जाए सर से,कभी मुखडे़ को चूमे ,
कभी करे अठखेलियाँ ,कभी हवा के संग झूमे ।
बादल में डोले मचलती जाये मेरी चुनरिया ,
लहर- लहर लहराये......।
साँवरिया के मन .........।।
मन - मंदिर में मेरे बसे हैं बताऊँ कैसे कौन‌?
जुबां में रहती खामोशी , आधर हैं मेरे मौन।
आज सारे राज खोल ,लजाये मेरी चुनरिया,
लहर - लहर जाये ...........।
साँवरिया के मन .............।।

#स्वरचित एवं #मौलिक*
#धनेश्वरीदेवांगन "#धरा"*
#रायगढ़ (#छत्तीसगढ़)*



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