Friday, August 9

"सज्जा "9अगस्त 2019

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ब्लॉग संख्या :-472

भावों के मोती🌹
9/8/2019
"सज्जा"
*
*******
सहज,सौम्य,सुंदर, सरल,सज्जा मन की शान
द्वेष दम्भ से दूर हो,जीवन पुष्प समान।।

मुख की सज्जा एक ही,वाणी मधुर महान
बोले ज्यों मोती झरे, कोयल कूक समान।।

उर की सज्जा प्रेम है,हर तन में हो वास
कुटिल कर्म को त्याग कर,कर ले हम तुम रास।।

बिंदी चूड़ी नाथ की,सज्जा ये श्रृंगार
प्रीतम चौबारे खड़े,सकुचाई मैं नार।।

मुख पर लिपटी क्रीम थी,वर्षा थी घनघोर
सजनी की सज्जा धुली,छुपती जैसे चोर।

वीणा शर्मा वशिष्ठ
स्वरचित

छोड़ दिया।
अरमानों के बाग लगाना छोड़ दिया।


जब से इन हाथों में आया मोबाइल है।
सब लोगों ने आवाज़ लगाना छोड़ दिया।

इतनी सीलन है रिश्तों में आज कहूं।
माचिस ने भी आग जलाना छोड़ दिया।

भूख बनीं दुश्मन क्या पेट नहीं भरता।
जबसे अपने घर का खाना छोड़ दिया।

पूछा जो दिया क्यों जवाब हाथ पैरों ने।
तुमने जो सुबह घूमने जाना छोड़ दिया।

जबसे हमको दी दाद तुम्हारी आंखों ने।
हमने भी महफिल में गाना छोड़ दिया।

रुसवा ना हो जाओ तुम दुनिया में सोहल।
बस नाम तेरा होंठों पर लाना छोड़ दिया।

विपिन सोहल

नमन मंच,भांवो के मोती
विषय सज्जा
विधा काव्य

09 अगस्त 2019,शुक्रवार

सज्जा धजा किरीट कश्मीर
जो भारत का मान बढ़ाता।
यह धरती का स्वर्ग अनौखा
जो आता प्रिय हिय हर्षाता।

सजा धजा उत्तुंग हिमालय
जिससे गङ्गा यमुना बहती।
शस्यश्यामला भारत माँ की
हर विपदा संकट को हरती।

प्रकृति की सज्जा अति भव्य
फैली हरियाली धरा के ऊपर।
रंग बिरंगे सुमन खिले उपवन
मलय पवन बहती नित भू पर।

सुसज्ज़ा शौभित देवालय
भक्ति भाव भरते नित मन में।
मनमोहन श्री कृष्ण बिहारी
रमण करे मानस और तन में।

तन मन घर सुसज्जित होता
मिलता नित है जीवन आनंद।
जीवन तो आना जाना नित
शरणागत अति पावन गोविन्द।

स्व0 रचित ,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

शीर्षक -- सज्जा 
विधा--🌷दोहा🌷
प्रथम प्रस्तुति
सज्जा तेरे रूप की , कैसे करूँ बखान ।
नही जरूरत सजने की , सजाया भगवान ।।

चाँद सा मुखड़ा खिलती , यह सुमधुर मुस्कान ।
खिल रही ज्यों धूप सुवह , अगहन मास समान ।।

है कश्मीर की कली या , ख्वाबों का अरमान ।
तुझे सुमरकर ही करूँ , शायरी का संधान ।।

तेरी जो सज्जा न हो , हो फीके सब गान ।
तुझसे ही निकले नये , नगमें नये निदान ।।

तुझसे ही प्रीत जगकर , कलम का हुआ भान ।
कलम उठाऊँ जब 'शिवम' , सुमरूँ करलूँ ध्यान ।।

सपनों की रानी कहूँ ,बिना सजे गुणगान ।
सजकर तो उठा देगी , चाँद की भी दुकान ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 09/08/2019

नमन भावों के मोती
आज का विषय, सज्जा
विधा, दोहा 

9,8,2019.
शुक्रवार

सज्जा घर की खूब की,
बदला न व्यवहार ।
आपस में लड़ते रहे ,
मिला नहीं आहार ।।
ममता माँ की छोड़ दी,
बैंक सजाया खूब ।
पछतायेगा जब कभी ,
जायेगा फिर ऊब ।।
मन की बीणा ना बजी ,
फीकी थी मुस्कान ।
दूर सभी फिर हो गये ,
आयें न मेहमान ।।
दिल से दिल जब मिल गये,
सज्जा सब बेकार ।
चैन कभी मिलता नहीं,
हो रहे बेकरार ।।
दुनियाँ बसती नेह से ,
मन से मन का मेल ।
हँसी खुशी जीवन चले ,
करुणा का सब खेल ।।
सज्जा हो संबंध में ,
बने रहें हम मीत ।
मन बीणा बजती रहे ,
हो जीवन संगीत ।।

स्वरचित , मीना शर्मा, मध्यप्रदेश,


सज्जा
💐💐
मन मंच।
नमन गुरुजनों, मित्रों।
💐🙏💐
गृहसज्जा खूब की,
तन को भी ,सजाया।
लेकिन मन को नहीं सजाया कभी,
कुंठित मन कहलाया।

मन में रहे विकार हमेशा,
तन को चाहे सजा लो जितना।
अपना नहीं बना सकोगे किसी को,
चाहे चेहरा सजा लो कितना।

दुनियां में गर पाना है सम्मान,
बनो मन, वचन,कर्म से महान।
मन को सुसज्जित कर लो,
फिर पाओगे हर जगह मान।
🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺
वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी
स्वरचित

भावों के मोती
बिषय- सज्जा
सज्जा तन की हो या मन की

सबको अच्छी लगती है।
सुन्दरता किसी भी चीज की
सबको आकर्षित करती है।।

सजा-संवरा घर हो या मुखड़ा
सबको प्यारा लगता है।
सलिका जीने का आ जाए तो
जीवन न्यारा लगता है।।

स्वरचित- निलम अग्रवाल, खड़कपुर

तिथि-9/8/19
विषय - सज्जा


सज्जा होती है
जड़ और चेतन की
जीवित या मृत की
तन और मन की
जीवनभर करते सज्जा
अपनी या दूसरों की
मन्दिरों और भवनों की
पाषाण या निर्माण की
सजाते और पूजते
बड़ और पीपल को
अंतिम यात्रा समय
नहलाते श्रृंगार करते
नारी, पुरुष का
सजाते विमान उसका
तन का श्रृंगार करते
बच्चे से बूढ़े तक
निहारते दर्पण में
मन की सज्जा
अच्छे कर्म और
विनीत स्वभाव
परोपकार से
करता मानव
सजाते घर आँगन
बाजार और दुकानें
त्योहारों पर
सजाते मूर्तियाँ
शिवालय में
सजाते नया वाहन
फूलों से
सज्जा करते कुछ लोग
नारी की
दिखावटी सामान की तरह
मगर नारी
दिखावट का सामान नहीं
वह सज्जित होती है
प्रिय के लिए
जीवन भर करता मानव
साज-सज्जा
सम्पूर्ण प्रकृति की
होता तरंगित
सज्जा एक जरूरत है
इंसान की
जिंदगी को सुंदरता से
एक नये दृष्टिकोण से 
जीने के लिए
जरूरी है एक हलचल
उबाऊ जिंदगी से 
बचने के लिए
जीने के लिए
जरूरी है सज्जा

सरिता गर्ग

भावों के मोती
9/8/2019
विषय-सज्जा

.................
साज श्रृंगार बिन गोरी का
सौंदर्य अधूरा
प्रेमी,कवि,जन सभी यही बतावें 
सरल सादगी से सज्ज जो नारी
सहज सौंदर्य युक्त वही मन भावे
साज सज्जा है बाह्य आवरण
कुछ पल सज्जित फिर
रूप प्राकृतिक ही आ जावे
उर की सज्जा सहज योग सी
श्रृंगार हार उस प्रियतम को लुभावे
नख शिख श्रृंगार करूँ
जो साजन के मन भावे
शक्ति धन बल बुद्धि से सज्जित
दुर्गा,लक्ष्मी, शारदा देवी कहलावें
न जानो हमें छुई मुई सी कोमल नारी
समय आने पर हम दुर्गा रूप दिखावें
कर्णावती लक्ष्मी बाई सी नार हम
अंग अंग को वाण प्रत्यंचा से सजावें ।।
✍🏻वंदना सोलंकी©️स्वरचित

नमन मंच
दिनांक .. 9/8/2019
विषय .. सज्जा

********************

बन ठन कर के राधारानी,
निकली जो कर सज्जा।
काँव काँव करता इक कागा,
आ बैठा घर छज्जा।
**
पाँव ठिठुर गये सोच मे पड गयी,
क्या होगा कुछ अच्छा।
शायद श्याम पिया घर आये,
सोच के आ गयी लज्जा॥
**
वापस लौट वो घर में आ गयी,
चढ गयी घर के छज्जा।
राह निहारन लगी बैठ कर,
ख्वाब सजा कर अच्छा।
**
सुबह से हो गयी शाम सखी रे,
आये ना नन्द के लल्ला।
शेर भक्ति मे डूबा लेकर,
श्याम सखी गयी झल्ला॥

स्वरचित .. शेर सिंह सर्राफ

नमन"भावो के मोती"
09/08/2019
"सज्जा"

1
कोरा कागज
बना ज्ञान भंडार
शब्दों की सज्जा
2
मन की सज्जा
दया व अनुराग
भावना बाग
3
नारी की सज्जा
कुशल व्यवहार
गहना लज्जा
4
रसोई सज्जा
छप्पन पकवान
रसना द्वार
5
दीपों से सज्जा
दीपावली की रात
स्वर्ग सी धरा
6
चाँद,सितारे
रात आसमां सज्जा
नैन निहारे
7
भावना सज्जा
माँ,बहन व बेटी
नारी सम्मान
8
मयूर पंख
कृष्ण मुकुट सज्जा
चैन चुराया
9
"हरि "की सज्जा
गले में वनमाला
नैनाभिराम
10
होठों की सज्जा
खिली-खिली मुस्कान
जीत लो जहां

स्वरचित पूर्णिमा साह
पश्चिम बंगाल ।।

1भा.नमन साथियों
तिथिःः9/8/2019/शुक्रवार
बिषयःः #सज्जा#

विधाःः काव्यःः

मानव मन वचन कर्म से सज्जित,
फिर क्यों सजने की पडे जरूरत।
मधु मुस्कान घुली मिश्री वाणी में,
फिर क्यों सज्जा की हमें जरूरत।

ढोंग करें कलुषित मन सज कर।
बल दिखाऐं दूषित तन तन कर।
ये गुण गाहक सब देख समझते,
चाहे जितने आऐं सज धज कर।

हो सौम्य सरल व्यवहार हमारा।
पुरूषार्थ धर्म परोपकार प्यारा।
यही सज्जा हम विवेकशील हों,
निजधर्म और सब सनेह सहारा।

सज्जा अपना बडा प्रेम प्यार है।
सचमुच सजना ये प्रेमोदगार है।
सज्जा साहित्यकार की कविता,
अपनी रचना स्वयंभावोदगार हैं।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
जय जय श्रीराम राम जी

भा.#सज्जा#काव्यःः
9/8/2019/शुक्रवार

नमन मंच
दिनांक-९/८/२०२९
शीर्षक-सज्जा"

घर तो तूने खूब सजाया
मन का द्वार न ख़ोला
साज सज्जा तेरे घर की
लोगों को खूब भरमाया।

उपहार तो तूने खूब दिया
सम्मान नही किसी को 
संतान को साजे नही
साजने चले समाज को।

नाम समाज में खूब कमाया
घर संसार बर्बाद हुआ
माँ बाप से प्यार नहीं
श्रृंगार तेरा बेकार हुआ।

अपना काम निकल गया
परवाह नही दूजे का 
घर सजाया कीमती सामानों से
माँ बाप को वृद्धाश्रम दिया।

बाहरी सज्जा तो खूब किये
पर अन्तर्मन न सजा पाये
बाहर भीतर एक सा हो 
तभी मानव जीवन सकार हो पाये।
स्वरचित-आरती-श्रीवास्तव।

 नमन मंच भावों के मोती
9/8 /2019
बिषय ,सज्जा,,

मधुर वाणी त्याग नेह है
मानव के तन मन की सज्जा
नारियों को शुशोभित करती है
मर्यादा लज्जा
सरहद के रखवाले वीरों के कर में बंदूक सुहाती
कर्तव्यों के पथ प्रदर्शकों को रक्षा का सूत्र सिखाती
वसुंधरा की सज्जा हरे भरे वृक्ष हरियाली
लगती मानों ओढ़ी चुनरिया मखमल वाली
सरिता बिन पानी के लगती सूनी खाली खाली
नीर से भरपूर बहती ज्यों नागिन मतवाली
रंगोली बिन शोभा नहीं देता आंगन
वैसे ही बेटी बिन अधूरा है ए
जीवन
बेटियों से सज जाती है घर आंगन देहरी
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ
ए चिड़िया हमारी सुनहरी
स्वरचित, सुषमा ब्योहार

नमन मंच
सज्जा
सौम्य, शुचि, साज-सज्जा
अरुणाभ-सी किंचित लज्जा
नागिन लट लहराये
मृदु स्मित पुलक गात,
दाड़िम सम दमक दाँत
मृगिनि ठुमक बलखाये
बंकिम दृग विष बाण 
रक्त-अधर मदिर-पान
चितवन चित्त हरसाये
सरस सुरस सुर निर्झर
खनकमयी आह्लादकर
बिन बात खिलखिलाये
शशि साजे कलित कपोल
सुगठ, गठ हरहठ भूगोल
अंग तरंग उकसाये 
बाँकपन, उद्दाम यौवन
सहज सुरभि पराग-धन
भ्रमर भाग मुसकाये
-©नवल किशोर सिंह
09-08-2019
स्वरचित

भावों के मोती
9/08/19
विषय-सज्जा 

गोपाला की झूलन सज्जा

झूलना चढ़ झुल रहे लड्डु गोपाला ,
पालना में झूल रहे मुकुंद बिहारी ललना,
गोवर्धन ललना ,गोपाला ललना 
कुंज बिहारी आये हमारे अंगना ,
श्याम सलौना आया हमारे घर मा,
नैवेद्य लाओ, मंगल गावो चंदन चोक पुरावो ,
मधुर-मधुर से मोदक लाओ केशर थाल सजावो,
माखन लाओ मिश्री लाओ गीत मधुर से गाओ,
पीताम्बर लाओ , मयूर पंखी भाल सजाओ, 
वैजयंती की लाओ माला गले में पहनावो ,
नौबत बाजे और नगाड़ा मुरली आज बजाओ,
हिलमिल आवो लोग लुगाई झुलन आज सजाओ,
मनमोहन को सज्यो हिण्डोलो झोटा देई झुलाओ।
स्वरचित

कुसुम कोठारी।

नमन मंच 
09/08/19
सज्जा 
***
प्रकृति की सज्जा अतुलित
देख हृदय होता उल्लसित ,
दांतो तले अँगुली दबाई 
जब नभ की अपरिमित 
सज्जा नजर आयी।

अन्तर्मन की सज्जा से 
मुखमंडल का तेज बढ़ा
जीवन हो आमोदित प्रमोदित,
जन जन का 
नैतिक उत्थान हुआ।

घर की रहे जब साज सज्जा
देवताओं का वास हुआ 
बड़े बुजुर्गों की सेवा सज्जा
दिनचर्या में कर सम्मिलित।
धन्य करें जीवन और
सब जन हो जाएं हर्षित ।

नारी की सज्जा अनमोल
बांध के रखती रिश्तों की डोर 
मुसकान जो उसके मुख ठहर जाये 
क्या कोई आभूषण पिया को रिझाये ।
मधुर वाणी पायल की झंकार
सजाये बच्चों को ,दे संस्कार ।

बगिया की सज्जा में 
कितने रंग के पुष्प निराले 
दीपों की सज्जा से 
चहुँ ओर उजियारा है।
मन के कोने का मिटा 
अंधियारा है ।

कागज पर शब्दों की सज्जा 
भावों के मोती चुनते हैं 
उद्वेलित मन की कुंठा को
शिल्प रूप में 
आभूषित करते हैं ।

देख कर मन होता 
हैरान चकित ,
जब बाहरी सज्जा
आडम्बर में उलझ 
कर रह जाते हैं
सज्जा के अपरिभाषित
अर्थ को 
आओ हम 
परिभाषित कर जाते ।

स्वरचित
अनिता सुधीर

नमन भावों के मोती
09 अगस्त 19 शुक्रवार
विषय - सज्जा
विधा - हाइकु
💐💐💐💐💐💐
धरा की सज्जा

हरी-भरी धरती

धानी चुनर👌
💐💐💐💐💐💐
घर की सज्जा

स्वच्छ वातावरण

नारी की लज्जा👍
💐💐💐💐💐💐
देश की सज्जा

पावन राजनीति

प्रेम की भाषा💐
💐💐💐💐💐💐
श्रीराम साहू अकेला

भावों के मोती दिनांक 9/8/19
सज्जा / सजावट

लगती अच्छी 
सज्जा सब को
घर आँगन और
देश समाज

सजे झूले
सावन झूमें 
फैली हरियाली 
चहुंओर 

लगे 
सजावट से
घर सुन्दर 
रहे खुश 
पूरा परिवार 

सज्जा 
झांकियों की
मचे धूम जब
सजे किशन 

होती 
सज्जा
हाथों की
बांधे जब बहन
राखी 
भाई को

होती 
सज्जा
माता पिता की
जब दें बच्चे 
उन्हें सम्मान 

उत्तम विचार
और सदाचार से
जब महके 
बच्चों का
यही है उनकी
सज्जा 

स्वलिखित
लेखक संतोष श्रीवास्तव भोपाल

नमन:भावों के मोती मंच 
विधा: हाइकु 
09/08/2019

नव निर्माण 
मद साज सज्जा 
पूर्ण संस्थान ।

मन की सज्जा
तकनीकी शिक्षण 
विकास पूर्ण 

माँ की सज्जा 
संस्कारी हो संतान 
रचे सृजन ।
#स्वरचित 
नीलम श्रीवास्तव


शुभ साँझ
नमन मंच
विषय--सज्जा
विधा--🌷ग़ज़ल🌷
द्वितीय प्रयास 

गेसुओं में गुलाब जो सजाया तूने 
सच मानिये जानकर तड़फाया तूने ।।

बिना किये श्रंगार है हाल बेहाल
क्यों न हाल पर तरस खाया तूने ।।

ऊपर से ये धूप का काला चश्मा 
आँख से हटा सर पर चढ़ाया तूने ।।

कोई बिजली गिरने वाली है आज 
बतादे जो राज कोई छुपाया तूने ।।

बिन सजे शायर 'शिवम' बना डाला
अब सजकर और क्या सुझाया तूने ।।

देखकर तेरा मुखड़ा बने ग़ज़ल का
मुखड़ा लगे ज्यों नूर नया बताया तूने ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 09/08/2019

भावों के मोती:
#दिनांक:९"८"२०१९:
#वार:शुक्रवार:
#विषय:सज्जा:
#विधा:काव्य:
#रचनाकार:दुर्गा सिलगीवाला सोनी:

*"""""*"""""* सज्जा *"""""*"""""*

सादगी को ही वारीयता मिलती है,
तड़क भड़क और साज सज्जा पर,
आकर्षण शाश्वत से बना हुआ है,
नारी सादगी और सुलभ लज्जा पर,

नारी की सहज लज्जा का स्वाभाविक
संस्कार निभाएं भूमिका जनक की,
श्रृंगार के बिना भी वह मन को मोहे,
मोहताज नहीं रत्न आभूषण कनक की,

स्वत:स्फूर्त भाव है आकर्षण नारी का,
लज्जा ही उसका श्रृंगार और गहना है,
घूंघट में छिपकर रहने वाली ये अबला,
किसी की मां बेटी किसी की बहना है,

गृहणी बनकर ये करे गृह की सज्जा,
परिवार की इज्जत का ये रखे ख्याल,
सीता बनकर ये रावण वध करवा दे,
सावित्री बनकर जीते यम और काल,

#रचनाकार:दुर्गा सिलगीवाला सोनी,
भुआ बिछिया जिला मंडला
मध्यप्रदेश,,


नमन भावों के मोती
आज का विषय-सज्जा
चली गयी रानी छोड़कर अपना राजा।
बज गया राजा का पूरी तरह से बाजा।।
रहता था सजा सजाया उनका मकान।
पड़ा रहता है तित्तर बित्तर वहाँ सामान।।
समस्त साज से युक्त था वह मकान।
लगता अब जेसे कोई युध्द का मैदान।।
अब तो अगले जन्म में ही रानी आयेगी।
आकर अपना घर भली प्रकार सजायेगी।।
डा0 सुरेन्द्र सिंह यादव
“व्यथित हृदय मुरादाबादी”
स्वरचित

भावों के मोती
9/08/19
विषय-सज्जा

पद्मिनी की रूप सज्जा 

ओ पुगल की पद्मिनी
सजा थाल कहां चली, 
नख शिख शृंगार रचा
ओ रूपसी मृगनयनी,
कहां चली गज गामिनी
मधुर स्मित रेख रची लब पर,
ओ मधुकरी मनस्वी
रत्न जड़ीत दृग जुडवां,
शुक नासिका, भ्रमरी
मुख उजास चंद्रिका सम उजरो,
गुलाब घुल्यो ज्यों क्षीर समंदर,
शीश बोरलो झबरक झूमे,
चंद्र टिकुली चढ़ी ललाट,
काना झुमका नथ मोतियन की
गल साजे नव लख हार,
कंगना खनके खनन-खनन
पग पायल की रुनझुन,
ओ गौरा सी सुभगे
कहां चली चित चोर,
सांझ दीपिका सी झिल-मिल
कभी उगती सी भोर।

स्वरचित

कुसुम कोठारी

शुभ साँझ 🌇
नमन "भावों के मोती"🙏🏻
दिनांक-9/8/2019
विधा-हाइकु (5/7/5)
विषय :-"सज्जा" 

(1)
जीवन क्षण 
मन को छोड़कर 
सजाया तन 
(2)
चाँद की बिंदी 
सितारों का गज़रा 
निशा सजती 
(3)
सजे पहाड़ 
वर्षा करे धरा का 
हरा श्रृंगार 
(4)
रंग लगाए 
रवि ने जाते हुए 
साँझ सजाई 
(5)
भोर किरण 
आसमां को सजाये 
धरा चहके 

स्वरचित 
ऋतुराज दवे,राजसमंद(राज.)

नमन् भावों के मोती
09अगस्त19
विषय सज्जा
विधा हाइकु

देश की रक्षा
कंधों पर बंदूकें 
वीरों की सज्जा

बरसे मेघ
तृप्त हुई धरती
सज्जा बढ़ी

सज्जित देश
जवानों के रक्त से
सुकून निंद्रा

सुमन इच्छा
मन्दिर साज सज्जा
ईश्वर की पूजा

घर की सज्जा
प्रेम भरा आँगन
जीवन धन्य

यौवन सज्जा
जीवन का आधार
प्रेम की पूजा

सिंदूर सज्जा
सौभाग्यवती नारी
भारत वर्ष

रक्त तिलक
वीरों की प्रिय थाती
माथे की सज्जा

मानस सज्जा
विद्या का उपहार
जिन्दगी ज्ञान

सुंदर रंग
सतरंगी दुनिया
प्रकृति सज्जा

मनीष श्री
स्वरचित
रायबरेली

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"कांच /शीशा ""10अक्टुबर 2019

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