Sunday, September 22

"रस " 18 सितम्बर 2019

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ब्लॉग संख्या :-509
विषय रस
विधा काव्य

18 सितम्बर 2019,बुधवार

नव रस जीवन का सृंगार है
सरसमयी जीवन की शान।
कडुवे कसैले फ़ीके खारे
मधुर वाणी जीवन का मान।

स्नेह नित वात्सल्य जीवन
उड़े हास रस का अट्टहास।
भक्ति रस में भगवन बसते
हर विपदा करते नित नाश।

बैठे बैठे रस नहीं मिलता
खून पसीना बहाना पड़ता।
रात रात भर सदा जाग कर
प्रगति पथ कदम नर बढ़ता।

जीवन रसमय बने सुहाना
हर जीव ईश्वर की है रचना।
छल कपट द्वेष से बचकर
मानव बनकर जग में रहना।

काव्य रसों का क्या कहना
अद्भुत भाव हृदय में लाते।
करुण सृंगार वीर हास रस
कभी हँसाते कभी रुलाते।

भंवरे तितली बैठ पुष्प पर
जीवन भर रस पान करते।
सब अपने हिस्से का पीते
नहीं कभी जीवन में लड़ते।

धुंआ धुंआ हो जाएगा
पगला गया है पाकिस्तान।
पर्यावण विश्व विशुद्ध हो
जन प्रिय नारा हिंदुस्तान।

स्वरचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

विधा--ग़ज़ल
प्रथम प्रयास


कड़ुवा रस ज्यादा था
मीठा रस घोल दिया ।।

मेरे प्रभु बिना कहे
तूने सब बोल दिया ।।

पहला पहला पाठ था
साथी अनमोल दिया ।।

जादू जो गया नही
जादू बेतोल दिया ।।

नही कोसूँ किस्मत को
बेशक सौ झौल दिया ।।

सोचूँ जीवन मेरा
हीरे से तोल दिया ।।

गम में भी हँसूँ 'शिवम'
तोहफा अमोल दिया ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 18/09/2019

18/9/2019
विषय रस
हाइकु सृजन
1
जीवन रस
अभ्यास से ही चख
विश्वास रख

2
भक्ति में शक्ति
रसो की अभिव्यक्ति
बने महान
3
श्याम सांवरे
भक्त हुए बावरे
रसास्वादन
कुसुम पंत उत्साही
स्वरचित

18/9/2019::बुधवार
विषय रस


सुनो कान्हा!!!
लोग देते हैं तुम्हें
न जाने कितने नाम
और न जाने कितने रिश्ते
पर तुम तो बस मेरे सखा हो
तुम सँग लागी प्रीत अलबेली
न कोई सँगी मेरा न कोई सहेली
मोहे तो कान्हा तुम सा सखा मन भाये
ऐ सखा!!
मैं तुम सँग सिर्फ प्यार ही नही करती
झगड़ा भी करती हूँ
तुम सँग झगड़ा
आनन्द ही निराला है
कभी तुम रूठ जाते हो
कभी मैं रूठ जाती हूँ
कभी तुम मुझे मनाते
और कभी मैं तुम्हें मनाती हूँ
रूठने मनाने में और गहरा
हो जाता है दोस्ती आधार
ग़र देखना हो कान्हा का प्यार
उस सँग झगड़ा कर देखो एकबार
वो रह नहीं पायेगा तुम बिन
दौड़ा चला जायेगा यार
जब इस अहसास को जीने लगोगे
गट गट अन्तस् सुधा रस पीने लगोगे
रजनी रामदेव
न्यू दिल्ली

शीर्षकःरस
*
वरदे ! कल्याणीया करदे,
नरता का अंतस्-रस विकास।
भरदे मानव - मानव में नव,
सुस्मिति का शुचि उत्पल-विलास।

झरदे प्रतिभा - अभिमंत्रित जल,
जीवन-जगती हो सुधा-स्नात।
स्वर्बीजांकुर मुस्करा उठें,
करदे कुहेलिका भस्मसात।।
-डा.'शितिकंठ'

18/09/19
विषय-रस


आ जाओ तुम कविता बन।

जीवन आंगन में रुनझुन-रुनझुन
पायल बन छनको बस तुम
आ जाओ तुम कविता बन।

सूनी सांझ, खग लौटे नीड़ों में
कलरव बन छा जाओ तुम
आ जाओ तुम कविता बन।

संतप्त हृदय एकाकी मन उपवन
सोम सुधा "रस " बन बरसो तुम
आ जाओ तुम कविता बन।

शब्द भाव अहसास बहुत है
अर्थ बन सज जाओ तुम
आ जाओ तुम कविता बन।

निश्छल मन के कोरे सर सलिल में
कमलिनी बन खिल जाओ तुम
आ जाओ तुम कविता बन।

स्वरचित।

कुसुम कोठारी ।
Damyanti Damyanti

जीवन जड चेतन होते ,पल्लवित पुष्पित नव रसो से |
बिन रस सब सूना जैसे पानी सब सून |

वलण बिन व्यंजन,शक्कर बिन मि ठाई |
रसो से निसृत सब होते ,कविता लेख धरा सब |
चंद्रिका बिन चद्रंमा पावसॠतु बिन जगत जड चेतन नही होते पल्लवित,पुष्पित |
बिन रस मानव जीवन जड ही रहता |
होते रस निसृत तो मानव बनता वीर धीर वातस्लय नव रसो पूर्ण |
बिन रस संगीत नही बजता सुर नही बनते |
सब माया रसो की कडवे खट्टे मीठे रसो की |
स्वरचित__दमयंती मिश्रा
गरोठ जिला मंदसौर मध्यप्रदेश

18/9/2019
विषय-रस
:::::::::::::::::::::::::::::::::
बात यह विचारणीय है
यदि रस न होते जीवन में
सब नीरस से फिरते
जीवन के इस चमन में

कर माँ का दुग्ध पान
शिशु अमृत रस पाते हैं
पुष्पों का रसपान कर
तितली मक्षिका मधु बनाते हैं

अमृतरसमय जल भरी सरित दरिया
जीवन दायिनी कहलातीं हैं
नवरस के सृजन से ही
साहित्य की सज्जा हो जाती है

रुच्छ,रसहीन फल फूल
भला किसे सुहाते हैं
भोजन से हम अंगप्रत्यंग में
जीने के आवश्यक रस पाते हैं

नव रसों को हम
निज जीवन में भी धारण करें
उचित समय पर
यथोचित रस व्यवहार करें

खुश्क रसहीन ज़िंदगी जीने का
भला क्या फायदा है
रसमय जीवन सुखमय जीवन
जीवन जीने की कला का कायदा है ।।

**वंदना सोलंकी**©स्वरचित

विषय - रस
विधा-दोहे


कोमल उर में बह रही, मीठी -सी रसधार।
छलकाओगे तुम जरा, बरसायेगी
प्यार।।

कलियों में रस है भरा, भँवरे करते पान।
रोज नये की चाह में ,कभी लुटाते जान।।

रस जीवन का स्वाद है,रस जीवन का
सार
सूखा-सा जीवन लगे,रस बिन जीवन खार

मदिरालय में रस मिले, कदम उधर उठ जाय।
जाते सीधी चाल से , डगमग चलते आय।।

कोमल उर में रस भरा, बहे प्रणय रसधार।
आनन्दित हो पाइये, उस रस की बौछार।।

रसना में रस घोल दो, बोलो मीठे बोल।
जो कुछ भी मुख से कहो,पहले उसको तोल।।

शुगरकेन-रस औषधी , पीत-रोग उपचार।
इसका रस सेवन करें ,वैद न आये द्वार।।

मदिरा-रस ले हाथ में, बहके-बहके
यार।
कभी किसी भी बात पर ,रोज करें
तकरार।।

रस, गन्ध, बिन स्वाद का , भोजन तनिक न भाय।
सजे ,सुगन्धित थाल पर, सबका मन ललचाय।।

सरिता गर्ग

बिषय ,,"रस,,
जहाँ रस का अभाव वहाँ नीरसता का बास
झरने जैसी लय में रस ही रहता खास
रस से भरे प्याले पीते पिलाते विद्वान
रस की ही सारी कला जो छूते आसमान
नरसी मीरा सूर कवि
तुलसीदास
जन्मजन्मांतर करेंगे दिलों में बास
रस विहीन रूखा रूखा रहता जीवन
जैसे कि बरषा बिना सूखा जाता सावन
रस के बिना महफिल भी जैसे हो मातम
यत्र तत्र सर्वत्र रस का ही परचम
रंग छा जाए जहाँ रस की बरसात
आनंदोत्सव में रस की ही सौगात
इसीलिए मीठी रस से भरी राधा प्यारी लागे
बहुत रसीलो रसिकविहारी लागे
स्वरिचत,, सुषमा, ब्यौहार

(रस)
***

शुचि श्रव्य दृश्य के माध्यम से,
आनंद मात्र रस का अभिप्राय,
हदृय भाव, संवेदन केन्द्र,
कर्म मनस का चिर व्यवसाय।

रस के वश में मन के घोड़े,
कल्पनातीत अतिशय थोड़े,
जीवन के पल प्रतिपल को,
अदभुत सहज भाव से जोड़े।

नवरस प्रभाव में उर मानस,
संवेदन, भाव बदलते प्रतिपल,
प्रतिबिंबित चिन्ह हुआ करते,
मुख मयंक के शचि तल पर।

विविध रसों की प्रतिक्रियाऐं,
परिलक्षित लोचन वाणी में,
अश्रु - नाद आनंद कहीं पर,
कहीं अधर पर द्रुत मुस्कानें।

काव्य शास्त्र में निहित विनोद का,
रस का किंचित अन्तर्ज्ञान,
बना समय जाता मानुष को,
इसी धरा पर प्रिय रसखान।
--स्वरचित--
(अरुण)
साथियों
तिथि 18/9/2019 /बुधवार
बिषय रस

विधा. काव्य

मधु रसधार बहे हर उर में
हम सभी करें प्रेम रस पान ।
अ मधुमिलन हो परस्पर
ये किरपा करें आप भगवान ।

डूब जाऐं भक्तिरस में सबजन
भरें वीर रस का हम भंडार ।
फैले करूणा करूण रस और
दिखे चहुंओर रस सुंदर श्रंगार।

नहीं मिले वीभत्स रस कहीं भी
होय प्रथ्वी का अद्भुत शृंगार.।
हरित धरा यहां हरियाली होए
बरसे सदा यहां प्रेमरस बौछार।

स्वरचित
इंजी शम्भू सिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म प्रदेश

1भा *:रस*काव्य
18 /9 /2019 /बुधवार

दिनांक_१८/९/२०१९
शीर्षक"रस"


नीरस न हो जीवन अपना
जीवन है अनमोल
मधुर रस से भरा हो जीवन
करें सदा प्रयत्न।

हर्ष, विषाद,विस्मय, घृणा
सभी चलते जीवन के संग
निंदा रस से दूरी सदा
हो सही सत्संग।

वात्सल्य वो करुणा रस से
जीवन हो परिपूर्ण
वीर रस की कविता लिखे
देशप्रेम बढ़ाये जरूर।

राधा का श्रृंगार देख
कृष्ण छेड़े मुरली तान
श्रृंगार व भक्ति रस का
अद्भुत छटा निहार।

स्वरचित आरती श्रीवास्तव

18/9/2019
बुधवार

विषय -रस

चाहे पी लो आम रस
चाहे पी लो गन्ने का रस
सबसे अधिक तो भाय
बस इंसान को निंदा रस
सबकी जिंदगी में
घुला रहे ये रस
थोड़ा सकुचाते
थोड़ा घबराते
किन्तु इस रस का
पान किये बगैर
चैन कहाँ पाते
बस मिल जाये
कोई अपने सदृश
फिर खूब बहता
निंदा रस
स्वरचित
शिल्पी पचौरी

दिन , बुधवार
दिनांक , 18,9,2019,

रसमय जीवन की अभिलाषा ।
सबके मन में रहती आशा ।।
जीवन खुशियों में हो डूबा ।
मन खुशियों से कभी न ऊबा ।।
काल चक्र की गति कब जानी ।
होनी किसने है पहचानी ।।
फूल और काँटों की माया ।
जीवन पर सुख दुख की छाया ।।
समझ सका जो उसकी लीला ।
हुआ न निश्चय उसका ढ़ीला ।।
शुभ कर्मों में रहता खोया ।
मिला वही जो उसने बोया ।।
हरी नाम की जपता माला ।
भक्ति रस का पीता प्याला ।।

स्वरचित , मीना शर्मा , मध्यप्रदेश 

8/09/2019
"रस"

छंदमुक्त
-----------------------------------
यह जिंदगी जो हमें मिली..
नव रस इसमें है घुला...
हर जीव के मन में भाव भरे
बाल सुलभ गुण है रग-रग में
करुणा,दया मन में अपार...
विस्मय भरा है पूरा संसार...
भक्ति भाव जीवन आधार..
प्रेममय यह जीवन है....
आवेग,उन्मादना मन में है..
अपरुप है प्रकृति का शृंगार.
वीरता है हमारी शान..
हौसला न कम हैं..
दया से आँखें नम हैं...
रौद्ररूप देख मन भयभीत है.
हास-परिहास बसते प्राण....
उम्र का अंतिम पड़ाव...
मन हो जाता है शांत...
जिंदगी का ये सफर ...
रसों का है अद्भुत संयोजन।।

स्वरचित पूर्णिमा साह
पश्चिम बंगाल ।।
विषय- "रस"
विधा - कविता

काव्य रचना के तीन अवयव,
रस, छंद और अलंकार।
रस है काव्य की आत्मा,
करता आनंद का संचार।

ग्यारह स्थायी रसों से निखरता,
काव्य का रूप श्रृंगार।
रसभरी, मनोहारी ये काव्य पुष्प,
काव्य-कानन में लाते बहार।

सौन्दर्य व प्रेम से पूर्ण काव्य,
श्रृंगार रस का कहलाये।
रसराज है, रसपति भी यही,
रति भाव इसका मन भाये।

मन को हँसाये, गुदगुदाये जो,
जिसमें कष्ट-क्लेश का अभाव।
यही तो हास्य रस है बन्धु,
हास इसका स्थायी भाव।

रौद्र रस का रूप विकराल,
दिखाता क्रोध का भाव।
करुण रस है दुःख-वेदना से भरी,
शोक है स्थायी भाव।

उत्साह भाव से जो भरी,
वीरों में जोश जगाती।
आगे बढ़ते रहने को उकसाती,
वह काव्य वीर रस की कहलाती।

काव्य जो करती विस्मित,
समेटे स्थायी आश्चर्य भाव।
अद्भुत रस है वही जो,
मन में भर दे अचरज भाव।

घृणित वस्तु,व्यक्ति व घटना को,
देख उठे जो घृणा का विचार।
वीभत्स रस दर्शाते उसे,
भाव जुगुप्सा है आधार।

दु:खद घटना या दृश्य भयानक,
जगाती व्याकुलता का भाव।
भयानक रस दिखाती है,
व्याकुल मन के भय का भाव।

संसार से जब मन वैरागी हो,
तब शांत भाव जगती है।
जिसमें न दुःख हो, न द्वेष हो,
उसी को शांत रस जग कहती है।

बड़ों का छोटों के प्रति,
प्रेम,स्नेह से सरस।
वात्सल्यता का भाव हो जिसमें,
वही होता है वात्सल्य रस।

दर्शाये जो प्रभु की भक्ति,
भाव जिसका देव रति।
वह भक्ति रस कहलाता है,
जिसमें ईश्वर की अनुराग-अनुरक्ति।

स्वरचित
रानी कुमारी
पूर्णियां, बिहार
@सर्वाधिकार_सुरक्षित

दिनांक 18 -9-2019
रस था,उसकी बातों में।
बिन डोर, खिंचा गया मैं।।

पहुंँचा उस बगिया में ।
देख उसे, खो गया मैं।।

भँवरा डूबा, गुलाब रस में।
उसे देख, प्रेम रस डूबा मैं।।

भूला सब, हुआ बेगाना ।
उसके प्यार में, खोया मैं।।

नहीं रही सुधबुध, भुला में।
दुनिया नियमों को,तोड़ गया मैं।।

होश आया ,बहू अकेला मैं।
प्रेम रस डूब, सब भूल गया मैं।।

नहीं देता, साथ जिंदगी भर।
यही समझ,अब पाया मैं ।।

डूबा जिस, प्रेम रस में ।
कभी उभर न, पाया मैं।।

ना डूब इतना,रह होश में।
अति वर्जित, समझा मैं ।।

निकल, इस रस से बाहर।
जीवन,प्रभु चरण समर्पित किया मैं।।

वीणा वैष्णव
कांकरोली

18/09/19
विषय रस

***
ये भावों के मोती देता ,आज विषय रस घोल ।
रस के कितने ही रूपों से ,मन में उठे हिलोल।।

माता से अमृत रस पाते, करे दुग्ध का पान।
बूंदे निचोड़ कर छाती की ,देती जीवनदान।।

ईश्वर के वंदन में होता, भक्ति भाव का नूर ।
मात पिता की आशीषों में ,जीवन रस भरपूर।।

गुंजन करके पीते भौरें , फूलों का मकरंद ।
नव कोपल से कलियां खिलती,रचें सृष्टि का छन्द।।

काव्य रसों से सजी लेखनी ,रचते ग्रंथ सुजान ।
लिखे वीर रस की गाथायें,भरती जोश महान ।।

कोमल उर के भावों से है सजता रस श्रृंगार।
विरह अग्नि का रस ये लिखता,प्रणय भाव का सार।

भावों का रस ये वाणी में, है अद्भुत अनमोल।
कभी घाव बन कर टीसें क्यों,तोल मोल के बोल।।

बंजर मन की धरती पर रस जीवन का आधार।
कहता कोई हौले से तुम बिन सूना है संसार।।

स्वरचित
अनिता सुधीर

भावों के मोती
विषय-रस

===========
रस बिना जीवन की
क्या कल्पना करे कोई
रस नहीं तो जीवन सबका
पत्थर सा होता नीरस
इंसान होते बुत जैसे
फूल बिना रस के कंटीले
फलों का सृजन न होता
बंजर धरा का सीना
मुस्कान कहीं दिखे ना
सोचो कैसा होता जीना
रस ही जीवन संसार का
जीवन के रंग भी हैं रस से
फूलों के रस से ले मधुकर
मधुवन सींचते मधुरस से
मधुर रस से भरे फल-फूलों
झूमती वृक्षों की डालियाँ
प्रेम रस में सराबोर हो
सजनी साजन के मन भाए
कान्हा की प्रीत में झूमे
गोपियाँ गोकुल में रास रचाएं
वियोग में डूबी मीरा की भक्ति
कान्हा की प्रीत में जोगन बनी
किलकारी शिशु की सुन
अमृत-सा ममत्व उमड़ता सीने में
दादाजी के किस्से सुनकर
बचपन हँसता बगीचे में
भांति-भांति के रस लिए
वसुधा जीवन में प्राण भरे
रस बिना जीवन नीरस
रसमय जीवन से प्रकृति हँसे
***अनुराधा चौहान***स्वरचित

नमन भावों के मोती
विषय-- रस

विधा--ग़ज़ल
मात्रा भार -- 21 मापनी मुक्त
द्वितीय प्रयास

भौंरों का क्या बदनाम हैं रस पीते हैं
हम तो सिर्फ उनकी खातिर जीते हैं ।।

भौंरों की क्या सुनायें अपनी किस्मत
कल भी रीते थे आज भी रीते हैं ।।

उनकी दुआ सलामती के सजदे हैं
उनसे ही तो इस दिल में सुवीदे हैं ।।

कितने नही हैं गम इस दिल की खातिर
दवा वो इस दिल की हर गम सींते हैं ।।

कहते सब मयखाने वाले कहाँ तुम
असरदार ये रस अब न संजीदे हैं ।।

कब तक उलझोगे पेचीदे मुद्दों में
किस्से ऐसे 'शिवम' यहाँ सभी के हैं ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 18/09/2019

मधुमालती छंद
विषय:-रस
2212 2212

रस छंद का ,सम्मान हो।
नव गीत में, पहचान हो
हो भाव में, रचना नयी।
रस से भरी,भाषा यही ।

रस धार में ,भाषा बहे।
हर भाव में ,बातें कहे।
सजती रहे, श्रंगार में
हिन्दी तभी,रचना रचे ।

रस से भरी, बातें नहीं।
प्रिय प्रीत तुम,भूले कहीं।
हाँ आस में,बीता यही ।
तुम आ मिलो,चाहत वही।

स्वरचित
नीलम शर्मा#नीलू

छंदमुक्त रचना
"रस' जीवन का सिकुड़ सा गया है
व्यक्ति अपने ही शहर में
अपनों से बिछड़ सा गया है
रौनक वही मेलों की है
दौड़ की वही खेलों की है
लेकिन....
कहीं कोई पिछड़ सा गया है
दानव विषमता का
भेदभाव कर सो गया है

शब्द बड़े सस्ते हैं
और भाव बढ़े अमूल्य
कृत्यों में ही जी रहे हम
लिए भावहीन शून्य

शब्दों की भीड़ में
ज्ञान भी उलझ गया है
कोई रह गया किनारे
तो कोई....
कश्ती संग डूब गया है

हाँ जाम छलकते हैं यहाँ
संतोष कहां झलकेगा
आज भूखा पेट मरा है कोई
कोई कल अति से मरेगा

स्वार्थ नगरी पसर रही
आज संवेदनहीनता
असमानताओं में पिस रही
गरीबी और मानवता

स्वरचित
ऋतुराज दवे,राजसमंद
दिनांक---18--9--2019
विषय--------रस

रस बिना नहीं है जीवन
नहीं कोई राग,श्रृंगार रे
सब के मन को करें तृप्त ये
सकल जगत का आधार रे
जग के कर्ता,पालन कर्ता
ईश्वर जिसका नाम रे
नव रस में वो ही समाया
मानव मन पहचान रे
मन की तृष्णा रहे अधूरी
भटकत ये दिन रात रे
आकंठ डूबो सत के रस मे
मिल जाये मुक्ति का द्वार रे ।
स्वरचित-------

विधा:-- मुक्त

नव रस की ताल पे
नाच रहा है तन
कभी करे श्रृंगार तो
कभी करुणा में
डूबे मन
क्रोध दिखे नयनों में
घृणा छिपी अंतस
लब पर सोहे
मुक्त हास
संवादों के घर्षण
में वीरोचित
अभिमान है
रिश्तों की दरार में
कभी विभत्सता
आती है
कभी कर्म से
होता अद्भुत संयोग
कभी प्रकृति
दिखा देती
भयानक रुप
माता की
वाणी-पाणी में
ममत्व का वास
खुल जाए जब
ब्रह्म रंध्र
भक्ति के खुलते द्वार

डा.नीलम

दिनाँक 18/09/19
विषय रस

विधा हाइकु

औषधि पथ्य
रसों का रसायन
मानव स्वास्थ्य

रस निष्पत्ति
भाव की अनुभूति
काव्य साहित्य

प्रेमी प्रेमिका
नयन मदहोस
श्रृंगार रस

फलों के रस
शरीर तन्दुरस्त
प्रसन्न मन

मनीष श्री
स्वरचित

विषय :- वीर रस
विधा:- ताटंक छंद


बहता वीर रस हुँकारों से , भारती के सपूतों का ।
शत्रु की छाती को चीरते , प्रलयंकारी दूतों का ।।

रक्तिम आँखें शस्त्र हाथ में , डटे वीर सीमाओं पे ।
झेल के सीनों पर गोलियाँ , जूझें उलट हवाओं से ।।

शस्य श्यामला करे सदा ही , गुणगान शूरवीरों के ।
सुरभित होते घाव पुष्प खिल ,मिट्टी में इन धीरों के ।।

सीमा की वे चिंता करते , चिंता ना परिवारों की ।
करता है रस वीर प्रशंसा , डटे मृत्यु से यारों की ।।

सैनिक सोता भी है सुनता , रणभेरी ही कानों में ।
शान तिरंगे की नैनों में , ले सोता तहखानों में ।।

नमन भारती माँ है करती , मृत्यु के अलंकारों को ।
सरहदें अभिमान है करती , वीर सिपहसालारों को ।।

स्वरचित :-
ऊषा सेठी
सिरसा 125055 ( हरियाणा )
दिनांक -18/09/2019
विषय-रस

जीवन है रस का समाहार
जिनका नित होता है प्रहार।
हँसी- खुशी ,क्रोध, घृणा प्यार
इसमें नित करते हैं विहार ।
हर एक के हैं अनुभाव -विभाव
जिनसे नित पाते हाव-भाव ।
बालक की मोहक छवि निहार
वात्सल्य उमड़ कर आता है ।
उसकी तोतलि बोली सुनकर
मन हरष -हरष पुलकाता है ।
यौवन की बेला आते ही ऋंगार
उमड़ने लगता है ,
प्रियतम से मिलने को मन बार-बार
ही करता है ।
नयनों में अजब अनुराग लिए
पलकों में अलग खुमार लिए
यौवन ही अलग झलकता है ।
जब हर पल हर क्षण मन
प्रियतम के लिए तरसता है ।
काम -क्रोध' मद -लोभ लिए
कब जीवन ही कट जाता है।
बचपन से लेकर बुढा़पे तक
नवरस की ही परिभाषा है ।
आओ हम सब इस जीवन में
इन नवरसों का पान करें।
आखिर में शांति से उस प्रभु की
सत्ता का गुणगान करें ।
स्वरचित
मोहिनी पांडेय



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"कांच /शीशा ""10अक्टुबर 2019

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