Sunday, September 22

"पलकें " 19सितम्बर 2019

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ब्लॉग संख्या :-510
दिनांक- 19/9/2019
शीर्षक- "पलकें"
विधा- छंदमुक्त कविता
******************

आँखों में कुछ ख्वाब सजाकर,
हमारी पलकें दे रही थी पहरा,
तभी एक आहट हुई थी ऐसी,
सजाकर आ गया कोई सेहरा |

खोली जब हमने अपनी पलकें,
मंजर लगा बड़ा ही सुवाहना था,
ख़्वाब जिसके सजाये थे हमने,
यही तो इस समां का परवाना था |

स्वरचित- *संगीता कुकरेती*

विषय पलकें
विधा काव्य

19 सितम्बर 2019,गुरुवार

लाज शर्म से पलकें झुकती
प्यार अनौखा होता उसमें ।
आदर मान सम्मान बढ़ावे
प्यार जरूरी है उपवन में।

स्वाभिमान आत्मविश्वास से
पलकें सदा ऊपर ही उठती।
असंभव जग में नहीं होता
सम्भव सब मेहनत ही करती।

पलकें रक्षक है नयनों की
शयन कराती सदा हँसाती।
स्वप्न लोक अद्भुत जग के
सोकर भी नव चित्र दिखाती।

खून पसीना श्रमिक बहाता
थककर भी पलकें न झुकती।
कमर तोड़ मंहगाई के आगे
करता नित शक्ति की भक्ति।

भीगी पलकें बन जाती है
दीन हीन निराश्रित देखे।
हँसी खुशी हर्षोल्लास में
हर पल पलकें स्नेह निरखे।

पलकें झपके तो जीवन है
पता नहीं कब क्या हो जाए।
बंद पलकें ध्यान प्रभु का
सुख शांति अमृत रस पाए।

स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

विषय -पलक

पलक पर तुमको , सजाया है सनम
आँख से अश्कों से तुम बह न जाना

दिल का दरवाजा खुला तुम आ गए
यही रहना अब इसे , तुम घर बनाना

हृदय वीणा बन केअब बजते हो तुम
मेरी धड़कन से जरा तुम सुर मिलाना

पलक की ये झील कितनी है सुहानी
सैर इसमें हम करें,......नौका बनाना

बहुत शिद्दत से सनम हम प्यार करते
उसी शिद्दत से सनम तुम भी निभाना

मेरी पलकों पे कभी....आँसू न आयें
चूम कर पलकें , सदा तुम मुस्कुराना

सरिता गर्ग

विधा--ग़ज़ल
मात्रा भार -- 21

काफ़िया -- ओने
रदीफ़ -- का

हुनर आ जाता अल्फ़ाज़ पिरोने का
दर्द बहुत होय अज़ीज़ के खोने का ।।

पलकों से पूछो कितने गिरे मोतीं
कितना गम था उनके जुदा होने का ।।

इक इक आँसू का हिसाब रखें पलकें
क्या सिला मिला उन ख्वाब सँजोने का ।।

पलकों में सजाय ख्वाब सारे बह गये
वक्त को दर्द न हुआ दिल के रोने का ।।

कीमती ख्वाब सब वक्त के हाथों बिके
वक्त लगाया दाम ओने पोने का ।।

बेचारीं ये पलकें क्या करें 'शिवम'
उनको तो काम मिला दर्द ढोने का ।।

जब जब होयँ वो यादें ताज़ा-तरीन
पलकें नाम नही लेंय फिर सोने का ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 19/09/2019

पलकें

नमन मंच भावों के मोती। नमन गुरुजनों मित्रों।

पलकें जब उठती हैं,तो खिल जाते हैं जीवन।
जबतक पलकें झूकी रहती हैं,
उदासीन हो जाता है मन।
पलकों की पोरों में छिपेहैं जाने कितने सपने।
कोई हो जाते पूरे,तो कोई रहे अधूरे।
सपने तो सपने हैं,क्या पूरे,क्या अधूरे।
फिर भी विचलित होता है मन।
जो नहीं होते सपने पूरे।
पलकों में छिपे हुए हैं आशा और निराशा।
पलकों में छिपे हुए हैं सारे ख्वाब।
पलकों में छिपे हुए हैं आंसूओं की धारा।
जब बहेंतो बहें बेहिसाब।
कभी होते हैं आंसू खुशी के।
कभी कभी दुःख के।
संभालकर रखना इन आंसूओं को।
बेमतलब नहीं करना बर्बाद।
पलकों की भाषा होती है निराली।
समझना है इन्हें मुश्किल जनाब।

वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी
स्वरचित

नमन भावों के मोती मंच

कुछ कह रहा है पलकों का उठना गिरना तेरा।

या मरासिम बन रह हैं या मुहब्बत हो चुकी है।

मुझको परेशां कर के मुस्कुरा रहे हैं आप जो।
कुछ और बाकी अभी या शरारत हो चुकी है।

सज - धज के वो जो आए सामने तो हैरान हूँ।
उतरा कुदरत का कहर या कयामत हो चुकी है।

तडपा दिया इक नजर ने होश कुछ बाकी नहीं।
कुछ और है ईनाम क्या या इनायत हो चुकी है।

उम्र तो मेरी कट चुकी है इक तेरे इन्तजार में।
ठहरूं जरा कुछ और देर या इजाजत हो चुकी है।

ये साफगोई भी ईश्क़ मे जुर्म से कुछ कम नहीं।
या जां छिडकते थे हमपे या अदावत हो चुकी है।

विपिन सोहल स्वरचित

19 /9 /2019 /
शीर्षक,, पलकें,

भीगी भीगी पलकें बहुत कुछ बता रही हैं
मेघों की तरह बरषती जा रही हैं
वैसे तो जमाने में अनेकों गम हैं
सभी के बराबर न किसी के कम हैं
पराए दिए गमों को लोग भूल जाते हैं
अपनों के नासूर बन जिंदगी भर सताते हैं
कुछ गम आंसू बन पलकों से निकल जाते हैं
जाने कितना सैलाब इस दिल में छिपा है
कुछ दफन हो गया कुछ बह निकला है
जिंदगी चली जा रही है झंझावातों में
सोए नहीं जागे सारी सारी रातों में
इसलिए पलकों से सारा गुबार निकल गया
फिर चल पड़ी जिंदगी मन संभल गया
स्वरिचत,, सुषमा ब्यौहार

पलकें

पलकें खुलीं
लगा सारा जहां
अपना सा
बंद हुई पलकें
न दिखा
कोई अपना सा

संजोए बैठी
दुल्हन
सतरंगी सपने
बंद किये पलकें
आऐगा शहजादा कोई
बैठाने पलकों में कोई

खुश थी माँ
सरहद से
आते थे संदेशे
आया जब
बंद पलकें बेटा
हो गयी बेचैन माँ

है लाज का गहना
पलकें
झुका के बैठी वो
महफ़िल में
हर कोई दीवाना हो गये

अब और क्या कहें
"संतोष "
पलकें तेरे लिए
मिली आँख से आँख
और सारा जहां
हकीकत हो गया

स्वलिखित
लेखक संतोष श्रीवास्तव भोपाल

दिनांक 19/09/2019
विषय:पलकें

विधा:हाइकु

🌷🌷🌷
पलकें होती
नयनों की कवच
आँधी का वार।

झुकीं पलकें
मर्यादा का पालन
बेटी श्रृंगार ।

बंद पलकें
रस्म मुह दिखाई
ले उपहार ।

उठी पलकें
मांगती अधिकार
भेदती पार ।

पलके मूदी
कर एकाग्र चित्त
सृजन काव्य ।

व्यथित मन
अश्रुपूरित नैन
साथी पलके।

विश्राम काल
हुआ शिथिल देह
सोती पलकें ।
🌹🌹🌹
स्वरचित
नीलम श्रीवास्तव लखनऊ उत्तर प्रदेश

दिनांक-१९/९/२०१९
शीर्षक-"पलक"

नींद से अलसायी पलकें
शर्म से शर्माई पलकें
पलकों की अद्भुत भाषा
हर पल कुछ कहती पलकें।

पलकें जब जब उठती है
बहुत कुछ ये कहती हैं
संचित कर ये भाव दिलो का
संवाद ये खूब करती है।

पलकें जब उठती है
बहुत कुछ ये कहती हैं
निष्फल नहीं हो प्रयास उसका
कभी कभी ये बंद रहती है।

दृग की ये खिड़की है
बंद पलकों में राज रखती है
आशा, निराशा,लज्जा,शर्म,
सबका ये मर्म जानती है।

पलकें जब उठती है
बहुत कुछ ये कहती है
बंद पलकों में ये राज रखती है
कभी अधीर हो ये अश्रु बहाती है।

स्वरचित आरती श्रीवास्तव।

दिनांक .. 19/9/2019
विषय .. पलकें

*********************

कोई सुन्दर, कोई बेहतर, कोई क्या खूब लिखा है।
कोई कहता है उम्दा शब्दों ने दिल जीत रखा है।
**
कोई वाहह वाह कहता है लिखी कविता पे है मेरे।
मगर सच में बताओ शेर ने क्या कुछ खास लिखा।
***
अभी शैशव अवस्था है मै हूँ अनभिज्ञ नियमों से।
अभी अज्ञान हो मै तो बताओ मेरी कमीयो कों।
**
अभी मन भाव कहता हूँ मै पलकें बन्द कर करके।
उसे पन्नों पे गढता हूँ मै अपना जान कर करके।
***
मेरी कोशिश तो है उम्दा लिखूँ पर भूल जाता हूँ।
करूँ जब तक कि कोशिश भाव ही बदल जाता है।
**
मगर फिर भी मै लिखता हूँ यही इक शौक है मेरा।
मेरे पलकों के नीचे बन्द ये ही ख्वाब है मेरा।
**
स्वरचित .. शेर सिंह सर्राफ

19/09/2019
विषय -- पलकें

विधा -- मुक्त छंद

तुम कहते हो/देखो मुझको
रोना तनिक न सुहाता है!
पर मैं कहती हूं/ इस रोने मे
अनुपम सुख छा जाता है!
पलकों में आई बडी बडी,
मोती की लरियां तो देखो!
दहकते सू्र्ख गालों के नीचे
सरकने की आतुरता देखो!
आँखों में जो लाली है,
उसे देख सूरा वरमाई है!
हौले से उठते पलकों में,
हाय/ कितनी तरुणाई है! सांसों का रूक रूक कर,
आना/ फिर से रुक जाना!
हिचकी की धीमी रफ्तार फिर/ दोनों का मिल जाना!
होठों का हौले-हौले सा,
कंपकंपा कर कुछ कहना!
फिर/ घनी पलकों का यूं ही
गिरना/ और धीरे से उठना! प्रिय/ सिर्फ रूदन नहीं है ये
उच्छवासों आहों का अहसास
हृदय की छोटी कुटिया में सहसा रोक लेने का प्रयास
जैसे सावन के आने से,
काले बादल छंट जाते हैं!
अश्रु के वेगों को तो देखो,
कितना कुछ कह जाते हैं!

स्वलिखित--डॉ.विभा रजंन(कनक)

तिथि __19/9 /2019 /गुरुवार
बिषय ____पलकें
विधा ____मुक्तक
मात्रा भार (24)

उर आंगन सजाऐं तो मिलें यहां भगवान.।
पलक हम बिछाऐं तो आऐं यहां भगवान ।
सुंदर तन माया नहीं प्रीति प्रेम बढाऐं
पलक पांवडे गर बिछें दिखें यहां भगवान.।

"प्रीत रीत की. हो जहां खुश होते भगवान ।
आदर प्यार मिले वहां खुश होते महमान.।
पलक झपकते पता नहीं यहाँ क्या हो जाए,
त्याग मोह ममाया सभी बन जाते दरबान.।

पलक बंद कर देख लें अंतर्मन भगवान.।
नहीं मिलते हमें कभी मैले मन भगवान.।
रहें प्रेमसागर मप्रेमालय में अगर सभी
निश्चित मानें हमें दर्शन देंगे भगवान.।

स्वरचित ::इंजी शम्भू सिंह रघुवंशी अजेय
जय जय श्री राम राम जी

1भा ख "पलकें"मुक्तक
मात्रा भार (24)
19/9 /2019 /गुरुवार

बिषय,, पलकें,,
द्वितीय,, प्रस्तुति

उन्होंने पलकें कुछ यूं उठाईं
दीवाना अपना बना लिया है
हजारों देते हुए दुआएं
दिल में उनको बैठा लिया है
गुस्ताखी शोख हवाओं ने की
घूंघट उनका उठा दिया
शर्म से उन्होंने दोनों हाथों
चेहरा अपना छिपा लिया है
चलो कभी तो दीदार होंगे
. हमने भी उनके दर के सामने
आशियाना अपना बना लिया है
नजर न लग जाए कहीं जहां की
चुपके से हमने भी कलाई पर
उनकी काला टीका लगा दिया है
स्वरिचत,, सुषमा,, ब्यौहार

आज का विषय, पलकें
दिन, गुरुवार

दिनांक, 19,9,2019,

पहरेदारी आँखों की हरदम ,
पलकें करतीं रहतीं हैं ।
जो बात मचलती है आँखों में ,
पलकें उलझायें रखतीं हैं ।
याचना कभी अपमान कभी ,
आँखों का सहारा लेते हैं ।
तब पलकें बीच में आकर के ,
भावों को किनारा देतीं हैं ।
पलकों का झुकना हया कभी,
कभी शर्मिंदगी होती है ।
अपना अपना विश्लेषण ये ,
नीयत की बात ये होती है ।
कहीं पलकों में कटतीं हैं रातें ,
बसर कहीं पलकों की छांव में ।
ईश्वर की बनाई इस दुनियाँ में ,
तकदीरें समान नहीं होतीं हैं ।
करतीं हैं चुगली भींगी पलकें ,
अपनी बेबसी और लाचारी की,
उठतीं गिरतीं चंचल सी पलकें,
कहतीं हैं कहानी मक्कारी की।
छल प्रपंच से भरी इस दुनियाँ में,
दिखे सूरत नहीं कहीं भरोसे की ।
पलकों की कहानी खत्म न हो ,
होतीं हैं शायरी ये तो शायरों की ।
रखतीं हैं शर्मो हया के पर्दे में ,
शोभा बन जातीं हैं नारी की ।

स्वरचित, मीना शर्मा , मध्यप्रदेश 

विषय-पलकें🌷🌷🌷🌷

अधखुली पलकों से
धीरे से छलका
मोती सा आँसू का कतरा
कपोलों पर फिसला
फिर हवा में यूँ तिरता चला गया

ज्यूँ शाख से गिरा
सूखा पत्ता
हवा की लहरों संग
उड़ता चला गया
बिना अपना अंजाम जाने
समर्पण में बहा
या बेबसी में ढहा
न पलकें जाने
न ही शाख को पता ।।

**वंदना सोलंकी**©स्वरचित

विषय:-पलक
विधा:-तुकांत कविता

पलकों के दायरे में कहाँ ख्वाब सिमटते हैं।
कभी उठते हैं बेहिसाव कहीं जमीन पर गिरे हैं

सजधज के चली दुल्हन के भी ख्वाब सुनहरे हैं
ये विधवा की कराहों से कभी
बचते मिले हैं

कहीं दो जून की रोटी भी मयस्सर
नहीं होती
यहाँ रोटियों को फेंकते भी कुछ
इन्सान दिखे हैं।

प्रेयसी ने पलकों मे जो ख्वाब कभी सजाएँ थे
उन्हें. तोड़ते हुए भी उनके यहाँ भगवान चले हैं

जीवन की तूलिका को दुख सुख ने सजाया है
पलकों में बंद आँखों ने अनगिनत
ख्वाब गढ़े हैं।

हाँ "नीलू" ये जीवन तो है बस
एक मोती।
पलकों में छिपा कर अब उसे निखारते चले हैं ।

स्वरचित

नीलम शर्मा #नीलू

शीर्षक- पलकें
पलकें पहरा देती हैं इसलिए

मेरे ख्वाबों को
मेरी आँखों से आजतक
कोई चुरा नहीं पाया।

पलकें पहरा देती है इसलिए
दृश्य जो भी
मेरी नजरों को न भाया
कभी दिल में न उतर पाया।

देखा जब पहली बार तुम्हें
पलकें पल को मुंद गई
असर कुछ ऐसा हुआ
आजतक दूजा कोई न समाया।

स्वरचित- निलम अग्रवाल, खड़कपुर

बिषय ____#पलकें#
विधा _____काव्य

भीगती पलकें
दर्द समेटे
निकलती झरती अश्रुधार
विव्हल बेचैन उनींदी पलकें
शिकायत करती
टपकती कभी
रूकती झुकतीं
झर झर टपकती पलकें
चले गए सजन हमें छोडकर
यही अपना प्यारा
तिरंगा ओढ़कर
गर्व है तुम पर
मगर हम अकेले
ढोऐंगे कैसे बजन झमेले
अलसाई अंखियों में
तुम्हारी ही आहट
बच्चे पूछते कब आओगे
इन्हें कपड़े खिलौने
कब आकर दिलाओगे
भीगी पलकों से
क्या जबाव दूं
जरा आकर कुछ तो बता दें।

स्वरचित ::
इंजी शम्भू सिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म प्रदेश
जय जय श्री राम राम जी

2भा #पलकें#काव्य
19/09/19
विषय पलकें

विधा कविता

छायी फिजा में बासन्ती बयार
पलकें बिछाये करती वो इंतजार

यादों में पहली मोहब्बत की रात
करवट बदल कर करती वो बात

नींदों से पलकों की हो गयी रार
पिया से दिल की हो गयी हार

दिल की धड़कन करती पुकार
पलकें करती प्रियतम इंतजार

मनीष श्री
स्वरचित
रायबरेली


इन पलको को बंद कर तो
मेरे सपने मुझे पूरे दिखते है
पर जब खोलूँ तो अधूरे लगते है
लगता है बंद रखु हरदम
पलकों को खुलने ही ना दु
पर बंद पलकों से क्या कभी सपने पूरे होते है
ठान लिया है अब मैंने
जो इन पलकों में छिपा रखा है
उन सपनों को हकीकत कर दिखाना है
बस जरूरत अपनो की है
दे साथ तो जीत लू सारी जंग अपनी

पर जब अपनो का साथ न मिले
तो इन्ही पलकों के कोनो से
आशु की बूंद निकल पड़ती है
ओर लगता है जैसे मेरे सपने
इन पलकों से निकल कर मिल
न जाये इन आशु के बूंद में
ओर बह कर मुझे दूर जाते दिख रहे है

स्वरचित
दीपिका मिश्रा
मिर्ज़ापुर

दिनांक-19/09/2019
विषय-पलकें


दहक लालिमा सुर्ख गालों पर

आंखों में जो लाली छाई।

अंजन मस्करी देख कर

मेरी तरुणाई भी शरमाई।।

झपकी पलकें, थपकी कुंभलाई

हृदय पलकें, अविरल सुहाई।।

तुम हो कुसुमित पुष्प प्रिये

पलकों की हर अपलक पर तेरे

प्राण न्योछावर है मेरा सारा

मलयलिन अलको पर ओढे़

नभमंडल के चादर का हर तारा।।

नयनों के शीतल झरने में

गजगामिनी सी पलकें भारी

बांध लिया आगोशो के ओसों में

मेघो का मँडराना है जारी।।

कंगन की हर खनखन पर तेरे

रचूँ छंद मैं जग का सारा

जब -जब महके के आंचल तेरा

जगमग -जगमग चमके

नभ मंडल का हर तारा।।

हृदय ऐश्वर्य को स्फुरित करो तुम

पुष्प जग का प्रथम सुगंध होवे न्यारा

मिले रूप दर्शन लावण्य यह तेरा

चुम्बित बसंत के प्रथम तरंग से

पुलकित हो जाए विह्वल मन मेरा

स्वरचित


पलकें

***
पलकों में कैद छोटे सपनों
की छोटी छोटी खुशियां हैं ,
छोटे-छोटे इन पलों में
सिमटी अपनी दुनिया है ।

पलक झपकते ही कुछ
ख्वाब टूट बिखर जाते हैं ,
टूटने के चुभन की टीस से
पलकों से मोती गिर जाते हैं ।

पलकें बिछाकर राहों में
बैठे थे उनके इंतजार में ,
पलक झपकी ही नहीं
उनके आने के करार में ।

पलकों के द्वारे से नींद
बड़ी दूर खड़ी थी ,शायद
बीते लम्हों को लेकर
उनकी पलकों तक चली थी ।

पलकों का गिरना उठाना
नजरों से सब कह गया
उन आंखों के काजल में
दिल वही अटका रह गया।

पलकों पर बिठाकर
प्रभू मूरत उर बसाऊं,
कैद कर इन नयनों में
जीवन तुझमें ही लगाऊँ।

स्वरचित
अनिता सुधीर


भावों के मोती
विषय=पलकें

===========
पलकें बिछाए बैठी
कान्हा,राधा तेरे प्यार में
कहाँ छुपे तुम ओ गिरधारी
झलक दिखला इक बार में
तेरे प्रेम में सब कुछ भूली
चली अकेली नार-नवेली
तुझसे मिलने की चाह लिए
मन में प्रीत के भाव लिए
यमुना किनारे बंशी-बजैया
सुध-बुध अपनी खो बैठी
सांवरिया तेरी याद में खोई
वृंदावन को निकल पड़ी
तुझसे मिलने आई सांवरे
दर्श दिखा तरसा ना सांवरे
दूर न तुझसे मैं रह पाऊँ
बंशी की धुन पर दौड़ी आऊँ
घर-बाहर रास्ते-चौबारे
ढूँढ तुझे यमुना किनारे
बंसीवट की छैंया
कहाँ छुपे हो जाकर
नटखट कृष्ण कन्हैया
बीती रही रैना चंदा छुपा जाए
श्याम तुम बिन अब रहा न जाए
***अनुराधा चौहान***स्वरचित 


नमन !"भावों के मोती"🙏
19/09/2019
ंद हाइकु(5/7/5)-"पलकों "पर

(1)
जागी है निशा
साँझ पलकों तले
सूरज सोया
(2)
बोले नयन
पलकों की चिलमन
झाँकता मन
(3)
जागता मन
पलकों की ओट में
छुपे हैं स्वप्न
(4)
भाव छलके
खूब बरसी यादें
भीगी पलकें
(5)
नैन ख़ुमार
पलकों के पर्दे से
झाँकता प्यार
(6)
चूमती ख़त
बिछ गई पलकें
प्रतीक्षारत
(7)
झुकी पलकें
बेटी का जिस्म तार
शर्म समाज

स्वरचित
ऋतुराज दवे,राजसमंद(राज.)


छंदमुक्त

पलकें

पलकें
आज बैठी है सज धज के
नेत्रों में लगे काजल
से प्रतिस्पर्धा करती स्वमेव
खुशी को समेट कर
खुलती है बन्द होती है
सीप के मोती की तरह
और नेत्र चमक रहे है
उस अनुपम अहसास से...
समय से कदमताल कर रही है
क्षण क्षण...
उद्वेलित हृदय को बार बार
स्नेह से विचलित होने से रोक रही है
जाने कब से टकटकी लगाये राह निहारते नेत्रों को
मुठ्ठी में बन्द कर अधीर न होने का
उपक्रम कर रही अनवरत..
दर्पण से अठखेलियाँ करती मुखमण्डल की आभा को
सौंदर्यता प्रदान कर रही पलकें..
जब भी झुक के उठी है
हजारों कामदेव
रती के इस रूप पर
न्योछावर हो गए ...

पलकें
कितनी बोझिल हो गयी थी आज
उमड़ते घुमड़ते जलधरों
के सदृश
वर्षा को आतुर
असमर्थ ,असहाय,
दर्द का बोझ उठाने में
बहुत प्रयास किया
मोतियों को बचाने का
उर की कसमसाहट को समेटने का
मन में उपजे क्षोभ को
अंदर ही अंदर मारने का..
पर दृगजल आतुर था विरलता को
और आखिर लुढ़क गए
मोती शून्य में
सीधी रेखा बनाते
गिरि गह्वर पार कर के
सज गए कपोलों पर..
और दर्द का सागर छलक उठा
न चाहते हुए उठती लहरों में
भीग गयी पलकें....
कभी हार गयी
कभी जीत गयी पलकें........
स्वरचित
गीता गुप्ता 'मन'

तिथि ___19/9/2019 /गुरुवार
बिषय___#पलकें#

काफिया "आ" स्वर
विधा ___ गजल
मात्रा भार (17)
एक कोशिश मात्र

पलकों से आंसू गिराता रहा ।
डोली किसी की उठाता रहा.।(1)

कभी वहारों को देखा नहीं
क्यों जमाने को बुलाता रहा.।(2)

छलकती पलकें उसे देखकर
मै आंसू झुका बहाता रहा ।(3)

सदा गोदी में खिलाया जिसे
यह सोच पलकें गिराता रहा.।(4)

नहीं /हो सितम किसी बेटी पर
पलकों से आंसू झराता रहा ।(5)

बिटिया की पलकें रूकती नहीं
न रोए कभी भी सिखाता रहा ।(6)

बेटी तुम्हारी हमारी. मिले
हंसाता कभी. रूलाता रहा । (7)

स्वरचित
इंजी शम्भू सिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म प्रदेश
जय जय श्री राम राम जी

3*भा शी # पलकें#गजल
मात्रा भार (17)
19/9 /2019 /गुरुवार

विषय-पलकें
विधा-हाइकु
💐💐💐💐💐💐
झुकी पलकें

बहुत कुछ बोलें

भेद न खोलें👍
💐💐💐💐💐💐
भीगी पलकें

कुछ भी नहीं बोलें

हाँ,भेद खोलें👌
💐💐💐💐💐💐
कुछ ना बोलें

उन्मीलित पलकें

राज न खोलें💐
💐💐💐💐💐💐
श्रीराम साहू"अकेला"
बिषय- "पलकें"
दिनांक-19-09-2019

विधा- हाइकु

सूरज जागा
कलियाँ मुसकाई
पलकें खोल।

बम धमाका
पलक झपकते
बिखरे अंग।

पी परदेशी
बाट जोहती गोरी
पलकें बिछा।

प्यार में धोखा
दिल-ए- बेकरार
भींगी पलकें।

दिन का थका
रात्रि गहरी नींद
पलकें बंद।

स्वरचित
@सर्वाधिकार_सुरक्षित
रानी कुमारी
पूर्णियां, बिहार


दिनांक 19 -9-2019लाज से पलकें झुका,सम्मान देना ना भूलती कभी।
सब के दिलों पर राज करती,कोई ना भूलता कभी।।

जमाना बेदर्द है,राज तू ना बताना कभी।
पलकों में ही दबा रख,दर्द दरिया ना बन जाए कभी।।

राज यह उसके दिल के,मैं ना समझ पाया कभी।
बहुत संभल लिखें मैंने,जहन ए जज्बात कभी ।।

पलक उठा नजर बचा,जब जब देखा मैंने तुझे।
तब तब मैं डूबा उसमें, होश में रहा ना कभी।।

बंद करेगी जब पलकें, मैं आऊंगा तेरे जेहन में तभी ।
तू समा मैं परवाना, मिलन होगा कभी ना कभी।।

कहती है वीणा जमाना निष्ठर, पलक तू न उठाना कभी।
तोड़ बंधन देख हम, इस जहां में मिलेंगे कभी ना कभी।।

वीणा वैष्णव
कांकरोली
(स्वरचित)

विषय पलकें
विधा कविता

दिनांक 19.9.2019
दिन। गुरुवार

पलकें
💘💘💘

भावातिरेक में ,जब भी मैं बहा
अपनी ही शैली में ,पलकों ने कहा
सारी भाषायें ,जाने कहाँ विलीन हुईं
अश्कों ने अश्कों से ,ऐसा कुछ कहा।

पलक जब भी ,सजल होती है
मन मे बडी़ ,उथल पुथल होती है
भावों की सीमायें ,भी तर होतीं
ऐसी अज़ब दिल में , हलचल होती है।

कल तिरंगे में लिपटा था जोधा ,पलकें हुईं अज़ब विह्वल
कल चाँद में हमारी आवाज़ गूँजी,पलकें खुशी में हुईं सजल
कल बेटी की हुई विदाई,पलकों में हुई अज़ब छलछल
कल बेटे ने छलाँग लगाई
लम्बी ,पलकों में बिछी खुशी की मलमल।

पलकों ने जब जब ,प्यार सजाया
सौन्दर्य अनोखा ,निखर कर आया
पलकें जब ,जीवन ने मूँदी
भावों की दुनियाँ, में ज्वार आया।

कृष्ण !सजा रखा है, तुमको पलकों में
शिव!तुम्हारे लिये, जल रखा है पलकों में
एक आस ,संजो रखी है मैंने पलकों में
क्या तृप्ति बसेगी, कभी मेरी पलकों में।

कृष्णम् शरणम् गच्छामि

दिनांक -19/9/2019
विषय - पलकें


आँखों की बनकर आभा
बहुत इठलाती है पलकें
इनकी हर भाव भंगिमा में
सजगता दिखाती हैं पलकें
काजल का सानिध्य पाकर
खिल खिल उठती है पलकें
बनकर इन आँखों की सहेली
निज अहसास कराती हैं पलकें
आँखों में सुंदर सुंदर ख़्वाब सजा
बड़ी निष्ठा से सजाती हैं पलकें
कल्पनाओं भावों की प्रीति का
राज़ गहरा बतला देती हैं पलकें
सुख दुःख में छलके जब आँसू
सहारा अपना देती हैं पलकें
सहन भार जब ना ये कर पाएँ
गालों को सौंप देती है पलकें
हो ना जाए कहीं जग हँसाई
आँखों में क़ैद करती है पलकें
लाज हया का पर्याय बनकर
अदब से झुक जाती हैं पलकें
धूल भरी आँधी जब जब आए
रक्षाकवच भी बनती है पलकें
भयावह दृश्य देखा ना जाए
आँचल सा फैलाती है पलकें
जीवन के अंतिम लम्हों तक
अंतरंग प्रिया रहती हैं पलकें
साँसों की डोरी जब छूट जाती
चिर निद्रा में सुलाती हैं पलकें

✍🏻 संतोष कुमारी ‘ संप्रीति ‘
स्वरचित



लग के पलक से,पलक सोई
ख्वाबों की दुनिया में खोई


नींद की जाने क्या हम से दुश्मनी
रात बीती पलक से पलक न लगी

ढलक ही गया पलक के कोर से
बैठा रहता कब तक आंसू का मोती

कैसा ये जादू मुझ पर हुआ
देख कर उसे पलक न झपकी

पल रहे हैं जाने कब से
मोती आंसू के सीप में पलकों की

उमड़े भाव बरसी यादें
भीग गई पलकें उसकी

बहुत कोशिश की पलकों ने
सैलाब आंसूओं का रोक न पाईं

देख कर फलक पे भोर का तारा
होने लगी बन्द पलकें रात की

उभर आया है फफोला हाथ पे मेरे
गिरा था आंसू जहां पलकों से तेरी

दिनांक------19-9-2019
विषय---पलकें


कभी झुक जाती, कभी उठ जाती
कभी लजाती,कभी मुस्काती
काजल लगी आँखों पर देखो
कैसे ये इठलाती पलकें
हृदय मे उमंगते आवेगों को
मन मे तरंगित, तरानों को
आइना सदृश्य दिखाती पलकें
कामदेव सा रुप सजाये
नवयोवन को ये बहकाये
नारी का श्रृंगार दमकता
जब उसकी इतराती पलकें
श्री राधे बिन श्री कृष्ण अधूरे
सनातन प्रेम में दोनों डूबे
सुन तान मधुर मुरली की
उठ जाती राधा की पलके
स्वरचित/-------




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"कांच /शीशा ""10अक्टुबर 2019

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