Monday, September 23

"लोहा,लौह " 23 सितम्बर 2019

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ब्लॉग संख्या :-514
शीर्षक-- लोहा / लोह
विधा-- दोहा
प्रथम प्रस्तुति


पिटता देख लोहे को , सोना करे सवाल ।
मैं भी तो पिटता रोज , पर नही करूँ बवाल ।।

बराबर हथौड़ा दोउ , बराबर रहे मार ।
पर तूँ ज्यादा रोय है , क्या कारण है यार ।।

लोहा कुछ सकुचाय के , बोला बरख़ुरदार ।
तुझे पीटता ग़ैर पर , मुझ पर निज का वार ।।

जाना वो पीड़ा 'शिवम' , जाना जग संसार ।
ऐसे ऐसे वाक्या , नज़ीर यहाँ हजार ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 23/09/2019

विषय लोहा,लौह
विधा काव्य

23 सितम्बर 2019 सोमवार

विश्व विकास लौह पर सम्भव
कल कारखाने उन्नति शिखर।
रोजगार मुहिया करवाते ये
प्रगति शीलता मार्ग के प्रखर।

ठंडा लोहा बड़ा कठोर है
गरम लोहे को सदा पीटता।
काम हज़ारों करने पर भी
क्या मजाल जो घिस जाता।

इतिहासों के स्वर्णिम पन्नो में
लौह पुरुषों की गाथा अद्भुत।
नित टकराए शिला खंडों से
क्या बिसात जो जांय वे टूट।

मानव कर पारस ही समझो
लोहे को नित सोना करता।
दूर गगन अंतरिक्ष में जाकर
लंबी उड़ान चंद्रयान भरता ।

चने चबवाते नित लोहे के
सीमा पर भारत के सैनिक।
सीधे जाते रिपु जहन्नुम
पावन काम होता है दैनिक।

स्व0 रचित ,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।
लोहा

मिलना,बिछडना,

फिर मिलना,फिर बिछडना ।
हर बार एक नया जीवन,
जीवन में साथ,
कुछ रिश्ते,कुछ नाते ।
कुछ धूप,कुछ छांव ।
संघर्ष के बादल ।
बादल छटते ही,
फिर परिपक्व होकर ,
नई उम्मिद लेकर,
नया रुप लेकर निकलना ।
जैसे हैं हमारा जीवन।
वैसे ही हैं लोहे का जीवन ।
मिलता हैं,कही विरान वन में ।
बड़ी,बडी चट्टानों में ।
मशिनों के बडे घाव झेलकर ।
टुटता हैं छोटे कन में ।
पिघलता हैं भट्टी में ।
साथ होते भट्टी में,
कुछ रसायन,कुछ पुराने साथी ।
सब मिलकर,
करते हैं संघर्ष गर्म भट्टी में ।
जब संघर्ष होता खत्म,
तो बाहर निकलता,
लाल सूर्ख रंग में ।
तेज तपन के साथ ।
मानों जैसा फट रहा ज्वालामुखी ।
धिरे,धिरे होती कोशिश,
लाल सूर्ख को शांत करने की ।
फीर जब होता शांत तो !
बनता हैं कठोर ।
रंग भी होता परिवर्तीत ।
कहते हम लोहा ।
फिर तपता भट्टी में,
होता परिवर्तीत,
कई रंग रुप में ।
बनता हैं,
हमारे जीवन का हिस्सा ।
यही हैं,
लोहे का किस्सा ...

स्वरचित- प्रदीप सहारे

बिषय- लौह
लौह महिला बन जाना तुम

कोमलता का चोला उतार।
तनिक न घबराना तुम
चाहे कितनी पड़े वक्त की मार।।

पारस की तरह आएगा कोई
जिसे छूकर बन जाओगी कंचन।
समय सदा एक सा रहता नहीं
चमकेगा एक दिन तेरा भी जीवन।।

तुम्हें केवल धैर्य बनाए रखना है
हर चोट को यूं ही हंसकर सहना है।
जिन लोगों ने घायल किया है तुम्हें
उनके लिए ही मरहम बनना है।।

स्वरचित- निलम अग्रवाल, खड़कपुर

23/9 2019/
बिषय,, लौह ,, लोहा

लौह पुरुष होते मेरे देश के जवान
सीमाओं पर खड़े हुए हैं सीना तान
सर्दी गर्मी की नहीं परवाह
दिल में बस भारत माँ की चाह
कठिन से कठिन राहों में हौसला बुलंद हैं
समय ही सब कुछ समय के पाबंद हैं
दुश्मन से लोहा लेने से न घबराते
हँसते हँसते देश के खातिर शहीद हो जाते
वर्तमान में नारी शक्ति का बराबर से योगदान
एक कदम आगे बढ़ करती आह्वान
घर बाहर सर्वत् पाती रही सम्मान
इनके हर रुप में रही अलग पहचान
.हर कर्तव्य वहन कर बनाई हुई शान
सहानुभूति की नहीं तमन्ना
रुकना नहीं बस आगे ही आगे बढ़ना
स्वरिचत,, सुषमा ब्यौहार

23/9/2019
विषय - लोहा/लौह
🌷
🌿🌷🌿🌷
मंजूर था मुझे तेरे प्रेम में
काठ बन जाना
कभी जीवन हुआ करता था
लकड़ी में
जब ये हरा भरा
फल फूल से लदा
एक दरख़्त हुआ करता था
जो बिहँस क्रीड़ा करता था
चहचहाते पक्षियों संग

घर के फर्नीचर के रूप में
किवाड़ों,खिड़कियों के रूप में
मैं जीवित रहना चाहती थी
मैं सालों साल
पीढ़ी दर पीढ़ी संग

मगर तुमने तो
मुझे गलाकर,तपाकर
ठोक पीटकर
लोहे में तब्दील कर दिया
और जड़ दिया
कीलों, कब्ज़ों के रूप में
जिसमें लग जाती है जंग
समय के संग ।।

**वंदना सोलंकी**©स्वरचित®


23/8/2019
विषय-----लोहा


लोहा और स्त्री
मुझे एक जैसे लगते हैं
ढलते हैं नए नए रूप में
अपनी ही रचना से विकसित
और विध्वंस को प्राप्त होते हैं
लेते हैं लोहा और स्त्री
नए नए आयाम
नए सृजन को जन्म देते हैं
स्त्री भी ढलवाँ लोहे के जैसे ही होती है
जिंदगी की धूप के हथौड़े खा खा कर
वो संवर जाती है,निखर जाती है
या फिर उंन्हे लोहे जैसे ही पीट पीटकर
बिना उनकी मर्जी जाने
किसी भी रूप,आकार में ढलने को विवश कर दिया जाता है।
सच में लोहे और स्त्री का शायद ही अपना अलग कोई वजूद होता है
लोहे को पीट पीट कर ही
हथौड़ा बनता है
और फिर वही हथौड़ा
लोहे को पीटता है
उसी तरह एक स्त्री जन्म देती है
पुरुष को
और फिर वो ही पुरुष
उस स्त्री ,उस जननी को छलता है
कितना विचित्र सा लगता है ना ये सब
पर फिर भी संसार ये सब देखते हुए मौन हैArpan@

स्वरचित
अर्पणा अग्रवाल

विषय:--लोहा
विधा:--मुक्त

दिनांक:--23 / 09 /19
~~~~~~~~~~~~~~
तन लोहा,मन मोम है
वो मेरे दिल का सुरुर है
हमदम मेरा हमनवा है वो
मेरे मन का करार है वो

बिन बोले मुझको वो जाने
बिन चिह्ने मुझको पहचाने
मेरे सर का सरताज है वो
जिसका लौह तन , मन मोम का है

आँसू गर मेरे आयें,पलके उसकी भीगीं हैं
गम का साया अपने सर ले
खुशी की चादर देता है

कांटो पर चलकर वो
फूल मेरे लिए ले आता है
मन का भोलाभाला है वो
तन का थोडा़ सा है कठोर

तन लोहे का ,मन का मोम है वो।

डा.नीलम

तिथि 23/9 /2019 /सोमवार
बिषय =#लोहा/लोह#
विधा ==गीत
मात्रा भार (16)

हम कटु लोह पारस श्री राम ।
करते भजन निशदिन श्री राम ।
इस जीवन को सफल बनालें ,
अगर चलें राह पर श्री राम ।
आओ इन्हें हम करें प्रणाम ।
बोले सभी जन सीताराम - - - - - - - - -

ऐसा कहते नहीं अघाते ।
कहते लोहा लोहा काटे ।
लोहा गर्म किया कृष्णा फिर ,
शिशुपाल के तभी सिर काटे ।
भजलें हम सभी राधेश्याम ।
बोलें सभी जन सीताराम - - - - - - - - - - -

पारस गर लोहे को छूले,
लोहा तक कंचन बन जाता ।
फिर तो हम मानव हैं भाई,
क्यों कभी सोना न बन पाता ।
हम तभी होते हैं बदनाम ।
बोलें सभी जन सीताराम । - - - - - - - - - -

जो बोऐंगे वह काटेंगे ।
बोऐं. नफरत क्या पाऐंगे ।
खान लौह की स्वर्ण ढूंढते ,
क्या इसमें सोना छांटेंगे ।
करलें परोपकार शुभकाम ।
बोलें सभी जन सीताराम ।

स्वरचित = =
इंजी शम्भू सिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म प्रदेश
9425762471
जय जय श्री राम राम जी

1भा सा #लोहा#गीत*
मात्रा भार (16)
21/9 /2019 /सोमवार

दिनांक-२३/९/२०१९
शीर्षक-"लोहा"

हवा न सताये मुझे
बारिश ना गलाये मुझे
लोहा है हम कमजोर नहीं
जो टूटकर बिखर जाये कही,

निकल कर सीधे खद्दानो से
बिछूड़ कर परिजनो से
दुःख में भी हम हँसते है
दुनिया के संग जीते हैं।

दुनिया वालों ने जो देखे सपने
उनको हम पूरा करने निकले
बनकर कीमती समान
सजा दिये उनके सपने हजार।

जो घबराये नहीं बाधाओं से
उन्हें हम अपना देते नाम
दुनिया में वे पाते सम्मान
"लौह पुरुष"जब वे कहलाते,

उनके साथ हम भी सम्मान पाते
सम्मान नही आसानी से मिलता
हमें परिश्रम करना पड़ता
हमें परिश्रम करना पड़ता ।
स्वरचित आरती श्रीवास्तव।
23/09/2019
"लोहा"

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लोहे का तन
पाषाण सा मन
होता नीरस जीवन।

लोहे का तन
झुकना न जानता
अहं को मानता
पल-क्षीण भंगुरता।

लोहे का तन
कठोरता से नाता
जल से वैमनस्यता
अग्नि में पिघलता।

लोहे का तन
स्वयं ही स्वयं को काटता
मजबूती में महानता
जन-जन यह जानता।

स्वरचित पूर्णिमा साह
पश्चिम बंगाल ।।

Damyanti Damyanti 
विषय_ लोहा)लोह |
हो परिश्रमी तन लोहा वही पारस |
हर किसान व सैनिक लोह संताने माँ की |

नकरे परवाह धूप छाँव की ,
नकरे फरहाह आपदाओ व दुश्मनों की |
सर्दी गर्मी बर्षा ओलो की मार सहते |
तान सीना कहते हम भारतवासी,
किसी हिम्मत ले लोहा हमसे |
पीया दुध शेरनी का ,दांत उनके गिनते |
बनता देश ऐसी ही संतानो से |
होता पल्लवित पुष्पित विकसित |
लोह सभी नर नारी भारत वासी |
नहीं किसी डरते न झुकते भाल हमारे |
युग युगातंर से रीत यही चली आई |
स्वरचित,,,दमयंती मिश्रा

23/9/2019
"लौह/लोहा"
ंदमुक्त
************
कोमल तन था
कोमल मन था
नही सुना कभी किसी ने ये था?
कूट-कूट कर
पीस-पीस कर
नारी तन मन
लोहा हुआ था।
रिमझिम-रिमझिम बौछारों से
तन भी शीतल हुआ था उसका।
कूट-कूट कर
पीस-पीस कर
लौह तन में ढाला उसको था
रिमझिम सी बौछारों से ही
विधुत लगा और ढेर हुआ था।
तन-मन ये
खिलवाड़ नही था
सबक बड़ा तुझे यहीं मिला था
भूल गया क्या वीर गाथाएं
जब,चपला बन विध्वंस हुआ था।
कूट-कूट कर
पीस-पीस कर
नारी मन बेमन कर डाला
रंग नही चढ़ पाया फिर था
कालापन ही उसको भाया।
बेशक राधे याद रही हो
कालरात्रि को भूल न जाना
कूट-कूट कर
पीस-पीस कर
नारी मन को मार ही डाला।।

वीणा शर्मा वशिष्ठ
स्वरचित

23/9/2019::सोमवार
विषय--लौह, लोहा


इंतज़ार

आज फिर वही मौसम
वही बादल, वही स्टेशन
वही लौह-पथ

इंतज़ार है तो सिर्फ
गंतव्य तक पहुँचाने वाली
रेल का
ताकती निर्विकार आँखे
कभी प्रतीक्षारत रेल को
कभी सुदूर उन बादलों को

लगता जैसे उन श्वेत श्याम
बादलों के पीछे से
आवाज़ देते हो तुम
देखो ट्रेन रुक जाने देना
हाँ!!!!!
पर तुमने
क्यूँ नहीं मानी मेरी बात
जानती हूँ तुम्हे
मज़ा आता था मुझे सताने में
और तुम हमेशा की तरह
उस दिन भी
ट्रेन खिसकने के बाद ही
भागे उसके पीछे

पर!!!!
रोज़ की तरह
तुम्हारा परफेक्शन
काम नहीं आया
पायदान पर नहीं टिका
तुम्हारा पैर
देखते देखते सरक गये
ट्रेन के नीचे

ट्रेन रोक निकाले गए
क्षत-विक्षत तुम
अब तुम कहाँ थे
अब था सिर्फ तुम्हारा शरीर
चीखें निकल गईं थी मेरी
पर तुम अब कहाँ
सुनने वाले थे

आज भी रोज जब
स्कूल जाने को यहाँ पहुँचती हूँ
हर पल सरकते नज़र आते हो तुम
हमारी दोस्ती किसी मुकाम तक पहुँचे
पहले ही चले गए तुम
इन दो समानांतर रेल पथ की तरह
कभी न मिलने के लिए

काश!!!
मानी होती मेरी बात
तो आज हम पटरी नहीं
प्लेट फार्म होते
रजनी रामदेव
न्यू दिल्ली
आज का विषय, लोहा, लौह
सोमवार

23, 9,2019,

अगर संकल्प हमारा बन जायेगा, लोहे की तरह ठोस ।
फिर नहीं आयेगा सही काम में, कभी भी कोई अवरोध ।
कदम कदम पर जीवन में , हमारे चलता रहता संघर्ष ।
लोह सा हो जो अपना होंसला, हम नहीं पड़ पायेंगे कमजोर ।
लौह स्वरूप भारत के सैनिक, सभी दुश्मनों को दहलायें ।
शौर्य देख भारतीय वीरों का, तिरंगा अपना लहर लहर लहराये ।
लौह पुरुष जो अपने राष्ट्र के ,सूत्रपात नव युग का वे करते।
जन कल्याण हेतु जीवन को,परोपकार में समर्पित करते ।
बन जायें बुराई के लिए हम लोहा , मार्ग प्रशस्त खुशहाली का हो जाये ।
नहीं रहे कहीं जग में दीनता , मानवता पल्लवित हो जाये ।

स्वरचित , मीना शर्मा , मध्यप्रदेश ,

विषय-- लोहा / लोह
विधा-- दोहा

द्वितीय प्रस्तुति

सोना तो सोना क्यों न , वो खुद पर इतराय ।
पर अहमियत लोहे की , सदा ही हम भुलाय ।।

बेचारा दीवाल में , चिन घरोंदा बनाय ।
हथियार में हँस कर के , हमरे प्राण बचाय ।।

शत्रु से लड़ने में यह , लोहा निज मनवाय ।
किसान के हल में रहे , अन्न हमको उगाय ।।

क्या करले सोना भला , लोहा न साथ निभाय ।
हर शय की कीमत यहाँ , सीख 'शिवम' सिखलाय ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 23/09/2019

विषय - लोहा /लौह
दिनांक 23-9 -2019
लोहा लेकर जिसने, दुश्मन के छक्के छुड़ा दिए।
नारी होकर भी उसने, कदम पीछे ना किए।।

डटी रही वह रण में, मुकाबला बराबर किया।
देख उसकी वीरता, दंग सब रह गए ।।

पुत्र बांधा पीठ पर, मुकाबला सदा किए।
ऐसे लोहा रण लिया, दुश्मन पीठ दिखा दिए।।

धन्य है वह वीरांगना, महल मोह त्याग दिए।
मेवाड़ रक्षार्थ जिसने, दुश्मन से लोहा लिए।।

वीणा वैष्णव
कांकरोली

भावों के मोती
२३/९/२०१९

विषय-लोहा/लौह

अनीतियां
कुरीतियां
ये रूढ़ियां
देती हैं दंश जब
ममतामयी
कोमलांगी
स्नेह निर्झरणी तब
बन ज्वालामुखी
अंतस में जिसके
पिघलता है लावा,
जूझती परिस्थितियों से
बनती जाती लौह सम,
हारती नहीं
भागती नहीं
करती सामना
वक्त के बेरहम हथौड़ो से
उसके अंदर का
पिघलता लोहा
पा लेता है आकार
धैर्य से वह लेती काम
बन जाती है लौह चट्टान
वह जो धुरी है सृष्टि की
संचालिका इस सृष्टि की
जो टूटती नहीं
जो झुकती नहीं
गढ़ती नए आयाम
विश्व-पटल पर।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित मौलिक

23/09/19
विधा हाइकु

विषय लौह/ लोहा

लौह तत्व से
हीमोग्लोबिन मिले
शरीर स्वास्थ्य

लौह वर्तन
जीवन में संचरा
नये विकास

लौह उत्पाद
आधुनिक विकास
उन्नत ज्ञान

लौह विचार
समग्र क्रान्ति धारा
परिवर्तन

लोहा मिलता
बाक्साइट अयस्क
उद्दोग क्रान्ति

लौह महिला
सुकोमल शरीर
दृढ़ विश्वास

लौह पुरूष
सरदार पटेल
हिन्द की शान

मनीष श्री
स्वरचित
लोहा / लोह

होती है चाह
हर किसी की
हो औलाद
उसकी मजबूत
लोह जैसी

बनता है
लोहा तप कर
मजबूत
कभी हथियार
तो कभी
बनाता है
दुश्मन से
निपटाने को
होशियार

रहता है
सोना
छिप कर
तिजोरी में
लेता है
लोहा
खुल कर
दुश्मन से
लोहा

रखो अपने
ईरादे
लोहे से मजबूत
फिर न चुनौती
पहाड़ की
या समुन्दर की

स्वलिखित
लेखक संतोष श्रीवास्तव भोपाल



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