Tuesday, September 10

"तीर्थ"7 सितम्बर 2019

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ब्लॉग संख्या :-498
विषय तीर्थ
विधा काव्य
07 सितम्बर 2019,शनिवार

जगन्नाथ बसे पूरब में
पश्चिम में द्वारिका धाम।
उत्तर में बद्री हैं शौभित
दक्षिण में रामेश्वर धाम।

भारत का कण कण तीर्थ
पावन नदियां भव्य तीर्थ।
घर घर देवालय निवास है
खारा जल भी गङ्गा तीर्थ।

तीर्थ मुक्ति मार्ग समझ कर
श्रवण कुमार हर तीर्थ पहुँचा।
अंध मात पिता को उसने
भाव भक्ति के जल से सींचा।

मात पिता गुरु जन की सेवा
दीन हीन अपाहिज पूजन ।
यह तीरथ से कम नहीं होती
परोपकार निहित है यजन।

स्व0 रचित,मौलिक
गोविंद प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।


 द्वितीय कृति

तीर्थ है भारत की मिट्टी

तीर्थ मात पिता स्वयं है।
तीर्थ चरण गुरु वृद्ध जन
तीर्थ में न कोई शर्म है।

दीन दुःखी सेवाएं करता
सबसे बड़ा है जग तीरथ।
भूले भटके राह दिखाना
सदा रहो जीवन प्रिय रत।

दो आलिंगन निर्धन जन
उँगली थामो दो सहारा।
चारो धाम यही तो तीर्थ
परोपकार गूँजे जयकारा।

बहता रक्त हाथ से पोंछो
साफ़ करो आँखो के आँसू।
उच्च कोटि का पावन तीर्थ
वह जग नर भारत में धांसू।

तीर्थ सब माँ के चारणों में
तीर्थमयी दुनियां की नगरी।
प्रति दिवस जीना तीर्थ है
झलक रही जीवन की गगरी।

स्व0 रचित, मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।
को नमन
दिनांक-07-09-2019
विषय-तीर्थ

🌹गोरी है वृषभानु दुलारी
कारो सो घनश्याम
आंख मिचौली खेलें गोपी
तीर्थ वृंदावन धाम

🌹कौशल्या की कोख
धन्य कियो श्री राम
अंगना खेलत भ्रात संग
तीर्थ अयोध्या धाम

🌹विश्व कल्याण की लिए कामना
तप करते भगवान
हिम पर्वत पर जा विराजे
तीर्थ बद्रीनाथ धाम

🌹लालच,आशक्ति छोड़ दे
निज स्वार्थ छोड़े इंसान
हो शुद्ध जब आचरण
हो जाये तीर्थ हर काम

**स्वरचित **
सीमा आचार्य(म.प्र. )

नमन मंच भांवो के मोती
विषय तीर्थ
विधा काव्य
07 सितम्बर 2019,शनिवार

श्रवण जैसा बेटा बनो, जग में पहचान होना चाहिए
दीन-दुखियों की सेवा, व्यक्तित्व महान होना चाहिए।

माता-पिता का आदर करना, रखना उनका ख्याल
छोटों को प्यार सदैव बड़ों का मान होना चाहिए।

जैसा बोओगे काटोगे वहीं, तू ठान ले अपने मन में
बुजुर्गों का दिल न दुखाना न अपमान होना चाहिए।

माता-पिता ने जीवन दिया,उनका तुम सम्मान करो
पाल-पोसकर बड़ा किया है, गुणगान होना चाहिए।

जीवन में संघर्ष बहुत, तुम तूफानों से कभी न डरना
सुख-दुख में खुश रहना, यही दास्तान होना चाहिए।

काँवड़ में बिठा चल दिये मात-पिता आँखों से लाचार
संकल्प लिया श्रवण ने आज तीर्थ-दान होना चाहिए।

माता-पिता की सेवा का आज मुझे सौभाग्य मिला
नत्-मस्तक हूँ इनके चरणों में सम्मान होना चाहिए।

सुमन अग्रवाल "सागरिका"
आगरा ( स्वरचित )


विषय -- तीर्थ
प्रथम प्रस्तुति

काश कोई पोलिश होता
मानवता की गर्द धोता ।।

तीर्थ को फिर कहाँ जाना
तीर्थ तो वो यहीं सँजोता ।।

इंसानियत का पाठ पढ़ता
अच्छाइयाँ गढ़ता न रोता ।।

ग़ैर का दिल दुखाय लूट
भाय मन लूट में डुबोता ।।

आमद तीर्थ में लगा गला
काटने के पैंतरे पिरोता ।।

कैसी ये मन बुद्धि कितने
संत जगाय अब भी सोता ।।

मेहनत ईमान का पैसा
लख तीर्थ का पुण्य बिंधोता ।।

लोक परलोक बनता 'शिवम'
जो जीवन परहित में खोता ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 07/09/2019



शुभ संध्या
नमन भावों के मोती
विषय-- तीर्थ
द्वितीय प्रस्तुति

तीरथ कहाँ तकदीर में
फिर भी करूँ हरदम यतन ।।

थोड़ा तप गर दे उजास
तपूँ जपूँ लगाऊँ लगन ।।

मन पावन सो तन पावन
पूजूँ उसे मन ही मन ।।

विरह वेदना सी मन में
होय ईश्वर से कब मिलन ।।

जगमग सी ज्योत जगायी
जिसने उस गुरू को नमन ।।

माँ बाप कब किसके सदा
आप से मिलकर मन चमन ।।

तीर्थ सा सुख हर पल होय
करूँ 'शिवम' हर पल सुमिरन ।।

सबको सब न कहीं नसीब
रहूँ खुद में मैं खुश मगन ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 07/09/2019
बिषय ,,तीर्थ,,,
चाहे गंगा काशी हरिद्वार में कर लें स्नान
चाहे साक्षात सामने खड़े हों भगवान
क्यों न सारे तीर्थ कर लें
चाहे कर लें चारों धाम
लेकिन उद्धार तभी होगा
जब मात पिता को करें प्रणाम
सारे तीर्थ माँ बाप के चरणों की सेवा में हैं
जैसे कि मधुरता दूध मलाई मेवा में है
जहाँ बुजुर्गों की सुश्रुषा वहाँ
देवों का वास है
इनकी प्रसन्नता से घर में रहता मधुमास है
ऐ साथ न कुछ भी ले जाते
सोच से ज्यादा हमको दे जाते
ए धरोहर हैं अत्यंत अनमोल
नहीं सकते हम पुण्यों की तराजू में तौल
ईश्वरतुल्य मात पिता को
श्रवण कुमार बन सहेज लें
कुछ सुखद अनुभव क्षणों को आंचल में समेट लें
स्वरिचत ,,सुषमा ब्यौहार
Damyanti Damyanti 
विषय,,तीर्थ |
मात पिता सा नही कोई पावन तीर्थ |
बडे खर्च से घूमे सब तीर्थ ,
पर मन मस्तिष्क न मिला सकुन |
बूढे़ माता पिता को छोड वृद्धा श्रम
कैसे मिले सकुन दुआ होती उनकी तोमिलता सकुन |
नछोडा राम ने न कृष्ण ने मानव बना चतुर |
था एक श्रवण कुमार इस युग मे भी |
ले कावड बिठा कराये तीर्थ सकल |
देती गद गद आनंदित आत्मा आषीश |
फलोफूलो वत्स भरे भंडार कोई कष्ट न आवे जीवन मे यही हार्दिक वरदान |
स्वरचित,,दमयंती मिश्रा
विषय-तीर्थ
तिथि-07सितम्बर2019
वार-शनिवार
विधा-कविता

कहीं देखा है?कहीं सुना है?
त्रेता युग जैसा कोई लाल,
जिसकी देता है हर कोई
कलयुग में भी आज मिसाल।
वो अद्वितीय , अकथनीय,
आज्ञापालक , अकल्पनीय।

उस जैसा अद्भुत सेवा भाव,
होता है बस विरले के पास,
जो न देखे कभी अपनी भूख,
न ही देखे वो अपनी प्यास।

चक्षुहीन मात-पिता को वो
फिर दोनों पलड़ों में बैठाकर,
अंतिम इच्छा को मन में धर,
ले चला वो तीर्थ यात्रा पर।

करता था उनको वो प्यार,
आँखों का तारा बेशुमार,
गया सरयू से लेने को नीर,
दशरथ ने चलाया फिर तीर।

चिर निद्रा में सो गया कुमार,
हृदयवेदन थीउसकी चीत्कार,
सुनकर पहुँचे वो बूढ़े अभागे,
श्राप देकर अपने प्राण त्यागे।

वो मानता था उनको बस
अपने भगवन के समान,
ऐसे वचन के पक्को में ही
होता है ऐसा भक्ति ज्ञान।

कहे प्रकृति का कण- कण,
देखकर उसका ये समर्पण,
ख़ुद को भी कर दिया अर्पण,
वो था हमारा प्यारा श्रवण।

पूर्णतया स्वरचित,स्वप्रमाणित
सर्वाधिकार सुरक्षित

अंशुल पाल 'रण'
जीरकपुर,मोहाली(पंजाब)
भावों के मोती
7/9/2019
विषय-तीर्थ
**************
माता पिता की दुआओं में मुझे
स्वर्ग से भी सुंदर सुख नज़र आते हैं
काशी,मथुरा,गंगा सब तीर्थ
सब उनके सानिध्य में मिल जाते हैं

प्रथम पूज्य स्वयं गणपति जी भी
जग को यही बात सिखाते हैं
वेद पुराण धार्मिक ग्रंथ
सब यही मर्म समझाते हैं

श्रवण कुमार सरीखे मातृ पित्र भक्त
कांवर पर लेकर निज मात पिता को
तीर्थ धाम की यात्रा कराने जाते हैं
प्यासे मात पिता की प्यास बुझाने में
निज प्राणों की बलि दे जाते हैं

मत भटको पत्थर,मूरत,तीर्थ धामो में
सब तीर्थ यहीं हैं माता पिता के चरणों में

सब बातों उद्धरणों का यही मर्म है
मात पिता की सेवा सर्वश्रेष्ठ धर्म है
स्वयं के अंदर सब तीर्थ धाम बसे हैं
हम नाहक ही सारा जीवन
अपना ध्यान बाहर बाहर ही भटकाते हैं।।

**वंदना सोलंकी**©स्वरचित

भावों के मोती दिनांक 7/9/19
तीर्थ

है बड़ा तीर्थ सबसे
सेवा माता पिता की
जन्मदाता है माँ
भाग्य-विधाता है पिता

करें जितनी भी
सेवा उनकी बाकी
सब है त्रर्ण समान

ऐसे बच्चे है कलंक
जो छोड़ उन्हें है जाते
वृध्दावस्था में दर दर भटके
माता पिता हुए बेहाल

करते बच्चे करम धर्म
जाते तीर्थंकर अनेक
परवाह नहीं माता पिता की
मिलता नहीं आशीर्वाद

रखों प्यार से
करो दो बात प्यार से
कर लो सेवा उनकी
है यही सबसे बड़ा तीर्थ
दोस्त मिलें, रिश्तेदार मिलें
पर मिलते नहीं
माता पिता बार बार

स्वलिखित
लेखक संतोष श्रीवास्तव भोपाल

शीर्षक --तीर्थ
दिनांक--7-9-19
विधा --दोहा मुक्तक
1.
माँ के चरणों से बड़ा, तीर्थ न हमको ज्ञात।
संतति निज या और की सबके लिए प्रभात।
सेवा से इस तीर्थ की,सभी हस्तगत होय--
माँ का गर आशीष हो,सभी कष्ट हों मात।
2.
उत्तर बद्रीनाथ हैं,केदारनाथ साथ ।
वैष्णोदेवी तीर्थ को,सदा झुकाएँ माथ।
रामेश्वर जगनाथ जी,तथा द्वारका धाम--
यात्रा इन सब तीर्थ की,बनती धार्मिक गाथ।

******स्वरचित*******
प्रबोध मिश्र ' हितैषी '
बड़वानी(म.प्र.)451551
नमन मंच
दिनांक ७/९/२०१९
शीर्षक-तीर्थ
दायित्वों का जब बोझ भारी
तीर्थ-दर्शन भाये ना आली
माता पिता की सेवा न्यारी
इससे बड़ा ना तीर्थ सारी।

गंगा को स्वच्छ बनाने में
करूँ जब अपना योगदान
सर्वव्यापी है ईश हमारे
पूरे मन की आस।

तीर्थ की है महता भारी
जाने सकल जहान
मानव मात्र की सेवा कर लें
ये भी तीर्थ समान।

मथुरा घूमे,काशी घूमे
किये न कोई सत्काम
पशु पक्षियों पर दया नही
सब तीर्थ बेकार।

करुणा , दया से भरा हो मन
न हो कोई विकार
घर बैठे भगवान मिले।
तीर्थ घूमे न मिले राम।
स्वरचित आरती श्रीवास्तव।

भावों के मोती
शीर्षक- तीर्थ
पुत्र हो तो श्रवण कुमार सा
जो मात पिता को ले कांवड़ पर
निकल पड़ा था तीर्थ कराने।
दशरथ के शब्द भेदी बाण का
अनजाने में हुआ शिकार
पड़े थे उसे प्राण गँवाने।
प्यास बुझाने मात पिता की
गया था वो,सरोवर पर पानी लाने।
अंत समय तक सुध रही केवल यहीं
प्यासे हैं मेरे मात पिता,
हे राजन्! पीला देना पानी उन्हें
दशरथ से कहकर यही
चला गया हँसते हुए उस दुनिया में।

स्वरचित- निलम अग्रवाल, खड़कपुर
नमन भावों के मोती
आज का विषय, तीर्थ
दिन, शनिवार
दिनांक, 7,9,2019,

बात तीर्थ की जब - जब आती है ,
नाम सदैव धर्म स्थलों का ही आता है ।
इंसा सद्कर्मों की बातों को भूलकर ,
हमेशा अभिलाषा मुक्ति की करता है ।
माता - पिता की सेवा को तजकर के ,
हमारा तीर्थ को जाना ठीक नहीं है ।
अपने लोगों के दिल को दुखाकर के,
कभी भी तीर्थ का मिलता पुण्य नहीं है ।
परिभाषा पुण्य की परिभाषित करने में,
दुखियों की सेवा का होता सहयोग बड़ा है ।
सच्चा तीर्थ व्यवहार और दृष्टि कोण के,
सुखद फलीभूत होने पर निर्भर करता है ।
प्यार मुहब्बत मेल जोल एकता से ही ,
हमेशा ही ऊपर वाला खुश रहता है ।
कभी तीर्थ स्थल पर जाने न जाने से ,
मानव का व्यक्तित्व नहीं बदल पाता है ।
हमारे नेक कर्म ही तीर्थ कहलाते ,
इनसे ही तो मुक्ति हम सब पाते हैं ।
ईश्वर तो सदा हमारे मन में ही बसते ,
हम निर्मल मन रख उनसे मिल सकते हैं ।
हम घृणा , द्वेष, कटुता को तजकर के ,
तीर्थ हर घर को बना सकते हैं ।

स्वरचित , मीना शर्मा , मध्यप्रदेश
पता ठिकाना आम न करना।
ऐसा कोई काम न करना।

घर की इज्जत घर में रखना।
चौराहे पर नीलाम न करना।

मंजिल गर पानी है तुझको।
रस्ते में आराम न करना।

दिल के बदले दिल देना।
इससे कम दाम न करना।

उनके लब तक ना पहुंचे जो।
पेश कभी वो जाम न करना।

दिल की बातें दिल में रखना।
इनका चर्चा आम न करना।

मिलने का वादा था सुबह।
देखो तुम अब शाम न करना।

अभी है बाकी खूब जिन्दगी।
बातें अभी तमाम न करना।

दौलत और मुहब्बत दोनों।
कभी मंजरे आम न करना।

उलझ न जाएं हम दोनों ही।
इतने सारे झाम न करना।

उठ जाग सफर कर बाकी।
हसरत कोई नाकाम न करना।

इक दिन जान खुदा को देनी।
तू उल्टे सीधे काम न करना।

सेवा मातु - पिता की करना।
चाहे तू तीर्थ धाम न करना।

स्वरचित विपिन सोहल

नमन "भावो के मोती"
07/09/2019
"तीर्थ"
मात-पिता की सेवा करके
ये जन्म सार्थक हो जाए।

उनके चरणों का वंदन कर,
तीर्थों का पूण्य मिल जाए।

मिलता रहे आशीष उनका,
ये जीवन धन्य हो जाए ।

श्रवन सा न भी बन पाँऊँ तो
वैसा ही मनोभाव हो जाए।

तीर्थाटन के सारे पूण्य ,,,,
सच्ची निष्ठा से मिल जाए।

गुरु का मार्गदर्शन जो मिले
कर्म सारे सफल हो जाए।

निर्मल मन की निश्छल सेवा से
तेतीस करोड़ देवी-देवता के दर्शन हो जाए।।

स्वरचित पूर्णिमा साह
पश्चिम बंगाल।।

वार शनिवार

शीर्षकः- तीर्थ

करी है माता पिता की सेवा जीवन गया नहीं व्यर्थ।
मिल गया पुण्य करने का आपको सबसे बड़ा तीर्थ।।

करा नहीं यदि आपने कभी किसी नारी का अपमान।
ऐसा करना भी समझो है तीर्थ करने के ही समान।।

किसी दुखी के दुख को भी दिया आपने जड़ से मिटा।
मिलेगा आपको भी बहुत बड़ा तीर्थ करने का ही सिला।

बिलखते हुये बच्चे के अधरों पर ला दी यदि मुस्कान।
तब यह होगी समस्त तीर्थो की यात्रा करने के समान।।

डा0 सुरेन्द्र सिंह यादव“
“व्यथित हृदय मुरादाबादी”
स्वरचित

विधा-हाईकु
विषय- तीर्थ

माँ के चरण
सेवा की हो लगन
तीर्थ समान

करते पाप
इंसानियत खत्म
तीर्थ को भागे

बुजुर्ग मान
मिलता आशिर्वाद
घर में तीर्थ
***
स्वरचित-रेखा रविदत्त
7/9/19
शनिवार

 भावों के मोती
7/9/19
शुभ सांध्य

विषत - तीर्थ
कविता
------------
ममता की अमृत धारा
संवार गयी जो जीवन प्यारा
पिता से सिद्ध मनोरथ सारा
चरणों में इनके तीरथ हमारा ।।

विश्वास रिश्तों में हो,
हो स्नेह, त्याग-अनुराग
खुशहाली आये सारे,
घर हो जाए तीर्थ प्रयाग।।
••••••••••••••••○○○•••••••••••••
क्षीरोद्र कुमार पुरोहित
(स्वरचित)
#विषय: तीर्थ :
#विधा:काव्य:

+*+ कलयुगी तीर्थ +*+

पहले तीर्थ हुआ करते थे धर्म स्थल
अब तीर्थ बन गए हैं वृद्धाश्रम,
शनै शनै ही बदल रहे हैं
पारिवारिक सँस्कार हीन घटनाक्रम,

बुजुर्गों पर हो रहा अत्याचार,
पूर्वजों के प्रति ना रहे सम्मान के भाव,
श्रवण अब कोई जन्मता ही नहीं,
आज्ञांकारिता के लक्षणों हुआ अभाव,

खुदगर्जी अब फैशन बन गई है,
परोपकार शब्द पर लग गई है जंग,
पुत्र दुःशासन दुर्योद्धन के लक्षणों से
पिता माता भी हो चुके है तंग,

ना श्रवण सी अब आज्ञाकारी संतान,
ना धर्मराज उदय की कोई उम्मीद है,
स्वार्थ जनित बनने लगे हैं रिश्ते,
केवल धन सम्पदा की संतान मुरीद हैं,

"*" रचनाकार!!! दुर्गा सिलगीवाला सोनी
भुआ बिछिया मण्डला मप्र
Neelam Sharma द्वि
द्वितीय प्रयास

दोहे
🍁🌷🍁🌷🍁🌷🍁🌷🍁
क्या तुझको अर्पण करू, हे गौरा के लाल ।
पूजे जग सारा तुझे , तेरा रूप विशाल ।।

तुझे मिला जो रूप है ,गौरा किया कमाल ।
निरख रूप खुद का तभी, ढाल दिया इक लाल ।।

तीरथ सभी मिले तुम्हें, मात पिता सम्भाल।
बाहर क्यों भटकें सभी, घर में रखें खयाल।।

ज्ञान दिया ये ही बहुत, दे सभ्यता को मान ।
श्रवण कुमार बने सभी,हो संतति को ज्ञान ।।

स्वरचित
नीलम शर्मा


भावों के मोती 7/9/2019
विषय :-तीर्थ ।विधा:/ पद्य
मात पिता के रहते
सारे तीरथ उनके
चरणों में होते ।
इधर उधर क्यों
भटके मनवा
उनकी सेवा कर
पुण्य कमा ले ।
बारम्बार नहीं आयेंगे
तीरथ सारे घर मे
पावन तन मन
अपना.करके
उनकी हर इच्छाओं
को पूरण करके
पुण्य कमा ले ।
स्वरचित :-उषासक्सेना

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