Tuesday, September 10

"शिकार /शिकारी""9सितम्बर 2019

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ब्लॉग संख्या :-500


विषय - शिकार /शिकारी
दिनांक 9 -9- 2019
जीवन दिया प्रभु ने, अच्छा काम कर।
मदद कर सबकी, जीवन साकार कर ।।

शिकारी बन,ना किसी का शिकार कर।
प्रभु जीवन को, यूं ना तू बेकार कर।।

निहत्थे पर तू ,कभी भी ना वार कर ।
गरीब पर सदा ही, तू दया कर। ।

शिकार का शौक, तो हैवान का कर।
जो देता है दुःख , उसका संहार कर।।

अनमोल जीवन को, तू यादगार कर ।
मनुष्य है ,जानवर सा व्यवहार ना कर ।।

ताकत दी, कमजोर का शिकार न कर ।
दिमाग उपयोग, विकास कार्य में कर।।

वीणा वैष्णव
कांकरोली


विषय -शिकार /शिकारी
दिनांक 9-9- 2019
🌹 द्वितीय रचना🌹

तेरे नैयनों से ,घायल हुआ मैं।
बिन शिकार ही ,कैद हुआ मैं।।

चाहता नहीं, गिरफ्त बाहर आना।
तेरी कैद में, रहना चाहता हूँ मैं ।।

शिकारी बन,रोज शिकार कर तू।
आसान ही,तेरी जाल फसूंगा मैं।।

या खुदा,उम्र भर कैद मंजूर ।
बस तेरे दिल, ता उम्रकैद रहूंँ मैं।।

तेरी मोहब्बत में,कुछ यूं खोया में।
शिकारी बन ,शिकार हुआ मैं।।

वीणा वैष्णव
कांकरोली


दिनांक -9 -9-2019🌹 तृतीय रचना 🌹

हम अपना हुनर, आज दिखाएंगे।
शिकारी हैं,पर शिकार हो जाएंगे।

उनकी अदा में,हम यूं खो जाएंगे। आज नहीं हम,होश में रह पाएंगे।

जमाने के डर से,सामने नहीं आएंगे।
पर हर रिश्ते को, बखूबी निभाएंगे।

कोई लगा ना दे, तोहमत उस पर। हम उससे रिश्ता,कुछ यू निभायेंगे

दूर से देख उसे, खुश हो जाएंगे। प्यार करते हैं,बेवफा न कहलाएंगे।

वीणा वैष्णव
कांकरोली

९/९/१९@६:४९
शिकार वह नहीं जीवों को मारा जाऐ।
नित कुठार से वृक्षों का उत्पाटन करे।
शिकार वही कुशल शिकारी वही हैं।
जो लक्ष्य वेधे और सभी निर्भय होवे।
न मांसाहार की तनिक मंशा होवे।
न तनिक मछली फसाने की मनोदशा।
वही कुशल सफल शिकारी है।
जो अहिंसक हो जीवों पर दया भाव।
वृक्ष संवर्धन करें प्रकृति संवारे।
🚩🌳🚩🌳🚩🌳🚩🌳🚩
स्वरचित:-
राजेन्द्र कुमार अमरा


शीर्षक-- शिकार / शिकारी
विधा--ग़ज़ल
प्रथम प्रयास


निकले थे शिकार करने
हमारा ही शिकार हो गया ।।

वो हमसे बड़े शिकारी थे
नादां दिल गिरफ़्तार हो गया ।।

शिकारी भी ऐसा छोड़कर
हमें वो फ़रार हो गया ।।

बेचारा उसके चंगुल में
फँसा अब लचार हो गया ।।

सोचूँ कभी आए छुड़ाने
कितना मुझे इंतज़ार हो गया ।।

उसको अब तक न खबर
दिल को उससे प्यार हो गया ।।

अब दे वो दवा या फिर जहर
सब कुछ अब स्वीकार हो गया ।।

तड़फता छोड़ना यूँ इश्क-म
जुल्मो अत्याचार हो गया ।।

पता न क्या हुआ मुझसे 'शिवम'
जो उन्हे नागवार हो गया ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 09/09/2019


शीर्षक-- शिकार/शिकारी
द्वितीय प्रस्तुति


शिकारियों की न कमी यहाँ
और बजार हैं शिकार के ।।

कौन जबावदेह है आज
बढ़ते हुए अत्याचार के ।।

सरकार क्या करे पहाड़े -
पढ़े हमने भ्रष्टाचार के ।।

हर महकमे में सगे बैठे
किसी दलाल ठेकेदार के ।।

कठिन बिमारी दूर करना
पढ़ाओ पाठ सदाचार के ।।

शिकार तो खुद-व-खुद फँस जाय
कमाल है उस व्यवहार के ।।

लूटते ही बदलें व्यवहार
उस सगे उस वफादार के ।।

दोष किसको देंय 'शिवम' हम
खुद जिम्मेदार अनाचार के ।।

घूँस से नही सँकोच कपड़े-
तंग बुलावा दुराचार के ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 09/09/2019

नमन मंच भावों के मोती
9//9 // 2019//
बिषय ,,शिकार /शिकारी

तन मानव मन शिकारी
ऊपर से राम बगल में छुरी
देखने मिलते अनेकों ब्यभिचारी
बगला भगत ढूंढते रहते शिकार
कैंसर की तरह फैला अनाचार
कोई वस्तु नहीं शुद्ध मिलावट. का जमाना
व्यापारी भी अपना भरते खजाना
लूट खसोट चारों तरफ भारी
बेईमानी ऐसी जैसे हो महामारी
नेताओं से बढ़कर और कोई न शिकारी
सरेआम रिश्वत लेते अधिकारी
.दस ठगों के बीच में दो ही हों
वफादार
उसे बेबकूफ कह करते पागल करार
फिर भी देश की आन बान शान
इसलिए तो है मेरा भारत देश महान
स्वरिचत ,, सुषमा ब्यौहार


आज का विषय शिकार,
काले भौंरा,
शहर की गलियों,

और गांव के,
गलियारों में घूम रहे,
फूलों की खोज में,
हर पल रहते हैं।
समय देख,
शिकार करते हैं,
फूलों के आबरु लूट कर,
मौत के घाट,
उतार,
अपराधी जीवन जीने को
मजबूर हैं।
अपने कामुक विचार के कारण,
ग़लत राहों पर चल पड़ते हैं,
अंधेरों में जीते हैं।
मानव को उसके विचारही,
देव और दैत्य बना सकता है।
मानव योनि में जन्म लेकर,
मानव देव और दैत्य
बन सकते,
केवल विचारों को,
अपनाकर।
स्वरचित देवेन्द्र नारायण दास बसनाछ,गया,।

शिकारी बन कर हम निकले, खुद ही शिकार हो गए।
शिकार शिकारी के चक्कर में , जाने कैसे उलझ गए।।

जाने कैसे उलझ गए, उलझन हुई बड़ी भारी ।
जितना खुद को सुलझाते, उतना उलझते ओर गए ।।

उतना उलझते ओर गए , मति गई थी हमारी मारी।
उस पल को कोस रहे थे, जब बनने चले थे शिकारी।।

बनने चले थे शिकारी, अब आयी थी हमारी बारी ।
"आगे कुआं पीछे खाई" ,कहावत समझ थी आयी।।

अब समझ थी आई ,मन में सोच लिया था भाई ।
निर्दोष का नहीं करें शिकार कभी, बात मन मे आई।।

बात मन में थी आई, प्रेम, स्नेह सब पर लुटाएं।
मिलजुल कर सब के संग, 'चौधरी'आगे बढ़ते जाएं।।

चावली चौधरी🙏( राजसमंद)
नमन,भावों के मोती🌹🌹🌷🌷
विषय:-शिकार

वि
धा :-दोहा' रोला छंद

करता है प्रेम अपार, जो जगत से भारी ।
दुष्टों का करे शिकार, सभी विपदा टारी ।

माँग करे मनमान, प्रीत अँखियों में भरता ।
नयनों से मारे तीर, हृदय घायल वो करता ।।

हृदय हुआ शिकारी, उसी कान्हा पर मरता ।
जग का तारणहार, तू पागल मुझे करता ।।

स्वरचित
नीलम शर्मा#नीलू
नमन भावों के मोती
9/9/2019
विषय-शिकार/शिकारी

विधा-क्षणिका
🐦🐤🏹🏹🏹
वो नन्ही सी चिड़िया
परदे में छुपी रही
घर में
मालिकों की पनाह में
खुद को सुरक्षित समझती रही
बाहर उसकी आबरू
बेपरदा हुई
किसी पिताऔर भाई
रिश्तेदार रूपी
शिकारी के हाथ ,,,
शिकारी छुपे हुए हैं
रिश्तों के भेष में
कब शिकार हो जाएं
वो नन्ही चिड़िया
कैसे समझ पाए !!

**वंदना सोलंकी**©स्वरचित

यूं आब से तिश्नगी पुकारी है।
फिर वही जिन्दगी हमारी है।


किस कदर हम यूं हैरान हैं ।
जाने क्या मरजी तुम्हारी है।

किस चीज़ का गुमां हम करें ।
सांस पल - पल की उधारी हैं।

कितनी भोली हैं सूरत तेरी।
लगे हैं आसमां से उतारी है।

संवर गई अपनी तकदीर भी।
जो मैंने जुल्फ तेरी संवारी है।

होश मुझको न आया कभी।
न ही उनकी उतरी खुमारी है।

जो कट गयी थी वही जिन्दगी।
क्यूँ आज पल पल की भारी है।

यूँ सामां है जिन्दगी के सभी।
हां बस इक कमी तुम्हारी है।

इश्क है जंग दुनिया में आखिर।
उस पर शमशीर ये दुधारी हैं।

है जिन्दगी मौत का सिलसिला।
कब कौन किसका शिकारी है।

स्वरचित विपिन सोहल


 नमन मंच भांवो के मोती
विषय शिकारी ,शिकार
विधा काव्य

09 सितम्बर,2019 सोमवार

यम बहेलिया घूम रहा है
मृत्यु जाल लिये हाथों में।
व्यर्थ यूंही सपने बुनते हैं
अमावस काली रातों में।

कौन शिकारी नहीं धरा पर
जो उल्लू सीधा न करता
मायावी इस मृत्यु लोक में
जैसा करता वैसा भरता।

सब शिकार हैं एक दूजे के
उच्च जीव के लघुतम जीव।
हर नर स्वार्थमयी हो डोले
सृष्टि बनी स्वार्थ की नींव।

मेरा तेरा कुछ नहीं होता
हम शिकार सब मृत्यु के।
शीतल गर्म चलते झौंखे
चक्र परिवर्तन होते ऋतु के।

स्व0 रचित,मौलिक
गोविंद प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

नमन समस्त मंच🙏 09/09/2019
विषय-शिकार/शिकारी

हे प्रभु! शिकारी बन,
नेह-बंधन
शिकार करने को गए,
खुद शिकार हो गये

हे प्रभु! डोरी नेह की
शिकार करनी ना पड़े
आप स्वयं ही शिकारी बन
मुझ तुच्छ को शरण दे दो 🙏

छल- कपट मन में नहीं
शुद्ध-सरल मन मेरा
ऊँचाई छूने की चाह में भी
कदम इस जमीं पर है

हे ईश! ना मांगू कुछ तुझसे
बस नेह-बंधन स्वीकार कर
मन की चाहतों का
शिकार कर ले🙏
स्वरचित -आशा पालीवाल पुरोहित,कांकरोली (राजसमंद)

शिकार/शिकारी
नमन भावों के मोती। नमस्कार गुरुजनों, मित्रों।

करते हैं शिकार वो नन्हीं बच्चियों का।
शर्मआनी चाहिए उन्हें।

शिकारी की तरह झपट्टा मारकर।
नोचते, खसोंटते हैं उन्हें।

फांसी पर लटका दो।
तब कुछ होगा सुधार।

वरना लुटती रहेगी उनकी अस्मत।
शिकारी में होता नहीं है कोई संस्कार।

वे बुद्धि से हीन हैं होते।
मानसिक बीमार होते हैं वे।

वे बचे रहेंगे तो बचेगी नहीं बच्चियां।
कुलकलंक होते हैं वे।

वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी
स्वरचित

बिषय- शिकार
हर बलवान कमजोर का करता शिकार है।
कुछ न कर पाता वो तन मन से जो लाचार है।।
लूट रहा आज भाई भाई को, दोस्त दोस्त को।
दौलत पर ही चल रहा रिश्तों का कारोबार है।
कोई किसी का सगा नहीं है इस दुनिया में,
स्वार्थ से लिपटा हुआ यहां हर किरदार है।
लोभ, क्रोध, घृणा, अहंकार से भरा हर दिल है,
हर इंसान आज मानसिक रूप से बीमार है।
ख्वाहिशों की कोई हद ही नहीं क्या करे कोई,
साजो-सामान से भरा हर किसी का घर-द्वार है।
आदर्श और इंसानियत की नहीं रही कोई कीमत
छीना-झपटी में सबका ही दामन हुआ तार-तार है।

स्वरचित- निलम अग्रवाल,खड़कपुर

शिकार / शिकारी
हास्य कविता

बड़े जब कदम
जवानी की तरफ
हुंकार यूं
उठने लगी
मिल जाए
कोई हसीना
कट जाए
जिन्दगी आराम से

निकल पड़े
शिकार करने हम
फेंके जाल बहुत
फ॔स गयी
मछली एक
थी भोली भाली
नाजों में पली
पसंद आ गयी
पहली ही
निगाह में वो
रचाया ब्याह
धूमधाम से
समाये नहीं
खुशी से हम

अब का कहूँ
दास्ताँ अपनी
बरतन
हम मांझते हैं
कपड़े
हम धोते है
झाडू पौंछा
हम करते हैं
हुकुमत
चलती है
उसकी
बन गये
हम तो
गुलाम

सोचते हैं अब
क्यो निकले थे
शिकार को ?
अपने ही घर में
हो गये
शिकारी हम
थी अच्छी खासी
जिन्दगी
फ॔से गये
जाल में

स्वलिखित
लेखक संतोष श्रीवास्तव भोपाल


नमन भावों के मोती
तिथि-09सितम्बर2019
वार-सोमवार
विषय-शिकार/शिकारी

2122 1122 1122 22(112)

ज़िन्दगी मौत में भी जंग ये जारी क्यूँ है।
मेरे अपनों की रकीबों से ही यारी क्यूँ है।

तुम तो कहते रहे के साथ रहेंगे मेरे,
उम्र तन्हा ही यहाँ तुमने गुजारी क्यूँ है।

तुमने इक बार छुआ था मुझे जो नज़रों से,
मुद्दतों बाद भी छाई ये ख़ुमारी क्यूँ है।

कैसे महफूज़ रहें परियाँ तेरी दुनिया में,
ज़र्रे - ज़र्रे पे यहाँ बैठा #शिकारी क्यूँ है।

दिल के सौदे में तो हम दोनों ही शामिल थे मगर,
फिर ये गलती ऐ हसीं सिर्फ हमारी क्यूँ है।

कर दिया ख़ुद को भी क़ुर्बान तेरी उलफ़त में,
बाजी फिर दिल की यहाँ मैंने ही हारी क्यूँ है।

बेख़ुदी कह दे इसे या तू कोई 'रण' का वहम,
आइने में भी ये तस्वीर तुम्हारी क्यूँ है।

अंशुल पाल 'रण'
जीरकपुर,मोहाली(पंजाब)

नमन भावों के मोती 🙏😊
विषय -शिकारी /शिकार‌

विधा गज़ल‌

🙂
ये हुस्न अपना सँभाल रखना ।
इसे जहाँ में मिसाल रखना ।

ढलक न जाएँ ये अश्क मोती ,
दबा के अपना रूमाल रखना ।।

टहल रहे हैं यहाँ शिकारी ,
नहीं कबूतर तुम पाल रखना ।।

बस इतनी है इल्तिज़ा हमारी ,
न मन में कोई मलाल रखना ।।

पुनीत सबके लिए खड़ी है,
ज़रा सा खुद भी खयाल रखना ।।

पुनीता भारद्वाज

बिषय:- शिकार
विधा:- मुक्त

ओ शेर-
तुम तैयार थे टूट पड़ने को
उन पर
शिकार करने को
जो
मख़ौल उड़ाते थे तुम्हारा।
आक्रोश भड़क उड़ता था
जो हर हमेशा
उड़ाते थे मख़ौल तुम्हारा।
किन्तु वह-
दहकता,बिखरता,दहाड़ता
आक्रोश आज शांत कैसे?
शायद-
तुम्हारा गला बैठ गया
नित्य की चिल्ल-पौं से।
आँखें सूज उठीं
समय के संक्रमण से।
तभी तो-
छाती के सामने
फिर से वही,तुम्हारा
मख़ौल उड़ा रहे हैं
" ओ परम्परावादी " बूढ़े शेर
और तुम चुप हो
किस व्यथा से?
मौलिक:

डॉ.स्वर्ण सिंह रघुवंशी
गुना मध्यप्रदेश

विषय-शिकार/शिकारी
विधा-स्वतंत्र

ओ कर्ण धारो देश के न करो अब अनसुना।
देश द्रोहियौं को दो धर पूरी पर गुना।

स्वर्ग अपवर्ग से विहीन हो रहा।
जो मौसम था खुश हाल गमगीन हो रहा।
सदबुद्धि सदविचार की न बात हो रही।
"शिकारी" संग "शिकार" की घात हो रही।
नापाक पाक पड़ौसी हंसी हंस रहा।
मुकुट भारत मां का संकट में फंस रहा।
रो रहा हिमालय व रो रहीं गंगा जमुना।
देश द्रोहिंयौंं को दो धर पूरी पर गुना।

कवि महावीर सिकरवार
आगरा (उ.प्र.)

 मंच भावों के मोती को नमन।दिन :-सोमवार ।
ता:-9 /9 /2019
विषय:-शिकार/शिकारी

विधा :-कविता
शिकार को अपने
फंदे में फंसाने के लिये
शिकारी न जाने
कितनी चालें चलता है ।
फिर भी जब वह
नही फंसता उसकी चालमें
तब बेताब होकर
फिर नई चालें चलता है ।
शिकार करने को
ही तो वह शिकारी बना अन्यथा काम और
बहुत जीवन मे करने को।स्वरचि :-उषासक्सेना

 नमन मंच
दिनांक-९/९/२०१९
शीर्षक+"शिकार/शिकारी"

तजे मोह शिकार का
यह नही उचित व्यवहार
इस धरा पर महता सभी का
है एक समान।

मृगछौना प्यारा सा
है माँ की आँखो का तारा
उसने क्या बिगाड़ा भला
क्यों शिकार कर डाला?

यज्ञ हवन बहुत किया
छोड़ा ना शौक पुराना
सभ्य समाज के प्राणी हम
शिकार नही कर्म हमारा।

शिकार नही उचित कर्म
करें सबसे प्यार
इस धरा के सभी जीव
आपस में परिवार।
स्वरचित आरती श्रीवास्तव।

नमन, भावों के मोती
विषय_-शिकार/शिकारी
छल,दंभ, द्वेष के जो खुद ही शिकार हो ,
शिकारी हों तो आखिर शिकार क्या करोगे।

अपना सुधारों पहले चाल, चरित्र, चिंतन,
किसी परिवर्तन का सार क्या करोगे।

रीति,प्रीत, नीति, जहां कोई काम नहीं,
वहां किसी चीज से प्यार क्या करोगे।

क्रोध,कलह,कपट, जहां कूट कूट भरा है,
ऐसे महानुभावों का बीचार क्या करोगे।

मांगने से यारों यहां भीख नहीं मिलती,
बेंच के कलम तलवार क्या करोगे।
आर.के.यादव,

"शिकार/शिकारी"
-----------------------------------
जंगल में चर्चा है.....
जोर-शोर से आज....
चलो करें सब मिलकर विचार
शिकारी को देनी होगी मात.।

शिकारी जंगल आते .....
हाथों में ले तीर कमान...
छुप कर करते हमपर वार..
जाल में भर कर ले जाते साथ

काला बाजार में बेच आते..
चिड़ियाघरों की शोभा बढ़ाते
सर्कस के करतब सिखलाते..
मोटी जंजीरों में जकड़े जाते।

सभा की अगुवाई करते "शेर"
केसर.से है राजा जी के शान
हाथी दादा भी चिंघाड़ रहे
जीना हमारे हो रहे हैं दुश्वार ।

हिरण-हिरणी बातें कर रहें
सब मिलकर दें अपना सुझाव
कब तक बिकते रहे बाजार
करते जीव जंतुओं का संहार

बंदर मामा उछलते कुदते आए
संदेशा अनहोनी लेकर आए
शिकार करने को शिकारी आए
अबकी तो बंदूकधारी है आए।

राजा जी करें अगुवाई..
मिलकर उन्हें भगाए साथी
झुंड-झुंड हाथी चले चिंघाड़
बाघ मिलकर रहे हैं दहाड़

एकता देखकर भागे शिकारी
इधर-उधर गिरे जो हथियार
सब खिलखिला कर हँस पड़े
एकता का है यह कमाल ।।

स्वरचित पूर्णिमा साह
पश्चिम बंगाल ।।


विषय :-शिकार
🍂🌿🍂🌿🍂🌿🍂
विधा हाइकु

1))

शिकारी सब
मोह का पाल भ्रम
भटका जन
2)))

शिकार बनी
आबरू बेटी की
अंधा कानून
3)))

शिकार खुद
मोह के फेरे बुन
इन्सान मन

स्वरचित
नीलम शर्मा #नीलू


नमन भावों के मोती
आज का विषय, शिकार, शिकारी
सोमवार
9,9,2019,

शिकार सत्य हो गया,
शिकारी बना असत्य ।
भ्रष्टाचार करता शिकार,
सिस्टम हुआ बेकार ।

रिश्ते अविश्वास के,
होने लगे शिकार।
भाई चारा खो गया,
परिवार हुए शिकार ।

पर्यावरण हो गया,
प्रदूषण का शिकार ।
लालच मनु का बढ़ गया ,
वृक्ष हो गये शिकार ।

धूमिल होने लगा,
मानव का इतिहास ।
दुराचार ने कर लिया,
मानवता का शिकार ।

हमें चाहिए हम करें,
अनीति का शिकार ।
जीत नीति की हो सके ,
इंसाफ की हो जयकार ।

स्वरचित, मीना शर्मा, मध्यप्रदेश


नमन मंच भावों के मोती
09/09/19
विषय शिकार
विधा मुक्तक
20 मात्रा 12,8 यति अंत लगाल
***
कैसी मन की कुंठा ,कैसा विकार,
मासूम को देख क्यों,करता शिकार।
नारी सुरक्षित नहीं,कैसा समाज ,
आचरण में हो सदा,उत्तम विचार ।।

यहाँ व्यवस्था के सब ,होते शिकार,
सबके प्रयास से ही ,होगा सुधार ।
जीवन में सबके अब आये उजास ,
कर्तव्य निभा पाओ ,खुशियां अपार।।

शब्दों का आज पड़ा भीषण अकाल,
भाव भी नहीं करते ,कोई कमाल ।
लेखनी कुपोषण की,लगती शिकार ,
होता जा रहा छन्द ,लिखना मुहाल ।।

नजरों से लोग लगे करने शिकार,
चाहत में अब उनकी ,रहते बिमार।
साजन से मिलकर मैं,होती निहाल,
पिया के प्रेम पर हो,एकाधिकार ।।

स्वरचित
अनिता सुधीर

भावों के मोती
विषय= शिकार/शिकारी
================
अपने अहम के शिकार हुए
अब सबसे अलग-थलग बैठे
अहंकारी व्यक्ति का जीवन
बस अकेलेपन में ही बीते है
जब तक रहता माल जेब में
चापलूस कई मिल जाते हैं
पूरे हो जाते हर सपने
बस अपने ही खो जाते हैं
तिनका-तिनका जोड़ा था जो
जिस दिन मिट्टी में मिल जाता है
मुश्किल घड़ी में गले लगाने
अपनों का हाथ आगे आता है
पल दो पल के यह साथी
पल दो पल ही साथ निभाएंगे
करो शिकार खुद अहम का अपने
शिकारी बाहर से न आएंगे
भाई-बहन और बन्धु सखा से
मत तोड़ना नेह के धागे
बहुत बड़ी होती है ज़िंदगी
क्यों जीवन के सच से भागे
***अनुराधा चौहान***स्वरचित 


दिन :- सोमवार
दिनांक :- 09/09/2019
शीर्षक :- शिकार/शिकारी

शिकारी बन घूम रहे मानवता के पुजारी..
दर्द से बिलख रही नादान हवस की मारी..
कभी फेंकी जा रही कूड़े के ढेरों में...
कभी कुचली जाती आस्था के डेरों में...
शिकारी हुई अब तो निगाहें भी अपनों की...
ले लेते बलियाँ वो अब मासूम सपनों की...
शिकार की तलाश में भटकते नौजवान देखे...
सियासत की रोटियां सेंकते कदरदान देखे..
बन नहीं पा रहा कानून कोई मासूमियत पर...
हैं मौन लोकतंत्र के पैरोकार हेवानियत पर...

स्वरचित :- मुकेश राठौड़

शिकार/शिकारी
मुक्तक

देखी कंचन मृग की छाया,
वैदेही मन वार।
राघव से कर बैठी उस पल,
शिकार की मनुहार।
कल्पना के परे बसी थी,
कनक हिरण की देह-
माया रचाई मारीच ने,
सिया हरण का सार।।

देवव्रत ने तीर चलाया,
पंछी कलपे प्रान।
तीव्र गति सिद्धार्थ ने आकर,
दूर किये थे त्रान।
कुमार बोला शिकार मेरा,
राजा का दरबार-
नृप निर्णय जो प्राण बचाया,
मिले हंस का दान।।

शिकार करके बने शिकारी ,
भावों का है खेल।
लिपसा,लालच ,वासना,शक्ति,
चढ़े मनुज मन बेल-
सजग रहे जो जीवन पथ पर,
समय रहे बलवान-
यदा-कदा प्राणी का होता,
भ्रमित हृदय से मेल।।

स्वरचित
रचना उनियाल

#दिनांक:9:9:2019:
#विषय:शिकार शिकारी:
#विधा:काव्य:

*+*शिकार बेटियां*+*

जगत जननी खुद जन्मते ही,
जग का #शिकार बन जाती है,
समाज की कमजोरी के कारण,
गर्भ मैं ही मारी जाती है,

सीता बनकर जो त्याग करे,
राधा बन प्रीत सिखाती है,
सावित्री का सतीत्व है इसी मैं,
मीरा बन मोह जगाती है,

सत्यवान ना बन सके हम,
रावण बन शर्म ना आती है,
मिटे झूठी शान की खातिर,
बेटियां भ्रूण मैं ही मारी जाती हैं,

कुटुंब बढ़ाने की इस जग मैं,
क्या कोई दूजी सूरत है,
माँ बहन बेटियों से भी बढ़कर
ममता की कोई मूरत है,

चलता रहा आगे भी ऐसे ही,
इतिहास भी खुद को दोहराएगा,
हर पुरुष स्वयंवर भागी होगा,
खुद ही खुद से मारा जायेगा,

समय अभी है रोक लो "दुर्गा"
इन गला घोंटते हाथों को,
किलकारी फिर से गूँज उठेगी
हर आँगन दिन और रातों को,

"*"रचनाकार दुर्गा सिलगीवाला सोनी
भुआ बिछिया जिला मंडला मप्र

"नमन भावों के मोती"
विषय-शिकार/शिकारी
विधा-मुक्तछंद

छलांग लगाई सारंग ने
बोल पड़ा तभी मोर
शिकारी आया कानन में
बन्दर मचाए शोर

सावधान हुआ सारंग तभी
मृग छौना लिया घेर
जान अपनी लगा दांव पर
चला शिकारी करने ढेर

शिकारी चौकस हो गया
दोनों को लूँ फाँस
कमाऊँगा मैं पैसा बहुत
बेचूँ बाजार में माँस

जाल फैंका सारंग पर
शिकारी खाली हाथ
मारी छलांग एक लंबी
शिकारी खाई मात

मृगछौना भाग खड़ा हुआ
सांरग भी भागमभाग
लालच बुरी बला है
शिकारी मलते रह गया हाथ।

रचनाकार:-
राकेशकुमार जैनबन्धु
रिसालियाखेड़ा, सिरसा
हरियाणा,

बिषयःः शिकार/शिकारी
विधाःः काव्यः ः

शिकार करूँ प्रेम से लेकिन,
शिकार स्वार्थ से नहीं करूँ।
बनूँ शिकारी अगर प्यार का,
शिकार प्रेमी का सही करूँ।

ढोंग दिखावा नहीं प्यार का,
प्रभु सदैव सनेही वरण करूँ।
नहीं फंसाऊँ शिकार जाल में,
नहीं कभी किसी हरण करूँ।

घूम रहे हैं यहाँ बडे शिकारी,
जो रोज शिकार ही करते हैं।
इन्हें लगाव कुछ नहीं केवल,
ये स्वार्थ शिकार ही करते हैं।

बिन स्वार्थ कोई नहीं मिलता,
यहाँ सभी धूर्त शिकारी बैठे हैं।
झूठी प्रेमप्रीति दिखाते हमको,
यहाँ कुछ कपट शिकारी बैठे हैं।

स्वरचितःः ः
इंंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

विषय- शिकार/ शिकारी

लाचार बच्चे,
कुपोषण शिकारी
रोटी तलाशे

नैन शिकारी
प्रेम बनता रोग
लूटते चैन

नैनों के तीर
प्रियतमा शिकारी
हृदय हारी

बेटी की लाज
वासना की शिकार
बन लाचार
***
स्वरचित-रेखा रविदत्त
9/9/19
सोमवार

09/009/2019
हाइकु (5/7/5)
विषय:-"शिकार/शिकारी"

(1)
हथेली जान
रफ़्तार के शिकार
सड़क लाल
(2)
ढूँढे शिकार
इंसान के वेश मे
छुपा सियार
(3)
शिकारी ठंड
ढूँढ रही है रंक
बिना वसन
(4)
वक़्त शिकारी
घायल हुआ अहं
जिंदगी हारी
(5)
इंसानियत
आतंक का शिकार
रोती बहार
(6)
ईश व्यापार
शिकारी भी शिकार
चक्र संसार

स्वरचित
ऋतुराज दवे,राजसमंद(राज.)

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"स्वतंत्र लेखन "17नवम्बर 2019

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