Tuesday, September 10

"पोशाक/परिधान"6 सितम्बर 2019

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ब्लॉग संख्या :-497




नमन मंच भांवो के मोती
विषय परिधान,पौशाक
विधा काव्य
06 सितम्बर 2019,शुक्रवार

नीलाम्बर परिधान गगन का
शस्यश्यामल वसन धरा का।
रंग बिरंगे परिधान पुष्पों के
रजत श्वेत वसन हिमगिरी का।

श्री कृष्ण पीताम्बर धारी
श्वेता माँ परिधान अनौखे।
कृपा बरसती जब भक्तों पे
सुख भक्ति के मिलते झौखे।

परिधान फैशन नहीं होती
तन ढकता सर्दी को हरता।
कभी खुशी कभी गम होते
वसन बदन शौभित करता।

परिधान पहिचान मानव की
जैसा पहने मानस भी बदले।
रब रंग बिखेरे अद्भुत अवनी
सोचे समझे नर नारियां पहने।

स्व0 रचित, मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।
06/09/2019
"पोशाक/परिथान"
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व्यक्तित्व का प्रथम परिचायक है पोशाक..
उम्र के साथ-साथ बदल जाते हैं पोशाक..
पोशाक में झलक जाते हैं संस्कार..
सामने वालों के नजर में रुचिकर हो पोशाक.।

हमारे भारतीय पारंपरिक परिधान..
साड़ी से हैं नारी का सम्मान........
हर राज्य में पहनने के है अपने अंदाज
धोती कुर्ता की अपनी है शान..।

दादाजी पर बार्डर वाली धोती खूब जमती..
उसपर सिल्क की पनजाबी खूब चमकती..
दादी माँ के आँचल से बरसते हैं आशीर्वाद..
हिंद के सिवा कहीं नहीं ऐसा परिधान..।

शादी -ब्याह हो या हो तीज त्योहार.
नन्हें-मुन्नों की खुशियाँ होती है अपार
एक से मन न भरता ले आते दो-चार.
देखते ही बनते रंग-बिरंगे पोशाक..।

पाश्चात्य परिधान की लगी है होड़..
इसे अपनाकर युवा दिखाते अपनी शान..
वस्त्र चीर-फाड़कर दिखा रहे जो तन..
क्या यही है आधुनिकता की पहचान??

स्वरचित पूर्णिमा साह
पश्चिम बंगाल ।।

 नमन "भावो के मोती"
06/09/2019
"परिधान/पोशाक"

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कुशल व्यवहार और लज्जा..
नारी के हैं परिधान...
संस्कारों की गरिमा...
झलकाती है परिधान...
मूल्यों से न इसका आकलन
इज्जत का है आवरण..
पोशाक सदैव हो मनभावन
मन भ्रमित हो जाता कभी
देख कर सफेद पोशाक..
कली करतूतों को भी ...
छुपा देता है ये परिधान..
सफेद पोशाक में ...
छुपा होता है शैतान..।।

स्वरचित पूर्णिमा साह
पश्चिम बंगाल।।


06/09/2019
"पोशाक/परिधान"
संस्मरण
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मेरे शहर से 10-12 किलोमीटर की दूरी पर "कालीडांगा" नामक एक गाँव है..वहाँ अंधों का विद्यालय है. मेरे बच्चों का स्कूल उसी रास्ते पर पड़ता है ।वहाँ अनाथ या निर्धन अंधे बच्चे या जो 80 फिसदी अदृश्य हों उनके लिए भोजन,शिक्षा एवं आवास की नि:शुल्क व्यवस्था की जाती है..।यह अर्द सरकारी विद्यालय है ..बाकि खर्चे अनुदान से चलती है..।
करीबन 8-10 वर्ष पहले की बात है..संस्था के कुछ लोग हमारे मोहल्ले से घर-घर बच्चों के पुराने शीत वस्त्र इकट्ठा कर रहे थे.. मेरे पास बहुत सारे थे.. पर उस वक्त सामने नहीं थे अंदर से निकालना पड़ता..।
मुझे दूसरे दिन अपने बच्चों का स्कूल जाना था..उनके इम्तिहान के पेपर देखने के लिए... इसलिए मैनें कह दिया मैं कल स्वयं लेकर जाऊँगी..।
रात को बच्चों के बहुत सारे शीत पोशाक जो छोटे हो चूके थे..निकाल कर रखी..।
दूसरे दिन लेकर पहूँच गई।मेज पर सारे पोशाक को रखकर...
मेरे सामने ही कुछ बच्चों को बुला दिया गया।बच्चे हाथ छू-छू कर महसूस कर खुश हो रहे थे वहाँ के किरानी ने सभी को उनके आकार के अनुसार एक-दो परिधान दे दिए..।
पुराने पोशाक पाकर इतनी खुशी मैंनें पहली बार देखा था...।

स्वरचित पूर्णिमा साह
पश्चिम बंगाल ।।
प्रथम प्रस्तुति

बहके बहके कदम तुम्हारे
बहका बहका परिधान है ।।

सच में क्या पश्चिमी सभ्यता
ने खींचा तुम्हारा ध्यान है ।।

ठीक न यह लिबास तुम्हारा
अभी न इसका अनुमान है ।।

खुद के हाथ खुद को छलना
फैशन न ये ठगी दुकान है ।।

नासमझी नादानी की यह
छोटी पहल बड़ी आसान है ।।

मगर ये छोटी भूल कभी
बनती भूल बड़ी महान है ।।

अपना नही तो अपनों का
समझो मान सम्मान है ।।

वस्त्र ही तो कराये 'शिवम'
इंसा की सही पहचान है ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 06/09/2019



विषय-- परिधान/पोशाक
विधा--दोहा
द्वितीय प्रस्तुति

सोच की तरहा सिमटे , पहनावे के ढंग
जिसे भी देखिये उसे, पहने कपड़े तंग ।।

कहने से क्या फर्क है, सोच का सदा रंग
जितनी शहर की सज्जा, उतनी वस्त्रिय जंग ।।

संस्कृती की सरासर , उड़ रही है पतंग
बन रहे हैं मजाक खुद में , कैसी ये हुड़दंग ।।

परिधान की परख आज , भूल गये हैं यंग
पाश्चात्य के चढ़ गये , उन पर पूरे रंग ।।

वस्त्र वो पहनें जिसमें, दिखें अंग प्रत्यंग
अनुकरणी वही 'शिवम' , जो कहायें दबंग ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 06/09/2019
नमन मंच भावों के मोती
6 / 9 /2019
बिषय,, पोशाक,, परिधान
बुंदेलखंडी कहावत सत्य चरितार्थ
पुराने कवियों ने कहा वर्तमान में यथार्थ
जैसे कि लिपीपुती देहरी
पहनों ओढ़े महरी
पहनो वही जो नजरों को भाए
खाओ वही जो पेट पचाए
सुंदर परिधान में सजी है गोरी
क्यों न खिची आए साजन की डोरी
पोशाक बढ़ा देती मन की उमंग
झूम झूम जाए ज्यों लहर तरंग
हरियाली चुनरी धरा का परिधान
सजनी के मिलन को उमड़ पड़ा आसमान
वहीं भगवा पोशाक में बाबा ढोंगी
अध्यात्म की.आड़ में निकले भोगी
परिधान पहनावे में हो समानता
प्रफुल्लित हो तन मन रहे प्रधानता
स्वरिचत ,,सुषमा ब्यौहार
नमन" भावों के मोती"💐💐
विषय:-पोशाक/परिधान
विधा:-मुक्तक

🌹🍂🌹🍂🌹🍂🌹
1))))

डूबके मर गये हैं इरादे बहुत,
रुठके अब हैं बैठे सहारे बहुत,
चाहतों को मिला नहीं जो कभी
नहीं है लिबास राहतों के बहुत।
2))))

देते रहे जो शय और मात को,
निभाते कहाँ है वो हर बात को,
जो बदलते रहे इरादों का लिबास
वो ढूंढने चले हैं अब साथ को

स्वरचित
नीलम शर्मा#नीलू
भावों के मोती
बिषय- परिधान
परिथान से पहचान होती
हमारे सम्पूर्ण व्यक्तित्व की।
हमारी रूचि हमारे विचार
हमारी पोषाक बता देती।।

जैसा देश वैसा वेश
इस नीति पर चलना चाहिए।
जगह और समयानुसार ही
हमारा पहनावा होना चाहिए।।

तभी पा सकेंगे सम्मान व प्यार
हम जहां कहीं भी जाएंगे।
वरना हम हंसी के पात्र ही
बस बनकर रह जाएंगे।।

स्वरचित- निलम अग्रवाल,खड़कपुर
परिधान/पोशाक
🏝️🏝️🏝️🏝️🏝️
नमन मंच भावों के मोती।
नमन गुरूजनों, मित्रों।

हरे भरे वस्त्र धारण कर।
धरती है इठलाती।

आया है बरसात का मौसम।
धरती को है यह भाती।

हरे भरे पेड़ पौधे हैं।
सबोंने हरे वस्त्र पहने हैं।

प्रकृति ने ओढ़ ली हरी चुनरी।
लहराती बलखाती है।

वीणा झा
स्वरचित
बोकारो स्टील सिटी
नमन मंच "भावों के मोती" 🙏
दिनांक -06-09-2019
शुक्रवार
विषय- पोशाक/परिधान
विधा- छंदमुक्त काव्य

दया, प्रेम, करुणा , ममता का भाव नहीं,
न भले - बुरे की पहचान।
ऐसे व्यक्तित्व का कोई मोल नहीं,
चाहे सुंदर पहने परिधान।

मीठी न जिनकी वाणी,
जिह्वा उनकी कटार।
भाई-बंधु,सखा-मित्र सब,
साथ छोड़ेंगे बीच मझधार।

धन -दौलत के मद में चूर,
दिखलाते झूठी शान।
व्यर्थ वह मानव जीवन,
जो किया न सुपात्र को दान।

तन की बाहरी साज-सज्जा,
देती पल भर की मुस्कान।
जीवन को मुखरित करें,
पहन इंसानियत का परिधान।

स्वरचित
@सर्वाधिकार_सुरक्षित
रानी कुमारी
पूर्णियां, बिहार

Damyanti Damyanti 
 विषय,,परिधान,,पोषाक |
परिधान वही श्रेष्ठ तम |
छवि निखरे मानव का सौदर्य |

पौषाक से झलकता आतंरिक सौदंर्य |
इसी से निखरता विकसित होता ,
व्यक्तित्व मानव का यही अस्तित्व |
होगा ऐसा तब जब होग शुभ गुण चरित्र संस्कार हममे |
आधुनिकता की पोषाके लील रही जीवन |
बहुत हुआ सभंल जाओ फैशन के पुतलो भ्रम न जीवो |
स्वरचित,,दमयंती मिश्रा
नमन मंच
दिनांक ६/९/२०१९
शीर्षक-"पोशाक/परिधान"
लघुकथा
सुबह के दस बज रहे थे,शालू अपने सुबह के सभी जरूरी काम निबटा कर बैठी ही थी कि उसके प्रिय सहेली रानू का फोन आ गया,वह खुश हो कर उससे बातें करने लगी, रानू उसके बिटिया की शादी में नही आने का अफसोस जता रही थी,साथ ही उसने बताया की शादी के सभी वीडियो फोटो देख लिये, बहुत ही सुन्दर है,साथ ही उसने आशांका भी जताई की बिटिया के ससुराल वाले परिधान से काफी आधुनिक लग रहे हैं,क्या वे वास्तव में आधुनिक है ?क्या उनके विचार भी आधुनिक है या सिर्फ पोशाक ही आधुनिक पहन आधुनिक होने का दिखावा कर रहे हैं।
आज शादी को दो माह होने को आये थे,अब तक शालू बिटिया की शादी बहुत सम्पन्न व अच्छा वर से होने से बहुत खुश थी, परन्तु यह बात उसके मन में घर कर गई"कि क्या वे लोग विचार से भी आधुनिक है या सिर्फ परिधान से?
उसने तुरंत प्लान बना अपने पति के साथ बिटिया के ससुराल पहुंच गई, क्योंकि हर मां बाप के लिए बेटी "आँखो की तारा "जो होती है, वहां जाकर उसे पता चला कि वाकई वे बहुत अच्छे लोग हैं,और दूसरे दिन सुबह वह यह देखकर हैरान रह गई कि, उसके ससुराल वाले सभी उठ गये, लेकिन उसकी बेटी देर तक सोती रही,शालू ने बिटिया की सास नीता को टोकते हुए कहा कि"आप अपनी बहु जो मेरी बेटी है को सुबह उठाती क्यों नहीं?
परन्तु नीता जी ने जो कहा वह सुनकर वह आश्चर्यचकित रह गई उन्होंने बताया"आपकी बेटी जो अब हमारी बहू है वह देर रात तक आफिस का काम करती है,और फिर उसे ससुराल में अपने घर का फिलिंग आना चाहिए, ससुराल का नहीं, उसे बिल्कुल वैसा ही लगना चाहिए की वह अपने घर में है न की ससुराल में,तभी वह यहां सहजता से रह पायेगी, और फिर वह एक बार सोकर उठ जाती है तो वह घर और आफिस सभी मैनेंज कर लेती है।"
उनकी बातें सुनकर शालू सोच में पड़ गई कि कल को उसका बेटा का शादी होगा और उसकी बहू भी देर तक सोये तो क्या वह बर्दाश्त कर पायेगी? तभी उसने दृढ़ निश्चय किया कि उसे भी नीता जी की तरह सिर्फ परिधान से ही नही विचारों से भी आधुनिक बनना होगा,और बहू को सिर्फ दिखावे के लिए नही सही मायने में बेटी मानना होगा।
स्वरचित आरती श्रीवास्तव।
सादर नमन मंच
परिधान
(मात्रा-16,11 अंत गुरु,लघु )

तुम भावों की मूर्त कली हो,
मैं पल्लव परिधान।
मुझे पहन इतराओ सखि हे,
मुख मंगल अम्लान।

बाधा विरति सब आहरित हो
मधुप मदिर गुंजार
छुईमुई सी लाज लचक,
अवलंबन भुजतान।

कोल कपोल केलि कलोल करि
बिंदी तारक भास
सहमी साँझ कहीं सिंदूरी
भ्रमित भए दिनमान ।

तुम भावों की मूर्त कली हो,
मैं पल्लव परिधान।
-©नवल किशोर सिंह
06-09-2019
स्वरचित
नमन मंच भावों के मोती
06/09/19
विषय। पोशाक
विधा क्षणिकाएं
1)
अजर अमर आत्मा
बदलती रहती
नित नई पोशाक ,
पोशाक पुरानी
हो जाये
तब बदला करे
शीघ्र क्यों बदलती!
2)
एक पोशाक
दुखों के छिद्र थे
अवसाद से छिद्र और बढ़ रहे ,
पैबंद लगाने बैठे छिद्रों
पर सुखों का ,
विश्वास के धागों से
सपने टांके,
लगन की सुनहरी जरी
पोशाक बड़ी खूबसूरत नजर आई ।
3)
पोशाक पर
ऊँगली उठती बार बार
बच्चियों की पोशाक
कोई बता दे ।
4)
वर्दी बड़े सम्मान का विषय
कितनों की कुर्बानी
वर्दी की आन शान में ,
एक मेडल और सजा था
वर्दी पर
उसके जाने के बाद ।
5)
आज दुकान पर भीड़ बड़ी
पोशाक सिलवाने आये सभी,
सोचा सबकी एक सी सिल दूँ
इतनी शक्ति देना प्रभू!
सबकी पोशाक में
धरा की हरियाली भर दूँ
केसरिया शक्ति दे दूँ
श्वेत हिमकणों की शीतलता से
प्रेम का रंग लाल भर दूँ ।

स्वरचित
अनिता सुधीर
 नमन भावों के मोती
दिनांक- 6 /9 /2019
विषय -पोशाक परिधान


मन के मिट जाए सब विकार
आशाएं ले नवल आकार
दीपक जले , फैले उजियार
जीवन हो जाता प्रकाशवान
मनमोहता उसका परिधान

छोड़े जो हिंसा और रार
चले सुगंधित सी ज्यूं बयार
सच्चाई हो जिसका हथियार
जीवन बनता इक उद्यान
मनमोहता उसका परिधान

रखे जो मन में शुद्ध विचार
पा जाता वही दृढ़ आधार
जीवन हो जाता एक उपहार
मन हो जिसका शौर्यवान
मनमोहता उसका परिधान
*******
मीनाक्षी भटनागर
स्वरचित
भावों के मोती
6/09/19
विषय-परिधान

व्यंग रचना

मन काला तो क्या हुवा उजला है परिधान,
ऊपर से सब ठीक रख अंदर काली खान ।

बालों को खूब संवार दे अंदर जूं का ढेर,
ऊपर से रख दोस्ती मन में चाहे बैर ।

बलवानों की कर खुशामद और जी हजूरी ,
कमज़ोरों पर रौब झाड़ रख थोड़ी सी दूरी।

बात बनती जहां दिखे बना गर्दभ जी को बाप,
जहां नहीं निज कारज सरे अपना रस्ता नाप।

मौके का जो लाभ उठाते वो ही बुद्धिमान ,
अपना कह सब हथियाले न वस्तु पराई मान ।

स्वरचित

कुसुम कोठारी।
नमन भावों के मोती
विषय पोशाक/परिधान
दिनांक 6.9.2019
दिन शुक्रवार

पोशाक/परिधान
🍁🍁🍁🍁🍁🍁

कितना है आकर्षक शब्द परिधान
यह तन को करता सुरक्षा प्रदान
यह व्यक्तित्व की शोभा बढा़ता
और सँस्कारों की देता पहचान।

परिधानों में आकर्षण है विशेष
ये कई बातों का देते संदेश
अलग अलग प्रान्त अलग देश
सबके अपने अपने होते वेश।

सर्दी में कपडे़ ऊनी गरम
गर्मी में हल्के नरम नरम
निर्वस्त्रता को नहीं मान्यता
हमारी सँस्कृति में यह है शरम।

शाल ओढा़ना विद्वता का सम्मान है
साफा पहनाना महिमा का गुणगान है
वैवाहिक समारोहों में छलकती गर्व से
विविध परिधानों की अलग ही पहचान है।

स्वरचित
सुमित्रा नन्दन पन्त
5/9/19
परिधान
ास्य कविता
×××××××
मंच सजा,रंक आया
राजा बनके, रानी लाया
लोग हंसें, जोकर जान
झूठा मजा, झूठी पहचान
दे गया, झूठा परिधान ।

छोटे बड़े, खास आम
अलग अलग, उनके काम
जैसा काम,वैसा दाम
उनकी अपनी, अलग यूनिफार्म
है उनका, अपना परिधान ।

गांव शहर, देश विदेश
ऋतु मौसम, बदले परिवेश
अलग अलग, धरे वेश
प्यारा प्यारा, खास पहचान
सबकी अपनी, अलग परिधान ।

धोती कुर्ता, बुट सूट
जब जैसा, मजे लूट
नये युग, मिली छूट
आधे कपड़े, बड़ी पहचान
ये कैसा, है परिधान ।

लहंगा चोली,सूट साड़ी
निखर जाए, देशी नारी
माता, बहन; पत्नी प्यारी
सुन्दर लगे,पुरानी पहचान
था अपना, ऐसा परिधान

चाहे जैसा, रूप धरो
काम बड़े, अच्छे करो
प्रेम स्नेह, मान सम्मान
कभी नहीं हो अभिमान
गुण अच्छे, अच्छा परिधान ।।
××××××××××××
क्षीरोद्र कुमार पुरोहित
विषय- पोशाक /परिधान
दिनांक 6 -9-2019

फैशन दौर में,परिधान बदल गया ।
अंतर नहीं रहा,पहचानना मुश्किल हो गया।।

पुराने पहनावे को ,फालतू बता दिया ।
अर्ध वस्त्र परिधान,आज फैशन हो गया ।।

बुजुर्गों का नजर उठाना, मुश्किल हो गया ।
परिधान उनका ,सबको शर्मसार कर गया।।

पाश्चात्य संस्कृति को, अपनाने में खो गया।
अपनी संस्कृति को, उसने भूला दिया।

अपने परिधान को, सबसे श्रेष्ठ बताने में।
अपना सुख चैन, उसने खो दिया ।।

पहचान परिधान बना, वाणी संयम नहीं रहा।
हाय हेलो बोलने में ,जय श्री कृष्णा भूल गया ।।

बड़ों का अपमान कर, विनाश निमंत्रण दिया।
देखो इस परिधान ने, सब बदल दिया ।।

वीणा वैष्णव
कांकरोली
(स्वरचित)
नमन भावों के मोती
आज का विषय, परिधान, पोशाक
दिन, शुक्रवार
दिनांक, 6,9, 2019

होता परिधान व्यक्तित्व का परिचायक है ,
सही पोशाक वही जो आरामदायक है ।
कभी-कभी तो अंधी फैशन को अपनाना -
बन जाया करता बहुत ही कष्टदायक है ।

हमेशा से संस्कृति की पहचान यही है ,
चयन वस्त्र का गरिमा के अनुरूप सही है ।
अनुचित पहनावा हास्यास्पद बन जाता -
मतलब कपड़ों का जाने इंसान वही है ।

स्वरचित, मीना शर्मा, मध्यप्रदेश,

नमन् भावों के मोती
दिनाँक: 6/9/19
विधा:छंदमुक्त कविता
विषय: पोशाक /परिधान

परिधान जीवन का सम्मान
शरीर का सुरक्षा कवच
परिधान लज्जा के आभूषण
समाज की गरिमा
विभिन्न प्रकार के परिधान
प्रत्येक ऋतु के अनुसार
हर अवस्था के परिधान
जिन्दगी के अनुसार
हर व्यवस्था के परिधान
ड्रेस कोड केअनुसार
परिधान में समेटी पूरी दुनिया
समाज की अवधारणा
जन्म से मृत्यु तक का सफ़र
परिधान ही वस्तुतः हमसफ़र

स्वरचित
मनीष श्री
रायबरेली

 नमन भावों के मोती
6/9/2019
विषय-परिधान

**********
व्यक्तित्व की पहचान है परिधान
पहनावे से होती है व्यक्ति की पहचान
पीताम्बर पहनें कृष्ण कन्हाई
नील अम्बर में सजे राम रघुराई
श्वेत वस्त्र है माँ शारदे का परिधान
वीणा वादिनी का स्वरूप महान
प्रकृति ने पहने विविध रंग के परिधान
नीले वसन में विस्तृत है आसमान
धरती ने ओढ़ी धानी चुनरिया
रंगीन परिधानों से सजी है बगिया
साड़ी है नारी का उत्तम परिधान
सौम्य रूप हो या हो महफ़िल की जान
पहनावा चुनना सबकी अपनी पसंद
शालीनता मर्यादा हो,कोई न रहे प्रतिबंध
गरिमा,गौरव,प्रतिष्ठा पर आंच न आए
परिष्कृत अभिरुचि पोशाक से दिख जाए
समयानुकूल जो पहनते हैं परिधान
समाज मे बढ़ जाती है उनकी शान
सरल सुखद लगते भारतीय परिधान
व्यक्तित्व में लग जाते हैं चार चाँद
अब तो विदेशी भी
अपनाने लगे हैं भारतीय पहनावा
सादा,सौम्य,सहज वस्त्र ,न ही इनमें है कोई दिखावा
हम भारतीय होने पर गर्व करें
सुंदर हमारे परिधानों को
सकल जगत में विख्यात करें ।।

**वंदना सोलंकी**©स्वरचित
 नमन भावों के मोती
शीर्षक -पोशाक/
परिधान

दि. शुक्रवार/6-9-19
विधा ---दोहे
1.
ऐश करो खाओ पिओ,का जहरीला मंत्र।
फूहड़ विज्ञापन डगर,घटा पोशाक तंत्र।।
2.
विज्ञापन की राह में,घटती है पोशाक।
धन ऐश्वर्य बढा मगर, याद रहा चार्वाक।।
3.
ज्यों पोशाक घट रही , बढ़ यौवन उन्माद।
हाव भाव की धौंकनी,बन जाती है खाद।।
4.
सब नङ्गे हम्माम में, कोई नहिं अनजान ।
ये नंगापन आजकल,राजनीति परिधान ।।

******स्वरचित*******
प्रबोध मिश्र 'हितैषी'

नमन:भावों के मोती
शुभ संध्या
दि0 06/09/2019
विषय :पोशाक /परिधान
विधा:पिरामिड

है
शादी
पोशाक
दूल्हा सूट
दुल्हन साड़ी
साला शेरवानी
साली लहगा चुन्नी ।

ली
शिक्षा
परीक्षा
शोभा यात्रा
एक पोशाक
विश्वविद्यालय
दीक्षांत समारोह ।

ओम्
फौजी
पोशाक
अश्त्र शस्त्र
देश प्रहरी
सीमा पे चौकसी
सुसज्जित है सभी ।

स्वरचित
नीलम श्रीवास्तव लखनऊ उत्तर प्रदेश ।

नमन-भावो के मोती
दिनांक-06/09/2019
विषय-परिधान

एक अधूरा नंगा सच

नारी के परिधानों पे।

सच नहीं , यथार्थ सत्य

मर्यादा के संविधान पे।।

मचा है आज घमासान

स्त्री के परिधानों पे।।

पोशाकों के बाजारों में

कपड़ों के गलियारों में

नारीवाद कांप रहा है

आक्रांत वायु के तूफानों में।।

मथ रही है मनुज की जिज्ञासाए

आंखों से अपना रूप छिपाने में।

तारों में संकेत है ,चांदनी में है छाया

अंतर्मन में शब्द छिपा, प्रबल कैसी ये माया।।

असली नजरें वस्त्रों पर, अर्धरात्रि के स्वांग मनाने में

किसे फिकर है फक्र की.......

अधुरी....
मौलिक रचना
सत्य प्रकाश सिंह प्रयागराज

नमन "भावों के मोती"🌹🙏
06/09/2019

िषय:-"परिधान"

आत्मविश्वास छलक उठे, दे अंगों को प्राण,
तन और मन की संगत हो, खिलते हैं परिधान l

पहचान है व्यक्तित्व की ,निखर जाती है शान,
मौसम के रंगों में रंगे हुए, मुस्काते हैं परिधान l

लाज ढँकी घूँघट ने, पगड़ी बढ़ाती है मान,
सारी में गरिमा नारी की, स्वयं बोलते परिधान l

त्यौहारों के देश में, भारत विविधता की है खान,
यहाँ संस्कृति के परिवेश में, जँचते हैं परिधान l

स्वरचित एवं मौलिक
ऋतुराज दवे, राजसमंद (राज.)
विषय :- परिधान / पोशाक,
दिनांक :- 6/9/19.
विधा :- "दोहा"
1.
आज रहा ना जगत में, कहीं गुणों का मान।
बने योग्यता के यहाँ, सूचक ये परिधान।
2.
सुघड़ सलौनी देह पै, हो सुन्दर पोशाक।
भरी सभा के बीच में, खूब जमावै धाक।
3.
विश्वाशों के सूत से, बुनी नयी पोशाक।
ममता धागे से सिली,बटन नेह कर पाक।
4.
क्षीण वसन निज रूप से,ना बिल्कुल अनजान।
निर्धन तो मज़बूर हैं, धनिक दिखावें शान।
5.
बहुधर्मी इस देश में, भिन्न-भिन्न परिधान।
पर-भू, पर बस तिरंगा, है सबकी पहचान।
**********************************
सादर नमन
विधा-हाईकु
विषय-पोशाक/परिधान

घर की आन
संस्कारों की पोशाक
मिलता मान

फैशन दौर
परिधानों की बाढ़
सब हैरान

पेट है खाली
दिखावा परिधान
झुका. इंसान
***
स्वरचित-रेखा रविदत्त
6/9/19
शुक्रवार

नमन मंच
विषय-पोशाक/परिधान/लिबास

"लिबास"

बेच दिया ईमान सबने
रद्दी में,ईमानदारी फैंककर
टूटी हुई कलम से
आज नसीब,वो अपना लिखने लगे हैं

बदल गया है देश अपना
बदल गया समाज
बिल्डिंग,बनने लगी है सीमेंट की
दिल,पत्थर के बनने लगे हैं

घिरा देखकर मुझे
दुश्मनों की बस्ती में
बदल गए हैं दोस्त भी अपने
चाल,सियार सी आज वो चलने लगे हैं

शराफत को हाथ में लेकर
मैं घूम रहा हूँ ,चोरों की बस्ती में
बिगड़े लिबास हैं जिनके
वो सरे आम,इज्ज़त नीलाम करने लगे हैं

मैं खड़ा था,ईमान की चौखट पर कभी
अब उलझी है दिल की डोर मेरी
सुलझेगी या नहीं कभी
लिबास सब,अपना बदलने लगे हैं

राकेशकुमार जैनबन्धु
रिसालियाखेड़ा, सिरसा
हरियाणा
#दिनांक:6"9"2019:
#विषय:पोशाक:प्रधान:
#विधा:काव्य

"+*+"पोशाक परिधान"+*+"

जलवायु का असर भी तय करता है,
हमारे पहनावा और परिधान को,
पोशाक से अक्सर पहिचाना जाता है,
समाज के संस्कारों और विधान को,

कुछ फैशन से कुछ आधुनिकता से भी,
बिगड गया है पहनावे का तरीका,
यही पोशाक कभी सभ्यता बन जाए,
कभी परिधान ही बन जाता है सलीका,

कभी बुर्का बनकर छिपाता तेरा भेष,
कभी स्कूली बच्चों का मोहक गणवेश,
कभी वर्दी बनकर ये सम्मान दिलाए,
कभी घूंघट मैं गोरी सभी के मन भाए,

पूर्वी और पाश्चात्य पहनावे में भी है,
जमीन और आसमान का विरोधाभाष,
पूर्वी परिधान रहा है लज़्ज़ा का सूचक,
पश्चिमी पहिनावे मैं चमक दमक है खास,

"*" रचनाकार दुर्गा सिलगीवाला सोनी
भुआ बिछिया मंडला मप्र


भावों के मोती
विषय - परिधान / पोशाक
(बाल कविता )

एक थे दबंग दर्जी दादा ,
सिलते सुंदर सलीकेदार परिधान ,
चिंदी चिंदी चुराकर इधर-उधर से
पहुंचे चकमक चूहे राजा
छुपकर सबकी नजर से
और उठा ली सर पर दुकान ।
दर्जी दादा ,दर्जी दादा ,
दर्जी दादा ,दर्जी दादा
सिल दो मेरे लिए भी
एक झालरदार परिधान ।
चमको चुहिया गई मायके
फीके हुये रसोई के पकवान
उसको लेने जाना ससुराल
पहनकर परिधान मस्त कमाल ।
बोले दर्जी दादा धीर धरो
न हो अधीर ज्यादा
सिल देता हूँ, धोती कुर्ता सादा
उस पर बाँध कर पगड़ी
लगोगे तुम शहजादा।
लिवा लाना चमको बिटिया को
और सुनो कुतर ना देना
ससुराल की खटिया को ।
अब जाओ करने दो मुझको काम
वर्ना बिगड़ जायेगा नाम
चकमक ने दर्जी दादा को किया प्रणाम
उछल उछल कर खुशी खुशी
चले अपने धाम
पहन नयी पोशाक
चकमक चले मटक मटक ससुराल ।

(स्वरचित )सुलोचना सिंह
भिलाई (दुर्ग )
आज का विषय पोशाक, परिधान,
१/गोरे अंगों का,
प्रर्दशन करती
आज युवा लड़की
माया जाल में
रुपहले परदे,
पोशाक पहन के।।१।।
२/फटे पेंन्ट को,
फैशन बना हुआ,
सभ्यता के घावहै,
नग्नता ढांके,
अंग का प्रदर्शन,
आज युवा लड़की।।२।।
३/बदल रहा,
पोशाक पहनावा,
अंग प्रदर्शन का,
फैशन हवा
पाश्चात्य संस्कृति की,
सभ्यता की निशानी।।
स्वरचित देवेन्द्र नारायण दास बसनाछ,ग,।।

भावों के मोती
विषय=पोशाक/परिधान
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ज़िंदगी तो वही जीते हैं
जो हर हाल में खुश हैं
रो-रोकर
जिए तो क्या जिए
बस दुःख की माला पहनते रहे
सब सुख
भला किसको मिला
किसी का पेट भरा
तो
कोई भूखा जगा
पहनकर रेशमी जामा
कुछ रोते
खस्ताहाली का दुखड़ा
पैबंद लगे
कपड़ों में मुस्कुराते
गरीब भी देखे हैं
हालात से
करके समझौता
जीवन जीते जी भर के
प्याज,नमक मिल जाए
खा लेते पेट-भर रोटी
कहीं भोग छप्पन हैं
फिर पेट भूखा है
ओढ़ रखा है जो
दिखावे का सबने
वो आडम्बर झूठा है
इस आडम्बर ने ही
ज़िंदगी से
सुख-चैन है छीना
भरी अलमारियाँ
पोशाकें
अनगिनत कितनी
एक भी शलीके का नहीं
यह ज़िंदगी भर का रोना है
कुछ लोग ऐसे भी हैं
जिन्हें
उतरन भी मिल जाए
वो
चार कपड़ों में खुश हैं
ज़िंदगी तो
वही जीते हैं
जो हर हाल में खुश हैं
***अनुराधा चौहान***स्वरचित 

नमन मंच
विषय:--पोशाक /परिधान
विधा:--मुक्त
दिनांक:--06 / 09 / 19

आत्मदेह की
पोशाक जिस्म है
करता मानव
कृत्य जिस्म से
मैली होती
आत्मा है
एक ही परिधान
देय है
परमात्मा का दान
करके कुकृत्य
रखकर मलीन विचार
क्यूं करता
मैला परिधान ।

डा.नीलम

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"गुमनाम"12नवम्बर 2019

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