Tuesday, November 5

"नज़र "02नवम्बर 2019

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ब्लॉग संख्या :-554
2/11/2019
शीर्षक-नज़र

विधा-गीत

चटक रही मन में चिंगारी,
सूखी जाती है हरियाली।
किसकी काली नज़र लगी है,
हुई बड़ी, दुर्लभ खुशहाली।

धरणी रोती अंबर रोता,
रुदन करे उपवन का माली।
स्वार्थ में अंधी है मानवता,
बजती सबके हाथों ताली।

मुखिया घर का भुगत रहा है,
न्यारा चूल्हा , न्यारी थाली।
मात-तात भी बांट लिए हैं,
दिन में दिखती रजनी काली।

कच्चे चिट्ठे खोल रहे हैं,
खड़ी दीवारें टूटी जाली।
पछुवा आकर चली गई है,
उड़ते पत्ते सूखी डाली।

शालिनी अग्रवाल
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

विषय नज़र
विधा काव्य

02 नवम्बर 2019,शनिवार

नज़र झुके तो लाज शर्म है
नज़र उठे आत्म स्वाभिमान।
नजर रुके तो अति आश्चर्य
नजर नजर अलग पहिचान।

मेहरबान जब नजरें होती
दया धर्म की हो बरसात।
दीन दुःखी मन हर्षित होता
मिलती है सुंदर सौग़ात।

नजर गड़ाए रहता सैनिक
चूक सुरक्षा न होने पाए।
बर्फीली वादी ऊपर चढ़
राष्ट्र भक्ति गीतों को गाए।

भक्तवत्सल ध्यान मग्न हैं
अन्तर्यामी श्री चरणों में।
भाव भक्ति हिय सात्विक
होड़ मची रहती भक्तों में।

जन नायक की एक नजर से
रिपुदल में कौहराम छा जाता।
भारत माता प्रिय पद पदम्
जय जय नर गीतों को गाता।

स्वरचित, मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान
विधा--ग़ज़ल
मात्रा भार-- 16

प्रथम प्रयास

🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷

नज़रों से क्या जाम पिलाया
होश नही अब तक है आया ।।

कैसे कह दूँ नशा न करता
शाम हुई चेहरा लुभाया ।।

नहि देखूँ रहे छटपटाहट
देखूँ जी नहि कभी अघाया ।।

मय के प्याले बढ़े निराले
मयकशी का मान बढ़ाया ।।

गमों की ही तो दवा आखिर
कब नहि उसने असर दिखाया ।।

गम वाले ही पिया करे है
गम मुकर्रर हमको कहाया ।।

कैसी थी वो नज़र नशीली
नशा कभी नही उतरने पाया ।।

कहते नशा नही जाय 'शिवम'
हाल वही अपना कहलाया ।।

जाम तो कब के जा चुके
दिल ढुढ़े वो मय-कदा साया ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 02/11/2019
हमारी नज़र का असर देख लेना।
जरा आईना इक नज़र देख लेना।


कडी धूप है और है बडी जिन्दगी।
कहीं छांव को इक शजर देख लेना।

जो दामन तुम्हारा कभी थाम लेंगें ।
न रहने देंगे कभी कसर देख लेना।

लबों पर हमेशा तेरा नाम रहता है।
दुआओं में हमारी असर देख लेना।

महबूब की तारीफ क्या न पूछिए़।
चौंदवीह की रात क़मर देख लेना।

विपिन सोहल
आज का विषय नजर,
सेदोका,
सृष्टि में छुपा,

जीवन का संगीत,
बात कहे ,दिल की,
आंखो में तुम,
अच्छी नजर रखों,
तुमको लुभायेगी

लगी है प्रीत,
पल बिसरे नहीं,
नयन आंसू बहाते,
जीवन तड़पें,
विरह सतावे जी,
नजर करो नाथ।।


आप हमको,
अजनबी बनके

न ही देखा कीजिए,
इक नज़र,
दिखाई देंगे हम,
जरा दिल से देखें।।

स्वरचित दे्वेन्द्र नारायण दास,साधना कुटीर बसनाछ ग।


उसको भूलने की कोशिश करता है
रह-रह कर याद उसकी आती है,
कभी बात में कभी नींद में नज़र वो आती है,

भूलना चाहता है उसको फिर भी भुला न पाता है,
तरीके याद बहुत आते है फिर भी कुछ कर न पाता है,
जीवन खोया उसकी यादो में, महकते फूलो के ख्वाबो में,
प्यार की इस दुनिया में कुछ ओर नज़र न आता है,
प्यार की उस यादो में रोता जाता है,
जीवन में न कुछ भांता न कुछ पाता है।।

भाविक भावी

दिनांक 2/11/19
शीर्षक - नज़र

विधा - नज़्म

मेरे ख्वाबों का वो संसार लौटा दो।
संजोये सपनों की सौगात लौटा दो।।

महकता था कभी जो गालों पर मेरे।
वो हया नज़ाकत भरा गुलाब लौटा दो।।

देखे थे कई ख्वाब मिलकर नजरों ने।
टूटे हुऐ मेरे वो जज़्बात लौटा दो।।

थीं ये ख़्वाहिशें मद भरी धुवाँ-धुवाँ।
आँधी से उजड़ी वो बरसात लौटा दो।।

खो गयी "रागिनी" गमों के संमन्दर में।
खुशियों के पल फिर से दो चार लौटा दो।।

स्वरचित
मीनू "रागिनी"
02/11/19
मीनाकुमारी शुक्ला
राजकोट
2 /11/2019
बिषय,, नजर

तेरी भक्ति का सुरुर है ए
कुछ तो मतलब जरूर है ए
अभी तक तुमको समझ न पाई
मेरी नजर का कुसूर है ए
तेरे मिलने के ख्वाब सजाए
दिल में दीप जलाए
दिल की बनी हुई दिल्लगी ए
शंका का मन में फितूर है ए
नजर पे पर्दा पड़ा हुआ था
जमाना सामने खड़ा हुआ था
सारे झमेलों में पड़कर देखा
माया का ही तो दस्तूर है ए
नहीं है कोई मेरा अपना
टूट चुका है अधूरा सपना
रिश्ते नाते अब नहीं भाते
मेरे लिए तो नासूर है ए
स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार
विषय नज़र
विधा कविता

दिनाँक 2.11.2019
दिन शनिवार

नज़र
💘💘💘

नज़र की ही बात है कैसी है नज़र
जीवन में बहुत असर डालती है नज़र
जब भी पड़ती है किसी की इनायते नज़र
तो चमक जाती है खुशी से जीवन की नज़र।

उन्होंने कर दिया अपने दिल को हमारी नज़र
इससे बडी़ क्या होगी किसी की नज़र
हमने भी हर साँस अपनी उनको कर दी नज़र
पर ज़माने की लग गई देखो हमको नज़र।

बात न बन सकी मिलकर भी नज़र
ज़माने की कितनी बुरी है नज़र
मेरी ये दास्ताँ करुँ किसको अब नज़र
बस ख़बर के रुप में इसे देखती हर नज़र।

स्वरचित
सुमित्रा नन्दन पन्त
जयपुर

नमन मंच भावों के मोती समूह। गुरूजनों,मित्रों।
नजर

आज कोई चेहरा खुश नजर आता नहीं।
जिंदगी के जद्दोजहद में लगे हुए हैं सारे।

एक मुसीबत टली नहीं, दूसरी आन पहुंची।
इन्हीं उलझनों को सुलझाने में लगे हुए हैं सारे

नजर बदल जाती है सबकी कभी ना कभी।
जब दोस्ती दुश्मनी में बदल जाती है।

दुश्मनी मिटाकर दोस्ती कर लो।
फिर सारी दुनियां अच्छी लगती है।
वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी
स्वरचित

2/11/2019
भावों के मोती
विषय-नजर

___________________
पलकों में सपने सँजोये,
आस मन पलती रही।
छवि बसी आँखों में तेरी,
धार बन बहती रही।।

खोजती हूँ निशान तेरे,
दूर जाती राह में।
छोड़ सब संग चल पड़ी हूँ,
विश्वास ले चाह में।
गूँजती मन बातें तेरी,
मिसरी उर घुलती थी।
पलकों में सपने सँजोये,
आस मन पलती रही।।

आस मन में तेरी लिए हम,
प्रेम डगर पे चल दिए।
पता नहीं तेरा ठिकाना,
खोजने तुझे चल दिए।
ढूँढ रही अब हर दिशा में,
धूप में चलती रही।
पलकों में सपने सँजोये,
आस मन पलती रही।।

धूप में तपी जिंदगी को
प्यास तड़पाती रही।
पाँव में उभरे हैं छाले,
राह थी काँटो भरी।
घूरती लोगों की नजरें,
हृदय को खलती रही।
पलकों में सपने सँजोये,
आस मन पलती रही।।

***अनुराधा चौहान***स्वरचित

विषय-नजर
दिनांक 2-11-2019
नजर के तीर से,यूं ना सदा तू वार कर।
हो जाऊंगा घायल,बस थोड़ा प्यार कर।

यूं ना तू हर समय,मुझसे तकरार कर।
खुशियों के लिए,थोड़ा इंतजार कर।

इस तरह देख, मुझे ना बेकरार कर।
तिरछी नजर से ही,थोड़ा प्यार कर।

रात भर तड़प, सुबह का इंतजार कर।
मिल मुझसे ऐसे,ना ओर परवाह कर।

नजर बचा, तू सबसे रह सदा पर्दा कर।
किसी ओर को न,तिरछी नजर घायल कर।

वीणा वैष्णव
कांकरोली 

नमन भावों के मोती
आज का विषय, नजर
दिन, शनिवार ,

दिनांक, 2,11,2019,

नजरें सब कुछ कह देतीं हैं
कभी हाले दिल न छुप पाता ।
हमको नजरें समझा देतीं हैं,
मान अपमान की परिभाषा ।

प्रगट हो ही जाया करती है ,
घृणा वाली आखों की भाषा।
करूणा सामने आ जाती है,
दुःखी ही नजर को पढ़ पाता।

वेदना भी छलक ही जाती है,
जब हमदर्द नजर कोई पाता।
हर गम की मरहम ये होतीं है,
माँ की नजरों का क्या कहना।

झुकी नजर शर्म कहलाती है,
नजर होती जीवन का गहना।
नजरें हरि चरणों में रखना है,
सम्मान सभी का हमें करना ।

स्वरचित , मीना शर्मा , मध्यप्रदेश
विषय_" नजर "
विधा॒॒॒_काव्य (मात्रा -भार 17)

नजर नजर की बात है भैया
इनमें बसता अपना संसार
छिपा बहुत हमारी नजरों में
जैसे वैरभाव और दुलार।

तिरछी नजर से हमें देखता
कोई बुरी नजरों से घूरे।
कहीं वासना उफनती देखें
मिलें यहां दुर्भावना घूरे।

नजरें मिला के शरमाता वो।
नजरें घुमा के इठलाता वो।
किसी का मानस कौन जानता
नजरें झुका के घबराता वो।

अपनी नजर से नजर लडी है।
उनकी नजर से नजर बडी है।
नजर कहीं भी चलेंगी अपनी
मानें किसी की नजर पडी है।

"नजर "काव्य (मात्रा भार -17)
2/11/2019/शनिवार 

नमन भावो के मोती
2/11/19
विषय नजर


निगाहे थी उनकी
चेहरा मेरा था
खामोश नजरे
बया कर रही थी
वो गजल लिख रहे थे
आँखों मे मेरी
मुहब्बत की कविता
औऱ शब्दो की नदियां
मैं खोई हुई थी
अदाओं में उनकी
ध्यान के आलम
छाया हुआ था
की लम्हो का मुझको
पता ही नही था
वो पिलाते रहे
जाम पर जाम मुझको
हम पीते रहे बिना कुछ रुके
आलम नजर का
अजी इस कदर था
मैं खुद को उनमे
डुबाती गई थी
नशे के कहानी
लुभानी थी मुझपर
मैं डूबी हुई थी
वो डूबता गया था
फैसला वक्त का
बहारो ने है लिखा
नींद जो टूटी
मैं बेहताशा लुटीथी
कोई और न था
लुटेरा था दिलवर
जग का दुलारा
यशोदा का लाला

स्वरचित
मीना तिवारी

Vandna Solanki 🙏
2/11/2019
विषय-नज़र
िधा-काव्य
🌷🌷🌷🌷
====¢¢¢¢¢====
उन्मीलित दृगों में
करुणा के बादल छाए
अल्प अवधि इस जीवन में
गहन निशा बढ़ती ही जाए
मद्धिम निशा की श्वास अधूरी
घोर अमावस में चाँद नज़र न आए

हम इंसानों ने ही तो
बनायीं हैं सरहद और दिशाएं
भरोसा कर बैठे हम
अपने बनाए भ्रमजाल पर
इससे परे हमें
कुछ भी नज़र न आए..

आँखे अब तक ढूंढ़ रही हैं
अपनी उस शख्शियत को
जो निग़ाहों में बसी थी
इंतज़ार है जिसका इस दिल को
वो यूँ छिप गई है जैसे
साँझ ढले सूरज नज़र न आए...

ये कोई आभास था या
मेरे मन का वहम
ऐसा लगा मानो
किसी ने पोंछ दी हो आंखे नम
धुंधली निग़ाहों से कुछ भी नज़र न आए..

**वंदना सोलंकी**©स्वरचित®

भावों के मोती पटल
दिनांक : 02.11.2019
वार : शनिवार

आज का शीर्षक : नज़र
विधा : गीत

गीत

नज़र नज़र से लड़ी कहीं तो ,
नंदन वन महका है !!

अधर कहीं कंपित लगते हैं ,
गालों पर लरजन है !
पल पल चंदन से महके हैं ,
देह लगे मधुबन है !
बाहों के भुजबन्द कसे हैं ,
पल पल फिर बहका है !!

नेह निमंत्रण स्वीकारा तो ,
खुशियाँ लगी चहकने !
एक दूजे के पास हुए तो ,
चढ़े अटारी सपने !
दुनिया की नज़रों के डर से ,
दिल फिर से दहका है !!

जिसको जो कहना है कह ले ,
जो मन आये सोचे !
मिटी दूरियाँ , हुआ मिलन अब ,
कौन कहाँ तक रोके !
आज नहीं कल रुख बदलेगा ,
लगे समय चहका है !!

स्वरचित / रचियता :
बृज व्यास
शाजापुर ( मध्यप्रदेश )

विषय: नज़र
दिनांक ,02/11/2019


शीर्षक : नज़र

नज़र ने नज़र से कहा
क्षितिज की ओर नज़र उठाकर देख लो

नज़र ने नज़र से कहा,
प्रभु के चरणों में नज़र झुकाकर देख लो

नज़र ने नज़र से कहा,
सामने वाले से नज़रे मिलाकर देख लो

नज़र ने नज़र से कहा,
नज़र से निज नजरिया बदलकर देख लो

नज़र ने नज़र से कहा,
किसी की नज़रों से गिरना छोड़ दो।

नज़र ने नज़र से कहा,
पलभर के लिए नज़रें बंद करके देख लो

नज़र ने नज़र से कहा,
एक नज़र में पूरी दुनिया को समा लो।

नज़र ने नज़र से कहा,
नज़रों से नज़रें मिलाकर तुम देख लो।

नज़र ने नज़र से कहा,
नज़र से 'भावों के मोती' बनाकर देख लो।

नज़र ने नज़र से कहा,
नज़र से 'रिखब' की रचना पढकर देख लो।

रचयिता
रिखब चन्द राँका 'कल्पेश'
स्वरचित एवं सर्वाधिकार सुरक्षित
जयपुर राजस्थान

नमन भावों के मोती समूह।

पहली पेशकश इस समूह में

देखिएगा......

आज के शीर्षक - * नजर *

नजर नजर ही इक कमाल है,
हर नजर में कुछ सवाल हैं।

तिरछी जो पढ़ी नजर तो,
उठे उस नजर से बवाल है।

नजर से नजर मिली जो
हुआ फिर जीना मुहाल है।

गहरी गहरी झील सी आँखे,
रुख से टपके जमाल है।

इनायतें नजर हुई जरा जब,
हुई जीस्त बाकमाल है।

ख़ुदा की निगाहें करम तो,
महकती जीस्त, जैसे तमाल है।

नजर में उसकी सब बराबर,
हाथ हमारे ही सब आमाल हैं।

नीता सक्सेना
2 नबंवर 19
नमन मंच भावों के मोती
02/11/2019
विषय नज़र

शीर्षक वह एक नज़र

वह एक नज़र तेरी कह गई कितना कुछ
अवाक् रह गई मैं
एक नज़र में समा सकता है इतना कुछ
सोच न सकी थी कभी मैं-
भर्त्सना,तैश,खेद,परेशानी और चिंता
प्यार भी ,नफ़रत भी-
उलझन भी सवाल भी,एक हल्की सी चंचल मुसकान भी-
लगा ऐसा कि उस एक नज़र में हैं क़ैद
ज़मीन आसमान
यह सारी कायनात-
और कहीं क्या जाना
तुझे समझने के लिए-
यह एक नज़र तेरी,दे गई
कहानियाँ माना-
सदियों के फ़ासले मिट जाते शायद..मगर
मगर पलक झपकते ही
देखा उस नज़र में
बस खालीपन..
खालीपन को छोड़ कुछ भी नहीं!
अलविदा को छोड़ कुछ भी नहीं
------------------------
मीना मल्लवरपु

नज़र ने नज़र को दिया नज़राना।
नज़र से नज़र का बना इक

फ़साना।
नज़र ही नज़र की दिवानगी में।
हुआ ये दिल तेरी नज़र का
दिवाना।
नज़र में गड़ी जब नज़र तेरी
तिरछी।
बड़ा ही अचुक है तुम्हारी नज़र का निशाना।
नज़र दिल का शीशा,नज़र
आईना है।
नज़र से नज़र को है मुश्किल बचाना।
नज़र मयकशी है, नज़र
मैकदा है।
साकी तू भर के पीला दे
नज़र का पैमाना।।
(स्वरचित)

दिनांक.........02/11/2019
विषय.......... नज़र

★★★★★★★
नज़र
नज़र मिली तो इज़हार करना जरुर।
दिल की ख्वाहिश दफन मत करना।
वक्त आने पर इकरार करना जरुर।

नज़र मिला उसकी मासूमियत पर,
फिर उसे हाले दिल बयां करना।
सुनकर शिकवा और शिकायत,
फिर दर्दे दिल पर मरहम लगाना।
★★★★★★★
स्वलिखित
कन्हैया लाल श्रीवास
भाटापारा छ.ग.
जि.बलौदाबाजार भाटापारा

दिन :- शनिवार
दिनांक :- 02/11/2019

शीर्षक :- नजर

मिली नजर जब उनसे भरे बाजार में,
हार गए दिल हम तभी भरे बाजार में।
मदमस्त था यौवन लट काली-काली,
लूटा आए जिंदगी हम भरे बाजार में।

मिली नजर जबसे घायल दिल हो गया,
मुहब्बत में उसकी पागल दिल हो गया।
हिरनी सी मस्तानी चाल,वो नैनों के वार,
हर अदा पे उसकी कायल दिल हो गया।

स्वरचित :- राठौड़ मुकेश

नमन मंच भावों के मोती
विषय नजर
आधार छंद--वाचिक भुजंग प्रयात

(मापनीयुक्त मात्रिक)
मापनी- लगागा लगागा लगागा लगागा
समान्त -आना ,पदान्त -न आया
****
तुम्हें भाव अपने दिखाना न आया ।
तुम्हीं से कहूँ क्या बताना न आया ।।

छिपाते रहे राज हम आपसे जो ।
नजर से हमें क्यों छुपाना न आया ।।

नजर जो उठी आपकी इस तरह से ।
दिया क्यों मुझे तब बुझाना न आया ।।

उलझती रही डोर मन की सदा क्यों ।
मुझे चाल से क्यों बचाना न आया ।।

जहाँ हम बसायें धवल चाँदनी में ।
सपन क्यों पलक पर सजाना न आया ।।

स्वरचित
अनिता सुधीर

नमन भावों के मोती मंच
विषय-नजर
विधा पद्य

दिनांकः 2:11:2019
शनिवार
आज के विषय पर मेरी रचना:

जो बैठे हैं अंधेरे में,
नज़र उन पर भी तुम डालो।
मानवता की सीख यही,
सदा अपना उदर मत पालो।।

एक नज़र आइना देख,
तेरे पाप नज़र आ जायेंगे ।
मत आॅख बंद कर दौड़,
ये तेरे पीछे पीछे आयेंगे ।।

मत फेर नज़र तू फर्ज से,
यह जीवन तभी सार्थक है ।
मोड लिया मुख कर्म से,
तो जीना तेरा निरर्थक है ।।

नज़र उठा कर देख जरा,
ये देश तुझे पुकार रहा ।
वहां कत्ले-आम मचा हुआ,
तू क्यों अब तक सो रहा ।।

नहीं नज़र झुके ऐसे कभी,
तेरे नीच कर्म के कारण ।
दंडित और अपमानित हो,
समस्या नहीं निवारण ।।

नजरों में रख अपनों को,
उनको कभी नहीं बिसारना।
सेवा फर्ज अपने करना,
बुरे वक्त में काम आना ।।

कोई गरीब आये नज़र में,
मदद सदा उसकी करना ।
चुपचाप नहीं जाना छुपकर,
मत फर्ज से मुँह मोडना ।।

अपने से जो बड़े हैं,
नज़र झुका नमन करना ।
काम बताये कोई अगर,
उनका तुम पालन करना ।।

स्वाध्याय पर नजर रहे,
गुणावणुण मुल्यांकन हो।
यदि कहीं हो कोई कमी ,
क्षमा याचना उसकी हो ।।

नहीं स्वार्थ पर नजर रहे,
परोपकार ही सदा करें ।
नारी को समझें बहन समान,
सम्मान सदा उसका करें ।।

स्वरचित
डॉ एन एल शर्मा जयपुर
(डॉ नरसिंह शर्मा ' निर्भय ,जयपुर)
 नमन-भावों के मोती मंच को समर्पित
दिनांक:2/11/2019
विधा:हाइकु

विषय:नज़र

झुकी नज़र
शर्म के बोझ तले
गुलाबी रूप

बुरी नज़र
राई नोन व मिर्ची
अंधविश्वास ।

माँ की नज़र
बलइया हज़ार
दुआ आबाद ।

नज़रो में ही
प्यार का इज़हार
ह्रदय गति।

समुद्र पार
नज़र से है दूर
दिल के घोड़े ।

स्वरचित
नीलम श्रीवास्तव

नमन भावो के मोती
विषय - नज़र

एक नज़र क्या उठी,
नज़र की बदल गई नज़र ।
नाज़नीन को छूती नज़र
एक नज़र की भूखी नज़र ।
जो बदले नजारे तो
नज़र को तौलने के पैमाने बदल गए ।
पलक झपक भी ना पायी
और ज़माने बदल गये ।
रंगीन मंजर लिए खड़े थे हथेलियों पे
बदली नज़र तो गाज गिरी
ख्वाब की हवेलियों पे ।

(स्वरचित)सुलोचना सिंह
भिलाई (दुर्ग )

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"जिम्मेदार"18नवम्बर 2019

ब्लॉग की रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं बिना लेखक की स्वीकृति के रचना को कहीं भी साझा नहीं करें   ब्लॉग संख्या :-569 Hari ...