Tuesday, November 5

"परिवेश"05नवम्बर 2019

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ब्लॉग संख्या :-557
नमन मंच भावों के मोती
विषय परिवेश
विधा काव्य

05 नवम्बर 2019,मंगलवार

बड़े भाग्यशाली हैं मित्रो
जो साहित्य परिवेश मिला।
करते मिल काव्य साधना
कोई शिकवा नहीं गिला ।

परिवेश निर्मित हम करते
तब कदम आगे को बढ़ते।
आना जाना मेला जग का
आओ पर पीड़ा मिल हरते।

है भारतमाता प्रिय पुत्रों
सब मनु की हम संताने।
शुभ परिवेश मिला सबको
हम गाते राष्ट्र भक्ति तराने।

हितं भाव साहित्य सरिता
आओ मिल प्रक्षालन करलें।
माँ श्वेता आशीष मिला है
यह परिवेश हिय में भरलें।

स्वरचित, मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।
शीर्षक -- परिवेश
प्रथम प्रस्तुति


बदलते परिवेश में हमें ढलना होगा
क्या-क्या न समझौता लेकर चलना होगा ।।

भौतिकता के क़हकहा अब लग रहे हैं
अध्यात्मिकता को भी न कुचलना होगा ।।

अच्छा क्या है बुरा क्या है अब वक्त नही है
फिर भी इस पर चिन्तन हमें करना होगा ।।

पहचान हमारे देश की कुछ अलग रही
वो खासियत हमें बरकरार रखना होगा ।।

सत्य है जो नही बदले वो पिछड़ गये
नाप तौल कर कदम 'शिवम' धरना होगा ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 05/11/2019
नमन भावों के मोती
आज का विषय, परिवेश
दिन, मंगलवार

दिनांक, 5,11,2019,

परिवेश बदलता है कर्मों से हमारे ,
अभिमान नहीं करने की ये बात।
आज यहाँ हम कल जाने कहाँ हों,
सबको कर्मों की मिलती है सौगात ।
हाथ हमारे सपनों की परिकल्पना,
करना तो चाहते हैं सदा साकार ।
इंसा पहुँचता है जब तक मंजिल पे,
बदल जाया करते हैं सपनों के आकार।
निर्माण मानसिकता का हो जाता वैसा,
सम्मुख रहता है जैसा भी परिवेश ।
मानव मन गीली मिट्टी सा है रहता ,
बन जाया करता है कुम्हार परिवेश ।
परिवेश बदलने का हक है हमको,
निर्माण करें हम जैसा चाहें परिवेश ।
फसल अगर हम चाहते हैं अच्छी ,
उसे उचित देना पड़ता है परिवेश ।
प्रयास करना हमेशा हमारे हाथों में,
बैठा है फल देने को विधाता तैयार ।

स्वरचित, मीना शर्मा, मध्यप्रदेश,


नमन भावों के मोती
दिनांक: 05.11.2019
विधा: पद (छंदमुक्त कविता)

विषय: परिवेश

पनपते राक्षस

हाथ में मोबाइल
सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम
पढ़ा लिखा समाज
और आधुनिक सोच
होने के बावजूद भी ...
जब सूर्य की रोशनी
धुंधली पड़ने लगती है
धीरे-धीरे अंधेरा
पैर पसारने लगता है
गगन के पक्षी जब ...
वापस घोंसलों की ओर
उड़ान भरते हैं

तब....
एक चिंतित पिता
बार-बार घड़ी देखकर
शहर से आने वाली
आखिरी बस का
टकटकी लगाकर
ऐसे इंतजार करता है जैसे...
घायल लक्ष्मण के लिए
श्री राम हनुमान के आने का

क्योंकि... हर रोज
नई-नई बढ़ती
दुष्कर्म और उत्पीड़न की खबरें
उसकी शांति को छीन लेती हैं
विश्वास को अधमरा कर देती हैं
दुश्मन की गोलियों से बचना
आसान है पर...
जहर उगलती कामुक
भूखी नजरों से बचना
बहुत मुश्किल है

वह बस से उतरने वाली
हर एक सवारी को
ऐसे निहारता है जैसे...
गरीब भिखारी
गिनती करते समय सिक्कों को
सहसा बस से उतरती
बेटी को देख ...
उसका चिंतित चेहरा
ऐसे खिल उठता है जैसे...
बड़े होते हुए दीए में
घी ढल गया हो

क्योंकि...
उसे पता है कि...
अच्छे संस्कारों के सिवाय
बेटी को सम्मान
और सुरक्षा पाना
मरुस्थल में
बारिश के पानी को
इकट्ठा करने के बराबर है
वह जानता है कि...
दम तोड़ते संस्कार
बेटियों के लिए
बढ़ता हुआ खतरा है
और ...अकेली शिक्षा
बेचारी असमर्थ है
इस मामले में
तभी तो पनप रहे हैं
इसी डर से
भ्रूण हत्यारे व
दानवी दहेज रूपी राक्षस
घरों में
बचे तो कैसे बचे ???
बेचारी बच्ची
सैकड़ों राक्षसों से
इसलिए ...एक पिता
बच्ची को लेकर तनाव में रहता
नफे सिंह योगी मालड़ा ©
स्वरचित रचना
मौलिक
परिवेश
नमन मंच भावों के मोती समूह।गुरूजनों, मित्रों।


आज के परिवेश में स्वस्थ अगर रहना है,
तो कर लो अपने आसपास की सफाई।
स्वच्छ परिवेश में हीं संभव है स्वस्थ जीवन,
हमने इसीलिए स्वच्छता अपनाई।

तन,मन को गर रखोगे साफ,
तो मिलती है खुशियां अपार।
प्रफुल्लित रहता है मन तेरा सदा,
हो जाता है सुखी संसार।

आज के परिवेश में सबकुछ मिलता है,
पर मिलती है नहीं सच्ची खुशियां।
इसीलिए स्वच्छ रखो परिवेश को,
खिल जायेगी तेरी दुनियां।

वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी
स्वरचित
मेरी रचना प्रस्तुति

कैसा परिवेश है,भटका अब देश है।
भूले संस्कार सब,बदला अब वेश है
चली हवा है कैसी--
देख हृद डोलता है ।

अरे !पैसा बोलता है---
पैसा बोलताहै।

जीवन बाजार है
शिक्षा ब्यापार है
इसके ही नींव पर
जग कारोबार है

इसके बिन सब सूना
उदासी घोलता है
अरे पैसा-----

खन खन खन आवाज
दे सुख की सौगात
लेते खरीद यहाँ
कोई घर की लाज

खामोश चीखें लहू ---
उबल कर खौलता है
अरे पैसा ---

मंदिर से मस्जिद तक
राजनीति दरबार
कहाँ मिले न्याय अब
है कानून लाचार

रुपयों की थैली से--
गरीबी तोलता है।
अरे पैसा--

सब बेमानी बाते
अर्थ बिन ब्यर्थ नाते
संकट में दूर होते
कोई साथ न आते

रुपया हो हाथ में --
गूंगा मुँह खोलता है
अरे पैसा---

पैसा है माई बाप
मिटे सकल संताप
पैसा सुख का मूल
पैसा ही पुण्य पाप

डूबा मद मोह में
आचरण घोलता है
अरे पैसा---
स्वरचित
सुधा शर्मा
राजिम छत्तीसगढ़

शीर्षक - "परिवेश"
००००००००००००

मुक्तक
--------

तड़प रही हूँ साजना,
कब आओगे देश,
मन में गहरी पीर है,
बिगड़ रहा परिवेश,
जल्दी आओ हे सजन,
तुमको है सौगंध-
अब भी जो आये नहीं,
अस्थी होंगी शेष ।।
~~~~~~~~~
मुरारि पचलंगिया
परिवेश
घनाक्षरी छन्द

**

एक नया परिवेश ,बदल रहा है देश,
कष्ट बचे नहीं शेष ,राष्ट्र ऐसा चाहिये।

समस्या बड़ी जटिल ,चालें न अब कुटिल ,
आत्मा हो रही चोटिल,समाधान चाहिये ।

क्यों भूले अपने कर्म ,निभायें अपना धर्म
खोखली हुई व्यवस्था ,राष्ट्र को बचाइये ।

देखो आन बान शान ,मेरा भारत महान
इसे सोने की चिड़िया ,फिर से बनाइये ।

स्वरचित
अनिता सुधीर

नमन"भावों के मोती"
05/11/2019
"परिवेश"

✍️✍️
भावों को शब्दों में पिरो दिया
कोरे कागज पे उतार दिया
रस की फुहार यूँ बरसा......
अक्षर-अक्षर चमक गया.....
शब्द-शब्द का मिलन हुआ...
मन में प्रीत का अंकुर फुटा...
मौसम खुशगवार हुआ........
मन का परिवेश ही बदल गया
✍️✍️
बड़े जतन से एक घर बनाया
दीवारों पे प्रीत का रंग लगाया
आशियां को फूलों से सजाया
भूकंप का झटका ऐसा आया
घर की दीवारें दरकते रहे.....
सजे फूल सारे झरते रहे.......
नज़र के सामने घर ढह गया
होठों की मुस्कान ले गया....
हादसों का शिकार यूँ हुआ..
घर का परिवेश ही बदल गया
✍️✍️
सफर का कारवाँ चलता रहा
सफर में मनमीत बनता रहा
आचानक कोई तूफान आया
मनमीत बने थे वो बिछड़ गए
पाँवों के निशां रेत में ढक गए
वो उमंग ही अब ना रहा.......
शाम भी अब ढल चुकी......
रात ने गले लगा लिया........
किंकर्तव्यविमूढ़ सा बना गया
सफर का परिवेश बदल गया

स्वरचित पूर्णिमा साह
पश्चिम बंगाल ।।
नमन भावों के मोती
दिनांक -५/११/२०१९
शीर्षक"-परिवेश"


चलो मिलकर बनाये सुंदर परिवेश
हो न अन्नाभाव कही
पर्यावरण हो बिल्कुल सही
रोचक बनाये अपने परिवेश।

मनोयोग से करें प्रयास
निरर्थक न हो अपना प्रयास
सही परिवेश मिले सबको
उन्नति पर हो सबका ध्यान।

सही परिवेश, सार्थक प्रयास
बदल कर रख दें भाग्य का खेल
आंकाक्षा वह परिवेश का
तालमेल रहे सदा सही।

बदले परिवेश के अनुसार
बदलना होगा स्वंय को
सबसे सुंदर सबसे प्यारा
है अपना देश का परिवेश।

स्वरचित आरती श्रीवास्तव।

विषय-- परिवेश (हमारा- तुम्हारा )

अपने तथा तुम्हारे बारे में, बताता हूँ कुछ मैं यार ।
बने थे एक दूजे के लिये, थे फिर भी कुछ अन्तर ।।
था बचपन में,अपने घर में सब का बड़ा ही दुलारा ।
थीं तुम भी अपने, माता पिता की आँखों का तारा ।।
थे पर हम दोनों ही एक दूसरे से बिल्कुल अन्जान ।
थी नही आपस में हम दोनों में भी कोई पहचान ।।
मगर थे परिवेश भी हम दोनों के ही पृथक-पृथक ।
सोच भी हमारी बहुत बातों में, थी अलग अलग ।।
झुकाव परिवार का मेरे,था भौतिक वाद की ओर ।
किन्तु परिवार का तुम्हारे,आघ्यात्म वाद की ओर ।।
होती थी तुम्हारे यहाँ सन्त कबीर दास की पूजा ।
होती थी घर में हमारे, भगवान कृष्ण की पूजा ।।
दक्ष थीं उंगलियां तुम्हारी रानी, करने में चित्रकारी ।
चलतीं थीं परन्तु उंगलियां मेरी, करने में सर्जरी ।।
लगती थी अच्छी मुझे, पीने में गरम गरम चाय ।
पसंद थे तुमको पीने किन्तु, ठन्डे व शीतल पेय ।।
रहतीं थीं व्यस्त तुम तो, बातें काम की करने में ।
आता था आनन्द मुझको, गप्पें व्यर्थ की लड़ाने में।।
आता था आनन्द तुमको, करने में अतिथि सत्कार ।
आता था आनन्द मुझको चलाने में तेज़ मोटरकार ।।
थीं तुम तो जनाब, बैडमिन्टन व थ्रो बाल चैम्पियन ।
करता था पसंद मैं खेलना, ताश,चौपड़ एवं शतरंज ।।
मिलकर तुम और मैं दोनों बन गये एक दिन हम ।
रही नहीं चिन्ता फिर कोई, रहा ही नहीं कोई गम ।।
त्याग दिया विवाह के बाद,तुमने भी पिता का घर ।
आ गयीं तुम साथ मेरे फिर, स्वयं अपने ही घर ।।
त्याग दिया तुमने उन सबको, थे जो तुम्हारे अपने ।
अपना लिये ससुराल में अपनी, सब रिश्ते मेरे तुमने ।।

डा0 सुरेन्द्र सिंह यादव
"व्थथित हृदय मुरादाबादी"
स्वरचित.

 नमन मंच
भावो के मोती
5/11/19

विषय परिवेश

बदल गए है रिस्ते
बदली है भावनाएं
स्नेह भाव क्या है
अपने ही रिस्ते कुचले

पाश्चात्य सभ्यता का
रङ्ग चढ़ चुका है
परिवेश बदल रहा है
मानव बदल रहा है

कर्तव्य से विमुखता
बढ़ने की है जिज्ञासा
अपनो को छोड़कर
हर बच्चा भाग रहा है

माँ बाप पहुँचे आश्रम
जिनका पकड़ा था दामन
रिस्तो में धूल चढ़ गई
संबंधों में है खालीपन

स्वर विहीन मानव
खेलता है उंगलियों से
परिवेश सुना सूना
खामोश है जन जीवन

स्वरचित
मीना तिवारी
दिन :- मंगलवार
दिनांक :- 05/11/2019
शीर्षक :- परिवेश

बदला आँगन व बदला परिवेश है...
नववधू का यह प्रथम गृहप्रवेश है...
लाज बैठी घूँघट घेरे...
लेके नयन स्वप्न घनेरे...
स्नेहसीक्त आँचल सुर्ख...
श्यामल घटा से केश है...
नववधू का यह प्रथम गृहप्रवेश है..
उमंगें हो रही उल्लासित...
कर रही मन अह्लादित..
पल्लू गंठे संस्कार मातृ के...
पितृ के सजे संदेश है..
नववधू का यह प्रथम गृहप्रवेश है..
उन्मुक्तता को त्यागकर...
नवबन्धन को बांधकर...
सप्त शपथ परिणय की ले...
बदलना अपना अब भेष है...
नववधू का यह प्रथम गृहप्रवेश है...
सजी है हाथों मेहंदी...
चूनर है धानी सुगंधि...
सात जनम का वचन दिया...
अब यही उसका देश है...
नववधू का यह प्रथम गृहप्रवेश है..
भावों के मोती
शीर्षक- परिवेश


पर्यावरण को बचाएं
परिवेश स्वच्छ बनाए।
मिलकर करें प्रयास
रोज एक वृक्ष लगाएं।

हवा हो रही दूषित
जल हो रहा दूषित।
शोरगुल चहूंओर है
स्वच्छ वातावरण लाएं।

घृणा,लोभ,क्रोध,ईर्श्या
मन सबका दूषित है।
अच्छे विचारों से हृदय
निर्मल पावन बनाएं।

स्वरचित- निलम अग्रवाल, खड़कपुर.

स्वरचित :- राठौड़ मुकेश

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