Monday, November 4

"सरस""11अक्टुबर 2019

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ब्लॉग संख्या :-532
विधा-- मुक्तक छंद
प्रथम प्रस्तुति


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नीरसता में नीर बहाये
सरसता में फूल उगाये ।।
कैसे करूँ व्याख्या मन की
जो अहसास हमने पाए ।।

कितने खरपतवार उखाड़े
कितने अभी भी हैं ठाड़े ।।
सरसता का दामन पकड़े
कर रहे हैं वारे-न्यारे ।।

रसविहीन नही फल भाये
रसविहीन नही पल भाये ।।
हर कारज में गान 'शिवम'
ऐसी संस्कृति हम पाए ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 11/10/2019

मोती
विषय सरस
विधा लघुकाव्य

11 अक्टूबर 2019,शुक्रवार

सरसमयी होता जग जीवन
गरल कभी इसमें न घोलो।
सोचो समझो सस्वर वाचन
मधुर वाणी जिव्हा से बोलो।

जग अद्भुत जीवन अद्भुत है
मन में सदा बहे समरसता।
बैर भाव लोभ लालच कुंठा
त्याग करो नित रहे सरसता।

भक्ति जग मुक्ति का साधन
परमानन्द सदा रस मिलता।
भ्रमर भक्त सरस रस स्वादन
जीवन कभी नही है खलता।

होता जीवन सुधामय सागर
सब कर्मो पर सुख आधारित।
स्वर्ग नरक सब इस जीवन में
स्नेह अमीय सरस अपरिमित।

स्व0 रचित मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

11 /10 2019
बिषय,, सरस,

जहाँ साथ अपनों का हो
सरस हो जाता जीवन
सुखद जहाँ परिवेश हो प्रफुल्लित रहता है मन
सदभावना स्नेह की बहती हो अविरल धार
शुद्ध शाश्वत हों जहाँ आचार विचार
लगता है यूं ज्यों ऋतु बसंत हो मन भावन
दुख सुख दोनों का मिलकर हो आगम निगम
सौहार्द समानता का हो जहाँ पर संगम
ऐसे ही जैसे वरषा में लगता सावन
सरस सहजता से ही.बनते हैं. मधुर संबंध
उनकी जिंदगी में बस रहता है आनंद ही आनंद
जैसे ऋतुओं में बसंत ऋतु है मनभावन
स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार

दिनांक ... 11/10/2019
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तू लाख दुआ कर ले मुझसें दूर जाने की।
मेरी मन्नत उसी खुदा से है तुझे पास लाने की॥
देखेगे हम भी किसकी दुआओं मे असर है।
तेरी नफरत जीतती है की मोहब्बत मे असर है॥
***
आँखो की मेरी भाषा वाणी से भी सरस है।
तुम दिल मे तो आओ मेरे ये जन्नत से ना कम है।
तू लाख दुआ कर ले मुझसे दूर जाने की।
शेर की मन्नत उसी खुदा से है तुझे पास लाने की॥

शेर सिंह सर्राफ

11/10/2019
शीर्षक-सरस


छंद भद्रिका-(र,न,र)

कामना सरस पावनी,
वाष्प संग मनभावनी।
बूंद- बूंद जब मानिनी,
श्रावणी मधुर यामिनी।।

उर्वशी सुखद मेदिनी,
सार से गठित स्वामिनी।
दृश्यता मधुर धारिणी,
धूल हीन गज गामिनी।।

शालिनी अग्रवाल
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

भावों के मोती
शुक्रवार

11/10/2019
विषय -सरस

जिसमें मिल जाये
सब रस वही तो है
सरस , जिसके लिए
रहा मानुष तरस
दाल रोटी जहाँ
होती थी सादा
भोजन
जिसे खाकर
होता मन प्रसन्न
आज व्यंजन
के प्रकार बहुत है
पर सरस उनमें
कुछ नहीं
आज सौंदर्य
प्रसाधन बहुत है
पर प्राकृतिक
सुंदरता के
सम्मुख सरस
कुछ नहीं
व्यक्ति का व्यवहार
बहुत है पर दिखता
किसी में सरस
व्यक्तित्व नहीं
परत दर परत
चढ़ाकर
हो गया सरस
जटिल....
स्वरचित
शिल्पी पचौरी


गीत तुम संगीत तुम तुम ही गन्धर्व गान हो।
प्राण मन संकल्प तुम तुम ही प्रज्ञा ज्ञान हो।


तुम ही धुन बांसुरी की ताल का तुम थाप हो।
आलाप सा आरम्भ हो संगत सा अवसान हो।

गीत का मुखड़ा कभी और कभी हो अन्तरा।
राग हो वीणा का तुम सुर का तुम उपमान हो।

एक सरस बन्दिश हो तुम ताल की हो गमक।
नाद स्वर राग तुम तुम ही लय और तान हो।

स्वरचित विपिन सोहल

विषय-सरस
11-10-2019


नव निर्मित रचना
"कविता "विषय पर कविता
**************************हरिगीतिका छंद आधारित,,, गीतिका
******
2212 ,2212,2212,2212-माप
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कविता *सरस* मन भावनी,कवि के हृदय की स्वामिनी!
कवि-मानसी "वीणा" सुस्वर सी,झंकृता ज्यों रागनी!
+
शुचि शब्दिका,मधु कल्पना की सरसता से महकती,
करती हृदय आनंदमय,बहती अमिय-मंदाकिनी!
+
ये शारदे की ज्ञानदा,सदभाव की है साधिका,
प्रस्फुटित मन की चेतना है,रौशनी ज्यों दामिनी !
+
भाषा सरल गतिमान हो,हिन्दी सृजित हो छंदिका,
मन मोहिनी,मन मुग्धिता,कविता बने जग पावनी !
+
कविता प्रबल,सुजला,सुफल,ज्यों ज्ञान दानी शारदा ,
सुंदर,सरस,कोमल,विमल,संचारिका शुभकामनी !
+
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ब्रह्माणी वीणा हिन्दी साहित्यकार
#स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

दिनांक-11/10/2019
विषय-सरस


सरस बने प्रभु सरस बने....
सरस मेरा है जीवन
ना औपचारिकता ना पाखंड
जैसा जीवन वैसा लेखन
शख्सियत में गर्माहट
शीतलता में नरमाआहट
आलोचना की अकुला आहट
लेखनी में है अदम्य सरस साहस
कालजई रचना में संतृप्त आहट
सरस बने प्रभु सरस बने......

मौलिक रचना
सत्य प्रकाश सिंह प्रयागराज


दिनांक 11/10/2019
विषय:सरस

विधा: दोहा वली

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
सरस लोग चाहे सभी,है सबका अरमान।
मिल जाए हर मोड़ पर,रक्खें सबका मान।।

भावों से परिपूर्ण हो,आज लिखूँ जो काव्य ।
बैठी हूँ गढने अभी,गुणवाचक हो काव्य ।।

सरस विषय देकर हमें, मन में जागे भाव।
सुबह सुबह लिखने लगी,भर के सारे घाव ।।

सरस स्वाद हर भोज में, घुला हुआ है प्यार ।
भोज बना यदि क्रोध में, कर देता है रार।।
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स्वरचित
नीलम श्रीवास्तव

विषय -सरस
दिनांक 11- 10- 2019
आशीष यही देना प्रभु, सरस सदा बने रहे हम।
बड़ों के आशीष से कभी,वंचित ना रहे हम।।

सही राह दिखा सदा, मार्ग प्रशस्त करेंगे वो।
उन्हीं के मार्गदर्शन चलकर, बड़े बनेंगे हम।।

बड़े होकर कभी भी,अहम ना करेंगे हम।
अपनों संग सदा,सरस बन प्रेम से रहेंगे हम ।।

अहम जब आ जाएगा, सब कुछ खो देंगे हम।
रावण से ना सीख ली, विनाश न्योता देंगे हम ।।

अपनी गलती की सजा, अपनों को भी देंगे हम।
सरस बन सबका जीवन, खुशहाल करेंगे हम।।

संस्कारों की सरस बेल से, जीवन स्वर्ग बनाएंगे।
बड़ों को सम्मान दें, आशीष उनका पाएंगे।।

कहती वीणा सरस बन, प्रसिद्धि पा लेंगे हम।
कोई बिसरा ना पाएगा, ऐसे काम करेंगे हम।।

वीणा वैष्णव
कांकरोली

कपोल
नहीं किसी का कोई मोल
मेरी प्रीत का हो सिंगार

तुम जीवन की सरस धार

है क्षीण कटि औ रंग धवल
मुस्काती सी यूँ लगो नवल
तुमसे ही जग हुआ उजार
तुम जीवन की सरस धार

तुम सावन की मधुर बयार
तुम ही हो मधुरिमा उपहार
तुम ही जीवन का आधार
तुम जीवन की सरस धार

तुम मन का बसंत बहार
ह्रदय से छलके है प्यार
प्रेमभाव का तुम उद्गार
तुम जीवन की सरस धार

मीनाक्षी भटनागर
स्वरचित

11/10/2019
विषय-सरस
=
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शुद्ध विचारों से पूरित शुभ संकल्प
सहज विवेक बुद्धि से युक्त सभी जन
सरस रसभीनी मीठी वाणी वाले प्राणी
पशु से भिन्न विवेकवान मनुज कहलाते हैं

अनुराग सभी को मिलता है
सरस ममतामयी प्रकृति का
कण कण में प्यार छलकता है
सरस धार सा झरना झरता है
रूप,गुण, धर्म कोई भी हो
सरस सरिता में हम सभी बहते जाते हैं

आत्म मंथन करने का यही समय है
सद्गुण सद्भाव ही वास्तविक धन संचय है
नीरस जीवन भी क्या जीवन है
सरस वाणी,सरस जीवन अनामय है
निर्मल मन हो तो सरस साहित्य सहज ही प्रस्फुटित हुआ करते हैं....!!

**वंदना सोलंकी**©स्वरचित®
11/10/2019::शुक्रवार
विषय--सरस


मोरे हिय मा बसौ घनश्याम!!
कर वंशी मुस्कान अधर पर,, मोहक ललित ललाम
मोर मुकुट कटि काछनि साजै,नैनन छवि अभिराम
चरण-धूल मस्तक पर राखूँ, मैं वृन्दावन धाम
निरख रहूँ बस तोरा मुखड़ा,और न कोई काम
छमछम छम बरसति ये अँखियाँ, सरस बहै अविराम
हेरत हेरत नयन थकाने, भइ जीवन की शाम
तुम बिन मोहन श्वास न आपन, काय करूँ यह चाम
नयन मूँद बैठूँ चरणन महि, देउ मोहि विश्राम
भक्ति भाव आकण्ठ सरोवर, भरा रहे निष्काम
रजनी रामदेव
न्यू दिल्ली

11/10/2019
विषय:---सरस

विधा :---"चोका"
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सरस वाणी
मंत्रमुग्ध करती
नेह की आली
कर्णप्रिय लगती
क्लेश हरती
मन वास करती
रूह समाती
शीतलता प्रदात्री
रस से भीगी
पाषाण मन में भी
प्रेम जगाती
रसधार बहाती
द्वेष, दूराव
हिंसा और जलन
दूर भगाती
सबको वो लुभाती
मधुरिमा कहाती ।।

स्वरचित पूर्णिमा साह
पश्चिम बंगाल ।।

विषय-सरस
दिनांकः 11:10:2019

शुक्रवार

आज के विषय मेरा प्रयास:

मधुर वाणी,मधुर संगीत,
सबके मन को ही भाते।
माँ की ममता समर्पण,
दुनियाॅ में कहीं नहीं पाते ।

कल कल छल छल सरिता बहे,
मन बरबस ही हमारा खींचती ।
सरस गीत संगीत सदा ही ,
सबके मन को हर्षित करती ।

जीवन होता रस से युक्त सदा,
कभी नीरसता जीवन नहीं ।
नीरस जीवन मुरदा समान ,
जीवन में रौशनी, रौनक नहीं ।

प्रकृति का निर्मल रूप सदा,
सरस मनोहर ही होता ।
प्रेम ह्रदय की सुंदरता ही,
सरस सहज मन मोहता।

शीतल कोमल और मनोहर,
रूप सदा सबको भाता ।
सहज भाव और मन पावन,
सरस सदा आनंद झरता।

स्वरचित
डॉ एन एल शर्मा जयपुर
(डॉ नरसिंह शर्मा 'निर्भय ,जयपुर )
चयन के लिए
दिनांक-११/१०/२०१९
शीर्षक" -सरस"

सायली छंद
है
मस्त सरस
सदाचारी महत्त्वाकांक्षी अनुरागी
आचार कुशल
जिंदगी।

२)
तू
सदा सरस
अलौकिक कलानिपुण महापुरुष
कमल नयन
घनश्याम।

स्वरचित आरती श्रीवास्तव।

आज का विषय, सरस
दिन, शुक्रवार

दिनांक, 11,10,2019

जीवन को सरस बनाने की,
कोशिशें सभी नाकाम हुईं ।
जिंदगी लगी अनबूझ पहेली,
सुलझाई जितनी उलझ गई ।

चाहत महके गुलशन की थी,
सब राहें काँटों से भरीं मिलीं ।
रिश्तों में चाही सरसता ही थी,
कटु आभासों की फसल उगी।

आँखे दौलत की थीं चमकीली,
ऐसे दिल की दुनियाँ बेनूर हुई।
रहे दिल के गीत सरस कभी,
वो मधुरताअबअंह में खो गई।

कृत्रिमता के युग की कहानी,
सामूहिक चर्चा का विषय हुई।
मिल पाती नहीं कथनी करनी,
मूरत सरसता की काफूर हुई।

शेष है सरस अभी हरि नाम ही,
पर पावन मन की अब कमी हुई ।
बढ़ गई आसक्ति क्रोध लोभ की,
फिर वो सरसता भी दुर्लभ हुई।

ये खेल हमारा हम ही खिलाड़ी,
अब ढूँढें हम गलती कहाँ हुई ।
तब सरस हुई जग में जिंदगानी,
जब भावना हमारी सरस हुई ।

स्वरचित, मीना शर्मा, मध्यप्रदेश

Damyanti Damyanti 
विषय_ सरस|
मन बहते भाव सरस |

तन प्रफुल्लित होता |
जब बहती सरस संगीत सरिता |
शुद्ध सरस भावो से आते संस्कार |
इनसे बनता परिवार सुखद संसार|
बहे प्रेम व्यवहारिक सदभावनाऐ |
मानव बनता देव ,सात्विक गुणी |
हम सब मे आये सरस संस्कार संस्कृति तो देश होगा स्वर्णिम शिखरस्थ |
स्वरचित__दमयंती मिश्रा

विषय - सरस
11/10/19

शुक्रवार
गीत

पहला-पहला प्यार हृदय का
पुण्य कोष बन जाता है,
जीवन के उदास लम्हों को
भी वह सरस बनाता है।
पहला - पहला प्यार हृदय का......

मन उन सुन्दर यादों में
इस कदर मगन होता क्षण में,
गम की किसी चुभन का फिर
अहसास नहीं रह जाता है।
पहला - पहला प्यार हृदय का......

आँखों के आगे वे प्यारे
दृश्य घूमने लगते हैं ,
प्रियतम के संग वादों का
सिलसिला याद आ जाता है।
पहला - पहला प्यार हृदय का......

मधुर चाँदनी रातों में
झिलमिल तारों के गगन तले ,
एक- दूजे के लिए गुनगुनाने
का पल याद आता है।
पहला - पहला प्यार हृदय का......

नहीं भुलाया जा सकता वह
प्रथम- प्रणय का अद्भुत क्षण,
जो जीवन को सदा प्रेम की
सरस राह दिखलाता है।
पहला - पहला प्यार हृदय का......

स्वरचित
डॉ ललिता सेंगर

उसकी एक झलक देखने को तरस गई हूँ
बिन बदरा की तरह बरस गई हूँ
कभी सूरत तेरी नजर आ जाये

बस इसी ख्याल में भरी सर्द रात में सरस गई हूँ .

उड गई हैं नींद मेरी
रात के पहर में जागी हूँ
यादों की बरखा में सिमटी हूँ
कभी तो सूरत तेरी नजर आये ख्वाब सजाये बैठी हूँ .

ये तो तुम्हारे चाहत के तोहफ़े हैं
नहीं तो गीत क्या हैं हमें क्या पता
अपनी रातें तबाह करके हमने लिखे तुम्हारे गीत
सरस महफ़िल में करा मोहब्बत का इकरार .
स्वरचित :- रीता बिष्ट

11/10/19
सरस
छंदमुक्त कविता


सरस सरल स्वभाव
मोरे कान्हा का
कभी बने
सखा सुदामा के

कभी बने भाई
बलदाऊ के
कभी बने प्रेमी
राधा के
घूमे वृन्दावन
गोपियन संग

करते बाते सरस
मगर होती
शिक्षाप्रद वह
है नन्हे
कोमल से
पर है कठोर
दुश्मन के
कंस , कौरवों
का किया अंत

बन जाते बालरूप
भक्त संग

ऐसे मोरे
सरस कान्हा जी
करूँ नमन
बारम्बार

स्वलिखित
लेखक संतोष श्रीवास्तव भोपाल

11/10/19
विषय-सरस।


घुमड़ता मेघ,
मल्हार गा रहा
मदमाती बूंदों का
श्रृंगार गा रहा
सरसती धरा का
प्यार गा रहा
खिलते फूलों का
अनुराग गा रहा
कलियों का
सोलह सिंगार गा रहा
गूंचा-गूंचा महती
नज्मे गा रहा
रुत का खिलता
अरमान गा रहा
पपीहरा मीठी सी
राग गा रहा
मन मोर ठुमक-ठुमक
नाच गा रहा
नदियों का कल-कल
राग गा रहा
मदमाता सावन
फूहार गा रहा
भीना "सरस "
रस काव्य गा रहा।।

स्वरचित

कुसुम कोठारी।

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"जिम्मेदार"18नवम्बर 2019

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