Monday, November 4

"अनंत" "15अक्टुबर 2019

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ब्लॉग संख्या :-537
शीर्षक अनंत
विधा काव्य

15 अक्टूबर 2019,मंगलवार

नभ अनंत जलनिधि अनंत
ज्ञान अनंत भाव अनंत हैं।
शुभ सद्कर्म करो जीवन में
लक्ष्य प्राप्ति साधन अनंत है।

जीवन सोना नहीं होता है
जीवन होता सदा जागना।
सुख अनंत फैले जगति में
श्रेष्ठ नहीं सद्कर्म भागना।

आगे बढ़ो प्रगति के पथ
जीवन में लक्ष्य न भूलो
ज्ञान अनंत भव सागर में
खोजो फलो और फूलों।

परम् ब्रह्म स्वरूप अनंत
भक्ति से शक्ति मिलती है।
दिल से करो परम् वन्दना
खाली झौली माँ भरती है।

पंचतत्व अमर अनंत जग
अमर आत्मा सदा अनंत।
माया मोह साथ नहीं जाते
सबका स्वामी श्री भगवंत।

स्वरचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।
विधा-- मुक्तक छंद
प्रथम प्रस्तुति


संभावना अनंत हैं
साधन भी अनंत हैं ।।
चमकाइए किस्मत निज
आज हम स्वतंत्र हैं ।।

एक वो जमाना था
तरक्की भूल जाना था ।।
हुनर को हथकड़ी थी
हमें गँवार माना था ।।

वक्त है इसे जानिए
राह कोई ठानिए ।।
शिकायतें छोड़ के
लक्ष्य को पहचानिए ।।

वक्त की तेज रफ़्तार है
छेड़ना दिल के तार है ।।
किन्ही न किन्ही लयों से
हमारा सरोकार है ।।

साजिंदे सब मिलेंगे
राग भी नये बनेंगे ।।
किस्मत के सितारे 'शिवम'
हमारे भी चमकेंगे ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 15/10/2019

विषय-अनंत

अनंत अस्तबल में बैठा मेरा मन

अंतर्मन के प्रत्यूर से कहता.....
शून्य की गौरव गाथा प्रचंड
अनंत ही है पूर्ण उदर अंश
अनंत तारे , अनंत नक्षत्र
अनंत गगन, अनंत दीप्ति
अनंत मौन का आभास अंत
अनंत को जाने मस्त मलंग
अनंत है एक ज्वलंत प्रसंग
अनंत जीवन मरण का द्वंद
दर्द की अधीरता में अनंत
मुस्कानों की प्रतीक्षा में अनंत
प्रश्न जटिल है प्रत्यूषर से........

अंधेरों का एकाकीपन अनंत
क्यों उथला पुथला है मेरा मन
अनंत मर्म माया है आदि अंत
यह विवेकानंद का विजय स्तंभ

मौलिक रचना
सत्य प्रकाश सिंह प्रयागराज

शीर्षक-अनंत
15/10/2019


विधा- मनहरण घनाक्षरी

काम क्रोध बैर भाव द्वेष भीत दंड भाव
स्वार्थ के विनाश से ही, रामराज्य आज है।

साथ परिवार रहे शुभता विचार रहे
संतुलन भावना से, नर सुख साज है।

दायरे अनंत रहें शील सदा कंत रहे
क्षिति जल पावक में, श्रद्धा एक लाज है।

निश्छल सकाम रहे राजधर्म साम रहे
आज्ञाकारी आचरण, नीति धर्म काज है।

शालिनी अग्रवाल
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित


आज का विषय, अनंत
मंगलवार

15,10,2019 .

मानव मन
अनंत आसमान
मिला न अंत ।

ओर न छोर
कामनाएँ अनंत
नहीं है अंत ।

ईश अनंत
गहरा समुदंर
मन दर्पण ।

संत महात्मा
कल्याण की कामना
भाव अनंत ।

लोक हितार्थ
करते चरितार्थ
देव अनंत ।

मोह अनंत
शरीर परतंत्र
आत्मा स्वतंत्र ।

युग अनंत
आवागमन तंत्र
आत्मा अमर ।

सेवा अनंत
प्रकृति चमत्कार
प्राणी जीवन ।

सृष्टि नियंता
संभावना अनंत
कर्मों का योग ।

भूखी जनता
भ्रष्टाचार अनंत
गायब संत ।

गद्दार खास
प्रलोभन अनंत
बिकें महंत ।

नकाबपोश
चारो ओर अनंत
लुटेरे कंत ।

स्वरचित, मीना शर्मा, मध्यप्रदेश

विषय -अनंत
दिनांक 15-10- 2019
तेरी याद सीने में बसा,अनंत सुख पाता है।
रह दूर तुझसे वो, तुझे यादों में सजाता है।।

प्यार करने वालों की, कद्र नहीं कर पाता है।
प्यार करने वाला,अनंत दुखों से गुजरता है ।।

कर दूर उनको वह, चैन से सदा सोता है ।
पर यादों से दूर, नहीं वह कर पाता है ।।

खोए रहते हैं यादों में, सदा ऐसा होता है ।
अनंत सुख वो इस तरह, यादों में पाता है।।

बुजुर्गों का रख सम्मान,वो खामोश रहता है।
दे प्यार की कुर्बानी, वह जग में जीता है ।।

बहुत मुश्किल दूर, प्यार में रहना होता है ।
अपनों को ना हो दुख, हर दर्द सहता है।।

अनंत दुःख सह जग में, देखो वह जीता है।
रख होंठों पर मुस्कुराहट, हर दर्द छुपाता है।।

नहीं समझता, कैसे दुख मैं जीवन जीता है।
वह जीवन भर सिर्फ, खून के आँसू पीता है।।

अपनी जिंदगी का हर पल वो, ऐसे बिताता है।
रह दूर उससे वो, अनंत दुख स्वयं को देता है

वीणा वैष्णव
कांकरोली


15/10/19
विषय-अनंत


अथाह सागर में, अनंत प्यास

सब अपनी चाल चले
मध्यम,द्रुत गति,
कोई रुके, ठहरे।

अथाह सागर में
मीन की प्यास की
कोई थाह नही
चले निरन्तर
किसकी तलाश
कोई नही जाने
ढूंढ रही है क्या ?

वो सुधा ! जो
सुर ,सुरपति,
ले के दूर चले
या उत्कर्ष करने
निज प्राण व्याकुल
गरल घट लखे
अनंत में यों डोले
फिर भी मन वेदना
का एक तार ना खोले
कब तक यूंही भटकेगी
प्यास अबूझ लिये ।

स्वरचित

कुसुम कोठारी ।

15/10/2019
विषय-अनंत
~
~~~~~~~~~~~~~
दिशा से परे है अनंत आसमाँ
सबके लिए है सारा आसमाँ
न कोई पश्चिम न ही पूरब
होता नीले आसमाँ के ऊपर

हम इंसानों ने बनायीं हैं
दिशाएं और सरहदें
भरोसा कर बैठे हम
अपने बनाए भ्रमजाल पर
इससे परे हमें
आता नहीं कुछ भी नज़र

हिसाब किताब गुना-भाग से
जब हम उठते ऊपर
बस रह जाता है तब शून्य भर
उस समय अनंत होता दृष्टिगोचर

स्वयं को जान लें हम
अपनी उस अंतिम
अनंत यात्रा पर जाने से पहले
यही शाश्वत यही सत्य
कहते धर्म ग्रंथ और ईश्वर ।।

**वंदना सोलंकी**©स्वरचित

15/10/2019
"अनंत"

################
शून्य में मन का विचरण
धड़कनों का स्पंदन.....
भावनाओं का स्फुरण...
संवेदनाओं में हुई हलचल
अनंत इच्छाएँ करे नर्तन।

चाहतों का जागरण..
नैनों का मौन रुदन....
ख्वाबों का आवरण...
अधरों का कंपन........
होता कोमल मन में ...
अनंत प्रेम का उद्गम..।

निश्छल प्रेम का संगम..
प्यारा प्यारा ये अनुभव....
मुस्कुराता जो दर्पण.......
भीगा-भीगा हो तन-मन...
महकता है जीवन......
खिल जाता उपवन...
रहता सदैव भरा-भरा..
अनंत आशाओं का दामन।

स्वरचित पूर्णिमा साह
पश्चिम बंगाल ।।

15 /10 /2019
बिषय, अनंत,

.मानव जीवन की अनंत कहानी
कभी गम की रात कभी सुबह सुहानी
कामनाओं वासनाओं का नहीं अंत
पूर्ण न होंगी जीवन पर्यंत
आधुनिक संसाधनों के ह़ गए गुलाम
संचय में व्यस्त तनिक भी न आराम
भौतिक सुखों के लिए बैचैन है आदमी
जाने क्यों इतना परेशान है आदमी
बुलबुले सी जिंदगी के लिए बेईमान है आदमी
स्वयंभू बना हुआ नादान है आदमी
क्या साथ लाए क्या लेकर जाना है
हाथ पसारे आए हाथ लटकाए जाना है
स्वरचित,सुषमा ब्यौहार

विषय अनंत
विधा तांका

***
इच्छा अनंत
क्यों जीवन पर्यन्त
कहाँ है अंत !
मन करें बसंत
प्रभु सत्ता अनंत

प्रेम अनंत
जैसे नभ अनंत !
धरा अनंत
में शून्य कण हम
हो विस्तार अनंत ।

स्वरचित
अनिता सुधीर

तिथि _15 /10/2019/मंगलवार
बिषय ____अनंत

विधा _ _ काव्य

कहां तलाशें तुम्हें हम भगवन
अनंत अगोचर हो परमेश्वर।
ढूंढ रहे जिन्हें गली कूचों में
क्यों नहीं हो पाते दृष्टिगोचर।

भूल गये हम हस्ती इनकी
पले बडे हम मस्ती अपनी।
जो नर नारायण में समाये
अनंत संभावनाऐं देखें अपनी।

प्रभु एक तीर से सागर सोखें,
एक बाण से भवफंद काट दे।
होती टेडी निगाह जब इनकी
अनंत काल तक हमें बांट दें।

अनंत पथ उन्नति के दिखते
जितना चाहें हम सब करलें।
रखें आस्था हम अखिलेश्वर
चाहें जितनी चोटियां चढ लें।

नित संघर्ष करें डरें नहीं हम
अनंतकाल तक नाम कमाऐं।
दौड रही यह दुनिया कब से
बहुत समय तक इसे बढाऐं।

स्वरचित
इंजी शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय मगराना गुना मध्य प्रदेश

15/10/19
विषय अनंत


'अनन्त' गुण
विज्ञान जगत के-
विश्व विकास

गणित क्रिया~
शून्य से संख्या भाग
'अनन्त' होवै

'अनंत' होती
परमात्मा की कृपा-
संसार-सृष्टि

'अनन्त' रूप
प्रभु श्री नारायण-
सृष्टि पालक

'अनन्त' इच्छा
मनुष्य में जागती-
आत्म सयंम

झकझोरते
सवाल मनुष्य को -
'अनन्त' दृष्टि

मनीष श्रीवास्तव
स्वरचित
रायबरेली

दिन :- मंगलवार
दिनांक :- 15/10/2019

शीर्षक :- अनंत

अनंत में डूबा हुआ..
मन हुआ है अशांत...
ठहर गया वक्त भी..
तन हुआ है क्लांत...
तक रहा रश्मि रथ को..
बैठकर भूमंडल पर..
छा रही मूर्छा घनी..
शिथिल मुखमंडल पर....
उठेगा ज्वार फिर एक...
शांत जलधि के पाट पर...
मैं लिख दूंगा गीत कोई...
काल के कपाट पर..
खिलेगा फिर हर मधुवन...
भँवरों के गुँजन से..
महकेगा आँगन फिर...
तुलसी से संदल से..
न हारा हूँ न हार मानी...
सदा नभ छूने की है ठानी...
उठेंगे फिर उसी उम्मीद से...
बीत जाए चाहे रवानी..
उम्मीद अभी तक जिंदा है...
मन तो भटकता परिंदा है..
हारा वही जो लड़ा नहीं..
जीता वही जो जिंदा है...

स्वरचित :- राठौड़ मुकेश


15अक्टूवर19मंगलवार
विषय-अनन्त

विधा-हाइकु/तांका
💐💐💐💐💐💐
जीवन यात्रा

अनन्त की सफर

मिले न मुक्ति👍
💐💐💐💐💐💐
मोक्ष की प्राप्ति

जीवन सफर में

कभी मिलेगा?👌

आदि-अनन्त तक

तय नहीं लगता💐
💐💐💐💐💐💐
श्रीराम साहू अकेला
भावों के मोती
मंगलवार

15/10/2019
विषय अनन्त

साँस है तो जीवन है
जीवन है तो आस है...
अपूरित तमन्नाओं व
बड़ी बड़ी कामनाओं का
पुलिंदा है...जीवन!!!!

बिना पाँखों के
अनन्त आकाश को छूने की
तृष्णा है ....मन!!!

कल्पनाओं के सागर में डूबना
यथार्थ के पर्वतों को पार करने का
हौंसला है....तन!!!!

जब तक जीवन है
तन और मन को खुश रखने की
कोशिश है...अमन!!!!

रजनी रामदेव
न्यू दिल्ली

अन॔त

जिसका न हो
कोई अंत
वही होता है
अनंत
ब्रह्मांड अनंत
सृष्टि अनंत
देव अनंत
ईश पक्षिय है
अनंत

मन की
चंचलता अनंत
इच्छाऐं अनंत
लालच अनंत
कुचेष्टाऐ अनंत
घोटाले अनंत
भ्रष्टाचार अनंत
अशान्ति अनंत
बीमारियां अनंत
मानव पक्षिय है
ये अनंत

जन्म से अंत
तक का सफर है
जीवन यात्रा
जब खत्म हुआ सफर
हो गयी शून्य जिन्दगी

स्वलिखित
लेखक संतोष श्रीवास्तव भोपाल

विषय:-अनंत
विधा:-स्
वतंत्र लेखन

जिन्दगी से फिर मुलाकात हुई
फिर वो ही बात हुई.........
अनंत अपेक्षा और उम्मीदें जो जन्म लेती हैं एक पल में चूर
पर मन ? मन कहाँ मानता है ?
वो तो आकार लेता रहता है ।
और आँखों को सजा झेलनी पडती है।
एक औरत समझौते ही तो करती है अपनों से अपेक्षा करके फिर चाहे दम ही क्यों न घुटे।
लाज ,शर्म और सहनशीलता की मूरत जो ठहरी,
फरेब और दोगली जिन्दगी जीते हैं न सभी ?
समाज में साफ सुथरी छवि और और मन में अनंत उथल पुथल करते विचार, और और कहीं कहीं उनको आकार भी मिल जाता है
न न न ये तो पुरूष के लिए सम्भव है न .......

हाँ अगर कोइ स्त्री अगर ऐसा करती है तो वो चरित्रहीन की संज्ञा में आ जाती है।
क्यों कि उसके लिए दायरे सीमित हैं

वह हँसती भी है तो पुरूष उसमें सम्भावना तलाश करने लगता है
और स्त्रियों की नजरों में वो निहायती स्वतंत्र बेवाक नजर आती है ।
अफसोस ये पुरुषों की और समाज की बनाई दायरों की दुनिया ।

काश समझ पाती ये दुनिया कि पुरूष से स्पर्श नहीं सबल चाहिए होता है जो ये कहे कि मैं हूँ।...

तुम्हारे हर कदम के साथ, वो सम्मान उसकी नजरों में इतना चाहती हैं कि कोइ इल्जाम अगर दे तो उसकी नजर नहीं बदले
प्यार जैसा है वैसे ही बना रहे।
कभी वो अकेली होकर भी अकेलापन महसूस न करे ।

स्वरचित

नीलम शर्मा # नीलू

दिनांक-15/10/2019
विधा-हाइकु (5/7/5)
िषय:-"अनंत"
(1)
तन को छोड़
निकल गई आत्मा
अनंत यात्रा
(2)
मरते दम
अभिलाषा अनंत
अधूरे स्वप्न
(3)
स्वार्थ बेकाबू
धरती की झोली में
अनंत आँसू
(4)
जोड़ न बाकी
भावनाएँ अनंत
प्रेम में साकी
(5)
आशीष छाँव
अनंत आशीर्वाद
बुजुर्ग हाथ

स्वरचित
ऋतुराज दवे

बिषय- अंनन्त
अनन्त आकांक्षाएं

एक पूरी होती तो
दूजी खड़ी होती सर उठाए।
भ्रमित मन की दिशाएं।
शानो-शौकत की होड़ में
हर इंसान बना बाबला
संवेदनाऔं को भूला
साजो-सामान की कद्र
अपनों से नहीं कोई रिश्ता।
देख बदलते दुनिया के ढ़ंग
व्याकुल होकर हृदय
आत्मियता को ढूंढ रहा
जो हो गई है लापता।
स्वरचित- निलम अग्रवाल, खड़कपुर

II अनंत II नमन भावों के मोती....शुभ रात्रि...

मन चल तू अब अंत की ओर...

बस पग एक अनंत की ओर...

शान्ति अशांति लोभ और क्षोभ...
हो मोह या विछोह की डोर....
किसकी किसके साथ है भोर...
नहीं स्थायी किसी को ठौर...
मन चल तू अब अंत की ओर....

ज़िंदा जीवन लगे ज़हर है....
मौत का पहरा हर पहर है...
कितने अर्थ अनर्थ यहां पर...
अपने ऊपर कैसा कहर है...
मन चल तू अब अंत की ओर....

राग विराग बहाव अनंत है...
'मैं' और 'वो' दोनों अनंत हैं...
अंत निहित अनंत का अंत है...
मैं के अंत में मिलता कंत है....
मन चल तू अब अंत की ओर...
बस एक पग अनंत की ओर...

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II
१५.१०.२०१९

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"जिम्मेदार"18नवम्बर 2019

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