Monday, November 4

"नारी श्रृंगार"17अक्टुबर 2019

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ब्लॉग संख्या :-539
दिनाँक-17/10/2019
शीर्षक-नारी श्रृंगार


सज धज कर खड़ी मैं
करके सोलह श्रृंगार
कब की खड़ी बात में
आओ मेरे भरतार।

करवा चौथ मनाने को
माँगू न गले का हार
एक तमन्ना दिल मेरे की
पाऊँ पिया तेरा प्यार ।

हार श्रृंगार सब फीके हैं
मिले न पिया का प्यार
एक दुआ माँगू रब से
सुखी रहे मेरा संसार।

आज करवा चौथ है
तुम बैठे इतनी दूर
आओ पिया संग मेरे
भरो मेरे मांग सिंदूर ।

सोलह हैं नारी श्रृंगार
पिया बिन सब बेकार

***************
स्वरचित
अशोक कुमार ढोरिया

विषय नारी सृंगार
विधा काव्य

17 अक्टूबर 2019,गुरुवार

सृंगारित होकर सुहागनें
पतिव्रत धर्म सदा निभावे।
पैरों में बिछिया और पायल
कटि किंकिनी अति सुहावे।

रचे महावर कर कमलों में
कंगन चूड़ी सदा खनकती।
दमक रही हीरे की अंगूठी
स्वर्ण श्रृंखला गले खेलती।

शीशफूल सिर शौभित है
बाजूबन्द बाँह अति राजे।
माथे पर चन्दा सी बिंदिया
सुंदरी हार गले में साजे।

नाक में नथनी कर्ण लटकन
सुमन चमेली जूड़ा बालों पर।
निराहार निर्जला निर्मल मन
मधुर मुस्कान सदा गालों पर।

यह पूरब की पतिव्रत नारी
सात जन्म वचन निभाती।
पति हेतु यमराज से लड़ती
विपदाओं से नहीं घबराती।

मिट्टी के करवे का जल पी
चलनी से पिया मुख निरखे।
करवा चौथ पावन दिन पर
दोनों मिलकर वे अति हरखे।

स्वरचित, मौलिक
गोविंद प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।


दिनांक:17/10/2019
विधा: हाइकु

विषय:स्त्री श्रृंगार

लज्जा ओढनी
सकुचाई अखियाँ
नारी श्रृंगार ।

धर्म निर्वाह
संस्कार व संस्कृति
हो स्त्री श्रंगार।

शिक्षण पूर्ण
पति कदम ताल
है स्त्री श्रृंगार ।

करवा चौथ
स्त्री सोलह श्रंगार
चाँद अर्चना

शादी का जोडा
सीता स्त्री श्रृंगार
चाहत राम।

शिव पार्वती
तपस्या स्त्री श्रृंगार
पति स्वरूप ।

आस्था विशेष
परिवार का सुख
स्त्री के श्रृंगार ।

विद्या श्रृंगार
धारण करती स्त्री
कीमती रत्न।

स्वरचित
नीलम श्रीवास्तव लखनऊ उत्तर प्रदेश

प्रथम प्रस्तुति

नारी है प्रकृति की सुन्दर कृति प्यारी ।
नारी बना कुदरत ने सृष्टि विस्तारी ।
नारी श्रंगार नारी कि शोभा न्यारी ।
नारी का योगदान जाने संसारी ।

नारी ने समर्पण से जग को जीता ।
इसी भाव से पूज्य है वो ज्यों गीता ।
नारी न होती 'शिवम' जग रहता रीता ।
समृद्ध है वो घर जहाँ सजी परणीता ।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 17/10/2019

🌳शुभाशया करवा चतुर्थी🌳
शीर्षक- सोलह श्रृंगार।
🌷🌷🌷
🌷🌷🌷🌷🌷
बहनों का सिंदूर रहें नित शोभा।
पाय मे नित माहवर ललिमा।।
पायल की झंकार आंगन झनके।
पति की छत्रछाया में सदा रहो।।
आज्ञाचक्र पर बिन्दु शोभितम्।
हस्त में नित शोभे कंचुकीका।।
ओष्ठराग की कभी लाली न छुटे।
नेत्र पटल पर कज्जल लकीर।।
सोलह श्रृंगार अभिर्भूत रहो नित।
सौभाग्यशालनीम् सौभाग्यकांक्षणी।।
🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩
स्वरचित
राजेन्द्र कुमार अमरा
१७/१०/२०१९@०८:१५

भावों के मोती
बिषय- नारी श्रृंगार


यूं तो हया ही है सच्चा नारी श्रृंगार।
मगर करती है वो सोलह श्रृंगार।।
बिंदिया,कजरा,झूमका, कंगना
बिछिया,पायल, हार, चूड़ियां
सिंदूर,मेंहदी,गजरा,लाली से
बड़े जतन से सजाती अपनी देह को।
मोहक मुस्कान लिए अधर पर
करती करवा चौथ का व्रत श्रद्धा से
पिया की लम्बी उम्र की कामना लिए।
नारी के निश्छल प्रेम और त्याग का
प्रतिक है यह पर्व करवा चौथ का।
दिन भर अन्न-जल के बैगेर रहती
रात को चाँद को देखकर और
पिया के हाथ से जल पीकर व्रत तोड़ती।

स्वरचित- निलम अग्रवाल,खड़कपुर


नमन भावों के मोती
17/10/2019:: वीरवार
विषय-- नारी श्रृंगार

***********************************

फिर आज किया श्रृंगार प्रिये
दुल्हन सा हुई ....तैयार प्रिये
यूँ तो हर दिन है ...तेरे लिए
पर ये दिन है उपहार प्रिये....

मेहँदी से रचे है हाथ मेरे
कंगन भी पहने लाल प्रिये
मांग मेरी सिंदूरी है और
भाल पे टीका लाल प्रिये....

पाँव सजे बिछुए पायल
और लगा महावर लाल प्रिये
दर्पण संमुख मै इतरायूं
सिर ओढ़ चुनरिया लाल प्रिये....

मेरे हाथ पूजा की थाली है
उसपर है लाल रुमाल प्रिये
छलनी भीतर चन्दा देखूँ
आज चन्दा भी है लाल प्रिये....

करवाचौथ के व्रत की मैं
राह तकूँ हर साल प्रिये
तेरी ही सुहागन कहलाऊँ
तुम जिओ हज़ारों साल प्रिये....
रजनी रामदेव
न्यू दिल्ली

Uma Vaishnav 🙏 
दिनांक :- 17/10/19
विषय :- श्रृंगार
आओ रे सखी श्रृंगार करें,
मिल-जुल कर श्रृंगार करें,आओ रे सखी ....

कंगन - चूड़ी - बिंदियां ला दें,
लाल रंग की चुन्दडी मंगवा दें,
मिल - जुल कर श्रृंगार करें आओ रे सखी ......

मेंहदी - काजल - सूरमा ला दें,
मांग में अपनी सिन्दूर सजा दें,
मिल - जुल कर श्रृंगार करें आओ रे सखी .......

पायल - झूमका - हार ला दें
गले में मंगलसूत्र बाँध कर ,
मिल - जुल कर श्रृंगार करें, आओ रे सखी .....

व्रत सुहागों वाला रख दें ,
चाँद को अपने छत पर तक लें,
मिल - जुल कर मंगल - गान करें, आओ रे सखी .....

आओ पिया अब तुम भी आओ,
करवा चौथ का ये व्रत खोला दो,
कब से हम इंतजार करें...आओ... रे सखी ....

उमा वैष्णव
मौलिक और स्वरचित

बांध लें बंधन में मुझको प्रीत के तू प्यार के।
रंग तुम पर हों निछावर, रूप के श्रंगार के।


बंध के बंधन में तुम्हारे रंग है मन के निराले।
खेल प्रिय मुझको तुम्हारे है जीत के हार के।

तन समर्पित मन समर्पित हैं अवशेष क्या।
सार्थक जीवन किया मैंने तुम्ही पर वार के।

श्वास के अवरोह से मन का स्पनदन कहे।
संग संग चलते हुए गीत हम गाएं प्यार के।

प्रेम ही पूजा मेरी और प्रेम ही निष्ठा मेरी।
डिग न पाए मन कभी कोप से संसार के।

स्वरचित विपिन सोहल


17/10/2019
विषय-नारी श्रृंगार
💐
🌷💐🌷💐🌷💐

जानती हूँ कि आयु ईश्वर द्वारा नियत है
फिर भी तुम्हारी लंबी आयु की कामना हेतु व्रत करना मुझे अच्छा लगता है

चाँद का वैज्ञानिक रूप भी जानती हूँ
फिर भी चाँद में तुम्हारी छवि निहारना
मुझे अच्छा लगता है

तुम शरारत से मुस्कराते हुए छलनी के पीछे से जब मुझे देखते हो,
तुम्हारा यूँ छेड़ना मुझे अच्छा लगता है

जानती हूं मेरा अर्घ्य चाँद तक नहीं पहुँचेगा
तुम्हारे हाथों से दो घूंट जल ग्रहण करना
मुझे अच्छा लगता है

उम्र के इस पड़ाव पर भी नई दुल्हन सा साज श्रृंगार करना मुझे अच्छा लगता है

'साज श्रृंगार बिना भी तुम क्या खूब लगती हो'
तुम्हारे मुंह से मेरे लिए'मेरा चाँद" कहना मुझे अच्छा लगता है।

पति बिन नारी का श्रृंगार अधूरा फीका सा
लगता है
संग तुम्हारे हर त्यौहार मनाना मुझे अच्छा लगता है ।।

**वंदना सोलंकी**©स्वरचित®

तिथि _17/10/2019/गुरुवार
विषय_ नारी श्रंगार

विधा _ क्षणिकाऐं

1)
नारी श्रंगार
मन लुभावन
मगन भरतार
उबटन बदन
मेंहदी महावर
मांग भरी सजना
चांद निहारूं
2)
आओ वलमवा
बाट जोहती
तुम्हें मोहना
सोलह श्रंगार
कंगन नूपुर
कुमकुम बिंदिया
अंगना बैठी
अनुपम वहार
3)
ईश उपहार
सजन सुहावन
रूप उन्माद
कंचन काया
चंदन महके
पायल छमके
पिया मनुहार
4)
प्रीतम प्यार
सजकर तकती
बनिता वहार
सजन श्रंगार
परमेश उपकार
5)
जीवन समर्पण
श्रंगारित हुई
भावना संगम
नार सुहावन
प्रियतम प्यारे
लाल चूनरिया
आओ सनम
बुलाऐ सजनिया
बनी दुल्हनिया ।

स्वरचित
इंजी शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना मध्य प्रदेश


17/10/19
विषय-नारी शृंगार।


ओ सुनयनी सरोजिनी गूजरिया
चंचल चपल नैन सोहे कजरिया
ज्यों बादर बीच चमके बिजुरिया
ललाट शोभित चंदा सी रखरिया।

तीखी नासिका दमके नथनिया
अधर गुलाब मधुर मुस्कनिया
ग्रीवा सुडौल सजत नौलखिया
कान सुघड़ झुमका झनकईया।

बांह चम्पई खन खनकत चुरियां
लचकत कमर बांध करधनिया
केशरी लहंगा रतनार चुनरिया
चलत छमकत पांव पैजनिया ।

पनिया भरन आई पनघटिया
शीश कलश माटी की झरिया
ताल पोखरे रीते, सूखी दरिया
अब तो पानी बरसा मन हरिया।

स्वरचित
कुसुम कोठारी।

१७/१०/१९
श्रृंगार

छंदमुक्त
**
माथे पर बिंदिया की चमक
हाथों मे कँगने की खनखन,
मेहंदी की खुशबू रची बसी
माँग में सिंदूर की लाली सजा
सुहाग का जोड़ा पहन
पैरों मे महावर लगा
अग्नि को साक्षी मान
बंधी सात वचनों मे
बनी में तुम्हारी सुहागन
मन में उमंग लिये
तुम्हारे संग चली,
छोड़ के अपना घर अँगना।
हाथों की छाप लगा द्वारे
आँखो मे नए सपने सजाए
तुम संग आई ,तुम्हारे घर सजना ।
सामाजिक बंधन रीति रिवाज़ों में
तुम्हारी जीवनसाथी ,तुम्हारी अर्धांगिनी ।
अर्धागिनी.....अर्थ क्या....
अपना घर छोड़ के आने से
तुम्हारे घर तक आने का सफर
बन गया हमारा घर...
मेरे और तुम्हारे रिश्ते नाते
अब हो गए हमारे रिश्ते,
मेरे तुम्हारे सुख दुख ,मान सम्मान
अब सब हमारे हो गए ।
एक दूसरे के गुण दोषो को
आत्मसात कर
मन का मन से मिलन कर
मैं और तुम एकाकार हो गए ।
जीवन के हर मोड़ पर
एक दूसरे के पूरक बन
जीवनसाथी के असली अर्थ को
बन अर्धांगिनी तुम्हारी जी रहे हम।
ये चांद सदा साक्षी रहा
हमारे खूबसूरत मिलन का
सुहाग की सुख समृद्धि रहे
ये श्रृंगार सदा सजा रहे
बस यही है मंगलकामना ।

स्वरचित
अनिता सुधीर

Veena Vaishnav नमन🙏
विषय -नारी श्रृंगार
दिनांक 17-10-2019
सादा जीवन उच्च विचार को,नारी श्रृंगार मानती है।
दुनिया दिखाने के लिए, वह श्रृंगार करती है।।

गरीब नारी, सादे कपड़ों में भी सुंदर लगती है।
पिया के मन जो भाए,नारी श्रृंगार वह करती है ।।

सम्मान बड़ों का कर, आशीर्वाद उन से पाती है ।
सोलह श्रृंगार का सुख, परिवार संग पाती है।।

नहीं चाहती नथनी झुमका,स्नेह अभिलाषी होती है ।
अपनों का साथ मिले, यही कामना नारी करती है।।

वीणा वैष्णव
कांकरोली

16,14-दो दो चरण समतुकांत,चरणांत तीन गुरु )

सोलह सिंगार करी सजनी
अधर मंद मुसकानी है
ऊहापोह पिय भरे हिय में
मिलन रुत अति सुहानी है

अधर रुधिर नैनन द्वय मदिर
झलक पुलक दिखलानी है
मनमीत प्रीत जो जीत लिए
अब रीत भी निभानी है

धड़क धधक पल-पल बढ़ि जावै
जिया बड़ी अकुलानी है
आओ प्रियवर भुज हार गहो
रैन नैन कट जानी है
-©नवल किशोर सिंह
स्वरचित

विषय-रूप सौंदर्य
विधा- छंद मुक्त


नारी करती श्रृंगार प्रिया
साजन को सदा रिझाने को
दिल में जगह बनाने को
और प्यार प्रिय का पाने को
मोती-पतली, गोरी-काली
साड़ी या लहंगे वाली
सूट,जीन्स में सजीधजी
पार्लर में नित जानेवाली
मन में बस चाह यही रखती
दिलवर के दिल पर राज करूँ
अपने श्रृंगार से मोहित कर
अपने यौवन से दास करूँ
मेरी सजनी पर मुझको तो
तुम यूँ ही सुंदर दिखती हो
उन लिपे-पुते से चेहरों से
हटकर तुम मुझको दिखती हो
न गहना है कोई तन पर
न रेशम साड़ी है तन पर
अधरों पर गुलाब की लाली हैं
अँखियाँ मय की दो प्याली है
दिल शीशे सा उज्ज्वल, निर्मल
दामन में ममता ,मन कोमल
तेरी चूड़ी,बिंदिया कंगना
श्रृंगार तेरा ,तेरा सजना
तेरा यह रूप लुभाता है
सुख-दुख का अपना नाता है
आ जाओ मेरी बाँहों में
तुझे तेरा प्यार बुलाता है

सरिता गर्ग

शीर्षक -नारी श्रंगार
दि-गुरुवार/17-10-19

विधा ---दोहा मुक्तक

1.
द्वार बंद सारे करें,अगर रूप दीवार।
हर क्षण हर पल कर रही,बस नारी श्रृंगार।
अहंकार ये देह का ,लाता आफत दोष--
निज को सतत निहारती,दूर कर रही प्यार ।
2.
आकर्षक हो चेहरा,अरु नारी श्रृंगार।
नेह प्रेम के भाव से,बढ़ता ये आधार ।
कर्म भाव श्रृंगार का, होता पृथक सुरूप--
मगर सलीके से सजा, तन पाता है प्यार।

******स्वरचित*******
प्रबोध मिश्र ' हितैषी'
बड़वानी(म.प्र.)451551

दिनांक _१७/१०२०१९
विषय_ नारी श्रृंगार
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1) मांग सजे हैं लाले सिंदूर।
हाथ रंगे हैं मेंहदी लाल।।
चूड़ियाँ खनके खनखन-खनखन।
बिंदिया चमके निखरे भाल।।
ओढ़ी है मैंने धानी चुनरिया।
पांव सजाया आलता लाल।।
किया है मैंने , आज सोलह श्रृंगार।
प्रियतम मिले सदा तुम्हारा प्यार।।
सदा सुहागन मैं रहूँ, करूँ तीज त्योहार।
आशीर्वचन मुझको देना,अचल रहे सौभाग।
माँ गौरी तुमसे है विनती, करूँ आँँचल पसार।।
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तनुजा दत्ता (स्वरचित)

आज के प्रद्दत्त।विषय
नारी श्रृंगार पर मेरी एक रचना।


----करवा चौथ पर मेरी कुछ पंक्तियाँ-----

एक चाँद है गगन में,एक चाँद मेरे आंगन!
है प्रीत बडी निर्मल ये प्यार बड़ा पावन!
**
जल्दी से आना चंदा तुम आज मेरे आंगन!
प्यारा है मेरा हमदम भोला है बड़ा साजन!!
**
बैठी हूँ ले के करवा श्रृंगार सोलह करके!
मेरी उम्र भी लग जाये सपना है मेरा साजन!!
**
मांगों में सजा कुमकुम माथे पे चमके बिंदिया!
श्रृंगार निखरता है तेरे प्यार से ही साजन!!
**
देना आशीष इतना वो ख़ुश रहें सदा ही!
बंधी रहे युगों तक ये प्रीत बड़ी पावन!!
**
पांवो के महावर में तेरी उम्र की कहानी!
तेरे प्यार से ही साजन महका है मेरा तन मन!!
**
सम्मान सदा करते हम रीत रिवाज़ों का!
मेरा देश है निराला सब रीत यहाँ पावन!!

@ मणि बेन द्विवेदी


17/10/2019
"नारी शृंगार"

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आया करवा चौथ का त्योहार
नारी करती सोलह शृंगार.....
घर-घर आज उतरा है चाँद..
देख कर नारी शृंगार...........
छलनी के पीछे से मुस्कुराता।

साजन से है नारी शृंगार.......
सोलहों शृंगार में झलकता....
साजन का प्यार........
मिलता बड़ों का आशीर्वाद..
आया करवा चौथ का त्योहार

माथे की बिंदिया चमके.....
माँग में सिंदूर दमके.........
आँखों का कजरा बहके.....
होठों की लाली चहके.......
कलाई में कंगना खनके......
हाथों में मेंहदी महके.........
पाँवों में बिछुआ छमके.....
साजन को रहा पुकार....
नारी का हर शृंगार.....।।

स्वरचित पूर्णिमा साह
पश्चिम बंगाल ।।

तिथि _ 17/10/2019/गुरुवार
बिषय _ नारी -श्रंगार

विधा _ गजल
काफिया _"उर "की बंदिश
(मात्रा भार -27)
एक प्रयास मात्र

आज सजी मै तुम्हें सजनवा बहुत हुई मशहूर।
मेंहदी रची हाथ पांव में बिंदिया है दस्तूर।१

जगत जानता बनिता कब करती सोलह श्रंगार
जब दुल्हन कभी बनती नारी होती है मगरूर।२

नख से पग श्रंगारित होकर आती साजन पास
रूप निहारती दर्पण में तब आता है गुरूर।३

भरी मांग नार गुलजार माथे दमके बिंदिया
लगें नयन कजरारे जैसे उतर आई है हूर।४

लटकन बाली कानों साजे गले सुनहरा हार
देखे राह वलमवा मानो टपक रहा है नूर।५

स्वरचित
इंजी शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना मध्य प्रदेश
जय जय श्री राम रामजी

2भा 'नारी-श्रंगार" गजल*
काफिया "उर "की बंदिश

17 /10 /2019
बिषय ,,नारी, श्रृंगार,

कर सोलह श्रृंगार चली पिया मिलन को
करेगी बहुत मनुहार चली पिया मिलन को
माथे बिंदिया केश हैं काले
जैसे बदरवा छाए मतवाले
नयन कजरवा धार चली पिया मिलन को
नाक नथनियां होठों पे लाली
कमर में करधन कानों में बाली
गले में नौलख हार चली पिया मिलन को
हाथों की चूड़ी खनखन खनकें
पांव पायलिया छनछन छनके
ओढ़े चुनरी गोटेदार चली पिया मिलन को
नयन झुकाए लाज की मारी
सोच रही है पिय की प्यारी
करते होंगे वो इंतजार चली है पिया मिलन को
पास सजन के जब जाऊंगी
चूड़ी कंगना पायल छनकाउंगी
इकटक देखें नारी श्रंगार
चली है पिया मिलन को
स्वरचित,, सुषमा, ब्यौहार

भावों के मोती
विषय=नारी श्रृंगार

=============
हाथों की मेहंदी रची रहे
माथे की बिंदिया दमकती रहे
सोलह श्रृंगार से शोभित
नारी का सौभाग्य रहे
छनकती रहे पैरों में पायल
चूड़ी की खनक से गूँजे आँगन
छलनी में दीप साथ लिए
सब मन में एक आस लिए
सुन ओ चंदा जल्दी आना
बदली में मत छुप जाना
ज्यों ज्यों साँझ ढलती जाए
दिल की बेचैनी बढ़ती जाए
करवाचौथ का व्रत है पावन
काले कजरारे नयनों से
चाँद को ढूँढें अंबर के आँगन
होंठों पे सुमधुर गीत सजे
चंदा-सा साजन का तेज रहे
बस यही दुआ माँगे सुहागन
श्रद्धाभक्ति से करें चंद्रदर्शन
पूर्ण हो व्रत यह मनभावन
***अनुराधा चौहान*** स्वरचित

दिन :- गुरुवार
दिनांक :- 17/10/2019

शीर्षक :- नारी श्रृंगार

कर सोलह श्रृंगार नार...
बैठी प्रतीक्षारत हो द्वार...
नयना सजे कजरा से..
खिले जैसे बासंती कचनार...
कर में चूडियां खनक रही है...
पग में पायल छनक रही है...
करुणा भरे इन नैनों से...
स्नेहा सुधा छलक रही है...
माथे कुमकुम माँग सिंदूरी....
बन जाती ये जीवन धुरी..
पग बिछिया छन-छन करती..
बिन श्रृंगार नारी ये अधूरी..
नारायणी का है रूप ये....
जगत का है प्रारूप ये...
इनसे चलती है जगति...
जीवन का है स्वरूप ये....

स्वरचित :- राठौड़ मुकेश

भावों के मोती'
,दिनांक-17/10/19

विषय-श्रृंगार

मेरे सोलह श्रंगार
में झलकते पिया
तुम रहते हो

कत्थई आंखों में
तुम महताब से
रहते हो

मद्धम मद्धम से
हर वक़्त मुझमें
बिखरे रहते हो

नूर तेरे प्यार का
आफताब बन फ़ै
जाता है
जब जब तुम
मुझसे मुझमे
मिलते हो

उतर कर रंगत
तेरी मिल जाती
यूँ मेरी मेहंदी में
अरुणाई सा फैल
जाते हो

छलछला कर
आँखों से
मुस्कुराहट बन
होंठो से लिपटे
रहते हो

है मेरी सांसों
में नमी से तुम
धवल चाँदनी
तपते मन को
शीतल कर
जाते हो

कभी बन
खुद चाँद
मेरी जिंदगी
उजली कर
जाते हो।।।।

अंजना सक्सेना
इंदौर

आज का विषयः- नारी श्रंगार

भ्रम है नारियों को करा जाता उनका श्रंगार।
श्रृंगार के नाम पर होता उन पर अत्याचार।।

कर श्रंगार बनाया जाता नारी को अति दीन।
सारी आजादी महिलाओं की ली जाती छीन।।

बताता हूँ श्रंगार का एक बहुत बड़ा ही भेद।
नाक व कानों को पशुओं तरह से देते छेद।।

चूड़ियां व पायल करती हैं हिलने पे आवाज़।
कहाँ घूम रही है बहू खोल देती है वह राज।।

गहने पहना कर नारियों को, बना रहे लाचार।
कर न सके प्रतिरोध वह, करें जब अत्याचार।।

डा0 सुरेन्द्र सिंह यादव“
“व्यथित हृदय मुरादाबादी”
स्वरचित

🌹करवा चौथ सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।😊🌹

🌹
मन मंच🙏🏻🙏🏻
🌹तिथि-१७/१०/२०१९
🌹वार-गुरुवार
🌹विषय - करवा चौथ
🌹विधा-छंदमुक्त

आज का दिन!...
हाँ बड़ा ही पवित्र,पावन है
हर सुहागिनों का बड़ा ही मनभावन है
आज चाँद से सजदे की अनमोल रात है।
लब पे तो साजन जी की ही प्रेम बात है।

आज कार्तिक माह की चौथ को!....
ले करवा, सजा पूजा का थाल हाथ में,
संग सखी, सहेलियों,बहनों के साथ में,
सुहागिन लगाती मेहंदी, सिंदूर से माँग सजाती
पहन सुहाग चूड़ा, ओढ़े लाल चुनरिया करती सोलहा शृंगार है।

पति-पत्नी के एक- दूजे के प्रति!....
आस्था, प्रेम-विश्वास,समर्पण, आदि का
यह बड़ा ही प्यारा सा
सुहागिनों का मनभावन त्यौहार है।
रख निर्जला व्रत वे करती
अपने पिया जी के लिए
चौथ माता से लंबी उम्र की कामना है।

गगन में चमक चाँद!....
देखो-देखो कितना वो इतरा रहा
मन मेरा भी पिया के आसपास मंडरा रहा
अपने पूरे शबाब पर है चाँद आज
खेल लुका-छिपी, सुहागिनों को बहला रहा।

पर ऐ चंदा!...
हम सुहागिन भी हार न मानेगी।
नारी है!.... सहना आता है हमें।
हँसते-मुस्कुराते हुए अपने साजन जी के लिए
हम आज भूख- प्यास सब सह जायेगें।

ऐ चाँद!...
जब तू चमकेगा अम्बर पे,
छलनी से तुझमें में प्रीतम को निहारूँगी
जल-ग्रहण कर पिया जी के हाथ से,
हृदयतल तक तृप्त हो जाऊँगी।
देखेगे जो वो एक नजर प्यार से,
मुरझा हुआ चेहरा खिल जाएगा।

हे चंदा!....चमकेगा एक चाँद गगन में तो,
.....धरा पर भी यह चाँद चमकेगा।
.......धरा पर भी यह चाँद चमकेगा।😊

🌹©सारिका विजयवर्गीय"वीणा"
🌹नागपुर (महाराष्ट्र)

दिनांक १७/१०/२०१९
शीर्षक-नारी-श्रृगांर"

हर नारी का प्रिय त्योहार
आया करवा चौथ आज
सोलह श्रृंगार करके सजनी
भई आँगन में ठाड़,
बालों में गजरा, नयनों में कजरा
किया रूप श्रृंगार।
सजने संवरने का आया है आज
करवा चौथ त्योहार।
सिंदूर लगाई भर कर माँग
नारी ने किया श्रृंगार।
भर भर कलईया चुड़ी पहनी
पावँ में बाजे पाजेब
लाल चुनरिया पहन कर सजनी
हो गई बस तैयार।
आया करवा चौथ त्योहार
हरदम तुम ऐसे ही सजी रहना
साजन करें मनुहार।
स्वरचित आरती श्रीवास्तव।

दिनांक-17/10/2019
विषय- नारी श्रृंगार


सोलह श्रृंगार
................................
नैनो में ,कजरे की धार,
गेसू में ,गजरे का प्यार।

हाथ में भीनी खुशबू है,
मेहंदी है,चुनरी गोटेदार।

होंठ हया की लाली है,
कानो में बाली झलकार।

हार सजा है कुंदन का,
खिले हुए हथफूल बहार।

हाथ में खनकी चूड़ी है,
पैरों में पायल की झनकार।

मांग मेरे सिन्दूर भरा,
है टीका उसका पहरेदार।

कंगन तुझे बुलाते है,
हैं बिन सजना के ,ये बेकार।

रब मिल जाए,जग मिल जाए,
मिलता रहे सजना का प्यार।

बिन तेरे पूरे ना हों अब,
मेरे ये सोलह श्रृंगार।

मेरे ये सोलह श्रृंगार।।
-
मौलिक रचना सत्य प्रकाश सिंह प्रयागराज

नारी श्रृंगार

अधूरा है श्रृंगार
अधूरा है प्यार
अधूरा है दुलार
बिन नारी श्रृंगार

है कल्पना
किसी कवि की
है रूप सलोना
किसी चित्रकार का
है मंगल मूर्ति
किसी मूर्तिकार की
है सब समाया
नारी श्रृंगार तुझ में

है प्रिय पति की
है माँ बहन बेटी
सा रूप तुझमें
जब रहे बन-संवर कर
सफल है
नारी श्रृंगार तेरा

हर त्यौहार की
है शान नारी
हर पर्व का
रखती मान नारी
लगती सबको
सुहावनी
जब करती
श्रृंगार नारी

स्वलिखित

17/10/19
विषय नारी- शृंगार

द्वितिय प्रस्तुति

चली पीया संग गोरी
रंग गुलाबी गालन पे,
नजरे झुकी झुकी सी
पहरा लाज का पलकन पे,
बिजली जैसी चमक रही
रेख काजल की नयनन में,
कंगन डोला बल खाये नथनी
झुमका झनका कानन में
चाल है मद्धम, उठे कदम,
पायल छनकी पावन में
चली बयार मतवाली
लट लहराई आनन पे,
सुकुमारी चली डगर में
सीकर चमका भालन पे,
नही भय, ना ही चिंता
साथी हाथ, हाथन में ।

स्वरचित

कुसुम कोठारी ।

आज का कार्य
विषय नारी का श्रृंगार

पर मेरी अभिव्यक्ति
दूसरी प्रस्तुति।

करवा कलशा अक्षत रोली कर सोलह श्रृंगार।
बाट जोहती बैठी सजनी न आए सजन हमार
एक चांद चमके है बदरा दूजा चमके अंगना हमरा।
कब तक राह निहारूं प्रियतम कब तक करूं इंतज़ार।
अब तो आ जा सजन हमार।
राह निहारूं मन घबराए मन का धड़कन बढ़ता जाए।
वो निर्मोही साजन मेरे जियरा अब घबराए।
मांग में सिंदूर माथे बिंदिया, कजरा गजरा लाल चुनरिया। पांव माहवार हाथ की मेहंदी।
बिछुआ बैरन पायल छन छन।
करत बड़ा झंकार।
अब तो आ जा सजन हमार।
चांद गगन पर कब का आया, देख चांद जीयरा हरसाया
तांकू बाट तोहार ।बैरन आजा सजन हमार
मणि बेन द्विवेदी।

विषय --शृंगार

एक पल को भी यदि आ जाती, करता जी भर शृंगार प्रिये।
आलिंगन में अपने लेकर, सपने करता साकार प्रिये।।

कुछ तुम कहती कुछ मैं कहता, सपने हम सुनहरे बुन लेते।
इस चन्द्र रात की बेला में,हम भी जी भर के जी लेते।।

तुम जो भी कहती सुन लेता, सुन करके सपने बुन लेता।
जो विरह सहा हम दोनों ने,अधरों से तुम्हारे चुन लेता।।

यदि आ जाती तुम पास मेरे,करता सपने साकार प्रिये।।

इस दिल में तुम्हारी यादें हैं,कैसे समझाएं तुम्हें प्रिये।
अवशेष तुम्हारे प्रेम प्रसंग, हैं शेष हृदय में अभी प्रिये।।

जो शिथिल पड़ा है प्रेम भाव,उसमें चाहिए सहयोग आज।
जो सूख चुका है प्रेम वृक्ष, कर दो तुम उसको हरा आज।।

यदि आ जाती तुम पास प्रिये, करता सपने साकार प्रिये।।

एक बार पलट कर कहती तो,अपने दिल के जज्बातों को।
रख देता दुनिया कदमों में,पूरा करता अरमानों को।।

एक पल को भी यदि आ जाती, करता जी भर शृंगार प्रिये।
आलिंगन में अपने लेकर, सपने करता साकार प्रिये।।
(अशोक राय वत्स)© स्वरचित
रैनी, मऊ उत्तरप्रदेश।
दि.17/10/10.
विषयः नारी शृंगार

छंदः शृंगार(13+3=16मात्राएँ,अंतिम गुरु लघु)
*
सृष्टि की सूत्राधार अनूप।
सत्य शिव सुषमा की प्रतिरूप।
शक्ति - रूपा सम्पूज्य अनन्य।
देवि, माँ ,सहचरि ,भगिनी धन्य।

जहाँ गृह - लक्ष्मी का सत्कार।
वंद्य वह , देश ,सौध ,गृह - द्वार।
जहाँ भी बनी मात्र वह भोग्य।
वहाँ रह सकता कब आरोग्य।

नहीं वह कहीं , पुरुष से हेय।
उसी के बल से पुरुष अजेय।
सर्वधारिणि - धरणी जग - वंद्य।
सरस्वति माँ दुर्गा अभिनंद्य।

रसेश्वरि श्री-राधा , शिव - शक्ति।
प्रिया रघुनंदन सीता - भक्ति।
अनगिनत पावन रूप - ललाम।
मरुस्थल की सलिला अभिराम।

--डा. उमाशंकर शुक्ल'शितिकंठ'

दिनांक............17/10/2019
विषय..............नारी श्रृंगार

विधा ..............कविता
–------------------------------------------
.......नारी श्रृंगार........
नारी श्रृंगार कर करती नव परिधान।
चौथ माता पूजन कर लेती है वरदान।

पूर्ण चंद्र चलनी निहारे देख पिया का माथ।
पूर्ण होवे व्रत जब जल पिए पिया के हाथ।

रचा महावर हस्त पग कनक दमकती गल।
हाथ कंगन सज गई भाल चमकती बिन्द।

केश सोहे गजरा कमर बंधे करधन।
कर्ण झूले कुंडल हाथ चूड़ी कंगन।

मांग सिंदूर लगाये नैन काजल अंजन।
होंठ लाली रचे थाल साजे पुष्प बंदन।

करवा कलशा पूजन कर ले आशीष करवा माँ।
दिर्घायु पति निरोग काया ले मंगल कामना माँ।
स्वलिखित
कन्हैया लाल श्रीवास
भाटापारा छ.ग.
बलौदाबाजार भाटापारा

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