Monday, November 4

"स्वतंत्र लेखन ""20अक्टुबर 2019

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ब्लॉग संख्या :-541
मोती
विषय स्वतन्त्र लेखन
विधा काव्य

20 अक्टूबर 2019,रविवार

इक्ष्वाकु अठारहवी पीढ़ी
श्री राम का जन्म हुआ था।
सरयू तट अवधपुर कौशल
पावन चरण धरा छुआ था।

जग कर्तार तार तार किया
कचहरी में लेजाकर उनको।
रोम रोम में राम विराजित
कौन सिखाये जाकर इनको।

राम जन्मभूमि अयोध्या है
वाल्मीकि तुलसी की वाणी।
रामायण में साफ़ लिखा है
रामराज्य हर्षित हर प्राणी।

क्या आता है बड़ा फैसला
अब लिखना है केवल बाकी।
राम लला का पावन मन्दिर
कण कण अवधपति साखी।

स्वरचित
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान

20/10/2019
विषय- स्वतंत्र लेखन

( गीत रचना)
212 212 212

तौलते लोग हैं प्यार को।
छोड़ बैठे हैं घर-द्वार को।

हाल कैसा हुआ आज है।
आधुनिकता करे राज है
दिल तरसते हैं त्योहार को।
तौलते लोग......(1)

भाव खोए हैं मनुहार के।
मोल चढ़ते हैं बाजार के।
भूलते आज आभार को।
तौलते लोग......(2)

प्रीत की रीत जानी नहीं।
आंँख में आज पानी नहीं।
जानते मात्र अधिकार को।
तौलते लोग......(3)

धार गंगा की पावन रखो।
सद्विचारों का सावन रखो।
भूल मत मात- उपकार को।
तौलते लोग......(4)

शालिनी अग्रवाल
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित
20/10/2019
विषय- स्वतंत्र लेखन

( गीत रचना)
212 212 212

तौलते लोग हैं प्यार को।
छोड़ बैठे हैं घर-द्वार को।

हाल कैसा हुआ आज है।
आधुनिकता करे राज है
दिल तरसते हैं त्योहार को।
तौलते लोग......(1)

भाव खोए हैं मनुहार के।
मोल चढ़ते हैं बाजार के।
भूलते आज आभार को।
तौलते लोग......(2)

प्रीत की रीत जानी नहीं।
आंँख में आज पानी नहीं।
जानते मात्र अधिकार को।
तौलते लोग......(3)

धार गंगा की पावन रखो।
सद्विचारों का सावन रखो।
भूल मत मात- उपकार को।
तौलते लोग......(4)

शालिनी अग्रवाल
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित
।। पत्नि श्रंगार ।।😁

करवा चौथ के दिन
त्नि को देख मैं चौंका
कुछ इस तरह था सँवारा
मैंने बार बार उसे निहारा

तब जाकर यकीन हुआ
हाँ ये मेरी बीवी है सगी
ब्यूटी पार्लर गयी थी
कुछ अलग तरह थी सजी

बाल बाँधने का डिजाइन
कुछ अलग हटकर था
क्रीम पाउडर भी उस दिन
कुछ ज्यादा डटकर था

मैंने कहा भाग्यवान तुझे
आज यह क्या हो गया
मुझ जैसे कवि पत्नि को
फैशन का भूत बिंधो गया

वो बोली रहने दो जी
तुम्हारी ये सारीं बातें
मुझे तो लगती यह
हो ज्यों गधे की लातें

यह हम औरतों का
निजी मामला है
कितना समझाया तुम्हे
यहाँ भी तुम्हारा हमला है

कोई तो जगह छोड़ो
हम पत्नियों को अपनी
कलम से कभी भी
भूलकर मत जोडो़

वरना चोट खाओगे
इक दिन पछताओगे
गिफ्ट कभी न लाओगे
बातों में लटकाओगे

हर जगह बातों से
काम नही चले
लायक पति वो जो
पत्नि स्वभाव में ढले

मैं भागा बढ़ रहा था
तनाव कंट्रोल किया
अपनी सारी बातों को
तुरत मजाक में लिया

गुलाब जामुन डिब्बा
उसके हाथ थमा दिया
वो मुस्कुरायी 'शिवम'
वोली वाह मेरे पिया

आज जो तुमने मुझे
लोटा से जल दिया
उसमें कितना प्यार था
खुश है आज मेरा जिया

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 20/10/2019

नमन: भावों के मोती मंच
दिनांक: 20/10/2019
विषय:स्वतंत्र लेखन के अंतर्गत कसम/शपथ शीर्षक

सुप्रभात रविवार 🌹🌹
सयाली छंद : पाँच पंक्तियों की रचना जिसमें क्रमशः एक,दो,तीन, दो,एक शब्द आते है।

विवाह
प्यार मिलन
फेरा सात वचन
रक्षा शपथ
भाग्यशाली ।

कसम
बहन भाई
जीवन भर साथ
प्यार अपार
भाग्यशाली ।

पित्रॠण
संतान फर्ज
कसम जीवन पर्यन्त
रहो कर्मठ
वचनबद्ध।

सैनिक
सरहद विस्तृत
कसम देश रक्षा
बारहों मास
सेवारत।

न्यायालय
गवाह अनेक
गीता की कसम
झूठ पहनकर
अन्याय ।

दीपावली
कसम खाते
पर्यावरण संरक्षण भाव
बिजली पानी
सौहार्दपूर्ण ।

स्वरचित रचना
नीलम श्रीवास्तव लखनऊ उत्तर प्रदेश

दिनांक-20/10/2019
स्वतंत्र सृजन.....


राहें.....

जब तक चांद चमकता होगा
अंबर की वाहो में,

तब तक फूल सितारे होंगे
प्रीति की राहों में।

जब तक आफताब दमकता होगा
आसमान की बाहों में,

जीवन सदा बसंती बीते
मृदुल महताब की छांवो में।

चांद तारों की उम्र को जिए
धरा के आंगन के पांवो में,

चांद के तख्त पर नूर चमके
नृत्य मयूरा नर्तन थिरके

शब्द सागर प्रीती के.......राहो मे

स्वरचित
सत्य प्रकाश सिंह
दिन :- रविवार
दिनांक :- 20/10/2019

विषय :- स्वतंत्र लेखन..

इश्क है ये या कोई बिमारी है..
नादां दिल की अदद लाचारी है..

जिसके नशे से मैं बहक रहा हूँ..
तेरी आँखों की वो खुमारी है..

आँख मूँदने से क्यों करें परहेज़..
दिल में बसी जो तस्वीर तुम्हारी है..

इश्क भी तो एक खेल है "गज़ल"..
खेलने वाला हर एक जुआरी है..

कैसे कह दें तुझको बेवफा हम..
तुमसे आबाद ये दुनिया हमारी है..

स्वरचित :- राठौड़ मुकेश

नमन मंच -भावों के मोती
दिनांक -20 अक्टूबर 2019 दिन -रविवार
स्वतंत्र सृजन दिवस पर

🙏🙏🙏

काफ़ी दिनों पहले हुई यह कविता आज प्रसंग वश........
कविता के प्रथम तीन अंतरे, देश की प्रथम दृष्टिहीन महिला आईएएस प्रांजल पाटिल को समर्पित......
____________________

क़ाबिल

अपने सामर्थ्य का ख़ुद पता दूंगी मैं ।
मैं भी क़ाबिल हूँ इक दिन बता दूंगी मैं ॥

एक मुद्दत से दुनिया सताती रही,
मेरी कमज़ोरियाँ ही गिनाती रही ।
देखकर खुद को उनकी नज़र से सदा,
ख़ुद को ही फ़िर भला क्यों सता दूंगी मैं ॥1॥
मैं भी क़ाबिल हूँ इक दिन बता दूंगी मैं ॥

मानती हूँ कि धीमी गति है मेरी,
किंतु प्रत्युत्पन्न सी मति है मेरी ।
हारती है सदा ही मति से गति,
ये फ़िर इक दिन ज़माने जता दूंगी मैं ॥2॥
मैं भी क़ाबिल हूँ इक दिन बता दूंगी मैं ॥

इतना आसान पाना कहाँ मंज़िलें,
सबकी राहों में आती ही हैं मुश्किलें ।
हौंसलों से सभी मुश्किलें पार कर,
आसमां भी क़दम पे नता दूंगी मैं ॥3॥
मैं भी क़ाबिल हूँ इक दिन बता दूंगी मैं ॥

शब्द मेरे सभी फूल बनकर खिलें,
बन के परिचय की ख़ुशबू जहां से मिलें।
शारदे भरदे वर से मेरी लेखनी,
नित सृजन की सुनहरी लता दुंगी मैं॥4॥
मैं भी क़ाबिल हूँ इक दिन बता दूंगी मैं ॥

-अंजुमन 'आरज़ू' ©
रचना तिथि 25/05/2018

मोती ....
स्वतंत्र लेखन के लिए मेरी रचना.....
दिनांक..............20/10/2019

दिन....................रविवार
विषय..................*ईश्वर/परमात्मा/भगवान*
विधा....................कविता
;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;
*ईश्वर/परमात्मा/भगवान*
*पूनम की चाँद, चली चाँदनी संग।*
*अमृत बरसे गगन,मन उठती तरंग।*

अविरल बहती धरा पर जब ओंस रज।
लगी धुंधली सी चुनर ओढ़े गगन सजल।

ईश्वर की अनुपम छटा निराली बिखरी चाँदनी रात।
रजनीचर की वृहत आभा जग देती नई सौगात।

*ईश्वर कण- कण में बसे,और बसे बृजधाम।*
*मन मंदिर मत मलिन हो,रहे मुखर प्रभु राम।।*

*सागर धरती नभ बना ,बना खेत खलिहान।*
*जल समीर जग घन बना,बना जीव भगवान।।*

*परहित कर सहाय बने,मिलता खुशी अपार।*
*ईश विनय धीरज धरे , करे जगत उपकार।।*

वेदों मे पुराणों में,काव्य की हर विधाओ में।
ईश्वर प्रदत्त जगत की सारी रचनाओं में।

बाल कलाओ में,कृष्ण की लीलाओं में।
गौतम महावीर गाँधी संत के उपदेशों में।

*अखिल विश्व ब्रह्मांड में व्याप्त हो।*
*निराकारी दिव्य अलौकिक रुप हो।*

हे ईश्वर इस प्राणी जगत के हर युग में
हो आपका अभिनंदन
कर बद्ध श्रीवास करत
शत शत नमन
आपका वंदन

(स्वलिखित)
*कन्हैया लाल श्रीवास*
भाटापारा छ.ग.
जि.बलौदाबाजार भाटापारा

यात्रा शब्द से निशब्द की ओर
💘💘💘💘💘💘💘💘

शब्दों
 का जब रुप सँवरता,तो आराध्य पूजन के मन्त्र बनते
शब्दों का जब रुप बिगड़ता,कुटिल कुटिल षणयन्त्र तनते
शब्दों का जब माधुर्य उमड़ता,गहन महीन हो ये छनते
प्रियतम के सौन्दर्य में,मृदुल सुगन्धित हो ये रमते।

शब्द जब निशब्द होता,प्रेम से आबद्ध होता
आँखें भी सजल होतीं,और स्पन्दन गदगद होता
आकार भी एकदम तभी ,सही में निराकार होता
प्राण भी होता प्रफुल्लित,और यहीं साकार होता।

शब्द से निशब्द पथ पर,करवा दो मेरा प्रवेश
समय भी अब कहाँ,बाकी रहा हिस्से में शेष
अब आई है सुधि तो ,हाथ जुडे़ मेरे परमेश
खोल दो खोल दो,कृपालु हे अपने दरवेश।

तुम शब्द से हो परे,तो मैं भी शब्द क्यों चुनूँ
जन्म मरण की व्याधियों में,आखि़र कब तक मैं भूनूँ
इसलिये इस आँख की,दो बूँद तुमको है समर्पित
मस्तक भी झुका रहा,कहते हैं जिसको लोग दर्पित।

कृष्णम् शरणम् गच्छामि

दिनांक-20-10-2019
विषय- सत्य से साक्षात्कार

स्वतंत्र लेखन

आशा के दीप जलाओ
जीवन प्रकाशमय पाओगे
गर हाथ पर हाथ धरे बैठे
चेतन से जड़ बन जाओगे।।
शून्य दाहिने जिसके लगता
एक नहीं दस गुना है चलता
पैरों से मत रेत कुरेदो
गहरे सागर मोती पलता।।
निहित स्वार्थ में होकर अंधा
मत कर प्राणी गोरखधंधा
जीते जी काम करो ऐसा
मिल जाए अर्थी को कंधा।।
नागफनी लेती अगड़ाई
गमले की तुलसी कुम्हलाई
अपने ही घर के आंगन में
कैद हो गई आज लुगाई।।

मौलिक रचना
सत्य प्रकाश सिंह प्रयागराज

नमन मंच को 🙏🙏
दिनांक _20/10/2019
स्वतंत्र सृजन
1) मांग सजे हैं लाली सिंदूर।
हाथ रंगे हैं मेंहदी लाल।।

2) चूड़ियाँ खनके खनखन-खनखन।
बिंदिया चमके निखरे भाल।।

3) ओढ़ी है मैंने धानी चुनरिया।
पांव सजाया आलता लाल।।

4) किया है मैंने , आज सोलह श्रृंगार।
प्रियतम मिले सदा तुम्हारा प्यार।।

5) देती हूं ऐ चांद! अर्घ्य तुम्हें, हो सुहाग अमर।
सदा सुहागन मैं रहूँ, करूँ तीज त्योहार। ।

6) माँ गौरी तुमसे है विनती, अचल रहे सौभाग्य।
आयु बढ़े पिया की मेरे, मांगु आँचल पसार।।

तनुजा दत्ता (स्वरचित)

दिनांक 20-10 -2019
विषय - स्वतंत्र सृजन
अति पाने की लालसा में,शांति खो रहे हैं ।
अपना गलत तरीके, वह पैसे कमा रहे हैं ।।

कर्मों से कलंकित, बुजुर्गों को कर रहे हैं ।
शांति राह भटक,अशांति ओर जा रहे हैं ।।

समय शब्द का,सही उपयोग नहीं कर रहे हैं।
अपने बनाए जाल में,मकड़ी से उलझ रहे हैं।।

स्व अनुशासन नहीं ,ओरों को सिखा रहे हैं ।
मन शांति खोकर वो, राह भ्रमित हो रहे हैं ।।

इच्छा सीमित कर,अब शांति से जी रहे हैं।
उड़ा रंजिसे हवा में, जीना सिखा रहे हैं ।।

शेष जीवन इस तरह, यादगार बना रहे हैं।
जियो और जीने दो,शांति संदेश फैला रहे हैं।।

माँ-बाप आशीष से,शांति पथ अपना रहे हैं।
नासमझ मुकद्दर कोस,अपनों से दूर जा रहे हैं।।

वीणा वैष्णव
कांकरोली

नमन मंच भावों के मोती
20 10 2019
बिषय,, स्वतंत्र लेखन

बढ़ती ही जाती आपस की दूरियां
संकुचित बिचारधारा या कहें मजबूरियां
पराए हुए माँ बाप
रह गए बीबी बच्चे आप
छोटी होती जाती परिवार की परिभाषा
क्या करें अपनों से आशा
पाल पोस बड़ा किया वही धोखा देते
स्वार्थ की खातिर पालकों से किनारा कर लेते
स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार

20/10/2019
स्वतंत्र लेखन

छंदमुक्त सृजन
################
अवकाश के दिन थोड़ी मस्ती,,,🌹

तू मेरा कैसा सजना.........
भूल गया जो प्रेम जताना ..
कभी था जो मेरा दीवाना ...
भुला न पाती गुजरा जमाना..
उन्नीस सावन जो बीत गया..
कहाँ तेरा वो प्रीत गया....
अब दिनभर सबक सिखाते..
मुझको अपना विद्यार्थी समझते.
सबक न सीखनी साजन मेरे.
जिंदगी के दिन हैं थोड़े.....
गुजरे दिन यूँ हँसाते-हँसाते..
सातों वचन मैंनें निभाया...
तेरे संग लिए है जो फेरे....।

साजन बोले.....
सुन ले तू भी मेरी सजनी...
पहले तेरी थी शहद सी बोली.
कहाँ से सीखा तीखी बोली...
अब हो जैसे नीम की फली..
वो भी दिन थे क्या सुहाने...
दुबके पाँव चली आती थी सताने...
प्यारी-प्यारी होती तेरी बातें..
दिनभर जाने क्या काम करती...
अब देखके ही पगली लगती.
सिर्फ बच्चो संग ही बातें करती..
बातें मेरी अब न सुनती....
अलग दुनिया में अब तू रहती
फिर भी तू ही दिल में बसती..
वचन निभाया हमने सारी..
तू है मेरी पगली सजनी..।।

स्वरचित पूर्णिमा साह
पश्चिम बंगाल ।।
20/10/19
स्वतंत्र लेखन विधा लघुकथा


सकारात्मक सोच

रामलाल हाल का सामान जमा रहे थे । यहाँ अभी उनके साथी आने वाले थे । रामलाल ने जब अपना घर बनवाया था, तब बेटे सुरेश के लिए तीन कमरे ऊपर बनवाए थे और नीचे अपने लिए बड़ा हाल बनवाया था । उसका नाम उन्होंने " प्रसन्नाश्रम " था । यहाँ स्वेच्छा से उनके साथी और दूसरा वृद्धजन आ कर रूक सकते थे । वह यहाँ समाचार पत्र पढ़ने के अलावा केरम , शतरंज आदि भी खेल सकते थे ।

रामलाल की सोच थी कि:

" आज की भागदौड़ और तनाव भरी जिन्दगी में बेटे -बहूओं को अपने हिसाब से जिन्दगी जीने देना चाहिए, हम लोगों की वजह से वह डिस्टर्ब नहीं हों । "

इसलिए उन्होंने अपने घर में यह " प्रसन्नाश्रम " बनवाया था ।

तभी सुरेश ने कहा :

" पापा आपका पूरा सामान मैं ले आया हूँ और हाँ इस बार तो दीपावली के लिए भी मिठाई , लक्ष्मी जी की फोटो, दीपक , रोशनी वाली सीरिज , फल फूल बच्चों के लिए फुलझड़ी टिकली बगैरह सब है ।"

रामलाल ने कहा :

" हाँ बेट अच्छा किया , अब तू बहू को ले कर निकल जा उसको आफिस छोड़ देना , और हाँ दो बजे बच्चों को मैं बस स्टाप से ले आऊंगा , तू बिल्कुल चिंता मत करना ।"

इस तरह से रामलाल का बेटे बहू के साथ अच्छा सामन्जस्य चल रहा था और उनके " प्रसन्नाश्रम " में सभी साथी वृद्धजन खुशी-खुशी आते और दिन भर

इंजॉय करते ।

आज " प्रसन्नाश्रम " बहुत सुन्दर सजा था । अपने अपने घरों में पूजा के बाद सभी साथी बेटे बहुओं नाती पोतों के साथ आये हैं । यहां भी पूजन के बाद दीपावली मिलन चल रहा हैं बच्चे अपने दोस्तों के साथ , बहूएं और सब अपने हम उम्र लोगों के साथ मस्ती कर रहे हैं।

रामलाल कह रहे थे :

" वॄध्दाश्रम में हमें भेजने के नाम पर बच्चों को दोष देना उचित नहीं है , समय के अनुसार विचारधाराएं, मान्यताएं बदलनी चाहिए । आज बहुऐ भी नौकरपेशा हैं, और फिर इस मंहगाई में दो पैसे घर ही में आते हैं, तभी तो घर गृहस्थी अच्छे से चल पाऐगी । इसलिए हम लोग को भी उन्हें सहयोग करना चाहिए । "

तालियों की गड़गडाहट के साथ सब एक दूसरे का मुँह मीठा करा रहे थे । न बुजुर्गों को अपने बेटों बहुओं से कोई शिकायत थी और न ही बुजुर्गों को अपने बेटे बहुओं से ।

सब लोग रामलाल के " प्रसन्नाश्रम " की तारीफ कर रहे थे जो रामलाल का एक सार्थक प्रयास था ।

स्वलिखित

लेखक संतोष श्रीवास्तव भोपाल

20.10.2019
रविवार

मनपसंद विषय लेखन
विधा - ग़ज़ल

हार जाना चाहिए
🌹🌹🌹🌹

ख़ुद से ही कभी ,ख़ुद भी हार जाना चाहिए
ख़ुद आगे बढ़ के, हाथ भी मिलाना चाहिए।।

माना कि कोई ऐब नहीं है, दिमाग़ में
औरों की सोच को भी,मान जाना चाहिए।।

दिल दे दिया अगर, तो कभी पूछना नहीं
दिल दे के अपने दिल को,भूल जाना चाहिए ।।

अच्छा है कोई चाह नहीं,वाह की,नहीं
लेकिन कभी अरमान भी,जगाना चाहिए ।।

कोई नहीं है ग़ैर,सब अपने ही तो यहाँ
मिलते ही सबसे,हँसना-मुस्कुराना चाहिए।।

ख़ुशियों की भीड़ हो कि ग़मों का हो क़ाफ़िला
हिम्मत से ही ‘ उदार’, झेल जाना
चाहिए ।।

स्वरचित
डॉ० दुर्गा सिन्हा ‘ उदार ‘

०मन पसंद सृजन०
रविवार,दि.20.10.19

*
गीतः
उन्मन फिरती भूख-प्यास है;
भरे-पेट का ही विकास है;
निबल - निधन का कहीं न कोई ,दूर - दूर या आस - पास है।

इन्हें सिर्फ़ आश्वासन के छल;
ठिठुरन में वादों के कम्बल;
उन्हें बिजलियों सजी कतारें,इनकी ढिबरी तक निराश है।

'करम लिखाये' की मजबूरी;
गम खा , आँसू पिये सबूरी;
उनको छप्पन - भोगंगूरी,इनसे जूठन तक उदास है।

इन भगवानों की आहों को;
मुहँ-बाये मन की चाहों को;
कैसे कौन सुने - समझे जब,भोग - रोग का अट्टहास है।

अब तो दीनानाथ पधारो;
कंटक-वन द्रुम छाँट सँवारो;
कुटिलाचारों,व्यभिचारों से,विलुलित धरणी,महाकाश है।
उन्मन फिरती भूख-प्यास है;
भरे - पेट का ही विकास है;
निबल - निधन का कहीं न कोई , दूर-दूर या आस - पास है।।
--डा.'शितिकंठ'

नमन मंच
भावों के मोती

मनपसंद लेखन

दिनांक 16-10-2019

तेरे प्यार के सिवा दुनिया मे रख क्या
तू मिले प्राण मिले तू हँसे फूल खिले
मेरे नयनो ने बसाया तुझे पलको के तले
जैसे लहराते हुए सरोवर में सूरज की किरणों से फूल खिले
वैसे ही मनहर की मूरत को तेरे आने से मनवा खिले

मेरे मन मे रमा है तू मेरे मन का अरमान है तू
तू चाहे तो मेरे जीवन की हर सदाये
बदले
मैंने भी इस तन की वीणा को छेड़ा है तेरे प्यार से
मेरे दिल ने गीत गाया है प्रेम और अनुराग से
मेरा मनवा मगन हो उठा जब मेरे आंगन में लाल खेले

मीना तिवारी
Damyanti Damyanti 
 विषय _ मन पंसद लेखन |
माँ नर्मदा |
उज्जवल प्रदेश भागतट बधो से सजी माँ नर्बदे |

उज्जवल धवल जल मे गिरती सूर्य रश्मियां |
करती सतंरगी श्रृगांर उठती गिरती लहरे बल खाती लगे प्यारी |
चलती नावे बलखाती पतवार माझी के हाथ |
इस तट से उस तट पहुँचा ती कल कल स्वरलहरिया मन को भांति |
रामकुडं का यज्ञ कहानी कहता,
चलता लहरो पर किरणो का सतरगीं रथ |
सगंमरमर की धवल चट्टानों से झूमता वह धुवाधार प्रपात मन लुभावन |
मैदानो को सीचंती अन्न फूल फल की बहारकिनारो पर |
विध्यांचल का बोडा पर्वत बजा रहा
मुधर स्वर मे बासुंरिया |
सतपुडा का पछीं दलमधुर गीत सुनाता |
सागौनौ के जगंल की किरणे पशु पक्षी करते अठखेलियाँ |
माँ नर्मदा की कथा सुना रही माडंवगढ़ की पनिहारिया |
स्वरचित__ दमयंती मिश्रा

नमन भावों के मोती
दिनांक २०/१०/२०१९
स्वतंत्र लेखन
"गाँव की नारी,क्यो दिखाती है लाचारी"एक नजर उनकी लाचारी पर।
तुम्हारी बातें दुःख देती है मुझे
तुम मुस्कुराते रहो,
इसलिए अपना दुःख बताती नही तुम्हें।
दिखता नही चेहरे पर दुःख मेरे
मतलब साफ है, खुश रहने का नाटक,
करने आता है मुझे,
गर मैं चिल्लाई तो तुम्हें
चुप करा दूँगी,
जो तुम्हें अच्छा नहीं लगेगा।
तुम्हें हरपल अच्छा लगे
इसलिए चुप रहती हूँ मैं,
हाँ,मैं भी इंसान हूँ,
सोचने समझने की शक्ति है मुझमें
तुम समझते हो की मैं बेकार हूँ,
तो मैं बेकार ही भली,
कम से कम मेरी गृहस्थी
चल तो रही अच्छी भली।
स्वरचित आरती श्रीवास्तव।


समय का पहिया कुछ यू चलता है
देखकर अपने बन जाता है हर कोई
एक नई कहानी ।
हाथों की लकीरें भी नहीं देती आज हर
किसी का साथ।
खो जाता है कहीं गुमनामी के अंधेरे में
अच्छाइयां भी है आज।
बुराइयों और भ्रष्टाचार ने बना लिया है
अपना ही बोलबाला ।
शिशकती रह गई है ईमानदारी और नेकी
बैठकर किसी कोने में ।
बदल रहा है हर एक का नजरिया अब
होकर निराश जहां में।
कुंठित है हर कोई आज बदलते हुए परिवेश
में बदलने पर है मजबूर ।
🌹🌹शुभम्वदा पाण्डेय 
नमन भावों के मोती समूह
दिनांक 20/10/19

बाल मजदूर की मनोव्यथा
*********************

न छीनो मुझ से मेरा बचपन
ला कर दे दो मुझे कापी और कलम।
नहीं चाहिये कोई सौदे
नहीं चाहिये भरम।
बस लौटा दो मेरा बचपन।।

कहीं से किस्ती कागज वाली ला दो।
कलकल करते झरने बहा दो।
सतोलिया का खेल दोस्त ला दो।
न दिखाओ पैसों का सपन
बस लौटा दो मेरा बचपन।

नन्हे हाथ नहीं बने मजदूरी को।
चाहें खेल कर नापना
ये धरती गगन की दूरी को।
हटा दो मजबूरी के बंधन।
बस लौटा दो मेरा बचपन।

कब तक ईंटें ढ़ोता रहेगा।
चाय केतली को खेता रहेगा।
दे दो मुझे खिलौने
चाँद सूरज तारे चमचम।
बस लौटा दो मेरा बचपन।।

स्वरचित
मीनू "रागिनी "
20/10/19
मीनाकुमारी शुक्ला
राजकोट

20/10/19
स्वतन्त्र दिवस
दोहा गजल
***

सत्य वचन ये मानिये ,असली धन है ज्ञान।
लिप्त हुआ अभिमान जो,होये गरल समान ।।

दीप जला जो ज्ञान का,रोशन सब जग होय।
जन जन का कल्याण हो,रखिये इसका ध्यान ।।

दूषित मन की स्वच्छता, करती दूर विकार।
मर्म समझ त्यौहार का,रखना होगा मान।।

श्रेष्ठ दान है ज्ञान का ,कहते वेद पुराण ।
करिये जीवन में सदा ,असली धन का दान।।

अंतस की बाती बना ,तेल समर्पण डाल।
दीप अवलि बन कर जलें,ऐसा हो अभियान।।

स्वरचित
अनिता सुधीर

भावों के मोती
विषय- स्वतंत्र लेखन
=============
किस प्रेम की परिभाषा दूँ
प्रेम लिखने की वजह नहीं
रग-रग में बसी यह अनुभूति
कैसे शब्दों में बयां कर दूँ

प्रेयसी के दिल के भाव लिखूँ
या में लिख डालूँ माँ की ममता
करवाचौथ के व्रत में छुपा हुआ
सुहागिन का पति प्रेम लिखूँ

कठोरता का ओड़ आवरण
पिता के हृदय बसा प्रेम लिखूँ
कवि हृदय में बसा हुई
रचनाओं से उनकी प्रीत लिखूँ

किस प्रेम की परिभाषा दूँ
प्रेम लिखने की वजह नहीं
रग-रग में बसी यह अनुभूति
कैसे शब्दों में बयां कर दूँ
***अनुराधा चौहान*** स्वरचित

आपकै लिये गीत ला रहा हू मुझे बताना कि क्या आपको पसन्द आया
राहै बनाता चल जहाॅ मे प्यार के लिये
चरागे जलाता चल जहाॅ मे प्यार के लिये ।
बेनूर था जहाॅ भी जुल्मत के दाग से
रोशन हुई है दुनिया वफा के चराग से
हर जुल्म मिटाता चल जहाॅ मे प्यार के लिये ।
दुनिया का ये मंजर दिख जाता हर कही
एक सुखी हे इन्सा लाखो दुखी वही
लाचारो को गले लगाता चल जहाॅ मे प्यार के लिये।
देखा है हमने बडा अजब है जमाना
गमगीन लीगो को मुश्किल है हसाना
तू सबको हसाता चल जहाॅ मे प्यार के लिये ।
हामिद सन्दलपुरी

20 अक्टूबर 2019

विषय - " मन पसंद या स्वतंत्र लेखन "
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आज प्रस्तुत करता हूँ " प्रीत " शब्द पर अपनी 04 प्रस्तुतियाँ

प्रस्तुति 01
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" प्रीत "

प्रीत की डोर से जो भी लोग बँध जाते हैं

सारी सारी उम्र के लिये एक दूसरे के हो जाते हैं

ये डोर यूँ तो दिखाई ही नहीं पड़ती

पर इसकी मज़बूत पकड़ से लोग बच न पाते हैं

तमाम ऐसी ही डोरियों से बँधा होता है एक इंसान

माँ बाप पत्नी बेटी मित्र संबंधी और न जाने कितने ही नाते हैं

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प्रस्तुति 02
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" प्रीत "

प्रीत बिना जिंदगी जिंदगी बिल्कुल नहीं होती है

इसकी बेहद ज़रूरत हर आत्मा हर रूह को होती है

प्रीत अतः सबको बाँटो अपनी सारी सारी दुनियाँ में

तभी तो वोह सबको मिलेगी और आपकी जिंदगी में भी प्रीत होती है

बड़ा शुष्क नीरस सा रहता है जीवन प्रीत बिना

प्रीत मिल जाये तो फ़िर हर जिंदगी रंगीन होती है

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प्रस्तुति 03
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" प्रीत "

लगी हो किसी से प्रीत तो बेचैन फ़िज़ा होती है

उससे मिलने के बिना जिंदगी कहाँ होती है

बेक़रार रहते हैं आँखे रूह और ज़ेहन

उनमें बिन महबूब को मिले चैन कहाँ होती है

प्रीत है मारती और जिंदा भी वो ही रखती सबको

जिसको न मिली कभी प्रीत उसकी जिंदगी कहाँ होती है

(स्वरचित)

अखिलेश चंद्र श्रीवास्तव

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