Monday, November 4

"पंछी"22अक्टुबर 2019

ब्लॉग की रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं बिना लेखक की स्वीकृति के रचना को कहीं भी साझा नहीं करें 
ब्लॉग संख्या :-543
विधा-कविता
शीर्षक- "पंछी"


मन पंछी तन के पिंजर में रहता पांखें खोल-
कभी नहीं बाहर आने का करता कोई मोल,
गुनता 'भावों के मोती' की माला वो निश दिन-
कितना चंचल मचल-मचलकर करता रहे किल्लोल.

सुख दुःख की लहरों पर तैरे अनदेखा पाखी-
बीच भंवर से सदा बचाए किरपा है वाकी,
साथ-साथ ही कदम बढ़ाए भीतर बैठा
मौन-
पल-पल देखूं किरपालु की यहाँ वहाँ झांकी.
________
स्वरचित-
डा. अंजु लता सिंह
नई दिल्ली

पंछी/परिंदा
नमन,वन्दन मंच भावों के मोती,गुरूजनों, मित्रों।


रहता है घर के पीछे वृक्ष पर एक परिंदा।
चींचीं, चूंचूं करते रहना, दिन-रात है उसका धंधा।

एक एक तिनका जोड़कर घोंसला बनाये।
बच्चों सहित घोंसले में आराम फरमाए।

फूदक, फूदक कर कभी मेरे छत पर आ जाए।
मेरे बिखड़े चावल को वह बड़े प्यार से खाये।

कुछ खाये, कुछ बच्चे की खातिर ले जाये।
भर भरकर अपनी चोंच में वह अपने साथ ले जाये।

सुन्दर,प्यारा पंछी मेरे मन को भाये।
नहीं आये जिस दिन,मन मेरा उदास हो जाये।

सीखो कुछ पंछी से अनवरत मेहनत करना।
कभी ना रूकना, कभी भी नहीं पीछे हटना।

वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी
स्वरचित
दिनांक: 22.10.2019
विधा : पद (छंदबद्ध कविता)

विषय आधारित रचना
शीर्षक-" पंछी"

काश! अगर मैं पंछी होता

खुला आसमां मेरा होता ,
सुखमय रैन बसेरा होता ।
चूमें ऊँचे पेड़ गगन को ,
शाखाओं पर डेरा होता ।
काश!अगर मैं पंछी होता।।

मनमौजी बन मन की करता,
तजकर दिल से रंज व रंजिश।
न कोई होती हद व सरहद ,
न कोई बाधा, बंधन, बंदिश ।
काश !अगर मैं पंछी होता है।।

प्रकृति की गोद में खेलूँ ,
लूँ मनोहर, मोहक नजारा।
आकर्षक आवाज लोहानी,
सुंदरता का करूँ इशारा ।
काश ! अगर मैं पंछी होता।।

पनपे नहीं प्रेम से पीड़ा ,
लेकर देश ,धर्म, जाति को।
एक जैसा सबको चाहता ,
जितना संबंधी नाती को ।
काश !अगर मैं पंछी होता।।

बस मेहनत बलबूता होता ,
लगाम कभी न लगे लगन पे।
उड़ता पंखों को फैलाकर ,
राज करूँ मैं नील गगन पर ।
काश !अगर मैं पंछी होता ।।

चिंता मुक्त चेतना चित में ,
उर आजाद करे नभ विचरण।
हिला - हिलाकर पंख बुलाता ,
मुक्त प्यार का करता वितरण।
काश ! अगर मैं पंछी होता ।।

बन निष्छल , निर्मल , निर्मोही,
न पड़े छवि पर छल की छाया।
न कोई इच्छा व अभिलाषा ,
जितना पाया , उतना खाया ।
काश ! अगर मैं पंछी होता ।।

बस मौसम मजबूरी मेरी ,
आँधी ओले राह न आएँ ।
पलभर में मंजिल पर पहुँचूँ ,
महीने भर रथ से लग जाएँ।
काश !अगर मैं पंछी होता ।।

अंबर के आँचल को चूँमूँ ,
जब करता मन भरूँ उड़ारी ।
गलती से न गमन हो उस पथ,
घात लगा जित बैठ शिकारी ।
काश ! अगर मैं पंछी होता ।।

नफे सिंह योगी मालड़ा ©
स्वरचित रचना
मौलिक

विषय पंछी,परिंदा
विधा लघुकाव्य

22 अक्टूबर 2019,मंगलवार

कलरव करते सुबह उठकर
नीड बाहर निकलें मिल सारे।
दिकदिगन्त नभ में उड़ जाते
वे सकल दुनियां अति भाते।

तिनका लाते सदा ढूंढ़ कर
हवादार वे महल बनाते।
अद्भुत कलाकृति को भरते
प्रिय चुग्गों को वंही सुलाते।

बिना तनाव बिना मुसीबत
हँसकर जीवन जीते पंछी।
चुग्गा लाते चोंच में भरकर
जैसे बजे कृष्ण की बंशी।

यत्र तत्र सर्वत्र दल पंछी
सदा साथ मिल रहते सारे।
मानव से बढ़, है प्रिय जीवन
लालच स्वार्थ दूर सब भागे।

स्वरचित, मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

शीर्षक-- पंछी / परिंदा
प्रथम प्रस्तुति


अब कहाँ वो पंछियों का शोर
चाहे शाम होय या होय भोर ।।

वही भागता हुआ इंसान है
हर गली कूचा और हर खोर ।।

ठूँठ पर बैठा पंछी करे रूदन
हेरे आर्त भाव मानव ओर ।।

मानव ने तजी कब की मानवता
है हवस बस जिसकी खतम न डोर ।।

जाने कब तौबा करे गुनाह से
रहे हाबी भौतिकता का जोर ।।

पंछियों का गान अब कहाँ 'शिवम'
आ गये आज डी जे कान फोर ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 22/10/2019

22 /10 /2019
बिषय ,,पंछी,, परिंदा

पंछी बन मन उड़ चला
सितारों से गोद भर आसमान में घूमता
सागर की लहरों से अठखेलियां कर चूमता
नदियों की तरंगों को सुन सुन कर झूमता
परियों के संग आँख मिचौली कर ढूँढता
नित नव उड़ान भरता. परिंदों के संग
दोनों हाथ उलीचता नए नए रंग
सैर को जाता सात समुंदर पार
अंबर के आंचल में छिपता हर बार
धरा के मोतियों को बीन बीन सहेजता
प्रकृति की गोद में बालक बन लेटता
क्षणिक सुखों को भोग वापिस आ जाता
आटा दाल में पुनः रम जाता
स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार

दि.22/10/19.
विषयः पंछी/परिंदा

*
मंगलाशाः

रँगमगे पंख वाले पंछी,
अंबर-अवनीतल पर चहकें।
समदर्शी भाव जगें सब में
कोई न कहीं बहकें दहकें।।

बरसे अविरल आमोद सरल,
सरसे सम्बन्ध स्नेह - धारा।
मंगल - श्रीयुत हो वसुन्धरा,
नर का सौभाग्य बने न्यारा।।
-डा.'शितिकंठ'
22/10/2019
विषय-पंछी/परिंदा
=
===============

एक परिंदा हूँ मैं
पर मेरे पंख कहाँ???
ज़िंदा हूँ मैं
पर धड़कन कहाँ???

जब मैं पैदा हुई
सबके मुंह बने थे
अरे लड़की हुई!!
एक मातम सा छाया था वहां।।

बगल में लड़का हुआ
मानो रब का सज़दा हुआ
बड़े जोरों से जश्न मनाया गया था वहां।।

"बेटी लक्ष्मी है, दुर्गा है ,देवी है"
सच में??
ये दुनियां कितनी झूठी और फरेबी है..
हकीकत में
भला क्या ये मानता है जहाँ???

महज मंदिरों में पूजित है नारी
जिसकी वजह से ये कायनात है सारी
जग में उसकी अपनी पहचान है कहाँ??

जिसके वज़ूद से ये दुनियां कायम है..
छलनी हुआ आज उसका दामन है..
उसका स्वयं का वज़ूद है कहाँ???
परिंदा हूँ मैं
पर मेरे पंख कहाँ???

एक बार मुक्त करके देखो
छू लूँगी मैं भी आसमाँ
अपने लिए बनाउंगी
सुंदर सशक्त ये जहाँ..!!

**वंदना सोलंकी**©स्वरचित®

तिथि_22/10/2019/मंगलवार
विषय_ पंछी परिंदा

विधा॒॒॒ _छंदमुक्त

मन पंछी तोउडता फिरता।
आज यहां तो कल कहीं मिलता।
इसका नहीं कोई ठौर ठिकाना
इस शाखा से उधर फुदकता।

मन सदा अपनी मनमर्जी करता।
मन अपना मन नहीं भरता।
मन की महिमा अपरंम्पार
मनपंछी मन से नहीं मरता।

मन मयूर कहीं कहीं डोलता।
मनमंदिर से नहीं बोलता।
जीव परिंदा कभी उड जाऐ
फिर भी देखें जहर घोलता।

ढूंढ ढूंढकर तिनके बाने
अपना कहीं यह नीड बनाता।
चूजे शाम तक प्रतीक्षा करते
लौटआऐ तब शोर मचाता।

कलाकार हैं सभी परिंदे
कोई मधुरम से गीत सुनाता।
वया बनाऐ सुंदर घोंसला
कभी कोई मनमीत बुलाता।

कहीं शिकारी इन्हें ढूंढते
अपना जाल ये रोज बिछाते।
जब लालच में आऐं परिंदे
इनके जाल में फंस जाते।

स्वरचित
इंजी शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना मध्य प्रदेश

विषय -पंछी/ परिंदा
दिनांक 22-10- 2019
पंछी की तरह पंख नहीं,ख्यालों से उड़ा करती हूँ।
मैं जीवन की कहानी,इस तरह लिखा करती हूँ।।

झूठी हमदर्दी पसंद नहीं,स्वाभिमान जिया करती हूँ।
बेगानों से दूरी, अपनो के करीब रहा करती हूँ।।

संघर्ष सफलता पाने का हुनर,पंछी सीखा करती हूँ।
आए कितनी बाधाएं,हिम्मत ना हारा करती हूँ।।

संयम रख हुनर से, मंजिल को पाया करती हूँ।
पंछी के जीवन से मैं, बहुत कुछ सीखा करती हूँ।।

ईश्वर की इस रचना को, बारंबार नमन करती हूँ ।
अनवरत मेहनत करना, पंछी से सीखा करती हूँ।।

वीणा वैष्णव
कांकरोली

दिनांक- 22/10/2019
शीर्षक-पंछी/परिंदा
वि
धा- छंदमुक्त कविता
*****************
एक दिन का पंछी बन जाऊँ,
स्वतंत्रता से मैं पंख फैलाऊँ,
खुली हवा का लुप्त उठाऊँ,
एक परिंदा में भी बन जाऊँ |

न कोई बंधन न कोई दीवार,
चारों तरफ हो प्यार ही प्यार ,
ये तेरा है और ये मेरा है,
ऐसा न आये कभी विचार |

धर्म, मजहब की न हों दीवारें,
भेद-भाव को रखें सब किनारें,
हर मौसम में बस प्यार ही बरसे,
ये देखने को मेरे ये नैंना तरसें |

परिंदो में न दिखे भेद-भाव,
उनका तो घर है खुला आकाश,
ऐसा परिंदा मैं भी बन जाऊँ,
आसमान की सैर कर आऊँ |

स्वरचित- *संगीता कुकरेती*

सादर नमन
पंछी
सार छंद(16,12, अंतगुरु-गुरु)--एक प्रयास


पंछी पर हीन पिंजरे में
कितना भी अकुलाए
नभ का द्वार खुला है साधो
कागा बहु इतराए

मुट्ठी भर जग में खग देखो
डाले अपना डेरा
कनक कटोरी के बदले में
मिला लौह का घेरा

जीवन गति हीन पराधीन
मति महती चकराए
पिंजर-मोह विमुक्त परेवा
पुलक पंख लहराए
-©नवल किशोर सिंह
22-10-2019
स्वरचित

सादर नमन भावों के मोती
22/10/2019
शीर्षक - पंछी/परिंदा

विधा - चोका

आता परिंदा
चहकता चमन
हर्षित मन
झुलसाती गर्मी
भिगोए तन
धन्य श्रेष्ठ कुम्हार
ज्यों करतार
रचे माटी संसार
बड़ा सकोर
मैं दाना-पानी रखूँ
तुझे खिलाऊँ
तेरी प्यास बुझाऊँ
हो मेहमानी
जाना न कहीं और
बनाना ठौर
लगता प्यारा शोर
रच घोंसला
इसी नीम के तले
उड़ना मुझे सिखा ।

-- नीता अग्रवाल
स्वरचित

22अक्टूवर19मंगलवार
विषय-पंछी/परिंदे

विधा-हाइकु
💐💐💐💐💐💐
(१)
पढ़ाते पंछी
मुक्ति मन्त्र का पाठ
मानव बन्दी🎂
💐💐💐💐💐💐
(२)
कोकिल कण्ठ
परिंदों की चहक
मधुर स्वर💐
💐💐💐💐💐💐
(३)
परिंदे लाते
चुनकर तिनके
नीड़ बनाते👌
💐💐💐💐💐💐
(४)
पंछियाँ हमें
प्रेम-प्रीत की रीत
हैं सिखलाते👍
💐💐💐💐💐💐
(५)
माल हड़प
चाह नहीं,जीने की
पंछी के मन💐
💐💐💐💐💐💐
श्रीराम साहू अकेला

विषय परिंदा
22/10/2019


दर्द एक परिंदे का

नन्हा सा फरिश्ते
जान हथेली पे ले घूमते
जीने के लिए बेचारे
सरहदों पार जाते
इस मुल्क से क्या
दूर मुल्कों को जाते
दिलो से जोड़ते रिस्ते
फिर गुमनाम हो जाते
कितनी मुसीबतों से
है खुद को बचाते
कातिल निगाहों का
निशाना भी बन जाते
चहु ओर उनका
वीराने चमन होता
कभी यहाँ तो कभी वहाँ
इनका घर बार होता
न कोई ठौर है न कोई ठिकाना
दानों के लिए बाजी
लगा देते जान की
अपनी खुशी के खातिर
बनाते पिंजरे का साथी
नही चैन उनको मिलता
रखते है सफर जारी

स्वरचित
मीना तिवारी
पंछी मुक्तक का प्रयास

मन पंछी उन्मुक्त गगन में, ढूंढ रहा है छोर
पँख पसारे स्मृतियों के,मचा रहा है शोर
सागर नदियाँ उपवन कानन स्वप्निल सा वह लोक
करता आंखमिचौली नित नित,तरु शाखाएँ हिलोर।

पिंजरे में सोने का पंछी,भूल गया है उड़ान।
पंखों में सामर्थ्य न रहीं, संकट में है जान।
देख देख अकुलाता नित वह,स्वच्छ विमल आकाश
पराधीन जीवन क्या जीवन,खोकर निज सम्मान।

स्वरचित
गीता गुप्ता 'मन'

नमन भावों के मोती
आज का विषय, पंछी, परिंदा
दिन , मंगलवार

दिनांक , 22, 10, 2019,

खुले गगन में करें बसेरा,

न कुछ तेरा न कुछ मेरा ।

मेहनत होता जिनका गहना,

नहीं भूख से ज्यादा चाहना ।

कुछ महल झोपड़ी से न लेना ,

जहाँ रात हो वहीं रूक लेना ।

सदा मस्त हवा में उड़ते रहना,

ईर्ष्या द्वेष से दूर ही रहना ।

जीवन पंछी का सीधा सादा ,

रहती नफरत न कोई वादा ।

ये आते कितने काम हमारे ,

पर हम न हुए इनके रखवाले ।

हम बनें प्रकृति के सृजनहारे,

चहक उठेगें सब पंछी प्यारे ।

ये खुशियाँ कितनी हमको देते,

चहचहा के सब पीड़ा हर लेते ।

कुछ दाना और पानी देकर के ,

बनें शुभचिंतक हम पंछियों के।

स्वरचित , मीना शर्मा , मध्यप्रदेश
 नमन मंच
भावों के मोती
दिनांक 22.10.2019

विधा :तांका
उन्वान:परिंदा

1.
उड़े परिंदे
मुस्कान बिखेरते
घर लौटते
लालिमा आकाश में
पानी है प्रकाश में
2.
हुआ उजास
पक्षी मापे आकाश
हँसते गाते
परिंदे आते जाते
दोनों पंख फैलाते

----हरीश सेठी झिलमिल
(स्वरचित)
ता:-22/10/2019।
विषय :-पंछी/परिंदा
विधा:-कविता
पंछी :-
उंन्मुक्त गगन में
विचरण कर पंछी
ढूंढ़ रहा है ठौर कहीं
पल भर का विराम
लेने को उसको नही
मिलता ठौर कहीं
लौट धरा पर किसी
शाख पर बैठा फिर
मन ही.मन करता
वह बैठा. चिंतन
उड़ने को छूने ऊँचा
स्वपन दिखाता
हमें गगन पर द
दाना चुग कर
रहने को ठौर सदा
हमको देती.है धराती।
उषासक्सेना:-स्वरचित

शीर्षक- पंछी

मैं एक पिंजरे का पंछी
चाहकर भी कहीं
उड़ न पाऊं।
दिल की चाह
हमेशा दिल में ही
दबा कर रह जाऊ।
देखती रहती बेबश
नभ मैं उड़ते विहंग
नीर बहाती नियति पर
मगर कुछ कर न पाऊं।
जो मिले वही खाती
वंचित आजादी से।
औरों की तरह चाहकर भी
खुली हवा में उड़ ना पाऊं।
काश कि किसी दिन आए
कहीं से कोई फरिश्ता
खोले द्वार पिंजरे का
और मैं झट से उड़ जाऊं।

स्वरचित- निलम अग्रवाल,खड़कपुर

नमन भावों के मोती
आज का विषय पंछी-परिन्दा
पंछी / परिन्दा
शिकारी ने लगा करजाल का फन्दा।
फंसा लिया उसमें उसने एक परिन्दा।।
परिन्दे को पिंजड़े मे बन्द कर दिया ।
छीन पिंजड़ा मैने परिन्दा उड़ा दिया।।
दिया है परिन्दे मैने मैनेतुझे उड़ा ।
जिसमें था बन्द तू,तेरा वही पिंजड़ा ।।
छूट गया है तू आज मिली आजादी ।
रहेगा प्रसन्न होगई समाप्त बरबादी ।।
हुये बन्धन समाप्त सामने है गगन ।
जाये चाहे जहाँ खुला पड़ा आसमान ।।
रहेगा नहीं अकेला,मिलेंगें तुझे साथी ।
रह आनन्द से जीवन पड़ा है बाकी ।।
डा0 सुरेन्द्र सिंह यादव“
“व्यथित हृदय मुरादाबादी”
स्वरचित

मीना मल्लवरपु
सादर नमन मंच भावों के मोती
22.10.2019
शीर्षक- आज़ाद परिन्दा
विधा-मुक्तक

मैं हूं वह आज़ाद परिन्दा
जिसकी उड़ान
मौत को छोड़
रोक न पाएगा कोई

उड़ान में पड़ेगा जब विघ्न
छोड़ परिन्दों के झुंड मुझे
निकल जाएंगे जब आगे
न होने दूंगी,ख़ुद को मायूस

कायरता नहीं है
है फ़ितरत मेरी
हार से हारना,
आदत नहीं मेरी

उड़ना है जीवन,
है उड़ान स्पन्दन-
आसान यह सफ़र
कब किसने कहा

अनिवार्य यह सफ़र
सभी ने जाना
अनिवार्य है आना
अनिवार्य है जाना

स्फूर्ति और प्रेरणा,
जीवन की गरिमा
आज़ादी का राज.
क्यो ढूंढूं इधर उधर

सभी का वास
है मेरे ही अंतर्मन में
प्रेरणा वही,स्फूर्ति वही
हूं आज़द परिन्दा मैं
आखिरी सांस तक

भावों के मोती
22/10/19
विषय-पक्षी,पंछी, परिंदा

दूर मूंडेर पर बैठा पक्षी
जाने क्या सोच रहा ,
धीरे-धीरे इधर-उधर तक रहा,
जाना घर वापस पर
एक दाना भी नही पास ,
कैसे भूख मिटाऐगा नन्हों की,
झांकते होंगे बार-बार
घोसले से क्षुदा मिटाने अपनी,
राह तकते जन्म दाता की
कुछ लेके आते होंगे ,
उधर वो व्याकुल ढूंढ रहा
जाते-जाते कुछ पा जाऊं ,
थोड़ा दे के ही बहलाऊँ ,
कल का वादा कर सुलाऊँ ,
हा जिंदगी कैसी विडंबना तेरी
हर दीन भी दिन के अंत में
यही सोचता सा घर जाता है ,
अपनो से नजर चुराता है ,
मानो अपराध कर घर लौटा है।

स्वरचित

कुसुम कोठारी।

भावों के मंच को सादर नमन
मेरी रचना सादर प्रेषित
------------------/////////--------------------
दिनांक:--- 22/10/2019
दिन :---- मंगलवार
विधा :-----कविता
-----: परिंदा :------ संजोयें थे सपने हमने अपने जहाँ के,
मिलकर बसायेंगे खुशियाँ बागेबहार के।
लो अब आ भी जाओ इस शहर में,
वक्त परिंदा ठहर गया तुम्हारे इंतजार में।
जरूरत है मुझे तुम्हारी हर वफा की,
संग जो तुम्हारा मिले मुझे इस दफा भी।
हर पल यादों को समेटा हूं दिल में,
आ अपने ख्वाबों को बसा ले इस दिल में।
....................:....................
स्वलिखित
(कन्हैया लाल श्रीवास)
भाटापारा छ.ग.

 नमन भावों के मोती
22/10/19
आज के शीर्षक पर एक प्रयास सादर🙏🌹
गुजरो गली से तो इतना तो ताल्लुक़ात रखना।
फुलों के साथ कांटो से भी मुलाक़ात रखना।।

गोशा-ए-गुलशन से जब भी तुम ग़र ग़ुजर करो।
परिन्दों की नींद में मीठे- मीठे ज़ज़्बात रखना।।

आँधियों की गुस्ताख़ियों को नजर अंदाज करना।
आशियां के तिनकों में एकता के सलीक़ात रखना।।

आसमां छूने में परिन्दों अगर तुम्हारे घर उजड़े।
जमीनों से तुम परिन्दों थोड़ी मुलाकात रखना।।

इज़हारे-मुहब्बत की कुछ रश्मे-इबारत रखना।
गुज़ारिश है ख्वाबों में पुराने तजुर्बात रखना।।

✍🏻गोविन्द सिंह चौहान

नमन भावों के मोती
दिनांक २२/१०/२०१९
शीर्षक-"पंछी
विधा -वर्ण -पिरामिड
१)ये
पंछी
अमोल
मनोहारी
चहके सदा
ईश उपहार
सुरक्षा अधिकार।
२)
मैं
पंछी
उन्मुक्त
उड़ू नभ
घोंसला बुनू
चाहूँ संरक्षण
मुक्त हस्त दे प्यार
स्वरचित आरती श्रीवास्तव।

नमन् भावों के मोती
22/10/19
विषय:पंक्षी/परिन्दा
विधा:हाइकु

साँझ पहर-
आसमान में पंक्षी
नीड़ की ओर

पेड़ पे पंक्षी-
शिकारी ने उसपर
चलायी गोली

पेड़ों की ओट~
शिकारी ने फंसाया
जाल में पंक्षी

उषा काल में
पंक्षियों का नाद-
नभमण्डल

पेड़ मञ्जरी~
पंक्षियों के समूह
आम डाल पे

गिद्ध प्रजाति~
दवा दुष्प्रभाव से
परिन्दे नष्ट

मनीष श्रीवास्तव
स्वरचित
रायबरेली

नमन "भावों के मोती"
22/10/2019
"पंछी/परिंदा"
1
मन का पंछी
नीले आसमान में~
उन्मुक्त उड़ा
2
कैदी परिंदा~
आकाश निहारता
आस न खोया
3
प्राण पखेरु~
लौटकर न आया
पंछी सा उड़ा
4
मन परिंदा~
बंधनों में जकड़ा
जग की रीत
5
मन का पंछी
आकाश भुलाकर~
प्रेम से बंधा

स्वरचित पूर्णिमा साह
पश्चिम बंगाल।।

22;10:2019
मंगलवार
विषय-पंछी/परिंदा
आज के विषय पर मेरी रचना :

ये सदा गगन में उडते,
किसी को नहीं सताते ।
लाते सब घर का पोषण,
जो मिले उसे ले आते ।।

नहीं मानव जैसी नफ़रत,
कोई चोरी डकैती नहीं ।
जितना मिलता है खाते,
कभी संचय करते नहीं ।

घात लगाकर वे धोखा,
नहीं किसी को देते ।
निज पेट को ही नहीं ,
परिवार पेट भी भरते

मानव मानव का दुश्मन है,
वे छुरी पीठ में घोंपते ।
ये रहें प्रेम सदभाव से ,
सब परिवार को भी पोषते ।।

कहीं दूर जाना हो जब,
एक साथ वे उडते ।
जाते नहीं वे इधर उधर,
अनुशासन पालन करते ।।

सीमित में संतोष पाठ ,
गर मानव इनसे सीख ले।
बड़ी समस्याओं से वे ,
शीघ्र बड़ी निजात लें।।

स्वरचित
डॉ एन एल शर्मा जयपुर
)डॉ नरसिंह शर्मा 'निर्भय ,जयपुर)

तौहीन ए ईमान से खुद किनारा कर लिया।
मैंने फाकों से दोस्ती की गुजारा कर लिया।

उनके महल की सोने , के पिंजरे सी जिंदगी।
काटे कटी ना रात सफर गवारा कर लिया।

मै तुम वे और आप की चख चख है बेमजा।
प्यारी सी एक हंसी सबको प्यारा कर लिया।

उनकी हंसी पे कैसे हंसा यूं अरसे के बाद मैं।
मालूम हो कि जख्मे- दिल दोबारा कर लिया।

छुपाते रहे हैं लोग अक्सर ऐबों को पैरहन में।
मैंने गिरते हुए मेयार का, नजारा कर लिया।

आज उनके इल्म के हम भी हुए हैं कायल।
दौलत को अपनी मांग का सितारा कर लिया।

हंसती है आज सोहल ये जमाने की रौनके।
तूने गिरती हुई दीवार का सहारा कर लिया।

विपिन सोहल
दिनांक 22/10/2019
विधा:हाइकु
विषय पंक्षी/परिंदे

पंक्षी चहके
कलरव मधुर
भोर संदेश।

कोयल कूके
मोहक कर्णप्रिय
पक्षी विशेष ।

मन परिंदा
चक्रवर्ती तूफान
कल्पना लोक ।

पंक्षी उडान
प्रबंधन की सीख
एकता मंत्र।

चाहो के पक्षी
उडते गगन मे
अनन्त छोर।

परिंदा गिद्ध
लक्ष्य भेदन कला
एकाग्र मन।

पंक्षी विहार
विकसित अनेक
बाँट जोहते ।

पंक्षी बचाव
पराश्रव्य तरंगें
हो अभियान ।

स्वरचित रचना
नीलम श्रीवास्तव लखनऊ उत्तर प्रदेश

परिंदा/पंछी
***

उड़ते परिंदे सिखा रहे
दुनिया इक सराय है ।
क्यों संचित कर रखना
क्यों मायाजाल में फंसना।
पंखों पर है उसे भरोसा
रात बिता उड़ जाते हैं।
हम आये दुनिया मे
कर्म करें ,
क्यों मायामोह मे पड़े
रात बिता
मन का पंछी इक दिन
पिंजरे से उड़ जाएगा
सतकर्मों के सिवा
क्या यहाँ से जाएगा।
दुनिया एक सराय है
कुछ दिन के हम
पथिक यहाँ

स्वरचित
अनिता सुधीर

22/10/2019मंगवार
विषय पंछी परिंदा
विधा॒॒॒ छंदमुक्त

जब उड जाऐ तन से पंछी
सब यहीं धरा रह जाऐगा।
शेष बचेगा केवल पिंजर
जो जल राख हो जाऐगा।

धरा धरा तू क्या करे धरा पर
मानव जीवन सफल बना ले।
पता नहीं कब उड जाऐ पंछी
मनमंदिर को विमल बनाले।

मायामोह में फंसा हुआ मन
ये दुनियादारी राग बहुत हैं।
रोज देखते रहते हम सबही
पंछी तेरे खरीददार बहुत हैं ।

दीन दुखियों के गम समेटकर
चलें काम कुछ अच्छे कर लें।
जितना भी सभव हो सकता
हम झोली खुशियों से भरलें।

न पकड सकें हम मनपरिंदा
मनमौजी इसकी चलती है।
समय नहीं अब अपने पास
धीरेधीरेअब उमर ढलती है।

घढियां गिनते रहते रोजाना
क्या पता कब पंछी उड जाऐ।
छोड गया एक बार पिंजरा तो
लौट कभी वापस नहीं आऐ।

स्वरचित
इंजी शंमभूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म प

भा पंछी परिंदा छंदमुक्त
22/10/2019मंगवार

No comments:

"जिम्मेदार"18नवम्बर 2019

ब्लॉग की रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं बिना लेखक की स्वीकृति के रचना को कहीं भी साझा नहीं करें   ब्लॉग संख्या :-569 Hari ...