Tuesday, November 5

"रूप , सौंदर्य"26अक्टुबर 2019

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ब्लॉग संख्या :-547
शीर्षक- रूप/सौन्दर्य।
२६/१०/२०१९
यि अभि रुप आम्रपाली हो।
मनभावन पावन रुप स्वरुपणी।
केशलटाऐ कटिप्रदेश स्पर्शित।
वेणी गुथिंत धवल पुष्प से।
कुछ केश लटे वक्षाच्छादित।
मानो उन्नत उरोज कृष्ण पक्ष।
कमनीय आभा मधुमाती सी।
कर्णाभूषण मालती कुशुम से।
कदम्बपुष्प से कण्ठाभरण।।
नासिका परिजात पुष्पंमंडित।
दंतकांति गुलाबपंखुडीमंडित।
ओष्ठ राग जपापुष्प आच्छद।
मंद सुगंध से मद्मस्त होते।
पथिक रुक जाता पथभूल।
वक्षस्थले पद्म पंखुड़ी वस्त्रं।
उदरस्थले कमलपत्राच्छादित।
कटिप्रदेशपुष्पंमंडित आच्छादित।
सर्वांगसुन्दरीम् सर्वांगपुष्पे।
मंदसुगंध समीर सुरभित।
मनभावन उत्तम भावनामयी।
सरोवर निकट शिला पर बैठी।
बट शाखो पर झूलती मदना।
परीलोक सी शहजादी बन।
बैशाली सी आम्रपाली बनजाती।
हस्त नखों मे गुलाब पंखुड़ी।
कटिप्रदेश कदंब पुष्प हार।
पैर अगुलियां पुष्पाच्छादित।
सन सुणिऐ सी पायल आवाज।
परीलोक की शहजादी बन।
उतरी गगन से पुष्पाच्छादित हो।
सर्वांगसुन्दरीम् हाव भाविके।
बैशाली सी आम्पाली आभे।
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
स्वरचित
राजेन्द्र कुमार अमरा

मोती
विषय रूप,सौंदय
विधा काव्य

26 अक्टूब 2019 शनिवार

चाँद तारों से रजनी शौभित
क्या सौंदय पाया है नभ ने?
नव रंग वसुधा आच्छादित
अद्भत रूप सजाया है रब ने।

रंग रूप से सजी है दुनियां
रंगों की महिमा अति भारी।
चंपक वर्ण यौवना को लख
सगरी दुनियां जाती है वारी।

रूप सौंदय की गागर से
हर पल नव रूप झलकता।
नित नित जीवन उपवन में
सुमन सौंदय सदा महकता।

रंग रूप रस भँवरे डोले
चमन सदा गुंजायमान है।
आता जाता रूप सौंदय
काया कँहा नित्यमान है?

स्वरचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

रूप
प्रथम प्रस्तुति


🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷

सौंदर्यता सुन्दर सोच का नाम
सौंदर्य कुदरत का सुन्दर ईनाम ।।
नही आसान आँकलन यह तो है
निश्छल निष्कपट आत्मा का काम ।।

सौंदर्यता कहाँ नही है समायी
सौंदर्यता हर शय में है पायी ।।
आत्म रूप हमारा कहाँ आशक्त
सौंदर्यता वहाँ है कहलायी ।।

ज्ञानियों को कहाँ न सौंदर्य लगा
उनका शुद्धतम आत्म रूप होय जगा ।।
नकारात्मक सोच समूल नष्ट होय
रहे सकारात्मक का सिक्का जमा ।।

हो अगर सोच सुन्दर तो स्वर्ग यहीं
नही जो सोच सुन्दर तो नर्क यहीं ।।
सब कुछ सोच का परिणाम 'शिवम'
है कुदरत बहुत सुन्दर करना यकीं ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 26/10/2019

दिनांक-26.10.2019
शीर्षक-🌹रूप/सौंदर्य🌹
िधा -मुक्तक
=====================
(01)
रूप का आगार तुमको देखकर कविता लिखूँ मैं ।
कीजिए श्रृंगार तुम को देखकर कविता लिखूँ मैं।।
वासनाएँ यज्ञवेदी पर हवन कर राख कर दूँ ,
प्रेम का आधार तुमको देखकर कविता लिखूँ मैं ।।
(02)
मैं प्रणय को भस्म तन पर यूँ रमाना चाहता हूँ ।
जो तुम्हारे रूप पर अधिकार पाना चाहता हूँ ।।
आकुल विरह पीड़ित तुम्हारा हूँ मुझे शाश्वत शरण दो,
पारश्ववर्ती परिधि से बाहर न जाना चाहता हूँ ।।
=====================
'अ़क्स' दौनेरिया
विषय-रूप/सौंदर्य
विधा विधा-पद्य

दिनांकः 26:10:2019
शनिवार
आज के विषय पर मेरी रचना:

जब सावन में बरसे बादल,
चहुंओर हरियाली आती है ।
सौदर्य वान हो वसुंधरा,
मदमस्त चमक छा जाती है ।।

रूप चौदस है दिन इसका,
यह सौन्दर्य उनको देती है ।
जो ब्रह्ममुहुर्त में स्नान करे,
यह कृपा उन्ही पर होती है ।।

है जीवन में सौंदर्य तभी,
जब मानव गुणवान बने ।
सभी विकारों को छोडकर ,
परहित जनहित मन बनें ।।

हों मृदुभाषी और सदा सत्य,
जीवन में घुले हमारे हों ।
हो विलासिता किंचित नहीं ,
निर्मल मन से शोभित हों ।।

रूचि अभिरूचि ऐसी हो ,
कर पुरूषार्थ आगे बढ जायें ।
कल्याण लोक हम सदा करें,
मानव कर्मवीर हम बन जायें ।।

झिल मिल तारे नभ में,
सौदर्य सदा बढाते हैं ।
चंदा जब आता सामने,
चार चाँद लग जाते हैं ।।

प्राकृतिक सौंदर्य हमें,
सदा से ही लुभाता है ।
कश्मीर की वादी में,
स्वर्ग सदा आ जाता है ।।

सौदर्य विपुल हिमालय का,
हमारे मन को मुग्ध करता है ।
पर्यटन में झीलों का रूप,
मनमोहक सबको लगता है

सावन के महीने में हरदम,
प्राकृतिक रूप निखरता है ।
हो रिमझिम की बौछार अगर,
मौसम बहुत सुहाना लगता है ।।

स्वरचित
डॉ एन एल शर्मा जयपुर
(डॉ नरसिंह शर्मा' निर्भय, जयपुर)
दिनांक..........26/10/2019
विषय ............🌷रुप/सौंदर्य🌷
िधा.............🌷कविता🌷
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸
*******🙏कृष्ण-सौंदर्य🙏*******
कान्हा कमलनाथ कंजलोचन,
केशव कृष्ण मनमोहन ।
माधव मोहन मदन मनोहर,
श्याम सुदर्शन रविलोचन।
🍇🍇🍇🍇🍇🍇🍇🍇🍇🍇
*रुप* सुहावन
अति मन भावन।
*सौंदर्य* की मूरत
शयामल सी सूरत।
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अधर में मुरली धर,
बन गये मुरलीधर।
पीत अम्बर धर ,
बन गये पीताम्बर।
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पांखी सर पे राखिये,
श्याम लगे मुस्काये।
मुकुट सर पे साजिये,
लकुटी कांख दबाये।
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गिरधर गोपाल गोविंद नंदलाल,
बांके बिहारी बृजेश बृजलाल।
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जगदीश जगन्नाथ निर्गुण नारायण,
श्याम सुन्दर सांवरा घनश्याम।
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गल पुष्प शोभित कर्ण कुंडल धारय।
नैन काजल कजरारे,
माथ तिलक लगाय।
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कृष्ण की करु मैं वंदना,
कृष्ण मे रमे सदा ये मन।
कृष्ण को मेरा शत शत नमन।
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स्वलिखित
( कन्हैया लाल श्रीवास )
भाटापारा छ.ग.
तिथि _26/10/2019/शनिवार
विषय _ रूप सौंदर्य

विधा॒॒॒_काव्य

तन मन काया हो प्रफुल्लित,
कुछ तो अपना रूप निखारें।
कितने सचमुच दिखते सुंदर ,
ये मुखडा मन दर्पण निहारें।

हर गोरी काली त्वचा जलेगी।
यह भौतिक हस्ती नहीं रहेगी।
कब तक इसे संवार पाऐं हम
क्या मरने तक ये नही मिटेगी।

इस जीवन नहीं कोई भरोसा
अंतर्मन का सौंदर्य निखारें।
न रह पाऐ अंतरतम कलुषित
अपनी अंतरात्मा को संवारें।

क्षणभंगुर जीवन की कलियां
मानें एक दिन तो मुरझाऐंगी।
इन्हें चार कांधे ढोके ले जाऐंगे
केवल शेष राख रह जाऐगी।

बनें स्वयं गर ॠषि अष्टवकृ से
तप तप कर उर सौंदर्य संवारें।
रुप सौंदर्य कहीं नहीं दिखता
सभी ज्ञानवंत के पांव पखारें।

स्वरचित
इंजी शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय ,
मगराना गुना मध्य प्रदेश
जय जय श्री राम रामजी

1भा " रूप सौंदर्य" ,काव्य *
26/10/2019/शनिवार

नमन भावों के मोती पटल
वार : शनिवार
दिनांक : 26.10.2019

आज का विषय : रूप / सौंदर्य
विधा : काव्य

गीत

रूप रंग मदमाता चेहरा ,
हँसी बड़ी अनमोल है ।।
लगे हर्ष छवि डूबी-डूबी ,
नाज़ भरे से बोल हैं ।।

रोज़ इबारत नई लबों पर ,
हम तो बस हैरान हैं ।
मिले तीर हैं सजे नयन से,
काजर को अभिमान है।
घायल तन-मन नाम पुकारे,
दूर बज रहे ढोल हैं।।

कमर खा रही हिचकोले औ ,
ध्वनि नहीं पदचाप की ।।
आंख मूंदकर हम बैठे हैं ,
कही न जाये आपकी ।।
लगे समय भी बहक-बहका ,
करता यहाँ मख़ौल है ।।

पुलक गात पे थिरकी लाली ,
अगवानी है लाज की ।
स्मित हास्य अधरों पे छलके ,
छिपा गये सब राज भी ।
कंचन काया, लट लहराती ,
सधे हुए सब तोल हैं ।।

हाव भाव आते-जाते हैं ,
चेहरा बना गवाह है ।
खुशहाली जगमग चमके है ,
हम तो भरते आह हैं।।
आज सुधारस की बेला है ,
उत्सव सा माहौल है ।।

स्वरचित / रचियता :
बृज व्यास
शाजापुर ( मध्यप्रदेश )

रूप/सौंदर्य
रूप, सौंदर्य तो है चार दिनों का।

असली सौंदर्य तो है मन की सुन्दरता।
कितना भी सुन्दर मुखड़ा क्यों नहीं हो।
गर मन है काला तो किसी को नहीं जंचता।

सौंदर्य बोध तो मन से होता है।
किसी को चांद है खुबसूरत लगता।
पर उसी चांद में किसीको।
दाग़ कभी भी अच्छा नहीं लगता।

दीवाली का त्योहार बड़ा मनमोहक।
दीपमाला का सौंदर्य अनोखा है लगता।
चारों ओर दीपमालिका है सजी हुई।
इसका रूप मन को बहुत भाता।

जगमग करते हैं सबके घर आंगन।
इसका रूप बड़ा है सजता।
चहुं दिशा का तम हरने को।
दीवाली पर्व हर वर्ष है आता।

...... वीणा झा......
.. बोकारो स्टील सिटी..
...... स्वरचित.....

26/10/19

रूप / सौन्दर्य


मन की पवित्रता
मन की खुशहाली
में है
चेहरे से ज्यादा सौन्दर्य
रूप का रहता
सौन्दर्य चंद दिन
व्यवहार कुशलता
मधुर भाषा
सत्य वचन देते
जीवन भर का सौन्दर्य

अपने रूप
अपने सौन्दर्य पर
मत इतना इठला
मूर्ख इन्सा
यह तो है चंद दिनों
की चांदनी

बन कर्मठ
बन ईमानदार
बन मातृभूमि भक्त
बन माता पिता का
सेवक
कर ईश वंदना
हर वक्त

यही है
इन्सान का
सच्चा सौन्दर्य

स्वलिखित
लेखक संतोष श्रीवास्तव भोपाल

शीर्षक -रूप/सौंदर्य
दि.26-10-19

विधा -दोहे
1.
पा यौवन की डेहरी, रूप रंग श्रंगार।
हमसे सुंदर है कहाँ,कोई भी किरदार।।
2.
स्वाभाविक जु सुंदरता , होती है अनुकूल।
दुबला तन,पतली कमर, पाँव बने नहिं शूल।।
3.
स्थिर रहता रूप कब, कब न घटा है मान।
उम्र बीतती है सतत, घटता रूप वितान।।
4.
रंग रूप सब उतरता, ढले देह की शान ।
बूढ़ी काया ठिठकती, भूले खुशियाँ गान।।
5.
गर्व रूप का मत करो, दो दिन की ये शान।
जाने कब पाला पड़े, रोग मौत शमशान।।

******स्वरचित*******
प्रबोध मिश्र ' हितैषी '
बड़वानी(म.प्र.)451551

विषय -रूप/ सौंदर्य
दिनांक 26-10- 2019
आकर्षक दिखने के लिए, औरतें कितने जतन करती है।
द्वारपाल बना पति को ,पूरा दिन पार्लर में व्यतीत करती है ।।

रूप निखारा जिसके लिए,उसकी नजरों से दूर रहती है।
लीपापोती कर बदन की, असली सौंदर्य छिपाती है।।

मन को महत्व न दे, तन सौंदर्य को क्यूँ इतना बढाती है।।
तन सौंदर्य के चक्कर में, पहचान अपनी खो देती है।।

चेहरे की चमक का क्या, कुछ ही दिनों में खो जाती है।
आपके व्यक्तित्व की पहचान, कार्यशैली बनाती है।।

तन के साथ मन सौंदर्य बढा,आभा स्व बिखरती है।
अपनी पहचान बना इस तरह,तेरी अगवानी करती है।।

वीणा वैष्णव
कांकरोली
नमन मंच भावों के मोती
26/10/2019
शीर्षक-रूप/सौंदर्य

विधा-हाइकु
===============

रूप चौदस
अंग अभ्यंग स्नान
स्वस्थ तन

सौंदर्य खिला
साज श्रृंगार कर
मन सँवरा

मनमोहक
मन मोहन कान्हा
बाल स्वरूप

रूप सौंदर्य
नव विवाहिता का
वर रीझता

**वंदना सोलंकी**©स्वरचित®

नमन मंच भावों के मोती
26/10 /2019
बिषय ,,रुप,,सौंदर्य

मन के भावों में माधुर्य हो तो रुप खिल जाता है
मन ही दर्पण बन शाश्वत सत्य सामने लाता है
सौंदर्य क्या जिसके हृदय हो गुणों की खान
जिसको पूजता सारा जग वही श्री हनुमान
गजबदन श्री गणेश प्रथम पूजे जाते हैं
काली माँ के द्वारे से लोग न खाली जाते हैं
रुप सौंदर्य तो प्रकृति की देन है
परंतु अच्छी है तो शुकून चैन ही चैन है
लेकिन लोग तो सौंदर्य ,रुप के उपासक हैं
सौंदर्य जाल में फंसे हुए विस्वामित्र जैसे अधिनायक हैं
स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार

26/10/2019
"रुप/सौंदर्य"

################
रुप साजन का मन में बसा
जीवन की बगिया महका
रुप -लावण्य निखर उठता
प्रीतम का प्यार जो मिलता।

पिया का प्यार उबटन समान
होठों पर खिलती है मुस्कान
सौंदर्य नारी का बढ़ जाता...
जीवन उसका धन्य हो जाता।

तन का सौंदर्य महज आकर्षण
मन की सुंदरता बाँचते है नयन
रंग-रुप निखरता तन-मन का
सौंदर्य बढ़ता घर आँगन का।।

स्वरचित पूर्णिमा साह
पश्चिम बंगाल ।।
दिनांक २६/१०/२०१९
शीर्षक-रूप/सौंदर्य"


बाहरी आर्कषण व्यर्थ है
व्यर्थ रूप श्रृंगार
सौम्यता हो जब चेहरे पे
सौंदर्य निखरे आप।

श्रेष्ठ कर्म और मधुर वाणी से
बढ़े आत्मविश्वास
आत्मविश्वास का साथ हो
सौंदर्य निखरे आप।

दर्प न हो रूप का
करके सोलह श्रृंगार
निर्मल मन व तन स्वस्थ हो
सौंदर्य निखरे आप।

स्वरचित आरती श्रीवास्तव।
घूंघट में छुपा, चंदा जैसा।
मुखड़ा है तेरा सोने जैसा।
एक बार तेरा दर्शन हो तो।

उड जाए है , नीदं मेरी।
चाल चले घुंघरू छनके।
मोती बाटे उन्मुक्त हसीं तेरी।
एक बार तेरा दर्शन हो तो।
उड जाए है नीदं मेरी।
गालों का रंग गुलाबी है।
बालों की घटा शराबी है।
उफन रही नदिया में जैसे।
यौवन ने आग लगा दी है।
मेरी रातो का सपना सच।
हो कर हो जाओ मेरी ।
एक बार तेरा दर्शन हो तो।
उड जाए है नीदं मेरी।

विपिन सोहल

 नमन मंच " भावों के मोती '
शीर्षक ..सौंदर्य/ रूप
1/

निखरा रूप
चौदहवीं का चांद
कितना प्यारा ,,,,,।
2/
सजनी सजे
साजन मन भाए
सार्थक रूप ,,,,,,,,,।
3/
रूप निहार
खिल उठा यौवन ,,,
सौंदर्य बोध ,,,,।
स्व रचित ..... " विमल '

रुप,सौन्दर्य ,
ग़ज़ल,
हार दुखों का पहनना आ गया,
रोते दिल को हंसाना आ गया,
सच की ताकत सभी पहचानते,
झूठे रिश्तों को तोड़ना आ गया,
प्यार का पैगाम मिलते उनको,
रुप को संवरना आ गया,
अकेले खुद से बतियाने है,
जग की भी ड़ में जीना आ गया,
क्यो मां गंगे सहारा जीने का,
अपना बोझ उठाना आ गया,
नेह के दीप जलते जब रात में,
रुठे पिया को मनाना आ गया।
स्वरचित देवेन्द्र नारायण दास बसनाछ ग,

विषय_रूप सौंदर्य
विधा॒॒॒ _काव्य

चारू चंद्र सी चमक रही हो।
क्यूँ बिजली सी लपक रही हो।
लगे लिपाई पुताई हुई तुम्हारी
इसीलिए आज दमक रही हो।

कलिया गोरी दिख रही आज।
हूर आसमान से उतरी आज।
नहीं चाहिऐ कोई दामिनी,
रूप निहार के बजते साज।

तुम्हें देख दर्पण शरमाया।
देख श्रंगार सजन घबराया।
पता नही यहां आया कौन
रूप सौंदर्य से भरमाया।

खूब रसायन बटी लगाओ।
लाल गाल तुम सभी कराओ।
रूप चौदहवीं आज बुलाई
नकली असली माल पुताओ।

स्वरचित
इंजी शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय .
मगराना गुना मध्य प्रदेश
2भा "रूप सौंदर्य"
काव्य* 26/10/2019/शनिवार

आज का विषय, रूप, सौंदर्य
दिन, शनिवार
दिनांक, 26, 10,2019,

सौंदर्य बोध समाया है सबके मन में,
सबकी सोच छिपी हुई है भावना में।

अच्छा लग रहा है किसी को कानन में ,
खुश रहता है कोई कोई महफिल में ।

सौदंर्य अलग ही रहता है वेशभूषा चयन में,
अलग ही सौंदर्य बोध होता रंगों का मन में।

सबको कभी रूप अनूप लगे गोरे रंग में ,
वहीं कान्हा भा रहे हमें सांवले रंग में।

रहता है अलग- अलग पैमाना सभी का,
रहे पोषक कोई गुणों का तो कोई दौलत का ।

संसार में रूपवान तो वही होता है,
सबका हमदर्द बन के जो जीता है ।

बसेरा प्रेम भाव का जिसके उर में होता है,
रूप उसका ही हमेशा प्रकाशित रहता है ।

स्वरचित, मीना शर्मा, मध्यप्रदेश ,
शीर्षक- सौंदर्य

सौंदर्य बोध सबमें नहीं होता।
इसके लिए चाहिए मन की सुन्दरता।।
प्रकृति के कण-कण में बिखरा है
अपरिमित अद्भूत सौंदर्य मगर
हर इंसा इसे महसूस नहीं कर सकता।
इसके लिए चाहिए मन की पवित्रता।।
सुन्दर हैं वन,फूल, नदी,पर्वत, झरने
सुरज,बादल,अम्बर, चांद, सितारे
बस देखने के लिए वैसी नजरों की है आवश्यकता।

स्वरचित- निलम अग्रवाल, खड़कपुर

दि.26/10/19
विषयः रूप/सौन्दर्य
*
उन्नत ललाट की लोकोत्तर
सौन्दर्य-दीप्ति सह सके कौन?
बालारुण की कल किरण देख
खग-कुल कब तक रह सके मौन?

पुलकता कपोलों पर परिमल
रंजित ऊषा से अधर-पाश।
नयनों में तन्वीं रश्मि - रेख
विभ्रम में भ्रमरी का विलास।।

-डा.'शितिकंठ'

दोनों का अदभुद
है सिंगार
जन जीवन करता
उनका बखान
एक रूप पहेली
एक राह अकेली
दोनों की अद्भुद
छवि छाई
जिसे देख दुनिया मुस्काई
भोर हुई स्वर्ण
रङ्ग बिरंगी छवि छाई
जग जागा औऱ मुस्कराया
सजी दुनिया
तन मुस्कराया
धरती ने ली अंगड़ाई
रात अकेली जो बनी
पहेली
स्याह रात में सूनी डगर में
माथे चंदा लगा के बिदिया
तारे टके नीली चूनर
ओढ़ सवारियां
पी की नगरिया
देख विरहणी
लगा के टकटकी
रात गुजारे
रात ढल गई
निदिया भी उड़ गई
देख सादगी रूप अपार
मन भावे वो ही जागे
बाकी सब सो जावे

दिनांक 26/10/2019
विधा :हाइकु
विधा: रूप/ सौन्दर्य
1-
रूप श्रृंगार
शालनी आभूषण
झुकी पलकें ।
2-
वधु का रूप
संस्कार की ओढनी
उम्मीदें चली।
3-
रूप चौदस
नगरीय श्रृंगार
नयन सुख
4-
नभ श्रृंगार
चाँद सितारे संग
पूर्ण सौन्दर्य ।
5-
राम की पैडी
अयोध्या स्वर्ण रूप
दिया श्रंखला।

6-
सजी अयोध्या
नभ सरयू झाके
दुल्हन रूप ।
7-
जोश सैलाब
सियाराम का रूप
विश्व रिकॉर्ड ।

स्वरचित
नीलम श्रीवास्तव

दिनाँक-26/10/2019
शीर्षक-रूप , सौंदर्य
विधा-हाइकु

1.
सुंदर रूप
अगरबत्ती धूप
पूजा अर्चना
2.
लक्ष्मी गणेश
गजब का सौंदर्य
दिवाली रात
3.
मिट्टी के दीये
चमचमाती रात
पर्व सौंदर्य
4.
रंगोली द्वार
दीपावली सौंदर्य
उज्ज्वल घर
5.
प्यारी बिटिया
परिवार सौंदर्य
घर की लक्ष्मी
***********
स्वरचित
अशोक कुमार ढोरिया

26 अक्टूबर 2019

" रूप/सौंदर्य "

रूप/सौंदर्य केवल शरीरिक सुंदरता से नहीं आता

मन आत्मा की निर्मलता और सुंदर आचार व्यवहार इस रूप सौंदर्य को और जगमगाता

आपका अच्छा बात व्यवहार और मन की निर्मलता उसमें शामिल अवश्य होनी चाहिये

तभी आपको अपने शारिरिक मानसिक रूप सौंदर्य पर गर्व करना चाहिये

(स्वरचित)

अखिलेश चंद्र श्रीवास्तव

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"जिम्मेदार"18नवम्बर 2019

ब्लॉग की रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं बिना लेखक की स्वीकृति के रचना को कहीं भी साझा नहीं करें   ब्लॉग संख्या :-569 Hari ...